फरवरी 2026 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने भारतीय शेयर बाजार में ₹22,615 करोड़ का निवेश किया, जो पिछले 17 महीनों का सबसे बड़ा मासिक निवेश प्रवाह है। यह उछाल लगातार तीन महीनों की भारी बिकवाली के बाद आया है और अंतरिम भारत-अमेरिका व्यापार समझौते, बेहतर कॉर्पोरेट आय परिणामों तथा सुधरे हुए बाजार मूल्यांकन के कारण विदेशी निवेशकों के नए सिरे से बढ़े विश्वास को दर्शाता है। वर्ष 2025 की शुरुआत विदेशी निवेश के लिए उतार-चढ़ाव भरी रही थी, ऐसे में फरवरी का यह मजबूत निवेश प्रवाह बाजार की धारणा में संभावित सकारात्मक बदलाव का संकेत देता है।
ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, फरवरी 2026 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) का प्रवाह ₹22,615 करोड़ रहा, जो सितंबर 2024 के बाद का सबसे मजबूत मासिक निवेश है। यह उछाल लगातार भारी निकासी के बाद आया है। इससे पहले जनवरी 2026 में ₹35,962 करोड़, दिसंबर 2025 में ₹22,611 करोड़ और नवंबर 2025 में ₹3,765 करोड़ की निकासी हुई थी। वर्ष 2025 में फरवरी से पहले तक एफपीआई कुल ₹1.66 लाख करोड़ (लगभग 18.9 अरब अमेरिकी डॉलर) निकाल चुके थे, ऐसे में फरवरी का यह निवेश एक महत्वपूर्ण वापसी दर्शाता है।
फरवरी 2026 में एफपीआई निवेश का प्रमुख कारण अंतरिम भारत-अमेरिका व्यापार समझौता रहा, जिससे टैरिफ को लेकर अनिश्चितता कम हुई और निवेशकों का विश्वास बढ़ा। इसके साथ ही Q3FY26 में 14.7% की मजबूत कॉर्पोरेट आय वृद्धि ने बाजार धारणा को और सशक्त किया। पहले की ऊंची वैल्यूएशन में सुधार आने से भारतीय शेयर अपेक्षाकृत आकर्षक बने। विश्लेषकों के अनुसार बेहतर व्यापार दृश्यता और स्थिर मैक्रो आर्थिक आधार ने विदेशी निवेशकों की वापसी को समर्थन दिया।
फरवरी के निवेश में स्पष्ट सेक्टोरल ट्रेंड दिखाई दिया। वित्तीय सेवाओं में मजबूत खरीदारी और कैपिटल गुड्स में निवेश बढ़ा, जबकि आईटी क्षेत्र से ₹10,956 करोड़ की निकासी हुई। एआई आधारित बदलावों और वैश्विक टेक क्षेत्र की अनिश्चितताओं ने आईटी में बिकवाली को बढ़ावा दिया। यह संकेत देता है कि एफपीआई घरेलू विकास से जुड़े क्षेत्रों की ओर अपना पोर्टफोलियो स्थानांतरित कर रहे हैं।
रुपया 91 प्रति डॉलर से नीचे स्थिर रहने से मुद्रा जोखिम को लेकर विदेशी निवेशकों को भरोसा मिला है। आगे चौथी तिमाही के नतीजे और वित्त वर्ष 2027 में अनुमानित 15% आय वृद्धि बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होंगे। जीडीपी वृद्धि की संभावनाएं भी स्थिर दिखाई दे रही हैं।
मध्य-पूर्व में जारी तनाव ने वैश्विक बाजारों में अस्थिरता पैदा की है। कच्चे तेल की कीमतें और मुद्रा उतार-चढ़ाव प्रमुख निगरानी बिंदु बने हुए हैं। यदि तेल की कीमतों में तेज वृद्धि होती है, तो यह महंगाई और राजकोषीय संतुलन को प्रभावित कर सकता है, जिससे भविष्य के एफपीआई प्रवाह पर असर पड़ सकता है।
एफपीआई भारत के पूंजी बाजार में तरलता और मूल्यांकन को प्रभावित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। 2025 के अंत और 2026 की शुरुआत में मुद्रा अस्थिरता, अमेरिकी टैरिफ चिंताओं और ऊंची वैल्यूएशन के कारण भारी बिकवाली देखने को मिली थी। ऐसे में फरवरी 2026 का ₹22,615 करोड़ का निवेश भारतीय बाजारों में विश्वास की वापसी और मजबूती का संकेत है।
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