ट्रंप ने 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से हटने का आदेश दिया

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 07 जनवरी 2026 को एक बड़ा कदम उठाते हुए एक मेमोरंडम पर हस्ताक्षर किया है, जिससे अमेरिका उन 60 से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय संगठनों और संस्थाओं से अलग हो जाएगा, जो अमेरिका के हितों के खिलाफ काम करते हैं। इसमें भारत की अगुआई वाला इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA) भी शामिल है। ट्रंप प्रशासन ने इंटरनेशनल सोलर अलायंस और 65 अन्य एजेंसियों को अमेरिका विरोधी, बेकार या फिजूलखर्ची वाले अंतरराष्ट्रीय संगठन बताया है। वॉइट हाउस ने कहा कि ये संगठन कट्टरपंथी जलवायु नीतियों, ग्लोबल गवर्नेंस और वैचारिक कार्यक्रमों को बढ़ावा देते हैं, जो अमेरिकी संप्रभुता और आर्थिक ताकत के साथ टकराव में हैं।

वॉइट हाउस ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप ने 35 गैर-संयुक्त राष्ट्रीय निकायों और 31 संयुक्त राष्ट्र से जुड़े संगठनों से अमेरिका को बाहर निकालने का आदेश देने वाली घोषणा पर हस्ताक्षर किए हैं। बयान में कहा गया है कि यह कदम उन सभी अंतरराष्ट्रीय संगठनों, संधियों और समझौतों की समीक्षा के बाद लिया गया है, जिनमें अमेरिका सदस्य या पक्षकार है।

प्रतियोगी परीक्षाओं और समसामयिक घटनाओं के लिए प्रमुख तथ्य

  • संगठनों की संख्या: 66 अंतरराष्ट्रीय संगठन, एजेंसियाँ और आयोग
  • कार्यकारी आदेश की तिथि: 7 जनवरी 2026
  • मुख्य लक्ष्य: जलवायु, श्रम और सामाजिक विकास से जुड़े संयुक्त राष्ट्र–संबद्ध निकाय
  • प्रमुख निकास: संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा सम्मेलन (UNFCCC)
  • जलवायु गठबंधन से निकास: इंटरनेशनल सोलर एलायंस (भारत–फ्रांस नेतृत्व, 2015 में प्रारंभ)
  • UNFCCC अंगीकरण वर्ष: 1992 (पेरिस समझौते की आधारभूत संधि)
  • अमेरिकी स्थिति: विश्व के सबसे बड़े ऐतिहासिक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जकों में शामिल
  • पूर्व निकास: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद, यूनेस्को (UNESCO)
  • चयनात्मक सहभागिता जारी: अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ (ITU), अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO), अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO)
  • प्राथमिक रणनीतिक फोकस: चीन के साथ रणनीतिक प्रतिस्पर्धा

कार्यकारी आदेश और निकासी का दायरा

व्यापक समीक्षा और औपचारिक निर्णय

इस कार्यकारी आदेश के तहत अमेरिका ने 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों, एजेंसियों और आयोगों को दिया जाने वाला समर्थन निलंबित कर दिया है। इनमें से अधिकांश संयुक्त राष्ट्र से संबद्ध हैं और जलवायु कार्रवाई, श्रम मानक, सामाजिक विकास तथा परामर्शात्मक भूमिकाओं जैसे महत्वपूर्ण वैश्विक मुद्दों पर कार्य करते हैं। ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका की भागीदारी, वित्तीय योगदान और राष्ट्रीय हितों से सामंजस्य के आधार पर व्यापक समीक्षा के बाद इस निकासी प्रक्रिया को औपचारिक रूप दिया है।

निकासी के लिए घोषित कारण

प्रशासन के अनुसार कई संस्थाएँ:

  • अनावश्यक (Redundant): अन्य संगठनों के कार्यों की पुनरावृत्ति करती हैं
  • अक्षम (Inefficient): अत्यधिक नौकरशाही और खर्च से ग्रस्त हैं
  • असंगत (Misaligned): अमेरिकी हितों के विपरीत एजेंडा बढ़ाती हैं
  • वैचारिक रूप से आपत्तिजनक: विविधता और सामाजिक पहलों से जुड़ी नीतियाँ, जिन्हें प्रशासन प्राथमिकताओं के विपरीत मानता है

जलवायु और पर्यावरण से जुड़ी निकासी: प्रमुख पहलू

UNFCCC और पेरिस समझौते से अलगाव

निकासी का केंद्रीय बिंदु जलवायु ढाँचों से अमेरिका का बाहर होना है, विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा सम्मेलन (UNFCCC) से, जो 1992 में अपनाया गया और पेरिस समझौते की आधारशिला है। UNFCCC वैश्विक जलवायु शमन और अनुकूलन प्रयासों का प्रमुख कानूनी ढाँचा है।

इंटरनेशनल सोलर एलायंस से निकास

प्रशासन ने 2015 में भारत–फ्रांस के नेतृत्व में शुरू किए गए इंटरनेशनल सोलर एलायंस से भी निकासी की है, जिसका उद्देश्य सौर ऊर्जा, तकनीकी हस्तांतरण और जलवायु कार्रवाई को बढ़ावा देना है। अधिकारियों के अनुसार ये निकाय ऐसी नीतियों को आगे बढ़ाते हैं जिन्हें प्रशासन अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं के विपरीत मानता है।

वैश्विक शासन पर व्यापक प्रभाव

पूर्व की निकासी की निरंतरता

यह निर्णय ट्रंप काल की उस प्रवृत्ति को आगे बढ़ाता है, जिसमें पहले WHO, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद और यूनेस्को से निकासी शामिल रही है।

अंतरराष्ट्रीय संस्थानों पर प्रभाव

अमेरिकी वित्तपोषण में कटौती से कई संस्थानों को कार्यक्रम और स्टाफ में कमी करनी पड़ी है। इससे विशेष रूप से प्रभावित क्षेत्र:

  • जलवायु कार्रवाई: सामूहिक शमन व अनुकूलन प्रयास कमजोर
  • मानवीय सहायता: आपात प्रतिक्रिया, खाद्य सहायता और शरणार्थी कार्यक्रमों पर असर
  • विकास वित्त: गरीबी उन्मूलन और सतत विकास के लिए पूंजी व विशेषज्ञता में कमी

चयनात्मक सहभागिता और रणनीतिक पुनर्संतुलन

रणनीतिक क्षेत्रों में सहभागिता जारी

व्यापक निकासी के बावजूद अमेरिका कुछ संगठनों में चयनात्मक रूप से जुड़ा रहेगा, विशेषकर चीन के साथ रणनीतिक प्रतिस्पर्धा से जुड़े क्षेत्रों में—

  • अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ (ITU)
  • अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO)
  • अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO)

लगातार समीक्षा की प्रक्रिया

अमेरिका की वैश्विक संस्थानों में भागीदारी की आगे भी समीक्षा जारी है, जिससे संकेत मिलता है कि यह कदम अंतिम नहीं, बल्कि बहुपक्षीयता के प्रति निरंतर पुनर्संयोजन की शुरुआत है।

विशेषज्ञ आकलन और वैश्विक परिणाम

विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की अनुपस्थिति से सामूहिक वैश्विक प्रयास कमजोर हो सकते हैं—खासतौर पर जलवायु परिवर्तन, मानवीय संकट, विकास वित्त और महामारी तैयारी के क्षेत्रों में। यह निकासी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका ऐतिहासिक रूप से ग्रीनहाउस गैसों के सबसे बड़े उत्सर्जकों में रहा है।

RBI ने 35 NBFC का लाइसेंस रद्द किया

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने जनवरी 2026 में नियामकीय मानकों का पालन न करने के कारण 35 गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) का पंजीकरण प्रमाणपत्र (Certificate of Registration – CoR) रद्द कर दिया। ये रद्दीकरण 9 से 31 दिसंबर 2025 के बीच प्रभावी हुए। इसके अतिरिक्त, 16 अन्य NBFCs ने स्वेच्छा से अपना CoR RBI को वापस सौंप दिया, जिससे कुल 51 NBFCs का पंजीकरण निरस्त हो गया। यह सख्त नियामकीय कार्रवाई गैर-बैंकिंग वित्तीय क्षेत्र में अनुशासन, पारदर्शिता और वित्तीय प्रणाली की अखंडता बनाए रखने के प्रति RBI की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

यह कार्रवाई क्यों महत्वपूर्ण है?

RBI की यह सख्ती NBFC क्षेत्र में गंभीर अनुपालन विफलताओं को संबोधित करती है। इसके प्रमुख उद्देश्य हैं—वित्तीय प्रणाली की स्थिरता बनाए रखना, उपभोक्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना, नियामकीय प्रवर्तन को मजबूत करना, बाजार की विश्वसनीयता बढ़ाना तथा निवेशकों का भरोसा कायम रखना। गैर-अनुपालक संस्थाओं को हटाकर RBI जमाकर्ताओं, निवेशकों और पूरे वित्तीय तंत्र की सुरक्षा करता है। यह कदम नियामकीय उल्लंघनों के प्रति शून्य-सहिष्णुता नीति को स्पष्ट करता है।

कानूनी प्रावधान और RBI का अधिकार

RBI यह शक्ति RBI अधिनियम, 1934 की धारा 45-IA(6) के तहत प्रयोग करता है, जिसके अंतर्गत पंजीकरण शर्तों के उल्लंघन पर CoR रद्द किया जा सकता है। सभी NBFCs के लिए व्यवसाय शुरू करने से पहले पंजीकरण अनिवार्य है। न्यूनतम नेट ओन्ड फंड (NOF) की सीमा ₹10 करोड़ है (कुछ श्रेणियों में अधिक)। पंजीकरण रद्द होने के बाद संबंधित संस्थाएं NBFC/NBFI के रूप में कार्य नहीं कर सकतीं और उनका पंजीकरण स्वेच्छा से पुनः बहाल नहीं किया जा सकता।

भौगोलिक वितरण

RBI के अनुसार, रद्द की गई अधिकांश NBFCs दिल्ली/एनसीआर क्षेत्र में केंद्रित थीं, जो इस क्षेत्र में नियामकीय अनुपालन की गंभीर समस्याओं की ओर संकेत करता है। एनसीआर के बाहर केवल कुछ ही कंपनियाँ (जैसे मुंबई और जबलपुर) शामिल थीं।

16 NBFCs द्वारा स्वैच्छिक समर्पण

इनमें कुछ कंपनियाँ व्यवसाय से बाहर निकलने के कारण, कुछ कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC) मानदंडों में पुनर्वर्गीकृत होने के कारण, तथा कुछ विलय, अमलगमेशन, विघटन या स्वैच्छिक स्ट्राइक-ऑफ के चलते बंद हुईं।

NBFCs को समझना

NBFCs, कंपनियों अधिनियम 1956/2013 के अंतर्गत पंजीकृत वित्तीय संस्थाएँ होती हैं, जो ऋण, अग्रिम, शेयर/प्रतिभूतियों में निवेश जैसी सेवाएँ देती हैं, लेकिन बैंकों की तुलना में उन पर कड़े प्रतिबंध होते हैं। ये मांग जमा स्वीकार नहीं कर सकतीं, भुगतान प्रणाली (PSS) का हिस्सा नहीं होतीं, इनके जमाकर्ताओं को DICGC बीमा नहीं मिलता और ये सीमित बैंकिंग सेवाएँ ही प्रदान कर सकती हैं। RBI की कड़ी निगरानी के अंतर्गत कार्य करते हुए, इस कार्रवाई ने NBFC क्षेत्र में अनुपालन और भरोसे को और मजबूत किया है।

NBFC की श्रेणियाँ (NBFC Categories)

श्रेणी उद्देश्य
निवेश एवं ऋण कंपनी (Investment & Credit Company – ICC) निवेश और ऋण प्रदान करने से जुड़ी सेवाएँ
आवास वित्त कंपनी (Housing Finance Company – HFC) आवास (होम लोन) से संबंधित विशेष ऋण
अवसंरचना वित्त कंपनी (Infrastructure Finance Company – IFC) अवसंरचना परियोजनाओं के लिए वित्तपोषण
कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (Core Investment Company – CIC) अन्य कंपनियों में निवेश गतिविधियाँ
अवसंरचना ऋण कोष (IDF–NBFC) दीर्घकालिक अवसंरचना ऋण का वित्तपोषण

लायबिलिटी के प्रकार के अनुसार:

  • डिपॉजिट लेने वाली NBFCs – पब्लिक से डिपॉजिट लेती हैं (ज़्यादा रेगुलेटेड)
  • नॉन-डिपॉजिट लेने वाली NBFCs – डिपॉजिट नहीं लेती हैं (कम रेगुलेटेड)

परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण बिंदु 

याद रखने योग्य तथ्य (Must Remember Facts):

  • RBI द्वारा CoR रद्द: जनवरी 2026 में 35 NBFCs का पंजीकरण (Certificate of Registration) रद्द
  • प्रभावी अवधि: 9 से 31 दिसंबर 2025
  • कानूनी अधिकार: RBI अधिनियम, 1934 की धारा 45-IA(6)
  • स्वैच्छिक समर्पण: 16 NBFCs ने स्वयं CoR लौटाया
  • कुल रद्द पंजीकरण: 51 NBFCs
  • भौगोलिक एकाग्रता: अधिकांश दिल्ली/एनसीआर क्षेत्र में
  • मुख्य कारण: नियामकीय अनुपालन में विफलता (Non-compliance)

मुख्य नियामकीय ढांचा 

  • NBFC पंजीकरण: RBI अधिनियम, 1934 की धारा 45-IA के अंतर्गत
  • न्यूनतम नेट ओन्ड फंड (NOF): ₹10 करोड़
  • RBI का अधिकार: CoR रद्द करने का पूर्ण एवं अंतिम अधिकार
  • रद्द होने के बाद: संबंधित संस्थाएँ NBFC/NBFI व्यवसाय नहीं कर सकतीं
  • रद्दीकरण का ट्रिगर: निरंतर नियमों का उल्लंघन / अनुपालन की कमी

गुवाहाटी में राष्ट्रीय वस्त्र मंत्री सम्मेलन 2026

राष्ट्रीय वस्त्र मंत्रियों का सम्मेलन 2026 का शुभारंभ 8 जनवरी 2026 को गुवाहाटी में हुआ। इस दो दिवसीय सम्मेलन का आयोजन केंद्रीय वस्त्र मंत्रालय द्वारा असम सरकार के सहयोग से किया गया है। सम्मेलन में देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के वस्त्र मंत्री एवं वरिष्ठ अधिकारी भाग ले रहे हैं, जहाँ वे बदलती वैश्विक और घरेलू चुनौतियों के बीच भारत के वस्त्र क्षेत्र की रणनीतिक भविष्य दिशा पर विचार-विमर्श कर रहे हैं।

यह सम्मेलन संघ और राज्य नीतियों के समन्वय, सर्वोत्तम प्रथाओं के आदान-प्रदान तथा 2030 तक भारत को एक वैश्विक वस्त्र निर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने के लिए एकीकृत रोडमैप तैयार करने का एक महत्वपूर्ण संस्थागत मंच है। “India’s Textiles: Weaving Growth, Heritage & Innovation” (भारत के वस्त्र: विकास, विरासत और नवाचार का ताना-बाना) थीम के अंतर्गत आयोजित यह सम्मेलन आर्थिक विकास के साथ-साथ सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को भी प्रतिबिंबित करता है।

प्रतियोगी परीक्षाओं और करेंट अफेयर्स के लिए मुख्य तथ्य

  • कार्यक्रम: राष्ट्रीय वस्त्र मंत्रियों का सम्मेलन 2026
  • स्थान: गुवाहाटी, असम
  • अवधि: दो दिन (8–9 जनवरी 2026)
  • आयोजक: केंद्रीय वस्त्र मंत्रालय एवं असम सरकार
  • सम्मेलन की थीम: “India’s Textiles: Weaving Growth, Heritage & Innovation”
  • केंद्रीय वस्त्र मंत्री: गिरिराज सिंह
  • असम के मुख्यमंत्री: हिमंत बिस्वा सरमा
  • केंद्रीय राज्य मंत्री (वस्त्र): पबित्रा मार्गेरिटा
  • रणनीतिक दृष्टि: 2030 तक भारत को वैश्विक वस्त्र निर्माण केंद्र बनाना
  • मार्गदर्शक मंत्र: “विकास भी, विरासत भी”
  • प्रमुख पहल: पीएम मित्रा पार्क्स (PM Mega Integrated Textile Regions and Apparel Parks)

रणनीतिक दृष्टि: 2030 तक वैश्विक विनिर्माण केंद्र

भारत को वैश्विक वस्त्र शक्ति के रूप में स्थापित करना

यह सम्मेलन भारत सरकार की उस महत्वाकांक्षी दृष्टि के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य 2030 तक भारत को वैश्विक वस्त्र विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करना है। यह रणनीतिक लक्ष्य भारत की वस्त्र क्षेत्र में ऐतिहासिक विरासत, प्रचुर कच्चे माल की उपलब्धता, कुशल श्रम शक्ति और बढ़ती विनिर्माण क्षमताओं पर आधारित है। वर्ष 2030 तक भारत वैश्विक वस्त्र व्यापार में अपनी हिस्सेदारी को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाकर गुणवत्तापूर्ण और प्रतिस्पर्धी वस्त्रों के लिए एक पसंदीदा वैश्विक स्रोत बनने का लक्ष्य रखता है।

“विकास भी, विरासत भी” दर्शन

“विकास भी, विरासत भी” का मूल मंत्र आर्थिक प्रगति के साथ-साथ भारत की समृद्ध वस्त्र विरासत के संरक्षण की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। इस दर्शन के तहत औद्योगिक विस्तार और निर्यात उन्मुख उत्पादन को पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों, हथकरघा प्रथाओं और सांस्कृतिक वस्त्र परंपराओं की कीमत पर आगे नहीं बढ़ाया जाएगा।

उद्घाटन सत्र और प्रदर्शनी की मुख्य झलकियां

उच्चस्तरीय भागीदारी

8 जनवरी को आयोजित उद्घाटन सत्र में केंद्रीय वस्त्र मंत्री गिरिराज सिंह, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा, वस्त्र राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा तथा अन्य वरिष्ठ गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लिया। यह भागीदारी वस्त्र क्षेत्र के विकास को दी जा रही राष्ट्रीय प्राथमिकता को दर्शाती है।

विरासत और नवाचार का प्रदर्शन

उद्घाटन सत्र में आयोजित प्रदर्शनी एवं पवेलियन में भारत की वस्त्र विरासत, नवाचार और विनिर्माण क्षमताओं को प्रदर्शित किया गया, जिसमें शामिल थे—

  • पारंपरिक हथकरघा एवं हस्तशिल्प तकनीकें
  • आधुनिक वस्त्र विनिर्माण नवाचार
  • वस्त्र उत्पादन में आधुनिक प्रौद्योगिकी का उपयोग
  • सतत एवं पर्यावरण-अनुकूल वस्त्र प्रथाएं
  • नीतिगत एवं क्षेत्रीय विचार-विमर्श

व्यापक सम्मेलन एजेंडा

सम्मेलन के दौरान विभिन्न विशेष सत्रों में निम्नलिखित प्रमुख विषयों पर चर्चा हुई—

  • अवसंरचना एवं निवेश: वस्त्र विनिर्माण ढांचे के विस्तार और घरेलू व विदेशी निवेश को आकर्षित करने पर विचार
  • निर्यात विस्तार: वस्त्र निर्यात बढ़ाने और नए अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच
  • कच्चा माल एवं फाइबर: प्राकृतिक और कृत्रिम रेशों की सतत आपूर्ति, आपूर्ति श्रृंखला और कच्चे माल की सुरक्षा
  • तकनीकी वस्त्र: मेडिकल टेक्सटाइल, सुरक्षात्मक वस्त्र और औद्योगिक वस्त्र जैसे उच्च-मूल्य खंड
  • नवीन फाइबर: जैव-आधारित और सतत विकल्पों सहित उभरती फाइबर प्रौद्योगिकियां
  • हथकरघा और हस्तशिल्प संरक्षण: पारंपरिक वस्त्र क्षेत्रों के संरक्षण एवं संवर्धन पर विशेष जोर

प्रमुख पहल

पीएम मित्रा पार्क्स: पीएम मेगा इंटीग्रेटेड टेक्सटाइल रीजन एंड अपैरल (PM MITRA) पार्क्स पर विशेष बल दिया गया। इनका उद्देश्य कच्चे माल से लेकर विनिर्माण और निर्यात तक एकीकृत वस्त्र मूल्य श्रृंखला विकसित करना, निवेश आकर्षित करना, रोजगार सृजन करना और वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ाना है।

  • सततता एवं पर्यावरणीय अनुपालन: पर्यावरणीय जिम्मेदारी के साथ वस्त्र उत्पादन को बढ़ावा देने पर चर्चा
  • एकीकृत मूल्य-श्रृंखला विकास: उत्पादन से वितरण तक संपूर्ण मूल्य श्रृंखला को सुदृढ़ करने पर जोर
  • पूर्वोत्तर क्षेत्र पर विशेष फोकस: वस्त्र क्षमता का अनलॉक

समर्पित क्षेत्रीय कॉन्क्लेव

8 जनवरी को “पूर्वोत्तर भारत के वस्त्र क्षेत्र को सशक्त और मजबूत करना” विषय पर एक विशेष कॉन्क्लेव आयोजित किया गया, जिसमें क्षेत्र की विशिष्ट वस्त्र विरासत और संभावनाओं पर ध्यान केंद्रित किया गया।

क्षेत्रीय वस्त्र विशेषताएं

  • रेशम की किस्में: एरी, मुगा और शहतूत रेशम
  • हथकरघा एवं हस्तशिल्प: पारंपरिक कारीगरी और सांस्कृतिक धरोहर
  • बांस आधारित वस्त्र: सतत बांस फाइबर वस्त्रों में उभरते अवसर
  • महिला-नेतृत्व वाले उद्यम: महिला उद्यमियों को प्रोत्साहन
  • ब्रांडिंग और बाजार पहुंच: राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ने की रणनीतियां

केंद्र–राज्य सहयोग और भविष्य की रूपरेखा

यह सम्मेलन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सर्वोत्तम प्रथाओं के आदान-प्रदान, नीतिगत चुनौतियों पर चर्चा और क्षेत्रीय रणनीतियों के प्रस्तुतीकरण का मंच प्रदान करता है। इन विमर्शों का उद्देश्य एक प्रतिस्पर्धी, सतत और समावेशी वस्त्र क्षेत्र के लिए एकीकृत रोडमैप तैयार करना है, जिससे बड़े उद्योगों के साथ-साथ पारंपरिक कारीगरों को भी लाभ मिल सके।

ए.के. बालासुब्रमण्यन 2026 के लिए AERB का चेयरमैन नियुक्त

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट की नियुक्ति समिति (ACC) ने जनवरी 2026 में प्रतिष्ठित वैज्ञानिक ए.के. बालासुब्रमण्यन को परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) का अध्यक्ष नियुक्त किया। वे भारत के सर्वोच्च परमाणु सुरक्षा नियामक के रूप में तीन वर्ष के कार्यकाल के लिए नियुक्त किए गए हैं। उन्होंने डॉ. डी.के. शुक्ला का स्थान लिया, जिनका कार्यकाल 31 दिसंबर 2025 को समाप्त हुआ था। यह महत्वपूर्ण नियुक्ति AERB के नेतृत्व में लगभग चार दशकों के व्यापक अनुभव वाले एक वरिष्ठ परमाणु वैज्ञानिक को लेकर आई है, जिन्हें परमाणु विद्युत संयंत्रों के डिजाइन, विकास, सुरक्षा और कमीशनिंग का गहन अनुभव है। इससे भारत की विश्व-स्तरीय परमाणु सुरक्षा मानकों और नियामक उत्कृष्टता के प्रति प्रतिबद्धता को निरंतर मजबूती मिलती है।

प्रतियोगी परीक्षाओं और करेंट अफेयर्स के लिए मुख्य तथ्य

  • घटना: AERB अध्यक्ष की नियुक्ति
  • नियुक्त व्यक्ति: ए.के. बालासुब्रमण्यन
  • नियुक्ति तिथि: जनवरी 2026
  • कार्यकाल अवधि: 3 वर्ष
  • नियुक्त करने वाली संस्था: कैबिनेट की नियुक्ति समिति (ACC)
  • ACC के अध्यक्ष: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
  • पूर्ववर्ती: डॉ. डी.के. शुक्ला (कार्यकाल समाप्त – 31 दिसंबर 2025)
  • पद: परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) के अध्यक्ष
  • करियर अवधि: लगभग 40 वर्ष (परमाणु क्षेत्र में)
  • AERB की स्थापना: 15 नवंबर 1983
  • AERB मुख्यालय: मुंबई, महाराष्ट्र
  • AERB का कानूनी आधार: परमाणु ऊर्जा अधिनियम (Atomic Energy Act), 1962

ए.के. बालासुब्रमण्यन: प्रोफ़ाइल और विशेषज्ञता

परमाणु उद्योग में व्यापक अनुभव

ए.के. बालासुब्रमण्यन के पास परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में लगभग 40 वर्षों का समग्र अनुभव है। उनका करियर परमाणु विद्युत संयंत्रों (Nuclear Power Plants – NPPs) के डिज़ाइन, विकास, सुरक्षा मूल्यांकन, निर्माण और कमीशनिंग जैसे सभी महत्वपूर्ण चरणों में फैला रहा है। यह व्यापक अनुभव उन्हें ऐसे समय में भारत की परमाणु नियामक व्यवस्था का नेतृत्व करने के लिए विशेष रूप से सक्षम बनाता है, जब देश अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता का विस्तार और तकनीकी उन्नयन कर रहा है।

प्रमुख नेतृत्व पद

बालासुब्रमण्यन ने न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL) के बोर्ड में निदेशक (तकनीकी) के रूप में कार्य किया। NPCIL भारत में परमाणु बिजली उत्पादन की प्रमुख संस्था है, और यह वरिष्ठ पद उन्हें परमाणु प्रौद्योगिकी विकास तथा परिचालन प्रबंधन के केंद्र में रखता था। इसके अतिरिक्त, वे प्रेसराइज्ड हेवी वॉटर रिएक्टर (PHWR) आधारित परमाणु संयंत्रों के लिए प्रोजेक्ट डिज़ाइन सेफ्टी कमेटी के अध्यक्ष भी रहे, जहाँ उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि सुरक्षा मानकों को डिज़ाइन और विकास के प्रारंभिक चरण से ही शामिल किया जाए। उन्होंने AERB की ऑपरेटिंग प्लांट्स की सुरक्षा समीक्षा समिति (SARCOP) के सदस्य के रूप में भी सेवा दी, जिसके माध्यम से उन्हें चालू परमाणु संयंत्रों की नियामक निगरानी और सुरक्षा समीक्षा का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त हुआ।

नवाचार और स्वदेशी प्रौद्योगिकी विकास

अपने करियर के दौरान, बालासुब्रमण्यन ने स्वदेशी सुरक्षा विशेषताओं से युक्त कई पहली बार विकसित (first-of-its-kind) प्रणालियों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके कार्य ने न केवल भारत के परमाणु सुरक्षा मानकों को सुदृढ़ किया, बल्कि आयातित प्रौद्योगिकियों पर निर्भरता को भी कम किया। उन्होंने परमाणु रिएक्टर प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भरता को सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया और भारतीय संस्थानों के भीतर नवाचार को प्रोत्साहित किया, जिससे देश की स्वदेशी क्षमता मजबूत हुई।

अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधित्व

ए.के. बालासुब्रमण्यन ने रिएक्टर प्रौद्योगिकी और परमाणु सुरक्षा से जुड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों और तकनीकी मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व किया है। इससे वैश्विक परमाणु संवाद में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी और भारत को एक जिम्मेदार परमाणु राष्ट्र के रूप में स्थापित करने में मदद मिली।

AERB: भारत का परमाणु सुरक्षा प्राधिकरण

परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) का गठन 15 नवंबर 1983 को तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह द्वारा परमाणु ऊर्जा अधिनियम (Atomic Energy Act – AEA), 1962 के प्रावधानों के तहत किया गया था। यह कानूनी ढांचा AERB को परमाणु ऊर्जा के नागरिक उपयोगों को विनियमित करने और परमाणु सुरक्षा मानक निर्धारित करने का व्यापक अधिकार प्रदान करता है। AERB का मुख्यालय मुंबई, महाराष्ट्र में स्थित है और यह देशभर में फैली परमाणु सुविधाओं की निगरानी करता है।

नियामक दायित्व

भारत के सर्वोच्च परमाणु सुरक्षा नियामक के रूप में, AERB का दायित्व है—परमाणु प्रतिष्ठानों के लिए सुरक्षा मानकों का निर्धारण और प्रवर्तन, लाइसेंस जारी करना, सुरक्षा समीक्षाएँ और निरीक्षण करना, तथा अंतरराष्ट्रीय परमाणु सुरक्षा सम्मेलनों के अनुरूप अनुपालन सुनिश्चित करना।

नियुक्ति का महत्व

ए.के. बालासुब्रमण्यन की नियुक्ति इस बात को दर्शाती है कि भारत, परमाणु ऊर्जा क्षमता के विस्तार के साथ-साथ कठोर और विश्व-स्तरीय परमाणु सुरक्षा मानकों को बनाए रखने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उनकी गहन तकनीकी विशेषज्ञता और नियामक अनुभव AERB को नए परमाणु संयंत्रों के विकास की प्रभावी निगरानी करने और मौजूदा संयंत्रों में परिचालन उत्कृष्टता बनाए रखने में सक्षम बनाएंगे।

ICJS 2.0 रैंकिंग में उत्तराखंड पुलिस देश में पहले स्थान पर

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB), गृह मंत्रालय के अंतर्गत, ने इंटर-ऑपरेबल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम (ICJS) 2.0 की दूसरी संस्करण की रैंकिंग जारी की है। इस रैंकिंग में उत्तराखंड पुलिस ने 93.46 अंकों के साथ पूरे देश में प्रथम स्थान प्राप्त किया, जो उसकी उत्कृष्ट डिजिटल पुलिसिंग क्षमता और प्रभावी अपराध डेटा प्रबंधन को दर्शाता है। हरियाणा पुलिस 93.41 अंकों के साथ दूसरे स्थान पर रही, जबकि असम पुलिस ने 93.16 अंकों के साथ तीसरा स्थान हासिल किया।

यह उपलब्धि क्यों महत्वपूर्ण है?

यह मान्यता भारत की आधुनिक और प्रौद्योगिकी-सक्षम आपराधिक न्याय प्रणाली की दिशा में हो रही प्रगति को रेखांकित करती है। ICJS 2.0 प्लेटफॉर्म कानून प्रवर्तन और न्यायिक संस्थानों के कार्य करने के तरीके में एक मौलिक परिवर्तन का प्रतीक है। सर्वोच्च क्रियान्वयन स्कोर प्राप्त कर उत्तराखंड पुलिस ने डिजिटल उत्कृष्टता का एक राष्ट्रीय मानक स्थापित किया है। यह उपलब्धि राज्य की पारदर्शिता, दक्षता और तकनीक-आधारित न्याय वितरण के प्रति प्रतिबद्धता को प्रमाणित करती है। साथ ही, यह दिखाती है कि तकनीक का प्रभावी एकीकरण पूरे आपराधिक न्याय तंत्र को कैसे मजबूत बना सकता है और अन्य राज्यों को भी इसी दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।

ICJS 2.0 को समझना

इंटर-ऑपरेबल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम (ICJS) एक समग्र डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जो आपराधिक न्याय प्रणाली के सभी प्रमुख स्तंभों—पुलिस, न्यायालय, अभियोजन, जेल, फॉरेंसिक प्रयोगशालाएँ, फिंगरप्रिंट डेटाबेस और अपराध रिकॉर्ड प्रणालियाँ—को एकीकृत नेटवर्क से जोड़ता है। ICJS 2.0 इसका उन्नत संस्करण है, जो संस्थानों के बीच रीयल-टाइम डेटा साझा करने को बढ़ावा देता है। यह प्रणाली “वन डेटा, वन एंट्री” के सिद्धांत पर कार्य करती है, अर्थात एक बार दर्ज की गई जानकारी सभी अधिकृत एजेंसियों के लिए स्वतः उपलब्ध हो जाती है। इससे दोहराव समाप्त होता है, त्रुटियाँ कम होती हैं और जांच प्रक्रिया तेज होती है। अब मामलों को एफआईआर से लेकर सजा तक पूरी तरह डिजिटल रूप से ट्रैक किया जा सकता है, जिससे न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और साक्ष्य-आधारित निर्णय सुनिश्चित होते हैं।

उत्तराखंड पुलिस की उत्कृष्टता

उत्तराखंड पुलिस ने यह प्रथम स्थान सुनियोजित डिजिटलकरण और मजबूत संस्थागत प्रतिबद्धता के माध्यम से प्राप्त किया। राज्य ने जिला स्तर की प्रणालियों को राष्ट्रीय ICJS प्लेटफॉर्म से सफलतापूर्वक जोड़ा, जिससे कुशल केस प्रबंधन के लिए एक सशक्त नेटवर्क तैयार हुआ। तकनीकी क्रियान्वयन के साथ-साथ, उत्तराखंड पुलिस ने सभी स्तरों के अधिकारियों के लिए व्यापक प्रशिक्षण कार्यक्रम भी संचालित किए, ताकि वे ICJS टूल्स का प्रभावी उपयोग कर सकें। यह समग्र दृष्टिकोण दर्शाता है कि डिजिटल परिवर्तन में सफलता केवल तकनीक से नहीं, बल्कि मानव संसाधन विकास से भी जुड़ी होती है।

ICJS 2.0 के प्रमुख लाभ

यह प्रणाली एजेंसियों के बीच त्वरित सूचना उपलब्धता के माध्यम से जांच की समय-सीमा को काफी कम करती है। यह दोहराव और नौकरशाही देरी को समाप्त करती है। पारदर्शी डिजिटल केस ट्रैकिंग से जन विश्वास में वृद्धि होती है। सभी फॉरेंसिक डेटा और अपराध रिकॉर्ड एक ही प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध होने से साक्ष्य-आधारित जांच को बढ़ावा मिलता है। इसके अतिरिक्त, यह प्रणाली भौतिक भंडारण की आवश्यकता को कम करती है और डिजिटल प्रमाणीकरण व एक्सेस कंट्रोल के माध्यम से डेटा सुरक्षा को भी सुदृढ़ बनाती है।

Indian Navy की फर्स्ट ट्रेनिंग स्क्वाड्रन दक्षिण पूर्व एशिया के लिए रवाना

भारतीय नौसेना (Indian Navy) के प्रथम प्रशिक्षण स्क्वाड्रन (First Training Squadron – 1TS) ने दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए एक दीर्घ-परीय प्रशिक्षण तैनाती (Long-Range Training Deployment – LRTD) आरंभ की है। यह महत्वपूर्ण समुद्री अभियान 110वें एकीकृत अधिकारी प्रशिक्षण पाठ्यक्रम (Integrated Officers’ Training Course – IOTC) का हिस्सा है और नौसैनिक कैडेटों को समुद्र में वास्तविक एवं व्यावहारिक परिचालन अनुभव प्रदान करने की एक प्रमुख पहल है। इस तैनाती के तहत कई नौसैनिक पोत लंबी दूरी तय करते हुए विदेशी जलक्षेत्रों में संचालित होंगे, जो इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की बढ़ती नौसैनिक क्षमता और रणनीतिक सहभागिता को दर्शाता है।

यह तैनाती क्यों महत्वपूर्ण है?

दीर्घ-परीय प्रशिक्षण तैनातियाँ भावी नौसैनिक अधिकारियों के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, क्योंकि ऐसा हैंड्स-ऑन अनुभव कक्षा या बंदरगाह प्रशिक्षण से संभव नहीं होता। यह मिशन भारत की एक्ट ईस्ट नीति (Act East Policy) को सुदृढ़ करता है और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ सक्रिय कूटनीतिक व सुरक्षा साझेदारी को मजबूत करता है। साथ ही, यह स्वतंत्र, खुला और समावेशी इंडो-पैसिफिक के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करता है, जो क्षेत्रीय स्थिरता और समुद्री सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
निर्धारित बंदरगाह यात्राओं और पेशेवर संवादों के माध्यम से भारतीय नौसेना मित्र देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधों को सुदृढ़ करती है और क्षेत्रीय समुद्री सहयोग को बढ़ावा देती है।

पोत और संरचना

इस तैनाती में चार प्रमुख समुद्री पोत शामिल हैं—

  • आईएनएस तिर (INS Tir) – भारतीय नौसेना
  • आईएनएस शार्दुल (INS Shardul) – भारतीय नौसेना
  • आईएनएस सुजाता (INS Sujata) – भारतीय नौसेना
  • आईसीजीएस सारथी (ICGS Sarathi) – भारतीय तटरक्षक बल

नौसेना और तटरक्षक बल के पोतों का यह संयोजन भारत की एकीकृत समुद्री सुरक्षा दृष्टिकोण को दर्शाता है तथा प्रशिक्षण और परिचालन स्तर पर विभिन्न समुद्री बलों के बीच समन्वय को रेखांकित करता है।

परिचालन अनुभव और प्रशिक्षण का फोकस

इन पोतों पर सवार कैडेटों को निम्नलिखित प्रमुख समुद्री कौशलों में व्यापक प्रशिक्षण प्राप्त होता है—

  • सीमैनशिप – उन्नत नौकायन एवं समुद्री संचालन
  • नेविगेशन – खुले महासागर में सटीक नौवहन
  • पेशेवर परिचालन – वास्तविक नौसैनिक प्रक्रियाएँ
  • निर्णय-निर्माण – दबाव में नेतृत्व क्षमता
  • समुद्री प्रोटोकॉल – अंतरराष्ट्रीय मानक
  • विविध समुद्री परिस्थितियाँ – खुले समुद्र से प्रादेशिक जलक्षेत्र तक

अलग-अलग समुद्री परिस्थितियों में काम करने से ऐसा अनमोल अनुभव मिलता है जो भविष्य के नौसेना नेताओं को तैयार करता है। कैडेट्स असली दुनिया के हालात और प्रैक्टिकल ऑपरेशनल अनुभव से विशेषज्ञता हासिल करते हैं।

बंदरगाह यात्राएँ और क्षेत्रीय सहभागिता

स्क्वाड्रन दक्षिण-पूर्व एशिया के प्रमुख देशों में बंदरगाह यात्राएँ करेगा—

  • सिंगापुर – प्रमुख रणनीतिक केंद्र
  • इंडोनेशिया – क्षेत्रीय समुद्री साझेदार
  • थाईलैंड – दक्षिण-पूर्व एशियाई सहभागिता बिंदु

इन यात्राओं के उद्देश्य केवल प्रशिक्षण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें—

  • नौसैनिक कर्मियों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान
  • विदेशी बंदरगाहों में क्रू कल्याण गतिविधियाँ
  • भारत की सतत नौसैनिक उपस्थिति का प्रदर्शन
  • मित्र नौसेनाओं के साथ पेशेवर संवाद
  • द्विपक्षीय समुद्री संबंधों को सुदृढ़ करना
  • भारतीय नौसेना की पेशेवर क्षमता का प्रदर्शन शामिल है।

रणनीतिक महत्व

यह तैनाती एक्ट ईस्ट नीति को व्यवहारिक रूप में साकार करती है। इसके प्रमुख रणनीतिक पहलू हैं—

  • क्षेत्रीय सहभागिता – दक्षिण-पूर्व एशिया में सक्रिय भूमिका
  • सुरक्षा संरचना – क्षेत्रीय सुरक्षा में भारत की भूमिका सुदृढ़
  • नौवहन की स्वतंत्रता – अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्रों में अधिकारों का संरक्षण
  • नौसैनिक शक्ति प्रदर्शन – लंबी दूरी तक शक्ति प्रक्षेपण की क्षमता
  • इंडो-पैसिफिक स्थिरता – मुक्त, खुला और समावेशी क्षेत्र सुनिश्चित करना
  • प्रशिक्षण उत्कृष्टता – नौसैनिक अधिकारी विकास की गुणवत्ता का प्रमाण
  • द्विपक्षीय संबंध – दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ संबंध मजबूत करना

यह दीर्घ-परीय प्रशिक्षण तैनाती न केवल भारत की समुद्री शक्ति और प्रशिक्षण अवसंरचना की पुष्टि करती है, बल्कि यह भी सिद्ध करती है कि भारतीय नौसेना भविष्य के अधिकारियों को जटिल अंतरराष्ट्रीय समुद्री परिस्थितियों से निपटने के लिए सक्षम और पेशेवर रूप से तैयार कर रही है।

पृथ्वी घूर्णन दिवस 2026 – 8 जनवरी

पृथ्वी का घूर्णन दिवस (Earth’s Rotation Day) प्रत्येक वर्ष 8 जनवरी को विश्वभर में मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य पृथ्वी की घूर्णन गति के गहन महत्व को रेखांकित करना तथा फ्रांसीसी भौतिक विज्ञानी लियोन फूको (Léon Foucault) के ऐतिहासिक 1851 के पेंडुलम प्रयोग को स्मरण करना है, जिसने पहली बार सार्वजनिक रूप से पृथ्वी के घूर्णन का निर्णायक प्रमाण प्रस्तुत किया था। 8 जनवरी 2026 को यह दिवस उस क्रांतिकारी वैज्ञानिक प्रदर्शन की 175वीं वर्षगांठ के रूप में मनाया गया, जो न केवल भौतिक विज्ञान की एक महान उपलब्धि का उत्सव है, बल्कि अंतरिक्ष में पृथ्वी की गति को लेकर मानव समझ के निरंतर विकास को भी दर्शाता है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: प्राचीन अवधारणा से प्रमाणित सत्य तक

प्रारंभिक दार्शनिक विचार

पृथ्वी के घूर्णन की अवधारणा प्राचीन काल से जुड़ी हुई है। लगभग 470 ईसा पूर्व यूनानी विद्वानों ने यह विचार प्रस्तुत किया था कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है, हालांकि उस समय ये धारणाएँ मुख्यतः सैद्धांतिक थीं। इन प्राचीन दार्शनिक विचारों को दो हज़ार वर्षों से अधिक समय तक वैज्ञानिक पुष्टि नहीं मिल सकी, जो विज्ञान के इतिहास में सैद्धांतिक कल्पना से अनुभवजन्य प्रमाण तक की लंबी यात्रा को दर्शाता है।

पुनर्जागरण और वैज्ञानिक क्रांति

16वीं शताब्दी में पृथ्वी के घूर्णन की अवधारणा को नया बल तब मिला जब निकोलस कोपरनिकस ने सूर्यकेंद्रीय (हेलियोसेंट्रिक) मॉडल प्रस्तुत किया। इस मॉडल के अनुसार पृथ्वी ब्रह्मांड के केंद्र में स्थिर न रहकर सूर्य की परिक्रमा करती है। बाद में 1610 में गैलीलियो गैलीली के दूरबीन आधारित खगोलीय अवलोकनों ने इस सिद्धांत के पक्ष में साक्ष्य प्रदान किए, हालांकि उस समय तक पृथ्वी के घूर्णन का प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं हो पाया था।

लियोन फूको का ऐतिहासिक प्रमाण (1851)

8 जनवरी 1851 को फ्रांसीसी भौतिक विज्ञानी लियोन फूको (Léon Foucault) ने फ्रांस के पेरिस स्थित पंथियॉन में किए गए एक सरल किंतु अत्यंत प्रभावशाली पेंडुलम प्रयोग के माध्यम से पृथ्वी के घूर्णन को निर्णायक रूप से सिद्ध किया। यह प्रदर्शन भौतिकी के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध हुआ, क्योंकि इसने पहली बार प्रयोगशाला स्तर पर पृथ्वी के घूर्णन का प्रत्यक्ष और दृश्य प्रमाण प्रस्तुत किया, जो केवल खगोलीय सिद्धांतों से आगे बढ़कर ठोस भौतिक साक्ष्य प्रदान करता है।

फूको पेंडुलम: प्रयोगात्मक डिज़ाइन की एक उत्कृष्ट कृति

तकनीकी विनिर्देश

फूको का पेंडुलम अपने समय की एक अद्भुत इंजीनियरिंग उपलब्धि था। इस प्रयोग में प्रयुक्त पेंडुलम के प्रमुख घटक इस प्रकार थे— पीतल का बॉब (वज़न): 28 किलोग्राम, बॉब का व्यास: 38 सेंटीमीटर, तार की लंबाई: 67 मीटर, तथा स्थान: पंथियॉन, पेरिस (फ्रांस)। इतनी लंबी तार से लटका भारी पेंडुलम वह उपकरण बना, जिसके माध्यम से पृथ्वी की घूर्णन गति को वैज्ञानिक समुदाय और आम जनता के सामने स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया जा सका।

कार्य प्रणाली (कैसे काम करता है)

पेंडुलम का सिद्धांत देखने में सरल, किंतु अत्यंत गहन था। यदि पृथ्वी स्थिर होती, तो स्वतंत्र रूप से झूलता पेंडुलम हमेशा एक ही तल (Plane) में दोलन करता रहता। लेकिन प्रयोग के दौरान यह देखा गया कि पेंडुलम के दोलन का तल धीरे-धीरे घूमता हुआ प्रतीत होता है। यह परिवर्तन पेंडुलम के घूमने के कारण नहीं, बल्कि पेंडुलम के नीचे स्थित पृथ्वी के घूमने के कारण होता है। इस प्रकार फूको पेंडुलम ने पहली बार प्रत्यक्ष, दृश्य और पुनरावृत्त किए जा सकने वाले प्रमाण के रूप में यह सिद्ध कर दिया कि पृथ्वी वास्तव में अपनी धुरी पर घूमती है।

पृथ्वी के घूर्णन से जुड़े प्रमुख तथ्य

घूर्णन अक्ष और झुकाव (Axial Tilt)

पृथ्वी एक काल्पनिक अक्ष पर घूमती है, जो उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव को जोड़ता है। यह अक्ष सूर्य के चारों ओर पृथ्वी की कक्षा के तल के सापेक्ष लगभग 23.5° झुका हुआ है। यही अक्षीय झुकाव पृथ्वी पर ऋतुओं के परिवर्तन और विभिन्न क्षेत्रों में सूर्य के प्रकाश की असमानता के लिए उत्तरदायी है।

घूर्णन अवधि और गति

पृथ्वी लगभग 24 घंटे में अपनी धुरी पर एक पूरा चक्कर लगाती है, जिसे एक औसत सौर दिवस (Mean Solar Day) कहा जाता है। भूमध्य रेखा पर पृथ्वी की घूर्णन गति लगभग 1,670 किलोमीटर प्रति घंटा है। इसी कारण सूर्य और तारे आकाश में पूर्व से पश्चिम की ओर गतिमान प्रतीत होते हैं, जबकि वास्तविकता में पृथ्वी स्वयं पश्चिम से पूर्व दिशा में घूमती है।

ग्रह के आयाम (Planetary Dimensions)

  • ध्रुवीय व्यास: लगभग 12,714 किलोमीटर (उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव तक)
  • भूमध्यरेखीय व्यास: लगभग 12,756 किलोमीटर (भूमध्य रेखा के पार)

ध्रुवीय और भूमध्यरेखीय व्यास में यह हल्का अंतर पृथ्वी के चपटी गोलाभ (Oblate Spheroid) आकार को दर्शाता है, जो आंशिक रूप से पृथ्वी की घूर्णन गति से उत्पन्न बलों के कारण है।

पृथ्वी की क्रांतिकारी गति और परिवर्तन 

पृथ्वी लगभग 24 घंटे में अपनी धुरी पर घूमती है, लेकिन इसकी घूर्णन गति में हल्की-सी असमानता होती है, जिससे प्रतिदिन कुछ सेकंड का अंतर पैदा होता है। इसके अलावा, पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा लगभग 365 दिनों में पूरी करती है, जिससे एक पूर्ण आवर्त वर्ष (Orbital Year) पूरा होता है।

पृथ्वी के घूर्णन का महत्व 

पृथ्वी का घूर्णन कई ग्रहीय प्रक्रियाओं के लिए मूलभूत है:

  • दिन-रात चक्र (Day-Night Cycles): पृथ्वी का घूर्णन दिन और रात का चक्र उत्पन्न करता है, जो जीवन प्रक्रियाओं और मौसम पैटर्न को नियंत्रित करता है।
  • ऋतु परिवर्तन (Seasonal Changes): अक्षीय झुकाव और कक्षीय गति के संयोजन से तापमान और दिन की लंबाई में ऋतुओं के बदलाव उत्पन्न होते हैं।
  • कोरिओलिस प्रभाव (Coriolis Effect): पृथ्वी का घूर्णन कोरिओलिस प्रभाव उत्पन्न करता है, जो हवा की दिशा, महासागरीय धाराओं और वैश्विक मौसम प्रणालियों को प्रभावित करता है।

DRDO ने मनाया 68वां स्थापना दिवस 2026

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ), जो रक्षा मंत्रालय (MoD) के अधीन कार्य करता है, ने 1 जनवरी 2026 को नई दिल्ली स्थित डीआरडीओ मुख्यालय में अपना 68वाँ स्थापना दिवस मनाया। यह अवसर भारत की रक्षा और सुरक्षा अवसंरचना के निर्माण में डीआरडीओ के लगभग सात दशकों के असाधारण योगदान को रेखांकित करता है। इस समारोह में केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, राज्य मंत्री संजय सेठ तथा डीआरडीओ के अध्यक्ष और रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव डॉ. समीर वी. कामत की गरिमामयी उपस्थिति रही। उनकी उपस्थिति ने आत्मनिर्भर भारत—भारत की स्वावलंबी रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र—को आगे बढ़ाने में डीआरडीओ की उपलब्धियों और भविष्य की दिशा के राष्ट्रीय महत्व को उजागर किया।

प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए मुख्य तथ्य (Key Facts)

  • कार्यक्रम: डीआरडीओ का 68वाँ स्थापना दिवस
  • तिथि: 01 जनवरी 2026
  • स्थान: डीआरडीओ मुख्यालय, नई दिल्ली
  • स्थापना: 01 जनवरी 1958 (68 वर्ष पूर्ण)
  • अध्यक्ष: डॉ. समीर वी. कामत
  • वर्तमान नेटवर्क: 52 प्रयोगशालाएँ (शुरुआत में 10)
  • मुख्य फोकस क्षेत्र: साइबर, अंतरिक्ष (Space) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI)
  • AoN (Acceptance of Necessity) स्वीकृतियाँ:
  • 22 स्वीकृतियाँ, कुल मूल्य लगभग ₹1.30 लाख करोड़

रक्षा अनुबंध:

  • 11 रक्षा अनुबंध, कुल मूल्य ₹26,000 करोड़

प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (LAToT):

  • वर्ष 2025 में 245
  • कुल अब तक: 2,201

उत्कृष्टता केंद्र (Centres of Excellence – CoE):

  • 15 क्रियाशील
  • 66 नई परियोजनाएँ, कुल मूल्य ₹228 करोड़

डीआरडीओ की रणनीतिक दृष्टि: आत्मनिर्भर भारत

डीआरडीओ को रक्षा विनिर्माण में आत्मनिर्भर भारत अभियान की एक प्रमुख धुरी के रूप में पुनः स्थापित किया गया है। यह संगठन भारत के रक्षा विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को सशक्त बनाने में निरंतर अग्रणी भूमिका निभा रहा है, जिसमें भविष्य की रणनीतिक प्राथमिकता तीन महत्वपूर्ण क्षेत्रों—साइबर, अंतरिक्ष (Space) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI)—पर केंद्रित है। यह दूरदर्शी दृष्टिकोण भारत को उभरती सुरक्षा चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटने में सक्षम बनाता है और साथ ही विदेशी रक्षा प्रौद्योगिकियों पर निर्भरता को कम करने में सहायक है।

खरीद एवं वित्तीय उपलब्धियाँ: रिकॉर्ड उपलब्धियाँ

स्वीकृति की आवश्यकता (Acceptance of Necessity – AoN) अनुमोदन

रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) और रणनीतिक नीति बोर्ड (SPB) द्वारा कुल 22 स्वीकृति की आवश्यकता (AoN) को मंज़ूरी प्रदान की गई, जिनका कुल मूल्य लगभग ₹1.30 लाख करोड़ (₹1,30,000 करोड़) है। ये अनुमोदन भारतीय उद्योग को महत्वपूर्ण रक्षा प्रणालियों के उत्पादन में सक्षम बनाते हैं तथा निजी क्षेत्र और रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (DPSUs) को स्वदेशी रक्षा प्रौद्योगिकियों के विकास और निर्माण का अवसर प्रदान करते हैं।

रक्षा अनुबंध और सिस्टम्स का समावेशन

डीआरडीओ ने अपने उत्पादन भागीदारों के साथ कुल 11 रक्षा अनुबंध किए, जिनकी कुल कीमत ₹26,000 करोड़ है, जिससे इसकी परिचालन क्षमता और प्रभाव क्षेत्र में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। इसके अतिरिक्त, डीआरडीओ द्वारा विकसित कई प्रणालियों को केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPFs), राज्य पुलिस बलों तथा राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) में शामिल किया गया है। इससे डीआरडीओ की परिचालन पहुँच पारंपरिक भारतीय सशस्त्र बलों से आगे बढ़कर आंतरिक सुरक्षा और आपदा प्रबंधन क्षेत्रों तक विस्तारित हुई है।

अनुसंधान, विकास और परीक्षण: परिचालन प्रगति

उपयोगकर्ता मूल्यांकन परीक्षण (User Evaluation Trials – UETs)

डीआरडीओ ने कई महत्वपूर्ण प्रणालियों के लिए उपयोगकर्ता मूल्यांकन परीक्षण (UETs) पूरे कर लिए हैं या वे अंतिम चरण में हैं। इनमें प्रमुख रूप से प्रलय, आकाश नेक्स्ट जेनरेशन (आकाश-NG), गाइडेड पिनाका, मैन पोर्टेबल एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (MPATGM), एडवांस्ड लाइटवेट टॉरपीडो (ALWT), बैटलफील्ड ऑब्ज़र्वेशन सर्विलांस सिस्टम (BOSS), स्पेशलाइज़्ड डिमोलिशन रोबोट (SDR) तथा रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल और न्यूक्लियर (CBRN) जल प्रणालियाँ शामिल हैं। यह प्रगति इन प्रणालियों की परिचालन तत्परता और शीघ्र समावेशन की दिशा में डीआरडीओ के सशक्त प्रयासों को दर्शाती है।

चल रहे विकासात्मक परीक्षण (Ongoing Developmental Trials)

डीआरडीओ द्वारा कई अत्याधुनिक रक्षा प्रणालियों के विकासात्मक परीक्षण सक्रिय रूप से जारी हैं। इनमें प्रमुख रूप से भारतीय लाइट टैंक, वेरी शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम (VSHORADS), न्यू एयर-टू-सर्फेस मिसाइल – शॉर्ट रेंज (NASM-SR), रुद्रम-2, गौरव ग्लाइड बम, उन्नत रडार प्रणालियाँ, तथा लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (LCA) के लाइफ सपोर्ट सिस्टम शामिल हैं। ये परीक्षण भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमताओं को और अधिक मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

उद्योग एवं अकादमिक साझेदारी: पारिस्थितिकी तंत्र का सशक्तिकरण

प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में नेतृत्व

डीआरडीओ ने केवल वर्ष 2025 में ही 245 लाइसेंसिंग एग्रीमेंट्स (LAToT) पर हस्ताक्षर किए, जिससे कुल संख्या बढ़कर 2,201 हो गई। यह उपलब्धि रक्षा प्रौद्योगिकी के लोकतंत्रीकरण और भारतीय उद्योग को स्वदेशी क्षमताएँ विकसित करने में सक्षम बनाने के प्रति डीआरडीओ की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

उद्योग सहयोग

वर्ष 2025 में 13 नई डिफेंस कॉरिडोर प्रोडक्शन/प्रोडक्शन एजेंसी (DcPP/PA) साझेदारियाँ जोड़ी गईं, जिससे इनकी कुल संख्या 145 हो गई। इसके अतिरिक्त, निजी क्षेत्र और रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (DPSUs) के लिए 4,000 से अधिक उद्योग परीक्षण किए गए, जिससे एक मजबूत नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा मिला।

उत्कृष्टता केंद्र (Centres of Excellence – CoE)

वर्तमान में उद्योग–अकादमिक 15 उत्कृष्टता केंद्र (CoE) क्रियाशील हैं। वर्ष 2025 में 66 नई परियोजनाओं को मंज़ूरी दी गई, जिनका कुल मूल्य ₹228 करोड़ है। ये केंद्र अकादमिक अनुसंधान और औद्योगिक अनुप्रयोगों के बीच सेतु का कार्य कर रहे हैं।

डीआरडीओ की ऐतिहासिक स्थापना और विकास

डीआरडीओ की स्थापना 1 जनवरी 1958 को तकनीकी विकास प्रतिष्ठान, भारतीय आयुध कारखानों के तकनीकी विकास एवं उत्पादन निदेशालय तथा रक्षा विज्ञान संगठन के विलय के माध्यम से की गई थी। स्थापना के समय डीआरडीओ के पास केवल 10 प्रयोगशालाओं का नेटवर्क था, जो समय के साथ निरंतर विस्तार करते हुए आज 52 प्रयोगशालाओं तक पहुँच चुका है। अपने गठन के बाद से डीआरडीओ ने रक्षा अनुसंधान और प्रौद्योगिकी विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है और आज यह संगठन वैश्विक स्तर पर एक अग्रणी रक्षा अनुसंधान संस्थान के रूप में स्थापित हो चुका है।

HSBC प्राइवेट बैंक ने इडा लियू को CEO नियुक्त किया

HSBC प्राइवेट बैंक ने जनवरी 2026 में, इडा लियू (Ida Liu) को अपना नया मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) नियुक्त किया। यह नियुक्ति वैश्विक बैंकिंग और वेल्थ मैनेजमेंट क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण विकास को दर्शाती है और प्रतियोगी परीक्षाओं तथा करंट अफेयर्स की तैयारी के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।

HSBC प्राइवेट बैंक ने इडा लियू को नया CEO नियुक्त किया

HSBC प्राइवेट बैंक ने इडा लियू (Ida Liu) को मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) के रूप में औपचारिक रूप से नियुक्त किया, जो 05 जनवरी 2026 से प्रभावी होगा। वह गैब्रियल कास्तेलो (Gabriel Castello) का स्थान लेंगी, जो दिसंबर 2024 से अंतरिम CEO के रूप में कार्यरत थे। यह नेतृत्व परिवर्तन HSBC की वैश्विक प्राइवेट बैंकिंग और वेल्थ मैनेजमेंट संचालन को मजबूत बनाने की रणनीतिक प्राथमिकता को दर्शाता है।

प्रभावी तिथि और प्रमुख नियुक्ति विवरण

यह नियुक्ति प्रतियोगी परीक्षाओं के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, विशेष रूप से बैंकिंग अवेयरनेस, करंट अफेयर्स और वित्तीय संस्थान से संबंधित सेक्शन्स के लिए।

मुख्य तथ्य:

  • क्या: HSBC प्राइवेट बैंक के नए CEO की नियुक्ति
  • कौन: इडा लियू (Ida Liu)
  • पद: मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO)
  • प्रभावी तिथि: 05 जनवरी 2026
  • पूर्ववर्ती: गैब्रियल कास्तेलो (Interim CEO)

इडा लियू (Ida Liu) कौन हैं? – HSBC प्राइवेट बैंक की नई CEO का प्रोफ़ाइल

इडा लियू एक विश्व-स्तरीय और सम्मानित बैंकिंग लीडर हैं, जिन्हें प्राइवेट बैंकिंग और वेल्थ मैनेजमेंट के क्षेत्र में गहरी विशेषज्ञता हासिल है। हाल ही में उन्हें HSBC प्राइवेट बैंक की नई मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) नियुक्त किया गया है।

इडा लियू का पेशेवर अनुभव

इडा लियू के पास 25 वर्षों से अधिक का वैश्विक बैंकिंग अनुभव है। उन्होंने बैंकिंग के कई प्रमुख क्षेत्रों में नेतृत्वकारी भूमिकाएँ निभाई हैं, जिनमें शामिल हैं:

  • वेल्थ मैनेजमेंट (धन प्रबंधन)
  • रणनीतिक सलाह (Strategic Advisory)
  • बिज़नेस ट्रांसफ़ॉर्मेशन (व्यवसायिक परिवर्तन)
  • अल्ट्रा-हाई-नेट-वर्थ (UHNW) ग्राहकों के लिए सलाहकार सेवाएँ
  • निवेश योजना, तरलता प्रबंधन और विरासत (Legacy) समाधान में विशेषज्ञता

नेतृत्व क्षमता और वैश्विक दृष्टिकोण

इडा लियू का व्यापक अंतरराष्ट्रीय अनुभव और जटिल वित्तीय समाधानों में दक्षता उन्हें एक तेज़ी से प्रतिस्पर्धी वैश्विक बाजार में HSBC प्राइवेट बैंक का नेतृत्व करने के लिए उपयुक्त बनाती है। उनकी नियुक्ति से बैंक की वैश्विक प्राइवेट बैंकिंग रणनीति को और मजबूती मिलने की उम्मीद है।

HSBC में शामिल होने से पहले इडा लियू की भूमिका

HSBC में नियुक्ति से पहले इडा लियू (Ida Liu) ने सिटी प्राइवेट बैंक (Citi Private Bank) में एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वह 2007 से सिटी प्राइवेट बैंक की ग्लोबल हेड के रूप में कार्यरत थीं।

सिटी बैंक में इडा लियू की प्रमुख जिम्मेदारियाँ

सिटी बैंक में अपने लंबे और सफल कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई उच्च-स्तरीय नेतृत्व भूमिकाएँ संभालीं, जिनमें शामिल हैं:

  • हेड, सिटी प्राइवेट बैंक – नॉर्थ अमेरिका
  • हेड, सिटी प्राइवेट बैंक – न्यूयॉर्क (अमेरिका)
  • हेड, एशियन क्लाइंट्स ग्रुप

नेतृत्व और वैश्विक प्रभाव

इन भूमिकाओं के माध्यम से इडा लियू ने विविध वैश्विक ग्राहक पोर्टफोलियो का प्रभावी प्रबंधन किया और प्राइवेट बैंकिंग में सतत विकास (Growth) को गति दी। उनकी रणनीतिक सोच और अंतरराष्ट्रीय अनुभव ने उन्हें वैश्विक प्राइवेट बैंकिंग क्षेत्र की एक प्रभावशाली नेता के रूप में स्थापित किया।

Exam Hints & One-Liners (परीक्षा उपयोगी तथ्य)

  • HSBC प्राइवेट बैंक की CEO (2026): इडा लियू (Ida Liu)
  • प्रभावी तिथि: 05 जनवरी 2026
  • पूर्ववर्ती (Predecessor): गैब्रियल कास्टेलो (Gabriel Castello) – अंतरिम CEO
  • पूर्व संगठन: सिटी प्राइवेट बैंक (Citi Private Bank)
  • मुख्य ग्राहक फोकस: अल्ट्रा-हाई-नेट-वर्थ (UHNW) व्यक्ति

संयुक्त राष्ट्र ने 2026 को रेंजलैंड और पशुपालकों के लिए अंतर्राष्ट्रीय वर्ष घोषित किया

संयुक्त राष्ट्र ने 2026 को ‘अंतर्राष्ट्रीय वर्ष चरागाह और पशुपालक (International Year for Rangelands and Pastoralists)’ घोषित किया है, जो दुनिया के कुछ सबसे कम ध्यान दिए जाने वाले, किंतु अत्यंत महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्रों पर प्रकाश डालने का एक ऐतिहासिक निर्णय है। यह घोषणा वैश्विक जलवायु कार्रवाई में एक महत्वपूर्ण असंतुलन को संबोधित करती है: जहाँ वनों को असमान ध्यान और वित्तीय संसाधन प्राप्त होते हैं, वहीं घास के मैदान और सवाना (Grasslands and Savannahs)—जो कार्बन अवशोषण, जैव विविधता संरक्षण और जलवायु लचीलापन के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण हैं—अंतर्राष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं और राष्ट्रीय जलवायु रणनीतियों में अक्सर हाशिये पर रहते हैं। यह संयुक्त राष्ट्र की घोषणा समग्र पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण की दिशा में जलवायु कार्रवाई को संतुलित करने का एक निर्णायक क्षण है, जो यह स्वीकार करती है कि प्रभावी जलवायु शमन केवल वनों तक सीमित नहीं हो सकता, बल्कि सभी भूमि-आवरण (biomes) पर समान ध्यान देना आवश्यक है।

प्रतियोगी परीक्षाओं और करेंट अफेयर्स के लिए मुख्य तथ्य

  • संयुक्त राष्ट्र घोषणा: 2026 को अंतर्राष्ट्रीय वर्ष: चरागाह और पशुपालक घोषित किया गया
  • मुख्य उद्देश्य: कम ध्यान दिए जाने वाले घास के मैदान और सवाना पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रकाश डालना
  • वैज्ञानिक सहमति: घास के मैदान और सवाना कार्बन अवशोषक (Carbon Sink) के रूप में कार्य करते हैं
  • नीति अंतर (Policy Gap): UNFCCC की जलवायु वार्ताएं अक्सर वन-केंद्रित रहती हैं
  • 2022 में वैज्ञानिक पहल: अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों ने UNFCCC से जलवायु फोकस को विस्तारित करने का आग्रह किया
  • प्रमुख प्रकाशन: “Science” जर्नल में ओपन लेटर प्रकाशित, जिसमें घास के मैदानों की कार्बन अवशोषण क्षमता को उजागर किया गया
  • COP30 स्थान: बेलम, ब्राज़ील (2023)
  • प्रमुख पहल: COP30 में Tropical Forest Forever Facility (TFFF) की शुरुआत
  • मुख्य UN संधि: UNFCCC (UN Framework Convention on Climate Change)
  • संबंधित संधि: UNCCD (UN Convention to Combat Desertification)
  • वैश्विक खतरा: घास के मैदान दुनिया के सबसे अधिक संकटग्रस्त पारिस्थितिकी तंत्रों में शामिल हैं

वैज्ञानिक प्रमाण: घास के मैदान महत्वपूर्ण कार्बन सिंक के रूप में

2022 वैज्ञानिक अपील

साल 2022 में, अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों ने “Science” पत्रिका में एक ओपन लेटर प्रकाशित किया, जिसमें उन्होंने UNFCCC (UN Framework Convention on Climate Change) के पक्षकारों से आग्रह किया कि जलवायु लक्ष्यों को केवल वनों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि सभी पारिस्थितिकी तंत्र (biomes), विशेष रूप से घास के मैदान और सवाना को शामिल किया जाए। वैज्ञानिकों ने ठोस साक्ष्य प्रस्तुत किए कि सवाना प्रभावी कार्बन सिंक के रूप में कार्य करता है और वनों के समान या उससे भी अधिक दर से वातावरण में मौजूद कार्बन को अवशोषित करने में सक्षम है।

तीन साल बाद: नीति में विलंब

इस वैज्ञानिक सहमति के बावजूद, तीन साल बाद भी UNFCCC की जलवायु वार्ता वनों को प्राथमिकता देती है, जबकि अन्य महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र—विशेष रूप से घास के मैदान, सवाना और चरागाह—मुख्यधारा की जलवायु रणनीतियों और वित्तपोषण तंत्र से अधिकांशतः हाशिए पर हैं। यह लगातार वन-केंद्रित ध्यान वैज्ञानिक प्रमाण और नीति प्राथमिकताओं के बीच मौलिक असंतुलन को दर्शाता है।

COP30: वन-प्रधान एजेंडा का प्रतीक

ब्राज़ील की मेज़बानी और अमेज़न पर फोकस

बेलम, ब्राज़ील में आयोजित UNFCCC COP30 जलवायु वार्ताओं ने इस असंतुलन को स्पष्ट रूप से उजागर किया। ब्राज़ील द्वारा अमेज़न बेसिन की मेज़बानी के कारण वार्ता का एजेंडा वनों पर केंद्रित रहा। इस अवसर पर Tropical Forest Forever Facility (TFFF) की शुरुआत की गई, जिसमें वित्तीय तंत्र और शासन ढांचे के माध्यम से वन संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए मल्टी-मिलियन डॉलर की प्रतिबद्धताएँ शामिल थीं।

घास के मैदान पीछे छूट गए

फिर भी COP30 का समापन घास के मैदान और चरागाह के लिए किसी ठोस जलवायु रोडमैप के बिना हुआ, जिससे यह पुष्टि होती है कि ये पारिस्थितिकी तंत्र मुख्यधारा की जलवायु रणनीतियों से बाहर बने हुए हैं, जबकि उनका पारिस्थितिक महत्व अत्यधिक है। इस उपेक्षा के कारण घास के मैदानों को वन संरक्षण पहलों की तुलना में कम वित्तीय, तकनीकी समर्थन और नीति मान्यता प्राप्त होती है।

घास के मैदान: बहुप्रकार के खतरों का सामना

पारिस्थितिकी तंत्र के क्षरण के प्रमुख कारण

विश्वभर में घास के मैदान अत्यधिक दबावों का सामना कर रहे हैं, जिनमें मुख्य रूप से निम्नलिखित शामिल हैं:

  • कृषि में रूपांतरण (Agricultural Conversion): घास के मैदानों को कृषि भूमि और वृक्षारोपण में बदलना, मूल घास के मैदानों के आवास को नष्ट कर देता है।
  • आक्रामक प्रजातियाँ (Invasive Species): विदेशी प्रजातियाँ स्थानीय वनस्पतियों के साथ प्रतिस्पर्धा करती हैं और प्राकृतिक आग (fire) की घटनाओं के पैटर्न को बदल देती हैं।
  • जीवाश्म ईंधन निष्कर्षण (Fossil Fuel Extraction): खनन और ऊर्जा विकास से घास के मैदान टूटते हैं और पारिस्थितिकी तंत्र में विभाजन उत्पन्न होता है।
  • आग दमन नीतियाँ (Fire Suppression Policies): अच्छी मंशा से लागू की गई आग रोकने वाली नीतियाँ कभी-कभी विनाशकारी जंगल आग के जोखिम को बढ़ा देती हैं, क्योंकि खतरनाक ईंधन (fuel) जमा हो जाता है।

स्थानीय ज्ञान का हाशिये पर होना 

स्थानीय और आदिवासी भूमि प्रबंधन प्रथाएँ—जैसे नियंत्रित आग और अनुकूल चराई रणनीतियाँ—राज्य द्वारा लागू की गई आग दमन नीतियों और संरक्षण मॉडलों के कारण सिस्टमेटिक रूप से हाशिये पर चली गई हैं। इस उपेक्षा के परिणामस्वरूप जंगली आग की तीव्रता और कार्बन उत्सर्जन बढ़ गए हैं, क्योंकि खतरनाक ईंधन जमा हो जाता है और पारंपरिक प्रथाओं के माध्यम से प्रबंधित नहीं होता।

क्षेत्रीय अध्ययन: वैश्विक घास के मैदानों की संकटपूर्ण स्थिति

ऑस्ट्रेलियाई रेगिस्तानी घास के मैदान (Australian Desert Grasslands)

ऑस्ट्रेलियाई रेगिस्तानी घास के मैदान, जिनका प्रबंधन स्थानीय और आदिवासी समुदायों द्वारा किया जाता है, जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न अभूतपूर्व चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, जिनमें शामिल हैं:

  • गंभीर सूखा (Severe Droughts)
  • विनाशकारी अचानक बाढ़ (Destructive Flash Floods)

आक्रामक बफेल घास (Invasive Buffel Grass), जो स्थानीय प्रजातियों की तुलना में अधिक तीव्रता से जलती है

ब्राज़ील का सेराडो सवाना 

ब्राज़ील का सेराडो सवाना, जो कई प्रमुख नदी प्रणालियों का समर्थन करता है, पर भूमि उपयोग का दबाव अमेज़न की तुलना में अधिक है। यह महत्वपूर्ण, लेकिन कम सराहा गया पारिस्थितिकी तंत्र, अमेज़न वन संरक्षण प्रयासों की तुलना में अल्प सुरक्षा प्राप्त करता है।

नीति और वैश्विक निहितार्थ

घास के मैदानों को जलवायु ढांचे में शामिल करना

वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं ने आग्रह किया है कि घास के मैदानों को राष्ट्रीय जलवायु योजनाओं और पेरिस समझौते के राष्ट्रीय निर्धारित योगदान (NDCs) में शामिल किया जाए। इस समावेशन से यह सुनिश्चित होगा कि घास के मैदानों का संरक्षण वन संरक्षण के समान नीतिगत प्राथमिकता और वित्तीय समर्थन प्राप्त करे।

भारत का अवसर और चुनौती

भारत में घास के मैदान कई मंत्रालयों के अंतर्गत आते हैं जिनके विरोधाभासी आदेश और जिम्मेदारियाँ शासन में विखंडन (fragmentation) पैदा करती हैं। हालांकि, यदि भारत अपने NDC ढांचे में घास के मैदानों को कार्बन सिंक के रूप में मान्यता देता है, तो यह जलवायु शमन को मजबूत करने के साथ-साथ पशुपालक समुदायों के आजीविका समर्थन में भी योगदान देगा—इस प्रकार जलवायु और सामाजिक दोनों उद्देश्यों को पूरा किया जा सकता है।

समन्वित वैश्विक कार्रवाई

विशेषज्ञों ने जोर दिया है कि UN संधियों (विशेषकर UNFCCC और UNCCD) और राष्ट्रीय संस्थाओं के बीच समन्वित कार्रवाई आवश्यक है, ताकि घास के मैदानों का संरक्षण वैश्विक मुख्यधारा में शामिल हो और जलवायु कार्रवाई केवल वन-केंद्रित पूर्वाग्रह पर आधारित न रहकर वैज्ञानिक प्रमाणों के अनुरूप हो।

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