ऑपरेशन ग़ज़ब लिल-हक़: पाकिस्तान-अफगानिस्तान के बीच ‘खुली जंग’ का ऐलान

पाकिस्तान ने “ऑपरेशन ग़ज़ब लिल-हक़” नाम से एक बड़ा सीमापार सैन्य अभियान शुरू किया है, जिससे अफगानिस्तान के साथ तनाव में तीव्र वृद्धि हुई है। यह अभियान 26 फरवरी 2026 की तड़के उस समय शुरू हुआ, जब इस्लामाबाद ने अफगान तालिबान पर सीमा के कई संवेदनशील क्षेत्रों में “बिना उकसावे की गोलीबारी” शुरू करने का आरोप लगाया। पाकिस्तानी अधिकारियों ने इसे पिछले कई महीनों से बढ़ रही शत्रुता और सीमापार उग्रवादी गतिविधियों के खिलाफ एक निर्णायक जवाब बताया। रिपोर्टों के अनुसार काबुल सहित अफगानिस्तान के कई शहरों में हवाई हमले किए गए, जबकि दोनों देशों ने एक-दूसरे पर तीखे आरोप लगाए। यह घटनाक्रम हाल के वर्षों में दोनों पड़ोसी देशों के बीच सबसे गंभीर टकरावों में से एक माना जा रहा है।

ऑपरेशन “ग़ज़ब लिल-हक़” क्या है?

पाकिस्तान द्वारा शुरू किया गया ऑपरेशन “ग़ज़ब लिल-हक़” (अर्थ: “न्याय के लिए क्रोध”) एक व्यापक सैन्य अभियान है, जिसे कथित अफ़गान तालिबान ठिकानों के विरुद्ध चलाया जा रहा है। पाकिस्तान के सूचना मंत्रालय के अनुसार, यह अभियान तब शुरू किया गया जब खैबर पख्तूनख्वा के चितरल, खैबर, मोहम्मद, कुर्रम और बाजौर सेक्टरों में सीमापार गोलीबारी की घटनाएँ सामने आईं।

पाकिस्तान के सरकारी प्रसारक ने दावा किया कि सशस्त्र बलों ने काबुल, कंधार और पक्तिया में तालिबान के प्रमुख सैन्य ठिकानों पर समन्वित हवाई हमले किए। नंगरहार प्रांत में एक गोला-बारूद डिपो को भी नष्ट किए जाने की बात कही गई। पाकिस्तान ने बताया कि झड़पों में उसके दो सुरक्षाकर्मी मारे गए, जबकि 133 तालिबान लड़ाकों को मार गिराने का दावा किया गया है। हालांकि, इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि अभी शेष है।

ताजा पाकिस्तान-अफगानिस्तान तनाव की वजह

यह नया टकराव हाल के दिनों में बढ़ती सीमापार झड़पों के बाद सामने आया।

  • पाकिस्तान ने पहले भी अफगानिस्तान के अंदर हवाई हमले किए थे।
  • इस्लामाबाद का दावा है कि ये हमले पाकिस्तान में हुए आत्मघाती हमलों से जुड़े उग्रवादी शिविरों को निशाना बनाकर किए गए।
  • अफगान अधिकारियों ने आरोप लगाया कि नागरिक घरों और एक धार्मिक स्कूल को निशाना बनाया गया, जिसमें महिलाओं और बच्चों की मौत हुई।
  • तालिबान ने 26 फरवरी 2026 की रात “बड़े पैमाने पर” जवाबी कार्रवाई की घोषणा की।
  • काबुल में जोरदार विस्फोटों की आवाजें सुनी गईं, जबकि पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी सीमावर्ती इलाकों में भारी गोलीबारी की खबरें आईं।

हताहत और परस्पर विरोधी दावे

पाकिस्तान ने पुष्टि की कि खैबर पख्तूनख्वा में सीमा झड़पों के दौरान उसके दो सैनिक मारे गए और तीन घायल हुए।

तालिबान प्रवक्ता ज़बीहुल्लाह मुजाहिद ने दावा किया कि कई पाकिस्तानी सैनिक मारे गए और कुछ को बंदी बना लिया गया, साथ ही कुछ सैन्य चौकियों पर कब्ज़ा कर लिया गया।

हालांकि, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif के कार्यालय ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि किसी भी आक्रामक कार्रवाई का “तत्काल और प्रभावी जवाब” दिया जाएगा।

नाजुक युद्धविराम पर संकट

अक्टूबर में हुए एक नाजुक युद्धविराम समझौते के बावजूद यह तनाव बढ़ा है। पाकिस्तान–अफगानिस्तान सीमा, जिसे आमतौर पर डूरंड रेखा कहा जाता है, लगभग 2,574 किमी लंबी और पहाड़ी व दुर्गम क्षेत्र से गुजरती है।

हालिया झड़पों के कारण—

  • तोरखम सीमा पार के पास रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाना पड़ा।
  • अफगान नागरिकों की निर्वासन प्रक्रिया अस्थायी रूप से रोकी गई।
  • शरणार्थियों और व्यापारियों के लिए सीमा पार मार्ग बंद कर दिए गए।

रणनीतिक और सुरक्षा प्रभाव

यह नया संघर्ष क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर चिंता का विषय है। पाकिस्तान का आरोप है कि अफगानिस्तान स्थित उग्रवादी समूह सीमापार हमले कर रहे हैं, जबकि काबुल बार-बार अपनी संप्रभुता के उल्लंघन का आरोप लगाता रहा है।

मुख्य प्रभाव:

  • सीमावर्ती क्षेत्रों में अस्थिरता में वृद्धि
  • व्यापार और शरणार्थी आवाजाही में बाधा
  • व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष का खतरा
  • कूटनीतिक संबंधों में तनाव

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच सीमा विवाद ऐतिहासिक रूप से जटिल रहा है। डूरंड रेखा को लेकर लंबे समय से मतभेद रहे हैं, और तालिबान सरकार इसे औपचारिक अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में मान्यता नहीं देती।
  • 2021 में तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद से सीमाई झड़पों में वृद्धि देखी गई है। पाकिस्तान लगातार अफगान क्षेत्र से संचालित कथित उग्रवादी समूहों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग करता रहा है।
  • यह घटनाक्रम दोनों देशों के बीच अविश्वास को और गहरा कर रहा है तथा दक्षिण एशिया में स्थिरता के लिए नई चुनौतियाँ खड़ी कर रहा है।

 

विश्व NGO दिवस 2026: 27 फरवरी का महत्व आपकी सोच से कहीं अधिक क्यों है

विश्व एनजीओ दिवस 2026 शुक्रवार, 27 फरवरी 2026 को मनाया जाएगा। यह वैश्विक दिवस गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) की उस महत्वपूर्ण भूमिका को मान्यता देता है, जो वे समाज को बदलने और लोगों के जीवन को बेहतर बनाने में निभाते हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण और मानवाधिकार से लेकर आपदा राहत तक—एनजीओ जमीनी स्तर पर कार्य करते हुए सामाजिक बदलाव को गति देते हैं। यह दिवस केवल सराहना का नहीं, बल्कि जागरूकता, वकालत (एडवोकेसी) और ठोस कार्रवाई का भी प्रतीक है।

विश्व एनजीओ दिवस 2026: तिथि और वैश्विक महत्व

विश्व एनजीओ दिवस हर वर्ष 27 फरवरी को विश्वभर में मनाया जाता है। यह दिन विभिन्न क्षेत्रों और महाद्वीपों में कार्यरत संगठनों के योगदान को अंतरराष्ट्रीय मंच प्रदान करता है।

हर साल यह दिवस सामाजिक असमानता, गरीबी उन्मूलन, आपदा राहत और सतत विकास जैसे मुद्दों पर काम कर रहे संगठनों के सामूहिक प्रयासों को उजागर करता है। वर्ष 2026 में विशेष रूप से जागरूकता और वकालत पर जोर दिया जा रहा है, ताकि लोग समझ सकें कि एनजीओ दीर्घकालिक वैश्विक प्रगति में किस प्रकार योगदान देते हैं।

विश्व एनजीओ दिवस का इतिहास

इस दिवस की शुरुआत का उद्देश्य एनजीओ के सामुदायिक कार्यों को पहचान और सम्मान देना था। समय के साथ यह एक वैश्विक अभियान में बदल गया, जो सिविल सोसाइटी संगठनों के प्रभाव को रेखांकित करता है।

एनजीओ सरकारों से स्वतंत्र रूप से कार्य करते हैं, लेकिन अक्सर सार्वजनिक संस्थानों के साथ सहयोग भी करते हैं। वे मानवीय सहायता, सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण, सार्वजनिक स्वास्थ्य और नीति निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

विश्व एनजीओ दिवस 2026 का महत्व

एनजीओ अक्सर पर्दे के पीछे काम करते हैं। उनके प्रयासों को हमेशा व्यापक पहचान नहीं मिलती, फिर भी उनका प्रभाव अत्यंत गहरा होता है।

यह दिवस इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह—

  • समाज में एनजीओ की भूमिका के प्रति जागरूकता बढ़ाता है
  • स्वयंसेवा और सामुदायिक भागीदारी को प्रोत्साहित करता है
  • फंडरेज़िंग और जनजागरूकता अभियानों को समर्थन देता है
  • जलवायु परिवर्तन और असमानता जैसे वैश्विक मुद्दों को उजागर करता है
  • नागरिकों, सरकारों और संस्थाओं के बीच साझेदारी को मजबूत करता है

सामाजिक परिवर्तन और विकास में एनजीओ की भूमिका

एनजीओ अनेक क्षेत्रों में सक्रिय हैं, जिनका सीधा प्रभाव आम जीवन पर पड़ता है।

उनके प्रमुख योगदानों में शामिल हैं—

  • वंचित समुदायों में शिक्षा उपलब्ध कराना
  • ग्रामीण और संघर्ष क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करना
  • पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास को बढ़ावा देना
  • मानवाधिकार और लैंगिक समानता की वकालत करना
  • आपदा राहत और पुनर्वास में सहायता देना

जमीनी स्तर पर जुड़ाव और नीति-आधारित हस्तक्षेप के माध्यम से एनजीओ समुदायों और प्रशासन के बीच की दूरी को कम करते हैं।

विश्व एनजीओ दिवस 2026 में कैसे भाग लें?

इस दिवस में भागीदारी कई सरल लेकिन सार्थक तरीकों से की जा सकती है—

  • किसी स्थानीय या ऑनलाइन एनजीओ के साथ स्वयंसेवा करना
  • अपनी पसंद के सामाजिक उद्देश्य के लिए दान देना
  • सोशल मीडिया पर जागरूकता संदेश साझा करना
  • कार्यशालाओं, सेमिनार या जागरूकता अभियानों में भाग लेना
  • स्थानीय विकास परियोजनाओं में सहयोग करना
  • एनजीओ कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों को सम्मानित करना

छोटे-छोटे प्रयास भी एनजीओ पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत बनाने में योगदान देते हैं।

वास्तविक बदलाव के लिए प्रेरक विचार

विश्व एनजीओ दिवस 2026 केवल उत्सव का दिन नहीं, बल्कि सक्रिय भागीदारी का अवसर है।

आप अपने पेशेवर कौशल—जैसे वित्त, संचार या कानूनी सलाह—से योगदान दे सकते हैं। छात्र परिसर में जागरूकता अभियान चला सकते हैं। समुदाय दान अभियान या पर्यावरण स्वच्छता कार्यक्रम आयोजित कर सकते हैं।

जब सराहना को कार्रवाई में बदला जाता है, तब विश्व एनजीओ दिवस 2026 सतत सामाजिक प्रभाव का प्रेरक बन जाता है।

प्रश्न

Q. वर्ल्ड NGO डे हर साल मनाया जाता है,

A) 20 फरवरी
B) 27 फरवरी
C) 1 मार्च
D) 15 जनवरी

भारत-इज़राइल में अब ‘स्पेशल स्ट्रेटजिक पार्टनरशिप’

भारत और इज़राइल ने 25–26 फरवरी 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इज़राइल यात्रा के दौरान अपने द्विपक्षीय संबंधों को “शांति, नवाचार और समृद्धि के लिए विशेष रणनीतिक साझेदारी” के स्तर तक उन्नत किया। यह यात्रा इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की मेजबानी में हुई और 2017 में मोदी की इज़राइल यात्रा तथा 2018 में नेतन्याहू की भारत यात्रा से स्थापित मजबूत आधार को आगे बढ़ाने वाला एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पड़ाव साबित हुई।

संयुक्त वक्तव्य में रक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), साइबर सुरक्षा, व्यापार, कृषि, कनेक्टिविटी और जन-से-जन संबंधों सहित कई क्षेत्रों में गहन सहयोग की रूपरेखा प्रस्तुत की गई।

भारत-इज़राइल विशेष रणनीतिक साझेदारी 2026: नए युग की शुरुआत

भारत और इज़राइल के नेताओं ने 2017 और 2018 की ऐतिहासिक यात्राओं को याद करते हुए कहा कि उन्हीं दौरों ने आधुनिक भारत-इज़राइल संबंधों की मजबूत नींव रखी थी। वर्ष 2026 में दोनों देशों ने औपचारिक रूप से अपने संबंधों को “विशेष रणनीतिक साझेदारी” के स्तर तक उन्नत कर दिया है। यह साझेदारी शांति, सुरक्षा और तकनीकी नवाचार पर केंद्रित है।

इज़राइल की अत्याधुनिक नवाचार क्षमता और स्टार्टअप शक्ति को भारत के विशाल बाजार, प्रतिभा और विनिर्माण क्षमता के साथ जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। सहयोग के प्रमुख क्षेत्र हैं— एआई, सेमीकंडक्टर, क्वांटम कंप्यूटिंग, जैव-प्रौद्योगिकी, रक्षा प्लेटफॉर्म और अंतरिक्ष तकनीक। यह साझेदारी भारत के दीर्घकालिक विकास दृष्टिकोण और इज़राइल की नवाचार-आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करती है।

रक्षा और सुरक्षा सहयोग

4 नवंबर 2025 को हुए रक्षा सहयोग संबंधी समझौता ज्ञापन (MoU) का स्वागत करते हुए दोनों देशों ने भविष्य की रणनीतिक रूपरेखा तय की।

मुख्य फोकस क्षेत्र:

  • उन्नत रक्षा प्लेटफॉर्म
  • संयुक्त अनुसंधान एवं उत्पादन
  • साइबर सुरक्षा और आतंकवाद-रोधी सहयोग
  • रणनीतिक संवाद तंत्र

दोनों पक्षों ने 7 अक्टूबर 2023 को इज़राइल पर हुए हमले और 2025 में भारत में हुई आतंकी घटनाओं की कड़ी निंदा करते हुए आतंकवाद के प्रति शून्य सहिष्णुता की नीति दोहराई।

एआई, साइबर सुरक्षा और उभरती प्रौद्योगिकियाँ

तकनीकी सहयोग इस विशेष रणनीतिक साझेदारी का केंद्रीय स्तंभ है।

प्रमुख पहलें:

  • एआई सहयोग पर समझौता
  • भारत-इज़राइल साइबर उत्कृष्टता केंद्र की स्थापना
  • क्रिटिकल एवं उभरती प्रौद्योगिकी (CET) पहल
  • I4F (इंडस्ट्रियल R&D एवं इनोवेशन फंड) का विस्तार
  • संयुक्त शोध वित्त पोषण को 1 मिलियन डॉलर से बढ़ाकर 1.5 मिलियन डॉलर (प्रत्येक देश द्वारा)

साथ ही Indian Space Research Organisation (ISRO) और Israel Space Agency (ISA) के बीच अंतरिक्ष सहयोग को भी सुदृढ़ किया गया।

व्यापार, एफटीए वार्ता और यूपीआई लिंक

दोनों नेताओं ने व्यापारिक क्षमता को पूर्ण रूप से उपयोग में लाने पर जोर दिया।

मुख्य आर्थिक प्रगति:

  • मुक्त व्यापार समझौते (FTA) वार्ता हेतु शर्तों पर हस्ताक्षर
  • सितंबर 2025 का भारत-इज़राइल द्विपक्षीय निवेश समझौता
  • भारत-इज़राइल वित्तीय संवाद की शुरुआत
  • NPCI इंटरनेशनल और MASAV के बीच UPI को इज़राइल की त्वरित भुगतान प्रणाली से जोड़ने का समझौता

साथ ही भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) के माध्यम से क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को मजबूत करने पर भी चर्चा हुई।

कृषि, जल और सतत विकास

कृषि और जल सहयोग दोनों देशों के संबंधों का महत्वपूर्ण आधार है।

मुख्य बिंदु:

  • 35 उत्कृष्टता केंद्र संचालित; 8 और जोड़े जा रहे
  • 10 लाख से अधिक भारतीय किसानों को प्रशिक्षण
  • भारत-इज़राइल कृषि नवाचार केंद्र (IINCA) पर समझौता
  • मत्स्य और जलीय कृषि में सहयोग
  • विलवणीकरण, अपशिष्ट जल पुन: उपयोग और नदी सफाई पर ध्यान

पर्यावरणीय सहयोग में जलवायु कार्रवाई, सर्कुलर अर्थव्यवस्था और जैव विविधता संरक्षण भी शामिल है।

जन-से-जन संपर्क, शिक्षा और श्रमिक गतिशीलता

दोनों देशों ने इज़राइल में भारतीय श्रमिकों की सुरक्षित आवाजाही बढ़ाने पर सहमति जताई।

मुख्य बिंदु:

  • अगले पाँच वर्षों में 50,000 अतिरिक्त भारतीय श्रमिक
  • विनिर्माण, सेवा और रेस्तरां क्षेत्रों में विस्तार
  • संयुक्त समन्वय समिति को सुदृढ़ करना

शिक्षा क्षेत्र में नालंदा विश्वविद्यालय और यरूशलेम का हिब्रू विश्वविद्यालय के बीच समझौता, भारत-इज़राइल अकादमिक सहयोग मंच (I2I Forum) तथा एआई आधारित शिक्षा सहयोग शामिल हैं।

16 नए समझौते

इस यात्रा के दौरान कुल 16 समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए, जिनमें एआई सहयोग, साइबर उत्कृष्टता केंद्र, शिक्षा एवं सांस्कृतिक आदान-प्रदान (2026–2029), कृषि और मत्स्य नवाचार, भू-भौतिकीय अन्वेषण, समुद्री विरासत (लोथल परियोजना), वित्तीय एवं मध्यस्थता सहयोग, यूपीआई भुगतान लिंक और श्रमिक गतिशीलता प्रोटोकॉल शामिल हैं।

ये समझौते महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सहयोग को संस्थागत रूप देते हैं और भारत-इज़राइल संबंधों को एक नए रणनीतिक स्तर पर स्थापित करते हैं।

सवाल

Q. 2026 के दौरे के दौरान, भारत और इज़राइल ने अपने रिश्ते को अपग्रेड किया,

A. कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप
B. स्ट्रेटेजिक अलायंस
C. स्पेशल स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप
D. डिफेंस पैक्ट

 

चंद्रशेखर आज़ाद की 95वीं पुण्यतिथि: वह क्रांतिकारी जिसने आत्मसमर्पण से बेहतर शहादत को चुना

भारत ने 27 फरवरी 2025 को चंद्रशेखर आज़ाद का 95वां शहीदी दिवस मनाया, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे निडर क्रांतिकारियों में से एक थे। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे निर्भीक सेनानियों में गिने जाने वाले आज़ाद को देशभर में श्रद्धांजलि अर्पित की गई और विभिन्न दलों के राजनीतिक नेताओं ने उनके साहस और बलिदान को नमन किया। आज़ाद ने प्रण लिया था कि वे कभी भी अंग्रेजों के हाथ जीवित नहीं पकड़े जाएंगे, और उन्होंने 1931 में अपने अंतिम क्षण तक इस वचन को निभाया। उनका जीवन अडिग देशभक्ति, त्याग और क्रांतिकारी जज़्बे का प्रतीक है, जो आज भी भारत के स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरणादायी विरासत के रूप में स्मरण किया जाता है।

चंद्रशेखर आज़ाद कौन थे?

  • चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को भाबरा (वर्तमान मध्य प्रदेश) में चंद्रशेखर तिवारी के रूप में हुआ था। वे भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रमुख और निर्भीक क्रांतिकारी नेताओं में से एक बने।
  • सिर्फ 15 वर्ष की आयु में असहयोग आंदोलन के दौरान गिरफ्तारी के समय उन्होंने अपना नाम “आज़ाद”, पिता का नाम “स्वतंत्र” और पता “जेल” बताया। इसी साहसिक घोषणा ने उन्हें जीवनभर के लिए “आज़ाद” बना दिया।

प्रारंभिक प्रेरणा: जलियांवाला बाग से असहयोग आंदोलन तक

  • जलियाँवाला बाग हत्याकांड ने युवा आज़ाद को गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने महात्मा गांधीi के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन (1920–22) में भाग लिया।
  • लेकिन 1922 में चौरी-चौरा घटना के बाद आंदोलन स्थगित होने से वे निराश हुए और अहिंसात्मक मार्ग के बजाय क्रांतिकारी रास्ता अपनाया। इसके बाद वे हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) से जुड़े, जिसका उद्देश्य सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकना था।

काकोरी कांड और क्रांतिकारी नेतृत्व

  • 1925 का काकोरी ट्रेन षड्यंत्र आज़ाद की प्रमुख क्रांतिकारी कार्रवाइयों में से एक था, जिसमें HRA के सदस्यों ने सरकारी खजाना ले जा रही ट्रेन को लूटा। अधिकांश क्रांतिकारी गिरफ्तार हो गए, लेकिन आज़ाद पुलिस से बच निकले।
  • वे वर्षों तक भूमिगत रहे और भेष बदलकर काम करते रहे, जिसके कारण उन्हें “क्विक सिल्वर” कहा जाता था। बाद में उन्होंने संगठन को पुनर्गठित कर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) बनाया।

सांडर्स की हत्या और अन्य क्रांतिकारी कदम

  • 1928 में लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए आज़ाद ने भगत सिंह और शिवराम राजगुरु के साथ मिलकर ब्रिटिश अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • यह कार्रवाई साइमन कमीशन के विरोध के दौरान हुए लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय की मृत्यु के प्रतिशोध स्वरूप की गई थी।
  • आज़ाद ने 1929 में वायसराय लॉर्ड इरविन की ट्रेन पर बम हमले के प्रयास में भी भाग लिया। उनकी संगठन क्षमता और रणनीतिक कौशल ने ब्रिटिश दमन के बावजूद क्रांतिकारी गतिविधियों को जीवित रखा।

अल्फ्रेड पार्क में अंतिम संघर्ष

27 फरवरी 1931 को आज़ाद इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के अल्फ्रेड पार्क में एक साथी क्रांतिकारी से मिलने पहुंचे। किसी विश्वासघात के कारण वे ब्रिटिश पुलिस से घिर गए।

भीषण मुठभेड़ में उन्होंने दो अधिकारियों को घायल किया और अपने साथी को भागने का अवसर दिया। अंत में, अपने संकल्प के अनुसार कि वे जीवित पकड़े नहीं जाएंगे, उन्होंने अपनी अंतिम गोली स्वयं को मार ली। उस समय उनकी आयु मात्र 24 वर्ष थी। बाद में इस पार्क का नाम उनके सम्मान में आज़ाद पार्क रखा गया।

चंद्रशेखर आज़ाद की विरासत

चंद्रशेखर आज़ाद की विरासत आज भी प्रेरणा देती है।

उनके प्रमुख योगदान:

  • HSRA के तहत क्रांतिकारी आंदोलन का पुनर्गठन
  • काकोरी कांड में भागीदारी
  • लाला लाजपत राय की मृत्यु का प्रतिशोध
  • औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध निर्भीक प्रतिरोध का प्रतीक

उन्हें कई फिल्मों में भी दर्शाया गया है, जैसे शहीद, भगत सिंह की कहानी और रंग दे बसंती, जिन्होंने लोकप्रिय संस्कृति में उनकी स्मृति को जीवित रखा है।

प्रश्न

Q. चंद्रशेखर आज़ाद किस साल शहीद हुए थे?

A. 1928
B. 1929
C. 1930
D. 1931

जानें वृंदावन में फूलों की होली कब खेली जाएगी, कारण और महत्व

वृंदावन, नंदगांव और बरसाना की अनोखी होली देशभर में प्रसिद्ध है। देश-विदेश के लोग यहां लठमार, लड्डू मार और फूल वाली होली मनाने के लिए आते हैं। लड्डू मार होली के साथ ही मथुरा-वृंदावन में 9 दिनों तक चलने वाली होली की शुरुआत हो जाती है और यह रंगों वाली होली के अगले दिन तक चलती है। भगवान कृष्ण और राधा रानी के मंदिर में धूमधाम से भक्त होली का पर्व मनाते हैं। इस बार लड्डू मार होली 25 फरवरी, बुधवार के दिन मनाई गई। वहीं, 28 फरवरी, शनिवार को फूलों वाली होली मनाई जाएगी।

होली के दीवाने वृंदावन और बरसाना की होली का इंतज़ार पूरे साल करते हैं, और जब बात बांके बिहारी मंदिर में मनाई जाने वाली फूलों की होली की आती है, तो जो सुख और आनंद फूलों की होली खेलने में मिलता है।

वृंदावन में फूलों वाली होली कब खेली जाएगी?

वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में इस साल फूलों की होली 28 फ़रवरी 2026, शनिवार के दिन खेली जाएगी। इस दिन मंदिर में फूलों की बारिश करके होली उत्सव मनाया जाएगा है, जिसकी छटा बेहद मनमोहक होगा। ब्रज में माना जाता है कि कृष्ण और राधा ने वृंदावन की कुंज-गलियों में प्रेमपूर्वक फूलों से होली खेली थी। फूलों की नरम पंखुड़ियों में प्रेम, कोमलता और सौहार्द का संदेश छिपा होता है। इसी प्रेममयी वातावरण को बनाए रखने के लिए आज भी बांके बिहारी मंदिर में भक्तों पर फूल बरसाए जाते हैं।

ब्रज की होली 2026

ब्रज क्षेत्र में होली का त्योहार पूरे 40 दिनों तक मनाया जाता है, बसंत पंचमी से ही होली पर्व की शुरुआत हो जाती है, जिसके बाद होली तक रंग खेलने की परंपरा चली आ रही है। फूलों वाली होली के अलावा यहां की लड्डूमार होली, लठमार होली और हुरंगा होली भी बेहद प्रसिद्ध हैं।

  • लड्डूमार होली: लड्डूमार होली 25 फ़रवरी 2026, बुधवार को बरसाना स्थित राधा रानी मंदिर के अंदर खेली गई। इस दिन भक्त एक-दूसरे पर लड्डू फेंककर होली उत्सव मनाते हैं।
  • लठमार होली: लठमार होली 26 फ़रवरी 2026, गुरुवार को बरसाना में खेली गई। इस अनोखी परंपरा में विवाहित महिलाएं अपने पतियों व अन्य पुरुषों को लाठी से मारती हैं।
  • छड़ी-मार होली: छड़ी-मार होली इस साल 1 मार्च 2026, रविवार को गोकुल में मनाई जाएगी। इस दिन महिलाएं पुरुषों को छड़ी से मारकर पारंपरिक उत्सव मनाती हैं।

फूलों वाली होली की शुरुआत कैसे हुई

यह विशेष होली वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर, बरसाना, नंदगांव और विभिन्न वैष्णव मंदिरों में मनाई जाती है। यह परंपरा मंदिर-उपासना में एक सौम्य और भक्तिपूर्ण रूप में विकसित हुई, जहां रंगों के स्थान पर पुष्प-वर्षा की जाती है। फूल को वैष्णव उपासना में प्रेम और समर्पण का प्रतीक माना गया है। देवताओं पर पुष्प-वर्षा करना दिव्य आनंद का संकेत होता है। ऐसी मान्यता है कि वसंत ऋतु में वृंदावन के कुंजों में राधा-कृष्ण पुष्पों के बीच क्रीड़ा करते थे। भक्त इसी आनंद का अनुभव करने के लिए फूलों वाली होली मनाते हैं।

लड्डू मार होली क्यों मनाई जाती है 

मान्यता है की श्रीकृष्ण और उनके सखा नंदगांव से बरसाना आते थे। वे राधा रानी और सखियों से हंसी-मजाक किया करते थे। सखियां भी उन्हें प्रेमपूर्वक चिढ़ाती थीं। इसी प्रेमपूर्ण वातावरण में मिठाइयों का आदान-प्रदान होता था और इसी भाव से लड्डू मार होली की परंपरा विकसित हुई। माना जाता है कि लड्डू मिठास का प्रतीक और दिव्य प्रेम की मधुरता का संकेत है। यह दर्शाता है कि राधा-कृष्ण की लीला में जो भी नोक-झोंक है वह अंततः प्रेम से भरा हुआ है।

Holi 2026: 3 या 4 मार्च, जानें किस दिन है होली, 3 मार्च, नोट कर लें सही समय और शुभ मुहूर्त

Holi 2026 Kab Hai: होली का पर्व (Holi 2026) हर साल की चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाया जाता है। होलिका दहन के बाद अगले दिन रंगोत्सव मनाया जाता है। होली का पर्व खुशियों और बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व है। इस साल होली की तारीख को लेकर थोड़ी भ्रम बना हुआ है। दरअसल, पूर्णिमा तिथि दो दिन और चंद्रग्रहण लगने के कारण होलिका दहन और रंगोत्सव की तारीख को लेकर थोड़ी भ्रम है। जानें होली का पर्व इस साल कब मनाया जाएगा।

होलिका दहन कब है? 

पंचांग की गणना के अनुसार, होलिका दहन (Holika Dahan 2026) 2 मार्च को करना शास्त्र सम्मत है। बता दें कि 2 मार्च को शाम में पूर्णिमा तिथि लग जाएगा। पूर्णिमा तिथि 2 मार्च को शाम में 5 बजकर 56 मिनट पर आरंभ हो जाएगी और अगले दिन 5 बजकर 8 मिनट पर पूर्णिमा तिथि समाप्त हो जाएगी। 2 मार्च को भद्रा मुख मध्यरात्रि 2 बजकर 38 मिनट से सुबह में 4 बजकर 34 मिनट तक रहेगा। ऐसे में 2 मार्च को ही होलिका दहन (Holika Dahan 2026) करना शुभ रहेगा। बता दें कि होलिका दहन फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को किया जाता है। 3 मार्च को शाम में 5 बजकर 8 मिनट तक पूर्णिमा तिथि तो रहेगी लेकिन इस समय चंद्रग्रहण भी होगा। दोपहर में 3 बजकर 20 मिनट से चंद्र ग्रहण आरंभ हो जाएगा और शाम में 6 बजकर 47 मिनट पर ग्रहण समाप्त होगा। उससे पहले ही पूर्णिमा तिथि समाप्त हो जाएगी।

होली 2026 की तारीख

होलिका दहन के अगले दिन रंगों की होली खेली जाती है। उस समय में चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि होती है। पंचांग के अनुसार, प्रतिपदा तिथि 3 मार्च को शाम 05:07 बजे से शुरू होकर 4 मार्च को शाम 04:48 बजे तक रहेगी। उदयातिथि के आधार पर चैत्र कृष्ण प्रतिपदा 4 मार्च को है। इसलिए इस साल होली का त्योहार 4 मार्च बुधवार को मनाना शास्त्र सम्मत है। रंगोत्सव होली 4 मार्च को मनाई जाएगी।

होली का महत्व

होली ( Holi 2026) का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व है। इस दिन अपने भक्त प्रहलाद को भगवान विष्णु ने बचाया था। प्रहलाद भगवान विष्णु को बहुत बड़ा भक्त था। प्रहलाद के पिता हिरण्यकश्यप असुर राज था। वह प्रहलाद को भगवान विष्णु की भक्ति करने से रोकता है लेकिन, भक्त प्रहलाद ने कभी भी भगवान विष्णु की भक्ति नहीं छोड़ी। हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका (Holika) से भक्त प्रहलाद को जलती आग में लेकर बैठने के लिए कहा। क्योंकि, होलिका को आग में नहीं जलने का वरदान था। लेकिन, जब होलिका प्रहलाद को लेकर अग्नि में बैठी तो वह खुद ही जलकर भस्म हो गई। इसलिए होलिका दहन (Holika Dahan 2026) मनाया जाता है वहीं, होलिका का अंत और प्रहलाद की जीत के बाद लोगों ने एक दूसरे को रंग लगाकर उत्सव मनाया था। इसलिए होलिका दहन के अगले दिन रंगोत्सव मनाया जाता है।

Holi 2026: जानें इस बार कब होगा होलिका दहन

Holi 2026: रंगों के उत्सव होली से ठीक एक दिन पहले होलिका दहन किया जाता है, जिसे बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। इस वर्ष फाल्गुन पूर्णिमा पर होलिका दहन को लेकर जनमानस में संशय की स्थिति है कि 2 मार्च को हो या 3 मार्च को। शास्त्रीय प्रमाणों एवं ग्रहण नियम के सूक्ष्म विचार के आधार पर निर्णय स्पष्ट किया गया है।

होलिका दहन 2026 (Holika Dahan 2026) कब है 

होलिका दहन 3 मार्च 2026 को है और इसी दिन साल का पहला चंद्र ग्रहण भी लगने जा रहा है। लेकिन ग्रहण के कारण होलिका दहन की तारीख में कोई बदलाव नहीं होगा क्योंकि चंद्र ग्रहण शाम 06:47 बजे खत्म हो जाएगा। ऐसे में होलिका दहन शाम 6 बजकर 47 मिनट के बाद किया जा सकेगा। बता दें होलिका दहन का पावन पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है।

होलिका दहन का शुभ मुहूर्त 2026 

होलिका दहन का शुभ मुहूर्त (Holika Dahan 2026 Muhurat) 3 मार्च 2026 की शाम 06 बजकर 47 मिनट से लेकर रात 08 बजकर 50 मिनट तक रहेगा। इस मुहूर्त में होलिका पूजा शुभ साबित होगी। बता दें होलिका दहन का पावन पर्व फाल्गुन पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इस साल ये पूर्णिमा 2 मार्च 2026 की शाम 5 बजकर 55 मिनट से लेकर 3 मार्च की शाम 5 बजकर 7 मिनट तक रहेगी।

होली 2026 (Holi 2026 Date) कब है

इस साल रंग वाली होली यानी धुलेंडी 4 मार्च 2026 को मनाई जाएगी। पंचांग अनुसार रंग वाली होली चैत्र कृष्ण पक्ष की पहली तारीख को मनाई जाती है।

क्यों मनाई जाती है होली? 

होलिका दहन की कथा भक्त प्रह्लाद और उनके असुर पिता हिरण्यकश्यप से जुड़ी है। हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को मारने के लिए अपनी बहन होलिका (जिसे आग में न जलने का वरदान था) की गोद में बिठाकर अग्नि में डाल दिया।

लेकिन, भगवान की कृपा से भक्त प्रह्लाद सुरक्षित बच गए और होलिका जलकर भस्म हो गई। यह पर्व संदेश देता है कि अहंकार और अधर्म का अंत निश्चित है, जबकि सत्य की सदैव जीत होती है।

हरियाणा में पीएम श्री मॉडल पर ‘सीएम श्री स्कूल’ शुरू किए जाएंगे

हरियाणा सरकार ने केंद्र की पीएम श्री स्कूल योजना की तर्ज पर राज्य में सीएम श्री स्कूल शुरू करने की घोषणा की है। यह घोषणा राज्य के शिक्षा मंत्री महिपाल ढांडा ने हरियाणा विधानसभा के बजट सत्र के दौरान की। नए स्कूल केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) पैटर्न पर आधारित होंगे और राज्य में शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने का लक्ष्य रखेंगे।

सीएम श्री स्कूल की प्रमुख विशेषताएँ

  • पीएम श्री स्कूल मॉडल पर आधारित
  • CBSE पाठ्यक्रम और मूल्यांकन प्रणाली का पालन
  • आधुनिक अधोसंरचना और स्मार्ट कक्षाएँ
  • कौशल-आधारित एवं अनुभवात्मक शिक्षण पर जोर
  • राज्य संचालित विद्यालयों के शैक्षणिक मानकों को सुदृढ़ करना

यह पहल हरियाणा में एकरूप शैक्षणिक मानक स्थापित करने और बेहतर शिक्षण परिणाम सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

आरटीई अधिनियम के तहत 25% आरक्षण

शिक्षा मंत्री ने बताया कि निजी विद्यालयों में प्रवेश स्तर की कक्षाओं में 25% सीटें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और वंचित समूह (DG) के लिए आरक्षित हैं। यह प्रावधान बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE Act) के तहत लागू है।

पिछले शैक्षणिक सत्र में:

  • 14,127 आवेदन प्राप्त हुए
  • 11,803 छात्रों को निजी विद्यालयों में प्रवेश आवंटित किया गया

यह नीति सामाजिक समावेशन और समान शैक्षणिक अवसर सुनिश्चित करने में सहायक है।

पीएम श्री स्कूल क्या हैं?

पीएम श्री (प्रधानमंत्री स्कूल्स फॉर राइजिंग इंडिया) योजना का उद्देश्य चयनित सरकारी विद्यालयों को मॉडल संस्थानों में परिवर्तित करना है, जिनमें:

  • आधुनिक बुनियादी ढाँचा
  • स्मार्ट क्लासरूम
  • अनुभवात्मक शिक्षा
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप पाठ्यक्रम

हरियाणा द्वारा सीएम श्री स्कूल शुरू करना इसी मॉडल को राज्य स्तर पर लागू करने की दिशा में कदम है।

संभावित प्रभाव

सीएम श्री स्कूलों की शुरुआत से:

  • शैक्षणिक अधोसंरचना में सुधार
  • CBSE पैटर्न के अनुरूप पाठ्यक्रम का मानकीकरण
  • सीखने के परिणामों में वृद्धि
  • RTE प्रावधानों के माध्यम से समावेशी शिक्षा को बढ़ावा

गुणवत्ता सुधार और समावेशी प्रवेश नीति का यह संयुक्त प्रयास हरियाणा के स्कूल शिक्षा तंत्र को नई दिशा दे सकता है।

भारत और नेपाल ने वन एवं वन्यजीव सहयोग बढ़ाने के लिए नए समझौता ज्ञापन पर किए हस्ताक्षर

भारत और नेपाल ने 25 फरवरी 2026 को नई दिल्ली में वनों, वन्यजीव संरक्षण, जैव विविधता संरक्षण और जलवायु परिवर्तन पर एक नए समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए। यह समझौता साझा पारिस्थितिक तंत्रों की सुरक्षा और अंतर-सीमावर्ती (Transboundary) वन्यजीव गलियारों की बहाली को मजबूत करने के उद्देश्य से किया गया है। इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव और नेपाल के वन एवं पर्यावरण मंत्री माधव प्रसाद चौलागैन उपस्थित रहे, जिससे भारत-नेपाल पर्यावरणीय संबंधों में एक नया अध्याय जुड़ा।

भारत-नेपाल वन एवं वन्यजीव सहयोग MoU

यह समझौता भारत के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) और नेपाल के वन और पर्यावरण मंत्रालय के बीच हस्ताक्षरित हुआ।

समझौते के मुख्य बिंदु:

  • वनों, वन्यजीवों, जैव विविधता संरक्षण और जलवायु परिवर्तन पर द्विपक्षीय सहयोग को बढ़ावा।
  • वन्यजीव गलियारों की बहाली।
  • तकनीकी विशेषज्ञता का आदान-प्रदान।
  • सर्वोत्तम प्रथाओं (Best Practices) का साझा करना।

यह MoU साझा पारिस्थितिक तंत्रों और सीमापार वन्यजीव आवासों के समन्वित प्रबंधन की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

प्रमुख फोकस क्षेत्र

समझौते में परिदृश्य-स्तर (Landscape-Level) पर जैव विविधता संरक्षण रणनीतियों के निर्माण पर जोर दिया गया है।

समझौते के तहत चिन्हित प्रमुख प्रजातियाँ:

  • हाथी
  • गंगेटिक डॉल्फिन
  • गैंडा
  • हिम तेंदुआ
  • बाघ
  • गिद्ध

इसके अतिरिक्त, संरक्षित क्षेत्रों के प्रबंधन को मजबूत करना, वन्यजीव गलियारों की पुनर्बहाली, वन एवं वन्यजीव अपराध पर नियंत्रण, अग्रिम पंक्ति के कर्मचारियों का क्षमता निर्माण तथा जैव विविधता हॉटस्पॉट में स्मार्ट ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देना भी शामिल है।

जैव विविधता संरक्षण में भारत-नेपाल सहयोग का महत्व

भारत और नेपाल दोनों समृद्ध जैव विविधता और विस्तृत संरक्षित क्षेत्र नेटवर्क साझा करते हैं। कई वन्यजीव आवास और नदी तंत्र अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को पार करते हैं। बाघ, हाथी और गैंडा जैसी प्रजातियाँ दोनों देशों के बीच प्रवास करती हैं।

ऐसे अंतर-सीमावर्ती पारिस्थितिक तंत्रों के कारण संयुक्त संरक्षण रणनीतियाँ अत्यंत आवश्यक हैं। यह MoU एकीकृत संरक्षण परिदृश्य विकसित करने और साझा प्रजातियों व आवासों की समन्वित सुरक्षा सुनिश्चित करने में सहायक होगा।

जलवायु परिवर्तन और अंतर-सीमावर्ती वन्यजीव गलियारे

यह समझौता दोनों देशों के बीच जलवायु परिवर्तन सहयोग को भी सुदृढ़ करता है। हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र, वन और नदी प्रणालियाँ जलवायु परिवर्तन से गंभीर रूप से प्रभावित हो रही हैं।

अंतर-सीमावर्ती वन्यजीव गलियारों की बहाली से आवासीय संपर्क (Habitat Connectivity) बेहतर होगा और प्रजातियों को बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुकूल होने में मदद मिलेगी। समन्वित जलवायु कार्रवाई और पारिस्थितिकी-आधारित अनुकूलन रणनीतियाँ क्षेत्रीय लचीलापन बढ़ाने में सहायक होंगी।

वन्यजीव अपराध पर नियंत्रण और प्रवर्तन सुदृढ़ीकरण

इस MoU का एक प्रमुख उद्देश्य वन एवं वन्यजीव अपराध से निपटना है। अवैध शिकार, लकड़ी की तस्करी और वन्यजीव उत्पादों की अवैध तस्करी क्षेत्र में गंभीर चुनौतियाँ हैं।

समझौता प्रवर्तन एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय, खुफिया जानकारी साझा करने और निगरानी तंत्र को मजबूत करने को प्रोत्साहित करता है। इससे जैव विविधता की सुरक्षा और अधिक प्रभावी ढंग से सुनिश्चित की जा सकेगी।

भारत ने लॉन्च किया ‘ज़ीरो प्राइज़’: वास्तविक प्रदूषण कमी पर मिलेगा बड़ा इनाम

भारत ने पहली बार परिणाम-आधारित पर्यावरण पुरस्कार ज़ीरो प्राइज़ (Zero Prize) की घोषणा की है, जिसका उद्देश्य वायु, जल और भूमि प्रदूषण में प्रमाणित कमी लाने वाली पहलों को सम्मानित करना है। नई दिल्ली में लॉन्च किए गए इस पुरस्कार के लिए कुल ₹5 करोड़ का कोष निर्धारित किया गया है, जिसमें तीन श्रेणियों में प्रत्येक को ₹1 करोड़ प्रदान किए जाएंगे। पारंपरिक पुरस्कारों से अलग, ज़ीरो प्राइज़ में वित्तीय प्रोत्साहन को स्वतंत्र रूप से सत्यापित पर्यावरणीय परिणामों से सीधे जोड़ा गया है। यह पहल भारत में जलवायु जवाबदेही और मापनीय पर्यावरणीय सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण और नवाचारपूर्ण कदम मानी जा रही है।

ज़ीरो प्राइज़ क्या है और यह प्रदूषण नियंत्रण के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत का ज़ीरो प्राइज़ (Zero Prize) देश का पहला राष्ट्रीय स्तर का परिणाम-आधारित (Results-Based) पर्यावरण पुरस्कार है, जिसका उद्देश्य वास्तविक और मापनीय प्रदूषण में कमी लाने वाली पहलों को पुरस्कृत करना है। यह पहल नीति और शासन स्कूल (School of Policy and Governance) द्वारा संचालित की जा रही है और इसे परोपकारी फंडिंग, कॉर्पोरेट CSR साझेदारी तथा अन्य संस्थागत सहयोग से समर्थन प्राप्त है।

इस पुरस्कार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें केवल सैद्धांतिक विचारों को नहीं, बल्कि वैज्ञानिक रूप से सत्यापित और जमीन पर लागू परिणामों को ही मान्यता दी जाएगी। आवेदकों को निर्धारित भौगोलिक क्षेत्र में पर्यावरणीय सुधार का वास्तविक प्रमाण प्रस्तुत करना होगा। यह प्रदर्शन-आधारित फंडिंग मॉडल सुनिश्चित करता है कि धनराशि उन्हीं समाधानों को मिले जो वास्तव में वायु, जल और भूमि प्रदूषण को कम करते हैं।

₹5 करोड़ का कोष: राशि का वितरण कैसे होगा?

ज़ीरो प्राइज़ के लिए कुल ₹5 करोड़ का कोष निर्धारित है, जिसमें तीन प्रमुख श्रेणियों में प्रत्येक को ₹1 करोड़ प्रदान किया जाएगा:

  • वायु प्रदूषण में कमी
  • जल प्रदूषण में कमी
  • भूमि प्रदूषण में कमी

प्रत्येक चयनित परियोजना को पहले एक प्रलेखित (Documented) आधार रेखा स्थापित करनी होगी और फिर 12 माह की चुनौती अवधि में मापनीय कमी दिखानी होगी। प्रगति का दावा नहीं, बल्कि स्वतंत्र तृतीय-पक्ष सत्यापन के माध्यम से प्रमाण अनिवार्य होगा।

प्रदूषण में कमी का मापन कैसे होगा?

ज़ीरो प्राइज़ के अंतर्गत सख्त वैज्ञानिक और नियामक मानकों के अनुसार सत्यापन किया जाएगा:

  • वायु प्रदूषण: पार्टिकुलेट मैटर (PM) के संपर्क में कमी का आकलन स्थायी मॉनिटरिंग सिस्टम से किया जाएगा, साथ ही मौसमीय परिवर्तनों के अनुसार समायोजन किया जाएगा।
  • जल प्रदूषण: जैविक ऑक्सीजन मांग (BOD), रासायनिक ऑक्सीजन मांग (COD) और पोषक तत्वों के स्तर को डिस्चार्ज पॉइंट पर मापा जाएगा। निगरानी Central Pollution Control Board (CPCB) के अनुरूप प्रोटोकॉल के अनुसार होगी।
  • भूमि प्रदूषण: कचरा रिसाव और अनुचित निपटान को ट्रेस करने योग्य वज़न-आधारित ऑडिट और तृतीय-पक्ष सत्यापन से प्रमाणित किया जाएगा।

यह ढांचा सुनिश्चित करता है कि प्रदूषण में कमी मापनीय, विश्वसनीय और पारदर्शी हो।

कौन आवेदन कर सकता है?

ज़ीरो प्राइज़ के लिए भारत में निम्न प्रतिभागी आवेदन कर सकते हैं:

  • स्टार्ट-अप
  • गैर-सरकारी संगठन (NGO)
  • कॉर्पोरेट संस्थाएँ
  • नगर निकाय
  • शोध संस्थान
  • व्यक्तिगत नवोन्मेषक

हालांकि, केवल वे प्रतिभागी पात्र होंगे जो शहरी या अर्ध-शहरी क्षेत्रों में वास्तविक पायलट परियोजना लागू कर रहे हों। केवल प्रारंभिक विचार, बिना मापनीय क्रियान्वयन के, पात्र नहीं होंगे।

राष्ट्रीय मिशनों के साथ सामंजस्य

ज़ीरो प्राइज़ भारत के प्रमुख पर्यावरणीय अभियानों के अनुरूप है, जैसे:

  • नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (NCAP)
  • नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा
  • स्वच्छ भारत मिशन 2.0

वित्तीय प्रोत्साहन को सत्यापित परिणामों से जोड़कर यह पहल स्वच्छ शहरों और बेहतर पर्यावरणीय शासन की दिशा में तेजी लाती है।

नेतृत्व के वक्तव्य

ज़ीरो प्राइज़ के सह-संस्थापक और डाबर इंडिया लिमिटेड के उपाध्यक्ष साकेत बर्मन ने कहा कि यह पुरस्कार उन सिद्ध नवाचारों को बढ़ावा देगा जो भारत की वायु, जल और भूमि को मापनीय रूप से स्वच्छ बना सकें। उन्होंने बोर्डरूम चर्चाओं से आगे बढ़कर जमीनी क्रियान्वयन पर जोर दिया।

वहीं, रुचिर पंजाबी, अध्यक्ष, स्कूल ऑफ पॉलिसी एंड गवर्नेंस ने इसे नवोन्मेषकों और शोधकर्ताओं को प्रदूषण के खिलाफ ठोस और जवाबदेह समाधान विकसित करने हेतु प्रेरित करने वाला उत्प्रेरक बताया।

संक्षिप्त अवलोकन

  • ज़ीरो प्राइज़ भारत का पहला प्रदर्शन-आधारित पर्यावरण पुरस्कार है।
  • कुल कोष ₹5 करोड़; वायु, जल और भूमि प्रदूषण श्रेणियों में प्रत्येक को ₹1 करोड़।
  • 12 माह में वैज्ञानिक रूप से सत्यापित कमी अनिवार्य।
  • CPCB-अनुरूप मॉनिटरिंग और तृतीय-पक्ष सत्यापन आवश्यक।
  • SPG द्वारा संचालित और CSR/परोपकारी फंडिंग से समर्थित।

यह पहल नीति और जमीनी प्रभाव के बीच सेतु का कार्य करते हुए भारत में पर्यावरणीय जवाबदेही के एक नए मॉडल की शुरुआत करती है।

 

Recent Posts

द हिंदू रिव्यू मार्च 2026
Most Important Questions and Answer PDF
QR Code
Scan Me