नरेंद्र भूषण भूमि संसाधन विभाग के सचिव नियुक्त

वरिष्ठ IAS अधिकारी नरेंद्र भूषण ने 6 अप्रैल, 2026 को भूमि संसाधन विभाग के सचिव का कार्यभार संभाल लिया है। यह विभाग ग्रामीण विकास मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करता है। वे उत्तर प्रदेश कैडर के 1992 बैच के अधिकारी हैं और विभिन्न महत्वपूर्ण क्षेत्रों में तीन दशकों से अधिक का प्रशासनिक अनुभव रखते हैं।

भूमि संसाधन विभाग के बारे में

भूमि संसाधन विभाग (DoLR) भारत में भूमि से संबंधित नीतियों और सुधारों के प्रबंधन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

इसके मुख्य कार्यों में शामिल हैं:

  • भूमि सुधार और भूमि अभिलेखों का डिजिटलीकरण
  • वाटरशेड विकास कार्यक्रम का कार्यान्वयन
  • सतत भूमि उपयोग पद्धतियों को बढ़ावा देना
  • और बेहतर भूमि प्रबंधन के माध्यम से ग्रामीण आजीविका को सहायता प्रदान करना

नरेंद्र भूषण का करियर सफ़र

भारत में राज्य स्तर पर उन्हें व्यापक अनुभव प्राप्त है। अपनी नियुक्ति से पूर्व, उन्होंने निम्नलिखित पदों पर कार्य किया:

ऊर्जा और तकनीकी शिक्षा विभाग, उत्तर प्रदेश में अतिरिक्त मुख्य सचिव

इसके अतिरिक्त, उन्होंने कई विभागों में प्रमुख सचिव की भूमिका भी निभाई, जिनमें शामिल हैं:

  • विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
  • लोक निर्माण विभाग (PWD)
  • बुनियादी ढांचा (Infrastructure)
  • उद्योग
  • IT एवं इलेक्ट्रॉनिक्स

उन्होंने ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी के CEO के रूप में भी कार्य किया है, जिसने शहरी बुनियादी ढांचे के विकास में योगदान दिया है।

केंद्रीय स्तर पर प्रमुख भूमिकाएँ

उन्होंने भारत सरकार में भी महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया है।

  • भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण में उप महानिदेशक (संयुक्त सचिव स्तर)
  • राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा प्रबंधन के मिशन निदेशक
  • कृषि एवं सहकारिता विभाग में संयुक्त सचिव
  • मंत्री के OSD और भारत व्यापार संवर्धन संगठन में संयुक्त सचिव

क्षेत्रीय स्तर पर प्रशासनिक कार्यों का व्यापक अनुभव

नीति-निर्धारण से जुड़ी भूमिकाओं के अतिरिक्त, भूषण को ज़मीनी स्तर पर कार्य करने का भी व्यापक अनुभव है।

उन्होंने निम्नलिखित ज़िलों में ज़िलाधिकारी के रूप में कार्य किया है:

  • मथुरा
  • फ़िरोज़ाबाद
  • ऊधम सिंह नगर

शैक्षणिक पृष्ठभूमि

नरेंद्र भूषण की शैक्षणिक पृष्ठभूमि अत्यंत सुदृढ़ है।

उन्होंने ड्यूक यूनिवर्सिटी से ‘इंटरनेशनल डेवलपमेंट पॉलिसी’ (अंतर्राष्ट्रीय विकास नीति) में मास्टर डिग्री प्राप्त की है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर डिग्री हासिल की है और इलेक्ट्रॉनिक्स विषय में स्नातक किया है।

उन्होंने सार्वजनिक वित्त, अंतर्राष्ट्रीय वार्ताओं और जलवायु परिवर्तन से निपटने की तैयारियों से संबंधित विशेष प्रशिक्षण भी प्राप्त किया है। उनकी यह विविध शैक्षणिक और पेशेवर पृष्ठभूमि, उनकी नीति-निर्माण क्षमताओं को और अधिक सशक्त बनाती है।

भारत की परमाणु शक्ति मजबूत, एडवांस रिएक्टर हुआ सक्रिय

भारत ने अपनी परमाणु ऊर्जा यात्रा में एक बड़ा मील का पत्थर हासिल कर लिया है, क्योंकि कल्पक्कम में स्वदेशी रूप से विकसित प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) ने सफलतापूर्वक क्रिटिकैलिटी प्राप्त कर ली है। यह देश के दीर्घकालिक परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस उपलब्धि को एक निर्णायक क्षण बताया है, और उन्होंने उन्नत परमाणु प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की बढ़ती ताकत को रेखांकित किया है। साथ ही, उन्होंने स्वच्छ और टिकाऊ ऊर्जा समाधानों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता पर भी ज़ोर दिया है।

कल्पक्कम में PFBR: भारत के परमाणु कार्यक्रम 

  • यह 500 MW का प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड द्वारा संचालित एक प्रमुख परियोजना है।
  • यह उपलब्धि ऐतिहासिक है, क्योंकि यह भारत के तीन-चरणों वाले परमाणु कार्यक्रम के दूसरे चरण में हुई प्रगति को दर्शाती है। इसके साथ ही, इसने स्वदेशी रूप से उन्नत परमाणु रिएक्टरों के निर्माण की भारत की क्षमता को भी प्रदर्शित किया है।
  • यह वैश्विक परमाणु प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अग्रणी देशों के बीच भारत की स्थिति को भी मज़बूत करता है। एक बार पूरी तरह से चालू हो जाने पर, भारत रूस के बाद दूसरा ऐसा देश बन जाएगा जो कमर्शियल फ़ास्ट ब्रीडर रिएक्टर का संचालन करेगा।

परमाणु विज्ञान में ‘क्रिटिकैलिटी’ (Criticality) का क्या अर्थ है?

क्रिटिकैलिटी, किसी परमाणु रिएक्टर के जीवनचक्र का एक अत्यंत महत्वपूर्ण चरण है।

सरल शब्दों में कहें तो, यह वह बिंदु है जहाँ पर स्वतः-संचालित परमाणु श्रृंखला अभिक्रिया (nuclear chain reaction) शुरू होती है। इस अवस्था में रिएक्टर का कोर (core) अपनी डिज़ाइन के अनुसार कार्य करना प्रारंभ कर देता है; साथ ही, पूर्ण क्षमता से विद्युत उत्पादन शुरू करने से पहले यह एक अनिवार्य शर्त भी है।

यह चरण इस बात की पुष्टि करता है कि रिएक्टर सुरक्षित, स्थिर और तकनीकी रूप से पूरी तरह से सुदृढ़ है।

फ़ास्ट ब्रीडर रिएक्टर क्यों खास है?

पारंपरिक रिएक्टरों के विपरीत, फ़ास्ट ब्रीडर रिएक्टर का एक अनोखा फ़ायदा है।

मुख्य विशेषताएं

  • क्योंकि यह जितना परमाणु ईंधन इस्तेमाल करता है, उससे ज़्यादा पैदा करता है।
  • यह प्लूटोनियम-आधारित ईंधन का इस्तेमाल करता है।
  • यह ईंधन की दक्षता और स्थिरता को भी बढ़ाता है।

यह इसे भारत जैसे देशों के लिए बहुत कीमती बनाता है, जिनके पास यूरेनियम के स्रोत सीमित हैं, लेकिन थोरियम के भंडार बहुत ज़्यादा हैं।

भारत के तीन-चरणों वाले परमाणु कार्यक्रम को बढ़ावा

भारत की परमाणु रणनीति को तीन चरणों में डिज़ाइन और नियोजित किया गया है।

चरण 1

शुरुआत में, प्रेशराइज़्ड हेवी वॉटर रिएक्टर्स (PHWRs) में प्राकृतिक यूरेनियम का उपयोग।

चरण 2

अधिक ईंधन उत्पन्न करने के लिए फास्ट ब्रीडर रिएक्टर्स (जैसे PFBR) की तैनाती।

चरण 3

दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा के लिए थोरियम-आधारित रिएक्टरों का उचित उपयोग।

PFBR मील का पत्थर चरण 3 की दिशा में प्रगति को काफी तेज़ी से आगे बढ़ाएगा, जिसमें भारत अपने विशाल थोरियम भंडारों का उपयोग करने का लक्ष्य रखता है।

स्वच्छ और आत्मनिर्भर ऊर्जा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम

यह परियोजना भारत की निम्नलिखित प्रतिबद्धताओं को दर्शाती है:

  • कम कार्बन उत्सर्जन के साथ स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन
  • जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता को कम करना
  • और ‘आत्मनिर्भर भारत’ को सुदृढ़ बनाना

इस परियोजना में MSME सहित 200 से अधिक भारतीय उद्योगों ने योगदान दिया है, जिससे यह वास्तव में एक स्वदेशी उपलब्धि बन गई है।

फ़ास्ट ब्रीडर रिएक्टर क्या है?

फ़ास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBR) एक प्रकार का न्यूक्लियर रिएक्टर है, जो अपने इस्तेमाल से ज़्यादा फ़िसाइल मटीरियल बनाता है।

FBR के फ़ायदे ये हैं कि यह न्यूक्लियर ईंधन का सही इस्तेमाल करता है, न्यूक्लियर कचरा कम करता है, और लंबे समय तक ऊर्जा की स्थिरता बनाए रखने में भी मदद करता है।

इस टेक्नोलॉजी को न्यूक्लियर ऊर्जा के क्षेत्र में एक ‘गेम चेंजर’ माना जाता है।

 

G7 पहल: फ्रांस में ‘वन हेल्थ समिट’ से हेल्थ पॉलिसी को बढ़ावा

‘वन हेल्थ समिट 2026’ का आयोजन 5 से 7 तारीख तक फ्रांस के ल्योन में किया जा रहा है। यह समिट दुनिया भर के नेताओं, वैज्ञानिकों और विभिन्न संगठनों को एक मंच पर लाएगी, ताकि स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर चुनौतियों का समाधान किया जा सके। इसकी मेज़बानी फ़्रांस सरकार अपनी G7 अध्यक्षता के हिस्से के तौर पर करेगी, और यह शिखर सम्मेलन ‘विश्व स्वास्थ्य दिवस’ के अवसर पर आयोजित होगा। यह शिखर सम्मेलन मानव, पशु, वनस्पति और पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य के बीच की परस्पर निर्भरता को, तथा साझा स्वास्थ्य खतरों से निपटने के लिए समन्वित और विज्ञान-आधारित दृष्टिकोणों की आवश्यकता को रेखांकित करेगा।

वन हेल्थ समिट 2026 क्या है?

  • वन हेल्थ समिट 2026 एक उच्च-स्तरीय अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम है, जिसे ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह इस बात को मान्यता देता है कि मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी तंत्र का स्वास्थ्य आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं।
  • यह शिखर सम्मेलन एक महत्वपूर्ण अवसर है, क्योंकि यह राष्ट्राध्यक्षों और शासनाध्यक्षों, विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय संगठनों, वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, नागरिक समाजों और युवा प्रतिनिधियों को एक मंच पर लाता है।
  • इसका लक्ष्य वैश्विक प्रतिबद्धताओं को ऐसे वास्तविक कार्यों में बदलना है, जो भविष्य के स्वास्थ्य संकटों को रोक सकें और वैश्विक तैयारियों को बेहतर बना सकें।

आज ‘वन हेल्थ’ (One Health) दृष्टिकोण क्यों मायने रखता है?

COVID-19 जैसे हालिया वैश्विक संकटों ने यह दिखाया है कि बीमारियाँ विभिन्न प्रजातियों और सीमाओं के पार कितनी तेज़ी से फैल सकती हैं।

‘वन हेल्थ’ (One Health) दृष्टिकोण प्रतिक्रिया के बजाय रोकथाम पर, संबंधित क्षेत्रों के बीच सहयोग पर, और विज्ञान-आधारित निर्णय लेने की प्रक्रिया को बेहतर बनाने पर ज़ोर देता है।

यह इस बात को भी सुनिश्चित करता है कि स्वास्थ्य नीतियों में केवल मनुष्यों को ही नहीं, बल्कि जानवरों और पर्यावरण को भी ध्यान में रखा जाए, जिससे अधिक प्रभावी और टिकाऊ समाधान प्राप्त हो सकें।

शिखर सम्मेलन के मुख्य फोकस क्षेत्र

यह शिखर सम्मेलन उन कुछ सबसे महत्वपूर्ण कारकों पर चर्चा करेगा जो वैश्विक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहे हैं।

  • ज़ूनोटिक भंडार और वाहक
  • रोगाणुरोधी प्रतिरोध
  • सतत खाद्य प्रणालियाँ
  • प्रदूषण के संपर्क में आना

शिखर सम्मेलन के उद्देश्य

  • उदाहरण के लिए, सहयोग और अनुसंधान कार्यक्रमों को लागू करके वैश्विक मुद्दों पर अंतर्राष्ट्रीय और अंतर्विषयक संवाद को बढ़ावा देना।
  • एक साझा “वन हेल्थ” (One Health) संस्कृति का निर्माण करके वैश्विक संस्थागत ढांचों को नया रूप देना।
  • सभी सार्वजनिक और निजी हितधारकों को ठोस कदम उठाने में निवेश करने के लिए शामिल करना।
  • स्वास्थ्य और निगरानी प्रणालियों को मज़बूत करने के लिए ऐसे समाधान विकसित करना, ताकि उन स्वास्थ्य, खाद्य और पर्यावरणीय जोखिमों को रोका जा सके जो हमारी आबादी पर असर डालते हैं।

मूल सिद्धांत

  • विज्ञान, अनुसंधान और नवाचार का महत्व।
  • कार्य-उन्मुख बहुपक्षवाद और अंतर्राष्ट्रीय साझेदारियों को बढ़ावा देना।
  • सार्वजनिक-निजी साझेदारियों की केंद्रीय भूमिका।
  • नागरिक समाज, स्थानीय निकायों और युवाओं की समावेशी भागीदारी।
  • ‘वन हेल्थ समिट’ उन मुख्य कारकों पर ध्यान केंद्रित करेगा जो संक्रामक और गैर-संक्रामक रोगों में योगदान देते हैं।

वैश्विक संगठनों और साझेदारियों की भूमिका

यह शिखर सम्मेलन चतुष्पक्षीय साझेदारी के महत्व पर भी प्रकाश डालता है, जिसमें निम्नलिखित शामिल हैं:

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO)
  • खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO)
  • संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP)
  • विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन

फ्रांस का नेतृत्व और वैश्विक प्रतिबद्धता

इमैनुएल मैक्रॉन (फ्रांस के राष्ट्रपति) के नेतृत्व में, देश वैश्विक स्वास्थ्य पहलों को सक्रिय रूप से बढ़ावा दे रहा है।

देश इन प्रयासों में जुटा है:

  • महामारी की तैयारी से जुड़ी पहलों का समर्थन करना
  • अंतरराष्ट्रीय समझौतों में ‘वन हेल्थ’ (One Health) दृष्टिकोण को बढ़ावा देना
  • पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों को आगे बढ़ाना

फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि अब ‘वन हेल्थ’ (One Health) दृष्टिकोण हमारी सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों को विकसित करने के लिए हमारा मार्गदर्शक सिद्धांत होना चाहिए, जिसमें पशु स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियों को व्यवस्थित रूप से शामिल किया जाए। तभी ये नीतियां पूरी तरह से प्रभावी हो पाएंगी। तभी हम कई बीमारियों के बारे में अपनी समझ को बेहतर बना पाएंगे। बेहतर रोकथाम, बेहतर प्रतिक्रिया।

Menaka Guruswamy ने रचा इतिहास, बनीं देश की पहली LGBTQ सांसद

सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने हाल ही में सांसद के रूप में शपथ लेकर नया इतिहास रच दिया है। वह भारत की पहली LGBTQ राज्यसभा सदस्य बन गईं हैं। यह कदम भारत में LGBTQ+ समुदाय के प्रतिनिधित्व के लिहाज से बहुत ही महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

कौन हैं मेनका गुरुस्वामी?

मेनका गुरुस्वामी ने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, हार्वर्ड लॉ स्कूल और नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी से कानून की डिग्री हासिल की है। मेनका गुरुस्वामी सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट हैं और कई संवैधानिक मामलों में अपनी विशेषज्ञता के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने 1997 में भारत के पूर्व अटॉर्नी जनरल अशोक देसाई के साथ काम करते हुए कानून की बारीकियां सीखीं। मेनका उन्हें अपना मेंटर मानती हैं।

किरण मनराल की किताब राइजिंग: 30 वीमेन हू चेंज्ड इंडिया में भी मेनका गुरुस्वामी को शामिल किया गया है। साल 2017 से 2019 तक वह न्यूयॉर्क के कोलंबिया लॉ स्कूल में बीआर आंबेडकर रिसर्च स्कॉलर और लेक्चरर थीं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सामने कई महत्वपूर्ण मामलों में अपनी दलीलें रखी हैं।

उनकी स्कूली पढ़ाई

उनकी स्कूली पढ़ाई हैदराबाद पब्लिक स्कूल में हुई, जिसके बाद उन्होंने दिल्ली के सरदार पटेल स्कूल से हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी की। उन्होंने इसके बाद नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु से साल 1997 में BALLB की डिग्री ली। उन्होंने इसके बाद ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से BCL और फिर हार्वर्ड लॉ स्कूल से LLM किया। मेनका गुरुस्वामी LLB करने के बाद 1997 में बार काउंसिल से जुड़ीं और तब के अटॉर्नी जनरल अशोक देसाई के साथ काम शुरू किया। उन्होंने ऑक्सफोर्ड और हार्वर्ड से डिग्री लेने के बाद न्यूयॉर्क में वकालत की।

धारा 377 केस में महत्वपूर्ण भूमिका

मेनका गुरुस्वामी उन वकीलों में शामिल रही हैं, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट में उस ऐतिहासिक केस में बहस की थी, जिसके बाद 2018 में भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को आंशिक रूप से रद्द कर दिया गया। इस फैसले के बाद भारत में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया था।

मेनका गुरुस्वामी की पार्टनर

मेनका गुरुस्वामी की पार्टनर अरुंधति काटजू हैं। वह पेशे से वकील हैं। इंडियन पीनल कोड (IPC) की धारा 377 के खिलाफ कानूनी लड़ाई में मेनका गुरुस्वामी और उनकी पार्टनर अरुंधति काटजू दोनों महत्वपूर्ण भूमिका में थीं। दिल्ली हाई कोर्ट ने साल 2009 में धारा 377 को खत्म कर दिया था, लेकिन इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट में मेनका और अरुंधति ने मिलकर इस मामले की पैरवी की। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए धारा 377 को फिर से लागू कर दिया।

भारत ने वित्त वर्ष 2025-26 में अब तक की सर्वाधिक पवन ऊर्जा क्षमता जोड़ी

भारत ने स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है, जिसके तहत वित्त वर्ष 2025-26 में 6.05 GW की रिकॉर्ड पवन ऊर्जा क्षमता जोड़ी गई है। इसके साथ ही, यह अब तक का सबसे अधिक वार्षिक उत्पादन बन गया है। यह वृद्धि पिछले वर्ष की तुलना में 46% की बढ़त को दर्शाती है और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में मज़बूत गति का संकेत देती है। इसके साथ ही, भारत की कुल स्थापित पवन ऊर्जा क्षमता 56 GW के पार पहुँच गई है, जिससे सतत ऊर्जा के क्षेत्र में एक वैश्विक अग्रणी के रूप में भारत की स्थिति और मज़बूत हुई है और देश 2030 के सतत लक्ष्यों को प्राप्त करने के और करीब पहुँच गया है।

2025-26 में पवन ऊर्जा में रिकॉर्ड तोड़ बढ़ोतरी

भारत के पवन ऊर्जा क्षेत्र में वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान ज़बरदस्त उछाल देखने को मिला है, और इसने 2016-17 में दर्ज किए गए 5.5 GW के पिछले उच्चतम स्तर को भी पार कर लिया है। 6.05 GW की अतिरिक्त क्षमता का जुड़ना, हरित ऊर्जा के विस्तार की दिशा में नए सिरे से किए जा रहे प्रयासों को दर्शाता है।

ये केवल आँकड़े ही नहीं हैं, बल्कि ये उस संरचनात्मक बदलाव को दर्शाते हैं कि भारत में नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं की योजना किस प्रकार बनाई और उन्हें किस प्रकार कार्यान्वित किया जाता है।

मुख्य बातें

  • वित्त वर्ष 2025-26 में कुल 6.05 GW पवन ऊर्जा क्षमता जोड़ी गई
  • जो वित्त वर्ष 2024-25 की तुलना में 46% की वृद्धि है
  • देश में कुल स्थापित पवन ऊर्जा क्षमता 56 GW के पार पहुँच गई है
  • यह 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ईंधन लक्ष्य की दिशा में हुई मज़बूत प्रगति को दर्शाता है

पवन ऊर्जा में इस तेज़ बढ़ोतरी की वजह क्या है?

पवन ऊर्जा क्षमता में यह भारी उछाल सरकार और उद्योग जगत के कई समन्वित प्रयासों का परिणाम है। टर्बाइन के पुर्जों पर रियायती सीमा शुल्क और 2028 तक इंटर-स्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम (ISTS) शुल्कों में छूट जैसी सरकारी पहलों ने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है। बेहतर ग्रिड कनेक्टिविटी और ट्रांसमिशन की तैयारी जैसे बुनियादी ढांचे पर ध्यान केंद्रित करने से, राष्ट्रीय ग्रिड में नवीकरणीय ऊर्जा का तेज़ी से एकीकरण संभव हो पाया है।

इसके अलावा, पारदर्शी बोली प्रणालियों के कारण पवन ऊर्जा की दरें किफायती हुई हैं, जिससे पवन ऊर्जा और भी अधिक आकर्षक बन गई है। पवन-सौर हाइब्रिड परियोजनाओं में हो रही यह वृद्धि कार्यक्षमता में सुधार ला रही है और चौबीसों घंटे बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित कर रही है।

पवन ऊर्जा विस्तार में शीर्ष योगदान देने वाले राज्य

भारत में, इस उपलब्धि को हासिल करने में कई राज्यों ने अहम भूमिका निभाई है।

शीर्ष 3 राज्य हैं:

  • गुजरात
  • कर्नाटक
  • महाराष्ट्र

ये राज्य भारत की पवन ऊर्जा क्रांति के मुख्य चालक के रूप में उभरे हैं।

वैश्विक पवन ऊर्जा क्षेत्र में भारत की स्थिति

पिछले कुछ दशकों में लगातार विकास और नीतिगत समर्थन के प्रयासों के कारण, भारत अब दुनिया भर में पवन ऊर्जा के शीर्ष उत्पादकों में से एक है।

देश की पवन ऊर्जा यात्रा 1990 के दशक की शुरुआत में शुरू हुई थी, और आज यह इन उपलब्धियों पर गर्व करता है:

  • एक मज़बूत विनिर्माण तंत्र।
  • साथ ही, ‘राष्ट्रीय पवन ऊर्जा संस्थान’ से मिलने वाला सशक्त संस्थागत सहयोग।
  • और निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी।

भारत के प्रमुख बंदरगाहों ने वित्त वर्ष 26 में 915.17 मिलियन टन कार्गो का प्रबंधन किया

भारत के समुद्री क्षेत्र ने एक अहम मील का पत्थर हासिल किया है, जिसमें प्रमुख बंदरगाहों ने वित्त वर्ष 2025-26 में रिकॉर्ड 915.17 मिलियन टन (MT) कार्गो का संचालन किया है। बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्रालय के अनुसार, यह प्रदर्शन न केवल 904 MT के वार्षिक लक्ष्य से अधिक रहा, बल्कि इसमें 7.06% की साल-दर-साल वृद्धि भी दर्ज की गई। यह उपलब्धि भारत की बढ़ती व्यापार क्षमता को दर्शाती है।

FY26 में रिकॉर्ड कार्गो हैंडलिंग की खास बातें

मंत्रालय ने बयान में कहा कि यह प्रदर्शन प्रमुख बंदरगाहों में निरंतर वृद्धि को दर्शाता है, जिसमें दीनदयाल बंदरगाह प्राधिकरण 160.11 मीट्रिक टन के साथ शीर्ष प्रदर्शनकर्ता के रूप में उभरा है, इसके बाद पारादीप बंदरगाह प्राधिकरण 156.45 मीट्रिक टन और जवाहरलाल नेहरू बंदरगाह प्राधिकरण (जेएनपीए) 102.01 मीट्रिक टन पर है।

वित्त वर्ष 26 में सबसे तेज़ी से बढ़ते बंदरगाह

विशाखापत्तनम बंदरगाह प्राधिकरण, मुंबई बंदरगाह प्राधिकरण, चेन्नई बंदरगाह प्राधिकरण और न्यू मंगलौर बंदरगाह प्राधिकरण सहित अन्य प्रमुख बंदरगाहों ने भी अच्छा प्रदर्शन किया, जिसने समग्र कार्गो माल ढुलाई में महत्वपूर्ण योगदान दिया। विकास दर के संदर्भ में, मोर्मुगाओ बंदरगाह प्राधिकरण ने 15.91 प्रतिशत की सबसे अधिक वृद्धि दर्ज की, इसके बाद कोलकाता डॉक सिस्टम 14.28 प्रतिशत और जेएनपीए 10.74 प्रतिशत पर रहे, जो बेहतर दक्षता और कार्गो की बढ़ती मात्रा को दर्शाते हैं।

सरकारी प्रोत्साहन और नीतिगत समर्थन

मंत्रालय के अनुसार कार्गो प्रबंधन में यह निरंतर वृद्धि कई कारकों द्वारा संचालित रही है, जिनमें बंदरगाहों के बुनियादी ढांचे का आधुनिकीकरण और उनकी क्षमता में वृद्धि, सुदृढ़ मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी तथा निर्बाध हिंटरलैंड लिंकेज (पश्चभूमि संपर्क), डिजिटल एवं स्मार्ट पोर्ट पहलों को अपनाना, और कोयला, कच्चे तेल, कंटेनर, उर्वरक एवं पी.ओ.एल. जैसी प्रमुख वस्तुओं के संचालन में वृद्धि शामिल है। साथ ही, जहाजों के टर्नअराउंड समय में सुधार और बंदरगाहों पर व्यापार सुगमता ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय बंदरगाह-आधारित विकास, लॉजिस्टिक्स एकीकरण और स्थिरता पर केंद्रित एक व्यापक समुद्री रणनीति को आगे बढ़ाना जारी रखे हुए है।

 

इतिहास के 3 सबसे बड़े और विनाशकारी युद्ध, जिन्होंने वैश्विक सीमाएं और राजनीतिक नक्शे बदल दिए

पश्चिम एशिया में तनाव जारी है। इसी बीच ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव के बीच 45 दिन के संभावित युद्धविराम को लेकर कूटनीतिक कोशिशें तेज हो गई हैं। युद्ध की वजह से दुनियाभर में घरेलू गैस और कच्चे तेल की कीमतों पर असर पड़ रहा है। इन युद्धों ने देशों की सीमाओं में बदलाव करने के साथ राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर काफी बड़ा बदलाव किया, जिसका सीधा असर लोगों के जीवन पर पड़ा। इतिहास में युद्ध अक्सर उम्मीद से कहीं ज्यादा लंबे चले हैं। दरअसल कुछ लड़ाइयां तो पीढ़ियों तक चली हैं।

इतिहास के 3 सबसे बड़े और विनाशकारी युद्ध: एक नजर में

प्रथम विश्व युद्ध: प्रथम विश्व युद्ध 1914 से 1918 तक लड़ा गया था। प्रथम विश्व युद्ध का तात्कालिक वजह ऑस्ट्रिया-हंगरी के प्रिंस आर्कड्यूक फर्डिनेंड की सर्बिया में हुई हत्या को माना जाता है। इसमें एक तरफ केंद्रीय शक्तियों में जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी और ओटोमन साम्राज्य था, तो दूसरी तरफ मित्र देश फ्रांस ब्रिटेन, रूस, इटली एवं अमेरिका भी शामिल हुए थे। पहली बार इस युद्ध में टैंकों, जहाजों और जहरीली गैसों का इस्तेमाल हुआ था, जिससे युद्ध के परिणाम भयावह हो गए थे। इस युद्ध में जर्मनी की हार हुई थी तथा बाद में वर्साय की संधि हुई थी, जिससे द्वितीय विश्व युद्ध की नींव तैयार हो गई थी।

द्वितीय विश्व युद्ध: साल 1939 से 1945 तक चला द्वितीय विश्व युद्ध इतिहास का सबसे घातक संघर्ष था। इसमें ‘टोटल वॉर’ के कॉन्सेप्ट ने शहरों को भी निशाना बनाया, जिससे भारी संख्या में नागरिक मारे गए। अकेले सोवियत संघ ने 2.7 करोड़ और चीन ने 2 करोड़ लोगों को खोया। जर्मनी और जापान के क्रूर कब्जे ने दुनिया को हिला कर रख दिया था। यह युद्ध उस समय हुआ, जब जर्मनी ने पोलैंड पर आक्रमण कर दिया था। इसे देखते हुए ब्रिटेन और फ्रांस ने भी जर्मनी के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया था। यह युद्ध जर्मनी, इटली और जापान जैसे धुरी राष्ट्र और ब्रिटेन, सोवियत संघ, अमेरकिा, फ्रांस और चीन जैसे मित्र देशों के बीच हुआ था। इस युद्ध में अमेरिका द्वारा जापान के हिरोशिमा एवं नागासाकी पर परमाणु बम गिराया गया था। वहीं, यहूदियां को मारा गया। इस युद्ध में मित्र देश जीते थे और संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई थी।

मंगोल आक्रमण: 13वीं शताब्दी में मंगोलों ने रूस से लेकर चीन और इराक तक अपना साम्राज्य फैलाया। वे जिस शहर से गुजरते, उसे कब्रिस्तान बना देते। फारस के निशापुर में 17 लाख और बगदाद में 10 लाख लोग मारे गए। अनुमान है कि उनके आक्रमणों में करीब 4 करोड़ लोग मारे गए और आज करोड़ों लोग चंगेज खान के वंशज हैं। इस युद्ध का परिणाम यह हुआ कि मंगलो साम्राज्य प्रशांत महासागर से पूर्वी यूरोप तक अपनी जगह बना चुका था। हालांकि, इस हमले में करोड़ों लोग मारे गए थे।

 

भुवनेश्वर कुमार IPL में 200 विकेट लेने वाले पहले तेज़ गेंदबाज़ बने

रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर और चेन्नई सुपर किंग्स के बीच हुए मुकाबले में भुवनेश्वर कुमार ने इतिहास रच दिया, क्योंकि वह इंडियन प्रीमियर लीग में 200 विकेट लेने वाले पहले तेज़ गेंदबाज़ बन गए। उन्होंने CSK के आयुष म्हात्रे को आउट करके यह उपलब्धि हासिल की। ​​यह लीग में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है, खासकर तब जब IPL के इतिहास में स्पिनरों को सबसे ज़्यादा विकेट लेने वालों के तौर पर जाना जाता है।

200 विकेट लेने वाले पहले तेज़ गेंदबाज़

क्रिकेट जगत के कई बड़े नाम IPL में खेल चुके हैं और अभी भी खेल रहे हैं, लेकिन यह उपलब्धि ऐतिहासिक है, क्योंकि उन्होंने अपना 200वां विकेट हासिल किया और ऐसा करने वाले पहले तेज़ गेंदबाज़ बन गए। आमतौर पर स्पिनरों को ही सबसे ज़्यादा विकेट लेने के लिए जाना जाता है, ऐसे में इस भारतीय तेज़ गेंदबाज़ के लिए यह उपलब्धि सचमुच ऐतिहासिक है।

वह इस समय IPL में सबसे ज़्यादा विकेट लेने वाले लेग स्पिनर युजवेंद्र चहल से ठीक पीछे हैं।

IPL में भुवनेश्वर का सफ़र

भुवनेश्वर ने 2011 में IPL में डेब्यू किया था और वे इन फ्रेंचाइज़ियों के सबसे भरोसेमंद गेंदबाज़ों में से एक रहे हैं:

  • रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु
  • पुणे वॉरियर्स इंडिया
  • सनराइज़र्स हैदराबाद

उनका सबसे बेहतरीन सीज़न 2017 में आया, जब उन्होंने 26 विकेट लिए और अपनी टीम के लिए ‘पर्पल कैप’ का अवॉर्ड जीता।

‘पर्पल कैप किंग’ के नाम से मशहूर

उनके नाम एक बेहद खास रिकॉर्ड दर्ज है — लगातार दो बार ‘पर्पल कैप’ जीतना।

  • 2016 – 23 विकेट
  • 2017 – 26 विकेट

IPL के इतिहास में वह एकमात्र ऐसे गेंदबाज़ हैं, जिन्होंने लगातार दो वर्षों तक यह उपलब्धि हासिल की है।

IPL में सबसे ज़्यादा विकेट लेने वाले टॉप 5 खिलाड़ियों की सूची

  • युजवेंद्र चहल : 223 विकेट
  • भुवनेश्वर कुमार: 202 विकेट
  • सुनील नरेन: 193 विकेट
  • पीयूष चावला : 192 विकेट
  • रविचंद्रन अश्विन: 187 विकेट

LPG उत्पादन में भारत के प्रमुख शहर कौन-कौन से हैं? देखें लिस्ट

भारत में आज 33 करोड़ से अधिक परिवार खाना बनाने के लिए एलपीजी सिलिडंर (LPG cylinder) का इस्तेमाल करते हैं। ईरान और अमेरिका-इजरायल युद्ध की वजह से एलपीजी की आपूर्ति प्रभावित हुई है। भारत में एलपीजी (LPG) का उत्पादन और वितरण तीन बड़ी सरकारी कंपनियों के पास है। इन कंपनियों की हिस्सेदारी भारतीय बाजार में सबसे अधिक है। ऐसे में इन्हें ऑयल मार्केटिंग कंपनियां भी कहा जाता है। इन तीन कंपनियों में भारत पेट्रोलियम, इंडियन ऑयल और हिंदुस्तान पेट्रोलियम के नाम शामिल है।

भारत की सबसे बड़ी सरकारी तेल कंपनी

इंडियन ऑयल द्वारा इंडेन नाम से एलपीजी गैस का उत्पादन कर बिक्री की जाती है। यह कंपनी भारत की सबसे बड़ी सरकारी तेल कंपनी है। बता दें कि भारतीय एलपीजी बाजार में इंडेन की सबसे बड़ी हिस्सेदारी है। यह भारत के कुल उत्पादन का 40 से 50 प्रतिशत हिस्से का योगदान देता है। ऐसे में यह विश्व के सबसे बड़े पैक-एलपीजी ब्रांडों में शामिल है। इंडियन गैस भारत की सबसे बड़ी एलपीजी कंपनी (India Number One LPG Company) है।

देश की दूसरी सबसे बड़ी सरकारी तेल कंपनी

भारत पेट्रोलियम अपने एलपीजी गैस उत्पाद को भारत गैस नाम से बेचता है। यह कंपनी देश की दूसरी सबसे बड़ी सरकारी तेल कंपनी है। साथ ही, इसके पास बड़ी रिफाइनरियों एवं बॉटलिंग प्लांट का अच्छा-खासा नेटवर्क भी है। देशभर में इसके करोड़ों उपभोक्ता हैं।

ONGC की सहायक कंपनी

हिंदुस्तान पेट्रोलियम अपने एलपीजी गैस उत्पाद को एचपी गैस (HP GAS) नाम से बेचता है। दरअसल, यह कंपनी ONGC की सहायक कंपनी के तौर पर काम करती है। हालांकि, भारत में इसकी पहचान गैस उत्पादन और वितरण के लिए भी है। इस कंपनी के कमर्शियल गैस सिलिंडर अधिक देखने को मिलते हैं।

गैस का मार्केट शेयर

Indane सबसे बड़े हिस्से के साथ सबसे आगे है, जिसके बाद Bharat Gas और HP Gas का स्थान आता है। निजी खिलाड़ियों की मौजूदगी अभी भी अपेक्षाकृत कम है। इसके बाद दूसरे नंबर पर भारत गैस है। भारत गैस का मार्केट शेयर करीब 26 से 27 फीसदी है। तीसरे नंबर पर HP गैस है। इसका मार्केट शेयर करीब 22 से 24 फीसदी है। और 2 से 7 फीसदी में बाकी के प्लेयर हैं।

भारत में प्रमुख LPG उत्पादक शहर और रिफाइनरियां:

  • जामनगर (गुजरात): रिलायंस इंडस्ट्रीज की रिफाइनरी के साथ देश का सबसे बड़ा एलपीजी हब।
  • पानीपत (हरियाणा): इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOCL) की बड़ी रिफाइनरी।
  • मथुरा (उत्तर प्रदेश): IOCL रिफाइनरी।
  • हल्दिया (पश्चिम बंगाल): IOCL रिफाइनरी।
  • कोच्चि (केरल): भारत पेट्रोलियम (BPCL) रिफाइनरी।
  • मंगलोर (कर्नाटक): मंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स (MRPL)।
  • वडोदरा/कोयाली (गुजरात): IOCL रिफाइनरी।
  • वडिनार (गुजरात): नायरा एनर्जी रिफाइनरी।
  • बरौनी (बिहार): IOCL रिफाइनरी।
  • पारादीप (ओडिशा): IOCL रिफाइनरी।
  • भटिंडा (पंजाब): HPCL-मित्तल रिफाइनरी।
  • असम (बोंगाईगांव, डिगबोई, गुवाहाटी): यहाँ भी IOCL की रिफाइनरियां LPG का उत्पादन करती हैं।

 

जानें भारत के किस शहर से पहली बार हुई थी जनगणना की शुरुआत?

बता दें कि, भारत में जनगणना 2026-27 की शुरुआत हो गई है। इस बार इसे दो चरणों में पूरा किया जाएगा। इसके तहत पहले चरण में मकान और निवास का डाटा एकत्रित होगा और दूसरा चरण फरवरी 2027 में शुरू होगा, जिसमें शिक्षा, लिंग, धर्म और जाति से जुड़े आंकड़े शामिल रहेंगे।

हालांकि, यह पहली बार नहीं है, जब भारत में जनगणना हो रही है। इसकी शुरुआत 202 साल पहले उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में साल 1824 में हुई थी, जब आर. गुलाब ने शहर की जनगणना कराई थी। भारत का पहली डिजिटल जनगणना (Census) 1 अप्रैल 2026 से शुरू हो चुकी है।

डिजिटल भारत के दौर में अब कागज-कलम की जगह मोबाइल ऐप एवं टैबलेट ने ले ली है। इसी तकनीकी बदलावों के अनुरूप खुद को बदलते हुए भारत सरकार ने अपनी आबादी की जनगणना डिजिटली कराने की सोची है। भारत में आखिरी बार साल 2011 में जनगणना हुई थी। यह देश की 15वीं और आजाद भारत की 7वीं जनगणना थी।

पहली बार जनगणना

इलाहाबाद में साल 1824 में आर. गुलाब ने पहली बार जनगणना कराई थी। इसके बाद 1827-28 में बनारस में जेम्स प्रिंसेप ने जनगणना करवाई। वहीं, साल 1830 में ढाका में हेनरी वाल्टर ने जनगणना कराई, जिसे पहली और पूरी तरह आधुनिक शहर की जनगणना माना गया।

भारत में पहली बार देशव्यापी जनगणना

भारत में पहली बार देशव्यापी जनगणना साल 1872 में गवर्नर जनरल लॉर्ड मेयो के कार्यकाल में हुई थी। हालांकि, यह एक ही समय पर नहीं हुई थी और इस दौरान कई क्षेत्र शामिल नहीं हो सके थे। इस कारण से इस जनगणना को सही नहीं माना जाता है।

भारत में पहली नियमित जनगणना साल 1881 में गवर्नर जनरल रहे लॉर्ड रिपन के कार्यकाल में हुई थी। उस समय डब्ल्यू. सी. प्लाउडेन के नेतृत्व में पूरे देश में एक साथ जनगणना की गई थी। इसके बाद प्रत्येक 10 साल में एक बार जनगणना की परंपरा शुरू हुई थी।

आजादी के बाद भारत की पहली जनगणना

आजादी के बाद भारत की पहली जनगणना साल 1951 में हुई थी। यह जनगणना 10 फरवरी 1951 को शुरू हुई और 1948 के जनगणना अधिनियम के तहत आयोजित की गई थी।

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