उत्तर प्रदेश ने अपना पहला आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया

उत्तर प्रदेश ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए अपना पहला आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 प्रस्तुत किया है, जो अब तक केवल केंद्र सरकार के स्तर पर देखने को मिलता था। वित्त मंत्री सुरेश खन्ना द्वारा राज्य विधानसभा में प्रस्तुत इस सर्वेक्षण में उत्तर प्रदेश को 1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का स्पष्ट, आंकड़ों पर आधारित रोडमैप दिया गया है। इसमें निवेश-आधारित विकास, बुनियादी ढांचे के विस्तार और विभिन्न क्षेत्रों में सुधारों पर विशेष जोर दिया गया है।

उत्तर प्रदेश आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26: राज्य के लिए पहली बार

उत्तर प्रदेश आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 राज्य की अर्थव्यवस्था, वित्तीय स्थिति और विकासशील क्षेत्रों का व्यापक मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। यह पहली बार है जब उत्तर प्रदेश ने इस तरह का विस्तृत वार्षिक आर्थिक दस्तावेज जारी किया है। सर्वेक्षण में निरंतर आर्थिक वृद्धि, बेहतर राजकोषीय अनुशासन और बढ़ते निवेशक विश्वास को रेखांकित किया गया है। यह उत्तर प्रदेश को एक उभरती हुई आर्थिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है, जिसे शासन सुधारों, डिजिटल प्रणालियों और सुदृढ़ कानून-व्यवस्था का समर्थन प्राप्त है। यह दस्तावेज विकसित उत्तर प्रदेश 2047 के दीर्घकालिक विजन के अनुरूप है, जिसमें सतत विकास, रोजगार सृजन और समावेशी प्रगति पर फोकस किया गया है।

निवेश-आधारित विकास के जरिए 1 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था का लक्ष्य

आर्थिक सर्वेक्षण का मुख्य उद्देश्य उत्तर प्रदेश को 1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाना है। राज्य का सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) 2016-17 में ₹13.30 लाख करोड़ से बढ़कर 2024-25 में ₹30.25 लाख करोड़ हो गया है, जबकि 2025-26 में इसके ₹36 लाख करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। औसत वार्षिक वृद्धि दर 10.8% रही है, जो देश में सबसे अधिक में से एक है। ₹50 लाख करोड़ से अधिक के निवेश प्रस्ताव घरेलू और वैश्विक निवेशकों के बढ़ते विश्वास को दर्शाते हैं।

‘ट्रिपल एस’ मॉडल: सुरक्षा, स्थिरता और गति

सर्वेक्षण में सरकार के “ट्रिपल एस” निवेश मॉडल—सुरक्षा, स्थिरता और गति को विकास रणनीति की रीढ़ बताया गया है। बेहतर कानून-व्यवस्था, पूर्वानुमेय नीतियां और तेज़ परियोजना स्वीकृतियों ने कारोबारी माहौल को मजबूत किया है। निवेश मित्र जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म समयबद्ध मंजूरी और पारदर्शिता सुनिश्चित करते हैं। उल्लेखनीय है कि विश्व आर्थिक मंच 2026 में ₹2.94 लाख करोड़ के MoU पर हस्ताक्षर हुए, जिससे उत्तर प्रदेश की वैश्विक निवेश छवि और मजबूत हुई है।

बुनियादी ढांचे पर जोर: एक्सप्रेसवे, हवाई अड्डे और लॉजिस्टिक्स

उत्तर प्रदेश आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में बुनियादी ढांचे को विकास का प्रमुख चालक बताया गया है। राज्य भारत के एक्सप्रेसवे हब के रूप में उभर रहा है, जहां 22 एक्सप्रेसवे संचालित या प्रस्तावित हैं। देश का सबसे बड़ा रेल नेटवर्क उत्तर प्रदेश में है और 24 हवाई अड्डों के विकास की योजना है, जिनमें पांच अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे शामिल हैं। जेवर अंतरराष्ट्रीय ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट को उत्तर भारत का प्रमुख कार्गो और लॉजिस्टिक्स केंद्र बनाने की योजना है, जिससे निर्यात और रोजगार को बढ़ावा मिलेगा।

उद्योग और विनिर्माण: क्लस्टर आधारित विकास

औद्योगिक विकास में तेज़ी आई है। पंजीकृत कारखानों की संख्या 30,000 के पार पहुंच गई है, जो हाल के वर्षों में लगभग दोगुनी हो गई है। औद्योगिक सकल मूल्य वर्धन (GVA) में 25% की वृद्धि दर्ज की गई है, जो प्रमुख राज्यों में सबसे अधिक है। क्लस्टर रणनीति के तहत लखनऊ को AI हब, कानपुर को ड्रोन निर्माण और परीक्षण केंद्र, और नोएडा को आईटी व इलेक्ट्रॉनिक्स हब के रूप में विकसित किया जा रहा है। इससे रोजगार सृजन और विनिर्माण क्षमता को मजबूती मिली है।

कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था: अब भी आधार स्तंभ

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार कृषि उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बनी हुई है। 2024-25 में अर्थव्यवस्था में कृषि की हिस्सेदारी बढ़कर 24.9% हो गई। राज्य 737.4 लाख मीट्रिक टन उत्पादन के साथ देश का सबसे बड़ा खाद्यान्न उत्पादक बना हुआ है। उत्पादकता में वृद्धि, MSP पर अधिक खरीद, सूक्ष्म सिंचाई और विस्तारित सिंचाई कवरेज से किसानों की आय में सुधार हुआ है। दालों और तिलहनों के रकबे में भी वृद्धि हुई है।

स्वास्थ्य, सामाजिक कल्याण और शासन सुधार

स्वास्थ्य बजट 2025-26 में बढ़कर ₹46,728.48 करोड़ हो गया है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बेहतर हुई और जेब से होने वाला खर्च घटा है। संस्थागत प्रसव 96.12% तक पहुंच गए हैं और पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों का पूर्ण टीकाकरण सुनिश्चित किया गया है। कानून-व्यवस्था सुधार, तकनीक आधारित पुलिसिंग, महिला सुरक्षा पहल और फास्ट-ट्रैक अदालतों ने शासन व्यवस्था को मजबूत किया है। राज्य का बजट बढ़कर ₹8.33 लाख करोड़ हो गया है, जबकि ऋण-से-GSDP अनुपात 28% है, जो राष्ट्रीय औसत से कम है।

ग्रामीण कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने हेतु गुजरात ने स्पेसएक्स की सहायक कंपनी स्टारलिंक से साझेदारी की

सैटेलाइट इंटरनेट कंपनी स्टारलिंक (Starlink) भारत के पश्चिमी राज्य गुजरात में एंट्री करने वाली है। गुजरात सरकार ने स्पेसएक्स(SpaceX) की सब्सिडियरी के साथ लेटर ऑफ़ इंटेंट (LoI) साइन किया है। लेटर ऑफ़ इंटेंट एक्सचेंज सेरेमनी गांधीनगर में मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल और उपमुख्यमंत्री हर्ष सांघवी की मौजूदगी में हुई। जिसका उद्देश्य, राज्य के दूरदराज, सीमावर्ती और ऐसे इलाकों में हाई-स्पीड सैटेलाइट-आधारित इंटरनेट कनेक्टिविटी उपलब्ध कराई जाएगी। डिजिटल इंडिया और विकसित भारत 2047 के लक्ष्यों के अनुरूप यह पहल ई-गवर्नेंस, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और आपदा प्रबंधन को मज़बूत करने के लिए विश्वसनीय डिजिटल कनेक्टिविटी सुनिश्चित करेगी।

गुजरात–स्टारलिंक समझौता: क्या है पूरा मामला

मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में गुजरात सरकार ने स्पेसएक्स की सहायक कंपनी स्टारलिंक सैटेलाइट कम्युनिकेशंस के साथ सहयोग ढांचे में प्रवेश किया है। इस आशय पत्र (LoI) का मुख्य उद्देश्य उन क्षेत्रों में सैटेलाइट आधारित ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी उपलब्ध कराना है, जहाँ पारंपरिक दूरसंचार नेटवर्क कमजोर हैं या उपलब्ध नहीं हैं। यह साझेदारी दिसंबर 2025 में राज्य नेतृत्व और स्टारलिंक के वैश्विक नेतृत्व के बीच हुई प्रारंभिक चर्चाओं का परिणाम है।

डिजिटल इंडिया विज़न और राज्यव्यापी कनेक्टिविटी

यह पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के डिजिटल इंडिया विज़न के अनुरूप है, जिसका लक्ष्य तकनीक आधारित शासन और समावेशी विकास है। सैटेलाइट इंटरनेट के माध्यम से गुजरात भौगोलिक बाधाओं को पार कर सीमावर्ती और आंतरिक आदिवासी क्षेत्रों तक ई-गवर्नेंस, सार्वजनिक सेवाओं और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की पहुँच सुनिश्चित करना चाहता है।

आदिवासी और आकांक्षी जिलों में पायलट परियोजनाएँ

पायलट चरण में नर्मदा और दाहोद जैसे आदिवासी एवं आकांक्षी जिलों में स्टारलिंक कनेक्टिविटी उपलब्ध कराई जाएगी, जहाँ लंबे समय से कनेक्टिविटी की समस्याएँ बनी हुई हैं। इससे कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) और ई-गवर्नेंस सुविधाएँ अधिक प्रभावी ढंग से काम कर सकेंगी तथा नागरिकों को सरकारी योजनाओं, प्रमाणपत्रों और कल्याणकारी सेवाओं तक तेज़ पहुँच मिलेगी।

स्वास्थ्य, शिक्षा और टेली-मेडिसिन को बढ़ावा

इस पहल का एक प्रमुख हिस्सा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC), सरकारी स्कूलों और टेली-मेडिसिन केंद्रों के लिए स्मार्ट कनेक्टिविटी है। हाई-स्पीड इंटरनेट से दूरस्थ परामर्श, डिजिटल कक्षाएँ, रियल-टाइम डेटा शेयरिंग और आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएँ संभव होंगी, खासकर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में।

आपदा प्रबंधन और सुरक्षा को मजबूती

LoI में जिला आपदा प्रबंधन नियंत्रण कक्षों, पुलिस चौकियों, बंदरगाहों और वन्यजीव अभयारण्यों के लिए कनेक्टिविटी भी शामिल है। विश्वसनीय सैटेलाइट संचार से प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियाँ, आपातकालीन समन्वय, तटीय सुरक्षा, वन्यजीव निगरानी और राजमार्ग सुरक्षा प्रणालियाँ मज़बूत होंगी। इससे यह पहल विकास के साथ-साथ लचीलापन और आंतरिक सुरक्षा के लिए भी अहम बनती है।

औद्योगिक, बंदरगाह और बुनियादी ढाँचा कनेक्टिविटी

सामाजिक क्षेत्रों के अलावा, समझौते में GIDC औद्योगिक पार्कों, बंदरगाहों, समुद्री संचालन और तटीय पुलिस इकाइयों में डिजिटल कनेक्टिविटी सुधारने का प्रावधान है। इससे औद्योगिक दक्षता, लॉजिस्टिक्स, सुरक्षा और निगरानी बेहतर होगी और गुजरात एक अग्रणी विनिर्माण व निवेश गंतव्य के रूप में अपनी स्थिति और सुदृढ़ करेगा।

 

इसरो ने चंद्रयान-4 के लैंडिंग स्थल का चयन कर लिया—जानें यह क्यों महत्वपूर्ण है

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने अपने आगामी चंद्रयान-4 मिशन के लिए चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास लैंडिंग स्थल की आधिकारिक पहचान कर ली है। केंद्रीय सरकार द्वारा स्वीकृत यह मिशन भारत का पहला चंद्र नमूना-वापसी (लूनर सैंपल रिटर्न) मिशन होगा, जिसे लगभग 2028 में प्रक्षेपित किए जाने का लक्ष्य रखा गया है। चयनित लैंडिंग स्थल मॉन्स मूटन (Mons Mouton) क्षेत्र में स्थित है, जो चंद्रमा के सबसे वैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण लेकिन तकनीकी रूप से अत्यंत चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में से एक माना जाता है।

चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव इतना महत्वपूर्ण क्यों है

चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यहां स्थायी रूप से छाया में रहने वाले गड्ढे (Permanently Shadowed Craters) मौजूद हैं, जिनमें जल-बर्फ (Water Ice) होने की संभावना है। यह भविष्य के मानव मिशनों के लिए एक अहम संसाधन हो सकता है। हालांकि, यह क्षेत्र लैंडिंग के लिए बेहद कठिन भी है, क्योंकि यहां—

  • ऊबड़-खाबड़ भू-भाग
  • तीखी ढलानें और गहरे गड्ढे
  • अत्यधिक तापमान परिवर्तन
  • पृथ्वी से सीमित सीधा संचार जैसी चुनौतियां मौजूद हैं। इन कठिनाइयों के बावजूद, इसरो के विस्तृत विश्लेषण से सबसे अधिक सुरक्षा मार्जिन वाला स्थान चिन्हित किया गया है।

मॉन्स मूटन क्षेत्र: अंतिम लैंडिंग स्थल कैसे चुना गया

इसरो के वैज्ञानिकों ने मॉन्स मूटन क्षेत्र में चार संभावित लैंडिंग स्थलों— MM-1, MM-3, MM-4 और MM-5—का मूल्यांकन किया। विस्तृत भू-आकृतिक और जोखिम (हैज़र्ड) विश्लेषण के बाद MM-4 को सबसे सुरक्षित विकल्प के रूप में चुना गया।

MM-4 लैंडिंग साइट की प्रमुख विशेषताएं

  • मूल्यांकित क्षेत्र: 1 किमी × 1 किमी
  • औसत ढलान: लगभग 5 डिग्री (चंद्र मानकों के अनुसार अपेक्षाकृत समतल)
  • औसत ऊंचाई: लगभग 5,334 मीटर
  • सबसे अधिक खतरे-रहित ग्रिड्स
  • चट्टानों और गड्ढों की सबसे कम घनत्व

ये सभी गुण MM-4 को सटीक सॉफ्ट लैंडिंग के लिए आदर्श बनाते हैं।

चंद्रयान-4: अब तक का सबसे जटिल भारतीय चंद्र मिशन

चंद्रयान-4 मिशन, पिछले मिशनों की तुलना में कहीं अधिक उन्नत है और इसमें कई विशेष मॉड्यूल शामिल हैं—

  • प्रोपल्शन मॉड्यूल (PM) – डीप स्पेस मैनूवर के लिए
  • ट्रांसफर मॉड्यूल (TM) – पृथ्वी-चंद्रमा स्थानांतरण के लिए
  • डिसेंडर मॉड्यूल (DM) – चंद्र सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग के लिए
  • असेंडर मॉड्यूल (AM) – चंद्र नमूनों को ऊपर उठाने के लिए
  • री-एंट्री मॉड्यूल (RM) – नमूनों को सुरक्षित पृथ्वी पर वापस लाने के लिए

DM + AM स्टैक उन्नत नेविगेशन, गाइडेंस और कंट्रोल सिस्टम की मदद से दक्षिणी ध्रुव पर अत्यधिक सटीक लैंडिंग करेगा।

इसरो के लिए चंद्रयान-4 एक बड़ी छलांग क्यों है

चंद्रयान-4 केवल लैंडिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि चंद्र मिट्टी को पृथ्वी पर वापस लाने का मिशन है। यह भारत को उन चुनिंदा अंतरिक्ष शक्तियों के समूह में शामिल करता है, जो सैंपल-रिटर्न मिशन करने में सक्षम हैं—इन्हें अंतरिक्ष अभियानों में सबसे कठिन माना जाता है।

यह मिशन इसरो की क्षमताओं को और मजबूत करता है—

  • स्वायत्त लैंडिंग
  • सटीक नेविगेशन
  • डीप-स्पेस संचार
  • ग्रहों के नमूनों का सुरक्षित प्रबंधन

भारत की चंद्र विरासत पर कैसे आगे बढ़ता है चंद्रयान-4

इसरो की चंद्र यात्रा क्रमिक रूप से आगे बढ़ी है—

  • चंद्रयान-1 (2008) – चंद्रमा की कक्षा से जल अणुओं की पुष्टि
  • चंद्रयान-2 (2019) – ऑर्बिटर सफल, लैंडर असफल
  • चंद्रयान-3 (2023) – दक्षिणी ध्रुव के पास ऐतिहासिक सॉफ्ट लैंडिंग
  • चंद्रयान-4 (2028) – दक्षिणी ध्रुव से नमूना-वापसी का नियोजित मिशन

हर मिशन ने चंद्रयान-4 के लिए आवश्यक आत्मविश्वास और तकनीकी क्षमता को मजबूत किया है।

भविष्य के लिए यह मिशन क्यों महत्वपूर्ण है

चंद्रयान-4 वैज्ञानिकों को—

  • चंद्र भूविज्ञान का गहन अध्ययन करने
  • चंद्रमा के विकास को समझने
  • जल-बर्फ की संभावनाओं का आकलन करने
  • भविष्य के मानव मिशनों और चंद्र ठिकानों की योजना बनाने में महत्वपूर्ण सहायता प्रदान करेगा।

भारत के बैंकों का NPA रिकॉर्ड निचले स्तर पर, वित्तीय स्थिरता का संकेत

भारत की बैंकिंग प्रणाली ने हाल के वर्षों में अपनी सबसे मजबूत पुनर्बहाली में से एक दर्ज की है। 9 फरवरी 2026 को संसद को बताया गया कि अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्तियाँ (एनपीए) सितंबर 2025 के अंत तक घटकर ऐतिहासिक न्यूनतम 2.15% पर आ गईं। यह स्तर 2010–11 की तुलना में भी कम है, जो खराब ऋणों और कॉरपोरेट डिफॉल्ट्स के कारण वर्षों तक चले दबाव के बाद एक महत्वपूर्ण बदलाव और मजबूती का संकेत देता है।

एनपीए क्या हैं और इनका महत्व क्यों है

गैर-निष्पादित परिसंपत्तियाँ (एनपीए) वे ऋण होते हैं जिनमें उधारकर्ता 90 दिनों से अधिक समय तक मूलधन या ब्याज का भुगतान नहीं करता। उच्च एनपीए बैंकों की लाभप्रदता को कमजोर करते हैं और नए ऋण देने की क्षमता को सीमित करते हैं। एनपीए में गिरावट बेहतर परिसंपत्ति गुणवत्ता, मजबूत ऋण मूल्यांकन और उधारकर्ताओं में बेहतर भुगतान अनुशासन का संकेत देती है। 2.15% तक की गिरावट एक स्वस्थ बैंकिंग प्रणाली को दर्शाती है, जो आर्थिक विकास को समर्थन देने में सक्षम है।

बैंक श्रेणियों के अनुसार एनपीए का विभाजन

30 सितंबर 2025 तक घरेलू परिचालनों के लिए आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) का सकल एनपीए अनुपात 2.50% रहा, जबकि निजी क्षेत्र के बैंकों का यह अनुपात 1.73% था। भारत में कार्यरत विदेशी बैंकों में सबसे कम सकल एनपीए 0.8% दर्ज किया गया। उल्लेखनीय है कि मार्च 2018 के बाद से पीएसबी में तेज सुधार हुआ है, जिससे निजी बैंकों के साथ का अंतर काफी कम हुआ है।

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में तेज सुधार के कारण

पीएसबी में एनपीए में तेज गिरावट का मुख्य कारण बैलेंस शीट की सफाई, पूंजी पुनर्पूंजीकरण और शासन सुधार रहे। सरकार के अनुसार, बेहतर लाभप्रदता और मजबूत पूंजी स्थिति ने बेहतर ऋण प्रथाओं को समर्थन दिया। एनपीए में कमी से प्रावधान (प्रोविजनिंग) की आवश्यकता भी घटी, जिससे बैंक मुनाफा और ऋण देने की क्षमता सीधे तौर पर बढ़ी।

आरबीआई और सरकार की 4R रणनीति की भूमिका

यह सुधार 2015 में आरबीआई की एसेट क्वालिटी रिव्यू (AQR) के बाद शुरू हुआ, जिसने खराब ऋणों की पारदर्शी पहचान को अनिवार्य बनाया। इसके बाद सरकार की 4R रणनीति—पहचान (Recognition), समाधान (Resolution), पुनर्पूंजीकरण (Recapitalisation) और सुधार (Reforms)—लागू की गई। इन कदमों ने तनावग्रस्त परिसंपत्तियों का व्यवस्थित समाधान किया और नए खराब ऋणों के जमाव को रोका।

वसूली के साधन: IBC, SARFAESI और DRTs

बैंकों ने वसूली के लिए ऋण वसूली न्यायाधिकरण (DRTs), SARFAESI अधिनियम और राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण के माध्यम से दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) के तहत मामलों जैसे कई तंत्रों का उपयोग किया। सरकार ने कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रियाओं (CIRPs) को तेज करने के लिए IBC में संशोधन का प्रस्ताव भी रखा, जिससे वसूली के परिणाम और मजबूत हुए।

स्लिपेज अनुपात में सुधार और भविष्य का दृष्टिकोण

स्लिपेज अनुपात—जो नए एनपीए के जुड़ने को मापता है—पिछले छह वर्षों में लगातार बेहतर हुआ है, खासकर पीएसबी के लिए। यह कम नए खराब ऋण और बेहतर क्रेडिट निगरानी का संकेत देता है। सुधारों के साथ मिलकर, यह भारत के बैंकिंग क्षेत्र में दीर्घकालिक स्थिरता का मजबूत संकेत है।

नेटवर्क रेडीनेस इंडेक्स 2025 में भारत की चार पायदान की छलांग

वैश्विक डिजिटल प्रदर्शन में भारत ने उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। 4 फरवरी 2026 को जारी नेटवर्क रेडीनेस इंडेक्स 2025 रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने चार पायदान की छलांग लगाते हुए 127 अर्थव्यवस्थाओं में 45वाँ स्थान हासिल किया है। रैंकिंग में सुधार के साथ-साथ भारत का कुल स्कोर भी बढ़कर 2024 के 53.63 से 54.43 (2025) हो गया है। रिपोर्ट में प्रौद्योगिकी अपनाने, डिजिटल अवसंरचना और नवाचार-आधारित विकास में भारत की बढ़ती मजबूती को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है।

नेटवर्क रेडीनेस इंडेक्स 2025 क्या है?

नेटवर्क रेडीनेस इंडेक्स 2025 यह आकलन करता है कि देश विकास और वृद्धि के लिए डिजिटल तकनीकों का कितनी प्रभावी ढंग से उपयोग कर रहे हैं। यह सूचकांक पोर्टुलान्स इंस्टीट्यूट (Portulans Institute) द्वारा तैयार किया जाता है, जो एक स्वतंत्र गैर-लाभकारी शोध संगठन है। इसमें 127 अर्थव्यवस्थाओं का मूल्यांकन चार स्तंभों—प्रौद्योगिकी, लोग, शासन और प्रभाव—के आधार पर किया जाता है, जिनके अंतर्गत 53 संकेतक शामिल हैं। यह सूचकांक अर्थव्यवस्था और समाज में नेटवर्क, डेटा और डिजिटल टूल्स के उपयोग की प्रभावशीलता की एक समग्र तस्वीर प्रस्तुत करता है।

NRI 2025 में भारत की बेहतर रैंक और स्कोर

नेटवर्क रेडीनेस इंडेक्स 2025 में भारत का 45वें स्थान पर पहुँचना विभिन्न डिजिटल संकेतकों में निरंतर सुधार को दर्शाता है। देश का स्कोर 54.43 (100 में से) तक बढ़ गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में अधिक मजबूत डिजिटल आधार का संकेत देता है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि भारत की नेटवर्क रेडीनेस उसकी आय स्तर की अपेक्षा से अधिक है, जिससे स्पष्ट होता है कि देश की डिजिटल प्रगति आर्थिक सीमाओं से तेज़ गति से आगे बढ़ रही है।

प्रमुख डिजिटल संकेतकों में भारत की शीर्ष वैश्विक रैंकिंग

नेटवर्क रेडीनेस इंडेक्स 2025 की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक यह है कि भारत ने कई महत्वपूर्ण संकेतकों में वैश्विक स्तर पर प्रथम स्थान हासिल किया है। भारत दूरसंचार सेवाओं में वार्षिक निवेश, एआई से जुड़े वैज्ञानिक प्रकाशन, आईसीटी सेवा निर्यात और ई-कॉमर्स कानून जैसे क्षेत्रों में दुनिया में पहला स्थान पर रहा। ये रैंकिंग भारत के मजबूत डिजिटल नीति ढांचे, सशक्त नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र और निर्यात-आधारित आईटी सेवा क्षेत्र को दर्शाती हैं। यह प्रदर्शन भारत की एक वैश्विक डिजिटल और प्रौद्योगिकी सेवा केंद्र के रूप में भूमिका को रेखांकित करता है।

कनेक्टिविटी और बाज़ार आकार में मजबूत प्रदर्शन

कनेक्टिविटी से जुड़े संकेतकों में भी भारत का प्रदर्शन प्रभावशाली रहा है। भारत ने FTTH/बिल्डिंग इंटरनेट सब्सक्रिप्शन, मोबाइल ब्रॉडबैंड इंटरनेट ट्रैफिक और अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट बैंडविड्थ में दूसरा वैश्विक स्थान प्राप्त किया, जो डिजिटल अवसंरचना के तीव्र विस्तार को दर्शाता है। इसके अलावा, भारत ने घरेलू बाज़ार आकार और आय असमानता संकेतक में तीसरा स्थान हासिल किया, जो देश के विशाल डिजिटल उपभोक्ता आधार और डिजिटल समावेशन में हो रहे सुधार को दर्शाता है।

निम्न-मध्यम आय वर्ग की अर्थव्यवस्थाओं में भारत

नेटवर्क रेडीनेस इंडेक्स 2025 में भारत को निम्न-मध्यम आय वाले देशों में दूसरा स्थान मिला है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भारत अपनी आर्थिक स्थिति से कहीं आगे बढ़कर डिजिटल तत्परता का प्रदर्शन कर रहा है। यह लक्षित नीतिगत हस्तक्षेपों, निजी क्षेत्र के निवेश और बड़े पैमाने के डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से तेज़ तकनीकी अपनाने का परिणाम है। भारत का यह प्रदर्शन दिखाता है कि विकासशील अर्थव्यवस्थाएँ किस तरह डिजिटल नेटवर्क का उपयोग कर समावेशी विकास को आगे बढ़ा सकती हैं।

श्रेणीवार शीर्ष प्रदर्शन करने वाले देश (Category Wise Performers)

श्रेणी 1: आय समूह के अनुसार शीर्ष 3 देश

उच्च आय (High Income)

  • संयुक्त राज्य अमेरिका — रैंक 1
  • फ़िनलैंड — रैंक 2
  • सिंगापुर — रैंक 3

उच्च-मध्यम आय (Upper-Middle Income)

  • चीन — रैंक 24
  • मलेशिया — रैंक 38
  • थाईलैंड — रैंक 44

निम्न-मध्यम आय (Lower-Middle Income)

  • वियतनाम — रैंक 40
  • भारत — रैंक 45
  • फ़िलिपींस — रैंक 66

निम्न आय (Low Income)

  • रवांडा — रैंक 87
  • युगांडा — रैंक 112
  • मलावी — रैंक 116

श्रेणी 2: क्षेत्रवार शीर्ष 3 देश

अफ्रीका

  • मॉरीशस — रैंक 58
  • दक्षिण अफ्रीका — रैंक 69
  • केन्या — रैंक 77

अरब देश

  • संयुक्त अरब अमीरात (UAE) — रैंक 26
  • सऊदी अरब — रैंक 34
  • बहरीन — रैंक 36

एशिया और प्रशांत

  • सिंगापुर — रैंक 3
  • कोरिया गणराज्य (दक्षिण कोरिया) — रैंक 10
  • जापान — रैंक 11

CIS (स्वतंत्र राष्ट्रमंडल)

  • रूसी संघ — रैंक 56
  • आर्मेनिया — रैंक 62
  • कज़ाख़स्तान — रैंक 65

यूरोप

  • फ़िनलैंड — रैंक 2
  • डेनमार्क — रैंक 4
  • स्वीडन — रैंक 5

अमेरिका महाद्वीप

  • संयुक्त राज्य अमेरिका — रैंक 1
  • कनाडा — रैंक 12
  • कोस्टा रिका — रैंक 42

श्रेणी 3: समग्र वैश्विक रैंकिंग (शीर्ष 5)

  • संयुक्त राज्य अमेरिका — स्कोर 79.13
  • फ़िनलैंड — स्कोर 75.82
  • सिंगापुर — स्कोर 75.46
  • डेनमार्क — स्कोर 75.14
  • स्वीडन — स्कोर 75.09

नेटवर्क रेडीनेस क्यों महत्वपूर्ण है

नेटवर्क रेडीनेस किसी देश की इस क्षमता को मापता है कि वह डिजिटल नेटवर्क का उपयोग आर्थिक, सामाजिक और शासन से जुड़े परिणामों के लिए कितनी प्रभावी तरह से कर पा रहा है। उच्च नेटवर्क रेडीनेस नवाचार को बढ़ावा देती है, सार्वजनिक सेवाओं को अधिक कुशल बनाती है, ई-कॉमर्स के विकास को समर्थन देती है और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करती है। भारत जैसे देश के लिए नेटवर्क रेडीनेस में सुधार स्टार्टअप्स, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, एआई अनुसंधान और वैश्विक आईटी निर्यात को मजबूती देने के लिए अत्यंत आवश्यक है, जिससे यह एक महत्वपूर्ण दीर्घकालिक विकास संकेतक बन जाता है।

भारत और सेशेल्स ने ‘सेशेल’ विजन को अपनाया और विशेष आर्थिक पैकेज का घोषणा किया

भारत और सेशेल्स ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को एक नए रणनीतिक स्तर पर पहुंचा दिया है। 9 फरवरी 2026 को सेशेल्स के राष्ट्रपति की भारत की राजकीय यात्रा के दौरान, दोनों देशों ने सततता, आर्थिक विकास और सुरक्षा के लिए सुदृढ़ संपर्कों के माध्यम से संयुक्त दृष्टि (SESEL) की घोषणा की। यह पहल हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की बढ़ती भूमिका और एक करीबी समुद्री साझेदार के रूप में सेशेल्स के महत्व को रेखांकित करती है, जिसमें सुरक्षा, विकास और जन-केंद्रित सहयोग को केंद्र में रखा गया है।

भारत–सेशेल्स संयुक्त दृष्टि (SESEL)

भारत–सेशेल्स संयुक्त दृष्टि (SESEL) की घोषणा 9 फरवरी 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सेशेल्स के राष्ट्रपति पैट्रिक हर्मिनी के बीच हुई बैठक के दौरान की गई। यह दृष्टि सततता, आर्थिक विकास और सुरक्षा सहयोग को शामिल करते हुए एक समग्र रोडमैप प्रस्तुत करती है। यह यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण रही क्योंकि यह सेशेल्स की स्वतंत्रता के 50 वर्ष और भारत–सेशेल्स राजनयिक संबंधों के 50 वर्ष पूरे होने के अवसर पर हुई, जिससे दोनों देशों की दीर्घकालिक साझेदारी और मजबूत हुई।

राजकीय यात्रा का राजनीतिक और रणनीतिक महत्व

राष्ट्रपति हर्मिनी की यह यात्रा पद संभालने के लगभग 100 दिनों के भीतर हुई, जो भारत को सेशेल्स की प्राथमिकता को दर्शाती है। दोनों नेताओं ने दोहराया कि भारत और सेशेल्स के बीच लोकतंत्र, बहुलवाद और जन-जन के संबंधों पर आधारित एक विशेष और समय-परीक्षित साझेदारी है। समुद्री पड़ोसी होने के नाते, उन्होंने पश्चिमी हिंद महासागर क्षेत्र में शांति और स्थिरता के लिए सहयोग को अत्यंत आवश्यक बताया, जिसमें सेशेल्स की भूमिका भारत के विज़न महा-सागर (MAHASAGAR) में अहम मानी गई।

विकास साझेदारी और 175 मिलियन अमेरिकी डॉलर का आर्थिक पैकेज

संयुक्त दृष्टि का एक प्रमुख आकर्षण भारत द्वारा घोषित 175 मिलियन अमेरिकी डॉलर का विशेष आर्थिक पैकेज रहा। इसमें 125 मिलियन डॉलर की रुपये-नामित ऋण सहायता (Line of Credit) और 50 मिलियन डॉलर की अनुदान सहायता शामिल है। यह पैकेज विकास परियोजनाओं, क्षमता निर्माण, समुद्री सुरक्षा, रक्षा सहयोग और उच्च प्रभाव वाले सामुदायिक विकास पहलों को समर्थन देगा। सेशेल्स ने भारत को एक विश्वसनीय और भरोसेमंद विकास साझेदार के रूप में स्वीकार किया।

डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और शासन सुधार

डिजिटल परिवर्तन में भारत के नेतृत्व को स्वीकार करते हुए, दोनों पक्षों ने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) पर सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई। भारत, डिजिटल भुगतान सहित, सेशेल्स की शासन प्रणालियों के डिजिटलीकरण में सहायता करेगा, जिससे सेवा वितरण और नागरिक कल्याण में सुधार होगा। यह सहयोग भारत की ग्लोबल साउथ नीति को भी दर्शाता है, जहाँ डिजिटलीकरण को समावेशी विकास और कुशल शासन का एक महत्वपूर्ण साधन माना जाता है।

स्वास्थ्य, दवाइयाँ और खाद्य सुरक्षा सहयोग

स्वास्थ्य सहयोग संयुक्त दृष्टि का एक मजबूत स्तंभ बनकर उभरा है। भारत ने आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने के लिए सेशेल्स को 10 उन्नत एंबुलेंस प्रदान कीं। दोनों देशों ने भारतीय फार्माकोपिया को मान्यता देने पर भी सहमति जताई, जिससे सेशेल्स को भारत की जन औषधि योजना के तहत किफायती और गुणवत्तापूर्ण दवाइयाँ प्राप्त करने में मदद मिलेगी। इसके अतिरिक्त, भारत ने 1,000 मीट्रिक टन अनाज का भी दान किया, जिससे सेशेल्स की खाद्य सुरक्षा मजबूत होगी और जीवन-यापन की लागत कम करने में सहायता मिलेगी।

क्षमता निर्माण, शिक्षा और कौशल विकास

क्षमता निर्माण भारत–सेशेल्स संबंधों का एक केंद्रीय स्तंभ बना हुआ है। भारतीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग (ITEC) कार्यक्रम के तहत सहयोग का विस्तार किया जाएगा। दोनों पक्षों ने राष्ट्रीय सुशासन केंद्र (NCGG) के माध्यम से सेशेल्स के सिविल सेवकों के लिए अनुकूलित प्रशिक्षण, तथा साइबर सुरक्षा, वित्त, पुलिसिंग, जलवायु परिवर्तन, समुद्री विज्ञान और MSME प्रोत्साहन जैसे क्षेत्रों में सहयोग मजबूत करने पर सहमति जताई। इसके साथ ही शैक्षिक और व्यावसायिक प्रशिक्षण संबंधों को भी विस्तारित किया जाएगा।

नवीकरणीय ऊर्जा, जलवायु कार्रवाई और सततता

संयुक्त दृष्टि में नवीकरणीय ऊर्जा और जलवायु सहनशीलता पर विशेष जोर दिया गया है। भारत अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) के तहत सेशेल्स में सौर ऊर्जा परियोजनाओं का समर्थन जारी रखेगा। दोनों नेताओं ने मल्टी-हैज़र्ड अर्ली वार्निंग सिस्टम लागू करने, पावर ग्रिड प्रबंधन में सहायता देने और हरित सार्वजनिक परिवहन की ओर सेशेल्स के संक्रमण को समर्थन देने पर सहमति व्यक्त की। सेशेल्स ने आपदा-रोधी अवसंरचना गठबंधन (CDRI) में शामिल होने पर भी सहमति जताई।

व्यापार, निवेश, कनेक्टिविटी और पर्यटन

ब्लू इकोनॉमी, पर्यटन, मत्स्य, डिजिटल तकनीक, एआई और वित्तीय सेवाओं जैसे क्षेत्रों में व्यापार और निवेश सहयोग को और गहरा किया जाएगा। दोनों नेताओं ने सीधी उड़ान कनेक्टिविटी के सकारात्मक प्रभाव को रेखांकित किया, जिससे सेशेल्स में भारतीय पर्यटकों की संख्या बढ़ी है। उन्होंने हवाई संपर्क के और विस्तार तथा द्विपक्षीय व्यापार की पूर्ण क्षमता को साझा समृद्धि के लिए उपयोग करने पर सहमति जताई।

समुद्री सुरक्षा, रक्षा और हाइड्रोग्राफिक सहयोग

समुद्री सुरक्षा साझेदारी का एक मुख्य आधार बनी हुई है। भारत ने विज़न महा-सागर (क्षेत्रों में सुरक्षा और विकास के लिए पारस्परिक एवं समग्र उन्नति) के तहत सेशेल्स की रक्षा और समुद्री आवश्यकताओं के लिए समर्थन दोहराया। भारत की सहायता से सेशेल्स सेशेल्स हाइड्रोग्राफिक यूनिट की स्थापना करेगा। सहयोग का फोकस समुद्री डकैती, अवैध मछली पकड़ना, तस्करी और अन्य सीमा-पार अपराधों से निपटने पर भी रहेगा।

क्षेत्रीय और बहुपक्षीय सहयोग

भारत ने कोलंबो सिक्योरिटी कॉन्क्लेव का पूर्ण सदस्य बनने के सेशेल्स के निर्णय का स्वागत किया। सेशेल्स ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए भारत के समर्थन की पुन: पुष्टि की। दोनों देशों ने क्षेत्रीय और बहुपक्षीय मंचों पर मिलकर कार्य करने पर सहमति जताई, ताकि लघु द्वीपीय विकासशील देशों (SIDS) से जुड़ी साझा समुद्री और विकास संबंधी चुनौतियों का समाधान किया जा सके।

सेशेल्स के बारे में

  • स्थान: पश्चिमी हिंद महासागर में स्थित एक द्वीपसमूह देश; मेडागास्कर के उत्तर-पूर्व और अफ्रीकी मुख्यभूमि के पूर्व में
  • राजधानी: विक्टोरिया
  • निकटवर्ती द्वीप: दक्षिण में कोमोरोस और मॉरीशस; पूर्व में मालदीव
  • संरचना: 115 द्वीपों का द्वीपसमूह, जिनमें से केवल 8 स्थायी रूप से आबाद
  • जलवायु: उष्णकटिबंधीय महासागरीय जलवायु, तापमान में बहुत कम उतार-चढ़ाव
  • भूगोल: दो प्रमुख द्वीप समूह—पर्वतीय ग्रेनाइटिक माहे समूह और समतल कोरल द्वीप; सर्वोच्च शिखर मॉर्न सेशेल्वा

भारत ने सेशेल्स के लिए 175 मिलियन अमेरिकी डॉलर का विशेष पैकेज पेश किया

भारत ने हिंद महासागर क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक और रणनीतिक कदम उठाया है। 9 फरवरी 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली में सेशेल्स के राष्ट्रपति डॉ. पैट्रिक हर्मिनी के साथ द्विपक्षीय वार्ता के दौरान सेशेल्स के लिए 175 मिलियन अमेरिकी डॉलर के विशेष आर्थिक पैकेज की घोषणा की। यह घोषणा भारत की समुद्री पड़ोसियों पर बढ़ती प्राथमिकता, विकास सहयोग और सुरक्षा साझेदारियों को दर्शाती है, जो उसकी व्यापक हिंद महासागर दृष्टि का हिस्सा है।

भारत–सेशेल्स 175 मिलियन अमेरिकी डॉलर विशेष आर्थिक पैकेज

भारत ने सेशेल्स में सामाजिक आवास, ई-मोबिलिटी, व्यावसायिक प्रशिक्षण, स्वास्थ्य, रक्षा और समुद्री सुरक्षा को समर्थन देने के लिए 175 मिलियन डॉलर का विशेष आर्थिक पैकेज घोषित किया। यह घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति पैट्रिक हर्मिनी के बीच हुई द्विपक्षीय वार्ता के बाद की गई। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच सात समझौता ज्ञापनों (MoUs) पर हस्ताक्षर हुए, जिससे विभिन्न प्रमुख क्षेत्रों में सहयोग को मजबूती मिली।

175 मिलियन डॉलर पैकेज के प्रमुख क्षेत्र

यह विशेष आर्थिक पैकेज जन-केंद्रित और सुरक्षा से जुड़े क्षेत्रों पर केंद्रित है। इसके तहत किफायती सामाजिक आवास को बढ़ावा, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी का विस्तार, स्वास्थ्य अवसंरचना को मजबूत करना और व्यावसायिक प्रशिक्षण को सुदृढ़ किया जाएगा। पैकेज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रक्षा और समुद्री सुरक्षा के लिए निर्धारित है, जिससे एक रणनीतिक समुद्री साझेदार के रूप में सेशेल्स की क्षमता और मजबूत होगी। यह पैकेज क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग के साथ विकास सहायता को जोड़ने की भारत की नीति को दर्शाता है।

सात MoUs: शामिल क्षेत्र

भारत और सेशेल्स के बीच स्वास्थ्य, मौसम विज्ञान, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी, डिजिटल परिवर्तन और सुशासन जैसे क्षेत्रों में सात समझौता ज्ञापन किए गए। इनमें एक प्रमुख समझौता भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और सेशेल्स मौसम विज्ञान प्राधिकरण के बीच तकनीकी और वैज्ञानिक सहयोग से संबंधित है। इन MoUs का उद्देश्य संस्थागत संबंधों को गहरा करना, शासन क्षमता बढ़ाना और प्रौद्योगिकी-आधारित विकास को प्रोत्साहित करना है।

डिजिटल परिवर्तन और सिविल सेवा प्रशिक्षण

डिजिटल परिवर्तन से जुड़ा MoU एक प्रमुख आकर्षण रहा, जिसके तहत भारत अपने सफल डिजिटल गवर्नेंस मॉडल सेशेल्स के साथ साझा करेगा। एक अन्य महत्वपूर्ण समझौता सेशेल्स के सिविल सेवकों को भारत में प्रशिक्षण देने से संबंधित है, जिससे प्रशासनिक क्षमता मजबूत होगी। डिजिटल सार्वजनिक सेवाओं और शासन सुधारों में भारत का अनुभव सेशेल्स को सार्वजनिक प्रशासन के आधुनिकीकरण में मदद करेगा।

स्वास्थ्य सहयोग और चिकित्सा समर्थन

प्रधानमंत्री मोदी ने दोहराया कि भारत सेशेल्स के लिए एक स्थिर और भरोसेमंद स्वास्थ्य साझेदार रहा है। सहयोग के प्रमुख क्षेत्रों में किफायती और गुणवत्तापूर्ण दवाएं, मेडिकल टूरिज्म और स्वास्थ्य अवसंरचना का विकास शामिल है। यह भारत की “दुनिया की फार्मेसी” की छवि को और मजबूत करता है तथा सेशेल्स की जनता के लिए बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच सुनिश्चित करता है।

समुद्री सुरक्षा और विज़न महा-सागर (MAHASAGAR)

दोनों नेताओं ने इस बात पर जोर दिया कि समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता द्विपक्षीय संबंधों के केंद्र में बनी हुई है। प्रधानमंत्री मोदी ने भारत के विज़न महा-सागर (क्षेत्रों में सुरक्षा और विकास के लिए पारस्परिक एवं समग्र उन्नति) में सेशेल्स के महत्व को रेखांकित किया। हिंद महासागर के पड़ोसी देशों के रूप में समुद्री निगरानी, रक्षा क्षमता और क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे में सहयोग आगे और गहराता रहेगा।

राजकीय यात्रा का रणनीतिक महत्व

यह राष्ट्रपति पैट्रिक हर्मिनी की अक्टूबर 2025 में पद संभालने के बाद भारत की पहली यात्रा थी। यह यात्रा भारत–सेशेल्स राजनयिक संबंधों की 50वीं वर्षगांठ के साथ भी मेल खाती है, जिससे इसका प्रतीकात्मक महत्व और बढ़ जाता है। राष्ट्रपति हर्मिनी ने इस यात्रा को दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक मित्रता, विश्वास और साझा पांच वर्षीय सहयोग दृष्टि का प्रतिबिंब बताया।

मिलान 2026 में मेडल की दौड़ में कौन आगे है? लाइव विंटर ओलंपिक्स 2026 मेडल ट्रैकर

विंटर ओलंपिक्स 2026 आधिकारिक रूप से मिलान, इटली में शुरू हो चुका है और प्रतियोगिताएँ पहले ही रोमांचक पदक क्षण प्रदान कर रही हैं। 9 फरवरी 2026 तक, खेलों में 16 इवेंट संपन्न हो चुके हैं, जिनमें कुल 48 पदक वितरित किए गए हैं। शुरुआती मुकाबलों में पारंपरिक शीतकालीन खेलों के दिग्गज देशों ने मजबूत प्रदर्शन किया है, साथ ही कुछ आश्चर्यजनक प्रतिस्पर्धियों ने भी ध्यान आकर्षित किया है। दर्शक और विश्लेषक प्रतिदिन के पदक आंकड़ों पर नज़र बनाए हुए हैं, जो खेलों की शुरुआत में ही प्रतियोगिताओं की कहानी को आकार दे रहे हैं।

मिलान विंटर गेम्स की शुरुआती झलकियां

2026 के विंटर ओलंपिक्स के शुरुआती दिन शानदार व्यक्तिगत और टीम प्रदर्शनों से भरे रहे हैं। टीम यूएसए ने महिलाओं की डाउनहिल स्कीइंग में ब्रीज़ी जॉनसन के स्वर्ण पदक के साथ मजबूत शुरुआत की। इसके बाद फिगर स्केटिंग टीम इवेंट में एक और स्वर्ण पदक जीतकर अमेरिका ने अपनी बढ़त को और पुख्ता किया। इन जीतों के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका ने शुरुआती चरण में स्वर्ण पदकों के मुकाबले कुल पदकों का बेहद शानदार अनुपात दर्ज किया। वहीं, कई यूरोपीय और एशियाई देशों ने भी दमदार शुरुआत की है, जो विंटर गेम्स की कड़ी और रोमांचक प्रतिस्पर्धा को दर्शाता है।

वर्तमान पदक तालिका: कौन शीर्ष पर है?

नवीनतम अपडेट (9 फरवरी) के अनुसार, मेज़बान देश होने का लाभ उठाते हुए इटली कुल 9 पदकों के साथ समग्र पदक तालिका में सबसे आगे है। जापान 7 पदकों के साथ दूसरे स्थान पर है, जबकि नॉर्वे और स्विट्ज़रलैंड उच्च स्वर्ण पदक संख्या के साथ शीतकालीन खेलों की दिग्गज ताकत के रूप में अपनी प्रतिष्ठा बनाए हुए हैं। हालांकि संयुक्त राज्य अमेरिका के कुल पदक अभी कम हैं, लेकिन उसके दोनों पदक स्वर्ण होने के कारण फाइनल मुकाबलों में उसकी उच्च दक्षता साफ़ तौर पर नजर आती है।

विंटर ओलंपिक्स 2026 लाइव पदक तालिका (शुरुआती स्थिति)

देश कुल पदक स्वर्ण पदक
इटली 9 1
जापान 7 2
नॉर्वे 6 3
स्विट्ज़रलैंड 5 3
ऑस्ट्रिया 4 1
जर्मनी 4 2
संयुक्त राज्य अमेरिका 2 2
फ्रांस 2 1
नीदरलैंड 2 1
स्वीडन 2 1
चेकिया 2 1
चीन 2
कनाडा 2

आगे क्या: किन स्पर्धाओं पर रहेगी खास नज़र

आने वाले दिनों में पदक तालिका में बड़े बदलाव की संभावनाएँ हैं, क्योंकि मेंस फ्रीस्की स्लोपस्टाइल और शॉर्ट ट्रैक स्पीड स्केटिंग मिक्स्ड टीम रिले के फाइनल मुकाबले निर्धारित हैं। इसके अलावा टीम यूएसए अपनी पहली-बार की ओलंपिक कर्लिंग मिक्स्ड डबल्स फाइनल में प्रवेश करने जा रही है, जहाँ उसका मुकाबला स्वीडन से होगा और उसे स्वर्ण पदक का प्रबल दावेदार माना जा रहा है। ये स्पर्धाएँ अगले कुछ दिनों में पदक क्रम को काफी हद तक बदल सकती हैं।

शुरुआती पदक गिनती क्यों मायने रखती है

ओलंपिक में शुरुआती पदक अक्सर पूरे टूर्नामेंट की दिशा तय करते हैं। जो देश शुरुआत में बढ़त बना लेते हैं, वे आगे की स्पर्धाओं में अधिक आत्मविश्वास के साथ प्रदर्शन करते हैं। मेज़बान देश इटली आमतौर पर शुरुआती नतीजों का अधिकतम लाभ उठाने की कोशिश करता है, जबकि नॉर्वे और स्विट्ज़रलैंड जैसी टीमें विभिन्न खेलों में निरंतरता पर भरोसा करती हैं। विश्लेषक स्वर्ण-से-कुल पदक अनुपात पर भी नज़र रखते हैं, जिससे प्रतिस्पर्धी दक्षता का आकलन किया जाता है—इसी कारण ये शुरुआती आंकड़े व्यापक ओलंपिक विश्लेषण में महत्वपूर्ण होते हैं।

विंटर ओलंपिक्स के बारे में

विंटर ओलंपिक्स हर चार वर्ष में आयोजित होते हैं और इनमें बर्फ व हिम पर खेले जाने वाले खेल शामिल होते हैं, जैसे स्कीइंग, स्केटिंग, आइस हॉकी और कर्लिंग। मिलान-कोर्टिना गेम्स के साथ इटली करीब दो दशकों बाद फिर से विंटर ओलंपिक्स की मेज़बानी कर रहा है। पदक तालिकाएँ दुनिया भर में करीबी से देखी जाती हैं और खेल, अंतरराष्ट्रीय आयोजन व मेज़बान देशों से जुड़े प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नों में भी अक्सर शामिल रहती हैं।

विश्व दलहन दिवस 2026: इतिहास और महत्व

विश्व दलहन दिवस प्रतिवर्ष 10 फरवरी को मनाया जाता है। यह खास दिन सेहत के लिए दालों का महत्व समझाने के उद्देश्य से मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा मान्यता प्राप्त यह दिवस बताता है कि दालें, सेम और चना जैसे सरल खाद्य पदार्थ भूख से लड़ने, मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और जलवायु-अनुकूल कृषि को समर्थन देने में कितनी अहम भूमिका निभाते हैं। किसानों से लेकर नीति-निर्माताओं तक, विश्व दलहन दिवस हमारी खाद्य पसंदों को वैश्विक सतत विकास लक्ष्यों से जोड़ने का संदेश देता है।

विश्व दलहन दिवस कब मनाया जाता है

विश्व दलहन दिवस हर वर्ष 10 फरवरी को मनाया जाता है। इसे आधिकारिक रूप से वर्ष 2019 से मनाया जा रहा है, जब दिसंबर 2018 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इसे घोषित किया था। यह अंतरराष्ट्रीय दलहन वर्ष 2016 की सफलता पर आधारित है, जिसने खाद्य सुरक्षा और सतत विकास के लिए दलहनों को एक आवश्यक फसल के रूप में वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाई।

विश्व दलहन दिवस क्यों मनाया जाता है

विश्व दलहन दिवस की स्थापना दलहनों के दीर्घकालिक महत्व को केवल एक वर्ष तक सीमित न रखते हुए लगातार उजागर करने के लिए की गई थी। इसका उद्देश्य स्वस्थ आहार को बढ़ावा देना, टिकाऊ खाद्य प्रणालियों को समर्थन देना, किसानों की आजीविका को मजबूत करना, भूख और कुपोषण को कम करना तथा मिट्टी की उर्वरता और जैव विविधता में सुधार करना है। सरल शब्दों में, यह दिवस दलहनों को लोगों, मिट्टी और पृथ्वी के लिए भोजन के रूप में मनाता है।

विश्व दलहन दिवस 2026 की थीम

विश्व दलहन दिवस 2026 की थीम है “पल्सेस ऑफ द वर्ल्ड: फ्रॉम मॉडेस्टी टू एक्सीलेंस” (दुनिया के दलहन: सादगी से उत्कृष्टता तक)। यह थीम दर्शाती है कि मसूर, मटर, सेम और चना जैसी साधारण फसलें कैसे विकसित होकर वैश्विक स्तर पर पोषक-तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थों के रूप में पहचानी जाने लगी हैं। साथ ही, यह आधुनिक आहार, पाक नवाचार और जलवायु-स्मार्ट कृषि में दलहनों की बढ़ती भूमिका को भी रेखांकित करती है।

विश्व दलहन दिवस 2026 के प्रमुख फोकस क्षेत्र

वर्ष 2026 का आयोजन दलहनों के साधारण मुख्य खाद्य से वैश्विक सुपरफूड बनने की यात्रा को उजागर करता है। यह अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देता है, जिसमें मुख्य वैश्विक कार्यक्रम स्पेन के साम्राज्य के सहयोग से वलाडोलिड में आयोजित किया जा रहा है। ये उत्सव विज्ञान और खाद्य संस्कृति का संगम प्रस्तुत करते हैं तथा संयुक्त राष्ट्र के 2030 सतत विकास लक्ष्यों, विशेषकर खाद्य सुरक्षा और जलवायु कार्रवाई, के प्रति समर्थन को और मजबूत करते हैं।

दलहन क्या हैं?

दलहन वे सूखे खाद्य बीज होते हैं जो फलीदार (लेग्यूम) पौधों से प्राप्त होते हैं और भोजन के रूप में उपयोग किए जाते हैं। इनमें प्रोटीन, फाइबर, विटामिन और खनिज प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। विश्वभर में दलहन अनेक देशों के आहार का प्रमुख हिस्सा हैं।

दलहनों के उदाहरण और प्रकार

सामान्य दलहनों में चना, मसूर, सूखी सेम, सूखी मटर और ल्यूपिन शामिल हैं। मसूर आयरन और प्रोटीन से भरपूर होती है, चना फाइबर और वनस्पति प्रोटीन का अच्छा स्रोत है, सूखी सेम हृदय स्वास्थ्य को सहारा देती है, जबकि मटर और ल्यूपिन अपनी जलवायु सहनशीलता के लिए जाने जाते हैं। ये फसलें सस्ती, पोषक और सांस्कृतिक रूप से विविध हैं।

स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए दलहनों का महत्व

दलहन कम वसा वाले होते हैं, रक्त शर्करा और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने में मदद करते हैं तथा हृदय स्वास्थ्य और वजन प्रबंधन को समर्थन देते हैं। पर्यावरण की दृष्टि से ये मिट्टी में नाइट्रोजन स्थिरीकरण करते हैं, कम पानी की आवश्यकता होती है, इनका कार्बन फुटप्रिंट कम होता है और ये जैव विविधता को बढ़ावा देते हैं। इसलिए दलहन आदर्श जलवायु-स्मार्ट फसलें मानी जाती हैं।

विश्व दलहन दिवस और भारत

भारत विश्व के सबसे बड़े दलहन उत्पादक और उपभोक्ता देशों में से एक है। विश्व दलहन दिवस भारतीय किसानों को दलहनों के साथ फसल चक्र और अंतरफसल अपनाने के लिए प्रेरित करता है, जिससे मिट्टी का स्वास्थ्य, उत्पादकता और आय में वृद्धि होती है। इसके साथ-साथ यह राष्ट्रीय पोषण लक्ष्यों को भी समर्थन देता है।

खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के बारे में

  • परिचय: भूख को समाप्त करने के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रयासों का नेतृत्व करने वाली संयुक्त राष्ट्र की विशेष एजेंसी; स्थापना अक्टूबर 1945 में।
  • दायित्व: पोषण में सुधार, कृषि उत्पादकता बढ़ाना, ग्रामीण जीवन स्तर उठाना और वैश्विक आर्थिक विकास को समर्थन देना।
  • कार्य: कृषि, वानिकी, मत्स्य, भूमि और जल संसाधनों में सरकारी व तकनीकी कार्यक्रमों का समन्वय; नीति-संवाद का मंच और तकनीकी ज्ञान का स्रोत।
  • सदस्यता व वित्तपोषण: 195 सदस्य (194 देश + यूरोपीय संघ); सदस्य देशों के योगदान से वित्तपोषित; भारत संस्थापक सदस्य है।
  • रिपोर्ट व मुख्यालय: SOFO, SOFIA, SOCO और SOFI रिपोर्ट प्रकाशित करता है; मुख्यालय रोम, इटली में स्थित है।

जानें रिसर्च पर सबसे ज्यादा खर्च करने वाला देश कौन है?

वैश्विक अनुसंधान और विकास (R&D) व्यय ने एक ऐतिहासिक मुकाम हासिल किया है। विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (WIPO) द्वारा जारी ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स 2025 के अनुसार, वर्ष 2024 में कुल वैश्विक R&D खर्च बढ़कर 2.87 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया, जिसमें लगभग 3% की वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई। इस रिपोर्ट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि चीन ने संयुक्त राज्य अमेरिका को पीछे छोड़ते हुए दुनिया का सबसे बड़ा R&D खर्च करने वाला देश बन गया है। वहीं, भारत ने भी अपनी स्थिति मजबूत करते हुए R&D खर्च के मामले में शीर्ष 10 देशों में स्थान हासिल किया है, जो नवाचार, विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में देश की बढ़ती क्षमता को दर्शाता है।

वैश्विक R&D खर्च का दीर्घकालिक रुझान

वर्ष 2000 के बाद से वैश्विक अनुसंधान एवं विकास (R&D) पर होने वाला खर्च लगभग तीन गुना हो चुका है, जो नवाचार-आधारित विकास के बढ़ते महत्व को दर्शाता है। वर्तमान में एशिया वैश्विक R&D व्यय का लगभग 45% हिस्सा वहन करता है, जो पारंपरिक पश्चिमी प्रभुत्व से हटकर एक बड़े संरचनात्मक बदलाव का संकेत है। उभरती अर्थव्यवस्थाएं विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार में लगातार निवेश बढ़ा रही हैं। यह वैश्विक रुझान दिखाता है कि अब देश केवल प्राकृतिक संसाधनों या विनिर्माण क्षमता के आधार पर नहीं, बल्कि अनुसंधान क्षमताओं के जरिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं।

R&D खर्च में चीन ने अमेरिका को पीछे छोड़ा

वर्ष 2024 में चीन दुनिया का सबसे बड़ा R&D खर्च करने वाला देश बनकर उभरा, जिसने अनुसंधान एवं विकास पर 785.9 अरब अमेरिकी डॉलर खर्च किए। यह आंकड़ा वर्ष 2000 की तुलना में लगभग 20 गुना वृद्धि को दर्शाता है, जिससे चीन वैश्विक R&D हिस्सेदारी में 23 प्रतिशत अंक से अधिक की बढ़त के साथ सबसे बड़ा लाभार्थी बन गया है। यह उछाल उन्नत विनिर्माण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर और रणनीतिक प्रौद्योगिकियों पर चीन के निरंतर फोकस को दर्शाता है, जिसने उसे एक वैश्विक नवाचार महाशक्ति के रूप में स्थापित किया है।

संयुक्त राज्य अमेरिका दूसरे स्थान पर फिसला

वर्ष 2024 में अनुसंधान एवं विकास (R&D) खर्च के मामले में संयुक्त राज्य अमेरिका 781.8 अरब अमेरिकी डॉलर के साथ दूसरे स्थान पर रहा। हालांकि पिछले 24 वर्षों में अमेरिका का R&D खर्च दोगुना हुआ है, लेकिन वैश्विक R&D में उसकी हिस्सेदारी 9.7 प्रतिशत अंक घट गई है। अत्याधुनिक शोध में अमेरिका अब भी अग्रणी बना हुआ है, परंतु यह सापेक्ष धीमापन एशिया और उभरती अर्थव्यवस्थाओं से बढ़ती प्रतिस्पर्धा को दर्शाता है, जो नवाचार और प्रौद्योगिकी नेतृत्व को लेकर वैश्विक परिदृश्य को तेजी से बदल रही हैं।

जापान, यूरोप और उभरती अर्थव्यवस्थाएं

R&D खर्च के मामले में जापान तीसरे स्थान पर रहा, हालांकि उसकी भी वैश्विक हिस्सेदारी में गिरावट देखी गई। जर्मनी, यूनाइटेड किंगडम और फ्रांस जैसे यूरोपीय देश अब भी प्रमुख R&D निवेशक हैं, लेकिन वैश्विक कुल खर्च में उनका अनुपात घटा है। इसके विपरीत भारत, तुर्किये, सऊदी अरब और थाईलैंड जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की हिस्सेदारी बढ़ी है। यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि नवाचार क्षमता अब कुछ गिने-चुने विकसित देशों तक सीमित न रहकर विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक रूप से फैल रही है।

वैश्विक R&D खर्च में भारत की स्थिति

वर्ष 2024 में भारत वैश्विक अनुसंधान एवं विकास (R&D) खर्च में सातवें स्थान पर रहा, जहां कुल 75.7 अरब अमेरिकी डॉलर का निवेश किया गया। भले ही यह चीन के R&D खर्च का लगभग दसवां हिस्सा हो, लेकिन वर्ष 2000 के 20.8 अरब डॉलर की तुलना में यह तीन गुना से अधिक वृद्धि को दर्शाता है। भारत में यह निरंतर बढ़ोतरी नवाचार, स्टार्टअप इकोसिस्टम, उच्च शिक्षा और रणनीतिक प्रौद्योगिकियों पर बढ़ते फोकस का परिणाम है। हालांकि भारत अभी शीर्ष R&D खर्च करने वाले देशों से पीछे है, लेकिन निवेश की यह मजबूत प्रवृत्ति विज्ञान और प्रौद्योगिकी में दीर्घकालिक संभावनाओं का संकेत देती है।

R&D खर्च के आधार पर शीर्ष 10 देश (2024–25)

रैंक देश R&D खर्च (अमेरिकी डॉलर)
1 चीन 785.9 अरब डॉलर
2 संयुक्त राज्य अमेरिका 781.8 अरब डॉलर
3 जापान 186.0 अरब डॉलर
4 जर्मनी 132.2 अरब डॉलर
5 दक्षिण कोरिया (कोरिया गणराज्य) 126.4 अरब डॉलर
6 यूनाइटेड किंगडम 86.5 अरब डॉलर
7 भारत 75.7 अरब डॉलर
8 फ्रांस 65.8 अरब डॉलर
9 तुर्किये 43.2 अरब डॉलर
10 ब्राज़ील 38.4 अरब डॉलर

ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स (GII) क्या है?

ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स (GII) विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (World Intellectual Property Organization – WIPO) द्वारा प्रकाशित की जाने वाली एक वार्षिक रैंकिंग है। यह देशों के नवाचार प्रदर्शन का आकलन करता है।

इस सूचकांक में नवाचार इनपुट्स जैसे अनुसंधान एवं विकास (R&D) खर्च, शिक्षा व्यवस्था, संस्थागत ढांचा और नीति वातावरण, तथा नवाचार आउटपुट्स जैसे पेटेंट, वैज्ञानिक प्रकाशन और उच्च-प्रौद्योगिकी उत्पादन को शामिल किया जाता है।

GII का व्यापक रूप से उपयोग सरकारों, नीति निर्माताओं और शोधकर्ताओं द्वारा किसी देश की नवाचार क्षमता, तकनीकी प्रगति और नीतिगत प्रभावशीलता को समझने के लिए किया जाता है।

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