मिशन सुदर्शन चक्र: भारत के ड्रोन डिफेंस को मज़बूत बनाना

भारत ने उभरते हवाई खतरों, विशेषकर शत्रुतापूर्ण ड्रोन से निपटने के लिए मिशन सुदर्शन चक्र की शुरुआत की है। यह एक महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य देश के लिए समग्र, बहुस्तरीय वायु रक्षा कवच तैयार करना है। यह पहल आधुनिक युद्ध में मानवरहित हवाई प्रणालियों (UAVs) की बढ़ती भूमिका और पाकिस्तान से लगी संवेदनशील सीमाओं पर बढ़ते ड्रोन खतरों के मद्देनज़र भारत की रक्षा रणनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाती है।

बढ़ता ड्रोन खतरा और रणनीतिक आवश्यकता

हाल के वर्षों में ड्रोन कम लागत लेकिन उच्च प्रभाव वाले असममित हथियार के रूप में उभरे हैं। इनका उपयोग—

  • निगरानी और खुफिया जानकारी जुटाने
  • हथियारों व नशीले पदार्थों की तस्करी
  • सैन्य व नागरिक लक्ष्यों पर सटीक हमलों के लिए किया जा रहा है।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ड्रोन तैनाती के प्रयासों और रूस–यूक्रेन संघर्ष में उनके व्यापक इस्तेमाल ने इनके विघटनकारी प्रभाव को उजागर किया है। भारत में भी सीमा पार ड्रोन घुसपैठ की घटनाओं में तेज़ वृद्धि हुई है, जिससे छोटे और नीची उड़ान भरने वाले लक्ष्यों के विरुद्ध पारंपरिक वायु रक्षा प्रणालियों की सीमाएँ स्पष्ट हुईं। ऐसे में विशेष काउंटर-ड्रोन आर्किटेक्चर अब रणनीतिक आवश्यकता बन गया है।

मिशन सुदर्शन चक्र और वायु रक्षा आधुनिकीकरण

मिशन सुदर्शन चक्र का लक्ष्य एकीकृत वायु रक्षा ढांचा स्थापित करना है, जो—

  • लड़ाकू विमान
  • मिसाइल
  • मानवरहित हवाई प्रणालियाँ (ड्रोन) जैसे खतरों का सामना कर सके।

इस कार्यक्रम को 2035 तक पूरा करने का लक्ष्य है और यह इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) जैसी मौजूदा व्यवस्थाओं का पूरक होगा। पहल का केंद्र लेयर्ड डिफेंस है—जिसमें लंबी दूरी की अवरोधन प्रणालियों के साथ अल्प दूरी और बिंदु-रक्षा समाधान शामिल होंगे। यह भारत के प्लेटफ़ॉर्म-केंद्रित दृष्टिकोण से नेटवर्क-केंद्रित व खतरा-विशिष्ट वायु रक्षा योजना की ओर संक्रमण को दर्शाता है।

संयुक्त काउंटर अनमैन्ड एरियल सिस्टम (CUAS) ग्रिड

मिशन सुदर्शन चक्र के समानांतर, भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना मिलकर एक संयुक्त CUAS ग्रिड विकसित कर रही हैं।

मुख्य विशेषताएँ

  • सेंसर, कमांड सेंटर और प्रतिक्रिया इकाइयों का एकीकरण
  • संयुक्त वायु रक्षा केंद्रों की स्थापना
  • तीनों सेनाओं के बीच रियल-टाइम डेटा साझा करना
  • तेज़ पहचान, आकलन और समन्वित प्रतिक्रिया

यह ग्रिड सीमाओं, तटरेखाओं और महत्वपूर्ण रणनीतिक प्रतिष्ठानों की सुरक्षा को मजबूत करेगा।

सॉफ्ट-किल और हार्ड-किल उपाय

मिशन सुदर्शन चक्र के तहत भारत की काउंटर-ड्रोन रणनीति दोहरी पद्धति पर आधारित है—

सॉफ्ट-किल उपाय (बिना भौतिक विनाश):

  • इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम
  • संचार संकेत बाधित करना
  • GNSS (सैटेलाइट नेविगेशन) जैमिंग

हार्ड-किल उपाय (भौतिक निष्क्रियता):

  • डायरेक्टेड एनर्जी वेपन्स
  • लेज़र आधारित प्रणालियाँ
  • पॉइंट-डिफेंस गन और काइनेटिक इंटरसेप्टर

सॉफ्ट-किल और हार्ड-किल का यह संयोजन लचीलापन, स्केलेबिलिटी और प्रभावशीलता सुनिश्चित करता है, जिससे विविध ड्रोन खतरों का सफलतापूर्वक मुकाबला किया जा सके।

गुजरात के मुख्यमंत्री ने कैंसर का जल्दी पता लगाने के लिए ‘आशा वैन’ मोबाइल यूनिट लॉन्च की

गुजरात ने निवारक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए ‘आशा वैन’ नामक मोबाइल कैंसर स्क्रीनिंग यूनिट की शुरुआत की है। इस विशेष चिकित्सा वैन का उद्घाटन मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने गांधीनगर में किया। यह वैन विशेष रूप से गांवों और दूरदराज़ के इलाकों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुँचाने के लिए तैयार की गई है, जहाँ उन्नत चिकित्सा सुविधाओं तक पहुंच सीमित होती है। इसका मुख्य उद्देश्य कैंसर का शुरुआती चरण में पता लगाना है, ताकि समय पर इलाज शुरू हो सके और जान बचाई जा सके।

कैंसर से लड़ाई में प्रारंभिक निदान बेहद अहम होता है। ‘आशा वैन’ के माध्यम से लोगों को अब बुनियादी जांच के लिए शहरों तक लंबी यात्रा नहीं करनी पड़ेगी—सेवा सीधे उनके द्वार तक पहुंचेगी।

‘आशा वैन’ क्या है?

‘आशा वैन’ एक पूरी तरह सुसज्जित मोबाइल मेडिकल यूनिट है, जो पहियों पर चलते-फिरते छोटे अस्पताल की तरह काम करती है। यह राज्य के किसी भी हिस्से में जाकर ग्रामीण, आदिवासी और वंचित समुदायों को सेवाएं प्रदान कर सकती है। यह यूनिट कई गंभीर बीमारियों, विशेषकर विभिन्न प्रकार के कैंसर के संकेतों की पहचान करने में सक्षम है। मौके पर ही जांच और विशेषज्ञ मार्गदर्शन उपलब्ध कराकर यह निदान में देरी को कम करती है और उपचार की सफलता की संभावना बढ़ाती है।

पहियों पर उन्नत चिकित्सा तकनीक

‘आशा वैन’ में आधुनिक चिकित्सा उपकरण लगाए गए हैं, जिनमें शामिल हैं—

  • EVA-Pro डायग्नोस्टिक तकनीक
  • डिजिटल मैमोग्राफी मशीन
  • टेली-कंसल्टेशन सुविधा (विशेषज्ञ सलाह के लिए)

इन उपकरणों की मदद से फेफड़े, मुख, रक्त, गर्भाशय ग्रीवा, अग्न्याशय, यकृत, स्तन और प्रोस्टेट सहित कई जानलेवा कैंसरों की जांच संभव है। मरीजों को तुरंत प्रारंभिक रिपोर्ट और चिकित्सकीय सलाह मिल जाती है, जो शुरुआती देखभाल के लिए अत्यंत आवश्यक है।

ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को बड़ा सहारा

‘आशा वैन’ का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह शहरों से दूर बसे क्षेत्रों तक पहुंच बनाती है। दूरी, खर्च और जागरूकता की कमी के कारण ग्रामीण इलाकों में लोग अक्सर जांच टाल देते हैं—यह पहल उन बाधाओं को दूर करती है। मुख्यमंत्री ने कहा कि समय पर पहचान जीवन बचा सकती है और मरीजों को सामान्य जीवन में लौटने में मदद कर सकती है। यह परियोजना “स्वास्थ्य और कल्याण सबके लिए” के राष्ट्रीय लक्ष्य के अनुरूप है।

भारतीय रेड क्रॉस सोसाइटी की भूमिका

उद्घाटन के बाद ‘आशा वैन’ को भारतीय रेड क्रॉस सोसाइटी की भावनगर शाखा को सौंपा गया, जो इसे जनसेवा के लिए संचालित करेगी। यह वैन दस तक प्रकार के कैंसर की जांच कर सकती है और अधिकतम कवरेज सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों में भेजी जाएगी। लॉन्च के दौरान स्वास्थ्य भागीदारों और रेड क्रॉस अधिकारियों की उपस्थिति ने इस पहल की सहयोगात्मक भावना को दर्शाया।

सार्वजनिक स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक प्रभाव

मुख्यमंत्री ने बताया कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में कैंसर की शुरुआती पहचान अब अधिक प्रभावी हो गई है। ‘आशा वैन’ जैसी मोबाइल यूनिट्स उन क्षेत्रों में स्क्रीनिंग का विस्तार करेंगी जहाँ अस्पताल आसानी से उपलब्ध नहीं हैं। गांवों तक उन्नत जांच सुविधाएं पहुंचाकर यह पहल जागरूकता बढ़ाएगी, नियमित स्वास्थ्य जांच को प्रोत्साहित करेगी और देर से पकड़े जाने वाले कैंसर मामलों का बोझ कम करेगी। दीर्घकाल में, ‘आशा वैन’ गुजरात को अधिक स्वस्थ और सुदृढ़ बनाने में एक सशक्त साधन सिद्ध होगी।

उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने भारतीय भाषाओं पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन किया

भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित भारतीय भाषाओं पर तृतीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन किया। इस सम्मेलन में विद्वानों, भाषा विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों ने भारतीय भाषाओं के संरक्षण, अध्ययन और वैश्विक प्रचार पर विचार-विमर्श किया। उपराष्ट्रपति ने कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, लोकतंत्र और ज्ञान की आधारशिला है।

भाषा — मानव सभ्यता की आत्मा

अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति ने भाषा को “सभ्यता की अंतरात्मा” बताया। उन्होंने कहा कि भाषाएँ इतिहास, विचार, मूल्य और परंपराएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाती हैं। प्राचीन शिलालेखों और ताड़पत्र पांडुलिपियों से लेकर आधुनिक डिजिटल लेखन तक, भाषाओं ने विज्ञान, दर्शन, साहित्य और नैतिक शिक्षाओं को संरक्षित रखा है। उन्होंने चेन्नई में सिद्धा दिवस के अनुभव का उल्लेख करते हुए बताया कि ताड़पत्र पांडुलिपियों के माध्यम से भारत की ज्ञान परंपराएँ सदियों से जीवित हैं।

भाषाई विविधता में निहित है भारत की शक्ति

उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत की बहुभाषिकता ने देश को कमजोर नहीं, बल्कि और अधिक एकजुट बनाया है। भारतीय भाषाओं ने चिकित्सा, विज्ञान, प्रशासन, अध्यात्म और दर्शन के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। राज्यसभा के सभापति के रूप में उन्होंने यह भी देखा कि अब अधिक सांसद अपनी मातृभाषा में बोलते हैं, जो भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता को दर्शाता है।

संविधान और सभी भाषाओं का सम्मान

उन्होंने स्मरण कराया कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने हाल ही में संविधान का संथाली भाषा में अनुवादित संस्करण जारी किया—यह भाषाई समावेशन की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। उपराष्ट्रपति ने बताया कि संविधान की आठवीं अनुसूची कई भारतीय भाषाओं को मान्यता और संरक्षण देती है। सच्ची राष्ट्रीय एकता समानता थोपने से नहीं, बल्कि विविधताओं के सम्मान से बनती है।

भाषाओं के संरक्षण में शिक्षा और तकनीक की भूमिका

उपराष्ट्रपति ने विश्वभर में कई स्वदेशी भाषाओं पर मंडरा रहे संकट की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन शोध, प्रलेखन और पांडुलिपियों के संरक्षण में सहयोग को बढ़ावा देते हैं। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और ज्ञान भारतम् मिशन जैसे सरकारी प्रयासों का उल्लेख किया, जो बहुभाषी शिक्षा और भाषाई धरोहर के संरक्षण को प्रोत्साहित करते हैं। साथ ही, डिजिटल अभिलेखागार, एआई आधारित अनुवाद उपकरण और बहुभाषी ऑनलाइन मंचों के उपयोग का समर्थन किया।

परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

  • आठवीं अनुसूची भारत की भाषाई विविधता को मान्यता देती है।
  • संथाली आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाओं में से एक है।
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा देती है।
  • ताड़पत्र पांडुलिपियाँ प्राचीन भारतीय ज्ञान का संरक्षण करती हैं।
  • डिजिटल तकनीक और एआई भाषाओं के संरक्षण व प्रचार में सहायक हैं।

भारत की वृद्धि दर 6.6 प्रतिशत रहने का अनुमान: UN

संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक मामलों के विभाग (UN-DESA) ने जनवरी 2026 में अपनी प्रमुख रिपोर्ट “वर्ल्ड इकोनॉमिक सिचुएशन एंड प्रॉस्पेक्ट्स (WESP) 2026” जारी की। इस रिपोर्ट में कैलेंडर वर्ष 2026 के लिए भारत की GDP वृद्धि दर 6.6% रहने का अनुमान लगाया गया है, जिससे वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा। हालांकि यह अनुमान वर्ष 2025 की अनुमानित 7.4% वृद्धि से थोड़ा कम है, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार 2027 में वृद्धि दर के 6.7% तक मामूली सुधार की संभावना जताई गई है।

रिपोर्ट विवरण (परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु)

  • क्या? UN-DESA ने वर्ष 2026 में भारत की GDP वृद्धि दर 6.6% और 2027 में 6.7% रहने का अनुमान लगाया है।
  • रिपोर्ट का नाम: World Economic Situation and Prospects (WESP) 2026
  • भारत की स्थिति: वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत के सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बने रहने की उम्मीद।

भारत की वृद्धि क्यों बनी रहेगी मज़बूत?

रिपोर्ट के अनुसार भारत की आर्थिक मजबूती को निम्नलिखित कारक सहारा देंगे:

  • घरेलू उपभोग की मजबूत और लचीली स्थिति
  • सार्वजनिक निवेश में निरंतर मजबूती
  • कर सुधारों और मौद्रिक सहजता (Monetary Easing) से मिलने वाला समर्थन
  • ये तत्व भारत को वैश्विक व्यापार तनावों और नीतिगत अनिश्चितताओं जैसी चुनौतियों से निपटने में मदद करेंगे।

वैश्विक वृद्धि परिदृश्य (2026)

  • 2026 में वैश्विक आर्थिक वृद्धि: 2.7%
  • 2025 का अनुमान: 2.8%
  • 2027 का अनुमान: 2.9%

इससे पता चलता है कि दुनिया की इकॉनमी अभी भी बढ़ रही है, लेकिन ग्लोबल अस्थिरता और ट्रेड से जुड़ी चिंताओं की वजह से धीमी गति से।

वैश्विक व्यापार अनुमान 

रिपोर्ट में वैश्विक व्यापार की गति कमजोर पड़ने की चेतावनी दी गई है:

  • 2026 में वैश्विक व्यापार वृद्धि: 2.2%
  • 2025 में वैश्विक व्यापार वृद्धि: 3.8%

धीमी वैश्विक व्यापार वृद्धि से निर्यात, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वैश्विक मांग पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

भारत के लिए मुद्रास्फीति अनुमान 

  • भारत में मुद्रास्फीति (2025): 4.1%

यह संकेत देता है कि महंगाई अपेक्षाकृत नियंत्रित रहने की संभावना है, जो आर्थिक स्थिरता के लिए सकारात्मक है।

IMF से तुलना 

UN-DESA के अनुमान अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के दृष्टिकोण से मेल खाते हैं:

  • 2025–26 के दौरान भारत 6% से अधिक की वृद्धि दर्ज करने वाली एकमात्र प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रह सकता है।

UN-DESA के बारे में 

  • पूरा नाम: संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक कार्य विभाग (UN-DESA)
  • अवर महासचिव (Under-Secretary-General): ली जुनहुआ (Li Junhua)
  • मुख्यालय: न्यूयॉर्क, अमेरिका
  • स्थापना वर्ष: 1948

 

वित्त वर्ष 2025-26 में 7.5% रह सकती है भारत की आर्थिक वृद्धि दर: SBI Report

भारत की आर्थिक वृद्धि संभावनाओं को एक सकारात्मक संकेत मिला है। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के आर्थिक अनुसंधान विभाग ने अनुमान लगाया है कि वित्त वर्ष 2025–26 (FY26) में भारत की GDP वृद्धि दर 7.5% रह सकती है, जिसमें ऊर्ध्वगामी रुझान (upward bias) की संभावना भी जताई गई है। यह अनुमान 7 जनवरी 2026 को जारी की गई SBI की प्रसिद्ध ‘इकोरैप (Ecowrap)’ रिपोर्ट में प्रकाशित किया गया।

विशेष रूप से, SBI का यह अनुमान राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा जारी प्रथम अग्रिम अनुमान (7.4%) से थोड़ा अधिक है और साथ ही भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के 7.3% के अनुमान से भी ऊपर है। इस कारण यह रिपोर्ट UPSC, SSC, बैंकिंग, रेलवे और राज्य लोक सेवा आयोग (PSC) जैसी विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए एक महत्वपूर्ण समसामयिक विषय बन गई है।

परीक्षा उपयोगी संकेत (त्वरित पुनरावृत्ति)

क्या? SBI ने FY 2025–26 के लिए भारत की GDP वृद्धि दर 7.5% रहने का अनुमान लगाया है।

किसके द्वारा? स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) – आर्थिक अनुसंधान विभाग

रिपोर्ट का नाम: इकोरैप (Ecowrap) रिपोर्ट

NSO का अनुमान: 7.4% (प्रथम अग्रिम अनुमान)

RBI का अनुमान: 7.3%

SBI का अनुमान क्यों महत्वपूर्ण है?

SBI की रिपोर्ट में एक अहम विश्लेषण सामने रखा गया है कि आमतौर पर RBI के अनुमान और NSO के अग्रिम अनुमान के बीच का अंतर 20–30 बेसिस प्वाइंट (bps) के भीतर ही रहता है।

मुख्य निष्कर्ष:

SBI के अनुसार, FY26 के लिए NSO का 7.4% अनुमान अपेक्षित और तार्किक है, और इसी कारण SBI का 7.5% पूर्वानुमान सामान्य विचलन सीमा के भीतर पूरी तरह फिट बैठता है।

यह विश्लेषण GDP वृद्धि अनुमान की विश्वसनीयता को मज़बूत करता है और भारत की अर्थव्यवस्था में लगातार गति (economic momentum) बने रहने का संकेत देता है।

भारत GDP अवलोकन (FY 2025–26)

वास्तविक GDP (Real GDP) अनुमान – NSO के अनुसार

  • वास्तविक GDP: ₹201.90 लाख करोड़
  • वृद्धि दर: 7.4% (FY26)

यह आंकड़ा महंगाई के प्रभाव को हटाकर अर्थव्यवस्था की वास्तविक गतिविधियों में मजबूत प्रदर्शन को दर्शाता है।

नाममात्र GDP (Nominal GDP) का अनुमान

(महंगाई के प्रभाव सहित)

  • नाममात्र GDP वृद्धि दर: 8.0%
  • नाममात्र GDP मूल्य: ₹357.13 – ₹357.14 लाख करोड़

नाममात्र GDP क्यों महत्वपूर्ण है?

नाममात्र GDP का सीधा उपयोग सरकार द्वारा किया जाता है:

  • बजट निर्माण में
  • कर राजस्व के अनुमान में
  • राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) की गणना में
  • आर्थिक नीतियों और योजना निर्माण में

इसलिए FY26 में नाममात्र GDP में अपेक्षाकृत तेज़ वृद्धि सरकारी वित्तीय प्रबंधन के लिए सकारात्मक संकेत मानी जाती है।

तुलना: एसबीआई बनाम एनएसओ बनाम आरबीआई

संस्था FY26 जीडीपी विकास अनुमान
एसबीआई (इकोव्रैप रिपोर्ट) 7.5%
एनएसओ (पहला अग्रिम अनुमान) 7.4%
आरबीआई 7.3%

यह तुलना एग्जाम MCQs और इंटरव्यू डिस्कशन के लिए बहुत उपयोगी है।

पीआईबी ने अरुणाचल प्रदेश में कमला हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट को मंजूरी दी

भारत तेजी से स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में आगे बढ़ रहा है और अरुणाचल प्रदेश की कमला जलविद्युत परियोजना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। हाल ही में सार्वजनिक निवेश बोर्ड (Public Investment Board) द्वारा स्वीकृत यह बड़ी जलविद्युत परियोजना न केवल नवीकरणीय बिजली उत्पादन में सहायक होगी, बल्कि बाढ़ नियंत्रण, रोज़गार सृजन और भारत के 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन लक्ष्य को प्राप्त करने में भी योगदान देगी।

परियोजना का स्थान और संक्षिप्त विवरण

कमला जलविद्युत परियोजना, जिसे पहले सुबनसिरी मिडिल जलविद्युत परियोजना के नाम से जाना जाता था, अरुणाचल प्रदेश की कमला नदी पर स्थित है। यह परियोजना कामले, क्रा दादी और कुरुंग कुमे जिलों में विकसित की जा रही है।

यह एक भंडारण आधारित (स्टोरेज-बेस्ड) जलविद्युत योजना है, जिसमें बाढ़ शमन (Flood Moderation) की एकीकृत व्यवस्था भी शामिल है। परियोजना से प्रतिवर्ष लगभग 6,870 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन होने की संभावना है, जिससे क्षेत्रीय और राष्ट्रीय विद्युत ग्रिड को मजबूती मिलेगी।

तकनीकी विशेषताएँ और निर्माण

कमला जलविद्युत परियोजना में 216 मीटर ऊँचा कंक्रीट ग्रैविटी बाँध तथा एक भूमिगत पावरहाउस का निर्माण किया जाएगा। इस परियोजना को 96 महीनों (लगभग 8 वर्ष) में पूरा करने की योजना है। बिजली उत्पादन के साथ-साथ इसकी भंडारण प्रणाली नदी के प्रवाह को नियंत्रित करेगी और विशेष रूप से ब्रह्मपुत्र घाटी के निचले क्षेत्रों को मौसमी बाढ़ से सुरक्षा प्रदान करेगी, जहाँ हर वर्ष बाढ़ की गंभीर समस्या रहती है।

निवेश और वित्तीय संरचना

कमला परियोजना को बिल्ड-ओन-ऑपरेट-ट्रांसफर (BOOT) मॉडल के तहत विकसित किया जाएगा। इसमें NHPC की 74% इक्विटी हिस्सेदारी होगी, जबकि अरुणाचल प्रदेश सरकार 26% हिस्सेदारी रखेगी। परियोजना की कुल अनुमानित लागत ₹26,070 करोड़ है, जिसमें 70:30 का ऋण-इक्विटी अनुपात अपनाया जाएगा। केंद्र सरकार की ओर से ₹1,340 करोड़ अवसंरचना सहायता तथा ₹4,744 करोड़ बाढ़ शमन के लिए दिए जाएंगे। राज्य सरकार द्वारा GST की प्रतिपूर्ति की जाएगी। परियोजना की स्तरीकृत (लेवलाइज़्ड) टैरिफ ₹5.97 प्रति यूनिट अनुमानित है।

रोज़गार और क्षेत्रीय लाभ

परियोजना के निर्माण चरण के दौरान लगभग 300 प्रत्यक्ष रोज़गार और 2,500 संविदा आधारित रोज़गार सृजित होने की संभावना है। इसके अतिरिक्त, यह परियोजना दूरस्थ जिलों में आधारभूत संरचना के विकास, पूर्वोत्तर क्षेत्र में विद्युत ग्रिड की स्थिरता और स्थानीय आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देगी।

भारत के नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों में योगदान

परियोजना के पूर्ण होने के बाद कमला जलविद्युत परियोजना स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन और बाढ़ प्रबंधन के माध्यम से कार्बन उत्सर्जन में कमी लाएगी और भारत को 2070 तक नेट-ज़ीरो लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ाएगी।

परीक्षा हेतु प्रमुख तथ्य (Key Facts for Exams)

  • स्थापित क्षमता: 1,720 मेगावाट
  • प्रकार: भंडारण आधारित जलविद्युत परियोजना (बाढ़ नियंत्रण सहित)
  • स्थान: कामले, क्रा दादी और कुरुंग कुमे जिले, अरुणाचल प्रदेश
  • हिस्सेदारी: NHPC – 74%, अरुणाचल प्रदेश सरकार – 26%

आंध्र विश्वविद्यालय में स्वच्छता कर्मी द्वारा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू पर पुस्तक का विमोचन

आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में एक हृदयस्पर्शी और सामाजिक रूप से अत्यंत सार्थक घटना देखने को मिली, जब आंध्र विश्वविद्यालय में सड़कों की सफाई करने वाली महिला स्वच्छता कर्मी लक्ष्मम्मा के हाथों राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के जीवन पर आधारित एक पुस्तक का विमोचन किया गया। यह पुस्तक विमोचन अपने आप में एक साधारण कार्यक्रम नहीं था, बल्कि समानता, श्रम की गरिमा और समावेशिता का सशक्त संदेश लेकर सामने आया।

इस घटना को भारतीय समाज के लिए एक महत्वपूर्ण प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है, जो यह दर्शाता है कि हर कार्य सम्मान के योग्य है और हर नागरिक समान गरिमा का हकदार है।

पुस्तक का शीर्षक और लेखक

इस पुस्तक का शीर्षक “अग्नि सरस्सुलो विकसितिंचिना कमलम् द्रौपदी मुर्मू” है। इस पुस्तक के लेखक यारलगड्डा लक्ष्मी प्रसाद हैं, जो पूर्व सांसद रह चुके हैं और वर्तमान में विश्व हिंदी परिषद के अध्यक्ष हैं।

शीर्षक का अर्थ

इस पुस्तक का शीर्षक प्रतीकात्मक और रूपकात्मक है। यह दर्शाता है कि किस प्रकार राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संघर्षों और कठिन परिस्थितियों से निकलकर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक का सफर तय किया—ठीक उसी तरह जैसे अग्नि से भरे जल में भी कमल खिल उठता है।

अनूठा और प्रभावशाली पुस्तक विमोचन स्थल

इस आयोजन की सबसे खास बात इसका स्थल था। किसी भव्य सभागार या औपचारिक मंच के बजाय, पुस्तक का विमोचन आंध्र विश्वविद्यालय परिसर में एक पेड़ के नीचे किया गया। यह असामान्य चयन कार्यक्रम को और अधिक भावनात्मक व अर्थपूर्ण बनाता है। यह सादगी, ज़मीनी जुड़ाव और वास्तविक जीवन से निकटता का प्रतीक है—जो राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के जीवन-संघर्ष और यात्रा से गहराई से मेल खाता है।

इसके साथ ही, एक स्वच्छता कर्मी द्वारा पुस्तक का विमोचन कराया जाना समाज को एक सशक्त संदेश देता है कि हर श्रम सम्माननीय है और हर व्यक्ति समान गरिमा का अधिकारी है।

यह पुस्तक विमोचन क्यों महत्वपूर्ण है?

लेखक लक्ष्मी प्रसाद ने बताया कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का जीवन उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है जो समाज में चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, विशेष रूप से—

  • महिलाएँ
  • आदिवासी समुदाय
  • हाशिए पर रहने वाले और कमजोर वर्ग
  • गरीबी और कठिन परिस्थितियों से जूझ रहे लोग

उन्होंने स्पष्ट किया कि पुस्तक के विमोचन के लिए लक्ष्मम्मा को चुनना एक सचेत और प्रतीकात्मक निर्णय था, जिसका उद्देश्य समाज के मूल मानवीय मूल्यों को सामने लाना था, जैसे—

  • विनम्रता
  • दृढ़ संकल्प और संघर्षशीलता
  • श्रम के प्रति सम्मान
  • समाज में समानता

यह पहल सीधे उन मूल्यों को दर्शाती है जिनका प्रतिनिधित्व राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू करती हैं—उनकी पृष्ठभूमि, सादगी और आंतरिक शक्ति। यह पुस्तक विमोचन केवल एक साहित्यिक आयोजन नहीं, बल्कि समानता और गरिमा का सामाजिक संदेश भी है।

जस्टिस मनोज कुमार गुप्ता उत्तराखंड हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस नियुक्त

भारत की न्यायपालिका में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम के तहत न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता को उत्तराखंड उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया है। वर्तमान में वे इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में कार्यरत हैं। यह नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश पर की गई, जिसकी आधिकारिक अधिसूचना केंद्र सरकार द्वारा जारी की गई।

कार्यभार ग्रहण करने की तिथि

न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता, वर्तमान मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति गुहनाथन नरेंद्र के सेवानिवृत्त होने के बाद पदभार संभालेंगे। न्यायमूर्ति गुहनाथन नरेंद्र 62 वर्ष की आयु पूर्ण करने पर शुक्रवार, 9 जनवरी 2026 को पदमुक्त हो रहे हैं।

न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता: करियर प्रोफाइल 

न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता का न्यायिक करियर दीर्घ, प्रतिष्ठित और विविध अनुभवों से समृद्ध रहा है। वे वर्तमान में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में कार्यरत हैं। उन्हें 12 अप्रैल 2013 को उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। आयु-सीमा के अनुसार उनकी सेवानिवृत्ति 8 अक्टूबर 2026 को निर्धारित है। दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा उन्हें उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पद के लिए अनुशंसित किया गया। उनकी नियुक्ति वर्तमान मुख्य न्यायाधीश के सेवानिवृत्त होने के बाद कार्यभार ग्रहण करने की तिथि से प्रभावी होगी।

यह नियुक्ति क्यों महत्वपूर्ण है?

न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता की नियुक्ति कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इससे उत्तराखंड उच्च न्यायालय में नेतृत्व का सुचारु संक्रमण सुनिश्चित होगा। यह भारत की कॉलेजियम प्रणाली के माध्यम से होने वाली न्यायिक नियुक्तियों की कार्यप्रणाली को भी रेखांकित करती है। मुख्य न्यायाधीश की भूमिका केवल न्यायिक निर्णयों तक सीमित नहीं होती, बल्कि वे न्यायालय के प्रशासन, कार्य-प्रबंधन और महत्वपूर्ण संवैधानिक मामलों में मार्गदर्शन देने में भी केंद्रीय भूमिका निभाते हैं।

2025 में महिलाओं के लिए सबसे अच्छा शहर रहा बेंगलुरु, जानें दूसरे नंबर पर कौन?

देश में महिला सुरक्षा के मामले में बेंगलुरु और चेन्नई सबसे बेहतर शहरों के रूप में सामने आए हैं। वर्क प्लेस कल्चर कंसल्टिंग फर्म अवतार ग्रुप की रिपोर्ट में यह खुलासा किया गया है। ‘टॉप सिटीज फॉर वीमेन इन इंडिया (TCWI) के चौथे संस्करण में यह बात सामने आई है कि इस रिपोर्ट में 125 शहरों की महिलाओं की भागीदारी रही। इन महिलाओं से सुरक्षा और करियर ग्रोथ के बारे में जानकारी ली गई। इसी आधार पर बेंगलुरु ने 53.29 के स्कोर के साथ पहला स्थान हासिल किया है।

अध्ययन के निष्कर्ष और शहर समावेशन स्कोर

यह अध्ययन चेन्नई स्थित कार्यस्थल समावेशन फर्म ‘अवतार (Avtar)’ द्वारा जारी किया गया, जिसमें भारत के 125 शहरों का आकलन किया गया।

शीर्ष पाँच शहर (2025 रैंकिंग)

  • बेंगलुरु – 53.29
  • चेन्नई – 49.86
  • पुणे – 46.27
  • हैदराबाद – 46.04
  • मुंबई – 44.49

इन परिणामों से स्पष्ट होता है कि महिला-अनुकूल शहरी वातावरण के निर्माण में दक्षिणी और पश्चिमी महानगरीय क्षेत्रों का वर्चस्व बना हुआ है।

समावेशन के लिए दो-स्तंभ (Two-Pillar) ढांचा

सिटी इन्क्लूज़न इंडेक्स दो प्रमुख स्तंभों पर आधारित है:

1. सामाजिक समावेशन स्कोर (Social Inclusion Score)

इस स्तंभ के अंतर्गत निम्न पहलुओं का मूल्यांकन किया जाता है:

  • सुरक्षा और संरक्षा
  • स्वास्थ्य और शिक्षा तक पहुँच
  • आवागमन और परिवहन सुविधाएँ
  • समग्र जीवन-योग्यता (Liveability)

2. औद्योगिक समावेशन स्कोर (Industrial Inclusion Score)

इस स्तंभ के तहत निम्न मानकों को परखा जाता है:

  • औपचारिक रोजगार की उपलब्धता
  • कौशल विकास और उन्नयन (Skilling & Upskilling) के अवसर
  • कॉर्पोरेट विविधता और समावेशन (Diversity & Inclusion) की प्रथाएँ
  • महिला कार्यबल की भागीदारी

जो शहर इन दोनों स्तंभों पर अच्छा प्रदर्शन करते हैं, वे महिलाओं के लिए टिकाऊ, सुरक्षित और लचीले करियर अवसर प्रदान करने में अधिक सक्षम पाए गए हैं।

औद्योगिक समावेशन में बेंगलुरु की बढ़त

जहाँ सामाजिक समावेशन के मामले में मज़बूत सार्वजनिक सेवाओं और बेहतर सुरक्षा ढाँचे के कारण चेन्नई शीर्ष पर रहा, वहीं औद्योगिक समावेशन में बेंगलुरु स्पष्ट रूप से अग्रणी बनकर उभरा।

बेंगलुरु की प्रमुख मजबूती

  • सुदृढ़ और विकसित कॉरपोरेट इकोसिस्टम
  • औपचारिक क्षेत्र की नौकरियों की उच्च उपलब्धता
  • प्रौद्योगिकी और सेवा उद्योगों की मज़बूत मौजूदगी
  • विविधता और समावेशन (Diversity & Inclusion) नीतियों का व्यापक अपनाव

इस बीच, पुणे और हैदराबाद ने सामाजिक और औद्योगिक—दोनों संकेतकों में संतुलित प्रदर्शन किया, जो महिलाओं की कार्यबल भागीदारी के लिए स्थिर और सकारात्मक संभावनाओं को दर्शाता है।

प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

  • सिटी इन्क्लूज़न स्कोर महिलाओं के समावेशन को सामाजिक और औद्योगिक दोनों मानकों पर मापता है
  • 2025 में बेंगलुरु 125 भारतीय शहरों में प्रथम स्थान पर रहा
  • सामाजिक समावेशन में सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन-योग्यता शामिल है
  • औद्योगिक समावेशन औपचारिक रोजगार, कौशल विकास और कार्यबल भागीदारी पर केंद्रित है
  • दक्षिण भारत ने क्षेत्रीय स्तर पर सबसे अधिक औसत स्कोर दर्ज किया

क्षेत्रीय रुझान और शीर्ष शहर

क्षेत्रवार विश्लेषण से निम्न प्रवृत्तियाँ सामने आईं:

  • दक्षिण भारत अधिकांश संकेतकों में अग्रणी रहा
  • पश्चिमी भारत औद्योगिक मजबूती के कारण क़रीबी प्रतिस्पर्धी के रूप में उभरा
  • मध्य और पूर्वी भारत में सामाजिक अवसंरचना में सुधार के बावजूद औद्योगिक समावेशन अपेक्षाकृत पीछे रहा

शीर्ष दस शहर

बेंगलुरु, चेन्नई, पुणे, हैदराबाद, मुंबई, गुरुग्राम, कोलकाता, अहमदाबाद, तिरुवनंतपुरम और कोयंबटूर।

ये निष्कर्ष दर्शाते हैं कि महिलाओं की करियर-लचीलापन (career resilience) और शहरी कल्याण सुनिश्चित करने के लिए मज़बूत सामाजिक प्रणालियों के साथ-साथ समावेशी उद्योगों का एकीकृत विकास अत्यंत आवश्यक है।

केयी पन्योर बना भारत का पहला ‘बायो-हैप्पी जिला’

अरुणाचल प्रदेश का नवगठित जिला केयी पन्योर अब भारत का पहला ‘बायो-हैप्पी जिला’ बनने जा रहा है। यह पहल जैव विविधता संरक्षण और मानवीय कल्याण को एकीकृत करने का एक अभिनव प्रयास है, जो सतत विकास की दिशा में भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह परियोजना प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक एम. एस. स्वामीनाथन द्वारा प्रतिपादित “बायोहैप्पीनेस” की अवधारणा को पुनर्जीवित करती है और पारिस्थितिकी, आजीविका तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य के समन्वय से आधारित एक विकास मॉडल को बढ़ावा देती है।

बायोहैप्पीनेस की अवधारणा और उसका पुनरुद्धार

एम. एस. स्वामीनाथन रिसर्च फ़ाउंडेशन द्वारा ज़िला प्रशासन के सहयोग से इस पहल को लागू किया जा रहा है। फ़ाउंडेशन की अध्यक्ष सौम्या स्वामीनाथन के अनुसार, परियोजना का फोकस—

  • आजीविका का आकलन
  • कृषि-जैव विविधता (Agro-biodiversity) का मानचित्रण
  • पारिस्थितिक तंत्र का मूल्यांकन पर केंद्रित है।

बायोहैप्पीनेस का आशय उस मानव कल्याण की अवस्था से है, जो तब प्राप्त होती है जब जैव विविधता का संरक्षण और सतत उपयोग करके पोषण, सार्वजनिक स्वास्थ्य, आय और आजीविका को सुदृढ़ किया जाता है। यह अवधारणा लोगों और प्रकृति के बीच सामंजस्य पर आधारित है, जहाँ संरक्षण को विकास की बाधा नहीं बल्कि उसकी आधारशिला माना जाता है।

आजीविका और पारिस्थितिकी पर विशेष ध्यान

इस परियोजना में—

  • पारंपरिक कृषि प्रणालियों
  • स्वदेशी ज्ञान परंपराओं
  • जैव विविधता-समृद्ध परिदृश्यों का गहन अध्ययन किया जाएगा।

पूर्वी हिमालय में स्थित अरुणाचल प्रदेश भारत के सबसे समृद्ध जैव विविधता क्षेत्रों में से एक है। इसके वन, नदियाँ और जनजातीय खेती की परंपराएँ इसे समुदाय-आधारित, बॉटम-अप विकास मॉडल के परीक्षण के लिए आदर्श बनाती हैं। केयी पन्योर से प्राप्त निष्कर्ष भविष्य में पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील और जनजातीय क्षेत्रों के लिए सतत ग्रामीण विकास नीतियों को दिशा देंगे।

पर्यावरण, स्वास्थ्य और प्रौद्योगिकी का संबंध

चेन्नई में आयोजित एक स्थिरता संवाद में सौम्या स्वामीनाथन ने पर्यावरण क्षरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच सीधे संबंध पर प्रकाश डाला। प्रमुख बिंदु—

  • कचरे से निकलने वाला मीथेन एक बड़ा जलवायु जोखिम
  • मीथेन अल्पकालिक लेकिन अत्यंत शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस
  • मीथेन में कमी से तत्काल जलवायु लाभ संभव

फ़ाउंडेशन IIT मद्रास और श्री रामचंद्रा उच्च शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान के साथ मिलकर लैंडफ़िल के पास रहने वाले समुदायों के स्वास्थ्य जोखिमों का आकलन भी करेगा।

प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

  • बायोहैप्पीनेस की अवधारणा: एम. एस. स्वामीनाथन
  • केयी पन्योर: अरुणाचल प्रदेश का नवगठित ज़िला
  • पूर्वी हिमालय: भारत के प्रमुख जैव विविधता हॉटस्पॉट्स में से एक
  • मीथेन: अत्यधिक शक्तिशाली लेकिन अल्पकालिक ग्रीनहाउस गैस
  • जैव विविधता-आधारित विकास: पर्यावरण + आजीविका + स्वास्थ्य का समन्वय

व्यापक स्थिरता विमर्श

इस पहल पर चर्चा द हिंदू और सवेथा इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल एंड टेक्निकल साइंसेज़ द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित सस्टेनेबिलिटी डायलॉग्स में की गई, जहाँ संस्थानों, प्रौद्योगिकी और साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण की भूमिका को दीर्घकालिक स्थिरता के लिए निर्णायक बताया गया।

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