आर्थिक सर्वेक्षण 2026: जारी होने की तारीख, महत्व और क्या उम्मीद करें

जैसे-जैसे केंद्रीय बजट नज़दीक आता है, भारत की आर्थिक दिशा तय करने वाले महत्वपूर्ण दस्तावेज़ आर्थिक सर्वेक्षण 2026 पर सभी की नज़र होती है। इसे भारत की अर्थव्यवस्था का “रिपोर्ट कार्ड” माना जाता है। यह दस्तावेज़ नीति-निर्माताओं, छात्रों, शोधकर्ताओं और देश की आर्थिक सेहत में रुचि रखने वाले हर व्यक्ति के लिए बेहद अहम है।

इस मार्गदर्शिका में हम समझते हैं कि आर्थिक सर्वेक्षण क्या है, इसे कब जारी किया जाता है, और यह केंद्रीय बजट से कैसे अलग है।

आर्थिक सर्वेक्षण 2026 क्या है?

आर्थिक सर्वेक्षण एक वार्षिक दस्तावेज़ है, जिसे वित्त मंत्रालय के आर्थिक कार्य विभाग द्वारा भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) की निगरानी में तैयार किया जाता है।

यह पिछले वित्त वर्ष के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें अर्थव्यवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण आँकड़े और आकलन शामिल होते हैं, जैसे—

  • समष्टि आर्थिक रुझान (Macroeconomic Trends): जीडीपी वृद्धि, महंगाई और राजकोषीय घाटा
  • क्षेत्रवार प्रदर्शन (Sectoral Performance): कृषि, उद्योग, सेवा क्षेत्र और अवसंरचना की विस्तृत समीक्षा
  • नीतिगत सुधार (Policy Reforms): सरकारी योजनाओं का मूल्यांकन और भविष्य की रणनीतियों के लिए सुझाव

केंद्रीय बजट के विपरीत, आर्थिक सर्वेक्षण बाध्यकारी नहीं होता। यह परामर्शात्मक और विश्लेषणात्मक प्रकृति का होता है, जो अर्थव्यवस्था की जमीनी स्थिति का स्पष्ट चित्र प्रस्तुत करता है और नीति निर्धारण के लिए मार्गदर्शन देता है।

जारी होने की तिथि और समय

परंपरा के अनुसार आर्थिक सर्वेक्षण को केंद्रीय बजट से एक दिन पहले संसद में प्रस्तुत किया जाता है।

  • आर्थिक सर्वेक्षण 2026 की जारी तिथि: 29 जनवरी 2026
  • केंद्रीय बजट 2026–27 की प्रस्तुति: 1 फरवरी 2026

शुरुआत में (1950–51 से) आर्थिक सर्वेक्षण को बजट के साथ ही पेश किया जाता था, लेकिन 1964 में इसे अलग कर दिया गया ताकि बजट से पहले अर्थव्यवस्था पर स्वतंत्र, निष्पक्ष और गहन चर्चा संभव हो सके।

आर्थिक सर्वेक्षण की प्रमुख विशेषताएँ

यह दस्तावेज़ इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है? इसकी मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं—

आँकड़ों पर आधारित विश्लेषण (Data-Driven Analysis): रोजगार, निर्यात, मौद्रिक प्रबंधन और अन्य आर्थिक संकेतकों की स्पष्ट तस्वीर प्रस्तुत करने के लिए आधिकारिक आँकड़ों का उपयोग किया जाता है।

भविष्य का दृष्टिकोण (Future Outlook): आगामी वित्त वर्ष के लिए जीडीपी वृद्धि दर का अनुमान दिया जाता है, जिससे आर्थिक दिशा का अंदाज़ा मिलता है।

नीतिगत सुझाव (Policy Suggestions): यह सरकार के लिए एक दिशासूचक (Compass) की तरह कार्य करता है, जिसमें सुझाए गए सुधार बजट में शामिल भी हो सकते हैं और नहीं भी।

थीम आधारित प्रस्तुति (Theme-Based): हाल के वर्षों में आर्थिक सर्वेक्षण किसी विशेष विषय पर केंद्रित रहे हैं, जैसे “एजाइल अप्रोच” या “नैतिक संपत्ति सृजन”। आर्थिक सर्वेक्षण 2026 के भी इसी परंपरा का पालन करने की संभावना है।

आर्थिक सर्वे बनाम केंद्रीय बजट: क्या अंतर है?

इन दो प्रमुख वित्तीय घटनाओं के बीच अक्सर कन्फ्यूजन होता है। यहाँ एक क्विक तुलना दी गई है:

विशेषता आर्थिक सर्वेक्षण (Economic Survey) केंद्रीय बजट (Union Budget)
स्वरूप (Nature) विश्लेषणात्मक रिपोर्ट (अर्थव्यवस्था की “रिपोर्ट कार्ड”) वित्तीय विवरण (सरकार की “कार्य योजना”)
उद्देश्य (Purpose) पिछली आर्थिक स्थिति की समीक्षा और नीतिगत सुझाव देना संसाधनों का आवंटन और कर/व्यय की घोषणाएँ
बाध्यकारी स्थिति (Binding Status) गैर-बाध्यकारी (सलाहकारी प्रकृति) संसद से पारित होने के बाद कानूनी रूप से बाध्यकारी
मुख्य फोकस (Focus) आर्थिक रुझान, चुनौतियाँ और संरचनात्मक मुद्दे सरकारी आय, व्यय, कर और सब्सिडी
प्रस्तुतकर्ता (Presented By) मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) / वित्त मंत्रालय वित्त मंत्री

बजट से पहले आर्थिक सर्वेक्षण क्यों जारी किया जाता है?

बजट से पहले आर्थिक सर्वेक्षण जारी करने का मुख्य उद्देश्य पारदर्शिता और सूचित निर्णय-निर्माण सुनिश्चित करना है। यह संसद सदस्यों और आम जनता को देश की वर्तमान आर्थिक स्थिति—जैसे महँगाई में उतार-चढ़ाव, विभिन्न क्षेत्रों में सुस्ती या तेज़ी—की स्पष्ट समझ देता है। इससे बजट में की जाने वाली कर, व्यय और नीतिगत घोषणाओं के लिए एक तार्किक और तथ्यात्मक आधार तैयार होता है, ताकि वित्तीय फैसले वास्तविक आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप हों।

‘ASC अर्जुन’ क्या है? भारतीय रेल का नया ह्यूमनॉइड सुरक्षा रोबोट

भारतीय रेल ने स्मार्ट और प्रौद्योगिकी-आधारित रेलवे स्टेशनों की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। 27 जनवरी 2026 को विशाखापत्तनम रेलवे स्टेशन पर ASC अर्जुन नामक एक ह्यूमनॉइड रोबोट तैनात किया गया। सुरक्षा और यात्री सेवाओं को सशक्त बनाने के उद्देश्य से विकसित यह रोबोट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालन और स्वदेशी नवाचार के माध्यम से सुरक्षित सार्वजनिक अवसंरचना विकसित करने पर भारतीय रेल के बढ़ते फोकस को दर्शाता है।

क्यों चर्चा में?

भारतीय रेल ने विशाखापत्तनम रेलवे स्टेशन पर अपना पहला ह्यूमनॉइड रोबोट ASC अर्जुन तैनात किया है, जो तकनीक आधारित यात्री सुरक्षा और स्टेशन प्रबंधन की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।

अपनी तरह की पहली पहल

ASC अर्जुन की तैनाती भारतीय रेल नेटवर्क के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह भारतीय रेल प्लेटफॉर्म पर तैनात किया गया पहला ह्यूमनॉइड रोबोट है, जिसे नवाचार-आधारित यात्री सेवा सुधार के तहत पेश किया गया है। इसका उद्देश्य सुरक्षा, निगरानी और भीड़ प्रबंधन में सहायता करना है। यह रोबोट मानव कर्मियों के साथ मिलकर काम करेगा, न कि उन्हें प्रतिस्थापित करेगा। यह पहल स्मार्ट स्टेशन इकोसिस्टम की ओर भारतीय रेल के बदलाव को दर्शाती है।

स्वदेशी विकास और संस्थागत भूमिका

ASC अर्जुन का विकास स्वदेशी तकनीक से किया गया है, जो आत्मनिर्भर भारत के दृष्टिकोण को मजबूत करता है। इसे रेलवे सुरक्षा बल (RPF), विशाखापत्तनम द्वारा विकसित किया गया है और स्थानीय परिचालन आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है। यह भारतीय सुरक्षा बलों के भीतर मौजूद नवाचार क्षमता को प्रदर्शित करता है और स्वदेशी तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में एक उदाहरण है।

सुरक्षा, निगरानी और एआई क्षमताएं

यह रोबोट स्टेशन सुरक्षा को उन्नत तकनीक के माध्यम से मजबूत करता है। इसमें घुसपैठ पहचान के लिए फेस रिकग्निशन सिस्टम (FRS), भीड़भाड़ वाले समय में एआई-आधारित भीड़ निगरानी, और RPF नियंत्रण कक्ष से रीयल-टाइम कनेक्टिविटी जैसी सुविधाएं हैं। ये क्षमताएं संभावित खतरों की समय रहते पहचान और त्वरित प्रतिक्रिया में मदद करती हैं, जिससे मानव संसाधनों पर दबाव कम होता है।

यात्री सहायता और इंटरएक्टिव फीचर्स

ASC अर्जुन यात्रियों के अनुभव को बेहतर बनाने के लिए भी डिजाइन किया गया है। यह अंग्रेजी, हिंदी और तेलुगु में स्वचालित घोषणाएं करता है, यात्रियों को रीयल-टाइम जानकारी और मार्गदर्शन प्रदान करता है, तथा “नमस्ते” जैसे मैत्रीपूर्ण हाव-भाव के साथ संवाद करता है। इसका सहज और मित्रवत स्वरूप इसे यात्रियों के लिए अधिक सुलभ बनाता है।

स्वायत्त गश्त और आपातकालीन प्रतिक्रिया

यह रोबोट अर्ध-स्वायत्त नेविगेशन और बाधा पहचान की क्षमता के साथ 24×7 प्लेटफॉर्म गश्त कर सकता है। इससे RPF कर्मियों की तैनाती का बेहतर उपयोग संभव होता है। इसके अलावा, इसमें आग और धुएं का पता लगाने वाली प्रणाली भी लगी है, जो आपात स्थितियों में त्वरित कार्रवाई और आपदा-तैयारी को मजबूत बनाती है।

प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित कर्जदारों के लिए RBI का ड्राफ्ट फ्रेमवर्क क्या है?

भारत में बढ़ते जलवायु जोखिमों को देखते हुए, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने बैंकों के लिए एक नया आपदा राहत ढांचा प्रस्तावित किया है। 27 जनवरी 2026 को घोषित इन मसौदा दिशानिर्देशों का उद्देश्य बाढ़, भूस्खलन और अन्य प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित उधारकर्ताओं को समय पर राहत देना है, साथ ही बैंकिंग प्रणाली की वित्तीय स्थिरता बनाए रखना भी है।

क्यों खबर में?

RBI ने प्राकृतिक आपदाओं के दौरान समाधान योजनाओं (Resolution Plans) से संबंधित मसौदा दिशानिर्देश जारी किए हैं, जो बैंकों और अन्य विनियमित संस्थाओं पर लागू होंगे। यह ढांचा 1 अप्रैल से प्रभावी होगा, और इस पर जनता एवं हितधारकों से 17 फरवरी तक सुझाव मांगे गए हैं।

RBI का प्रस्तावित आपदा राहत ढांचा क्या है?

इस ढांचे के तहत RBI ने बैंकों से कहा है कि वे अपनी ऋण नीतियों में प्राकृतिक आपदाओं के जोखिमों का पहले से आकलन करें। अब तक की तरह आपदा के बाद तात्कालिक राहत घोषणाओं के बजाय, बैंकों को पहले से समाधान तंत्र तैयार रखना होगा। RBI ने सिद्धांत-आधारित (principle-based) दृष्टिकोण अपनाया है, जिससे बैंकों को आपदा की गंभीरता, उधारकर्ता की प्रोफ़ाइल और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार राहत योजनाएं बनाने की लचीलापन मिलेगा, जबकि सावधानीपूर्ण बैंकिंग अनुशासन भी बना रहेगा।

ढांचे के तहत उपलब्ध राहत उपाय

मसौदा दिशानिर्देशों में कई राहत विकल्प शामिल हैं। इनमें ऋण पुनर्भुगतान की पुनर्सूचना (rescheduling), संचित ब्याज को अलग क्रेडिट सुविधा में बदलना, और अस्थायी मोरेटोरियम देना शामिल है। इसके अलावा, आपदा से उत्पन्न अस्थायी वित्तीय दबाव से उबरने के लिए अतिरिक्त ऋण भी दिया जा सकता है। हालांकि, ये राहत उपाय स्वचालित नहीं होंगे, बल्कि प्रत्येक मामले में बैंक द्वारा उधारकर्ता की स्थिति और आपदा के बाद उसकी पुनर्भुगतान क्षमता के आकलन के आधार पर दिए जाएंगे।

RBI की आपदा राहत के लिए पात्रता

RBI ने स्पष्ट किया है कि केवल मानक (standard) उधारकर्ता ही इस राहत के पात्र होंगे। जिन उधारकर्ताओं ने आपदा के समय 30 दिनों से अधिक का डिफ़ॉल्ट नहीं किया है, वही इस ढांचे के अंतर्गत राहत पा सकेंगे। इस शर्त का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राहत वास्तविक रूप से प्रभावित उधारकर्ताओं तक पहुंचे और पुराने या दीर्घकालिक तनावग्रस्त ऋणों को छिपाने के लिए इसका दुरुपयोग न हो।

क्यों जलवायु जोखिम अब बैंकिंग के लिए चिंता का विषय है?

भारत लगातार चरम मौसम घटनाओं का सामना कर रहा है। पंजाब और असम में बाढ़ से कृषि और आजीविका को नुकसान हुआ है, जबकि उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में अचानक आई बाढ़ और भूस्खलन ने भारी तबाही मचाई है। जर्मनवॉच ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स 2025 के अनुसार, भारत जलवायु संवेदनशीलता के मामले में विश्व में छठे स्थान पर है। 1993 से 2022 के बीच देश में 400 से अधिक चरम मौसम घटनाएं हुईं, जिनमें लगभग 80,000 लोगों की मृत्यु हुई और करीब 180 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान हुआ। यही कारण है कि जलवायु जोखिम अब केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि एक प्रणालीगत वित्तीय जोखिम भी बन चुका है।

RBI की ₹1 लाख करोड़ की OMO खरीद से तरलता संकट कैसे होगा कम?

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने अपनी निर्धारित ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO) खरीद को आगे बढ़ा दिया है। अब केंद्रीय बैंक सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद के ज़रिये प्रणाली में ₹1 लाख करोड़ की तरलता डालेगा, ताकि तरलता की स्थिति को स्थिर किया जा सके और बॉन्ड बाज़ार में बनी नकारात्मक धारणा को शांत किया जा सके।

क्यों खबर में है?

RBI ने सरकारी प्रतिभूतियों की OMO खरीद नीलामियों के समय में बदलाव किया है। यह फैसला ऐसे समय लिया गया है जब बैंकिंग प्रणाली में तरलता अधिशेष तेजी से घटकर सामान्य स्तर से नीचे आ गया और बेंचमार्क बॉन्ड यील्ड 11 महीनों के उच्च स्तर पर पहुंच गई।

OMO खरीद क्या होती है?

ओपन मार्केट ऑपरेशन RBI का एक प्रमुख मौद्रिक उपकरण है, जिसके माध्यम से वह बाज़ार में तरलता का प्रबंधन करता है। जब RBI सरकारी प्रतिभूतियाँ खरीदता है, तो वह बैंकिंग प्रणाली में धन प्रवाहित करता है, जिससे तरलता बढ़ती है और उधारी की लागत कम होती है। वर्तमान स्थिति में 26 जनवरी को तरलता अधिशेष केवल ₹56,987 करोड़ रह गया था, जबकि आरामदायक स्तर ₹1.50 से ₹2.00 लाख करोड़ माना जाता है। इतनी तंग तरलता से ब्याज दरें बढ़ सकती हैं, जिससे कारोबार और सरकार दोनों के लिए कर्ज महंगा हो जाता है। OMO खरीद को आगे बढ़ाकर RBI इसी दबाव को कम करने की कोशिश कर रहा है।

संशोधित OMO कार्यक्रम: क्या बदला?

पहले RBI ने 5 फरवरी और 12 फरवरी 2026 को OMO खरीद नीलामियाँ करने की योजना बनाई थी, लेकिन अब इन्हें पहले कर दिया गया है। केंद्रीय बैंक अब 29 जनवरी 2026 और 5 फरवरी 2026 को ₹50,000 करोड़ की दो किश्तों में खरीद करेगा। नीलामियों को पहले आयोजित करना इस बात का संकेत है कि RBI तरलता संकट को लेकर गंभीर है और देर होने पर स्थिति और बिगड़ सकती थी।

बॉन्ड यील्ड में उछाल

बेंचमार्क 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड (6.48% GS 2035) की यील्ड 6 बेसिस पॉइंट बढ़कर 6.72% पर बंद हुई, जो 11 महीनों का उच्चतम स्तर है। चूंकि बॉन्ड की कीमत और यील्ड विपरीत दिशा में चलते हैं, इसलिए कीमत में लगभग 42 पैसे की गिरावट आई। ऊँची यील्ड से सरकार की उधारी महंगी होती है और इसका असर पूरी अर्थव्यवस्था की ब्याज दरों पर पड़ता है। इसी तेज़ उछाल ने RBI को सक्रिय कदम उठाने के लिए प्रेरित किया।

रेपो दर कटौती के बावजूद यील्ड ऊँची क्यों है?

नुवामा वेल्थ के अनुसार, फरवरी 2025 से अब तक RBI रेपो दर में 125 बेसिस पॉइंट की कटौती कर इसे 5.25% तक ला चुका है, फिर भी यील्ड ऊँची बनी हुई है। इसके पीछे कई घरेलू और वैश्विक कारण हैं, जैसे रुपये की कमजोरी, भारत–अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर अनिश्चितता और ब्लूमबर्ग इंडेक्स सर्विसेज द्वारा भारत के बॉन्ड को अपने ग्लोबल एग्रीगेट इंडेक्स में शामिल करने में देरी। इन कारणों से विदेशी निवेशकों की रुचि प्रभावित हुई है।

FY26 में तरलता पर दबाव

वित्त वर्ष 2025–26 के दौरान बैंकिंग प्रणाली में तरलता अस्थिर बनी रही है। रुपये में गिरावट, अग्रिम कर भुगतान और नियमित GST निकासी जैसे कारकों ने बार-बार तरलता को खींचा है। इसके अलावा इस सप्ताह सरकारी बॉन्ड और राज्य विकास ऋण (SDLs) की भारी आपूर्ति भी रही। पर्याप्त मांग के अभाव में यह अतिरिक्त आपूर्ति बॉन्ड बाज़ार पर दबाव डाल रही है, जिससे यील्ड ऊँची बनी हुई है।

भारत अब आय की गणना क्यों कर रहा है? एनएसओ पहली बार राष्ट्रीय आय सर्वेक्षण के लिए तैयार

स्वतंत्रता के बाद पहली बार भारत राष्ट्रीय स्तर पर घरेलू आय और कॉरपोरेट सेवा गतिविधियों का व्यवस्थित रूप से आकलन करने की तैयारी कर रहा है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) दो ऐतिहासिक सर्वेक्षणों की आधारशिला रख रहा है, जो आय वितरण और सेवा अर्थव्यवस्था को समझने के तरीके को पूरी तरह बदल देंगे। ये दोनों ही क्षेत्र अधिक स्मार्ट और लक्षित नीति-निर्माण के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।

क्यों चर्चा में है?

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने भारत के पहले राष्ट्रीय घरेलू आय सर्वेक्षण (NHIS) और वार्षिक समेकित सेवा क्षेत्र उद्यम सर्वेक्षण (ASISSE) की तैयारी शुरू कर दी है। दोनों सर्वेक्षणों का फील्डवर्क अप्रैल 2026 से शुरू होगा, उससे पहले देश-भर में अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया जाएगा।

ऑल-इंडिया वर्कशॉप ऑफ ट्रेनर्स (AIWOT) क्या है?

  • तैयारियों को मजबूत करने के लिए सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के अंतर्गत NSO 28–29 जनवरी 2026 को चेन्नई में ऑल-इंडिया वर्कशॉप ऑफ ट्रेनर्स (AIWOT) का आयोजन कर रहा है।
  • इसमें देश के विभिन्न हिस्सों से आए वरिष्ठ अधिकारी और फील्ड कर्मियों को मास्टर ट्रेनर के रूप में प्रशिक्षित किया जाएगा।
  • ये मास्टर ट्रेनर आगे चलकर पूरे देश में गणनाकर्ताओं और पर्यवेक्षकों को प्रशिक्षण देंगे।
  • कार्यशाला का फोकस सर्वेक्षण की अवधारणाओं, डिजिटल डेटा संग्रह और एकरूप पद्धति पर होगा, ताकि सर्वेक्षण के दौरान उच्च गुणवत्ता और तुलनीय आंकड़े सुनिश्चित किए जा सकें।

राष्ट्रीय घरेलू आय सर्वेक्षण (NHIS): ऐतिहासिक क्यों है?

  • राष्ट्रीय घरेलू आय सर्वेक्षण (NHIS) पूरे भारत में पहली बार किया जाने वाला व्यापक अभ्यास है। अब तक भारत उपभोग-आधारित सर्वेक्षणों और बिखरे हुए आय आंकड़ों पर निर्भर रहा है।
  • NHIS के माध्यम से सीधे घरेलू आय वितरण और जीवन-स्तर से जुड़े आंकड़े एकत्र किए जाएंगे।
  • यह श्रम, पूंजी और भूमि से होने वाली आय का विश्लेषण करेगा और उसे आर्थिक गतिविधियों से जोड़ेगा।
  • इससे विभिन्न क्षेत्रों, सामाजिक-आर्थिक समूहों और परिवारों के बीच तुलना संभव होगी, जो लक्षित कल्याण योजनाओं और समावेशी विकास नीतियों के लिए मजबूत आधार प्रदान करेगा।

नीति-निर्माण में NHIS की भूमिका

  • सटीक आय आंकड़े असमानता और संवेदनशीलता की पहचान के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
  • NHIS के निष्कर्ष सार्वभौमिक और लक्षित कल्याण हस्तक्षेपों में मदद करेंगे, सब्सिडी की प्रभावशीलता का आकलन करेंगे और राजकोषीय योजना को बेहतर बनाएंगे।
  • इससे नीति-निर्माता आय-आधारित गरीबी और उपभोग-आधारित गरीबी के बीच अंतर स्पष्ट रूप से समझ सकेंगे, जिससे सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों की रूपरेखा अधिक प्रभावी बनेगी।
  • पहली बार भारत के पास यह स्पष्ट राष्ट्रीय तस्वीर होगी कि कौन, कहाँ और कैसे कमाता है।

वार्षिक समेकित सेवा क्षेत्र उद्यम सर्वेक्षण (ASISSE)

  • ASISSE भारत के तेजी से बढ़ते कॉरपोरेट सेवा क्षेत्र पर केंद्रित है, जो GDP में बड़ा योगदान देता है, लेकिन जिसके लिए विस्तृत सांख्यिकीय कवरेज अब तक सीमित रहा है।
  • यह सर्वेक्षण सकल मूल्य वर्धन (GVA), पूंजी निर्माण, रोजगार और पारिश्रमिक से जुड़े आंकड़े उपलब्ध कराएगा।
  • इसके माध्यम से राज्य और उद्योग-स्तर पर अनुमान तैयार किए जाएंगे, जिससे सेवा क्षेत्र का विश्लेषण मजबूत होगा।
  • यह एक उद्यम-आधारित सर्वेक्षण है और GSTN ढांचे का उपयोग करता है, जिसमें केवल समेकित (incorporated) सेवा क्षेत्र इकाइयों को शामिल किया जाएगा।

ASISSE अर्थव्यवस्था के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

  • भारत की अर्थव्यवस्था में सेवा क्षेत्र का दबदबा है, लेकिन अब तक उद्यम-स्तर के विस्तृत आंकड़ों की कमी रही है।
  • ASISSE आईटी, वित्त, लॉजिस्टिक्स और पेशेवर सेवाओं जैसे क्षेत्रों में उत्पादकता, रोजगार रुझान और निवेश पैटर्न को समझने में मदद करेगा।
  • यह डेटा राष्ट्रीय खातों को बेहतर बनाएगा, क्षेत्र-विशिष्ट नीतियों को दिशा देगा और वैश्विक स्तर पर भारत की आर्थिक रिपोर्टिंग मानकों को मजबूत करेगा।

बोम्बार्डियर लरजेट 45 क्या है? — विवरण और कंपनी स्पेसिफिकेशन

बोम्बार्डियर लियरजेट 45 एक मिड-साइज़ बिज़नेस जेट विमान है, जिसका उपयोग मुख्य रूप से कॉर्पोरेट लीडर्स, निजी कंपनियों और सरकारी अधिकारियों द्वारा छोटी और मध्यम दूरी की यात्राओं के लिए किया जाता है। यह विमान अपनी तेज़ गति, आरामदायक केबिन और उच्च विश्वसनीयता के लिए जाना जाता है। लियरजेट 45 को बॉम्बार्डियर एयरोस्पेस ने अपने लियरजेट डिवीजन के तहत विकसित किया था; इसकी पहली उड़ान 1995 में हुई और इसे 1998 में सेवा में शामिल किया गया। यह विमान सीटिंग कॉन्फ़िगरेशन के अनुसार सामान्यतः 6 से 9 यात्रियों को ले जाने में सक्षम है।

बोम्बार्डियर लियरजेट 45: प्रमुख तकनीकी विशेषताएँ

  • बोम्बार्डियर लियरजेट 45 एक मिड-साइज़ बिज़नेस जेट विमान है। इसका निर्माण बॉम्बार्डियर एयरोस्पेस के लियरजेट डिवीजन द्वारा किया गया है। इसमें सामान्यतः 6 से 9 यात्रियों के बैठने की क्षमता होती है, जबकि संचालन के लिए 2 पायलट आवश्यक होते हैं।
  • इस विमान की अधिकतम गति लगभग 860 किमी/घंटा है और इसकी उड़ान रेंज करीब 3,700 किमी तक है। इसमें दो हनीवेल TFE731 टर्बोफैन इंजन लगे होते हैं, जो बेहतर प्रदर्शन और ईंधन दक्षता प्रदान करते हैं। लियरजेट 45 की अधिकतम क्रूज़िंग ऊँचाई 45,000 फीट तक है।
  • केबिन सुविधाओं में आरामदायक सीटें, कम शोर स्तर और आधुनिक एवियोनिक्स शामिल हैं। यह विमान तेज़ और स्मूथ यात्रा के लिए डिज़ाइन किया गया है, और इसकी ऊँची क्रूज़िंग क्षमता खराब मौसम और टर्बुलेंस से बचने में मदद करती है।

निर्माता कंपनी के बारे में: बॉम्बार्डियर

बॉम्बार्डियर एक कनाडाई एयरोस्पेस और परिवहन कंपनी है, जो बिज़नेस जेट, क्षेत्रीय विमान और रेलवे उपकरणों के निर्माण के लिए जानी जाती है। लियरजेट ब्रांड 1990 में लियरजेट कॉर्पोरेशन के अधिग्रहण के बाद बॉम्बार्डियर का हिस्सा बना। बॉम्बार्डियर के विमान दुनिया भर में उपयोग किए जाते हैं और अपनी उन्नत तकनीक तथा उच्च सुरक्षा मानकों के लिए प्रसिद्ध हैं। हालांकि बाद में बॉम्बार्डियर ने लियरजेट विमानों का उत्पादन बंद कर दिया, फिर भी लियरजेट 45 सहित कई लियरजेट मॉडल आज भी सक्रिय सेवा में हैं।

विमान के स्वामी के बारे में: वीएसआर वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड

हालिया घटना में शामिल बॉम्बार्डियर लियरजेट 45 विमान दिल्ली स्थित विमानन कंपनी वीएसआर वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड के स्वामित्व में था। यह कंपनी पिछले 15 वर्षों से अधिक समय से संचालन में है और विमानन क्षेत्र में विभिन्न सेवाएँ प्रदान करती है। इनमें विमान प्रबंधन, रखरखाव और संचालन, विमानन परामर्श, तथा नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) और अन्य नियामक प्राधिकरणों के साथ समन्वय शामिल है। अपनी आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, वीएसआर वेंचर्स का मुख्य फोकस कॉर्पोरेट और विशेष प्रयोजन वाली यात्राओं के लिए सुरक्षित, विश्वसनीय और कुशल हवाई यात्रा सुनिश्चित करना है।

केरल ने बैसिलस सब्टिलिस को आधिकारिक रूप से अपना राज्य सूक्ष्मजीव घोषित किया

केरल ने विज्ञान आधारित एक अनोखा कदम उठाते हुए पहली बार किसी सूक्ष्मजीव को अपनी राज्य पहचान का हिस्सा बनाया है। यह पहल मानव स्वास्थ्य से लेकर कृषि और पर्यावरणीय स्थिरता तक, दैनिक जीवन में सूक्ष्मजीवों की भूमिका को रेखांकित करती है। इस तरह का निर्णय भारत में पहली बार लिया गया है, जो ज्ञान और अनुसंधान के प्रति केरल की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

क्यों चर्चा में है?

केरल ने आधिकारिक रूप से बैसिलस सब्टिलिस (Bacillus subtilis) को अपना राज्य सूक्ष्मजीव (State Microbe) घोषित किया है। ऐसा करने वाला केरल भारत का पहला राज्य बन गया है।

Bacillus subtilis क्या है?

  • Bacillus subtilis एक लाभकारी प्रोबायोटिक जीवाणु है, जो मिट्टी, किण्वित (fermented) खाद्य पदार्थों और मानव आंत में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है।
  • यह आंतों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, मिट्टी की उर्वरता सुधारने और पौधों की बीमारियों को नियंत्रित करने में सहायक माना जाता है।
  • अपनी उच्च सहनशीलता और बीजाणु (spore) बनाने की क्षमता के कारण इसका उपयोग औषधि उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण और सतत कृषि में व्यापक रूप से किया जाता है।
  • इसे राज्य सूक्ष्मजीव के रूप में मान्यता देना मानव कल्याण और पारिस्थितिक संतुलन में सूक्ष्मजीवों के मूक लेकिन महत्वपूर्ण योगदान को उजागर करता है।

आधिकारिक घोषणा और ऐतिहासिक पहल

  • यह घोषणा मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने तिरुवनंतपुरम में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम में की।
  • इस निर्णय के साथ केरल ने राष्ट्रीय स्तर पर एक नई मिसाल कायम की है, जहाँ पहली बार किसी सूक्ष्मजीव को औपचारिक मान्यता दी गई है।
  • यह पहल पारंपरिक प्रतीकों (जैसे पशु या पक्षी) से आगे बढ़कर वैज्ञानिक और ज्ञान-आधारित पहचान को अपनाने का संकेत देती है, जो केरल की शिक्षा और अनुसंधान परंपरा के अनुरूप है।

माइक्रोबायोम में उत्कृष्टता केंद्र 

  • इस घोषणा के साथ ही माइक्रोबायोम में उत्कृष्टता केंद्र (CoEM) की भी शुरुआत की गई।
  • यह केंद्र मानव स्वास्थ्य, पोषण, प्रतिरक्षा, कृषि, मत्स्य पालन और पर्यावरण संरक्षण पर सूक्ष्मजीवों के प्रभावों का अध्ययन करेगा।
  • राज्य सरकार के अनुसार, Bacillus subtilis रोग नियंत्रण और उत्पादकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, और इससे विकसित उत्पाद केरल के लिए उच्च मूल्य वाली आर्थिक संपत्ति बन सकते हैं।

संस्थागत ढांचा

  • CoEM, केरल राज्य विज्ञान, प्रौद्योगिकी और पर्यावरण परिषद के अंतर्गत कार्य करेगा और केरल विकास एवं नवाचार रणनीतिक परिषद के सहयोग से संचालित होगा।
  • यह भारत का पहला संस्थान है, जो विभिन्न क्षेत्रों में माइक्रोबायोम आधारित अनुप्रयुक्त अनुसंधान को एक ही मंच पर एकीकृत करता है।
  • इससे प्रयोगशाला आधारित शोध और व्यावहारिक अनुप्रयोगों के बीच की दूरी कम होने की उम्मीद है।

माइक्रोबायोम अनुसंधान का महत्व

  • माइक्रोबायोम अनुसंधान सूक्ष्मजीवों और उनके परिवेश, विशेषकर मानव शरीर, के बीच संबंधों को समझने पर केंद्रित होता है।
  • इसका वैश्विक महत्व एंटीबायोटिक प्रतिरोध, जीवनशैली जनित रोगों, मिट्टी के क्षरण और जलवायु तनाव जैसी चुनौतियों से निपटने में है।
  • Bacillus subtilis को चुनकर केरल ने ऐसे सूक्ष्मजीव को सामने रखा है, जिसकी वैज्ञानिक मान्यता और व्यावहारिक उपयोग पहले से स्थापित हैं, जिससे यह पहल प्रतीकात्मक होने के साथ-साथ उपयोगी भी बन जाती है।

वैज्ञानिकों ने उत्तराखंड के ओक के जंगलों में एक दुर्लभ मशरूम की खोज की

उत्तराखंड के हिमालयी वनों में वैज्ञानिकों ने मशरूम की एक पहले अज्ञात प्रजाति की खोज की है। ऊँचाई वाले क्षेत्रों में ओक (बलूत) के पेड़ों के नीचे पाई गई यह नई प्रजाति भारत की कवक (फंगल) विविधता में एक नया अध्याय जोड़ती है और देश में Hemileccinum वंश का यह पहला आधिकारिक रिकॉर्ड है।

क्यों चर्चा में है?

शोधकर्ताओं ने उत्तराखंड के ओक वनों में पाई गई गड्ढेदार बीजाणुओं वाली मशरूम की एक नई प्रजाति की पहचान की है, जिसे Hemileccinum indicum नाम दिया गया है। वर्ष 2022–23 के दौरान किए गए फील्ड अध्ययनों में यह खोज हुई और यह भारत में Hemileccinum वंश की पहली दर्ज उपस्थिति है।

मशरूम की खोज कहाँ और कैसे हुई?

यह मशरूम उत्तराखंड के बागेश्वर ज़िले के धाकुरी क्षेत्र में, 2,600 मीटर से अधिक ऊँचाई पर पाया गया। इसकी खोज मानसून के दौरान की जाने वाली मैक्रोफंगल सर्वेक्षण यात्राओं (macrofungal forays) के दौरान हुई, जिनका उद्देश्य बड़े कवकों का दस्तावेजीकरण करना होता है। ये सर्वेक्षण भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (BSI), यूनिवर्सिटी ऑफ़ टोरिनो और सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज के शोधकर्ताओं द्वारा संयुक्त रूप से किए गए।

Hemileccinum indicum क्यों है एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक खोज?

प्रारंभ में यह मशरूम उत्तरी अमेरिका और चीन में पाई जाने वाली समान प्रजातियों जैसा प्रतीत हुआ, लेकिन उन्नत वैज्ञानिक परीक्षणों ने इसे पूरी तरह नई प्रजाति सिद्ध किया। बहु-जीन आणविक वंशावली (multigene molecular phylogenetic) विश्लेषण के माध्यम से इसके डीएनए की तुलना विश्वभर की ज्ञात प्रजातियों से की गई। परिणामों से पता चला कि यह फ्लोरिडा की एक प्रजाति से निकट संबंध रखता है, लेकिन आनुवंशिक रूप से विशिष्ट है। इससे यह कवकों के विकासवादी वृक्ष की एक नई शाखा के रूप में स्थापित हुआ और Hemileccinum वंश के वैश्विक विस्तार को भी दर्शाता है।

विशिष्ट शारीरिक और सूक्ष्म विशेषताएँ

Hemileccinum indicum ‘बोलेट’ समूह से संबंधित है, जिनमें गलफड़ों (gills) की जगह टोपी के नीचे छिद्र (pores) होते हैं। इसकी टोपी शुरुआत में झुर्रीदार बैंगनी-भूरी होती है, जो परिपक्व होने पर चमड़े जैसी भूरी हो जाती है। इसके छिद्रों की सतह हल्की पीली होती है और चोट लगने पर रंग नहीं बदलती। स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप के नीचे इसके बीजाणुओं में सूक्ष्म गड्ढेदार संरचना दिखाई देती है, जो इसकी सबसे विशिष्ट पहचान है। इसके चिकने तने और गड्ढेदार बीजाणु इसे संबंधित प्रजातियों से अलग करते हैं।

पारिस्थितिक महत्व

यह मशरूम पारिस्थितिक रूप से एक्टोमाइकोराइज़ल है, अर्थात यह पेड़ों की जड़ों के साथ सहजीवी संबंध बनाता है। यह विशेष रूप से Quercus (ओक) प्रजातियों के साथ जुड़ा होता है। ऐसे कवक पेड़ों को पोषक तत्व और जल अवशोषण में मदद करते हैं, जबकि बदले में उन्हें शर्करा प्राप्त होती है। यह भूमिगत सहयोग वनों के स्वास्थ्य, मृदा स्थिरता और पोषक तत्व चक्र को मजबूत करता है। यह खोज हिमालयी वनों में कवकों की छिपी हुई लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर करती है।

भारत की फंगल विविधता क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत की कवक जैव-विविधता अब भी काफी हद तक अनदेखी है, विशेषकर उच्च हिमालयी और समशीतोष्ण वनों में। Hemileccinum indicum जैसी खोजें संकेत देती हैं कि अनेक प्रजातियाँ अभी भी वैज्ञानिक दस्तावेज़ों से बाहर हैं। कवक पारिस्थितिकी संतुलन, जलवायु सहनशीलता और भविष्य के औषधीय अनुसंधान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए वनों का संरक्षण न केवल दृश्य वन्यजीवों के लिए, बल्कि उन सूक्ष्म जीवों के लिए भी आवश्यक है जो पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को सहारा देते हैं।

CCRAS–सेंट्रल संस्कृत यूनिवर्सिटी पांडुलिपि पुनरुद्धार पहल क्या है?

भारत ने अपनी प्राचीन चिकित्सकीय विरासत के संरक्षण की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया है। केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS) और केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय (CSU) ने केरल में आयोजित एक विशेष कार्यशाला के माध्यम से दुर्लभ आयुर्वेदिक पांडुलिपियों को पुनर्जीवित किया है। यह पहल ताड़पत्र पांडुलिपियों के लिप्यंतरण और शोध-आधारित उपयोग पर केंद्रित है, जिससे शास्त्रीय आयुर्वेदिक ज्ञान आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययन के लिए सुलभ हो सके।

क्यों चर्चा में है?

केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS) और केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय (CSU) ने केरल में आयोजित 15-दिवसीय लिप्यंतरण कार्यशाला को सफलतापूर्वक पूरा किया है, जिसके परिणामस्वरूप पाँच दुर्लभ और अब तक अप्रकाशित आयुर्वेदिक पांडुलिपियाँ शोध एवं अकादमिक उपयोग के लिए पुनर्जीवित की गई हैं।

केरल में लिप्यंतरण कार्यशाला

  • यह आवासीय कार्यशाला CCRAS और CSU के बीच हुए औपचारिक समझौता ज्ञापन (MoU) के तहत 12 से 25 जनवरी के बीच त्रिशूर स्थित CSU पुरणट्टुकरा (गुरुवायूर) परिसर में आयोजित की गई।
  • कुल 33 विद्वानों ने भाग लिया, जिनमें 18 आयुर्वेद और 15 संस्कृत के विद्वान शामिल थे
  • कार्यक्रम ने पांडुलिपि अध्ययन में अंतर्विषयी (interdisciplinary) दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया
  • प्रशिक्षण में पांडुलिपि विज्ञान, प्राचीन लिपि-विज्ञान (palaeography) और आयुर्वेदिक तकनीकी शब्दावली शामिल थी
  • ग्रंथ और वट्टेझुथु लिपियों पर विशेष ध्यान दिया गया
  • इस कार्यशाला ने नाजुक ताड़पत्र पांडुलिपियों के संरक्षण और अध्ययन में विद्वानों की क्षमता को सशक्त किया

व्यावहारिक प्रशिक्षण और लिपि विशेषज्ञता

  • इस कार्यक्रम की प्रमुख विशेषता केवल सैद्धांतिक अध्ययन के बजाय व्यावहारिक लिप्यंतरण पर जोर देना था।
  • प्रतिभागी विद्वानों ने मूल ताड़पत्र पांडुलिपियों पर प्रत्यक्ष कार्य किया
  • ग्रंथ, मध्यकालीन मलयालम और वट्टेझुथु जैसी लिपियों का अध्ययन कराया गया
  • ‘लिपि परिचय’ सत्रों के माध्यम से लिपियों के विकास को समझाया गया
  • सटीकता, एकरूपता और शोध-उपयोगिता पर विशेष ध्यान दिया गया
  • इस व्यावहारिक संरचना ने अल्प अवधि में ठोस अकादमिक परिणाम सुनिश्चित किए

दुर्लभ आयुर्वेदिक पांडुलिपियों का पुनर्जीवन

इस कार्यशाला के परिणामस्वरूप पाँच दुर्लभ और पहले अप्रकाशित आयुर्वेदिक पांडुलिपियों का सफल लिप्यंतरण किया गया, जो अब उन्नत शोध के लिए उपलब्ध हैं।

  • धन्वंतरी (वैद्य) चिंतामणि – ग्रंथ से संस्कृत
  • द्रव्यशुद्धि – ग्रंथ से संस्कृत
  • वैद्यम् – मध्यकालीन मलयालम से मलयालम
  • रोग निर्णय (भाग-I) – मध्यकालीन मलयालम से मलयालम
  • विविधरोगंगल – वट्टेझुथु से मलयालम और संस्कृत

ये ग्रंथ क्षेत्रीय आयुर्वेदिक परंपराओं पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालते हैं।

संस्थागत सहयोग और विशेषज्ञ नेतृत्व

वरिष्ठ शिक्षाविदों ने इस पांडुलिपि पुनर्जीवन पहल की बढ़ती गति को रेखांकित किया।

  • CCRAS के महानिदेशक प्रो. वैद्य रवीन्द्रनारायण आचार्य ने इसे CSU के साथ दूसरा सफल सहयोग बताया
  • इससे पहले ओडिशा के CSU पुरी परिसर में आयोजित कार्यशाला में 14 पांडुलिपियों का लिप्यंतरण किया गया था
  • CSU अधिकारियों ने मलयालम आयुर्वेदिक परंपराओं के संरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई
  • कार्यक्रम का समन्वय दोनों संस्थानों के वरिष्ठ विशेषज्ञों द्वारा किया गया
  • यह पहल भारत की शास्त्रीय ज्ञान प्रणालियों के संरक्षण और पुनरुत्थान के प्रति निरंतर और संस्थागत प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

IIT गुवाहाटी ने पूर्वी हिमालय में ग्लेशियर के खतरों को ट्रैक करने की तकनीक बनाई

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने संवेदनशील पूर्वी हिमालयी क्षेत्र में हिमनदीय खतरों की भविष्यवाणी के लिए एक नई विधि विकसित की है। इस अध्ययन में सैकड़ों ऐसे स्थानों की पहचान की गई है, जहाँ भविष्य में हिमनदीय झीलें बन सकती हैं। इससे बाढ़, बुनियादी ढांचे की सुरक्षा और पर्वतीय क्षेत्रों में जलवायु अनुकूलन को लेकर गंभीर चिंताएँ सामने आई हैं।

क्यों चर्चा में है?

आईआईटी गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने एक पूर्वानुमानात्मक ढांचा विकसित किया है, जिसके माध्यम से पूर्वी हिमालय में 492 संभावित हिमनदीय झील निर्माण स्थलों की पहचान की गई है। यह अध्ययन हाल ही में Scientific Reports पत्रिका में प्रकाशित हुआ है और इसमें ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड्स (GLOFs) से जुड़े नए खतरों को उजागर किया गया है।

हिमनदीय खतरे और GLOFs को समझना

हिमनदीय खतरे मुख्य रूप से हिमनदीय झीलों के बनने और उनके अचानक फटने से उत्पन्न होते हैं। इन घटनाओं को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड्स (GLOFs) कहा जाता है, जिनमें बहुत कम समय में भारी मात्रा में पानी, बर्फ और मलबा नीचे की ओर बह जाता है। ऐसी बाढ़ें गाँवों, सड़कों, जलविद्युत परियोजनाओं और कृषि भूमि को भारी नुकसान पहुँचा सकती हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर तेजी से पीछे हट रहे हैं, जिससे विशेषकर हिमालय में नई झीलें अभूतपूर्व गति से बन रही हैं। ऐसे में यह जानना अत्यंत आवश्यक हो गया है कि ये झीलें कहाँ बन सकती हैं, ताकि आपदा तैयारी, दीर्घकालिक जल प्रबंधन और पर्वतीय समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

आईआईटी गुवाहाटी के अध्ययन की विशेषता क्या है?

शोध दल ने उच्च-रिज़ॉल्यूशन गूगल अर्थ उपग्रह चित्रों और डिजिटल एलिवेशन मॉडल (DEM) का उपयोग कर स्थलाकृति का सूक्ष्म अध्ययन किया। पहले के अध्ययनों के विपरीत, जो मुख्यतः ग्लेशियर के आकार या तापमान प्रवृत्तियों पर केंद्रित थे, इस नए ढांचे ने भू-दृश्य संरचना पर विशेष ध्यान दिया। ढाल, सतह की बनावट, सर्क और पास की झीलों जैसे कारकों का विश्लेषण कर शोधकर्ताओं ने जटिल स्थलाकृतिक व्यवहार को समझा। महत्वपूर्ण रूप से, इस मॉडल में अनिश्चितता के स्तर का भी आकलन किया गया, जिससे पूर्वानुमान अधिक यथार्थवादी बने। यह तरीका विश्वसनीयता बढ़ाता है और प्रशासन को उन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने में मदद करता है, जहाँ तत्काल निगरानी और निवारक कदम आवश्यक हैं।

अध्ययन में प्रयुक्त उन्नत पूर्वानुमान मॉडल

सटीकता सुनिश्चित करने के लिए शोधकर्ताओं ने तीन पूर्वानुमान तकनीकों का परीक्षण किया—लॉजिस्टिक रिग्रेशन (LR), आर्टिफिशियल न्यूरल नेटवर्क (ANN) और बेयesian न्यूरल नेटवर्क (BNN)। इनमें BNN सबसे अधिक सटीक मॉडल के रूप में उभरा। इसकी विशेषता यह है कि यह अनिश्चितता को बेहतर ढंग से संभाल सकता है, जो उच्च पर्वतीय क्षेत्रों के डेटा में सामान्य होती है। BNN मॉडल ने पीछे हटते ग्लेशियर, हल्की ढाल, सर्क और आस-पास की झीलों जैसे प्रमुख कारकों की पहचान की। इससे यह स्पष्ट हुआ कि भू-आकृतिक विशेषताएँ, जिन्हें पहले अक्सर नज़रअंदाज़ किया जाता था, हिमनदीय झीलों के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाती हैं।

मुख्य निष्कर्ष: 492 उच्च-जोखिम स्थल चिन्हित

इस विकसित ढांचे का उपयोग करते हुए टीम ने पूर्वी हिमालय में 492 ऐसे स्थानों की पहचान की, जहाँ भविष्य में नई हिमनदीय झीलें बनने की संभावना है। ये क्षेत्र संभावित भविष्य के खतरे वाले ज़ोन हैं। आईआईटी गुवाहाटी के सहायक प्रोफेसर प्रो. अजय डाशोरा के अनुसार, यह ढांचा GLOFs के लिए प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को दिशा दे सकता है, सड़कों और जलविद्युत परियोजनाओं की सुरक्षित योजना बनाने में सहायक हो सकता है तथा बसावट के लिए उपयुक्त स्थान तय करने में मदद कर सकता है। इस प्रकार यह शोध आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों, योजनाकारों और हिमालयी राज्यों के नीति निर्माताओं के लिए अत्यंत उपयोगी है।

वैश्विक महत्व और भविष्य की संभावनाएँ

भारत के बाहर भी, आईआईटी गुवाहाटी द्वारा विकसित यह ढांचा दुनिया के अन्य हिमाच्छादित पर्वतीय क्षेत्रों में अपनाया जा सकता है। एंडीज़ से लेकर आल्प्स तक, वैश्विक तापन के कारण हिमनदीय खतरे बढ़ रहे हैं। शोध दल भविष्य में मोरेन विकास के इतिहास को जोड़ने, डेटा तैयारी को स्वचालित करने और फील्ड-आधारित सत्यापन शामिल कर मॉडल को और मजबूत करने की योजना बना रहा है। इन सुधारों से सटीकता बढ़ेगी और बड़े पैमाने पर निगरानी संभव होगी। इससे भारत वैश्विक जलवायु विज्ञान और आपदा-सहिष्णुता योजना में एक महत्वपूर्ण योगदानकर्ता के रूप में उभरता है।

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