युगांडा में मुसेवेनी ने राष्ट्रपति के तौर पर सातवां कार्यकाल हासिल किया

युगांडा में हाल ही में संपन्न राष्ट्रपति चुनाव के नतीजों ने देश और अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आकर्षित किया है। अनुभवी नेता योवेरी मुसेवेनी को लगातार सातवीं बार राष्ट्रपति घोषित किया गया है। हालांकि, इस जीत के साथ ही विवाद भी खड़ा हो गया है, क्योंकि मुख्य विपक्षी उम्मीदवार ने चुनाव परिणामों को खारिज करते हुए अनियमितताओं, इंटरनेट बंदी और मतदान एजेंटों के कथित उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं। इस चुनाव ने एक बार फिर युगांडा की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को वैश्विक जांच के दायरे में ला दिया है।

खबरों में क्यों?

युगांडा के चुनाव आयोग ने राष्ट्रपति योवेरी मुसेवेनी को 71.65% मतों के साथ विजेता घोषित किया। विपक्षी नेता बोबी वाइन ने परिणामों को धोखाधड़ी बताते हुए खारिज कर दिया और शांतिपूर्ण विरोध का आह्वान किया।

चुनाव परिणाम और मत प्रतिशत

  • आधिकारिक नतीजों के अनुसार, राष्ट्रपति मुसेवेनी को कुल डाले गए मतों का 71.65 प्रतिशत प्राप्त हुआ, जिससे उनका शासन 1986 से आगे बढ़ गया।
  • उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी बोबी वाइन (वास्तविक नाम: क्यागुलानी सेंटामु) को 24.72 प्रतिशत वोट मिले।
  • चुनाव देशभर में आयोजित हुए, जिनमें राजधानी कंपाला जैसे शहरी विपक्षी गढ़ भी शामिल थे।
  • जहाँ सरकार ने चुनाव को सफल बताया, वहीं जीत का बड़ा अंतर युगांडा की चुनावी निष्पक्षता और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा पर बहस को तेज करता है।

मुसेवेनी का लंबा शासन और राजनीतिक परिदृश्य

  • 81 वर्षीय मुसेवेनी अफ्रीका के सबसे लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले नेताओं में से एक हैं।
  • संवैधानिक संशोधनों के जरिए राष्ट्रपति पद की कार्यकाल और आयु सीमा हटा दी गई, जिससे उन्हें बार-बार चुनाव लड़ने का अवसर मिला।
  • आलोचकों का कहना है कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को जेल में डाला गया, हाशिये पर रखा गया या कमजोर किया गया, जिससे वास्तविक प्रतिस्पर्धा सीमित हो गई।
  • विश्लेषकों के अनुसार, बोबी वाइन ने प्रतीकात्मक रूप से मजबूत चुनौती दी, लेकिन विपक्ष बिखरा हुआ है, जबकि मुसेवेनी का सत्तारूढ़ दल और सशस्त्र बलों पर मजबूत नियंत्रण बना हुआ है।

युगांडा की चुनावी व्यवस्था

युगांडा में राष्ट्रपति प्रणाली है, जिसमें राष्ट्राध्यक्ष का चुनाव प्रत्यक्ष जनमत से होता है। चुनाव आयोग मतदान, मतगणना और परिणामों की घोषणा करता है, जबकि चुनावी विवादों की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट द्वारा की जाती है।

युगांडा से जुड़े प्रमुख तथ्य

पहलू विवरण
क्षेत्र पूर्व–मध्य अफ्रीका
राजधानी कंपाला
राजनीतिक स्थिति 1962 से स्वतंत्र
सीमाएँ कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC), केन्या, रवांडा, दक्षिण सूडान, तंज़ानिया
भूमध्य रेखा युगांडा से होकर गुजरती है
सरकार लोकतांत्रिक; राष्ट्रपति राष्ट्राध्यक्ष
आधिकारिक भाषाएँ अंग्रेज़ी, स्वाहिली
सर्वोच्च शिखर मार्गेरिटा पीक (5,109 मीटर)
प्रमुख झील विक्टोरिया झील
पर्वत श्रेणियाँ रूवेनज़ोरी, विरुंगा
विशिष्ट स्थलरूप इन्सेलबर्ग (एकाकी चट्टानी पहाड़)
वन्यजीव महत्त्व विश्व की ~11% पक्षी प्रजातियाँ, ~8% स्तनधारी; सर्वाधिक प्राइमेट प्रजातियाँ; लगभग 50% पर्वतीय गोरिल्ला

दुनिया के किस शहर को व्हाइट सिटी के नाम से जाना जाता है?

दुनिया भर में कई शहरों को उनकी सुंदरता, संस्कृति या विशिष्ट रूप के कारण विशेष उपनाम दिए गए हैं। कुछ शहरों को उनके भवनों, सड़कों और आसपास के वातावरण के रंग के आधार पर नाम मिला है। ऐसा ही एक प्रसिद्ध उपनाम है “श्वेत नगरी (White City)”। यह नाम चमकती हुई दीवारों, शांत सड़कों और स्वच्छ, उज्ज्वल आकर्षण की छवि प्रस्तुत करता है। यह उपनाम उस स्थान से जुड़ा है, जो अपनी हल्के रंग की वास्तुकला और कालातीत सुंदरता के लिए जाना जाता है।

वास्तुकला (Architecture) क्या है?

वास्तुकला इमारतों और संरचनाओं—जैसे घर, स्कूल, कार्यालय और पूरे शहर—की रूपरेखा बनाने और निर्माण करने की कला और विज्ञान है। यह केवल इमारतों को सुंदर बनाने तक सीमित नहीं है। वास्तुकला में आराम, सुरक्षा, जलवायु, संस्कृति और लोगों की दैनिक आवश्यकताओं का भी ध्यान रखा जाता है। एक अच्छी तरह से डिज़ाइन की गई इमारत जीवन को बेहतर बना सकती है, ऊर्जा की बचत कर सकती है और किसी स्थान की आत्मा और पहचान को दर्शा सकती है।

किस शहर को व्हाइट सिटी के नाम से जाना जाता है?

इज़राइल का तेल अवीव शहर दुनिया की “श्वेत नगरी (White City)” के रूप में प्रसिद्ध है। यह भूमध्यसागरीय तट पर स्थित है और यहाँ हजारों सफेद रंग की इमारतें हैं, जो बॉहाउस (Bauhaus) नामक विशेष आधुनिक स्थापत्य शैली में बनी हैं। इसी कारण तेल अवीव को विश्व में आधुनिक वास्तुकला के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण संग्रहों में से एक माना जाता है।

तेल अवीव को ‘श्वेत नगरी’ क्यों कहा जाता है?

“श्वेत नगरी” नाम शहर में फैली हल्के रंग की इमारतों से आया है। इन इमारतों का निर्माण 20वीं सदी के प्रारंभ में उन वास्तुकारों द्वारा किया गया था, जो यूरोप की आधुनिक स्थापत्य अवधारणाओं से प्रभावित थे।

सफेद दीवारें सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करती हैं, जिससे गर्म भूमध्यसागरीय जलवायु में इमारतें ठंडी रहती हैं। चौड़ी बालकनियाँ, सपाट छतें, छायादार खिड़कियाँ और खुले स्थान जीवन को अधिक आरामदायक बनाते हैं। ये सभी विशेषताएँ मिलकर शहर को उज्ज्वल, स्वच्छ और शांत स्वरूप प्रदान करती हैं।

बॉहाउस (Bauhaus) स्थापत्य शैली

बॉहाउस एक ऐसी स्थापत्य शैली है, जो निम्न सिद्धांतों पर आधारित है—

  • सरल आकृतियाँ
  • स्वच्छ और सीधी रेखाएँ
  • भारी सजावट का अभाव
  • उपयोगी और व्यावहारिक डिज़ाइन

तेल अवीव में इन विचारों को स्थानीय जलवायु और संस्कृति के अनुसार थोड़ा बदला गया। परिणामस्वरूप, यहाँ की इमारतें आधुनिक भी दिखती हैं और गर्म तटीय वातावरण के अनुकूल भी होती हैं।

श्वेत नगरी की योजना कैसे बनी?

1925 से 1927 के बीच, पैट्रिक गेड्स (Patrick Geddes) नामक नगर योजनाकार ने तेल अवीव के लिए एक मास्टर प्लान तैयार किया। उन्होंने शहर को एक “जीवित शरीर” के रूप में कल्पना किया, जहाँ घर, सड़कें, पार्क और लोग आपसी सामंजस्य के साथ कार्य करें।

श्वेत नगरी मुख्य रूप से तीन क्षेत्रों में फैली हुई है—

  • सेंट्रल व्हाइट सिटी
  • लेव हेयर क्षेत्र (रोथ्सचाइल्ड एवेन्यू सहित)
  • बियालिक क्षेत्र
  • आज ये सभी क्षेत्र मिलकर एक संरक्षित विरासत क्षेत्र (Heritage Area) बनाते हैं।

जलवायु और संस्कृति के अनुसार बना शहर

वास्तुकारों ने ऐसी इमारतें डिज़ाइन कीं, जो गर्म क्षेत्र में दैनिक जीवन के अनुकूल हों। इनमें शामिल हैं—

  • सपाट छतें
  • लंबी बालकनियाँ
  • छायादार खिड़कियाँ
  • हल्के रंग की दीवारें

ये विशेषताएँ घरों को ठंडा और हवादार बनाए रखती हैं। साथ ही, ये खुले में रहने की संस्कृति को बढ़ावा देती हैं, जो स्थानीय जीवनशैली से पूरी तरह मेल खाती है।

श्वेत नगरी का वैश्विक महत्व

तेल अवीव की श्वेत नगरी 20वीं सदी के प्रारंभिक आधुनिक भवनों का विश्व में सबसे बड़ा समूह मानी जाती है। इसके ऐतिहासिक और स्थापत्य महत्व के कारण इसे विशेष विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त है। यह दर्शाती है कि किस प्रकार यूरोपीय आधुनिक विचारों को स्थानीय आवश्यकताओं के साथ सुंदर ढंग से जोड़ा गया।

पहली वंदे भारत स्लीपर ट्रेन शुरू, PM मोदी ने दिखाई हरी झंडी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की पहली स्लीपर वंदे भारत ट्रेन का शुभारंभ किया है, जो कोलकाता (हावड़ा) को गुवाहाटी (कामाख्या) से जोड़ती है। इस ट्रेन को 17 जनवरी 2026 को पश्चिम बंगाल के मालदा से हरी झंडी दिखाई गई। यह ओवरनाइट सेमी-हाई-स्पीड सेवा आधुनिक रेल यात्रा के एक नए चरण की शुरुआत है और पूर्वी तथा पूर्वोत्तर भारत के बीच लंबी दूरी की कनेक्टिविटी को मजबूत करेगी।

क्यों चर्चा में है?

भारत की पहली वंदे भारत स्लीपर ट्रेन शुरू की गई है। यह हावड़ा और गुवाहाटी को जोड़ती है और लगभग 14 घंटे में रातभर की यात्रा पूरी करती है।

वंदे भारत स्लीपर ट्रेन के बारे में

  • वंदे भारत स्लीपर, वंदे भारत एक्सप्रेस का उन्नत संस्करण है, जिसे लंबी दूरी की रात्रिकालीन यात्रा के लिए डिज़ाइन किया गया है।
  • चेयर कार वाली वंदे भारत ट्रेनों के विपरीत, इसमें स्लीपर बर्थ की सुविधा है, जो राजधानी श्रेणी जैसी आरामदायक यात्रा के साथ आधुनिक इंटीरियर और तेज गति प्रदान करती है।
  • यह पूरी तरह मेक इन इंडिया पहल के तहत निर्मित है और भारतीय रेल के आत्मनिर्भरता, आधुनिकीकरण और यात्री सुविधा पर जोर को दर्शाती है।
  • स्लीपर संस्करण के साथ वंदे भारत नेटवर्क अब छोटी दूरी से आगे बढ़कर लंबी अंतर-राज्यीय यात्राओं तक विस्तारित हो गया है।

मार्ग, समय-सारिणी और प्रमुख विशेषताएं

  • वंदे भारत स्लीपर ट्रेन हावड़ा और कामाख्या के बीच सप्ताह में छह दिन दोनों दिशाओं में चलेगी।
  • यह हावड़ा से शाम 6:20 बजे और कामाख्या से शाम 6:15 बजे प्रस्थान करेगी तथा लगभग 14 घंटे में यात्रा पूरी करेगी।
  • ट्रेन में आधुनिक कोच, उन्नत सुरक्षा प्रणालियां और बेहतर इंटीरियर उपलब्ध हैं।
  • रेलवे के अनुसार, यह सेवा बंगाल और असम के बीच यात्रियों को तेज, आरामदायक और भरोसेमंद रात्री यात्रा उपलब्ध कराएगी।

सांस्कृतिक और क्षेत्रीय महत्व

  • ट्रेन को हरी झंडी दिखाते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि यह मां काली की धरती को मां कामाख्या की धरती से जोड़ती है, जो पश्चिम बंगाल और असम के बीच सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है।
  • इस सेवा से पर्यटन, व्यापार और लोगों के आपसी संपर्क को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
  • रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि ट्रेन में बंगाल और असम के स्थानीय व्यंजन परोसे जाएंगे, जिससे यात्रा को क्षेत्रीय स्वाद मिलेगा।

पश्चिम बंगाल से शुरू की गई अन्य ट्रेनें

  • स्लीपर वंदे भारत के साथ प्रधानमंत्री ने चार अमृत भारत एक्सप्रेस ट्रेनों का भी शुभारंभ किया।
  • ये ट्रेनें न्यू जलपाईगुड़ी–नागरकोइल, न्यू जलपाईगुड़ी–तिरुचिरापल्ली, अलीपुरद्वार–बेंगलुरु (SMVT) और अलीपुरद्वार–मुंबई (पनवेल) मार्गों पर चलेंगी।
  • इनका उद्देश्य पश्चिम बंगाल से दक्षिण और पश्चिम भारत तक किफायती लंबी दूरी की रेल कनेक्टिविटी को बेहतर बनाना है।

₹3,250 करोड़ के रेल और सड़क प्रोजेक्ट

  • इसी कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने ₹3,250 करोड़ की रेल और सड़क परियोजनाओं की आधारशिला भी रखी।
  • इनमें बालुरघाट–हिली नई रेल लाइन, न्यू जलपाईगुड़ी में आधुनिक फ्रेट मेंटेनेंस सुविधा, लोको शेड का आधुनिकीकरण, वंदे भारत मेंटेनेंस यूनिट और एनएच-31डी के धुपगुड़ी–फालाकाटा खंड का चार लेन में विस्तार शामिल है।
  • ये परियोजनाएं पूर्वी भारत में बुनियादी ढांचे को मजबूत करेंगी।

वंदे भारत ट्रेनों से जुड़े तथ्य

  • वंदे भारत ट्रेनें सेमी-हाई-स्पीड ट्रेनें हैं, जिनकी शुरुआत 2019 में हुई थी।
  • ये मेक इन इंडिया के तहत भारत में निर्मित हैं।
  • वर्तमान में देशभर में लगभग 150 वंदे भारत ट्रेनें संचालित हो रही हैं।
  • स्लीपर संस्करण को विशेष रूप से लंबी दूरी की रात्री यात्राओं के लिए तैयार किया गया है।

PM मोदी ने ₹6,957 करोड़ के काजीरंगा एलिवेटेड कॉरिडोर का शिलान्यास किया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 18 जनवरी 2026 को असम में ₹6,957 करोड़ की काजीरंगा एलिवेटेड कॉरिडोर परियोजना का शिलान्यास किया और साथ ही दो अमृत भारत एक्सप्रेस ट्रेनों को वर्चुअली रवाना किया। यह परियोजना वन्यजीवों की सुरक्षित आवाजाही, सड़क दुर्घटनाओं में कमी, बेहतर कनेक्टिविटी तथा पर्यटन और रोजगार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू की गई है।

क्यों चर्चा में है?

प्रधानमंत्री मोदी ने काजीरंगा एलिवेटेड कॉरिडोर परियोजना का उद्घाटन किया और लंबी दूरी की रेल कनेक्टिविटी सुधारने के लिए दो नई अमृत भारत एक्सप्रेस ट्रेनों को हरी झंडी दिखाई।

काजीरंगा एलिवेटेड कॉरिडोर के बारे में

  • काजीरंगा एलिवेटेड कॉरिडोर 34.5 किलोमीटर लंबी ऊँची सड़क है, जो राष्ट्रीय राजमार्ग-715 (NH-715) के चौड़ीकरण का हिस्सा है।
  • यह राजमार्ग काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान की दक्षिणी सीमा के साथ-साथ गुजरता है और इसे कार्बी आंगलोंग पहाड़ियों से अलग करता है।
  • बाढ़ के दौरान वन्यजीव स्वाभाविक रूप से ऊँचे क्षेत्रों की ओर पलायन करते हैं, लेकिन भारी ट्रैफिक उनके रास्ते में बाधा बनता है।
  • एलिवेटेड कॉरिडोर से वाहन ऊपर से गुजरेंगे, जबकि जानवर नीचे से सुरक्षित रूप से सड़क पार कर सकेंगे।
  • परियोजना में जाखलाबंधा और बोकाखाट जैसे कस्बों के आसपास बाईपास भी शामिल हैं, जिससे यातायात जाम कम होगा।

मौजूदा राजमार्ग वन्यजीवों के लिए खतरनाक क्यों है?

  • NH-715 काजीरंगा में वन्यजीवों के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक है।
  • प्रतिदिन हजारों वाहन इस मार्ग से गुजरते हैं, खासकर वन्यजीव गलियारों से।
  • शोध अध्ययनों के अनुसार, एक वर्ष में इस मार्ग पर 6,000 से अधिक जानवरों की मौत दर्ज की गई, विशेषकर मानसून के दौरान।
  • तेज रफ्तार, रात में यातायात और कम दृश्यता के कारण हिरण, तेंदुआ और गैंडा जैसे जानवर सड़क हादसों का शिकार होते हैं।
  • सेंसर और स्पीड लिमिट जैसे उपाय अस्थायी समाधान हैं; विशेषज्ञों के अनुसार इंफ्रास्ट्रक्चर का पुनः डिज़ाइन ही स्थायी समाधान है।

संरक्षण और विकास में कैसे मदद करेगा कॉरिडोर?

  • यह परियोजना विकास और संरक्षण के संतुलन का एक मॉडल है।
  • ऊँचे हिस्सों पर ट्रैफिक ले जाने से नीचे का प्राकृतिक क्षेत्र वन्यजीवों के लिए खुला रहेगा।
  • वन अधिकारियों का मानना है कि इससे रोडकिल में भारी कमी आएगी और जानवरों पर तनाव घटेगा।
  • निर्माण के दौरान सावधानी बरतने की आवश्यकता पर संरक्षणवादियों ने ज़ोर दिया है।

पूरा होने के बाद यह परियोजना वन्यजीव मृत्यु की स्थायी समस्या का समाधान करेगी और साथ ही गुवाहाटी, पूर्वी असम और नुमालीगढ़ के बीच कनेक्टिविटी सुधारकर व्यापार, पर्यटन और स्थानीय आजीविका को बढ़ावा देगी।

काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान : प्रमुख तथ्य

पहलू विवरण
राज्य असम
नदी ब्रह्मपुत्र
जैव-विविधता क्षेत्र पूर्वी हिमालय जैव-विविधता हॉटस्पॉट
राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा 1974
टाइगर रिज़र्व 2006
यूनेस्को दर्जा विश्व धरोहर स्थल (1985)
प्रसिद्ध एक-सींग वाला गैंडा
प्रमुख नदियाँ डिफ्लू
मुख्य जीव-जंतु गैंडा, बाघ, हाथी, भैंसा, दलदली हिरण
वनस्पति आर्द्र जलोढ़ घासभूमि, एलीफेंट ग्रास
प्रमुख खतरे अवैध शिकार, बाढ़

दावोस 2026: मुख्य तारीखें, थीम, प्रतिभागी और फोकस में वैश्विक चुनौतियाँ

विश्व आर्थिक मंच (WEF) की वार्षिक बैठक 2026 का आयोजन 19 जनवरी 2026 से दावोस, स्विट्ज़रलैंड में होगा। पाँच दिनों तक चलने वाले इस शिखर सम्मेलन में लगभग 3,000 वैश्विक नेता भाग लेंगे। बैठक में आर्थिक मंदी, भू-राजनीतिक तनाव, जलवायु जोखिम और तकनीकी बदलाव जैसी वैश्विक चुनौतियों के समाधान पर चर्चा की जाएगी। यह सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब दुनिया में अनिश्चितता बढ़ रही है और वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव देखने को मिल रहा है।

समाचार में क्यों?

विश्व आर्थिक मंच (WEF) की वार्षिक बैठक 2026 19 जनवरी से दावोस में शुरू हो रही है। इस वर्ष का सम्मेलन अब तक के सबसे बड़े आयोजनों में से एक है, जिसमें 130 से अधिक देशों के नेता भाग ले रहे हैं।

दावोस और विश्व आर्थिक मंच क्या है?

  • विश्व आर्थिक मंच (WEF) एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है, जिसका मुख्यालय जिनेवा, स्विट्ज़रलैंड में है।
  • पिछले 50 से अधिक वर्षों से यह मंच सरकारों, व्यवसायों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और नागरिक समाज के नेताओं को एक साथ लाता रहा है।
  • इसका सबसे प्रमुख आयोजन दावोस वार्षिक बैठक है, जहाँ सार्वजनिक-निजी सहयोग के माध्यम से वैश्विक चुनौतियों पर चर्चा की जाती है।
  • WEF का उद्देश्य संवाद, सहयोग और नीति-नवाचार के ज़रिये दुनिया की स्थिति में सुधार करना है।

दावोस 2026: तिथि, स्थान और थीम

  • तिथि: 19 जनवरी से 23 जनवरी 2026
  • स्थान: दावोस, स्विट्ज़रलैंड
  • थीम: “संवाद की भावना (A Spirit of Dialogue)”

इस वर्ष की थीम एक विभाजित और प्रतिस्पर्धात्मक विश्व में सहयोग की आवश्यकता पर बल देती है। चर्चाओं का केंद्र बिंदु होगा—

  • भरोसे का पुनर्निर्माण
  • भू-राजनीतिक तनावों का प्रबंधन
  • नवाचार आधारित विकास
  • आर्थिक विखंडन और तेज़ तकनीकी बदलाव के बीच समावेशी विकास

दावोस 2026 में भाग लेने वाले

  • WEF के अनुसार, 130 से अधिक देशों से लगभग 3,000 नेता भाग लेंगे।
  • इनमें करीब 400 वरिष्ठ राजनीतिक नेता और लगभग 65 राष्ट्राध्यक्ष/सरकार प्रमुख शामिल होंगे।
  • G7 देशों के शीर्ष नेता भी इसमें मौजूद रहेंगे।
  • प्रमुख प्रतिभागियों में डोनाल्ड ट्रंप, जो अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करेंगे, शामिल हैं।
  • संयुक्त राष्ट्र (UN), अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) जैसे वैश्विक संस्थानों के प्रमुख भी भाग लेंगे।

व्यापार और प्रौद्योगिकी नेताओं की भूमिका

  • दावोस 2026 में लगभग 850 शीर्ष CEO और उद्योग जगत के नेता शामिल होंगे।
  • सत्या नडेला और जेन्सन हुआंग जैसे प्रमुख तकनीकी नेता भी इसमें भाग लेने की संभावना रखते हैं।
  • चर्चाएँ मुख्य रूप से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), डिजिटल परिवर्तन, ऊर्जा संक्रमण, आपूर्ति शृंखलाएँ और नवाचार आधारित विकास पर केंद्रित रहेंगी।
  • यह निजी क्षेत्र की बढ़ती भूमिका को दर्शाता है, जो वैश्विक आर्थिक नीतियों को आकार दे रहा है।

दावोस 2026 में भारत की भागीदारी

  • भारत का प्रतिनिधित्व एक उच्चस्तरीय राजनीतिक और व्यावसायिक प्रतिनिधिमंडल करेगा, जो उसकी बढ़ती वैश्विक आर्थिक और रणनीतिक भूमिका को दर्शाता है।
  • वाणिज्य, ऊर्जा, डिजिटल अवसंरचना और विदेश मामलों से जुड़े वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री भाग लेने की उम्मीद है।
  • महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, मध्य प्रदेश और केरल जैसे राज्यों के मुख्यमंत्री भी सम्मेलन में शामिल होंगे।
  • टाटा, इंफोसिस, महिंद्रा और JSW जैसे प्रमुख भारतीय उद्योग समूह भारत की मौजूदगी को मजबूत करेंगे।

भारत और राज्यों के उद्देश्य

  • भारतीय राज्य दावोस 2026 का उपयोग विदेशी निवेश आकर्षित करने और अपने विकास मॉडल प्रदर्शित करने के लिए करेंगे।
  • केरल जिम्मेदार निवेश और ESG-आधारित दृष्टिकोण को बढ़ावा देगा।
  • झारखंड नवीकरणीय ऊर्जा और समावेशी विकास पर आधारित ऊर्जा संक्रमण मॉडल प्रस्तुत करेगा।
  • आंध्र प्रदेश अवसंरचना और उद्योग में निवेश अवसरों को रेखांकित करेगा।
  • इन पहलों का उद्देश्य भारत को एक विश्वसनीय वैश्विक विकास साझेदार के रूप में स्थापित करना है।

वैश्विक स्तर पर दावोस 2026 का महत्व

  • दावोस 2026 ऐसे समय में हो रहा है जब दुनिया भू-राजनीतिक संघर्षों, आर्थिक सुस्ती, जलवायु संकट और तेज़ तकनीकी बदलाव से जूझ रही है।
  • यह मंच उस दौर में संवाद का तटस्थ मंच प्रदान करता है जब बहुपक्षीय सहयोग दबाव में है।
  • यहाँ से सतत विकास, जलवायु कार्रवाई, AI शासन और वैश्विक सहयोग पर रणनीतियाँ सामने आने की उम्मीद है, जिससे भविष्य की वैश्विक नीतियों को दिशा मिलेगी।

विश्व आर्थिक मंच (World Economic Forum) के बारे में

पहलू विवरण
स्थापना 1971 में (यूरोपियन मैनेजमेंट फोरम के रूप में)
1987 में नाम बदलकर विश्व आर्थिक मंच (World Economic Forum) किया गया
संस्थापक क्लॉस श्वाब (Klaus Schwab) – जर्मन अर्थशास्त्री
स्टेकहोल्डर कैपिटलिज़्म की अवधारणा के प्रवर्तक
मुख्यालय कोलॉनी (Cologny), स्विट्ज़रलैंड
उद्देश्य / लक्ष्य • दुनिया की स्थिति में सुधार करना
• सार्वजनिक–निजी सहयोग को बढ़ावा देना
• वैश्विक आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय चुनौतियों का समाधान करना
• सरकारों, व्यवसायों और नागरिक समाज के बीच सहयोग को प्रोत्साहित करना

कोकबोरोक दिवस 2026: त्रिपुरी भाषा दिवस – इतिहास, महत्व, समारोह

कोकबोरोक दिवस, जिसे त्रिपुरी भाषा दिवस भी कहा जाता है, हर वर्ष 19 जनवरी को त्रिपुरा में मनाया जाता है। यह दिन कोकबोरोक भाषा की समृद्ध भाषाई और सांस्कृतिक विरासत का उत्सव है, जो त्रिपुरी समुदाय की मातृभाषा है। यह दिवस कोकबोरोक को त्रिपुरा की राज्य भाषा के रूप में मान्यता मिलने की ऐतिहासिक घटना को स्मरण करता है और स्वदेशी भाषाओं के संरक्षण व संवर्धन के प्रयासों को उजागर करता है।

समाचार में क्यों?

कोकबोरोक दिवस 2026 को 19 जनवरी 2026 को मनाया जाएगा। इस वर्ष कोकबोरोक को त्रिपुरा की राजभाषा के रूप में मान्यता मिलने की 48वीं वर्षगांठ है।

कोकबोरोक भाषा क्या है?

  • कोकबोरोक, जिसे त्रिपुरी या टिप्राकोक भी कहा जाता है, त्रिपुरा के त्रिपुरी लोगों की मूल भाषा है।
  • यह तिब्बती–बर्मी (Tibeto-Burman) भाषा परिवार से संबंधित है।
  • यह मुख्य रूप से त्रिपुरा तथा बांग्लादेश के चिटगांव हिल ट्रैक्ट्स क्षेत्र में बोली जाती है।
  • कोकबोरोक उत्तर–पूर्व भारत की तेज़ी से विकसित हो रही स्वदेशी भाषाओं में से एक है।
  • कोकबोरोक बोलने वाले स्वयं को त्रिपुरी के रूप में पहचानते हैं और यह भाषा उनकी सांस्कृतिक पहचान का मूल आधार है।

कोकबोरोक दिवस का इतिहास

  • 1979 में त्रिपुरा सरकार ने बंगाली और अंग्रेज़ी के साथ कोकबोरोक को राज्य भाषा के रूप में आधिकारिक मान्यता दी।
  • प्राचीन टिपरा राज्य के त्रिपुरी राजाओं के शासनकाल में कोकबोरोक व्यापक रूप से बोली जाती थी।
  • यद्यपि यह भाषा हजारों वर्षों से अस्तित्व में है, लेकिन इसकी आधिकारिक मान्यता आदिवासी पहचान और भाषाई अधिकारों के संरक्षण हेतु चले लंबे सांस्कृतिक और राजनीतिक आंदोलनों के बाद मिली।

कोकबोरोक दिवस का महत्व

  • यह दिवस आदिवासी आत्म-अभिव्यक्ति और सांस्कृतिक मान्यता के संघर्ष का प्रतीक है।
  • प्राचीन अभिलेखों के अनुसार, कोकबोरोक में पहले कोलोमा (Koloma) लिपि का प्रयोग होता था, जिसे आज पुनर्जीवित करने के प्रयास चल रहे हैं।
  • सामाजिक–राजनीतिक बहसों के कारण लिपि का मानकीकरण नहीं हो सका है और वर्तमान में लैटिन लिपि का व्यापक उपयोग होता है।
  • यह दिवस स्वदेशी भाषाओं के संरक्षण के महत्व को रेखांकित करता है, जो इतिहास, परंपराओं और सामुदायिक ज्ञान को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक हैं।

कोकबोरोक दिवस कैसे मनाया जाता है?

  • त्रिपुरा भर में सांस्कृतिक कार्यक्रम, सेमिनार, साहित्यिक आयोजन और भाषा जागरूकता अभियान आयोजित किए जाते हैं।
  • सरकार और गैर-सरकारी संगठन “Kokborok tei Hukumu Mission” जैसी पहलों के माध्यम से कोकबोरोक साहित्य, संगीत, फिल्म और शिक्षा को बढ़ावा देते हैं।
  • अब यह भाषा स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है।
  • खुमुलुंग (Khumulwng) जैसे नगरों में कोकबोरोक की हजारों पुस्तकों वाले पुस्तकालय स्थापित किए गए हैं।

कोकबोरोक भाषा से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य

  • कोकबोरोक को पहले टिपरा कहा जाता था; 20वीं शताब्दी के बाद कोकबोरोक नाम प्रचलित हुआ।
  • यह भाषा मुख्यतः देबबर्मा, रियांग, जमातिया, त्रिपुरा, नोआतिया, रूपिनी, मुरासिंग और उचोई जैसे समुदायों द्वारा बोली जाती है।
  • राधामोहन ठाकुर कोकबोरोक का पहला व्याकरण लिखने वाले विद्वान थे; उनकी पुस्तक “Kokborokma” वर्ष 1900 में प्रकाशित हुई।

आज के समय में कोकबोरोक दिवस क्यों महत्वपूर्ण है?

  • वैश्वीकरण के दौर में अनेक स्वदेशी भाषाएँ लुप्त होने के खतरे का सामना कर रही हैं।
  • कोकबोरोक दिवस भाषाई विविधता और सांस्कृतिक संरक्षण के महत्व को उजागर करता है।
  • कोकबोरोक का प्रचार–प्रसार आदिवासी पहचान को सशक्त करता है, मातृभाषा में शिक्षा की पहुँच बढ़ाता है और समावेशी विकास को समर्थन देता है।
  • यह भारत की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के व्यापक प्रयासों के अनुरूप है।

भारत के लोकपाल ने स्थापना दिवस मनाया, सत्यनिष्ठा, जवाबदेही और पारदर्शी शासन के प्रति प्रतिबद्धता की पुष्टि की

भारत के लोकपाल ने 16 जनवरी 2026 को अपना स्थापना दिवस मनाया, जो भ्रष्टाचार के विरुद्ध भारत की लड़ाई में एक और महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी और जवाबदेही बनाए रखने के उद्देश्य से स्थापित इस संस्था ने इस अवसर पर अब तक की अपनी यात्रा की समीक्षा की और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित पारदर्शी एवं नैतिक शासन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया।

क्यों चर्चा में?

भारत के लोकपाल ने 16 जनवरी 2026 को अपना स्थापना दिवस मनाया। यह दिवस लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के लागू होने की स्मृति में मनाया जाता है, जिसके तहत 2014 में लोकपाल संस्था की स्थापना हुई थी।

स्थापना दिवस का आयोजन और महत्व

  • स्थापना दिवस का कार्यक्रम नई दिल्ली स्थित लोकपाल कार्यालय में सादे, आंतरिक स्वरूप में आयोजित किया गया, जो वित्तीय अनुशासन और मितव्ययिता को दर्शाता है।
  • यह दिवस लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013 की धारा 3 के अंतर्गत लोकपाल की विधिक स्थापना का प्रतीक है।
  • यह अवसर संस्था की प्रगति, चुनौतियों और लोकतांत्रिक जवाबदेही तथा शासन में जनविश्वास को सुदृढ़ करने में उसकी विकसित होती भूमिका पर चिंतन का अवसर प्रदान करता है।

नेतृत्व और प्रमुख गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति

  • कार्यक्रम की अध्यक्षता लोकपाल के अध्यक्ष न्यायमूर्ति ए. एम. खानविलकर ने की, जिनके साथ लोकपाल के कई न्यायिक एवं गैर-न्यायिक सदस्य भी उपस्थित रहे।
  • वरिष्ठ सदस्यों ने संस्था को सौंपे गए संवैधानिक दायित्वों और उसकी उस विशिष्ट भूमिका को रेखांकित किया, जिसके तहत वह सर्वोच्च स्तर के सार्वजनिक पदाधिकारियों सहित भ्रष्टाचार के आरोपों की स्वतंत्र जांच करने के लिए अधिकृत है।
  • यह आयोजन निरंतरता, संस्थागत परिपक्वता और निष्पक्षता व विधिक प्रक्रिया के पालन के सामूहिक संकल्प का प्रतीक रहा।

लोकपाल संस्था के पीछे की परिकल्पना

  • अपने संबोधन में अध्यक्ष ने अन्ना हजारे और पूर्व लोकायुक्त न्यायमूर्ति एन. संतोष हेगड़े जैसे व्यक्तित्वों के त्याग और प्रयासों को याद किया, जिनके संघर्ष ने एक सशक्त भ्रष्टाचार-रोधी तंत्र की लंबे समय से चली आ रही जन-आकांक्षा को अभिव्यक्ति दी।
  • लोकपाल की परिकल्पना “जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए” एक ऐसी संस्था के रूप में की गई थी, जो कानून के शासन और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का सख्ती से पालन करते हुए स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करे।

बढ़ता जनविश्वास और कार्यप्रदर्शन

  • अध्यक्ष ने बताया कि पिछले दो वर्षों में लोकपाल को प्राप्त शिकायतों की संख्या में निरंतर वृद्धि हुई है और 2025–26 के लिए यह संख्या पिछले वर्ष की तुलना में तेज़ बढ़ोतरी दर्शा रही है।
  • यह वृद्धि लोकपाल के प्रति बढ़ती जन-जागरूकता और भरोसे को दर्शाती है।
  • अधिक पीठ बैठकों और सक्रिय मामले प्रबंधन के माध्यम से न्यूनतम लंबित मामलों और समयबद्ध निपटान को सुनिश्चित किया गया है, जिससे संस्था की कार्यकुशलता और निष्पक्षता में जनता का विश्वास और मजबूत हुआ है।

भारत का लोकपाल 

शीर्षक विवरण
लोकपाल क्या है? • एक वैधानिक भ्रष्टाचार-रोधी संस्था
• लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के तहत स्थापित
• केंद्र स्तर पर संस्थागत जवाबदेही को सुदृढ़ करने हेतु गठित
दायित्व (Mandate) • भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच करना
• कुछ निर्दिष्ट सार्वजनिक पदाधिकारियों के विरुद्ध
• भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 से संबंधित मामलों में
संगठनात्मक संरचना • कुल 9 सदस्य
– 1 अध्यक्ष
– 8 सदस्य
• 4 सदस्य न्यायिक होना अनिवार्य
• कम-से-कम 50% सदस्य निम्न वर्गों से:
– अनुसूचित जाति / जनजाति / अन्य पिछड़ा वर्ग
– अल्पसंख्यक
– महिलाएं
पात्रता मापदंड अध्यक्ष:
• भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश, या
• सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश, या
• निर्धारित योग्यता वाला कोई प्रतिष्ठित व्यक्तिन्यायिक सदस्य:
• सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश, या
• किसी उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश
सदस्यों की नियुक्ति • भारत के राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति
• चयन समिति की सिफारिश पर, जिसमें शामिल हैं:
– प्रधानमंत्री (अध्यक्ष)
– लोकसभा अध्यक्ष
– लोकसभा में विपक्ष के नेता
– भारत के मुख्य न्यायाधीश (या उनके द्वारा नामित न्यायाधीश)
– एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता
कार्यकाल • पद ग्रहण की तिथि से 5 वर्ष
• या 70 वर्ष की आयु तक
• जो भी पहले हो
लोकपाल का अधिकार क्षेत्र • भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच, जिनके विरुद्ध:
– प्रधानमंत्री
– केंद्रीय मंत्री
– संसद सदस्य
– केंद्रीय सरकारी अधिकारी (समूह A, B, C और D)• इसके अतिरिक्त शामिल:
– संसद द्वारा स्थापित या केंद्र/राज्य सरकार से पूर्ण या आंशिक रूप से वित्तपोषित बोर्ड, निगम, सोसायटी, ट्रस्ट एवं स्वायत्त निकायों के अध्यक्ष, सदस्य, अधिकारी एवं निदेशक
– ₹10 लाख से अधिक विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाले निकाय

मारिया मचाडो ने ट्रंप को सौंप दिया शांति पुरस्कार, क्या ये अवॉर्ड ट्रांसफर किया जा सकता है?

वेनेज़ुएला की विपक्षी नेता मारिया मचाडो को 2025 का नोबेल शांति पुरस्कार मिला था। अब ये पुरस्कार अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के पास है। मारिया ने खुद उनके घर जाकर उन्हें ये पुरस्कार दिया है। 15 जनवरी को जब मारिया ट्रंप से मिलकर वॉइटहाउस के बाहर निकलीं तो उन्होंने ट्रंप को पीस प्राइज का सही हकदार बताया और अपना नोबेल उन्हें सौंप दिया। लेकिन क्या नोबेल पुरस्कार ट्रांसफर किया जा सकता है?

क्यों चर्चा में है?

जनवरी 2026 में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेज़ुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरिना माचाडो से सार्वजनिक रूप से नोबेल शांति पुरस्कार का पदक स्वीकार किया। यह इतिहास में पहली बार हुआ जब किसी नोबेल पुरस्कार विजेता ने स्वेच्छा से अपना पदक किसी अन्य व्यक्ति को सौंपा, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक बहस शुरू हो गई।

व्हाइट हाउस में वास्तव में क्या हुआ?

  • व्हाइट हाउस में हुई एक बैठक के दौरान मारिया कोरिना माचाडो ने अपना नोबेल शांति पुरस्कार पदक ट्रंप को सौंप दिया और वहीं छोड़ दिया। उन्होंने इस कदम को वेनेज़ुएला के लोगों की स्वतंत्रता के समर्थन में ट्रंप की भूमिका की मान्यता बताया।
  • डोनाल्ड ट्रंप ने पदक के साथ तस्वीरें खिंचवाईं और सार्वजनिक रूप से उनका धन्यवाद करते हुए इसे “आपसी सम्मान का प्रतीक” बताया।
  • यह घटना इसलिए भी वैश्विक ध्यान का केंद्र बनी क्योंकि ट्रंप लंबे समय से नोबेल शांति पुरस्कार पाने की इच्छा जाहिर करते रहे हैं।

नोबेल प्राधिकरणों की आधिकारिक स्थिति

  • मारिया कोरिना माचाडो की यात्रा से कुछ दिन पहले ही नॉर्वेजियन नोबेल संस्थान ने इस मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी थी।
  • संस्थान ने दोहराया कि नोबेल शांति पुरस्कार को किसी अन्य व्यक्ति को स्थानांतरित, साझा या वापस नहीं किया जा सकता, चाहे पुरस्कार विजेता व्यक्तिगत रूप से ऐसा कोई प्रतीकात्मक कदम क्यों न उठाए।
  • नोबेल फाउंडेशन के नियमों (Statutes) के अनुसार, एक बार नोबेल पुरस्कार प्रदान हो जाने के बाद वह अंतिम और स्थायी होता है, और उसमें किसी भी प्रकार के पुनःआवंटन या अपील की कोई व्यवस्था नहीं है।

क्या नोबेल शांति पुरस्कार कानूनी रूप से स्थानांतरित किया जा सकता है?

  • इसका स्पष्ट उत्तर है — नहीं। हालाँकि भौतिक पदक (मेडल) को एक व्यक्तिगत वस्तु की तरह किसी को उपहार में दिया जा सकता है, लेकिन नोबेल पुरस्कार विजेता (Nobel Laureate) होने की आधिकारिक मान्यता कभी भी स्थानांतरित नहीं की जा सकती।
  • इसका अर्थ यह है कि पदक स्वीकार करने से डोनाल्ड ट्रंप नोबेल शांति पुरस्कार विजेता नहीं बनते, और मारिया कोरिना माचाडो ही इसकी एकमात्र आधिकारिक विजेता बनी रहती हैं।
  • नोबेल समितियों ने यह भी स्पष्ट किया है कि पुरस्कार समारोह के बाद विजेता अपने पदक का कैसे उपयोग करते हैं या उसे कैसे प्रदर्शित करते हैं, इस पर वे कोई टिप्पणी नहीं करतीं।

माचाडो ने अपना पदक ट्रंप को क्यों दिया?

  • माचाडो ने स्पष्ट किया कि यह कदम पूरी तरह प्रतीकात्मक था। उनके अनुसार, यह इशारा वेनेजुएला की लोकतांत्रिक स्वतंत्रता के प्रति डोनाल्ड ट्रंप की प्रतिबद्धता को स्वीकार करने के लिए किया गया, विशेष रूप से राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को सत्ता से हटाए जाने के बाद।
  • उन्होंने इसे राजनीतिक कृतज्ञता का प्रतीक बताया, न कि नोबेल शांति पुरस्कार के किसी कानूनी हस्तांतरण के रूप में।

वैश्विक और कूटनीतिक महत्व

  • हालाँकि नोबेल पुरस्कार के नियमों के अनुसार इस कदम का कोई कानूनी महत्व नहीं है, लेकिन इसका प्रतीकात्मक और राजनीतिक प्रभाव अवश्य है।
  • इस घटना ने नोबेल शांति पुरस्कार की प्रतिष्ठा, वैश्विक पुरस्कारों के राजनीतिकरण, और इस बात पर नई बहस छेड़ दी है कि किस प्रकार किसी पुरस्कार विजेता के व्यक्तिगत कदम कानूनी वास्तविकताओं को बदले बिना भी अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक विवाद को जन्म दे सकते हैं।

 

भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 392 मिलियन डॉलर बढ़कर 687 बिलियन डॉलर हुआ

भारत के बाह्य क्षेत्र (External Sector) में जनवरी 2026 के मध्य में स्थिरता देखने को मिली, जब देश के विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) में हल्की वृद्धि दर्ज की गई। रिज़र्व बैंक द्वारा जारी साप्ताहिक आँकड़ों के अनुसार, विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों में गिरावट के बावजूद सोने के भंडार में तेज़ बढ़ोतरी के कारण कुल भंडार में इज़ाफ़ा हुआ।

समाचार में क्यों?

रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के अनुसार, 9 जनवरी 2026 को समाप्त सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 392 मिलियन डॉलर बढ़कर 687.19 अरब डॉलर हो गया।

विदेशी मुद्रा भंडार का समग्र रुझान

  • यह बढ़ोतरी पिछले सप्ताह आई तेज़ गिरावट के बाद दर्ज की गई है, जब कुल भंडार 9.809 अरब डॉलर घटकर 686.80 अरब डॉलर रह गया था।
  • नवीनतम आँकड़े आंशिक सुधार को दर्शाते हैं और यह स्पष्ट करते हैं कि विदेशी मुद्रा भंडार में साप्ताहिक उतार-चढ़ाव मुद्रा विनिमय दरों, परिसंपत्तियों के मूल्यांकन और सोने की कीमतों से प्रभावित होता है।
  • भारत विश्व के सबसे बड़े विदेशी मुद्रा भंडार रखने वाले देशों में शामिल है, जो बाहरी झटकों से निपटने की उसकी क्षमता को मज़बूत करता है।

विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियाँ (FCA): मिश्रित स्थिति

  • 9 जनवरी को समाप्त सप्ताह में विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियाँ 1.124 अरब डॉलर घटकर 550.866 अरब डॉलर रह गईं।
  • FCA में अमेरिकी डॉलर, यूरो, पाउंड स्टर्लिंग और जापानी येन जैसी प्रमुख विदेशी मुद्राओं में रखी गई परिसंपत्तियाँ शामिल होती हैं।
  • इनमें बदलाव केवल वास्तविक प्रवाह (इनफ्लो-आउटफ्लो) से ही नहीं, बल्कि गैर-अमेरिकी मुद्राओं की विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव से भी होता है।

सोने के भंडार से मिला बड़ा सहारा

  • कुल भंडार में वृद्धि का सबसे बड़ा कारण सोने के भंडार में तेज़ उछाल रहा।
  • इस अवधि में भारत का स्वर्ण भंडार 1.568 अरब डॉलर बढ़कर 112.83 अरब डॉलर हो गया।
  • यह बढ़ोतरी अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में सोने की कीमतों में वृद्धि को दर्शाती है और RBI की विविधीकृत भंडार रणनीति को रेखांकित करती है।
  • सोना मुद्रा अस्थिरता और वैश्विक वित्तीय अनिश्चितताओं के खिलाफ एक प्रभावी सुरक्षा कवच माना जाता है।

SDR और IMF में भारत की स्थिति

  • भारत के विशेष आहरण अधिकार (SDR) भंडार में मामूली गिरावट दर्ज की गई और यह 39 मिलियन डॉलर घटकर 18.739 अरब डॉलर रह गया।
  • SDR अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) द्वारा निर्मित एक अंतरराष्ट्रीय रिज़र्व परिसंपत्ति है।
  • इसके अलावा, IMF में भारत की रिज़र्व स्थिति 13 मिलियन डॉलर घटकर 4.758 अरब डॉलर हो गई।

विदेशी मुद्रा भंडार के घटक

भारत का विदेशी मुद्रा भंडार चार प्रमुख घटकों से बना होता है—

  • विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियाँ (FCA), स्वर्ण भंडार, विशेष आहरण अधिकार (SDR), और IMF में रिज़र्व स्थिति।
  • इनमें होने वाले बदलाव व्यापार संतुलन, पूंजी प्रवाह, मूल्यांकन प्रभाव और RBI के बाज़ार हस्तक्षेप पर निर्भर करते हैं।

आर्यन वार्ष्णेय भारत के 92वें शतरंज ग्रैंडमास्टर बने

भारत की विश्व शतरंज में बढ़ती ताकत को एक और बड़ी उपलब्धि मिली है। दिल्ली के युवा शतरंज खिलाड़ी आर्यन वर्शनेय ने आर्मेनिया में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में शानदार प्रदर्शन करते हुए ग्रैंडमास्टर (GM) खिताब हासिल किया। उनकी यह उपलब्धि भारत में उभरते युवा शतरंज खिलाड़ियों की मजबूत पीढ़ी और वैश्विक स्तर पर देश के बढ़ते प्रभुत्व को दर्शाती है।

समाचार में क्यों?

भारतीय शतरंज खिलाड़ी आर्यन वर्शनेय आर्मेनिया में आयोजित अंद्रानिक मार्गरयान मेमोरियल टूर्नामेंट में अपना अंतिम GM नॉर्म हासिल कर भारत के 92वें ग्रैंडमास्टर बन गए।

आर्मेनिया में ऐतिहासिक उपलब्धि

  • आर्यन वर्शनेय ने एक राउंड शेष रहते ही अंद्रानिक मार्गरयान मेमोरियल टूर्नामेंट जीतकर ग्रैंडमास्टर बनने की औपचारिकता पूरी की।
  • 21 वर्षीय वर्शनेय ने आठवें राउंड में FM तिग्रान अंबार्टसुमियन के खिलाफ अहम ड्रॉ खेलकर अपना तीसरा और अंतिम GM नॉर्म सुनिश्चित किया।
  • फाइनल राउंड से पहले ही नॉर्म हासिल करना उनके निरंतरता, आत्मविश्वास और अंतरराष्ट्रीय स्तर की परिपक्वता को दर्शाता है।

ग्रैंडमास्टर बनने की यात्रा

  • ग्रैंडमास्टर खिताब शतरंज का सर्वोच्च सम्मान है, जिसके लिए कई अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में उत्कृष्ट प्रदर्शन आवश्यक होता है।
  • आर्मेनिया में मिली यह सफलता वर्षों की कठोर ट्रेनिंग, नियमित प्रतिस्पर्धा और शीर्ष स्तर के खिलाड़ियों के खिलाफ मजबूत खेल का परिणाम है।
  • यह उपलब्धि भारतीय खिलाड़ियों के लिए उपलब्ध सुव्यवस्थित विकास मार्ग और वैश्विक टूर्नामेंटों में बढ़ती भागीदारी को भी दर्शाती है।

भारतीय शतरंज में दिल्ली का योगदान

  • इस उपलब्धि के साथ आर्यन वर्शनेय दिल्ली से आठवें ग्रैंडमास्टर बन गए।
  • राजधानी से कई शीर्ष खिलाड़ियों का उभरना बेहतर कोचिंग, टूर्नामेंटों की उपलब्धता और मजबूत शतरंज संस्कृति का प्रमाण है।
  • यह वातावरण कम उम्र से ही प्रतिभाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर के लिए तैयार करने में सहायक रहा है।

भारत की बढ़ती ग्रैंडमास्टर सूची

  • भारत आज दुनिया के सबसे तेजी से उभरते शतरंज देशों में शामिल है।
  • 92 ग्रैंडमास्टरों के साथ भारत की अंतरराष्ट्रीय शतरंज में मौजूदगी लगातार मजबूत हो रही है।
  • आर्यन वर्शनेय जैसे युवा खिलाड़ियों का इस सूची में शामिल होना देश की गहरी प्रतिभा, जमीनी स्तर के विकास कार्यक्रमों और अकादमियों की सफलता को दर्शाता है।

ग्रैंडमास्टर खिताब क्या है?

  • ग्रैंडमास्टर (GM) खिताब अंतरराष्ट्रीय शतरंज महासंघ (FIDE) द्वारा दिया जाता है।
  • इसके लिए खिलाड़ियों को तीन GM नॉर्म हासिल करने और न्यूनतम निर्धारित Elo रेटिंग पार करनी होती है, जिससे यह खेल जगत के सबसे कठिन और प्रतिष्ठित खिताबों में से एक माना जाता है।

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