डिजिटल Census 2027: अब खुद करें जनगणना, मोबाइल ऐप से होगा रजिस्ट्रेशन

भारत ने आधिकारिक तौर पर जनगणना 2027 की प्रक्रिया शुरू कर दी है। यह एक ऐतिहासिक कदम है, क्योंकि देश अपनी पहली डिजिटल जनगणना करने जा रहा है। जनगणना की यह विशाल प्रक्रिया पूरे देश में एक साथ आज से शुरू होगी। इसमें मोबाइल एप्लिकेशन और ऑनलाइन स्व-गणना (self-enumeration) का उपयोग किया जाएगा, जिससे डेटा संग्रह की प्रक्रिया अधिक तेज़ और पारदर्शी बनेगी। यह भारत की 16वीं जनगणना है और स्वतंत्रता के बाद की आठवीं जनगणना है; साथ ही, इसमें कई नई विशेषताएं भी शामिल की गई हैं, जो एक नया कीर्तिमान स्थापित करेंगी।

कितने सालों बाद जातिगत जनगणना होगी?

पहले चरण में हाउस लिस्टिंग होगी, यानी मकानों और घरों से जुड़ी जानकारी जुटाई जाएगी। इसके बाद दूसरा चरण जनसंख्या गणना का होगा, जोकि फरवरी 2027 में शुरू होगा!एक और अहम बात। आजादी के बाद पहली बार जनगणना में जाति से जुड़ा डेटा भी जुटाया जाएगा। इससे पहले ऐसा साल 1931 की जनगणना में हुआ था।

डिजिटल युग में जनगणना 2027 की शुरुआत

जनगणना 2027 की शुरुआत इस बात का संकेत है कि भारत जिस तरह से जनसांख्यिकीय डेटा इकट्ठा और प्रबंधित करता है, उसमें एक बड़ा बदलाव आने वाला है।

पहली बार, जनगणना करने वाले पारंपरिक कागज़ी तरीकों के बजाय स्मार्टफोन-आधारित मोबाइल एप्लिकेशन का उपयोग करेंगे।

इस डिजिटल बदलाव से सटीकता और कार्यक्षमता में सुधार होने, साथ ही डेटा प्रोसेसिंग में होने वाली देरी कम होने की उम्मीद है। इसके अलावा, यह रियल-टाइम मॉनिटरिंग भी सुनिश्चित करेगा।

इसके अतिरिक्त, नागरिकों के पास अब ‘सेल्फ-एन्यूमरेशन पोर्टल’ के माध्यम से भाग लेने का विकल्प भी उपलब्ध है; भारत की जनगणना के इतिहास में यह सुविधा पहले कभी शुरू नहीं की गई थी।

क्‍या है जनगणना 2027 की प्रक्रिया?

इस बार लोगों को एक नया विकल्प भी दिया गया है, जिसका नाम है- सेल्फ एन्यूमरेशन (स्व-गणना) यानी चाहें तो आप स्वंय भी अपने घर की जानकारी ऑनलाइन भर सकते हैं। इसके लिए पोर्टल se.census.gov.in पर जाना होगा।

  • बता दें कि प्रक्रिया ज्यादा जटिल नहीं है। पहले लॉगिन कर राज्य चुनना होगा और कैप्चा भरना होगा।
  • फिर घर के मुखिया का नाम तथा मोबाइल नंबर डालकर रजिस्ट्रेशन करना होगा।
  • इसके बाद 16 भाषाओं में से किसी एक भाषा चुननी होगी और OTP से वेरिफिकेशन (Verification) करना होगा।
  • फिर जिला या शहर की जानकारी भरकर मैप पर दिख रहे लाल मार्कर को अपने घर की सही लोकेशन पर सेट करना होगा।
  • इसके बाद हाउस लिस्टिंग से जुड़े 33 सवालों के जवाब देने होंगे।
  • सभी जानकारी भरने के बाद डेटा का प्रीव्यू देखा जा सकेगा। संतुष्ट होने पर फाइनल सबमिट करना होगा।

सबमिट करते ही स्क्रीन पर SE ID दिखाई देगी। यही आईडी बाद में जनगणना कर्मी को दिखानी होगी ताकि आपका डेटा सत्यापित किया जा सके।

जनगणना 2027 के दो चरण

जनगणना दो व्यवस्थित चरणों में आयोजित की जाएगी, ताकि व्यापक डेटा संग्रह सुनिश्चित किया जा सके।

चरण I: मकानों की सूची बनाना और आवास जनगणना (HLO)

यह पहला चरण अप्रैल से सितंबर 2026 तक चलेगा। इसका मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित से संबंधित डेटा एकत्र करना होगा:

  • आवास की स्थितियाँ
  • सुविधाओं की उपलब्धता
  • घरेलू संपत्ति

इसके अलावा, गणनाकारों के घर-घर जाकर दौरे शुरू करने से पहले, 15 दिनों की ‘स्व-गणना’ (self-enumeration) की सुविधा भी प्रदान की जाएगी।

चरण II: जनसंख्या गणना

यह चरण फरवरी 2027 के लिए निर्धारित है, और इस चरण में व्यक्तिगत स्तर पर विस्तृत डेटा एकत्र किया जाएगा, जैसे कि:

  • जनसांख्यिकी (Demographics)
  • शिक्षा
  • प्रवासन के पैटर्न
  • प्रजनन संबंधी विवरण

मुख्य तारीखें और क्षेत्रीय विविधताएँ जिनके बारे में आपको पता होना चाहिए

  • भारत के अधिकांश क्षेत्रों के लिए जनगणना 2027 की संदर्भ तिथि 1 मार्च, 2027 (00:00 बजे) है।
  • इसके अलावा, लद्दाख, जम्मू और कश्मीर, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे बर्फ़ से ढके और दुर्गम क्षेत्रों के लिए यह तिथि 1 अक्टूबर, 2026 है।
  • जनगणना प्रक्रिया के सुचारू संचालन को सुनिश्चित करने के लिए, विभिन्न राज्यों को मकानों की सूची बनाने हेतु विशेष समय-सीमाएँ निर्धारित की गई हैं।

स्व-गणना: भारत के लिए एक नई पहल

जनगणना 2027 की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक ‘स्व-गणना’ (Self-enumeration) की शुरुआत है।

अब नागरिक ये काम कर सकते हैं:

  • अपनी जनगणना से जुड़ी जानकारी ऑनलाइन भर सकते हैं।
  • साथ ही, गणना करने वालों का इंतज़ार करने से भी बच सकते हैं।
  • खुद जानकारी दर्ज करके डेटा की सटीकता सुनिश्चित कर सकते हैं।

यह पोर्टल और मोबाइल ऐप 16 भाषाओं में उपलब्ध होगा, जिससे भारत की विविध आबादी तक इसकी पहुँच सुनिश्चित हो सकेगी।

भारत के चिप उद्योग को बड़ा बढ़ावा: गुजरात में Kaynes प्लांट लॉन्च

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 31 मार्च, 2026 को गुजरात के सानंद में केन्स सेमीकॉन (Kaynes Semicon) प्लांट का उद्घाटन किया। यह उद्घाटन सेमीकंडक्टर निर्माण के क्षेत्र में भारत की बढ़ती ताकत और वैश्विक तकनीकी नेतृत्व बनने की उसकी महत्वाकांक्षा का प्रतीक है। इस सुविधा केंद्र में अब उन उन्नत घटकों का उत्पादन शुरू हो गया है, जो इलेक्ट्रिक वाहनों और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे उद्योगों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

केन्स सेमीकॉन का उद्घाटन

Kaynes Technology के सेमीकंडक्टर प्लांट के उद्घाटन के बाद, कंपनी द्वारा घरेलू चिप उत्पादन शुरू कर दिया जाएगा। यह प्लांट गुजरात के सानंद में स्थित है, और यह सुविधा भारत की एक व्यापक योजना का हिस्सा है जिसका उद्देश्य एक मज़बूत सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम का निर्माण करना है।

प्रधानमंत्री ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि यह कोई अलग-थलग घटनाक्रम नहीं है, बल्कि यह तेज़ी से बढ़ रहे सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम का एक हिस्सा है, और साथ ही पूरे देश में कई परियोजनाएँ चल रही हैं।

यह प्लांट भारत को वैश्विक सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन में एक भरोसेमंद साझेदार के तौर पर स्थापित करेगा और आयात पर निर्भरता को कम करने में भी मदद करेगा।

‘Make in India’ और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को बढ़ावा

Kaynes की यह सुविधा ‘Make in India, Make for the World’ की सोच के तहत बनाई गई है। इसके उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा पहले से ही वैश्विक बाजारों से जुड़ा हुआ है, और इसमें संयुक्त राज्य अमेरिका की कंपनियों के साथ की गई साझेदारियां भी शामिल हैं।

मुख्य आकर्षणों में शामिल हैं:

  • वैश्विक कंपनियों को इंटेलिजेंट पावर मॉड्यूल्स (IPMs) की आपूर्ति
  • साथ ही, निर्यात की प्रबल क्षमता जो भारत को सिलिकॉन वैली की आपूर्ति श्रृंखलाओं से जोड़ती है
  • और वैश्विक सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम में एकीकरण

EVs और भविष्य की तकनीकों को शक्ति प्रदान करना

इस प्लांट में बनने वाले सेमीकंडक्टर कंपोनेंट्स—और विशेष रूप से इंटेलिजेंट पावर मॉड्यूल्स—उभरती हुई तकनीकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।

ये मॉड्यूल्स निम्नलिखित को सहायता प्रदान करेंगे:

  • इलेक्ट्रिक वाहन (EVs) और उनकी सतत गतिशीलता
  • औद्योगिक स्वचालन और भारी मशीनरी
  • साथ ही, उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स और ऊर्जा-कुशल प्रणालियाँ

इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन

प्रधानमंत्री ने इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन के महत्व पर भी ज़ोर दिया, जिसे 2021 में शुरू किया गया था।

इस मिशन का उद्देश्य है:

  • पूरा सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम विकसित करना
  • घरेलू मैन्युफैक्चरिंग और डिज़ाइन क्षमताओं को बढ़ावा देना
  • साथ ही, ग्लोबल चिप इंपोर्ट पर निर्भरता कम करना

अभी भारत में कई राज्यों में ₹1.6 लाख करोड़ से ज़्यादा की लागत वाली परियोजनाएँ चल रही हैं, और यह भविष्य के इकोसिस्टम के प्रति देश की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 और वर्कफ़ोर्स डेवलपमेंट

इसके अलावा, भारत अब सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 के साथ अगले चरण की ओर बढ़ रहा है। इसका मुख्य फ़ोकस एक पूरी सप्लाई चेन बनाने पर होगा, जिसमें मटीरियल और इक्विपमेंट भी शामिल होंगे।

सरकार टैलेंट डेवलपमेंट में भी निवेश कर रही है,

  • जिसका लक्ष्य 85,000 सेमीकंडक्टर प्रोफेशनल्स को ट्रेनिंग देना है।
  • साथ ही, ‘चिप्स टू स्टार्टअप’ प्रोग्राम के ज़रिए स्टार्टअप्स को सपोर्ट देना भी इसका लक्ष्य है।
  • इसके अलावा, 400 से ज़्यादा यूनिवर्सिटीज़ और इनोवेटर्स की भागीदारी भी इसमें शामिल है।

उत्कल दिवस 2026: ओडिशा के गठन की कहानी और इसका महत्व

उत्कल दिवस 2026, 1 अप्रैल 2026 को मनाया जा रहा है। यह दिन वर्ष 1936 में एक अलग प्रांत के रूप में ओडिशा के गठन का प्रतीक है। यह ऐतिहासिक दिन उन नेताओं के दृष्टिकोण और प्रयासों का सम्मान करता है, जिन्होंने ओडिया भाषा, संस्कृति और पहचान को संरक्षित करने के लिए संघर्ष किया। इसे ‘ओडिशा स्थापना दिवस’ के रूप में भी जाना जाता है, और यह अवसर जीवंत समारोहों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों तथा विभिन्न सार्वजनिक आयोजनों के माध्यम से गौरव, एकता और विरासत को प्रदर्शित करता है।

ओडिशा का जन्म: भारत का पहला भाषाई राज्य

भारतीय इतिहास में ओडिशा राज्य का एक अत्यंत विशिष्ट स्थान है, क्योंकि यह पहला ऐसा राज्य है जिसका गठन भाषाई आधार पर किया गया था। 1 अप्रैल, 1936 को ओड़िया-भाषी क्षेत्रों को एकजुट करने के उद्देश्य से इस राज्य को एक पृथक प्रांत के रूप में गठित किया गया था।

यह ऐतिहासिक उपलब्धि दशकों के उस संघर्ष के कारण संभव हो पाई, जिसका नेतृत्व मधुसूदन दास और गोपबंधु दास जैसे दूरदर्शी नेताओं ने किया था।

उनके प्रयासों ने यह सुनिश्चित किया कि औपनिवेशिक शासन के दौरान ओडिया भाषा और उसकी पहचान पर कोई आंच न आए।

शुरुआत में, इस नए प्रांत में केवल छह जिले शामिल थे—कटक, पुरी, बालेश्वर, संबलपुर, कोरापुट और गंजाम—और इसी के साथ, आधुनिक ओडिशा की नींव रखी गई।

ऐतिहासिक यात्रा: कलिंग से औपनिवेशिक संघर्षों तक

जिस राज्य को आज ओडिशा के नाम से जाना जाता है, उसे एक समय ‘कलिंग’ कहा जाता था। कलिंग प्राचीन भारत का एक शक्तिशाली और समृद्ध साम्राज्य था। 261 ईसा पूर्व में हुआ प्रसिद्ध कलिंग युद्ध सम्राट अशोक के जीवन में एक बड़ा परिवर्तन लेकर आया, और उन्हें शांति तथा बौद्ध धर्म की ओर अग्रसर किया।

मध्यकालीन और औपनिवेशिक काल के दौरान ओडिशा को भी विखंडन का सामना करना पड़ा। 1568 में राजा मुकुंद देव के पतन के बाद, यह क्षेत्र मुगलों, मराठों और फिर अंग्रेजों के नियंत्रण में आ गया।

ब्रिटिश शासन के दौरान, ओड़िया भाषी क्षेत्र अलग-अलग प्रांतों में बँटे हुए थे, जिससे भाषा और संस्कृति के अस्तित्व को भी खतरा पैदा हो गया था। इसके परिणामस्वरूप, एक एकीकृत भाषाई राज्य की ज़ोरदार माँग उठी। और अंततः, 1936 में उन्हें इसमें सफलता मिल गई।

ओडिशा राज्य के दर्जे के लिए आंदोलन: पहचान की लड़ाई

  • अलग ओडिशा राज्य की मांग ने 19वीं सदी के आखिर और 20वीं सदी की शुरुआत में ज़ोर पकड़ा।
  • 1903 में ‘उत्कल सम्मेलनी’ का गठन हुआ, जिसका नेतृत्व मधुसूदन दास ने किया; उन्होंने जनता का समर्थन जुटाने में अहम भूमिका निभाई।
  • कई नेताओं ने यह तर्क दिया है कि भाषा ही पहचान और शासन की नींव है, और उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि एक अलग प्रांत के बिना ओडिया भाषा के लुप्त होने का खतरा है।
  • सुधारकों, बुद्धिजीवियों और नागरिकों के निरंतर और कठिन प्रयासों के फलस्वरूप ही अंततः ओडिशा का निर्माण संभव हो पाया।

उत्कल दिवस का महत्व

उत्कल दिवस केवल एक ऐतिहासिक घटना ही नहीं है, बल्कि आज के भारत में भी इसका गहरा महत्व बना हुआ है।

यह निम्नलिखित बातों का प्रतिनिधित्व करता है:

  • ओडिया भाषा और विरासत पर गर्व
  • नेताओं और सुधारकों को श्रद्धांजलि
  • ओडिशा की विकास यात्रा पर चिंतन
  • सांस्कृतिक एकता को बढ़ावा

ओडिशा के बारे में: संस्कृति, विरासत और पहचान

ओडिशा भारत के सबसे अधिक सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राज्यों में से एक है, और यह अपनी गहरी ऐतिहासिक जड़ों और जीवंत परंपराओं के लिए जाना जाता है।

ओडिशा के बारे में मुख्य तथ्य इस प्रकार हैं:

  • राजधानी: भुवनेश्वर
  • इसके लिए प्रसिद्ध: जगन्नाथ मंदिर (पुरी) और कोणार्क सूर्य मंदिर
  • शास्त्रीय नृत्य शैली: ओडिसी
  • बंगाल की खाड़ी के किनारे पूर्वी तट पर स्थित

पूरे ओडिशा में उत्कल दिवस कैसे मनाया जाता है

यह दिन पूरे राज्य में, और विशेष रूप से भुवनेश्वर और कटक जैसे शहरों में, बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है।

आमतौर पर समारोहों में ये शामिल होते हैं:

  • ओडिसी नृत्य और संगीत जैसी सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ
  • सार्वजनिक कार्यक्रम और परेड
  • नेताओं को संबोधित भाषण और श्रद्धांजलि
  • स्कूलों में प्रतियोगिताएँ, प्रदर्शनियाँ और कॉलेजों में कार्यक्रम

क्यों कुछ लोगों को ज्यादा काटते हैं मच्छर? जानिए ब्लड ग्रुप और जेनेटिक्स का असर

हमेशा देखा जाता है कि मच्छर गर्मियों और बरसात के मौसम में खासा परेशान करते हैं। मगर इनमें भी मच्छर कुछ लोगों को बेहद ज्यादा परेशान करते हैं। मच्छरों के काटने से हम सभी परेशान रहते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर ये मच्छर तय कैसे करते हैं कि किसे काटना है? हाल ही में हुई एक नई स्टडी में वैज्ञानिकों ने इस रहस्य से पर्दा उठाया है। उन्होंने पाया कि मच्छर किसी एक इंसान को यूं ही नहीं चुनते, बल्कि कई संकेतों को मिलाकर अपना टारगेट तय करते हैं। इस रिसर्च में सैकड़ों मच्छरों को ट्रैक किया गया और लाखों डेटा पॉइंट्स का एनालिसिस किया गया। नतीजों से पता चला कि मच्छर बेहद स्मार्ट तरीके से इंसानों को पहचानते और उन तक पहुंचते हैं।

मच्छर एक साथ कई संकेतों का इस्तेमाल

साइंस एडवांसेस में छपी स्टडी में वैज्ञानिकों ने पाया कि मच्छर एक साथ कई संकेतों का इस्तेमाल करते हैं, जैसे कि हमारी सांस से निकलने वाला कार्बन डाइऑक्साइड, शरीर की गंध और हमारे कपड़ों का रंग। खासतौर पर मादा एडीस एजिप्टी मच्छर (जो डेंगू तथा येलो फीवर फैलाते हैं) इस मामले में ज्यादा एक्टिव पाए गए. 3D इंफ्रारेड कैमरों की सहायता से यह देखा गया कि मच्छर कैसे इन संकेतों के आधार पर उड़ान भरते हैं और इंसान तक पहुंचते हैं।

रिसर्च के मुताबिक, हर मच्छर खुद ही फैसला लेता है, वो किसी दूसरे मच्छर को फॉलो नहीं करता। वैज्ञानिकों ने इसे एक भीड़ भरे बार की तरह समझाया, जैसे लोग एक ही जगह इसलिए आते हैं क्योंकि वहां अच्छा माहौल होता है, वैसे ही मच्छर भी एक ही इंसान की ओर आकर्षित होते हैं। यानी मच्छर एक-दूसरे के पीछे नहीं चलते, बल्कि एक जैसे संकेतों की तरफ खिंचते हैं।

कपड़ों का रंग मच्छरों को आकर्षित

स्टडी में यह भी पाया गया कि इंसान के कपड़ों का रंग मच्छरों को आकर्षित कर सकता है। जब रिसर्च में शामिल व्यक्ति के कपड़ों का रंग बदला गया, तो मच्छरों के व्यवहार में भी बदलाव देखने को मिला।

ब्लड ग्रुप O वाले लोगों की तरफ आकर्षित

वैज्ञानिक शोध बताते हैं मच्छर सबसे ज्यादा ब्लड ग्रुप O वाले लोगों की तरफ आकर्षित होते हैं। शोध बताता है कि इन पर काटने की संभावना A या B ग्रुप वालों की तुलना में ज्यादा होती है। रिसर्च के अनुसार ब्लड ग्रुप A वाले लोगों को मच्छर कम काटते हैं। यानी यह ग्रुप कुछ हद तक ‘कम पसंदीदा’ माना जाता है। मच्छर उन लोगों की तरफ ज्यादा आकर्षित होते हैं जो ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं। जैसे भारी शरीर वाले या ज्यादा सांस लेने वाले लोगों की तरफ आकर्षित होते हैं। पसीने में मौजूद लैक्टिक एसिड और अन्य केमिकल्स मच्छरों को आकर्षित करते हैं। इसलिए ज्यादा पसीना आने वाले लोग ज्यादा शिकार बनते हैं।

क्यों है यह रिसर्च इतनी जरूरी?

मच्छर कई खतरनाक बीमारियां फैलाते हैं, जैसे मलेरिया, येलो फीवर और जीका वायरस। हर साल दुनियाभर में 7 लाख से ज्यादा लोगों की मौत इन बीमारियों से होती है।

दिवाला समाधान में तेजी: भारत ने IBC संशोधन विधेयक 2026 को दी मंजूरी

भारत की वित्तीय प्रणाली को मज़बूत करने के लिए, लोकसभा ने 30 मार्च, 2026 को इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (संशोधन) विधेयक पारित किया है। इस सुधार का उद्देश्य इन्सॉल्वेंसी समाधानों में तेज़ी लाना, देरी को कम करना और लेनदारों का विश्वास बढ़ाना है। इस घोषणा के दौरान, निर्मला सीतारमण ने अपने भाषण में इस बात पर ज़ोर दिया कि IBC ने पहले ही 1,376 से ज़्यादा कंपनियों के मामलों को सुलझाने में मदद की है, जिससे ₹4.11 लाख करोड़ की वसूली हुई है।

IBC संशोधन विधेयक 2026 की मुख्य बातें

  • इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) को देरी को दूर करने और कार्यक्षमता में सुधार लाने के उद्देश्य से महत्वपूर्ण रूप से अपडेट किया गया है।
  • ये नवीनतम संशोधन बैंकों की इन्सॉल्वेंसी प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने के लिए संरचनात्मक बदलाव लाने हेतु पेश किए गए हैं।
  • सबसे ज़रूरी नियमों में से एक यह है कि डिफ़ॉल्ट साबित होने के 14 दिनों के अंदर इन्सॉल्वेंसी एप्लीकेशन को ज़रूरी तौर पर मंज़ूरी दी जाए।
  • इस कदम का मकसद गैर-ज़रूरी देरी को कम करना है, जिससे पहले से ही समाधान की प्रक्रिया धीमी हो गई है।

नया ढांचा: लेनदार-संचालित दिवालियापन मॉडल

इस संशोधन द्वारा लाया गया मुख्य बदलाव लेनदार-शुरू दिवालियापन ढांचे की ओर बढ़ना है। यह मॉडल लेनदारों को अधिक नियंत्रण प्रदान करता है, साथ ही देनदारों के अधिकारों के साथ संतुलन भी बनाए रखता है।

नई प्रणाली में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • अदालत के बाहर निपटान के तंत्र
  • देनदार-के-कब्ज़े वाला मॉडल
  • लेनदार-के-नियंत्रण वाला दृष्टिकोण

इन बदलावों से यह उम्मीद की जाती है कि ये इस प्रक्रिया को अधिक कुशल बनाएंगे, इसमें मुकदमों का बोझ कम करेंगे और इसे व्यापार-अनुकूल बनाएंगे।

गति, पारदर्शिता और मुकदमों में कमी पर ज़ोर

IBC के तहत सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक देरी रही है, जो अत्यधिक मुकदमों के कारण होती है। इस संशोधन ने समय-सीमा को सख्त करके और सुरक्षा उपाय लागू करके इस समस्या का सीधे तौर पर समाधान किया है।

मुख्य सुधारों में शामिल हैं:

  • मामलों को स्वीकार करने की तेज़ प्रक्रिया (14 दिनों के भीतर)
  • साथ ही, दिवालियापन की कार्यवाही के दुरुपयोग को रोकने के उपाय
  • और कानूनी अड़चनों को कम करने के लिए प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करना

ग्रुप और सीमा-पार दिवालियापन के प्रावधान लागू किए गए

पहली बार, इस संशोधन में ग्रुप दिवालियापन और सीमा-पार दिवालियापन के लिए सक्षम प्रावधान पेश किए गए हैं।

इसका मतलब है कि:

  • कंपनियां कई देशों में काम कर रही हैं, और अब उन्हें ज़्यादा कुशलता से संभाला जा सकता है।
  • ग्रुप कंपनियां समन्वित समाधान प्रक्रियाओं से गुज़र सकती हैं।
  • भारत का दिवालियापन ढांचा अब अंतरराष्ट्रीय मानकों के ज़्यादा अनुरूप हो गया है।

ये बदलाव एक वैश्वीकृत अर्थव्यवस्था में बहुत महत्वपूर्ण हैं, जहाँ व्यवसाय अक्सर राष्ट्रीय सीमाओं से बाहर काम करते हैं।

बैंकिंग क्षेत्र और NPA की वसूली पर प्रभाव

IBC ने भारत के बैंकिंग क्षेत्र की स्थिति को बेहतर बनाने में पहले ही एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

सरकार के अनुसार, आधे से अधिक नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPA) का समाधान, समाधान प्रक्रिया के माध्यम से किया जा चुका है।

इस संशोधन से निम्नलिखित की अपेक्षा है:

  • कर्ज़दारों के बीच ऋण अनुशासन को मज़बूत करना
  • बैंकों के लिए वसूली दरों में सुधार करना
  • कंपनियों की क्रेडिट रेटिंग को बेहतर बनाना

श्रमिकों और हितधारकों की सुरक्षा

दिवालियापन के मामलों में मुख्य चिंता श्रमिकों की सुरक्षा है। सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि IBC ढांचे के तहत श्रमिकों के बकाए को प्राथमिकता दी जाएगी।

इससे यह सुनिश्चित होगा कि जब व्यवसाय पुनर्गठन या परिसमापन की प्रक्रिया से गुज़र रहे हों, तब भी कर्मचारियों के हितों से कोई समझौता न हो।

साथ ही, इससे आर्थिक दक्षता और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन भी बना रहेगा।

IBC क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?

इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC), 2016 भारत का मुख्य कानून है, जिसका उद्देश्य कंपनियों, व्यक्तियों और फर्मों की इन्सॉल्वेंसी (दिवालियापन) से जुड़े मामलों को एक तय समय-सीमा के भीतर हल करना है।

IBC के आने से पहले, भारत में इन्सॉल्वेंसी के मामलों को सुलझने में अक्सर कई साल लग जाते थे।

IBC की शुरुआत से एक व्यवस्थित और समय-सीमा के भीतर काम करने वाली समाधान प्रक्रिया बनाने में मदद मिली। साथ ही, इससे बैंकिंग क्षेत्र की स्थिरता में सुधार हुआ और बैड लोन्स (NPAs) का बोझ कम करने में भी सहायता मिली।

IIP डेटा जारी: फरवरी 2026 में भारत का औद्योगिक उत्पादन 5.2% बढ़ा

भारत के औद्योगिक उत्पादन में फरवरी 2026 में 5.2% की वृद्धि दर्ज की गई है। जनवरी के आंकड़ों की तुलना में इसमें थोड़ा सुधार देखने को मिला है। यह वृद्धि मुख्य रूप से विनिर्माण क्षेत्र में आई मज़बूत रिकवरी के कारण हुई है, जो औद्योगिक उत्पादन की रीढ़ माना जाता है। हालाँकि, इस सकारात्मक गति के बावजूद, बिजली और खनन जैसे कुछ क्षेत्रों का प्रदर्शन मिला-जुला रहा है। ये आँकड़े राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा जारी किए गए हैं, और ये वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव तथा कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के संदर्भ में अवसरों और चुनौतियों, दोनों को उजागर करते हैं।

फरवरी 2026 में औद्योगिक विकास दर 5.2% रही

भारत का औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) फरवरी महीने में बढ़कर 5.2% हो गया। यह जनवरी के आंकड़े से थोड़ा ज़्यादा है, जिसे संशोधित करके 5.1% किया गया था।

यह सुधार औद्योगिक गतिविधियों में हो रही धीरे-धीरे रिकवरी को दर्शाता है।

हालाँकि, कुल IIP सूचकांक फरवरी महीने में घटकर 159 रह गया, जबकि जनवरी में यह 169.9 था।

यह सुधार कुछ हद तक मध्यम गति को इंगित करता है।

विनिर्माण क्षेत्र ने विकास की गति को बढ़ाया

विनिर्माण क्षेत्र, जिसका IIP में लगभग 78% योगदान है, ने औद्योगिक उत्पादन को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है।

इसमें साल-दर-साल 6% की वृद्धि भी दर्ज की गई, जो जनवरी के 5.3% के आंकड़े से ज़्यादा है।

यह वृद्धि कई उद्योगों में उत्पादन में हुए सुधार को दर्शाती है।

वित्त वर्ष 26 के पहले 11 महीनों में, मैन्युफैक्चरिंग में 5% की बढ़ोतरी हुई है, जो वित्त वर्ष 25 के 4.1% से ज़्यादा है।

अच्छा प्रदर्शन करने वाले मुख्य सेक्टरों में शामिल हैं:

  • बेसिक मेटल्स
  • मशीनरी और उपकरण
  • मोटर वाहन और परिवहन उपकरण

बिजली और माइनिंग सेक्टर में मिले-जुले रुझान

जहां मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने मज़बूती दिखाई है, वहीं दूसरे सेक्टरों की तस्वीर मिली-जुली रही है।

बिजली उत्पादन में बढ़ोतरी की रफ़्तार धीमी होकर 2.3% पर आ गई है, जो तीन महीने का सबसे निचला स्तर है; जनवरी में यह 5.2% थी।

इस गिरावट की वजह से साल-दर-साल (year-to-date) बढ़ोतरी घटकर सिर्फ़ 1.1% रह गई है, जबकि पिछले साल यह 5% थी।

इसके अलावा, माइनिंग उत्पादन में भी मामूली 3.1% की बढ़ोतरी हुई है, जो जनवरी महीने के 4.3% से कम है।

पूंजीगत वस्तुओं में उछाल निवेश में पुनरुद्धार का संकेत

फरवरी महीने का सबसे उत्साहजनक और महत्वपूर्ण संकेत पूंजीगत वस्तु क्षेत्र में आया भारी उछाल है, जिसमें 12.5% ​​की वृद्धि दर्ज की गई। ये आंकड़े पिछले नौ महीनों में सबसे ऊंचे स्तर पर हैं।

यह उछाल निम्नलिखित बातों का संकेत देता है:

  • निवेश गतिविधियों में वृद्धि
  • उद्योगों का बढ़ा हुआ आत्मविश्वास
  • उत्पादन क्षमता में विस्तार

इसके अतिरिक्त, मध्यवर्ती वस्तुओं में भी 7.7% की वृद्धि हुई है, जो एक स्वस्थ आपूर्ति श्रृंखला (supply chain) गतिविधि को दर्शाती है।

वैश्विक दबाव और बढ़ती लागतें: आगे की प्रमुख चुनौतियाँ

तकनीकी विशेषज्ञों ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, विशेष रूप से पश्चिम एशिया क्षेत्र में, औद्योगिक उत्पादन पर असर डाल रहा है।

चूँकि ऊर्जा की बढ़ती कीमतें और इनपुट लागतें निर्माताओं पर दबाव डाल रही हैं, इसलिए इससे उनके मुनाफ़े के मार्जिन को बनाए रखने की क्षमता सीमित हो रही है।

सभी कंपनियाँ इन लागतों का बोझ उपभोक्ताओं पर नहीं डाल सकतीं, और इसके परिणामस्वरूप विभिन्न उद्योगों में कीमतों को तय करने की शक्ति में असमानता देखने को मिलेगी।

औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) क्या है?

औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) एक प्रमुख आर्थिक संकेतक है जो भारत के औद्योगिक क्षेत्रों के प्रदर्शन को मापता है। इसमें विनिर्माण, खनन और बिजली क्षेत्र भी शामिल हैं।

यह निम्नलिखित कार्यों में भी सहायता करता है:

  • आर्थिक गतिविधियों और विकास के रुझानों पर नज़र रखना
  • नीतिगत निर्णयों और ब्याज दरों को दिशा देना
  • विभिन्न क्षेत्रों के प्रदर्शन को समझना

IIP में वृद्धि औद्योगिक उत्पादन के विस्तार का संकेत देती है।

विज्ञान प्रसार को बढ़ावा: एपी साइंस सिटी और CSIR-NIScPR के बीच 5 साल का MoU

आंध्र प्रदेश साइंस सिटी ने 30 मार्च, 2026 को CSIR-NIScPR के साथ एक रणनीतिक समझौता किया है। इस सहयोग का उद्देश्य पूरे देश में विज्ञान जागरूकता, STEM शिक्षा और नीति अनुसंधान को बढ़ावा देना है। यह साझेदारी वैज्ञानिक सोच की संस्कृति विकसित करने और साक्ष्य-आधारित नीति-निर्माण में सुधार करने पर केंद्रित है।

AP साइंस सिटी-CSIR NIScPR MoU की मुख्य बातें

  • आंध्र प्रदेश साइंस सिटी (SCAP) ने CSIR-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस कम्युनिकेशन एंड पॉलिसी रिसर्च के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं। यह MoU विज्ञान और नवाचार के क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा देगा।
  • इस समझौते का मुख्य उद्देश्य विज्ञान का प्रचार-प्रसार और सहयोगात्मक अनुसंधान है, विशेष रूप से विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार (STI) नीति के क्षेत्र में।
  • इसका मुख्य उद्देश्य साक्ष्य-आधारित नीति-निर्माण को बढ़ावा देना है, जो प्रभावी शासन और विकास रणनीतियों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • यह MoU गैर-वित्तीय प्रकृति का है और यह पाँच वर्षों तक वैध रहेगा; साथ ही, आपसी सहमति के आधार पर इसे आगे बढ़ाने का विकल्प भी उपलब्ध है।

विज्ञान के प्रचार-प्रसार और जन-जागरूकता को सुदृढ़ बनाना

इस साझेदारी का एक मुख्य उद्देश्य विज्ञान संचार को बेहतर बनाना और नागरिकों के बीच जागरूकता बढ़ाना है।

तेज़ी से बदलते इस विश्व में, सोच-समझकर निर्णय लेने के लिए इस प्रकार की वैज्ञानिक साक्षरता अत्यंत आवश्यक है।

इस सहयोग के माध्यम से, दोनों संस्थानों का उद्देश्य है:

  • जनता के बीच वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना
  • साथ ही STEM शिक्षा (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग, गणित) को प्रोत्साहित करना
  • जटिल वैज्ञानिक विचारों को आम लोगों के लिए समझने में आसान बनाना

भारत के वैज्ञानिक इकोसिस्टम में SCAP और CSIR-NIScPR की भूमिका

  • आंध्र प्रदेश साइंस सिटी, जिसका मुख्यालय अमरावती में है, अपनी स्थापना के वर्ष 2016 से ही इनोवेशन, STEM लर्निंग और वैज्ञानिक जिज्ञासा को सक्रिय रूप से बढ़ावा दे रहा है।
  • दूसरी ओर, CSIR-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस कम्युनिकेशन एंड पॉलिसी रिसर्च की स्थापना 2021 में काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च के तहत की गई थी। और इसका मुख्य ध्यान विज्ञान संचार, अनुसंधान और नीतिगत अध्ययनों पर होगा।
  • इनके संयुक्त प्रयास और ताकत वैज्ञानिक अनुसंधान और नीति-निर्माण के बीच की खाई को पाटने में मदद करेंगे।

विज्ञान का लोकव्यापीकरण क्या है?

विज्ञान का लोकव्यापीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा वैज्ञानिक ज्ञान को आम जनता के लिए सुलभ और बोधगम्य बनाया जाता है। इसमें विज्ञान प्रदर्शनियाँ, कार्यशालाएँ, प्रकाशन और डिजिटल माध्यमों से पहुँच बनाने जैसी गतिविधियाँ भी शामिल हैं।

SCAP और CSIR-NIScPR जैसे विभिन्न संस्थान इस मिशन को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, और यह वैज्ञानिकों तथा समाज के बीच की खाई को पाटने में सहायक सिद्ध होगा।

 

डॉ. थॉमस पुकाडिल बने BRIC-NCCS पुणे के नए निदेशक

डॉ. थॉमस पुकाडिल को पुणे स्थित BRIC-NCCS का नया निदेशक नियुक्त किया गया है। वे अपने साथ कोशिका जीव विज्ञान (cell biology) और अनुसंधान नवाचार के क्षेत्र में वर्षों का अनुभव लेकर आएंगे। उनकी यह नियुक्ति अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत इस समय उन्नत बायोमेडिकल अनुसंधान और स्वास्थ्य सेवा समाधानों पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित कर रहा है। यह बदलाव वर्तमान में जारी है, और ऐसी प्रबल अपेक्षाएं हैं कि इसके माध्यम से वैश्विक वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में भारत की स्थिति और अधिक सुदृढ़ होगी।

डॉ. थॉमस पुकाडिल, निदेशक, BRIC-NCCS पुणे

बायोटेक्नोलॉजी रिसर्च इनोवेशन काउंसिल – नेशनल सेंटर फॉर सेल साइंस (BRIC-NCCS), पुणे के निदेशक पद पर थॉमस पुकाडिल को नियुक्त किया गया है।

इससे पहले, उन्होंने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च, पुणे में अपना स्वतंत्र शोध करियर बनाया था। वहाँ उन्होंने जीव विज्ञान विभाग में प्रोफेसर के रूप में कार्य किया।

उनके नेतृत्व से संस्थान की शोध क्षमताओं और नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

अनुसंधान उत्कृष्टता और वैज्ञानिक योगदान

वे झिल्ली की अखंडता (membrane integrity) पर किए गए अपने अनुसंधान के लिए व्यापक रूप से जाने जाते हैं, जो कोशिकाओं में प्रोटीन को बाधित करती है। यह कोशिकीय प्रक्रियाओं और रोगों की कार्यप्रणाली को समझने के क्षेत्र में एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।

उनकी उपलब्धियों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • प्रतिष्ठित ‘शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार’ (2018) के प्राप्तकर्ता
  • ‘इंडियन नेशनल साइंस एकेडमी’ के फेलो
  • ‘इंडियन एकेडमी ऑफ साइंसेज’ के फेलो

NCCS में नेतृत्व परिवर्तन

वह मनीषा इनामदार से कार्यभार संभालेंगे; मनीषा ने अंतरिम निदेशक के रूप में कार्य किया था।

इससे पहले, शर्मिला बापट दिसंबर 2025 तक अतिरिक्त निदेशक के पद पर थीं। यह परिवर्तन संस्थान के लिए एक नए दौर की शुरुआत है, क्योंकि यह जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान नवाचार परिषद (BRIC) के व्यापक लक्ष्यों के अनुरूप है।

NCCS पुणे और इसके मुख्य क्षेत्र

नेशनल सेंटर फॉर सेल साइंस, सावित्रीबाई फुले पुणे यूनिवर्सिटी के कैंपस में स्थित है।

यह भारत के प्रमुख संस्थानों में से एक है, जो आधुनिक जीव विज्ञान के क्षेत्र में उन्नत अनुसंधान के लिए समर्पित है।

NCCS के मुख्य अनुसंधान क्षेत्र

  • कोशिका जीव विज्ञान और कैंसर अनुसंधान
  • संरचनात्मक जीव विज्ञान, बायोइन्फ़ॉर्मेटिक्स और ओमिक्स
  • संक्रामक रोग, प्रतिरक्षा विज्ञान और सूक्ष्मजीव विज्ञान
  • तंत्रिका जीव विज्ञान और स्टेम सेल अनुसंधान

 

 

NASA का Artemis II मिशन: 2026 में फिर चाँद पर मानव की वापसी

NASA एक ऐतिहासिक मील के पत्थर की तैयारी कर रहा है, क्योंकि Artemis II मिशन का लक्ष्य पिछले पाँच दशकों से भी ज़्यादा समय में पहली बार इंसानों को चाँद के चारों ओर भेजना है। इस मिशन का नेतृत्व NASA कर रहा है और यह व्यापक Artemis कार्यक्रम का हिस्सा है, जिसे चाँद पर इंसानों की लंबे समय तक मौजूदगी स्थापित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। इस मिशन को 1 अप्रैल, 2026 को लॉन्च करने की योजना है। Artemis II मिशन महत्वपूर्ण प्रणालियों का परीक्षण करेगा और भविष्य में चाँद पर उतरने के मिशनों के लिए रास्ता बनाएगा; साथ ही, यह मंगल ग्रह पर जाने वाले मिशन का अग्रदूत भी है।

Artemis II मिशन का अवलोकन: इसे क्या खास बनाता है?

Artemis II, Artemis कार्यक्रम के तहत पहला मानव-युक्त मिशन है और यह Artemis I की सफल मानव-रहित उड़ान के बाद आया है।

Apollo मिशनों की तुलना में, यह मिशन चंद्रमा पर उतरेगा नहीं, बल्कि उसके चारों ओर कक्षा में चक्कर लगाएगा और इसमें अंतरिक्ष यात्रियों के साथ सभी महत्वपूर्ण प्रणालियों का परीक्षण किया जाएगा।

इस मिशन में दो मुख्य घटकों का उपयोग किया जाएगा:

  • स्पेस लॉन्च सिस्टम (SLS): यह NASA द्वारा अब तक बनाया गया सबसे शक्तिशाली रॉकेट है।
  • ओरियन अंतरिक्ष यान: इसे अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी की कक्षा से भी आगे, सुरक्षित रूप से ले जाने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

यह मिशन चंद्रमा के सतत अन्वेषण और गहरे अंतरिक्ष की यात्रा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

मिशन की समय-सीमा: चंद्रमा तक की चरण-दर-चरण यात्रा

आर्टेमिस II मिशन एक सावधानीपूर्वक नियोजित क्रम के अनुसार आगे बढ़ेगा, ताकि सुरक्षा और मिशन की सफलता सुनिश्चित की जा सके।

लॉन्च और पृथ्वी की कक्षा

यह मिशन 1 अप्रैल, 2026 को फ्लोरिडा के केनेडी स्पेस सेंटर से एक ज़ोरदार लॉन्च के साथ शुरू होगा।

यह SLS रॉकेट ओरियन अंतरिक्ष यान को चंद्रमा की ओर भेजने से पहले, उसे पृथ्वी की कक्षा में ले जाएगा।

ट्रांस-लूनर इंजेक्शन

पृथ्वी की परिक्रमा करने के बाद, यह ओरियन एक महत्वपूर्ण इंजन बर्न करेगा जिसे ‘ट्रांस-लूनर इंजेक्शन’ (TLI) के नाम से जाना जाता है; यह प्रक्रिया अंतरिक्ष यान को चंद्रमा की ओर जाने वाले मार्ग पर स्थापित करती है।

लूनर फ्लाईबाई

अंतरिक्ष यान चंद्रमा से हजारों किलोमीटर आगे तक यात्रा करेगा और साथ ही ‘फ्री-रिटर्न ट्रेजेक्टरी’ (मुक्त-वापसी मार्ग) का भी पालन करेगा। यह सुनिश्चित करता है कि यदि किसी कारणवश सिस्टम में कोई खराबी भी आ जाए, तो भी यह अंतरिक्ष यान स्वाभाविक रूप से पृथ्वी पर लौट आएगा।

पृथ्वी पर वापसी

चंद्रमा के पास से गुज़रने के बाद, ओरियन बहुत तेज़ गति से पृथ्वी के वायुमंडल में फिर से प्रवेश करेगा और पैराशूट की मदद से समुद्र में सुरक्षित रूप से उतरेगा।

आर्टेमिस II के क्रू से मिलिए

NASA ने आर्टेमिस II के लिए एक विविध और अनुभवी क्रू का चयन किया है, और उनके नाम इस प्रकार हैं:

  • रीड वाइज़मैन – कमांडर
  • विक्टर ग्लोवर – पायलट
  • क्रिस्टीना कोच – मिशन स्पेशलिस्ट
  • जेरेमी हैनसेन – मिशन स्पेशलिस्ट (कनाडाई अंतरिक्ष एजेंसी से)

अंतरिक्ष अन्वेषण के भविष्य के लिए Artemis II क्यों महत्वपूर्ण है?

Artemis II केवल एक प्रतीकात्मक मिशन ही नहीं है, बल्कि यह भविष्य के गहरे अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण परीक्षण है।

यह मिशन:

  • लंबे समय तक चलने वाली अंतरिक्ष यात्राओं के लिए जीवन-रक्षक प्रणालियों (life-support systems) को प्रमाणित करेगा।
  • साथ ही, गहरे अंतरिक्ष में नेविगेशन और संचार प्रणालियों का भी परीक्षण करेगा।
  • भविष्य में होने वाली चंद्र-अवतरण (lunar landings) यात्राओं के दौरान अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।

यह Artemis III मिशन के लिए आधार भी तैयार करेगा, जिसका उद्देश्य मनुष्यों को चंद्रमा की सतह पर उतारना है—और जिसमें पहली बार किसी महिला को भी शामिल किया जाएगा।

महावीर जयंती 2026: पीएम मोदी ने सम्राट संप्रति संग्रहालय का किया लोकार्पण

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 31 मार्च, 2026 को गुजरात की अपनी यात्रा के दौरान गांधीनगर में ‘सम्राट संप्रति संग्रहालय’ का उद्घाटन किया। यह उद्घाटन भारत की समृद्ध जैन विरासत के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसका उद्घाटन महावीर जयंती के शुभ अवसर पर हुआ, जिससे इस कार्यक्रम को एक विशेष आध्यात्मिक महत्व प्राप्त हो गया। यह संग्रहालय गांधीनगर के कोबा गाँव में स्थित ‘श्री महावीर जैन आराधना केंद्र’ में स्थित है।

सम्राट संप्रति संग्रहालय: जैन सभ्यता की एक यात्रा

  • हाल ही में उद्घाटित यह सम्राट संप्रति संग्रहालय जैन संस्कृति और उनकी परंपराओं के एक व्यापक भंडार के रूप में स्थापित है।
  • इसका नाम संप्रति के नाम पर रखा गया है, और यह संग्रहालय उस शासक का सम्मान करता है, जो अपने पूरे साम्राज्य में जैन धर्म के प्रसार और अहिंसा को बढ़ावा देने के लिए जाने जाते हैं।
  • इस संग्रहालय में लगभग 2,000 दुर्लभ कलाकृतियाँ मौजूद हैं, और यह आगंतुकों को जैन दर्शन तथा उसके ऐतिहासिक विकास की गहरी जानकारी भी प्रदान करता है।
  • पत्थर की मूर्तियों से लेकर प्राचीन हस्तलिपियों तक—हर एक प्रदर्शनी में की गई बारीक नक्काशी जैन परंपराओं की आध्यात्मिक समृद्धि और कलात्मक महारत को दर्शाती है।
  • आधुनिक ऑडियो-विज़ुअल तकनीक का उपयोग आगंतुकों के अनुभव को और भी बेहतर बनाएगा, जिससे यह प्रस्तुति शैक्षिक और सांस्कृतिक—दोनों ही दृष्टियों से अधिक समृद्ध हो जाएगी।

भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित करने वाली सात गैलरी

एक सुविचारित योजना के तहत, इस संग्रहालय को सात अलग-अलग गैलरियों में विभाजित किया गया है; और इनमें से प्रत्येक गैलरी जैन धर्म तथा भारतीय सभ्यता के विभिन्न पहलुओं पर केंद्रित है।

ये गैलरीज़ प्रदर्शित करती हैं:

  • प्राचीन पांडुलिपियाँ और जैन शिक्षाओं को दर्शाने वाले सचित्र ग्रंथ
  • साथ ही पत्थर और धातु से बनी मूर्तियाँ, जो तीर्थंकरों का प्रतिनिधित्व करती हैं
  • लघु चित्रकलाएँ, सिक्के और चाँदी के रथ
  • और वे पारंपरिक कलाकृतियाँ, जो सदियों पुरानी कारीगरी को दर्शाती हैं

इस सुव्यवस्थित लेआउट से आगंतुकों को जैन धर्म के उद्भव से लेकर पूरे भारत में इसके प्रभाव तक के कालक्रमानुसार विकास को समझने में भी सहायता मिलती है।

महावीर जयंती और जैन मूल्यों का महत्व

महावीर जयंती के अवसर पर किया गया उद्घाटन भगवान महावीर की शिक्षाओं के महत्व को रेखांकित करता है।

अपने संदेश में प्रधानमंत्री मोदी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि:

  • सत्य, अहिंसा और करुणा के सिद्धांत आज भी अत्यंत प्रासंगिक हैं।
  • जैन दर्शन समानता, दयालुता और सामाजिक उत्तरदायित्व को बढ़ावा देता है।
  • ये मूल्य आधुनिक वैश्विक चुनौतियों का सामना करने के लिए अनिवार्य हैं।

सम्राट संप्रति कौन थे? एक ऐतिहासिक अंतर्दृष्टि

संप्रति ने 224-215 ईसा पूर्व के दौरान शासन किया, और उन्हें जैन धर्म के सबसे महान संरक्षकों में से एक माना जाता था।

धार्मिक मूल्यों के प्रसार में अपनी भूमिका के कारण उनकी तुलना अक्सर उनके दादा अशोक से की जाती थी; लेकिन दूसरी ओर, संप्रति ने विशेष रूप से जैन शिक्षाओं पर ध्यान केंद्रित किया था।

उनके योगदानों में ये भी शामिल हैं:

  • पूरे भारत में कई जैन मंदिरों का निर्माण करवाना
  • साधुओं को सहयोग देना और अहिंसा का संदेश फैलाना
  • और, सबसे महत्वपूर्ण रूप से, अहिंसा पर आधारित नैतिक शासन को बढ़ावा देना
  • उनके नाम पर बना संग्रहालय उनकी चिरस्थायी विरासत का प्रतीक है।

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