भारत ने 27 फरवरी 2025 को चंद्रशेखर आज़ाद का 95वां शहीदी दिवस मनाया, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे निडर क्रांतिकारियों में से एक थे। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे निर्भीक सेनानियों में गिने जाने वाले आज़ाद को देशभर में श्रद्धांजलि अर्पित की गई और विभिन्न दलों के राजनीतिक नेताओं ने उनके साहस और बलिदान को नमन किया। आज़ाद ने प्रण लिया था कि वे कभी भी अंग्रेजों के हाथ जीवित नहीं पकड़े जाएंगे, और उन्होंने 1931 में अपने अंतिम क्षण तक इस वचन को निभाया। उनका जीवन अडिग देशभक्ति, त्याग और क्रांतिकारी जज़्बे का प्रतीक है, जो आज भी भारत के स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरणादायी विरासत के रूप में स्मरण किया जाता है।
चंद्रशेखर आज़ाद कौन थे?
- चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को भाबरा (वर्तमान मध्य प्रदेश) में चंद्रशेखर तिवारी के रूप में हुआ था। वे भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रमुख और निर्भीक क्रांतिकारी नेताओं में से एक बने।
- सिर्फ 15 वर्ष की आयु में असहयोग आंदोलन के दौरान गिरफ्तारी के समय उन्होंने अपना नाम “आज़ाद”, पिता का नाम “स्वतंत्र” और पता “जेल” बताया। इसी साहसिक घोषणा ने उन्हें जीवनभर के लिए “आज़ाद” बना दिया।
प्रारंभिक प्रेरणा: जलियांवाला बाग से असहयोग आंदोलन तक
- जलियाँवाला बाग हत्याकांड ने युवा आज़ाद को गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने महात्मा गांधीi के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन (1920–22) में भाग लिया।
- लेकिन 1922 में चौरी-चौरा घटना के बाद आंदोलन स्थगित होने से वे निराश हुए और अहिंसात्मक मार्ग के बजाय क्रांतिकारी रास्ता अपनाया। इसके बाद वे हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) से जुड़े, जिसका उद्देश्य सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकना था।
काकोरी कांड और क्रांतिकारी नेतृत्व
- 1925 का काकोरी ट्रेन षड्यंत्र आज़ाद की प्रमुख क्रांतिकारी कार्रवाइयों में से एक था, जिसमें HRA के सदस्यों ने सरकारी खजाना ले जा रही ट्रेन को लूटा। अधिकांश क्रांतिकारी गिरफ्तार हो गए, लेकिन आज़ाद पुलिस से बच निकले।
- वे वर्षों तक भूमिगत रहे और भेष बदलकर काम करते रहे, जिसके कारण उन्हें “क्विक सिल्वर” कहा जाता था। बाद में उन्होंने संगठन को पुनर्गठित कर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) बनाया।
सांडर्स की हत्या और अन्य क्रांतिकारी कदम
- 1928 में लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए आज़ाद ने भगत सिंह और शिवराम राजगुरु के साथ मिलकर ब्रिटिश अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- यह कार्रवाई साइमन कमीशन के विरोध के दौरान हुए लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय की मृत्यु के प्रतिशोध स्वरूप की गई थी।
- आज़ाद ने 1929 में वायसराय लॉर्ड इरविन की ट्रेन पर बम हमले के प्रयास में भी भाग लिया। उनकी संगठन क्षमता और रणनीतिक कौशल ने ब्रिटिश दमन के बावजूद क्रांतिकारी गतिविधियों को जीवित रखा।
अल्फ्रेड पार्क में अंतिम संघर्ष
27 फरवरी 1931 को आज़ाद इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के अल्फ्रेड पार्क में एक साथी क्रांतिकारी से मिलने पहुंचे। किसी विश्वासघात के कारण वे ब्रिटिश पुलिस से घिर गए।
भीषण मुठभेड़ में उन्होंने दो अधिकारियों को घायल किया और अपने साथी को भागने का अवसर दिया। अंत में, अपने संकल्प के अनुसार कि वे जीवित पकड़े नहीं जाएंगे, उन्होंने अपनी अंतिम गोली स्वयं को मार ली। उस समय उनकी आयु मात्र 24 वर्ष थी। बाद में इस पार्क का नाम उनके सम्मान में आज़ाद पार्क रखा गया।
चंद्रशेखर आज़ाद की विरासत
चंद्रशेखर आज़ाद की विरासत आज भी प्रेरणा देती है।
उनके प्रमुख योगदान:
- HSRA के तहत क्रांतिकारी आंदोलन का पुनर्गठन
- काकोरी कांड में भागीदारी
- लाला लाजपत राय की मृत्यु का प्रतिशोध
- औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध निर्भीक प्रतिरोध का प्रतीक
उन्हें कई फिल्मों में भी दर्शाया गया है, जैसे शहीद, भगत सिंह की कहानी और रंग दे बसंती, जिन्होंने लोकप्रिय संस्कृति में उनकी स्मृति को जीवित रखा है।
प्रश्न
Q. चंद्रशेखर आज़ाद किस साल शहीद हुए थे?
A. 1928
B. 1929
C. 1930
D. 1931


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