जन विश्वास संशोधन विधेयक 2026 पारित: 784 प्रावधानों में बड़ा बदलाव

लोकसभा ने 1 अप्रैल, 2026 को जन विश्वास (प्रावधान संशोधन) विधेयक, 2026 को पारित कर दिया। यह विधेयक कुछ अधिनियमों में संशोधन करके अपराधों को निर्दिष्ट श्रेणी से निकालने और तर्कसंगत बनाने का प्रयास करता है। इसे जीवन तथा व्यापार में सुगमता लाने के लिए विश्वास आधारित शासन को और मजबूत करने के उद्देश्य से लाया गया है।

विधेयक में छोटे अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने और जुर्माने तथा दंड को अपराध के अनुपात में संशोधित करने के उपाय शामिल हैं। इसमें 23 मंत्रालयों द्वारा प्रशासित 79 केंद्रीय अधिनियमों में संशोधन का प्रस्ताव है। कुल 784 प्रावधानों में संशोधन प्रस्तावित है। इनमें 717 प्रावधानों को व्यापार में सुगमता लाने और 67 प्रावधानों को जीवन में सुगमता लाने के लिए इस संशोधन में प्रस्‍तावित किया गया है।

जन विश्वास संशोधन विधेयक 2026

जन विश्वास विधेयक 2026 लोकसभा में ध्वनि मत से पारित हो गया, और इसके साथ ही यह एक महत्वपूर्ण विधायी सुधार का प्रतीक बन गया है।

इस विधेयक पर हुई बहस के दौरान वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने इस बात पर ज़ोर दिया कि यह विधेयक:

  • व्यक्तियों और व्यवसायों पर कानूनी बोझ को कम करेगा
  • MSME (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों) और नए उद्यमियों को भी सहायता प्रदान करेगा
  • भारत के विनियामक वातावरण में सुधार लाएगा

यह विधेयक सरकार की ‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन’ (Minimum Government, Maximum Governance) की व्यापक पहल का भी एक हिस्सा है।

यह बिल क्या बदलाव लाता है?

इस सुधार का असर काफी अहम है और यह कई मंत्रालयों और कानूनों को कवर करेगा।

मुख्य बातें ये हैं:

  • अलग-अलग बिलों के 784 प्रावधानों में संशोधन किया जाएगा
  • कुल 79 केंद्रीय कानून इसमें शामिल हैं
  • इसके तहत 23 मंत्रालय आते हैं
  • लगभग 717 प्रावधानों को अपराध की श्रेणी से हटाया जाएगा
  • सरलीकरण के लिए 67 प्रावधानों में संशोधन किया गया है
  • 1,000 से ज़्यादा अपराधों को तर्कसंगत बनाया जाएगा

अपराध-मुक्ति पर ज़ोर: इसका क्या मतलब है?

यह बिल छोटे और तकनीकी अपराधों के लिए आपराधिक दंडों को समाप्त करता है, और इसके स्थान पर निम्नलिखित को लागू करेगा:

  • आर्थिक दंड
  • दीवानी दायित्व

अपराध-मुक्त करना इसलिए महत्वपूर्ण है ताकि अनावश्यक आपराधिक मुकदमों को रोका जा सके और साथ ही अदालतों तथा न्यायपालिका पर पड़ने वाले बोझ को कम किया जा सके। इसके अलावा, यह व्यवसायों को बिना किसी डर के नियमों का पालन करने के लिए भी प्रोत्साहित करेगा।

इससे विशेष रूप से छोटे व्यवसायों और स्टार्टअप्स को लाभ मिलेगा, जिन्हें अक्सर जटिल कानूनी आवश्यकताओं का पालन करने में संघर्ष करना पड़ता है।

‘जन विश्वास पहल’ क्या है?

‘जन विश्वास पहल’ का मुख्य उद्देश्य विश्वास-आधारित शासन व्यवस्था का निर्माण करना, अत्यधिक नियमों-कानूनों को कम करना और लोगों के जीवन तथा व्यापार करने में सुगमता को बढ़ावा देना है।

इसका कार्यान्वयन भारत के उन व्यापक सुधारों के अनुरूप है, जिनका लक्ष्य वैश्विक व्यापार रैंकिंग और निवेश के माहौल में सुधार लाना है।

 

मेघालय ने दूरदराज के इलाकों में हाई-स्पीड इंटरनेट पहुँचाने के लिए Starlink India के साथ साझेदारी की

मेघालय ने पूरे राज्य में कनेक्टिविटी को बेहतर बनाने के लिए Starlink के साथ साझेदारी की है। इसकी घोषणा 1 अप्रैल, 2026 को की गई थी, और इस समझौते का उद्देश्य राज्य के दूरदराज और कम सुविधा वाले क्षेत्रों तक हाई-स्पीड इंटरनेट पहुँचाना है। माननीय मुख्यमंत्री कॉनराड के. संगमा ने इस बात पर ज़ोर दिया कि यह साझेदारी शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और ग्रामीण आजीविका जैसे क्षेत्रों में बदलाव ला सकती है।

मेघालय-स्टारलिंक समझौता

  • मेघालय सरकार ने स्टारलिंक इंडिया के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं। यह पूर्वोत्तर राज्य में डिजिटल खाई को पाटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
  • यह साझेदारी सैटेलाइट-आधारित इंटरनेट सेवाएँ उपलब्ध कराने पर, और साथ ही दूरदराज व दुर्गम इलाकों तक पहुँचने पर केंद्रित है। यह पहाड़ी राज्य में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मज़बूत करने में भी अहम भूमिका निभाती है।
  • पारंपरिक ब्रॉडबैंड की तुलना में, Starlink लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) सैटेलाइट्स का इस्तेमाल करता है। यह मेघालय जैसे भौगोलिक रूप से चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में भी तेज़ और ज़्यादा भरोसेमंद कनेक्टिविटी उपलब्ध कराएगा।

मेघालय के लिए सैटेलाइट इंटरनेट की आवश्यकता

हालांकि राज्य ने बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में अच्छी प्रगति की है, फिर भी राज्य के कई हिस्सों में इंटरनेट की सीमित पहुँच की समस्या बनी हुई है, जिसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

  • पहाड़ी भूभाग और घने जंगलों की उपस्थिति
  • राज्य में फाइबर ऑप्टिक नेटवर्क की कमी
  • अत्यधिक दूरस्थ ग्रामीण बस्तियाँ

मुख्यमंत्री ने इसके महत्व पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि इससे शासन प्रक्रियाओं में काफ़ी सुधार होगा, और समय-सीमा 30 दिनों से घटकर मात्र 3 दिन रह जाएगी।

प्रमुख क्षेत्रों पर प्रभाव

  • Starlink के साथ सहयोग से कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण सुधार आने की उम्मीद है।
  • यह शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव लाने में अहम भूमिका निभाएगा, जहाँ दूरदराज के स्कूलों को ऑनलाइन लर्निंग प्लेटफॉर्म के साथ-साथ डिजिटल क्लासरूम तक भी पहुँच मिल सकेगी।
  • इससे शिक्षा के लिए बेहतर संसाधन उपलब्ध होंगे और ग्रामीण क्षेत्रों में सीखने के परिणामों में भी सुधार आएगा।
  • स्वास्थ्य क्षेत्र में बेहतर कनेक्टिविटी से टेलीमेडिसिन सेवाओं की शुरुआत संभव हो पाएगी, और साथ ही आपातकालीन स्थितियों में त्वरित सहायता भी सुलभ हो जाएगी।
  • साथ ही, दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों के डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड को सुरक्षित रखना।

इसके अलावा, किसानों और स्थानीय व्यवसायों को बाज़ार की जानकारी तक पहुँच मिलने से, तथा डिजिटल भुगतान और ई-कॉमर्स का हिस्सा बनने से भी लाभ होगा।

INS मालवन भारतीय नौसेना को सौंपा गया: अगली पीढ़ी के पनडुब्बी-रोधी पोत की पूरी जानकारी

INS मालवन की डिलीवरी से भारतीय नौसेना की ताकत को और बढ़ावा मिलेगा। यह अगली पीढ़ी का एंटी-सबमरीन युद्धपोत है, जिसे 31 मार्च, 2026 को कोच्चि में सौंपा गया। इसे पूरी तरह से देश के भीतर ही बनाया गया है, जिसमें 80% से अधिक स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल हुआ है; इस युद्धपोत को भारत की समुद्री तटरेखा को पानी के नीचे से होने वाले खतरों से बचाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। INS मालवन रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और समुद्री सीमाओं की सुरक्षा पर देश के बढ़ते फोकस को दर्शाता है।

INS मालवन: आधुनिक युद्धपोत

  • भारतीय नौसेना में INS मालवन का शामिल होना, आठ ‘एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट्स’ (ASW SWC) के नियोजित बेड़े में दूसरा जुड़ाव है, जिन्हें विशेष रूप से नौसेना के लिए ही निर्मित किया जाना है।
  • इसका निर्माण कोच्चि स्थित कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड द्वारा किया गया था, और यह पोत रक्षा निर्माण के क्षेत्र में ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में भारत के प्रयासों को दर्शाता है।
  • इसके अलावा, इसे वैश्विक वर्गीकरण मानकों के तहत डिज़ाइन किया गया है, जो नौसेना की विशिष्ट आवश्यकताओं को भी पूरा करता है।
  • इस परियोजना का उद्देश्य पुरानी हो चुकी ‘अभय-श्रेणी’ की कोरवेट्स को बदलना है, और इसीलिए देश के तटीय रक्षा बुनियादी ढांचे को उन्नत करना महत्वपूर्ण है।

तटीय सुरक्षा के लिए INS मालवन क्यों महत्वपूर्ण है?

यह ASW विशेष रूप से तटीय या उथले पानी के ऑपरेशन्स के लिए बनाया गया है, जहाँ बड़े युद्धपोत कम प्रभावी होते हैं।

ये क्षेत्र अत्यंत संवेदनशील हैं, क्योंकि यहाँ दुश्मन की पनडुब्बियाँ मौजूद हैं जो छिपकर काम कर सकती हैं। इसके अलावा, इस क्षेत्र का तटीय ढाँचा और बंदरगाह भी असुरक्षित हैं, और पारंपरिक रूप से बड़े जहाजों को यहाँ परिचालन संबंधी सीमाओं का सामना करना पड़ता है।

बेहतर सोनार और निगरानी प्रणालियों से लैस यह ASW, भारत के तटों के निकट मौजूद पानी के नीचे के खतरों के विरुद्ध रक्षा की पहली पंक्ति के रूप में कार्य करता है।

नौसेना के बेड़े के विस्तार की एक बड़ी योजना का हिस्सा

INS मालवन, INS माहे के बाद दूसरा जहाज़ है; यह आठ जहाज़ों की एक नियोजित श्रृंखला का हिस्सा है।

इस श्रृंखला में आने वाले जहाज़ हैं:

  • मालवन
  • मांगरोल
  • मालपे
  • मुल्की
  • मुनरो
  • मक्का
  • मांडवी

यह बेड़ा भारत के तटीय रक्षा नेटवर्क और समुद्री प्रभुत्व को काफी मज़बूत करेगा।

विरासत और नामकरण का महत्व

  • इस जहाज़ का नाम मालवन के नाम पर रखा गया है, जो महाराष्ट्र का एक ऐतिहासिक तटीय शहर है। इसका संबंध छत्रपति शिवाजी महाराज से है, जिन्हें अपनी शक्तिशाली नौसेना की शुरुआत के लिए जाना जाता है।
  • यह पहले के INS मालवन की विरासत को भी आगे बढ़ाता है; यह एक माइनस्वीपर जहाज़ था जिसने 2003 तक नौसेना में सेवा दी थी।
  • यह ऐतिहासिक गौरव और आधुनिक क्षमताओं के मेल को दर्शाता है।

एंटी-सबमरीन वॉरफेयर (ASW) क्या है?

एंटी-सबमरीन वॉरफेयर (ASW) उन सैन्य रणनीतियों और तकनीकों को कहते हैं जिनका इस्तेमाल दुश्मन की पनडुब्बियों को:

  • पता लगाने
  • ट्रैक करने
  • और बेअसर करने के लिए किया जाता है।

ASW में सोनार सिस्टम, टॉरपीडो और विमानों व जहाजों से निगरानी करने का इस्तेमाल शामिल होता है।

भारतीय सेना ने दक्षिणी, पूर्वी और पश्चिमी कमानों के लिए नए कमांडरों की नियुक्ति की

भारतीय सेना ने 1 अप्रैल, 2026 को अपनी तीन प्रमुख ऑपरेशनल इकाइयों—दक्षिणी, पूर्वी और पश्चिमी कमांड—में कई नए कमांडरों की नियुक्ति की है। यह बदलाव ऐसे समय में हो रहा है, जब भारत तकनीकी एकीकरण और रणनीतिक तैयारियों के साथ अपनी ऑपरेशनल तत्परता को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। उम्मीद है कि ये नवनियुक्त कमांडर भारतीय सेना की क्षमताओं को और अधिक सुदृढ़ करेंगे।

लेफ्टिनेंट जनरल संदीप जैन को दक्षिणी कमान की जिम्‍मेदारी मिली

लेफ्टिनेंट जनरल संदीप जैन ने दक्षिणी कमान की जिम्मेदारी संभाली है। उन्होंने लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ की जगह ली है, जो अब सेना के उप प्रमुख बन चुके हैं। महार रेजिमेंट से जुड़े संदीप जैन को जून 1988 में सेना में कमीशन मिला था। अपने लंबे करियर में उन्होंने विभिन्न ऑपरेशनल और स्टाफ पदों पर काम किया है और कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाई हैं।

लेफ्टिनेंट जनरल वीएमबी कृष्णन को पूर्वी कमान की जिम्मेदारी

लेफ्टिनेंट जनरल वीएमबी कृष्णन ने पूर्वी कमान की जिम्मेदारी संभाली है। उन्होंने लेफ्टिनेंट जनरल आरसी तिवारी का स्थान लिया है, जो हाल ही में सेवानिवृत्त हुए हैं। जून 1988 में सेना में शामिल हुए कृष्णन के पास लगभग चार दशकों का व्यापक सैन्य अनुभव है। उन्होंने देश के कई संवेदनशील इलाकों में कमान, प्रशिक्षण और स्टाफ से जुड़े महत्वपूर्ण पद संभाले हैं।

लेफ्टिनेंट जनरल पुष्पेंद्र पाल सिंह को पश्चिमी कमान मिली 

लेफ्टिनेंट जनरल पुष्पेंद्र पाल सिंह ने पश्चिमी कमान की कमान संभाली है। उन्होंने 1 अप्रैल 2026 को जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ के रूप में अपना कार्यभार ग्रहण किया है। वे इससे पहले सेना स्टाफ के उप-प्रमुख रह चुके हैं। उन्होंने लेफ्टिनेंट जनरल मनोज कुमार कटियार का स्थान लिया है, जो 31 मार्च को सेवानिवृत्त हुए हैं। पैराशूट रेजिमेंट (स्पेशल फोर्सेज) के अधिकारी पुष्पेंद्र पाल सिंह को दिसंबर 1987 में कमीशन मिला था। वे भारतीय सैन्य अकादमी और लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र हैं।

भारतीय सेना की कमानें: एक संक्षिप्त अवलोकन

भारतीय सेना को सात कमानों में विभाजित किया गया है, और इनमें से प्रत्येक कमान एक विशिष्ट भौगोलिक और रणनीतिक क्षेत्र के लिए जिम्मेदार है।

मुख्य कमानों में शामिल हैं:

  • उत्तरी कमान – जम्मू और कश्मीर
  • पश्चिमी कमान – पंजाब और पश्चिमी सीमाएँ
  • पूर्वी कमान – पूर्वोत्तर और चीन सीमा
  • दक्षिणी कमान – प्रायद्वीपीय भारत

इनमें से प्रत्येक कमान भारत की सुरक्षा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ बने नए उपसेना प्रमुख

भारतीय सेना में सुदर्शन चक्र कोर की कमान संभाल चुके लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ को बड़ी जिम्‍मेदारी मिली है। सेना के दक्षिणी कमान के जनरल कमांडिंग ऑफिसर इन चीफ रहे लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ ने देश के नए उपसेना प्रमुख का पदभार संभाल लिया। इसके साथ ही पश्चिमी, दक्षिणी और पूर्वी कमान में भी नए जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ की नियुक्ति की गई है।

आतंकवाद विरोधी अभियानों समेत

खड़कवासला स्थित राष्ट्रीय रक्षा अकादमी से दिसंबर 1986 में सेना के बख्तरबंद कोर में कमीशन हासिल करने वाले लेफ्टिनेंट जनरल सेठ ने बीते लगभग चार दशकों के अपने कार्यकाल में आतंकवाद विरोधी अभियानों समेत देश के विभिन्न इलाकों में संघर्षपूर्ण परिस्थितियों और चुनौतियों का सफलतापूर्वक मुकाबला किया है। जबकि धीरज सेठ की जगह ही दक्षिणी कमान के जनरल आफिसर कमांडिंग-इन-चीफ का कार्यभार लेफ्टिनेंट जनरल संदीप जैन ने संभाल लिया।

आतंकवाद-विरोधी बल की कमान संभालने का अनुभव

  • लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ के पास रेगिस्तानी क्षेत्र में एक बख्तरबंद रेजिमेंट, विकसित क्षेत्र में एक बख्तरबंद ब्रिगेड और जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद-विरोधी बल की कमान संभालने का अनुभव है।
  • लेफ्टिनेंट जनरल के पद पर पदोन्नति के बाद उन्होंने सुदर्शन चक्र कोर की कमान संभाली और बाद में दिल्ली क्षेत्र के जनरल ऑफिसर कमांडिंग के रूप में करते हुए प्रमुख राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अभियानों का नेतृत्व किया।
  • सेना कमांडर के पद पर पदोन्नत होने के बाद उन्होंने दक्षिण पश्चिमी कमान और दक्षिणी कमान के जनरल आफिसर कमांडिंग-इन-चीफ के रूप में कार्य किया। साथ ही पश्चिमी मोर्चे पर सेना के दो आपरेशनल कमांड की कमान संभालने का दुर्लभ गौरव भी प्राप्त किया।

महत्वपूर्ण रणनीतिक पदों पर काम करने का अनुभव

जम्मू-कश्मीर में एक स्वतंत्र बख्तरबंद ब्रिगेड के ब्रिगेड मेजर, अंगोला में संयुक्त राष्ट्र मिशन के संचालन अधिकारी, सेना मुख्यालय में सहायक सैन्य सचिव, दक्षिण पश्चिमी कमान मुख्यालय में ब्रिगेडियर जनरल स्टाफ आपरेशंस और अनुशासन, सहित कई महत्वपूर्ण रणनीतिक पदों पर काम करने का भी उन्हें अनुभव है। सेठ ने हायर कमांड कोर्स और प्रतिष्ठित नेशनल डिफेंस कालेज में प्रशिक्षण प्राप्त करने के साथ ही पेरिस में कमांड एंड स्टाफ कोर्स में भी भाग लिया है।

विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस 2026: विषय, इतिहास और महत्व

हर साल 2 अप्रैल को विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस (World Autism Awareness Day) मनाया जाता है। इसका उद्देश्य ऑटिज्म के प्रति जागरूकता बढ़ाना और लोगों को इसके बारे में सही जानकारी देना है। आज भी कई माता-पिता इस बीमारी के शुरुआती संकेतों को समझ नहीं पाते और इसे सामान्य व्यवहार मानकर नजर अंदाज कर देते हैं, जिससे सही समय पर इलाज और सपोर्ट नहीं मिल पाता। हालांकि, यदि समय रहते इसके लक्षणों को पहचान लिया जाए, तो बच्चे के विकास में काफी सुधार संभव है।

ऑटिज्म क्या है?

ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम विकार (Autism Spectrum Disorder) एक ऐसी न्यूरोलॉजिकल स्थिति है, जो बच्चों के दिमाग के विकास को प्रभावित करती है। इसके कारण बच्चे के व्यवहार, बोलने की क्षमता और दूसरों के साथ जुड़ने के तरीके में अंतर देखने को मिलता है। हर बच्चे में इसके लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं, इसलिए इसे “स्पेक्ट्रम” कहा जाता है।

क्या है इस साल की थीम?

हर साल इस दिन की थीम अलग-अलग होती है। विश्व ऑटिज़्म जागरूकता दिवस 2026 का आयोजन “ऑटिज़्म और मानवता – हर जीवन का मूल्य है” विषय के तहत किया जा रहा है, जो हमारे साझा मानवीय भविष्य के हिस्से के रूप में सभी ऑटिस्टिक व्यक्तियों की गरिमा को सभी के सामने लाने का काम करती है।

ऑटिज्म के लक्षण?

ऑटिज्म के सामान्य लक्षणों में बातचीत में देरी, दूसरों के भावों को समझने में कठिनाई, बार-बार दोहराए जाने वाले व्यवहार और सामाजिक बातचीत में रुचि की कमी शामिल हैं। बच्चों में आंखों से संपर्क कम होना, किसी चीज़ पर अत्यधिक ध्यान देना और सामान्य गतिविधियों में असामान्य प्रतिक्रियाएँं दिख सकती हैं।

कब मनाया जाता है विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस?

विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस हर साल 2 अप्रैल को मनाया जाता है। इस दिन दुनिया भर में नीली रोशनी, कार्यक्रम और जागरूकता अभियान आयोजित किए जाते हैं ताकि ऑटिज्म के प्रति समाज में सकारात्मक सोच और समर्थन बढ़ सके।

पहली बार कब मनाया गया यह दिवस ?

संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 2007 में इस दिन को मनाने का एलान किया गया था। जिसके बाद विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस पहली बार 2 अप्रैल 2008 को मनाया गया था। इसका उद्देश्य दुनियाभर में ऑटिज्म के प्रति जागरूकता बढ़ाना और इससे जुड़े लोगों को समर्थन देना है।

 

NASA का ऐतिहासिक कदम: 50 वर्षों बाद मानव चंद्र मिशन की शुरुआत

नासा का आर्मिटस II मिशन के तहत चार अंतरिक्ष यात्रियों ने अमेरिका के फ्लोरिडा से उड़ान भरी है। यह चंद्रमा के चारों ओर घूमने की 10 दिन की बहुत महत्वपूर्ण यात्रा है। चीन की पहली मानव-युक्त लैंडिंग से पहले इंसानों को चंद्रमा की सतह पर भेजने की दिशा में अमेरिका का एक साहसी कदम माना जा रहा है। आर्मिटस II के क्रू सदस्य अंतरिक्ष में उस जगह तक जाएंगे, जहां तक इंसान पहले कभी नहीं पहुंचे हैं।

यह बहुत ही खास और ऐतिहासिक पल है, क्योंकि करीब 54 साल बाद इंसान फिर से चांद की ओर जा रहा है। इस मिशन में चार अंतरिक्ष यात्री शामिल हैं, मिशन कमांडर रीड वाइसमैन, पायलट विक्टर ग्लोवर, मिशन विशेषज्ञ क्रिस्टीना कोच और जेरेमी हैनसेन। तीन साल की ट्रेनिंग के बाद चार सदस्यों का यह क्रू नासा के आर्टिम कार्यक्रम में उड़ान भर रहा है।

इस मिशन का उद्देश्य

यह कार्यक्रम साल 2017 में शुरू किए गए कई अरब डॉलर के मिशनों की एक श्रृंखला है। इसका उद्देश्य अगले दशक और उसके बाद चंद्रमा पर अमेरिका की लंबे समय तक मौजूदगी सुनिश्चित करना है। नासा ने बतया है कि ओरियन अंतरिक्ष यान ‘डीप स्पेस नेटवर्क’ के साथ संपर्क में है। 50 सालों में पहली बार नासा को एक ऐसे अंतरिक्ष यान से सिग्नल मिल रहा है, जो इंसानों को लेकर चांद की ओर बढ़ रहा है।

चार एस्ट्रोनॉट में तीन पुरुष और एक महिला

आर्मिटस II के चार एस्ट्रोनॉट में तीन पुरुष और एक महिला है। चांद पर जा रही नासा टीम में अमेरिकी नागरिक रीड वाइजमैन, विक्टर ग्लोवर और क्रिस्टीना कोच के साथ कनाडाई नागरिक जेरेमी हैनसेन शामिल हैं। यह टीम 10 दिनों के मिशन पर चंद्रमा पर उतरे बिना पृथ्वी के उपग्रह का चक्कर लगाएगी। दरअसल क्रू का गमड्रॉप के आकार का ओरियन कैप्सूल पृथ्वी की कक्षा में उड़ान के साढ़े तीन घंटे बाद SLS के ऊपरी चरण से अलग होगा। इसके बाद अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष यान का मैनुअल कंट्रोल अपने हाथ में लेकर उसकी स्टीयरिंग और मैन्यूवरेबिलिटी की जांच करेंगे।

क्रू 25 घंटे पृथ्वी के चारों ओर एक ऊंची

क्रू 25 घंटे पृथ्वी के चारों ओर एक ऊंची, अंडाकार कक्षा में चक्कर लगाते हुए बिताएंगे और अलग हुए ऊपरी चरण को करीब से गुजरने वाले मैन्यूवर के लिए टारगेट के तौर पर इस्तेमाल करेंगे। ऑटोमेटेड सिस्टम के बजाय अपनी आंखों से देखकर अनुमान लगाने पर भरोसा करते हुए वे ओरियन को उस चरण से 10 मीटर दूर ले जाएंगे।

गुरुत्वाकर्षण बल का इस्तेमाल

योजना के अनुसार चीजें हुईं तो ओरियन का मुख्य इंजन क्रू को चांद की ओर एक ‘फ्री-रिटर्न ट्रैजेक्टरी’ पर आगे बढ़ाएगा। यह एक ऐसा रास्ता है, जो पृथ्वी और चांद के गुरुत्वाकर्षण बल का इस्तेमाल करके अंतरिक्ष यान को वापस घर ले आता है। यह मिशन अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी से 252,000 मील (406,000 km) दूर ले जाएगा।

आर्मिटस II क्यों है खास?

आर्मिटस II इस पूरे कार्यक्रम का दूसरा और बेहद अहम मिशन है। यही वो मिशन है जो इंसानों को एक बार फिर चांद की दिशा में लेकर जाएगा। यह सीधे चांद पर लैंड नहीं करेगा, लेकिन चांद के आसपास उड़ान भरकर आगे के मिशनों की तैयारी करेगा।

समुद्री अनुसंधान को नई ताकत: ‘भावसागर केंद्र’ बना राष्ट्रीय भंडार

समुद्री संरक्षण को बनाए रखने के लिए, भारत ने ‘भवसागर’ रेफरल सेंटर को गहरे समुद्र के जीवों के लिए ‘राष्ट्रीय भंडार’ (National Repository) के रूप में नामित किया है। इसकी स्थापना कोच्चि में की गई है, और यह सुविधा भारत के गहरे समुद्र की जैव विविधता को संरक्षित करने और उसका अध्ययन करने का कार्य करेगी। इसे ‘समुद्री जीवित संसाधन और पारिस्थितिकी केंद्र’ (Centre for Marine Living Resources and Ecology) द्वारा विकसित किया गया है, जो पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन कार्य करता है। इस पहल का उद्देश्य वैज्ञानिक अनुसंधान, जैव विविधता संरक्षण और देश की बढ़ती ‘ब्लू इकोनॉमी’ (नीली अर्थव्यवस्था) को सुदृढ़ बनाना है।

भवसागर केंद्र: भारत का नया गहरे समुद्र का जैव विविधता केंद्र

‘भवसागर’ रेफरल केंद्र कोच्चि में स्थित है, और इसे पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा जैविक विविधता अधिनियम, 2002 के तहत आधिकारिक तौर पर मान्यता प्रदान की गई है।

इस मान्यता के साथ, यह केंद्र एक राष्ट्रीय-स्तर के वैज्ञानिक भंडार में तब्दील हो गया है, और अब इसकी ज़िम्मेदारी भारत के गहरे समुद्र में पाए जाने वाले जीव-रूपों को संरक्षित करने और उनका दस्तावेज़ीकरण करने की है।

इस केंद्र के पास पहले से ही 3,500 से अधिक वैज्ञानिक रूप से वर्गीकृत समुद्री नमूने मौजूद हैं, जो इसे देश के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री जैव-विविधता संग्रहों में से एक बनाता है।

इस रिपॉजिटरी को क्या चीज़ अनोखा बनाती है?

भवसागर केंद्र सिर्फ़ एक स्टोरेज सुविधा नहीं है, बल्कि यह गहरे समुद्र के इकोसिस्टम के लिए एक व्यापक रिसर्च और डॉक्यूमेंटेशन हब है।

केंद्र के कलेक्शन में कई तरह की प्रजातियाँ शामिल हैं, जैसे:

  • अकशेरुकी जीव, जैसे कि निडेरियन, मोलस्क, आर्थ्रोपोड और एकाइनोडर्म
  • कशेरुकी जीव, जिनमें गहरे समुद्र की मछलियाँ शामिल हैं, जैसे कि इलास्मोब्रैंक और टेलीओस्ट

जैव विविधता अधिनियम के तहत मुख्य कार्य

जैव विविधता अधिनियम, 2002 के प्रावधानों के अनुसार, इस रिपॉजिटरी को कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं।

इनमें शामिल हैं:

  • जैविक नमूनों के साथ-साथ DNA डेटा का सुरक्षित संरक्षण सुनिश्चित करना
  • हाल ही में खोजी गई गहरे समुद्र की प्रजातियों के संरक्षक के रूप में कार्य करना
  • और साथ ही वैज्ञानिक अनुसंधान तथा वर्गीकरण (Taxonomy) के विकास में सहायता करना

भारत की ब्लू इकॉनमी और महासागर अनुसंधान को बढ़ावा

  • इस केंद्र की स्थापना भारत की ब्लू इकॉनमी को मज़बूत करने की दिशा में उठाया गया एक बड़ा कदम है, जो महासागरीय संसाधनों के सतत उपयोग पर केंद्रित है।
  • एम. रविचंद्रन के अनुसार, यह रिपॉजिटरी भारत की गहरे समुद्र में अनुसंधान क्षमताओं को बढ़ाएगी और साथ ही समुद्री संसाधनों के सतत प्रबंधन में भी सहायता करेगी।
  • यह संयुक्त राष्ट्र के ‘सतत विकास के लिए महासागर विज्ञान दशक’ (2021-2030) जैसे वैश्विक प्रयासों के अनुरूप है।

RBI स्थापना दिवस: जानें इतिहास, कार्य और नई पहलें

1 अप्रैल को भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) का स्थापना दिवस मनाया जाता है, इसकी स्थापना 1 अप्रैल, 1935 को की गयी थी। RBI भारत का केंद्रीय बैंक है और मौद्रिक नीति में अहम भूमिका निभाता है; यह महंगाई को नियंत्रित करता है, मुद्रा के उतार-चढ़ाव को भी संभालता है और बैंकिंग प्रणाली को विनियमित करता है। 2026 में भी RBI अपनी नई डिजिटल पहलों और उन्हें सुरक्षित रखने के प्रयासों के कारण उतना ही महत्वपूर्ण बना हुआ है; साथ ही, वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों—विशेष रूप से पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष—के बढ़ने के बीच भारतीय रुपये की गिरावट को स्थिर करने में भी यह अहम भूमिका निभाता है।

RBI की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

RBI की स्थापना 1934 के ‘भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम’ के तहत की गई थी। इस बैंक की स्थापना हिल्टन यंग आयोग (1926) की सिफारिशों पर आधारित थी।

शुरुआती वर्षों में इसका मुख्यालय कोलकाता में स्थित था, और कुछ वर्षों बाद, वर्ष 1937 में इसे मुंबई स्थानांतरित कर दिया गया। साथ ही, आज भी यह इसका परिचालन केंद्र बना हुआ है।

RBI बैंक का राष्ट्रीयकरण वर्ष 1949 में किया गया था, और यह पूरी तरह से भारत सरकार के स्वामित्व में था।

मुख्य ऐतिहासिक तथ्य

  • प्रथम गवर्नर: सर ऑस्बोर्न स्मिथ
  • प्रथम भारतीय गवर्नर: सर सी. डी. देशमुख
  • भारत में मुद्रा और ऋण प्रणाली को विनियमित करने के लिए स्थापित

RBI की संरचना और शासन-प्रणाली

RBI का शासन केंद्रीय निदेशक मंडल द्वारा किया जाता है, जिसमें निम्नलिखित शामिल होते हैं:

  • RBI गवर्नर
  • अधिकतम 4 डिप्टी गवर्नर
  • और सरकार द्वारा नामित निदेशक तथा प्रमुख अधिकारी

इसके अलावा, RBI के चार क्षेत्रीय स्थानीय बोर्ड हैं — पश्चिमी, पूर्वी, उत्तरी और दक्षिणी।

हालाँकि, 2022 से ये बोर्ड कोरम (सदस्यों की आवश्यक संख्या) की कमी के कारण काम नहीं कर रहे हैं, और इनकी ज़िम्मेदारियाँ स्थायी समिति द्वारा संभाली जा रही हैं।

RBI के मुख्य कार्य: एक स्पष्टीकरण

RBI विभिन्न भूमिकाएँ निभाता है, जो देश की अर्थव्यवस्था को सीधे तौर पर प्रभावित करती हैं।

  • मौद्रिक नीति और मुद्रास्फीति नियंत्रण
  • मुद्रा जारी करना और उसका विनियमन
  • बैंकिंग विनियमन
  • विदेशी मुद्रा प्रबंधन

RBI के मुख्य कार्य

1. मौद्रिक प्राधिकरण

  • यह मौद्रिक नीति बनाता है और उसे लागू करता है।
  • साथ ही, यह आर्थिक विकास के साथ-साथ कीमतों में स्थिरता भी बनाए रखता है।

2. वित्तीय प्रणाली का नियामक और पर्यवेक्षक

  • यह देश में बैंकिंग कार्यों के लिए मापदंड निर्धारित करता है।
  • यह जमाकर्ताओं के हितों की भी रक्षा करता है।
  • यह वित्तीय स्थिरता और दक्षता भी सुनिश्चित करता है।

3. विदेशी मुद्रा प्रबंधक

  • विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999 का प्रशासन करता है
  • और विदेशी मुद्रा बाज़ार के विकास को बढ़ावा देता है

4. मुद्रा जारीकर्ता

  • यह भारत की मुद्रा को जारी करता है और उसका प्रबंधन करता है।
  • साथ ही, यह पर्याप्त और अच्छी गुणवत्ता वाली मुद्रा की आपूर्ति भी सुनिश्चित करता है।

5. विकासात्मक भूमिका

  • विभिन्न माध्यमों से देश में वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देता है।
  • सरकार द्वारा निर्धारित राष्ट्रीय विकास प्राथमिकताओं का समर्थन करता है।

2026 में RBI की नई पहलें

डिजिटल पेमेंट सुरक्षा को मज़बूत बनाना

RBI ने उपभोक्ताओं को धोखाधड़ी के जोखिम से बचाने के लिए कई सुरक्षा प्रावधान पेश किए हैं। अनिवार्य टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन और OTP जैसी पहलें ही काफ़ी नहीं हैं, बल्कि ये बैंकों को धोखाधड़ी के मुआवज़े के लिए भी जवाबदेह बनाती हैं।

ई-चेक की शुरुआत

RBI ई-चेक भी शुरू करने जा रहा है, जो पारंपरिक चेक की तरह ही डिजिटल रूप होंगे; ये ज़्यादा तेज़ और कागज़-रहित होंगे।

MuleHunter.AI

RBI द्वारा एक और महत्वपूर्ण तकनीकी नवाचार MuleHunter.AI भी लॉन्च किया गया है, जिसे बैंक खातों में ‘म्यूल’ (बिचौलियों) का पता लगाने, तथा मनी लॉन्ड्रिंग और डिजिटल धोखाधड़ी को रोकने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

आज RBI क्यों मायने रखता है?

RBI सिर्फ़ एक रेगुलेटर ही नहीं, बल्कि भारत की सबसे बड़ी वित्तीय प्रणाली की रीढ़ भी है।

बढ़ती कीमतों, मुद्रा में उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक तनावों के दौरान RBI की भूमिका और भी ज़्यादा अहम हो गई है।

साल 2026 में RBI के सामने एक मुश्किल चुनौती होगी—डिजिटल पेमेंट की सुरक्षा सुनिश्चित करना और साथ ही भारतीय रुपये में होने वाले उतार-चढ़ाव को नियंत्रित रखना।

भारत का पहला क्वांटम कंप्यूटर: अमरावती में नई तकनीकी शुरुआत

एडवांस्ड टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में एक बड़ी छलांग लगाते हुए, आंध्र प्रदेश 14 अप्रैल, 2026 को अमरावती में भारत का पहला क्वांटम कंप्यूटर लॉन्च करेगा। इसकी घोषणा मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने की थी, और यह पहल राज्य की महत्वाकांक्षी ‘अमरावती क्वांटम वैली’ परियोजना का हिस्सा है। इस कार्यक्रम को मज़बूत औद्योगिक साझेदारियों और ‘नेशनल क्वांटम मिशन’ का समर्थन प्राप्त है। इसके ज़रिए, भारत का लक्ष्य अगली पीढ़ी की कंप्यूटिंग और इनोवेशन के क्षेत्र में खुद को एक वैश्विक लीडर के तौर पर स्थापित करना है।

अमरावती क्वांटम इनोवेशन हब बनेगा 

राज्य सरकार अमरावती क्वांटम वैली विकसित कर रही है, जो अगली पीढ़ी की कंप्यूटिंग तकनीकों का प्रमुख केंद्र बनेगा। इस परियोजना में क्वांटम कंप्यूटिंग, अनुसंधान, स्टार्टअप और नवाचार के लिए आठ विशेष टावर बनाए जाएंगे। अमरावती को एक भविष्य-उन्मुख शहर के रूप में विकसित किया जा रहा है, जो वैश्विक निवेश और प्रतिभाओं को आकर्षित करेगा।

भारत का पहला क्वांटम कंप्यूटर

भारत के पहले क्वांटम कंप्यूटर का लॉन्च देश की तकनीकी यात्रा में एक परिवर्तनकारी कदम है। पारंपरिक कंप्यूटरों के विपरीत, ये क्वांटम कंप्यूटर क्वांटम यांत्रिकी के सिद्धांतों का उपयोग करके अत्यधिक जटिल समस्याओं को अभूतपूर्व गति से हल करते हैं। यह पहल आंध्र प्रदेश को उभरती हुई तकनीकों के क्षेत्र में अग्रणी के रूप में स्थापित करेगी, और वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था में भारत की स्थिति को मज़बूत बनाएगी।

स्टार्टअप और कौशल विकास को बढ़ावा

आंध्र प्रदेश सरकार स्टार्टअप्स और नवाचार को बढ़ावा देने हेतु विशेष नीतियां और बुनियादी ढांचा तैयार कर रही है। युवाओं को क्वांटम कंप्यूटिंग और संबंधित क्षेत्रों में प्रशिक्षित करने के लिए कार्यक्रम शुरू किए जा रहे हैं। “मेड इन अमरावती” पहल के अंतर्गत स्वदेशी उत्पाद विकास को प्रोत्साहित किया जाएगा, जिससे राज्य को साल 2030 तक विश्व के शीर्ष क्वांटम हब्स में शामिल करने का लक्ष्य है।

आत्मनिर्भरता और सहयोग पर जोर

इस पहल का मुख्य उद्देश्य भारत में आत्मनिर्भर क्वांटम पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना है। सरकार ने उद्योग, अनुसंधान संस्थानों और तकनीकी साझेदारों को सहयोग हेतु आमंत्रित किया है। इससे क्वांटम हार्डवेयर एवं सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में घरेलू क्षमताओं को बढ़ावा मिलेगा तथा आयात पर निर्भरता कम होगी।

औद्योगिक भागीदारी और अनुसंधान सहयोग

इस परियोजना को उद्योग और शिक्षा जगत की भागीदारी के साथ पहले ही ज़बरदस्त समर्थन मिल चुका है। मुख्य घटनाक्रमों में 15 कंपनियों के साथ कई MoU पर हस्ताक्षर शामिल हैं, जिनमें से 7 पहले ही विजयवाड़ा स्थित मेधा टावर्स में कार्यरत हो चुके हैं। इसके अलावा, वैश्विक और राष्ट्रीय संस्थानों के साथ सहयोग, जैसे:

  • IBM
  • सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग
  • रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन
  • भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र
  • भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास
  • भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान तिरुपति

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