ऊर्जा क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि: भारत का कोयला उत्पादन 1 अरब टन से ऊपर

भारत ने 20 मार्च 2026 को 1 बिलियन टन (BT) कोयला उत्पादन का महत्वपूर्ण मील का पत्थर हासिल किया। लगातार दूसरे वर्ष इस उपलब्धि को प्राप्त करना देश की ऊर्जा क्षेत्र में बढ़ती ताकत और बढ़ती बिजली मांग को पूरा करने की क्षमता को दर्शाता है। कोयला उत्पादन में वृद्धि से तापीय बिजली संयंत्रों और उद्योगों को स्थिर ईंधन आपूर्ति सुनिश्चित हुई है।

1 बिलियन टन कोयला उत्पादन: प्रमुख उपलब्धि

लगातार दूसरे वर्ष 1 बिलियन टन कोयला उत्पादन हासिल करना ऊर्जा क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि है। यह कोयला खनन और आपूर्ति श्रृंखला में बेहतर कार्यक्षमता और निरंतर प्रदर्शन को दर्शाता है। इससे उद्योगों और बिजली संयंत्रों को बिना रुकावट ईंधन उपलब्ध होता है और आयात पर निर्भरता भी कम होती है।

ऊर्जा आपूर्ति में कोयले की भूमिका

भारत की ऊर्जा व्यवस्था, विशेष रूप से बिजली उत्पादन में, कोयले की महत्वपूर्ण भूमिका बनी हुई है। उत्पादन बढ़ने से तापीय बिजली संयंत्रों में कोयले का भंडार रिकॉर्ड स्तर पर बना रहा, जिससे बिजली आपूर्ति स्थिर रही।

मुख्य लाभ:

  • उद्योगों और घरों के लिए विश्वसनीय बिजली आपूर्ति
  • बिजली संकट की संभावना में कमी
  • आयातित कोयले पर निर्भरता में कमी
  • आर्थिक गतिविधियों को समर्थन

भारत में कोयला क्षेत्र का विकास

यह उपलब्धि कोयला मंत्रालय और अन्य संबंधित हितधारकों के समन्वित प्रयासों का परिणाम है। निरंतर निगरानी, सुधारों और बेहतर लॉजिस्टिक्स ने उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सरकार ने पारदर्शी और प्रदर्शन-आधारित प्रणाली बनाने पर ध्यान दिया है, जिसमें बेहतर योजना, तेज मंजूरी और सार्वजनिक-निजी सहयोग शामिल है।

विकसित भारत 2047 का विजन

यह उपलब्धि भारत के दीर्घकालिक लक्ष्य विकसित भारत 2047 के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य एक मजबूत और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था का निर्माण करना है।

घरेलू कोयला उत्पादन बढ़ाना इस रणनीति का अहम हिस्सा है। ऊर्जा अवसंरचना को मजबूत करके भारत दीर्घकालिक स्थिरता और आर्थिक विकास सुनिश्चित करना चाहता है।

मध्य पूर्व संकट पर संसद में PM मोदी का संबोधन: जानें मुख्य बातें

वैश्विक स्तर पर बढ़ते तनाव के बीच भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 23 मार्च 2026 को लोकसभा में चल रहे पश्चिम एशिया संकट पर संबोधन दिया। उन्होंने इस स्थिति को “गंभीर और चिंताजनक” बताया और इसके वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति तथा विदेशों में रह रहे भारतीय नागरिकों पर प्रभाव को रेखांकित किया। अपने भाषण में उन्होंने बताया कि खाड़ी देशों में लगभग 1 करोड़ भारतीय रहते हैं, इसलिए सरकार उनकी सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है, साथ ही देश में ईंधन आपूर्ति को स्थिर बनाए रखने पर भी ध्यान दिया जा रहा है। यह संबोधन इस बात को दर्शाता है कि भारत इस वैश्विक संकट के दौरान कूटनीति, तैयारियों और राष्ट्रीय एकता पर केंद्रित संतुलित दृष्टिकोण अपना रहा है।

West Asia Conflict 2026: क्यों PM मोदी ने इसे ‘चिंताजनक’ बताया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को गंभीर और लंबा खिंचने वाला बताया। उन्होंने कहा कि यह संकट तीन सप्ताह से अधिक समय से जारी है, जो इसकी गंभीरता को दर्शाता है। संसद में सीधे इस मुद्दे को उठाना इस बात का संकेत है कि भारत इस स्थिति को अत्यंत महत्वपूर्ण मानता है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह केवल क्षेत्रीय संकट नहीं है, बल्कि इसके वैश्विक प्रभाव हैं। इसका असर विश्व अर्थव्यवस्था, व्यापार मार्गों और विभिन्न देशों के लोगों के दैनिक जीवन पर पड़ रहा है।

PM मोदी के भाषण से 10 प्रमुख बातें 

  1. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम एशिया संघर्ष को “चिंताजनक” बताया और कहा कि यह तीन सप्ताह से अधिक समय से जारी है, जिससे वैश्विक स्थिरता प्रभावित हो रही है।
  2. उन्होंने कहा कि यह संघर्ष वैश्विक सप्लाई चेन, व्यापार मार्गों और आर्थिक गतिविधियों को बाधित कर रहा है।
  3. प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि होर्मुज जलसंधि (Strait of Hormuz) में किसी भी प्रकार का व्यवधान स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि यह वैश्विक तेल परिवहन का प्रमुख मार्ग है।
  4. भारत अपनी लगभग 60% LPG जरूरतों का आयात करता है, ऐसे में यह संकट देश में ऊर्जा उपलब्धता और कीमतों पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है।
  5. आपूर्ति में अनिश्चितता से निपटने के लिए सरकार घरेलू ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रही है।
  6. प्रधानमंत्री ने बताया कि खाड़ी देशों में करीब 1 करोड़ भारतीय रहते हैं और उनकी सुरक्षा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है।
  7. वर्तमान में लगभग 700 भारतीय नाविक 22 जहाजों पर होर्मुज जलसंधि (Strait of Hormuz) क्षेत्र में प्रभावित हैं।
  8. भारत ने ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कतर, ओमान, कुवैत और बहरीन जैसे देशों के नेताओं से संपर्क बनाए रखा है।
  9. भारत ने इस मुद्दे के समाधान के लिए संवाद और कूटनीति को ही एकमात्र रास्ता बताया है।
  10. भारत ने एक संतुलित और रणनीतिक रुख अपनाया है, जिसमें सीधे किसी पक्ष की आलोचना से बचते हुए अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा पर ध्यान दिया गया है।

भारत की ऊर्जा सुरक्षा: एक प्रमुख चिंता

पश्चिम एशिया संकट के दौरान भारत की ऊर्जा सुरक्षा एक बड़ी चिंता के रूप में सामने आई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने होर्मुज जलसंधि (Strait of Hormuz) के महत्व को रेखांकित किया, जिसके माध्यम से भारत अपने कच्चे तेल, गैस और उर्वरकों का बड़ा हिस्सा आयात करता है।

संघर्ष के कारण इस क्षेत्र में समुद्री आवागमन प्रभावित हुआ है, जिससे आपूर्ति बाधित होने की आशंका बढ़ गई है। हालांकि, सरकार ने पेट्रोल, डीजल और गैस की आपूर्ति देशभर में स्थिर बनाए रखने के लिए सक्रिय कदम उठाए हैं।

प्रधानमंत्री ने भारत की दीर्घकालिक रणनीति पर भी जोर दिया, जिसमें ऊर्जा आयात स्रोतों को 27 से बढ़ाकर 41 देशों तक विविध बनाना और मजबूत भंडार तैयार करना शामिल है, ताकि किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम हो सके।

सामरिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) और तैयारी

प्रधानमंत्री के भाषण में भारत की तैयारियों पर विशेष जोर दिया गया। उन्होंने बताया कि भारत के पास लगभग 53 लाख मीट्रिक टन का सामरिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) है और इसे आगे बढ़ाने की योजना है।

यह भंडार वैश्विक आपूर्ति बाधाओं के दौरान सुरक्षा कवच का काम करता है और संकट के समय ऊर्जा स्थिरता बनाए रखने में मदद करता है।

इसके साथ ही भारत जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने के लिए इथेनॉल ब्लेंडिंग (लगभग 20%), नवीकरणीय ऊर्जा और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी जैसे उपायों पर भी ध्यान दे रहा है।

विदेशों में भारतीयों की सुरक्षा: सरकारी कदम

पश्चिम एशिया में रहने वाले भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बताया कि भारतीय मिशन 24 घंटे काम कर रहे हैं और सहायता, परामर्श तथा आपातकालीन सेवाएं प्रदान कर रहे हैं।

अब तक 3,75,000 से अधिक भारतीय सुरक्षित वापस लौट चुके हैं, जिनमें ईरान से बड़ी संख्या में छात्र भी शामिल हैं।

भारत पर आर्थिक और व्यापारिक प्रभाव

पश्चिम एशिया क्षेत्र भारत के व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस मार्ग में किसी भी प्रकार की बाधा से तेल, गैस और उर्वरकों के आयात पर असर पड़ सकता है।

प्रधानमंत्री ने आश्वासन दिया कि वैश्विक कीमतों में वृद्धि के बावजूद सरकार आम जनता और किसानों पर आर्थिक बोझ कम करने के लिए प्रयासरत है। उन्होंने यह भी बताया कि पहले भी वैश्विक कीमतों में वृद्धि के दौरान उर्वरकों पर सब्सिडी दी गई थी।

साथ ही, भारत ने उर्वरक उत्पादन बढ़ाकर और पर्याप्त अनाज भंडारण सुनिश्चित कर कृषि क्षेत्र को मजबूत किया है, जिससे खाद्य सुरक्षा बनी रहे।

कूटनीति और भारत का वैश्विक रुख

अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत हमेशा अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर शांति और कूटनीति का समर्थन करता रहा है।

उन्होंने दोहराया कि इस संकट का समाधान केवल संवाद के माध्यम से ही संभव है। भारत विभिन्न देशों के साथ सक्रिय रूप से संपर्क बनाए हुए है, ताकि समुद्री मार्ग सुरक्षित रहें और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं स्थिर बनी रहें।

यह भारत की बढ़ती भूमिका को दर्शाता है, जो एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में शांति और स्थिरता की वकालत कर रहा है।

हॉर्मुज जलडमरूमध्य संकट: तेल आपूर्ति सुरक्षित करने को 22 देशों का गठबंधन

मार्च 2026 में एक बड़े वैश्विक घटनाक्रम के तहत लगभग 22 देशों ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों की सुरक्षा के लिए एकजुट होकर कदम उठाया है। यह निर्णय ईरान और अन्य देशों के बीच बढ़ते तनाव के बीच लिया गया है। यह महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग प्रतिदिन लगभग 2 करोड़ बैरल तेल की आपूर्ति करता है, जिससे यह वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाता है। ईरान द्वारा इस जलडमरूमध्य में नौवहन पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद आपूर्ति बाधित होने की आशंकाएँ बढ़ गई हैं।

हॉर्मुज जलडमरूमध्य संकट 2026

यह संकट तब शुरू हुआ जब ईरान ने 2 मार्च 2026 के बाद इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की। साथ ही यह चेतावनी भी दी गई कि बिना समन्वय के चलने वाले जहाजों को निशाना बनाया जा सकता है। इससे वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ गई और आपूर्ति बाधित होने का खतरा पैदा हो गया।

यह कदम कथित रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल की सैन्य गतिविधियों के जवाब में उठाया गया, जिससे खाड़ी क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया। इसके परिणामस्वरूप वैश्विक शिपिंग मार्गों में अनिश्चितता पैदा हुई और तुरंत कूटनीतिक व सुरक्षा कदम उठाए गए।

22 देशों का गठबंधन: भूमिका और भागीदारी

22 देशों का एक मजबूत गठबंधन समुद्री मार्गों की सुरक्षा और निर्बाध व्यापार सुनिश्चित करने के लिए आगे आया है।

मुख्य देश शामिल हैं:

  • संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन (नेतृत्व भूमिका)
  • यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, जर्मनी, इटली
  • जापान, कनाडा, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया
  • नॉर्डिक देश जैसे स्वीडन, नॉर्वे, फ़िनलैंड

इस गठबंधन ने नागरिक जहाजों पर हमलों की निंदा की और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत नौवहन की स्वतंत्रता पर जोर दिया।

वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए महत्व

हॉर्मुज जलडमरूमध्य विश्व के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है।

महत्व:

  • वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20% इसी मार्ग से गुजरता है
  • मध्य पूर्व के तेल उत्पादकों को वैश्विक बाजारों से जोड़ता है
  • कई देशों की ऊर्जा सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक

इस मार्ग में किसी भी प्रकार का व्यवधान सीधे वैश्विक बाजारों को प्रभावित करता है।

वैश्विक ऊर्जा बाजार और व्यापार पर प्रभाव

वर्तमान तनाव का असर वैश्विक बाजारों पर दिखाई देने लगा है और तेल आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ गई है।

  • शिपिंग लागत में वृद्धि हुई है
  • जहाजों के बीमा प्रीमियम में भारी बढ़ोतरी हुई है

स्थिति को नियंत्रित करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने रणनीतिक तेल भंडार जारी करने के समन्वय की पहल की है, ताकि आपूर्ति और कीमतों को स्थिर किया जा सके।

प्रकृति 2026 पहल: कार्बन मार्केट पोर्टल के मुख्य उद्देश्य और फायदे

प्रकृति 2026 शिखर सम्मेलन 19 से 22 मार्च तक नई दिल्ली में आयोजित किया गया, जो जलवायु कार्रवाई और ग्रीन फाइनेंस की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इस कार्यक्रम के दौरान सरकार ने इंडियन कार्बन मार्केट पोर्टल लॉन्च किया, जिसका उद्देश्य कार्बन ट्रेडिंग और उत्सर्जन की निगरानी को मजबूत करना है। इस सम्मेलन का आयोजन ऊर्जा दक्षता ब्यूरो(BEE) द्वारा किया गया और इसका फोकस भारत के जलवायु लक्ष्यों को डिजिटल नवाचार के साथ जोड़ना था।

प्रकृति 2026 क्या है? 

प्रकृति 2026 का पूरा नाम परिवर्तनकारी पहलों के एकीकरण हेतु सुदृढ़ता, जागरूकता, ज्ञान और संसाधनों को बढ़ावा देना (Promoting Resilience, Awareness, Knowledge and Resources for Integrating Transformational Initiatives) है। यह कार्बन मार्केट्स पर आयोजित दूसरा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन है, जिसका उद्देश्य जलवायु वित्त और सतत विकास को बढ़ावा देना है। यह एक वैश्विक मंच के रूप में कार्य करता है, जहाँ नीति-निर्माता, उद्योग जगत के नेता और विशेषज्ञ एक साथ आकर उत्सर्जन कम करने और हरित तकनीकों को अपनाने की रणनीतियों पर चर्चा करते हैं। यह पहल जलवायु परिवर्तन के प्रति भारत के सक्रिय दृष्टिकोण और आर्थिक विकास के साथ स्थिरता को जोड़ने के प्रयासों को दर्शाती है।

इंडियन कार्बन मार्केट पोर्टल: मुख्य उद्देश्य 

इंडियन कार्बन मार्केट पोर्टल एक डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जिसे ऊर्जा दक्षता ब्यूरो द्वारा विद्युत मंत्रालय और पर्यावरण मंत्रालय के अंतर्गत विकसित किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य कार्बन उत्सर्जन को प्रभावी ढंग से ट्रैक करना, सत्यापित करना और उसका व्यापार (ट्रेडिंग) सुनिश्चित करना है। यह पोर्टल भारत की कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS) को भी समर्थन देता है और उत्सर्जन में कमी की प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखता है।

इस पोर्टल के प्रमुख उद्देश्यों में वित्तीय प्रोत्साहनों के माध्यम से उत्सर्जन में कमी को बढ़ावा देना, कार्बन क्रेडिट का सटीक ट्रैकिंग और सत्यापन सुनिश्चित करना तथा वैश्विक समझौतों के तहत भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं को समर्थन देना शामिल है।

कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS) कैसे काम करती है?

यह योजना एक बाजार-आधारित प्रणाली पर आधारित है, जिसका उद्देश्य उत्सर्जन को कम करना है। यह उद्योगों को आर्थिक प्रोत्साहनों के माध्यम से अपने कार्बन उत्सर्जन को घटाने के लिए प्रेरित करती है।

मुख्य कार्यप्रणाली:

  • उत्सर्जन सीमाएँ (Emission Caps): उद्योगों के लिए कार्बन उत्सर्जन की सीमा निर्धारित की जाती है
  • कार्बन क्रेडिट (Carbon Credits): जो कंपनियाँ उत्सर्जन कम करती हैं, उन्हें कार्बन क्रेडिट प्राप्त होते हैं
  • ट्रेडिंग प्रणाली (Trading System): निर्धारित सीमा से अधिक उत्सर्जन करने वाली कंपनियाँ इन क्रेडिट को खरीद सकती हैं

इस प्रकार, यह प्रणाली पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक गतिविधियों को भी संतुलित करने में मदद करती है।

डिजिटल MRV तकनीक: पारदर्शिता सुनिश्चित करना 

इंडियन कार्बन मार्केट पोर्टल की एक प्रमुख विशेषता डिजिटल मापन, रिपोर्टिंग और सत्यापन (MRV) प्रणाली का उपयोग है। यह तकनीक सुनिश्चित करती है कि उत्सर्जन से संबंधित डेटा सटीक और विश्वसनीय हो।

प्रयुक्त प्रमुख तकनीकें:

  • इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) डिवाइस
  • सैटेलाइट मॉनिटरिंग
  • ब्लॉकचेन आधारित सत्यापन

वैश्विक एकीकरण: पेरिस समझौता और कार्बन ट्रेड

भारत का कार्बन मार्केट पेरिस समझौता के आर्टिकल 6 के अनुरूप विकसित किया जा रहा है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्बन ट्रेडिंग की अनुमति देता है। इस एकीकरण से भारतीय कार्बन क्रेडिट का वैश्विक स्तर पर व्यापार संभव होता है। साथ ही, यह अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्त को आकर्षित करने में मदद करता है और वैश्विक जलवायु बाजार में भारत की स्थिति को मजबूत बनाता है।

समावेशी विकास: किसान और MSME की भागीदारी

प्रकृति 2026 में समावेशी विकास पर विशेष ध्यान दिया गया है, जिसमें किसानों और MSME क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित किया गया है। किसान सतत कृषि पद्धतियों को अपनाकर कार्बन क्रेडिट अर्जित कर सकते हैं। इस पहल के माध्यम से जलवायु कार्रवाई को ग्रामीण क्षेत्रों के लिए आर्थिक अवसर में बदला जा रहा है, जिससे सतत विकास को बढ़ावा मिलता है।

 

7 साल बाद फिर शुरू होगा लिपुलेख दर्रा व्यापार, भारत-चीन के रिश्तों में नई पहल

भारत जून 2026 से लिपुलेख दर्रा (Lipulekh Pass) के माध्यम से चीन के साथ सीमा व्यापार फिर से शुरू करने जा रहा है। यह कदम 2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान लगाए गए सात साल के प्रतिबंध को समाप्त करेगा। यह निर्णय विभिन्न मंत्रालयों की मंजूरी और महत्वपूर्ण कूटनीतिक वार्ताओं के बाद लिया गया है। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित यह ऐतिहासिक व्यापार मार्ग लंबे समय से स्थानीय लोगों की आजीविका का आधार रहा है, और इसके दोबारा खुलने से व्यापारियों को आर्थिक राहत मिलने की उम्मीद है।

भारत-चीन लिपुलेख पास व्यापार बहाली 2026

  • लिपुलेख दर्रा के पुनः खुलने से भारत और चीन के बीच एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक और आर्थिक कदम माना जा रहा है। यह व्यापार सामान्यतः जून से सितंबर तक चलता है और परिस्थितियों के अनुसार आगे बढ़ाया जा सकता है।
  • यह निर्णय दोनों देशों के अधिकारियों के बीच उच्चस्तरीय वार्ताओं के बाद लिया गया, जिसमें 2020 से बंद हिमालयी व्यापार मार्गों को फिर से खोलने पर सहमति बनी।

भारत के लिए लिपुलेख व्यापार का महत्व

  • यह व्यापार केवल वस्तुओं के आदान-प्रदान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्थानीय अर्थव्यवस्था और क्षेत्रीय संपर्क को मजबूत करने में भी अहम भूमिका निभाता है।
  • सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए यह आय का प्रमुख स्रोत है और यह दोनों देशों के बीच पारंपरिक संबंधों को भी बनाए रखता है।

मुख्य लाभ:

  • स्थानीय व्यापारियों और व्यवसायों को बढ़ावा
  • पारंपरिक हिमालयी व्यापार मार्गों का पुनर्जीवन
  • भारत-चीन आर्थिक संबंधों को मजबूती
  • सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास को समर्थन

निर्णय के पीछे कूटनीतिक वार्ता

यह निर्णय अजीत डोभाल और वांग यी के बीच अगस्त 2025 में हुई वार्ता के बाद लिया गया। दोनों पक्षों ने कई व्यापार मार्गों को फिर से खोलने पर सहमति जताई, जिनमें शामिल हैं:

  • लिपुलेख पास (उत्तराखंड)
  • शिपकी ला (हिमाचल प्रदेश)
  • नाथू ला (सिक्किम)

उत्तराखंड में तैयारियां

पिथौरागढ़ जिले में स्थानीय प्रशासन ने व्यापार को सुचारु रूप से शुरू करने के लिए तैयारियां शुरू कर दी हैं।

की जा रही व्यवस्थाएं:

  • व्यापारियों के लिए ट्रांजिट कैंप की स्थापना
  • बैंकिंग और मुद्रा विनिमय सेवाएं
  • चिकित्सा सुविधाएं
  • सुरक्षित संचार प्रणाली

स्थानीय व्यापारियों के लिए राहत

2020 से व्यापार बंद होने के कारण स्थानीय व्यापारियों को भारी आर्थिक नुकसान हुआ था और कई परिवारों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

अब इस मार्ग के फिर से खुलने से स्थानीय समुदायों में नई उम्मीद जगी है। यह कदम आय के स्रोतों को बहाल करने और सीमावर्ती गांवों में आर्थिक गतिविधियों को पुनर्जीवित करने में सहायक होगा।

हिमालय में तेजी से पिघलती बर्फ: क्या गंगा-ब्रह्मपुत्र पर मंडरा रहा है संकट?

हिमालय अब खतरे में है। हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रही है। पहले ये धीरे-धीरे बपिघल रहे थे लेकिन अब ये दोगुनी रफ्तार से पिघल रहे हैं। ध्रुवीय क्षेत्रों के बाद हिमालय विश्व का तीसरा सबसे बड़ा बर्फ का भंडार है, जिसे ‘तीसरा ध्रुव’ भी कहा जाता है। सवाल बड़ा है यदि यही हाल रहा तो क्या गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी जीवनदायिनी नदियां भी सूख जाएंगी? क्या यह किसी आने वाले संकट का संकेत है? हालिया रिपोर्ट चेतावनी देती है।

यह केवल बर्फ नहीं पिघल रही। यह आने वाले जल संकट की नींव है। करोड़ों लोगों की जिंदगी इससे जुड़ी है। खेती, पानी, अर्थव्यवस्था सब दांव पर है। यह कोई दूर की बात नहीं। यह अभी हो रहा है। और तेजी से हो रहा है।

ग्लेशियर क्षेत्र का करीब 12% हिस्सा खत्म

रिपोर्ट के मुताबिक, हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियर पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा तेजी से सिकुड़ रहे हैं। 1990 से 2020 के बीच ग्लेशियर क्षेत्र का करीब 12 प्रतिशत हिस्सा खत्म हो चुका है। बर्फ का भंडार भी 9 प्रतिशत कम हो गया है। चिंता की बात यह है कि 21वीं सदी में बर्फ पिघलने की रफ्तार 20वीं सदी के मुकाबले लगभग दोगुनी हो गई है। खासकर 2010 के बाद यह गिरावट और तेज हो गई है। छोटे ग्लेशियर सबसे ज्यादा प्रभावित हैं. कई तो पूरी तरह गायब होने की कगार पर हैं।

बेसिन में ग्लेशियरों का सबसे ज्यादा नुकसान

रिपोर्ट बताती है कि गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन में ग्लेशियरों का सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। पिछले तीन दशकों में इन इलाकों में क्रमशः लगभग 21 प्रतिशत और 16 प्रतिशत तक ग्लेशियर क्षेत्र घटा है। ये वही नदियां हैं जिन पर भारत समेत कई देशों की बड़ी आबादी निर्भर है। यदि ग्लेशियर सिकुड़ते रहे, तो इन नदियों का जलस्तर भी प्रभावित होगा. खासकर सूखे मौसम में पानी की उपलब्धता घट सकती है।

हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में ज्यादा ग्लेशियर

हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में करीब 63,000 से ज्यादा ग्लेशियर हैं। ये ग्लेशियर सिर्फ बर्फ के पहाड़ नहीं हैं। ये प्राकृतिक जल भंडार हैं। गर्मियों में यही बर्फ पिघलकर नदियों को पानी देती है। लेकिन अब यह संतुलन बिगड़ रहा है। तापमान बढ़ रहा है। बारिश का पैटर्न बदल रहा है। 5500 मीटर से नीचे के ग्लेशियर सबसे ज्यादा तेजी से पिघल रहे हैं। वहीं, दक्षिण और पूर्व की ओर मुख वाले ग्लेशियर ज्यादा तेजी से खत्म हो रहे हैं क्योंकि उन्हें अधिक धूप मिलती है।

 

इजरायल के डिमोना को क्यों माना जाता था सबसे सुरक्षित शहर

ईरान और इजरायल के बढ़ते संघर्ष के दौरान 21 मार्च 2026 को एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है। दरअसल ईरानी मिसाइलों ने डिमोना और अराद शहरों पर हमला किया। इस हमले में 100 से ज्यादा लोगों के घायल होने की खबर है, जिसमें डिमोना को शुरुआती हमले का सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा। इस घटना को चौंकाने वाली बनाती है वह यह है कि डिमोना को लंबे समय से इजरायल के सबसे सुरक्षित शहरों में से एक माना जाता रहा है। आइए जानते हैं क्या है इसके पीछे की वजह।

बहुस्तरीय हवाई रक्षा प्रणाली

डिमोना को इतना सुरक्षित इसकी एडवांस्ड और बहुस्तरीय हवाई रक्षा प्रणाली बनाती है। आने वाले खतरों को रोकने के लिए आयरन डोम और पैट्रियट मिसाइल प्रणाली जैसे सिस्टम तैनात किए गए थे। यह सिस्टम मिसाइलों का पता लगाने, उन पर नजर रखने और हवा में ही नष्ट करने के लिए डिजाइन किए गए हैं। इससे डिमोना जैसे जरूरी क्षेत्रों के ऊपर एक सुरक्षा कवच बन जाता है।

देश के सबसे ज्यादा सुरक्षित स्थानों में से एक

डिमोना का महत्व वहां मौजूद शिमोन पेरेस नेगेव परमाणु अनुसंधान केंद्र की वजह से है। यह इजरायल की सबसे गुप्त और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सुविधाओं में से एक है। ऐसा माना जाता है कि यह सुविधा इजरायल के परमाणु कार्यक्रम का मुख्य केंद्र है। इससे यह देश के सबसे ज्यादा सुरक्षित स्थानों में से एक बन जाता है।

शहर के ऊपर नो-फ्लाइट जोन घोषित

डिमोना के ऊपर का हवाई क्षेत्र दुनिया के सबसे ज्यादा प्रतिबंधित क्षेत्रों में से एक है। इसे एक सख्त नो-फ्लाइट जोन घोषित किया गया है। इसका मतलब है कोई भी अनाधिकृत विमान चाहे वह नागरिक हो या फिर सैन्य, इसमें प्रवेश नहीं कर सकता।

आसपास होने वाले नुकसान सीमित

डिमोना नेगेव रेगिस्तान के काफी अंदर तक बसा है। यह बड़े आबादी वाले केंद्रों से काफी दूर है। इस भौगोलिक एकांत ने इसे दुश्मनों के लिए एक कठिन लक्ष्य बना दिया है। यह दूरी अचानक होने वाले हमलों की संभावना को कम करती है। इससे आसपास होने वाले नुकसान सीमित हो जाते हैं।

परमाणु सुविधा के लिए जरूरी हिस्से

इन सबके अलावा परमाणु सुविधा के लिए जरूरी हिस्से भूमिगत बनाए गए हैं और कंक्रीट व स्टील की मोटी परतों से इन्हें सुरक्षा दी गई है। यह संरचनाएं खास तौर से भारी बमबारी का सामना करने के लिए डिजाइन की गई हैं। इससे इन्हें नष्ट करना और भी मुश्किल हो जाता है।

 

INS Taragiri: भारतीय नौसेना की नई स्टील्थ ताकत, जानें इसकी विशेषताएँ

भारतीय नौसेना 3 अप्रैल 2026 को विशाखापत्तनम में आईएनएस तारागिरी को कमीशन करने जा रही है। यह भारत की समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह नई स्टील्थ फ्रिगेट Project 17A के तहत बनाई गई है, जो भारत की रक्षा क्षमता और आत्मनिर्भरता को दर्शाती है। इस समारोह में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के शामिल होने की संभावना है।

INS तारागिरी: मुख्य विवरण और प्रोजेक्ट 17A

INS तारागिरी, प्रोजेक्ट 17A के तहत बनने वाली चौथी स्टील्थ फ्रिगेट है, जिसका उद्देश्य आधुनिक और उन्नत युद्धपोत तैयार करना है। इसका निर्माण मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL), मुंबई द्वारा किया गया है, जो भारत की शिपबिल्डिंग क्षमता को दर्शाता है।

इस युद्धपोत का विस्थापन लगभग 6,670 टन है, जो इसे भारतीय नौसेना के लिए एक शक्तिशाली संपत्ति बनाता है।

उन्नत स्टील्थ तकनीक

INS तारागिरी की सबसे बड़ी विशेषता इसकी उन्नत स्टील्थ तकनीक है, जो इसे दुश्मन के रडार से छिपाने में मदद करती है। इसका आधुनिक डिजाइन और कम रडार क्रॉस-सेक्शन इसे पहचानना और निशाना बनाना कठिन बनाते हैं। यह आधुनिक युद्ध में इसकी प्रभावशीलता को बढ़ाता है।

हथियार और युद्ध क्षमता

यह फ्रिगेट अत्याधुनिक हथियार प्रणालियों से लैस है, जो इसे हवा, सतह और पानी के नीचे से आने वाले खतरों से निपटने में सक्षम बनाती हैं।

मुख्य हथियार प्रणाली:

  • सुपरसोनिक सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइलें
  • मध्यम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें
  • उन्नत पनडुब्बी रोधी (Anti-Submarine) प्रणाली

इन सभी को एक आधुनिक कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम के माध्यम से एकीकृत किया गया है।

इंजन, गति और संचालन क्षमता

इसमें संयुक्त डीज़ल या गैस (CODOG) प्रोपल्शन सिस्टम का उपयोग किया गया है, जो गति और ईंधन दक्षता दोनों प्रदान करता है। यह प्रणाली जहाज को उच्च गति के साथ-साथ लंबी दूरी के मिशनों में भी कुशल बनाती है।

मेक इन इंडिया को बढ़ावा

INS तारागिरी मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत पहल को मजबूती देती है। इसमें 75% से अधिक स्वदेशी घटकों का उपयोग किया गया है और 200 से अधिक MSMEs ने इसमें योगदान दिया है।

यह परियोजना न केवल भारत की रक्षा क्षमता को मजबूत करती है, बल्कि देश के औद्योगिक और आर्थिक विकास को भी बढ़ावा देती है।

PRARAMBH 2026 क्या है? जानिए यह करदाताओं पर कैसे डालेगा असर

भारत सरकार ने PRARAMBH 2026 नामक एक राष्ट्रीय जागरूकता अभियान शुरू किया है, जिसका उद्देश्य नागरिकों को Income Tax Act, 2025 के बारे में जानकारी देना है। यह अधिनियम 01 अप्रैल 2026 से लागू होगा। इस पहल का मकसद नए कर प्रणाली में सुचारु परिवर्तन सुनिश्चित करना, जानकारी को सरल बनाना और लोगों की समझ को बढ़ाना है। इस अभियान का नेतृत्व वित्त मंत्रालय द्वारा किया जा रहा है।

PRARAMBH 2026 का उद्देश्य और दृष्टि

PRARAMBH का पूरा नाम मिशन विकसित भारत के लिए नीतिगत सुधार और ज़िम्मेदार कार्रवाई (Policy Reform and Responsible Action for Mission Viksit Bharat) है। यह सरकार के दीर्घकालिक आर्थिक विकास और सुशासन के दृष्टिकोण को दर्शाता है।

इसका मुख्य उद्देश्य करदाताओं में जागरूकता बढ़ाना और स्वैच्छिक अनुपालन (voluntary compliance) को प्रोत्साहित करना है। सरल और सुलभ जानकारी के माध्यम से यह अभियान भ्रम को कम करने, विश्वास बढ़ाने और कर प्रणाली में भागीदारी को मजबूत करने का प्रयास करता है।

Income Tax Act 2025: बड़ा बदलाव

आयकर अधिनियम, 2025 (Income Tax Act, 2025) भारत की कर प्रणाली में एक बड़ा सुधार है, जो 1 अप्रैल 2026 से लागू होगा। इसका उद्देश्य कर प्रक्रियाओं को सरल बनाना, पारदर्शिता बढ़ाना और अनुपालन को बेहतर करना है।

PRARAMBH 2026 इस बदलाव के लिए करदाताओं को तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, ताकि व्यक्ति और व्यवसाय नए नियमों को आसानी से समझ सकें और अपनाने में कोई कठिनाई न हो।

मल्टी-चैनल आउटरीच रणनीति

यह अभियान देशभर में अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचने के लिए पारंपरिक और डिजिटल दोनों माध्यमों का उपयोग करता है।

मुख्य माध्यम:

  • प्रिंट मीडिया और समाचार पत्र
  • टीवी और रेडियो अभियान
  • सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म
  • आउटडोर विज्ञापन

डिजिटल नवाचार: ‘कर साथी’ और वेबसाइट 2.0

इस अभियान की खास बात AI आधारित टूल्स और डिजिटल सेवाएं हैं।

  • ‘कर साथी’ चैटबॉट: कर संबंधी सवालों के रियल-टाइम जवाब देगा
  • Income Tax Website 2.0: बेहतर नेविगेशन और यूज़र-फ्रेंडली सेवाएं
  • वीडियो, FAQs और गाइडेंस नोट्स: जटिल कर नियमों को सरल बनाते हैं

बहुभाषीय सुविधा: समावेशी पहल

यह अभियान हिंदी और अंग्रेजी के साथ 10 क्षेत्रीय भाषाओं में भी जानकारी उपलब्ध कराता है, जिससे देश के विभिन्न क्षेत्रों के लोग आसानी से समझ सकें।

जनभागीदारी और इंटरएक्टिव लर्निंग

इसमें MyGov क्विज़ और अन्य इंटरएक्टिव कार्यक्रम शामिल हैं, जो लोगों को कर प्रणाली के बारे में रोचक तरीके से सीखने के लिए प्रेरित करते हैं।

इस प्रकार, PRARAMBH 2026 न केवल जागरूकता बढ़ाता है, बल्कि करदाताओं में आत्मविश्वास और भागीदारी को भी मजबूत करता है।

ऊर्जा सुरक्षा पर सरकार अलर्ट: पीएम मोदी ने की उच्चस्तरीय बैठक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष के बीच 22 मार्च 2026 को कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की अहम बैठक की अध्यक्षता की। प्रधानमंत्री आवास पर तीन घंटे से ज्यादा देर तक चली इस बैठक में मौजूदा हालात, उसके भारत पर असर और सरकार की तैयारियों का व्यापक आकलन किया गया। कैबिनेट सेक्रेटरी ने वैश्विक स्थिति और अब तक उठाए गए कदमों पर डिटेल में प्रेजेंटेशन​ दिया।

सीसीएस की बैठक के दौरान जिन मुद्दों पर चर्चा हुई उनमें कृषि, फर्टिलाइजर, फूड सिक्योरिटी, पेट्रोलियम, पावर, MSME, एक्सपोर्ट, शिपिंग और सप्लाई चेन जैसे अहम सेक्टर शामिल रहे। मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष का इन सेक्टर्स पर पड़ने वाले असर और उससे निपटने के उपायों पर बैठक में चर्चा हुई। सरकार ने साफ किया कि बदलते हालात का असर शॉर्ट, मीडियम और लॉन्ग टर्म में देखने को मिल सकता है। आम नागरिकों के लिए जरूरी खाद्य वस्तुओं और ईंधन की उपलब्धता को प्राथमिकता दी गई।

क्या-क्या हुई चर्चा बैठक में?

कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की बैठक में प्रधानमंत्री ने स्पष्ट निर्देश दिए कि सरकार के सभी अंग सही नजरिया अपनाकर नागरिकों को इस संकट के प्रभाव से सुरक्षित रखें। बैठक में भोजन, ऊर्जा और ईंधन सुरक्षा पर चर्चा हुई। किसानों के लिए खरीफ सीजन के लिए खाद की आवश्यकता का आकलन किया गया। PM ने आश्वस्त किया कि पिछले सालों में बनाए गए स्टॉक के कारण खाद की कोई कमी नहीं होगी। भविष्य के लिए वैकल्पिक स्रोतों पर भी चर्चा हुई। इसके अतिरिक्त देश के सभी पावर प्लांटों में कोयले का पर्याप्त स्टॉक सुनिश्चित करने का फैसला लिया गया, ताकि देश में बिजली की कोई किल्लत न हो।

जमाखोरी न हो: प्रधानमंत्री

प्रधानमंत्री ने राज्य सरकारों के साथ उचित समन्वय के निर्देश दिए हैं ताकि युद्ध की आड़ में जरूरी वस्तुओं की कालाबाजारी और जमाखोरी न हो सके। उन्होंने कहा कि नागरिकों को कम से कम असुविधा होनी चाहिए। PM मोदी ने इस संकट से निपटने के लिए एक डेडीकेटेड ‘ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स’ और सचिवों के समूह के गठन का निर्देश दिया है। यह समूह अलग-अलग सेक्टर के हितधारकों के साथ मिलकर काम करेगा।

कैबिनेट मंत्री बैठक में मौजूद

पीएम हाउस पर हुई इस हाई लेवल मीटिंग में 13 कैबिनेट मंत्री भी मौजूद थे। इसमें गृहमंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन, विदेश मंत्री एस जयशंकर, पीयूष गोयल, हरदीप सिंह पुरी, प्रह्लाद जोशी, अश्विनी वैष्णव, के राम मोहन नायडू, जे पी नड्डा, सर्वानंद सोनोवाल, मनोहर लाल खट्टर और शिवराज सिंह चौहान शामिल थे। इसके अतिरिक्त बैठक में एनएसए अजीत डोभाल और पीएम के दोनों प्रिंसिपल सेक्रेटरी भी मौजूद रहे।

युद्ध की शुरुआत

अमेरिका और इसराइल द्वारा ईरान पर 28 फरवरी को हमला किए जाने के बाद युद्ध की शुरुआत हुई। ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए इसराइल और खाड़ी क्षेत्र के अपने कई पड़ोसी देशों पर हमला किया। ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बाधित कर दिया है, जो एक प्रमुख समुद्री मार्ग है और इसके जरिए दुनिया की 20 प्रतिशत ऊर्जा की ढुलाई होती है। इसके कारण भारत समेत कई देशों में ऊर्जा आपूर्ति में गंभीर व्यवधान पैदा हो गया।

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