प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के नौ वर्ष पूरे

प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (PMMVY) ने 1 जनवरी 2026 को अपने कार्यान्वयन के 9 वर्ष पूरे कर लिए। यह भारत में मातृ स्वास्थ्य, पोषण और महिलाओं के कल्याण को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। वर्ष 2017 में शुरू की गई यह भारत सरकार की प्रमुख मातृत्व लाभ योजना है, जिसने विशेष रूप से समाज के कमजोर वर्गों की गर्भवती महिलाओं और धात्री माताओं को निरंतर सहायता प्रदान की है।

सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों और सामान्य पाठकों के लिए PMMVY सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं, महिला एवं बाल विकास तथा स्वास्थ्य से जुड़े करंट अफेयर्स का एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।

प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (PMMVY) : परिचय

प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना एक केंद्रीय प्रायोजित योजना (CSS) है, जिसे महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (MoWCD) द्वारा लागू किया जाता है। इसे 1 जनवरी 2017 को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA), 2013 की धारा 4 के तहत लागू किया गया था, जो पात्र महिलाओं को मातृत्व लाभ प्रदान करने का प्रावधान करती है।

इस योजना का उद्देश्य आंशिक वेतन क्षतिपूर्ति प्रदान करना तथा सुरक्षित गर्भावस्था और प्रसव को बढ़ावा देना है, ताकि मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य परिणामों में सुधार हो सके।

PMMVY के उद्देश्य

PMMVY का मुख्य उद्देश्य गर्भावस्था और प्रसव के बाद महिलाओं को वित्तीय सहायता देकर उनके मातृत्व स्वास्थ्य को सुदृढ़ करना है। यह सहायता महिलाओं को वेतन हानि से उबरने में मदद करती है, संस्थागत प्रसव को प्रोत्साहित करती है और माताओं व शिशुओं में कुपोषण के जोखिम को कम करती है।

इसके साथ ही, योजना के तहत गर्भावस्था के दौरान और प्रसव के बाद छह माह तक आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से निःशुल्क पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने की भी परिकल्पना की गई है।

मिशन शक्ति के अंतर्गत PMMVY

वर्ष 2022 में भारत सरकार ने मिशन शक्ति की शुरुआत की, जो महिलाओं की सुरक्षा, संरक्षा और सशक्तिकरण से जुड़ी विभिन्न योजनाओं को एकीकृत करता है। PMMVY को मिशन शक्ति के ‘समर्थ्य’ घटक के अंतर्गत शामिल किया गया, जिसका उद्देश्य महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण और वित्तीय समावेशन है। इस एकीकरण से योजना के बेहतर समन्वय, निगरानी और लक्षित लाभ वितरण में सुधार हुआ है।

पात्रता एवं अपात्रता मानदंड

PMMVY के तहत लाभ पहले दो जीवित बच्चों के लिए उपलब्ध है, बशर्ते कि दूसरा बच्चा बालिका हो। यह प्रावधान लैंगिक समानता और बालिका के महत्व को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया गया है।

हालांकि, केंद्र/राज्य सरकार या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में नियमित रूप से कार्यरत गर्भवती महिलाएं, या वे महिलाएं जो किसी अन्य कानून के तहत समान मातृत्व लाभ प्राप्त कर रही हैं, इस योजना के अंतर्गत पात्र नहीं हैं।

वित्तीय सहायता एवं किश्त संरचना

PMMVY के तहत पात्र लाभार्थियों को प्रत्यक्ष नकद सहायता प्रदान की जाती है।

पहले बच्चे के लिए कुल ₹5,000 की राशि दो किश्तों में दी जाती है।

दूसरे बच्चे (बालिका) के लिए ₹6,000 की राशि एक किश्त में प्रदान की जाती है।

पहली किश्त ₹3,000 गर्भावस्था के पंजीकरण और अंतिम मासिक धर्म की तिथि से छह माह के भीतर कम से कम एक प्रसवपूर्व जांच (ANC) पूरी होने पर दी जाती है।
दूसरी किश्त ₹2,000 बच्चे के जन्म और पंजीकरण के बाद, तथा सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम (UIP) के अंतर्गत 14 सप्ताह तक के सभी अनिवार्य टीकाकरण पूरे होने पर प्रदान की जाती है।

लाभ अंतरण की प्रक्रिया

PMMVY के अंतर्गत वित्तीय सहायता प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के माध्यम से लाभार्थियों के बैंक या डाकघर खातों में सीधे भेजी जाती है। इससे पारदर्शिता, जवाबदेही और समयबद्ध भुगतान सुनिश्चित होता है।

PMMVY का वित्तपोषण पैटर्न

  • यह योजना केंद्र–राज्य साझेदारी पर आधारित है।
  • अधिकांश राज्यों एवं विधायिका वाले केंद्र शासित प्रदेशों के लिए अनुपात 60:40 है।
  • पूर्वोत्तर एवं विशेष श्रेणी राज्यों के लिए 90:10 का अनुपात लागू है।
  • बिना विधायिका वाले केंद्र शासित प्रदेशों में योजना का पूरा खर्च केंद्र सरकार वहन करती है।

कवरेज और उपलब्धियां

दिसंबर 2025 तक, PMMVY के अंतर्गत 4.05 करोड़ से अधिक लाभार्थियों को कवर किया जा चुका है। मातृ पोषण, स्वास्थ्य सेवाओं और टीकाकरण को समर्थन देने के लिए ₹19,000 करोड़ से अधिक की राशि वितरित की गई है, जो इस योजना के व्यापक प्रभाव को दर्शाती है।

निगरानी एवं डिजिटल पर्यवेक्षण

योजना के प्रभावी कार्यान्वयन और निगरानी के लिए सरकार ने मार्च 2023 में PMMVY सॉफ्टवेयर (PMMVYSoft) लॉन्च किया। यह डिजिटल प्लेटफॉर्म राष्ट्रीय, राज्य, जिला, ब्लॉक और ग्राम स्तर पर रियल-टाइम निगरानी की सुविधा प्रदान करता है, जिससे प्रभावी पर्यवेक्षण और समयबद्ध शिकायत निवारण संभव हो सका है।

किस ग्लेशियर को हिमालय का ताज कहा जाता है?

हिमालय विश्व की कुछ सबसे ऊँची चोटियों और विशाल हिमनदों (ग्लेशियरों) का घर है। ये विशाल बर्फीले भंडार मीठे पानी का स्रोत, वन्यजीवों का सहारा और पर्वतीय सौंदर्य का अभिन्न हिस्सा हैं। इन्हीं हिमनदों में से एक इतना विशिष्ट और भव्य है कि उसे हिमालय का ताज कहा जाता है।

हिमालय का ताज किस हिमनद को कहा जाता है?

सियाचिन हिमनद (Siachen Glacier) को अक्सर हिमालय का ताज कहा जाता है। यह हिमालय–काराकोरम क्षेत्र के सबसे बड़े और सबसे ऊँचे हिमनदों में से एक है। कई किलोमीटर तक फैला यह हिमनद विशाल बर्फ और हिम का भंडार समेटे हुए है तथा भूगोल, जलवायु अध्ययन और राष्ट्रीय सुरक्षा—तीनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह भारत का सबसे बड़ा हिमनद और ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर दुनिया के सबसे लंबे हिमनदों में शामिल है।

सियाचिन को हिमालय का ताज क्यों कहा जाता है?

अपने विशाल आकार, अत्यधिक ऊँचाई और पूर्वी काराकोरम में विशिष्ट स्थिति के कारण सियाचिन को यह उपाधि मिली है। यह हिमनद साल भर बर्फ से ढका रहता है। इसकी कठोर जलवायु, वैज्ञानिक महत्त्व और जल आपूर्ति में भूमिका इसे हिमालय का एक अनोखा और अत्यंत महत्वपूर्ण हिमनद बनाती है।

सियाचिन हिमनद कहाँ स्थित है?

सियाचिन हिमनद लद्दाख (उत्तरी भारत) में पूर्वी काराकोरम पर्वतमाला में स्थित है। यह नुब्रा घाटी के ऊपर ऊँचाई पर और पाकिस्तान व चीन की सीमाओं के निकट है। यह क्षेत्र व्यापक हिमालयी पर्वत प्रणाली का हिस्सा है।

आकार और भौतिक विशेषताएँ

लंबाई: लगभग 75–76 किमी (ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर सबसे लंबे हिमनदों में)

प्रमुख विशेषताएँ:

  • बर्फ में गहरी दरारें (क्रेवास)
  • मोटी हिम परतें
  • बर्फीली चट्टानें
  • चारों ओर ऊँची पर्वत श्रेणियाँ
    ये विशेषताएँ इसे सुंदर होने के साथ-साथ अन्वेषण के लिए चुनौतीपूर्ण भी बनाती हैं।

नदियों और जल आपूर्ति में महत्व

सियाचिन से पिघलने वाली बर्फ नुब्रा नदी में मिलती है, जो आगे श्योक नदी और फिर सिंधु नदी प्रणाली का हिस्सा बनती है। यह जल:

  • नदियों के प्रवाह को बनाए रखता है
  • पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र को सहारा देता है
  • नीचे रहने वाले समुदायों की आजीविका को समर्थन देता है
    इस प्रकार, सियाचिन क्षेत्रीय जल चक्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

भारत का सबसे बड़ा हिमनद

लंबाई और बर्फ की मात्रा—दोनों दृष्टियों से सियाचिन भारत का सबसे बड़ा हिमनद है। इसकी भौगोलिक और प्राकृतिक महत्ता के कारण यह हिमालय के सबसे अधिक निगरानी किए जाने वाले हिमनदों में शामिल है।

ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर सबसे बड़े हिमनदों में एक

आर्कटिक और अंटार्कटिक के बाहर बहुत कम हिमनद सियाचिन जितने लंबे हैं। इसकी निरंतर बर्फीली धारा इसे पर्वतीय हिमनदों के अध्ययन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती है।

सियाचिन हिमनद से जुड़े रोचक तथ्य

  • अत्यधिक ऊँचाई पर स्थित – ऊँचाई लगभग 5,400 मीटर से 7,000 मीटर से अधिक।
  • अत्यंत ठंडा मौसम – सर्दियों में तापमान –40°C से नीचे, तेज़ हवाएँ और भारी हिमपात।
  • प्रमुख नदी प्रणालियों का आधार – इसका जल सिंधु बेसिन का हिस्सा बनता है।
  • जलवायु व हिमनद अनुसंधान का केंद्र – बर्फ/हिम परिवर्तन, जलवायु पैटर्न और हिमनद स्वास्थ्य के अध्ययन हेतु महत्वपूर्ण।
  • विश्व का सबसे ऊँचा युद्धक्षेत्र – अत्यधिक ऊँचाई पर सैन्य उपस्थिति के कारण इसे यह उपनाम भी मिला है।

सियाचिन हिमनद क्यों महत्वपूर्ण है?

सियाचिन केवल बर्फ का विस्तार नहीं, बल्कि भूगोल, जल संसाधन, जलवायु अनुसंधान और रणनीतिक सुरक्षा—सबका आधार है। अपनी महान ऊँचाई और विशालता के कारण यह सचमुच हिमालय के शिखर पर मुकुट की तरह विराजमान है।

विश्व ब्रेल दिवस 2026: महत्व और इतिहास

हर वर्ष 4 जनवरी को विश्व विश्व ब्रेल दिवस (World Braille Day) मनाया जाता है। यह दिन समावेशन (इन्क्लूज़न) के सबसे सशक्त साधनों में से एक—ब्रेल लिपि—का सम्मान करने के लिए समर्पित है। ब्रेल केवल पढ़ने-लिखने की प्रणाली नहीं है, बल्कि यह दुनिया भर के लाखों दृष्टिबाधित लोगों के लिए जानकारी तक पहुँच, आत्मनिर्भरता और गरिमा का प्रतीक है। यह दिवस हमें याद दिलाता है कि सच्चा विकास तभी संभव है जब ज्ञान सभी के लिए सुलभ हो।

4 जनवरी को विश्व ब्रेल दिवस क्यों मनाया जाता है?

विश्व ब्रेल दिवस लुई ब्रेल की जयंती पर मनाया जाता है, जो एक फ्रांसीसी शिक्षक थे और जिन्होंने ब्रेल लिपि का आविष्कार किया। लुई ब्रेल ने बहुत कम उम्र में एक दुर्घटना के कारण अपनी दृष्टि खो दी थी। लेकिन उन्होंने अंधत्व को अपनी सीमितता नहीं बनने दिया और छह उभरे हुए बिंदुओं पर आधारित एक ऐसी प्रणाली विकसित की, जिसे स्पर्श के माध्यम से पढ़ा जा सकता है।

हालाँकि ब्रेल लिपि का आविष्कार 19वीं सदी में हुआ था, लेकिन इसकी वैश्विक महत्ता को आधिकारिक मान्यता तब मिली जब संयुक्त राष्ट्र ने 2019 में 4 जनवरी को विश्व ब्रेल दिवस घोषित किया। यह घोषणा इस विचार को मजबूत करती है कि ब्रेल कोई विशेष सहायता नहीं, बल्कि समानता और समावेशन के लिए एक मौलिक मानव अधिकार है।

ब्रेल: केवल एक लेखन प्रणाली से कहीं अधिक

दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिए ब्रेल साक्षरता और शिक्षा की नींव है। इसके माध्यम से वे पाठ्यपुस्तकें पढ़ सकते हैं, गणित समझ सकते हैं, संगीत सीख सकते हैं और वैज्ञानिक ज्ञान तक पहुँच बना सकते हैं। ब्रेल के बिना शिक्षा कई लोगों के लिए अधूरी और असुलभ रह जाती।

शिक्षा के अलावा, ब्रेल रोज़गार के अवसरों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह दृष्टिबाधित लोगों को दस्तावेज़ पढ़ने, नोट्स बनाने और स्वतंत्र रूप से काम करने में सक्षम बनाता है। साथ ही, जन-सुरक्षा के लिए भी ब्रेल अत्यंत आवश्यक है—दवाइयों के लेबल, लिफ्ट के बटन और सार्वजनिक संकेतों पर ब्रेल का उपयोग लोगों को सुरक्षित और आत्मविश्वास के साथ सार्वजनिक स्थानों पर चलने-फिरने में मदद करता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ब्रेल सामाजिक समानता को बढ़ावा देता है और यह सुनिश्चित करता है कि जानकारी केवल देखने वालों तक सीमित न रहे, बल्कि सभी के साथ समान रूप से साझा हो।

आज के समय में विश्व ब्रेल दिवस क्यों प्रासंगिक है?

स्क्रीन रीडर और वॉयस असिस्टेंट जैसी आधुनिक तकनीकों के बावजूद, ब्रेल का महत्व आज भी अपरिवर्तनीय है। विशेष रूप से शिक्षा और कौशल विकास में स्पर्श आधारित पढ़ाई का कोई पूर्ण विकल्प नहीं है। आज भी कई दृष्टिबाधित लोगों को ब्रेल पुस्तकों की कमी, समावेशी कक्षाओं का अभाव और सार्वजनिक ढांचे में सुलभता मानकों के कमजोर क्रियान्वयन जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

विश्व ब्रेल दिवस सरकारों, शिक्षण संस्थानों और निजी संगठनों के लिए कार्रवाई का आह्वान है—ताकि शिक्षा, परिवहन, स्वास्थ्य और डिजिटल सेवाओं में सुलभ प्रारूप अपनाए जाएँ और कोई भी व्यक्ति पीछे न छूटे।

ब्रेल को बढ़ावा देने में UNESCO और वैश्विक प्रयास

UNESCO और BMW जैसे संगठन विश्व स्तर पर ब्रेल साक्षरता को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इनके प्रयासों में ब्रेल को मुख्यधारा की शिक्षा प्रणाली में शामिल करना, डिजिटल ब्रेल नवाचारों का समर्थन करना और दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा के लिए मजबूत नीतियों की वकालत करना शामिल है। ऐसे प्रयास तकनीकी प्रगति और सुलभता के बीच की खाई को पाटने में सहायक हैं।

व्यक्ति स्तर पर हम कैसे योगदान दे सकते हैं?

जागरूकता की शुरुआत समझ से होती है। लोग सार्वजनिक स्थानों पर सुलभ संकेतों को प्रोत्साहित कर सकते हैं, ब्रेल शिक्षण सामग्री उपलब्ध कराने वाले संगठनों का समर्थन कर सकते हैं और समावेशी शिक्षा को बढ़ावा दे सकते हैं। समुदाय स्तर पर किए गए छोटे-छोटे प्रयास मिलकर बड़ा और सार्थक परिवर्तन ला सकते हैं।

गणतंत्र दिवस 2026: भारत–यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन से पहले यूरोपीय संघ के नेताओं के मुख्य अतिथि बनने की संभावना

भारत के गणतंत्र दिवस समारोह (26 जनवरी 2026) में कूटनीतिक दृष्टि से विशेष महत्व देखने को मिल सकता है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, यूरोपीय संघ (EU) के शीर्ष नेता मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हो सकते हैं। यूरोपीय संघ द्वारा भारत के निमंत्रण को स्वीकार किया जाना ऐसे समय में भारत–EU रणनीतिक साझेदारी के बढ़ते महत्व को दर्शाता है, जब वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं।

संभावित मुख्य अतिथि कौन होंगे?

संभावित मुख्य अतिथियों में यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंतोनियो कोस्टा शामिल हैं। इन दोनों नेताओं की संयुक्त उपस्थिति यूरोपीय संघ की पहचान को एक एकीकृत राजनीतिक और आर्थिक ब्लॉक के रूप में दर्शाती है, न कि अलग-अलग सदस्य देशों के समूह के रूप में। उर्सुला वॉन डेर लेयेन यूरोपीय ग्रीन डील और कम्पटीटिवनेस कम्पास जैसी प्रमुख पहलों का नेतृत्व करने के लिए जानी जाती हैं, जिनका उद्देश्य अमेरिका और चीन से बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच यूरोपीय संघ की आर्थिक मजबूती बढ़ाना है। वहीं, 2024 में यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष बने एंतोनियो कोस्टा EU शिखर सम्मेलनों के समन्वय और सदस्य देशों के बीच कूटनीतिक सहमति बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पुर्तगाल के पूर्व प्रधानमंत्री के रूप में उनका अनुभव यूरोपीय संघ के नेतृत्व को अतिरिक्त राजनीतिक गहराई प्रदान करता है।

भारत–EU शिखर सम्मेलन से संबंध

EU नेताओं की यह यात्रा भारत–यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन से भी जुड़ी हो सकती है, जिसे अस्थायी रूप से 27 जनवरी 2026 के लिए प्रस्तावित माना जा रहा है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। यदि यह शिखर सम्मेलन आयोजित होता है, तो यह ऐसे समय में होगा जब भारत–EU मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर वार्ताएँ वर्षों के ठहराव के बाद फिर से शुरू हुई हैं।

नई वार्ताओं में बाजार पहुंच, सेवाएं, निवेश और आपूर्ति-श्रृंखला की मजबूती पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। दिसंबर 2025 में भारत आए EU के व्यापार और आर्थिक सुरक्षा आयुक्त मारोश शेफचोविच ने इन वार्ताओं को तेज करने की दिशा में अहम भूमिका निभाई थी। गणतंत्र दिवस पर शीर्ष EU नेतृत्व की मौजूदगी दोनों पक्षों पर समझौते को आगे बढ़ाने का राजनीतिक दबाव बना सकती है।

भारत–EU FTA क्यों महत्वपूर्ण है?

प्रस्तावित भारत–EU मुक्त व्यापार समझौता दोनों के लिए रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत के लिए, यह दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में से एक तक बेहतर पहुंच प्रदान करेगा और कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) जैसे नियमों से जुड़ी चुनौतियों से निपटने में मदद करेगा। स्टील और एल्युमिनियम जैसे निर्यात पर लगने वाले कार्बन कर को सहयोग और साझा मानकों के जरिए कम किया जा सकता है।

यूरोपीय संघ के लिए, भारत के साथ मजबूत व्यापार संबंध चीन पर निर्भरता कम करने, आपूर्ति-श्रंखलाओं में विविधता लाने और आर्थिक सुरक्षा बढ़ाने में सहायक होंगे। यह समझौता हरित प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण—जैसे हाइड्रोजन ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन और स्वच्छ विनिर्माण—को भी बढ़ावा देगा, साथ ही नवीकरणीय ऊर्जा में संयुक्त निवेश को प्रोत्साहित करेगा।

यात्रा का रणनीतिक महत्व

गणतंत्र दिवस पर यूरोपीय संघ के नेताओं को सामूहिक रूप से मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करना भारत की इस मान्यता को दर्शाता है कि EU एक बहुध्रुवीय विश्व में उसका प्रमुख रणनीतिक साझेदार है। वैश्विक अनिश्चितता, व्यापार विखंडन और भू-राजनीतिक तनावों के बीच भारत–EU सहयोग नियम-आधारित व्यापार, सतत विकास और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति साझा प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

कलाई-II हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट को मंज़ूरी

केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ समिति ने अरुणाचल प्रदेश में प्रस्तावित कलई-II जलविद्युत परियोजना को पर्यावरणीय मंज़ूरी देने की सिफारिश की है। इस निर्णय पर पर्यावरणविदों ने गंभीर चिंता जताई है, क्योंकि उनका कहना है कि परियोजना की पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्ट में लोहित नदी बेसिन में पाई जाने वाली गंभीर रूप से संकटग्रस्त श्वेत-उदर बगुला (White-bellied Heron) की उपस्थिति का उल्लेख नहीं किया गया।

खबर में क्यों?

विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (EAC) ने लोहित नदी पर प्रस्तावित 1,200 मेगावाट की कलई-II परियोजना को मंज़ूरी दी। पर्यावरणविदों ने यह मुद्दा उठाया कि EIA रिपोर्ट में परियोजना क्षेत्र में पाई जाने वाली गंभीर रूप से संकटग्रस्त श्वेत-उदर बगुला का ज़िक्र नहीं है।

कलई-II जलविद्युत परियोजना के बारे में

  • कलई-II परियोजना अरुणाचल प्रदेश के अंजॉ ज़िले में लोहित नदी पर प्रस्तावित 1,200 मेगावाट की जलविद्युत परियोजना है।
  • इसे THDC इंडिया लिमिटेड द्वारा विकसित किया जा रहा है।
  • परियोजना में 128.5 मीटर ऊँचा कंक्रीट ग्रैविटी बाँध, पोंडेज और एक भूमिगत पावरहाउस शामिल है।
  • अनुमानित लागत लगभग ₹14,176 करोड़ है।

EIA को लेकर चिंताएँ

  • WAPCOS लिमिटेड द्वारा तैयार EIA रिपोर्ट में 28 पक्षी प्रजातियों का उल्लेख है, लेकिन श्वेत-उदर बगुला का कोई ज़िक्र नहीं किया गया।
  • पर्यावरणविदों का कहना है कि परियोजना क्षेत्र इस पक्षी के ज्ञात आवास क्षेत्र में आता है, जिसमें नामदाफा टाइगर रिज़र्व और कमलांग टाइगर रिज़र्व के आस-पास के क्षेत्र शामिल हैं।

श्वेत-उदर बगुला क्यों महत्वपूर्ण है?

  • श्वेत-उदर बगुला को IUCN ने गंभीर रूप से संकटग्रस्त (Critically Endangered) की श्रेणी में रखा है।
  • विशेषज्ञों के अनुसार दुनिया भर में इसके 250 से भी कम पक्षी बचे हैं, जिनमें संभवतः केवल 60 के आसपास ही शेष हैं।
  • भारत में इसके प्रमुख घोंसला स्थलों में लोहित नदी के किनारे, विशेष रूप से वालोंग और नामदाफा क्षेत्र शामिल हैं, इसलिए इसके आवास की सुरक्षा अत्यंत आवश्यक है।

स्थैतिक पृष्ठभूमि: प्रजाति को कानूनी संरक्षण

  • श्वेत-उदर बगुला को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत अनुसूची-I (Schedule-I) में रखा गया है, जिससे इसे सर्वोच्च स्तर का कानूनी संरक्षण प्राप्त है।
  • इसके आवास को प्रभावित करने वाली किसी भी परियोजना के लिए विस्तृत पारिस्थितिक आकलन और संरक्षण योजना आवश्यक होती है, ताकि अपूरणीय जैव विविधता हानि से बचा जा सके।

श्वेत-उदर बगुला (White-bellied Heron) के बारे में

विवरण

  • अत्यंत दुर्लभ और रहस्यमयी पक्षी
  • बगुला प्रजातियों में दूसरा सबसे बड़ा जीवित पक्षी

विशेषताएँ

  • मानव उपस्थिति से अत्यधिक डरने वाला
  • गहरे स्लेटी रंग का शरीर और स्पष्ट सफेद पेट

लंबी गर्दन

  • आवास और वितरण (दुनिया के सबसे दुर्लभ पक्षियों में से एक)
  • पाया जाता है: भूटान, म्यांमार और भारत में नामदाफा टाइगर रिज़र्व, अरुणाचल प्रदेश
  • कैमरा ट्रैप के माध्यम से कमलांग टाइगर रिज़र्व, लोहित ज़िला (अरुणाचल प्रदेश) में भी दर्ज

संरक्षण स्थिति

  • IUCN रेड लिस्ट: गंभीर रूप से संकटग्रस्त
  • भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972: अनुसूची-IV

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में इंटीग्रेटेड सिक्योरिटी हब लॉन्च

भारत ने अपने द्वीपीय क्षेत्रों में सुरक्षा और सुशासन को मजबूत करने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया है। तकनीक आधारित निगरानी और समन्वय पर जोर देते हुए अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह में एक प्रमुख सुरक्षा अवसंरचना परियोजना की शुरुआत की गई है। यह पहल राष्ट्रीय सुरक्षा, विकास और पर्यटन को रणनीतिक रूप से जोड़ने की सरकार की व्यापक दृष्टि को दर्शाती है।

क्यों खबर में?

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह में एक एकीकृत कमांड एंड कंट्रोल सेंटर का उद्घाटन किया। इसके साथ ही उन्होंने 9 परियोजनाओं का उद्घाटन किया और 2 नई परियोजनाओं की आधारशिला रखी। इन सभी परियोजनाओं में कुल ₹373 करोड़ का निवेश किया गया है।

एकीकृत कमांड एंड कंट्रोल सेंटर के बारे में

  • ₹229 करोड़ की लागत से निर्मित यह सेंटर द्वीपों में सुरक्षा प्रबंधन और आपातकालीन प्रतिक्रिया को सुदृढ़ करने के लिए बनाया गया है।
  • यह निगरानी, संचार और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय को एक ही प्लेटफॉर्म पर एकीकृत करता है।
  • गृह मंत्री ने कहा कि यह केंद्र देश के विकसित शहरों में मौजूद आधुनिक सुविधाओं के समकक्ष है, जो इसकी उन्नत तकनीकी क्षमता को दर्शाता है।

अन्य परियोजनाएँ

  • कमांड एंड कंट्रोल सेंटर के साथ 9 विकास परियोजनाओं का उद्घाटन किया गया और 2 अतिरिक्त परियोजनाओं की आधारशिला रखी गई।
  • ये परियोजनाएँ अवसंरचना विकास, सार्वजनिक सेवाओं और प्रशासनिक दक्षता पर केंद्रित हैं।
  • इनका उद्देश्य निवासियों के जीवन स्तर में सुधार करना है, साथ ही यह सुनिश्चित करना है कि विकास के साथ आंतरिक सुरक्षा भी मजबूत बनी रहे।

अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह का रणनीतिक महत्व

  • यह क्षेत्र हिंद महासागर के प्रमुख अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों के निकट स्थित होने के कारण अत्यंत रणनीतिक और भू-राजनीतिक महत्व रखता है।
  • सुरक्षा अवसंरचना के सुदृढ़ीकरण से समुद्री सुरक्षा, आपदा प्रबंधन और निगरानी क्षमता में वृद्धि होगी।
  • यह क्षेत्र प्राकृतिक आपदाओं के प्रति संवेदनशील है, इसलिए त्वरित प्रतिक्रिया के लिए एकीकृत नियंत्रण प्रणालियाँ बेहद आवश्यक हैं।

द्वीपों के लिए सरकार की दृष्टि

  • गृह मंत्री ने कहा कि पिछले 11 वर्षों में हुए परिवर्तन यह दर्शाते हैं कि सरकार भारत की हर इंच भूमि को माँ भारती के रूप में देखती है।
  • सरकार का फोकस पर्यटन को बढ़ावा देने, विकास को गति देने और सुरक्षा को मजबूत करने पर है, विशेष रूप से छोटे और दूरदराज़ द्वीपों में।
  • ऐसी पहलें राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करने के साथ-साथ सतत पर्यटन के माध्यम से आर्थिक संभावनाओं को भी खोलती हैं।

अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह – मुख्य बिंदु

  • स्थान: बंगाल की खाड़ी
  • कुल द्वीप: लगभग 572 (जिनमें 37 आबाद हैं)
  • महत्व: समुद्री सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत रणनीतिक

अंडमान द्वीपसमूह

  • स्थिति: भारतीय मुख्यभूमि के अपेक्षाकृत निकट
  • विस्तार: उत्तर–दक्षिण दिशा में लगभग 800 किमी
  • प्रमुख द्वीप: उत्तर अंडमान, मध्य अंडमान और दक्षिण अंडमान
  • राजधानी: पोर्ट ब्लेयर (दक्षिण अंडमान)
  • रणनीतिक महत्व: टेन डिग्री चैनल और मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित

निकोबार द्वीपसमूह

  • स्थिति: अंडमान द्वीपसमूह के दक्षिण में, टेन डिग्री चैनल द्वारा अलग
  • राजधानी: कार निकोबार
  • रणनीतिक महत्व: इंदिरा पॉइंट – भारत का दक्षिणतम छोर, प्रमुख समुद्री मार्गों के निकट

PM मोदी ने 72वें राष्ट्रीय वॉलीबॉल टूर्नामेंट का उद्घाटन किया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से वाराणसी में आयोजित 72वीं राष्ट्रीय वॉलीबॉल प्रतियोगिता का उद्घाटन किया। खिलाड़ियों और अधिकारियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि वॉलीबॉल में टीमवर्क, समन्वय और सामूहिक जिम्मेदारी जैसे मूल्य भारत की विकास यात्रा को भी प्रतिबिंबित करते हैं। इस आयोजन में देशभर की टीमों ने भाग लिया और यह खेल एवं युवा विकास पर सरकार के मजबूत फोकस को दर्शाता है।

क्यों खबर में?

प्रधानमंत्री मोदी ने वाराणसी में 72वीं राष्ट्रीय वॉलीबॉल प्रतियोगिता का उद्घाटन किया और वॉलीबॉल की टीम भावना की तुलना राष्ट्र निर्माण और खेल विकास में भारत की सामूहिक प्रगति से की।

कार्यक्रम की मुख्य झलकियाँ और प्रधानमंत्री का संदेश

  • प्रधानमंत्री ने टीमवर्क और सामूहिक जिम्मेदारी पर जोर दिया।
  • वॉलीबॉल समन्वय, विश्वास और साझा प्रयास सिखाता है, जो राष्ट्र निर्माण जैसा ही है।
  • कोई भी जीत अकेले हासिल नहीं होती; हर खिलाड़ी की भूमिका सफलता के लिए अहम होती है।
  • 28 राज्यों की टीमों की भागीदारी ने “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” की भावना को दर्शाया।
  • कठिन तैयारी के बाद क्वालिफाई करने वाले खिलाड़ियों की सराहना की गई।
  • संदेश का मूल भाव “टीम फर्स्ट” और “इंडिया फर्स्ट” रहा।

खेल विकास के लिए सरकार की पहल

  • प्रमुख सुधार और एथलीट-केंद्रित पहलें लागू की गईं।
  • खेल बजट में वृद्धि और प्रतिभा पहचान पर विशेष ध्यान।
  • वैज्ञानिक प्रशिक्षण और पोषण को एथलीट-केंद्रित दृष्टिकोण में शामिल किया गया।
  • नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस एक्ट और खेलो भारत नीति 2025 जैसे सुधार लागू।
  • चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता और खेल व शिक्षा के बीच संतुलन को प्रोत्साहन।
  • जेन-ज़ी युवा खिलाड़ी वैश्विक स्तर पर बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं।

जमीनी स्तर से वैश्विक लक्ष्य

  • स्थानीय भागीदारी से लेकर वैश्विक मेज़बानी तक की महत्वाकांक्षा।
  • खेलो इंडिया से युवाओं को राष्ट्रीय स्तर पर भागीदारी का अवसर।
  • सांसद खेल महोत्सव में देशभर से लगभग एक करोड़ युवाओं की भागीदारी।
  • भारत ने फीफा अंडर-17 विश्व कप, हॉकी विश्व कप और शतरंज जैसे अंतरराष्ट्रीय आयोजन किए।
  • 2030 राष्ट्रमंडल खेल और 2036 ओलंपिक की मेज़बानी का लक्ष्य।
  • खेल अवसंरचना का उन्नयन जारी, जिसमें वाराणसी का सिगरा स्टेडियम शामिल है।

राष्ट्रीय वॉलीबॉल प्रतियोगिता के बारे में

  • वॉलीबॉल फेडरेशन ऑफ इंडिया (VFI) द्वारा वार्षिक आयोजन।
  • राज्य और संस्थागत टीमों की भागीदारी।
  • प्रतिभा खोज और राष्ट्रीय चयन के लिए मंच।
  • वॉलीबॉल में जमीनी स्तर की भागीदारी को बढ़ावा।
  • भारत की सबसे पुरानी राष्ट्रीय स्तर की टीम खेल प्रतियोगिताओं में से एक।

वॉलीबॉल फेडरेशन ऑफ इंडिया (VFI)

  • खेल: वॉलीबॉल
  • क्षेत्राधिकार: भारत
  • संक्षेप: VFI
  • स्थापना: 1951
  • मुख्यालय: चेन्नई, तमिलनाडु, भारत

जानें कौन हैं IPS अधिकारी सदानंद दाते? जिन्हें बनाया गया महाराष्ट्र का नया DGP

महाराष्ट्र को एक नया पुलिस प्रमुख मिला है, जिसमें एक वरिष्ठ और अनुभवी अधिकारी को राज्य पुलिस बल का नेतृत्व सौंपा गया है। यह नियुक्ति पुलिस नेतृत्व में स्थिरता और स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए निर्धारित न्यायिक दिशानिर्देशों के अनुरूप की गई है। नए पुलिस महानिदेशक (DGP) के पास आतंकवाद-रोधी अभियानों, शहरी पुलिसिंग और केंद्रीय जांच एजेंसियों में व्यापक अनुभव है।

क्यों खबर में?

सदानंद वसंत दाते ने महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक (DGP) के रूप में कार्यभार संभाला है। उन्होंने रश्मि शुक्ला का स्थान लिया है, जो राज्य की पहली महिला पुलिस प्रमुख थीं।

नए महाराष्ट्र DGP के बारे में

डॉ. सदानंद दाते 1990 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं और पुलिसिंग व आंतरिक सुरक्षा में उनका लंबा और प्रतिष्ठित करियर रहा है। हालांकि उनकी सेवानिवृत्ति दिसंबर 2026 में प्रस्तावित है, फिर भी वे पूरा दो वर्ष का कार्यकाल DGP के रूप में पूरा करेंगे। यह सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप है, जिनके तहत राज्य के पुलिस प्रमुख को न्यूनतम निश्चित कार्यकाल देना अनिवार्य है, ताकि निरंतरता बनी रहे और राजनीतिक दबाव से बचाव हो सके।

पेशेवर अनुभव और प्रमुख भूमिकाएँ

DGP नियुक्ति से पहले, दाते राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) के प्रमुख के रूप में कार्यरत थे। उन्होंने महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधक दस्ते (ATS) का भी नेतृत्व किया और कई संवेदनशील आतंकी मामलों की जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मुंबई में वे संयुक्त पुलिस आयुक्त (कानून एवं व्यवस्था) तथा बाद में संयुक्त पुलिस आयुक्त, अपराध शाखा के पद पर रहे, जिससे उन्हें गहन परिचालन अनुभव प्राप्त हुआ।

शहरी पुलिसिंग और सुरक्षा में भूमिका

डॉ. दाते नवगठित मीरा-भायंदर–वसई-विरार (MBVV) पुलिस आयुक्तालय के पहले पुलिस आयुक्त रहे, जिसकी स्थापना 2020 में हुई थी। वे अपनी स्वच्छ छवि और पेशेवर कार्यशैली के लिए जाने जाते हैं। हाल ही में, NIA में कार्यरत रहते हुए उन्होंने दिल्ली कार ब्लास्ट मामले की जांच की निगरानी की, जिससे एक सुरक्षा-केंद्रित प्रशासक के रूप में उनकी साख और मजबूत हुई।

DGP का कार्यकाल और सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया है कि राज्य के DGP को न्यूनतम दो वर्ष का निश्चित कार्यकाल दिया जाए। इस सुधार का उद्देश्य पुलिस स्वायत्तता, पेशेवर दक्षता और जवाबदेही को बढ़ाना है, ताकि शीर्ष पुलिस नेतृत्व को बार-बार होने वाले तबादलों से बचाया जा सके। यह नीति उस स्थिति में भी लागू होती है जब अधिकारी सेवानिवृत्ति के करीब हो—जैसा कि रश्मि शुक्ला और सदानंद दाते दोनों की नियुक्तियों में देखा गया है।

राष्ट्रीय पक्षी दिवस 2026: इतिहास, महत्व और मुख्य तथ्य

राष्ट्रीय पक्षी दिवस 2026 (National Bird Day 2026) 5 जनवरी को मनाया जाएगा। यह दिवस पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में पक्षियों की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका की ओर ध्यान आकर्षित करता है। परागण से लेकर कीट नियंत्रण तक, पक्षी स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र को सहारा देते हैं। साथ ही यह दिन याद दिलाता है कि आवास विनाश, जलवायु परिवर्तन और अवैध वन्यजीव व्यापार आज भी दुनिया भर में पक्षी आबादी के लिए गंभीर खतरे बने हुए हैं, जिससे संरक्षण प्रयास और भी आवश्यक हो गए हैं।

क्यों चर्चा में है?

राष्ट्रीय पक्षी दिवस 2026 को 5 जनवरी 2026 को विश्व स्तर पर मनाया जा रहा है। इसका उद्देश्य पक्षी संरक्षण के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाना और पक्षियों तथा उनके आवासों की रक्षा के लिए व्यक्तिगत एवं सामुदायिक स्तर पर कार्रवाई को प्रोत्साहित करना है।

राष्ट्रीय पक्षी दिवस क्या है?

राष्ट्रीय पक्षी दिवस एक वार्षिक आयोजन है, जो पक्षियों के कल्याण और संरक्षण को समर्पित होता है। यह दिवस पक्षियों को आवास विनाश, अवैध वन्यजीव व्यापार, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैसे खतरों से बचाने के महत्व को उजागर करता है। साथ ही, यह पक्षियों के नैतिक और मानवीय संरक्षण को बढ़ावा देता है तथा जंगली पक्षियों को कैद में रखने से हतोत्साहित करता है, यह स्पष्ट संदेश देते हुए कि पक्षी अपने प्राकृतिक आवास में ही सुरक्षित और स्वतंत्र रहते हैं।

राष्ट्रीय पक्षी दिवस का इतिहास

राष्ट्रीय पक्षी दिवस की शुरुआत 2002 में एवियन वेलफेयर कोएलिशन द्वारा की गई थी। यह अमेरिका के ऐतिहासिक क्रिसमस बर्ड काउंट के साथ जुड़ा हुआ है, जो दुनिया के सबसे पुराने वन्यजीव सर्वेक्षणों में से एक है। इस दिवस का उद्देश्य विशेष रूप से पालतू पक्षी व्यापार में होने वाले शोषण के प्रति जागरूकता फैलाना और पक्षियों के सामने मौजूद दीर्घकालिक संरक्षण चुनौतियों पर लोगों को शिक्षित करना था।

राष्ट्रीय पक्षी दिवस 2026 का महत्व

राष्ट्रीय पक्षी दिवस 2026 इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पक्षी पर्यावरणीय स्वास्थ्य के प्रमुख संकेतक होते हैं। उनकी संख्या में गिरावट अक्सर पारिस्थितिक असंतुलन का संकेत देती है। यह दिवस लोगों को प्रेरित करता है कि वे—

  • पारिस्थितिकी तंत्र में पक्षियों की भूमिका को समझें
  • आवास संरक्षण और पुनर्स्थापन का समर्थन करें
  • वन्यजीवों के साथ सह-अस्तित्व को बढ़ावा दें
  • पक्षियों को नुकसान पहुँचाने वाली मानवीय गतिविधियों को कम करें

यह शिक्षा और सामुदायिक पहलों में संरक्षण मूल्यों को भी सुदृढ़ करता है।

भारत का राष्ट्रीय पक्षी

  • भारतीय मोर (Peacock), जिसका वैज्ञानिक नाम Pavo cristatus है, भारत का राष्ट्रीय पक्षी है।
  • इसे 1963 में इसके सांस्कृतिक, धार्मिक और पारिस्थितिक महत्व के कारण राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया गया।
  • मोर को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के अंतर्गत संरक्षण प्राप्त है और यह भारतीय कला, लोककथाओं और परंपराओं में व्यापक रूप से दर्शाया जाता है।

भारत में पक्षी संरक्षण

भारत में पक्षियों की समृद्ध जैव विविधता पाई जाती है और यहाँ 70 से अधिक पक्षी अभयारण्य हैं।
प्रमुख स्थलों में—

  • केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (भरतपुर)
  • वेदांतंगल पक्षी अभयारण्य

भारत में संरक्षण प्रयास मुख्य रूप से आर्द्रभूमि संरक्षण, वन संरक्षण और सामुदायिक सहभागिता पर केंद्रित हैं, ताकि प्रवासी और स्थानीय पक्षी प्रजातियों की रक्षा की जा सके।

भारत के “बर्डमैन”

  • डॉ. सलीम अली को प्रेमपूर्वक “भारत का बर्डमैन” कहा जाता है।
  • वे एक अग्रणी पक्षी विज्ञानी थे, जिनके व्यापक सर्वेक्षणों ने भारत में आधुनिक पक्षी विज्ञान (ऑर्निथोलॉजी) की नींव रखी।
  • उनके कार्यों ने देश में पक्षी संरक्षण नीतियों और जन-जागरूकता को गहराई से प्रभावित किया।

MoSPI ने नया लोगो और शुभंकर लॉन्च किया

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने अपनी संस्थागत पहचान को आधुनिक स्वरूप देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए नया लोगो और शुभंकर (मास्कॉट) लॉन्च किया है। यह पहल डेटा-आधारित शासन, पारदर्शिता और नीति निर्माण में विश्वसनीय आँकड़ों की भूमिका को सशक्त रूप से रेखांकित करती है।

खबरों में क्यों?

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने लोगों तक अपनी पहुंच बढ़ाने, सरकारी आंकड़ों पर भरोसा बेहतर करने और पॉलिसी बनाने और राष्ट्र निर्माण में डेटा की भूमिका को मज़बूत करने के लिए एक नया ऑफिशियल लोगो और मैस्कॉट लॉन्च किया है।

नए लोगो की थीम और दृष्टि

  • नवीन रूप से लॉन्च किया गया यह लोगो “Data for Development (विकास के लिए डेटा)” की थीम पर आधारित है, जो यह दर्शाता है कि किस प्रकार सांख्यिकी भारत की आर्थिक और सामाजिक प्रगति को समर्थन देती है।
  • यह लोगो MoSPI के उस मिशन को दृश्य रूप में प्रस्तुत करता है, जिसके तहत मंत्रालय विश्वसनीय, समयबद्ध और पारदर्शी आँकड़े उपलब्ध कराता है, जो अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य, शिक्षा और अवसंरचना जैसे क्षेत्रों में साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण और निर्णय प्रक्रिया में सहायक होते हैं।

लोगो के प्रमुख डिज़ाइन तत्व

  • अशोक चक्र: सत्य, पारदर्शिता और सुशासन का प्रतीक।
  • केंद्र में रुपये का चिह्न (₹): आर्थिक योजना और राजकोषीय नीति निर्माण में सांख्यिकी की भूमिका को दर्शाता है।
  • संख्यात्मक आकृतियाँ और ऊपर की ओर बढ़ती ग्रोथ बार: आधुनिक डेटा प्रणालियों और सटीक आँकड़ों से संचालित प्रगति का संकेत।

रंग योजना और उसका महत्व

  • लोगो में केसरिया, सफेद, हरा और गहरा नीला रंग उपयोग किए गए हैं।
  • ये रंग राष्ट्रीय तिरंगे से प्रेरित हैं और विकास, स्थिरता, सततता, विश्वास और ज्ञान जैसे मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • समग्र रूप से, ये डिज़ाइन तत्व MoSPI की ईमानदारी, राष्ट्रीय विकास और आधुनिक सांख्यिकी विज्ञान के प्रति प्रतिबद्धता को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं।

शुभंकर (मास्कॉट) का परिचय

  • लोगो के साथ MoSPI ने अपना शुभंकर “सांख्यिकी” लॉन्च किया है।
  • यह एक मित्रवत और नागरिक-केंद्रित चरित्र के रूप में डिज़ाइन किया गया है।
  • इसका उद्देश्य जटिल सांख्यिकीय अवधारणाओं को सरल और सहज बनाकर आम लोगों तक पहुँचाना है।

जनसंपर्क में शुभंकर की भूमिका

  • यह मास्कॉट MoSPI की सार्वजनिक पहचान के रूप में कार्य करेगा और इसका उपयोग सर्वेक्षणों, जागरूकता अभियानों, शैक्षणिक पहलों, डिजिटल प्लेटफॉर्मों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में किया जाएगा।
  • इससे राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा किए जाने वाले सर्वेक्षणों में जनभागीदारी बढ़ने और प्रतिक्रिया की गुणवत्ता में सुधार होने की उम्मीद है।

Recent Posts

about | - Part 60_12.1
QR Code
Scan Me