सुप्रीम कोर्ट ने 29 अप्रैल 2026 को एक केस की सुनवाई के दौरान मौलिक अधिकारों का हवाला देते हुए आरोपी को बेल दिया। कोर्ट ने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि, किसी आरोपी के जल्द सुनवाई के अधिकार को, उस पर लगे आरोपों की गंभीरता के कारण छीना नहीं जा सकता है। सुनवाई में अगर देरी होता है तो वह जमानत का हकदार होगा, यह उसके मौलिक अधिकारों का हिस्सा है।
किस बेंच ने सुनवाई फैसला
बता दें, जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने सुनवाई के दौरान हैरानी जताई। दरअसल, उत्तर प्रदेश (UP) में हत्या के एक मामले में एक विचाराधीन कैदी पिछले नौ सालों से जेल में बंद है। कोर्ट ने इस बात की जानकारी होते ही उसे पहली ही सुनवाई में जमानत दे दी और राज्य सरकार की राय भी नहीं मांगी, जो कि किसी मामले का फैसला करने का सामान्य तरीका नहीं है।
आदेश पर आपत्ति जताई
बेंच ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश पर भी आपत्ति जताई, जिसमें आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी। हाई कोर्ट (HC) ने जमानत न देने के आधार के तौर पर सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला दिया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट के आदेश का असली मतलब समझने में नाकाम रहा और इस पर निराशा जताई।
कोर्ट के फैसले का असली उद्देश्य
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने आगे कहा कि ऐसा लगता है कि हाई कोर्ट इस कोर्ट के फैसले का असली उद्देश्य और आधार समझने में नाकाम रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट को बस इस बात पर गौर करना चाहिए था कि, याचिकाकर्ता पिछले नौ सालों से एक विचाराधीन कैदी के तौर पर जेल में बंद है। संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मिले जल्द सुनवाई के अधिकार को ध्यान में रखते हुए, याचिकाकर्ता की जमानत याचिका पर विचार करने के लिए हाई कोर्ट को और क्या चाहिए था?


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