मशहूर पत्रकार मार्क टली का निधन

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और प्रसारक मार्क टली का 26 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में 90 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्हें एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहाँ स्ट्रोक के बाद मल्टी-ऑर्गन फेल्योर के कारण उनका देहांत हुआ। भारत से रिपोर्टिंग करने वाले सबसे प्रभावशाली विदेशी संवाददाताओं में गिने जाने वाले मार्क टली ने पाँच दशकों से अधिक समय तक भारत की जटिलताओं को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने में अहम भूमिका निभाई।

क्यों चर्चा में है?

प्रसिद्ध पत्रकार, बीबीसी नई दिल्ली ब्यूरो के पूर्व प्रमुख और भारत पर लिखी गई कई चर्चित पुस्तकों के लेखक मार्क टली के निधन के साथ दक्षिण एशिया में विदेशी पत्रकारिता के एक युग का अंत हो गया।

मार्क टली कौन थे?

  • 1935 में कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) में ब्रिटिश शासन के दौरान जन्मे मार्क टली का पूरा नाम सर विलियम मार्क टली था।
  • वे ब्रिटिश नागरिक थे, लेकिन उन्होंने अपना अधिकांश जीवन भारत में बिताया।
  • भारतीय समाज और संस्कृति से गहरे जुड़ाव के कारण उन्हें स्नेहपूर्वक “टली साहब” कहा जाता था।
  • वे हिंदी भाषा में दक्ष थे, जिससे उन्हें भारत को बाहरी दृष्टि से नहीं, बल्कि अंदर से समझने और समझाने की दुर्लभ क्षमता मिली।

प्रारंभिक करियर और बीबीसी से जुड़ाव

  • मार्क टली ने 1960 के दशक में ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन (BBC) में कार्य करना शुरू किया।
  • 1965 में भारत में उनकी पोस्टिंग हुई।
  • शुरुआत में उन्होंने प्रशासनिक भूमिकाएँ निभाईं, लेकिन जल्द ही वे रिपोर्टिंग में आ गए।
  • उनकी सूक्ष्म दृष्टि, संवेदनशीलता और ज़मीनी रिपोर्टिंग ने उन्हें विशिष्ट पहचान दिलाई।
  • वे 22 वर्षों तक बीबीसी के नई दिल्ली ब्यूरो प्रमुख रहे और भारत के साथ-साथ पूरे दक्षिण एशिया की रिपोर्टिंग की।
  • वे भारत में कार्य करने वाले सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले विदेशी संवाददाताओं में से एक थे।

भारत के इतिहास की प्रमुख घटनाओं की रिपोर्टिंग

  • अपने दीर्घ और प्रतिष्ठित पत्रकारिता करियर के दौरान मार्क टली ने स्वतंत्रता के बाद के भारत की कई निर्णायक और ऐतिहासिक घटनाओं की रिपोर्टिंग की।
  • इनमें 1971 का बांग्लादेश मुक्ति संग्राम, आपातकाल (1975–77), ऑपरेशन ब्लू स्टार, 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या और सिख विरोधी दंगे, 1991 में राजीव गांधी की हत्या, तथा 1992 में बाबरी मस्जिद का विध्वंस शामिल हैं।
  • इसके अलावा उन्होंने भोपाल गैस त्रासदी, राजनीतिक परिवर्तन तथा भारत और पूरे उपमहाद्वीप में हुए सामाजिक उथल-पुथल की व्यापक कवरेज की।

भारत पर लिखीं कई मशहूर किताबें

उन्होंने भारत में लोगों के जीवन और समाज का बहुत करीब से अध्ययन किया था। मार्क टली ने भारत पर कई चर्चित पुस्तकें लिखीं, जिनमें ‘नो फुल स्टॉप्स इन इंडिया’, ‘इंडिया इन स्लो मोशन’, ‘द हार्ट ऑफ इंडिया’, अमृतसर: मिसेज गांधी लास्ट बैटल (1985), इंडियाज अनएंडिंग जर्नी (2008) और द रोड अहेड (2011) प्रमुख हैं। उनकी लेटेस्ट किताब, अपकंट्री टेल्स: वन्स अपॉन ए टाइम इन द हार्ट ऑफ इंडिया (2017), ग्रामीण उत्तर भारत की कहानियों का संकलन है।

बीबीसी के बाद का जीवन

  • 1990 के दशक के मध्य में संगठन के नेतृत्व से मतभेदों के कारण मार्क टली ने बीबीसी से इस्तीफा दे दिया।
  • इसके बावजूद वे बौद्धिक रूप से सक्रिय रहे और निरंतर लेखन एवं प्रसारण करते रहे।
  • उन्होंने BBC Radio 4 के कार्यक्रम “Something Understood” का प्रस्तुतीकरण किया, जो धर्म और नैतिक प्रश्नों पर केंद्रित था।
  • जीवन के उत्तरार्ध में भी वे धर्म, लोकतंत्र और भारतीय राजनीति से जुड़े विमर्शों में सक्रिय रूप से भाग लेते रहे और स्वयं को अक्सर भारत और ब्रिटेन—दोनों से जुड़ा हुआ बताते थे।

भारत से व्यक्तिगत जुड़ाव

  • मार्क टली का भारत से जुड़ाव केवल पत्रकारिता तक सीमित नहीं था।
  • वे दक्षिण दिल्ली में सादगीपूर्ण जीवन जीते थे और देशभर में व्यापक यात्राएँ करते थे, अक्सर रेल यात्रा के माध्यम से।
  • उन्होंने अपनी रिपोर्टिंग में केवल राजनीतिक वर्ग ही नहीं, बल्कि सामान्य भारतीयों की आवाज़ को लगातार प्रमुखता दी।
  • उनकी पत्रकारिता की शैली मैदानी रिपोर्टिंग और मानवीय कहानियों पर आधारित थी, जिसने उन्हें विभिन्न पीढ़ियों में गहरा स्नेह और विश्वसनीयता दिलाई।

सम्मान और पुरस्कार

  • पत्रकारिता में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए 2002 में ब्रिटिश सरकार द्वारा मार्क टली को नाइटहुड की उपाधि प्रदान की गई।
  • भारत सरकार ने भी उन्हें पद्म श्री तथा बाद में पद्म भूषण से सम्मानित किया, जिससे वे दोनों नागरिक सम्मानों को प्राप्त करने वाले चंद विदेशी नागरिकों में शामिल हो गए।
  • ये सम्मान भारत को ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ समझने और समझाने के प्रति उनके आजीवन समर्पण की भारतीय स्वीकृति को दर्शाते हैं।

सिक्किम पुलिस को विशिष्ट सेवा के लिए राष्ट्रपति पुलिस कलर पुरस्कार मिला

पूर्वोत्तर भारत के लिए गर्व के क्षण में, सिक्किम पुलिस को उसकी उत्कृष्ट सेवा, पेशेवर दक्षता और कर्तव्यनिष्ठा के लिए राष्ट्रपति पुलिस कलर सम्मान से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान भारत में पुलिस बलों को दिया जाने वाला सर्वोच्च और प्रतिष्ठित अलंकरणों में से एक माना जाता है, जो दीर्घकालिक उत्कृष्ट प्रदर्शन और जनसेवा के प्रति समर्पण को मान्यता देता है।

क्यों चर्चा में है?

सिक्किम पुलिस को प्रेसिडेंट्स पुलिस कलर (निशान) से सम्मानित किया गया, जिससे सिक्किम आज़ादी के बाद से यह प्रतिष्ठित सम्मान पाने वाला भारत का 15वां राज्य और नॉर्थ-ईस्ट का तीसरा राज्य बन गया है।

राष्ट्रपति पुलिस कलर पुरस्कार क्या है?

  • राष्ट्रपति पुलिस कलर पुरस्कार, जिसे सामान्यतः निशान कहा जाता है, पुलिस बलों को दिया जाने वाला एक औपचारिक एवं प्रतीकात्मक सम्मान है।
  • यह पुरस्कार असाधारण सेवा, वीरता, अनुशासन और पेशेवर उत्कृष्टता के लिए प्रदान किया जाता है।
  • यह सम्मान एक ध्वज (फ्लैग) और प्रतीक चिन्ह के रूप में होता है, जिसे पुलिस वर्दी की बाईं आस्तीन पर गर्व के साथ धारण किया जाता है।
  • यह पुरस्कार किसी एक व्यक्ति के कार्य के लिए नहीं, बल्कि पूरे पुलिस बल के सामूहिक प्रदर्शन, परंपरा और विरासत को मान्यता देता है।

सिक्किम पुलिस के लिए इस सम्मान का महत्व

  • राष्ट्रपति पुलिस कलर प्राप्त करना सिक्किम पुलिस के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।
  • स्वतंत्रता के बाद अब तक केवल 14 राज्यों को ही यह सम्मान प्राप्त हुआ था, जो इसकी दुर्लभता और प्रतिष्ठा को दर्शाता है।
  • इस सम्मान के साथ सिक्किम कुल मिलाकर 15वां राज्य बन गया है और उन चुनिंदा पुलिस बलों के समूह में शामिल हो गया है, जो ईमानदारी, दक्षता और जनविश्वास के उच्च मानकों के लिए जाने जाते हैं।
  • यह उपलब्धि संवेदनशील सीमा राज्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखने में सिक्किम पुलिस की पेशेवर, संयमित और जिम्मेदार भूमिका को रेखांकित करती है।

पूर्वोत्तर भारत का प्रतिनिधित्व और राष्ट्रीय महत्व

  • सिक्किम अब पूर्वोत्तर क्षेत्र का तीसरा राज्य बन गया है जिसे यह सम्मान प्राप्त हुआ है।
  • यह उपलब्धि पूर्वोत्तर राज्यों में पुलिसिंग की उत्कृष्टता को राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती मान्यता को दर्शाती है।
  • यह क्षेत्र कठिन भौगोलिक और रणनीतिक परिस्थितियों में कार्य करता है, जिसके बावजूद पुलिस बलों की क्षमता सराहनीय रही है।
  • यह सम्मान सीमा और पर्वतीय राज्यों में संस्थागत मजबूती और मनोबल बढ़ाने पर केंद्र सरकार के फोकस को भी दर्शाता है।

कलर प्रेज़ेंटेशन परेड

  • राष्ट्रपति पुलिस कलर का ध्वज और प्रतीक चिन्ह कलर प्रेज़ेंटेशन परेड के दौरान औपचारिक रूप से सिक्किम पुलिस को प्रदान किया जाएगा।
  • यह परेड एक पारंपरिक और औपचारिक समारोह होती है, जो एकता, गौरव तथा पुलिस बल और राष्ट्र के बीच के मजबूत संबंध का प्रतीक है।

नेट साइवर ब्रंट ने रचा इतिहास, WPL में शतक लगाने वाली बनीं पहली खिलाड़ी

महिला प्रीमियर लीग (WPL) के इतिहास में एक ऐतिहासिक क्षण दर्ज हुआ, जब लंबे समय से चला आ रहा एक बल्लेबाज़ी रिकॉर्ड आखिरकार टूट गया। दबाव भरे एक लीग मुकाबले में एक शानदार व्यक्तिगत प्रदर्शन ने टूर्नामेंट के रिकॉर्ड को नया आयाम दिया और भारत में महिला फ्रेंचाइज़ी क्रिकेट की बढ़ती प्रतिस्पर्धा को उजागर किया।

क्यों चर्चा में है?

नेट साइवर-ब्रंट (Nat Sciver-Brunt) ने WPL 2026 में इतिहास रचते हुए महिला प्रीमियर लीग की पहली शतकीय पारी खेली। उन्होंने यह उपलब्धि मुंबई इंडियंस की ओर से खेलते हुए रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु के खिलाफ वडोदरा में हासिल की।

WPL 2026 में ऐतिहासिक शतक

  • WPL 2026 के मैच संख्या 16 में नेट साइवर-ब्रंट ने 57 गेंदों पर नाबाद 100 रन की ऐतिहासिक पारी खेली।
  • यह मुकाबला कोटांबी स्टेडियम, वडोदरा में खेला गया।
  • वह उस समय बल्लेबाज़ी के लिए आईं जब मुंबई इंडियंस ने महज 16 रन पर पहला विकेट गंवा दिया था।
  • इसके बाद उन्होंने संयम और आत्मविश्वास के साथ पारी को संभाला।
  • उनकी पारी में 16 चौके और 1 छक्का शामिल था, जिसमें निरंतरता और नियंत्रित आक्रामकता साफ दिखाई दी।
  • इस पारी के साथ WPL में पहली बार किसी बल्लेबाज़ ने तीन अंकों का स्कोर (शतक) बनाया।

रिकॉर्ड साझेदारी

  • इस पारी की एक बड़ी खासियत हेले मैथ्यूज़ के साथ दूसरे विकेट के लिए की गई 131 रन की साझेदारी रही।
  • हेले मैथ्यूज़ ने 39 गेंदों पर 56 रन बनाए।
  • इस साझेदारी ने शुरुआती झटके के बाद मुंबई इंडियंस की पारी को मजबूती दी और बड़े स्कोर की नींव रखी।
  • तेज़ और स्पिन गेंदबाज़ों के खिलाफ दोनों बल्लेबाज़ों का तालमेल WPL 2026 में दिख रही रणनीतिक परिपक्वता को दर्शाता है।

लंबे समय से चला आ रहा WPL रिकॉर्ड टूटा

इस पारी से पहले WPL के इतिहास में कोई भी बल्लेबाज़ शतक नहीं लगा सकी थी।

अब तक का सर्वोच्च व्यक्तिगत स्कोर:

  • जॉर्जी वोल – 99*
  • सोफी डिवाइन – 99

विभिन्न सत्रों में 10 से अधिक खिलाड़ी 90 रन के पार पहुंचीं, लेकिन शतक का आंकड़ा छूना अब तक संभव नहीं हो पाया था।

नेट स्किवर-ब्रंट की इस पारी ने न सिर्फ यह इंतज़ार खत्म किया, बल्कि WPL के भविष्य के लिए नया मानक भी स्थापित कर दिया।

UGC बिल 2026 क्या है? इसके फायदे और नुकसान, जानिए विस्तार से

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने उच्च शिक्षा संस्थानों (HEI) में समता के संवर्द्धन से संबंधित विनियम, 2026 को अधिसूचित किया है, जिसका मुख्य उद्देश्य जाति-आधारित भेदभाव का उन्मूलन करना है। यूजीसी का दावा है कि ये नियम कास्ट आधारित भेदभाव रोकने, छात्रों की सुरक्षा बढ़ाने और विश्वविद्यालयों को अधिक जवाबदेह बनाने के लिए हैं। हालांकि, विशेषज्ञों और शिक्षाविदों के बीच यह नियम व्यावहारिकता, निष्पक्षता और प्रशासनिक दबाव को लेकर विवाद का विषय बन गए हैं।

क्या है UGC?

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के उद्देश्य से ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026’ लागू कर दिए हैं। यह रेगुलेशन 15 जनवरी 2026 से देशभर के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में प्रभावी हो गया है। इस नियम का उद्देश्य कैंपस में जातिगत भेदभाव को रोकना और सभी वर्गों के लिए समान, सुरक्षित और सम्मानजनक शैक्षणिक माहौल सुनिश्चित करना बताया गया है। हालांकि, इसके लागू होते ही देश के विभिन्न हिस्सों में अगड़ी जातियों से जुड़े संगठनों और समूहों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है। जानिए इसके फायदे और नुकसान…

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नए कानून में क्या बदला है?

नए रेगुलेशन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि अब अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) के साथ-साथ अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को भी जातिगत भेदभाव की परिभाषा में शामिल किया गया है। इसके साथ ही यूनिवर्सिटी स्तर पर एक समानता समिति गठित की जाएगी। इसमें ओबीसी, महिला, एससी, एसटी और दिव्यांग वर्ग के प्रतिनिधियों को सदस्य के रूप में शामिल करना जरूरी होगा। यह समिति हर छह महीने में अपनी रिपोर्ट तैयार करेगी और उसे यूजीसी को भेजना अनिवार्य होगा।

अब तक उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतें मुख्य रूप से एससी और एसटी समुदाय तक सीमित मानी जाती थीं। नए कानून के तहत ओबीसी वर्ग को भी स्पष्ट रूप से जातिगत भेदभाव की श्रेणी में शामिल कर लिया गया है। इसका मतलब यह है कि अब ओबीसी छात्र, शिक्षक और कर्मचारी भी अपने साथ होने वाले उत्पीड़न या भेदभाव की शिकायत आधिकारिक रूप से दर्ज करा सकेंगे।

इन विनियमों में जाति-आधारित भेदभाव को अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के विरुद्ध किसी भी अनुचित या पक्षपातपूर्ण व्यवहार के रूप में परिभाषित किया गया है। इससे OBC को स्पष्ट कानूनी सुरक्षा मिलती है और पिछले मसौदा ढाँचे में मौजूद बड़ी कमी को सुधारा गया है। प्रत्येक उच्च शिक्षा संस्थान के लिये समान अवसर केंद्र (EOC) स्थापित करना अनिवार्य होगा, जिसका उद्देश्य समता, सामाजिक समावेशन एवं समान पहुँच को बढ़ावा देना तथा परिसरों में भेदभाव से संबंधित शिकायतों का समाधान करना है।

विरोध क्यों कर रही हैं

कानून लागू होते ही देश के कई हिस्सों में अगड़ी जातियों से जुड़े संगठनों में असंतोष देखने को मिला। विरोध करने वालों का आरोप है कि इस कानून का दुरुपयोग हो सकता है और इसके जरिए अगड़ी जातियों के छात्रों और शिक्षकों को झूठे मामलों में फंसाया जा सकता है। आलोचकों का कहना है कि झूठी या निराधार शिकायतों को रोकने के लिए ठोस प्रावधान नहीं किए गए हैं, जिससे निर्दोष छात्रों या शिक्षकों को मानसिक दबाव और करियर से जुड़ा नुकसान हो सकता है।

महत्त्व

ये विनियम उच्च शिक्षा में जाति-आधारित भेदभाव के विरुद्ध कानूनी और संस्थागत ढाँचे को सुदृढ़ करते हैं तथा वर्ष 2019 के IIT दिल्ली अध्ययन में उठाई गई गंभीर चिंता को संबोधित करते हैं, जिसमें पाया गया कि ऐतिहासिक रूप से वंचित जातियों के 75% छात्र परिसर में भेदभाव का सामना करते हैं। OBC को शामिल करना सामाजिक न्याय के लिये एक व्यापक दृष्टिकोण को दर्शाता है। सख्त दंड यह संकेत देते हैं कि अब ये नियम केवल सलाहकारी दिशा-निर्देश नहीं, बल्कि प्रवर्तनीय विनियम हैं।

जाति आधारित भेदभाव

जाति आधारित भेदभाव न केवल शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करता है, बल्कि सामाजिक पूर्वाग्रहों को भी मज़बूत करता है; परिणामस्वरूप, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के छात्रों का प्रतिनिधित्व उच्च स्तरीय स्कूलों और कॉलेजों में सीमित रह जाता है। कई विश्वविद्यालयों में अनुसूचित जाति/जनजाति सेल प्रायः निष्क्रिय या “लीगल टीथ” (प्रभावी अधिकार) नहीं होते हैं। वे प्रायः पीड़ित को न्याय दिलाने की बजाय संस्था की प्रतिष्ठा की रक्षा को प्राथमिकता देते हैं।

24×7 शिकायत हेल्पलाइन 

नए नियमों के अनुसार, हर उच्च शिक्षा संस्थान में 24 घंटे सक्रिय हेल्पलाइन और Equal Opportunity Centre स्थापित किया जाएगा, जहां छात्र भेदभाव से जुड़ी शिकायत दर्ज करा सकेंगे।

आलोचकों का कहना है कि झूठी या निराधार शिकायतों को रोकने के लिए ठोस प्रावधान नहीं किए गए हैं, जिससे निर्दोष छात्रों या शिक्षकों को मानसिक दबाव और करियर से जुड़ा नुकसान हो सकता है।

Equity Committee और Equity Squad का गठन

UGC के नए नियमों के तहत सभी कॉलेज और विश्वविद्यालयों में Equity Committee और Equity Squad का गठन करना अनिवार्य होगा। छात्रों और शिक्षकों का मानना है कि इन समितियों में सामान्य वर्ग का संतुलित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित नहीं किया गया है। इसके अलावा, Equity Squad को व्यापक अधिकार दिए गए हैं, जबकि ‘भेदभाव’ की स्पष्ट और सीमित परिभाषा तय नहीं की गई, जिससे दुरुपयोग की आशंका जताई जा रही है।

सामाजिक तनाव बढ़ने की आशंका

UGC का मुख्य उद्देश्य अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्गों के खिलाफ भेदभाव रोकना है। हालांकि, कुछ सामान्य वर्ग के छात्र और फैकल्टी इसे एकतरफा नीति मानते हैं। उनका कहना है कि इससे सामान्य वर्ग के लोगों को पहले से ही संदेह के दायरे में रखा जा सकता है, जिससे सामाजिक तनाव बढ़ने की आशंका है।

आंकड़े क्या कहते हैं ?

UGC द्वारा संसद और सुप्रीम कोर्ट में पेश आंकड़ों के अनुसार, पिछले 5 वर्षों में जातिगत भेदभाव की शिकायतों में 118.4% की वृद्धि हुई है। वर्ष 2019-20 में 173 शिकायतें दर्ज हुई थीं, जबकि 2023-24 में यह संख्या बढ़कर 378 हो गई। 704 विश्वविद्यालयों और 1553 कॉलेजों से कुल 1160 शिकायतें सामने आईं। इन आंकड़ों को UGC नए नियमों के पक्ष में सबसे मजबूत तर्क के रूप में पेश कर रहा है।

 

BRO द्वारा जम्मू-कश्मीर के चतरगला दर्रे पर उच्च-ऊँचाई बचाव अभियान और सड़क बहाली

सीमा सड़क संगठन (Border Roads Organisation – BRO) ने एक बार फिर अपनी संचालन क्षमता और पेशेवर दक्षता का परिचय देते हुए जम्मू-कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश के चतरगला दर्रे पर उच्च-ऊँचाई बचाव एवं सड़क बहाली अभियान को सफलतापूर्वक अंजाम दिया। अत्यधिक ठंड, खराब मौसम और भारी हिमपात के बीच किए गए इस अभियान के तहत फंसे हुए नागरिकों और सैनिकों को सुरक्षित निकाला गया तथा एक महत्वपूर्ण संपर्क मार्ग को पुनः बहाल किया गया।

क्यों समाचार में?

23 जनवरी 2026 को भारी बर्फबारी के कारण चतरगला दर्रा (लगभग 10,500 फीट की ऊँचाई पर स्थित) अवरुद्ध हो गया था। इसके बाद BRO ने सड़क संपर्क बहाल करते हुए बचाव अभियान चलाया, जिसके तहत नागरिकों और सेना के जवानों को बिना किसी हताहत के सुरक्षित निकाला गया।

व्यवधान की पृष्ठभूमि

  • चतरगला दर्रा जम्मू क्षेत्र में भद्रवाह–चतरगला मार्ग पर स्थित है
  • 23 जनवरी 2026 को यहाँ 5–6 फीट तक भारी हिमपात हुआ
  • अचानक हुए इस मौसम परिवर्तन के कारण लगभग 38 किलोमीटर सड़क मार्ग अवरुद्ध हो गया
  • इससे नागरिकों और सुरक्षा बलों की आवाजाही पूरी तरह ठप हो गई

इस मार्ग का रणनीतिक और मानवीय महत्व अत्यधिक होने के कारण, त्वरित बहाली आवश्यक थी ताकि कठोर सर्दियों में किसी भी प्रकार की जनहानि या अलगाव को रोका जा सके।

बचाव एवं सड़क बहाली अभियान का क्रियान्वयन

  • बर्फ हटाने का कार्य 118 रोड कंस्ट्रक्शन कंपनी (RCC) द्वारा किया गया
  • यह इकाई 35 बॉर्डर रोड्स टास्क फोर्स (BRTF) के अंतर्गत प्रोजेक्ट संपर्क (Project Sampark) का हिस्सा है
  • टीम ने 24 जनवरी 2026 की सुबह कार्य शुरू किया
  • शून्य से नीचे तापमान में लगभग 40 घंटे तक लगातार कार्य किया गया
  • सभी कठिन परिस्थितियों के बावजूद 25 जनवरी 2026 की शाम तक मार्ग पुनः खोल दिया गया

निकासी एवं मानवीय सहायता

सड़क फिर से खुलने के बाद, BRO ने 20 फंसे हुए नागरिकों और राष्ट्रीय राइफल्स के 40 सैनिकों को उनके हथियारों और ज़रूरी सामान के साथ सुरक्षित निकाला।
यह बचाव अभियान 26 जनवरी, 2026 को 02:30 बजे बिना किसी जानमाल के नुकसान के पूरा हुआ, जो जानलेवा हालात में काम करने वाले BRO कर्मियों के प्रोफेशनलिज़्म, तैयारी और समर्पण को दिखाता है।

भारतीय सेना के साथ समन्वय

  • यह पूरा अभियान भारतीय सेना के साथ घनिष्ठ समन्वय में संचालित किया गया
  • बेहतर संचार, सुरक्षा और त्वरित राहत सुनिश्चित की गई
  • यह संयुक्त प्रयास दर्शाता है कि आपदा प्रबंधन में नागरिक-सैन्य सहयोग कितना महत्वपूर्ण है, विशेष रूप से उच्च-ऊँचाई और संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में

सीमा सड़क संगठन (BRO) के बारे में

  • बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइज़ेशन भारत की एक प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने वाली संस्था है, जो सीमावर्ती और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सड़कों के निर्माण और रखरखाव के लिए ज़िम्मेदार है।
  • दुनिया के सबसे दुर्गम और प्रतिकूल भौगोलिक क्षेत्रों में कार्य करते हुए सीमा सड़क संगठन (BRO) राष्ट्रीय सुरक्षा, आपदा प्रतिक्रिया और मानवीय सहायता के क्षेत्र में एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अपने आदर्श वाक्य “श्रमेण सर्वं साध्यम्” (परिश्रम से सब कुछ संभव है) से प्रेरित होकर BRO कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपने दायित्वों का सफलतापूर्वक निर्वहन करता है।

जातिगत भेदभाव के खिलाफ UGC के नए नियम, आखिर क्या है पूरा मामला

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने उच्च शिक्षा संस्थानों (HEI) में समता के संवर्द्धन से संबंधित विनियम, 2026 को अधिसूचित किया है, जिसका उद्देश्य जाति-आधारित भेदभाव का उन्मूलन करना है। ये केवल सुझाव नहीं हैं, बल्कि अनिवार्य (बाध्यकारी) नियम हैं, जिनका पालन हर संस्थान को करना होगा। इन नियमों का उल्लंघन करने वाले कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को कड़ी सज़ा का सामना करना पड़ेगा।

इन नियमों की ज़रूरत क्यों पड़ी?

भारतीय कॉलेजों में जातिगत भेदभाव एक असली और गंभीर समस्या है। 2019 में, IIT दिल्ली में एक स्टडी में पाया गया कि निचली जातियों के लगभग 75% छात्रों को कैंपस में भेदभाव का सामना करना पड़ा। इसमें शामिल हैं:

  • सामाजिक गतिविधियों से छात्रों को बाहर रखना
  • रूखा या अपमानजनक व्यवहार
  • छात्रावास, भोजनालय और खेल गतिविधियों में अलग-अलग व्यवहार या अलगाव

थोराट कमेटी (2007) ने पाया कि ये स्टूडेंट्स असल में अपने ही कॉलेजों में अलग-थलग थे, जिससे कैंपस के अंदर “अलग-अलग जगहें” बन गई थीं।

नए नियम क्या कहते हैं?

1. किन्हें संरक्षण मिलेगा?

नए नियमों के तहत संरक्षण दिया जाएगा:

  • अनुसूचित जाति (SC)
  • अनुसूचित जनजाति (ST)
  • अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)

ये नियम लोगों को धर्म, लिंग, विकलांगता और वे कहाँ से आते हैं, इस आधार पर होने वाले भेदभाव से भी बचाते हैं। यह पहले से ज़्यादा व्यापक है और यह हर किसी की सुरक्षा के प्रति सच्ची प्रतिबद्धता दिखाता है।

2. प्रत्येक कॉलेज को क्या करना अनिवार्य होगा?

अब हर कॉलेज और विश्वविद्यालय को एक समान अवसर केंद्र (Equal Opportunity Centre – EOC) स्थापित करना अनिवार्य होगा। इसे एक ऐसे विशेष कार्यालय के रूप में समझा जा सकता है जो:

  • भेदभाव से संबंधित शिकायतों को सुनता और दर्ज करता है
  • कॉलेज परिसर को अधिक न्यायपूर्ण और समावेशी बनाने के लिए कार्य करता है
  • यह सुनिश्चित करता है कि सभी छात्रों के साथ समान व्यवहार किया जाए

इस केंद्र में एक समिति का गठन भी अनिवार्य होगा, जिसमें निम्नलिखित वर्गों के प्रतिनिधि शामिल होंगे:

  • अनुसूचित जाति (SC) के छात्र
  • अनुसूचित जनजाति (ST) के छात्र
  • दिव्यांग छात्र
  • महिलाएँ
  • अन्य उपयुक्त प्रतिनिधि

इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि निर्णय-निर्माण प्रक्रिया में सभी वर्गों की आवाज़ शामिल हो।

3. कॉलेजों की जवाबदेही कैसे सुनिश्चित होगी?

अब कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को नियमित रूप से विस्तृत रिपोर्ट तैयार करनी होगी, जिसमें शामिल होगा:

  • प्राप्त हुई भेदभाव संबंधी शिकायतों की संख्या
  • उन शिकायतों पर की गई कार्रवाई
  • परिसर को अधिक समावेशी बनाने के लिए उठाए गए कदम

इन रिपोर्टों को साल में दो बार UGC को भेजना अनिवार्य होगा। इस प्रावधान से यह सुनिश्चित होगा कि संस्थान अब समस्याओं को छिपा नहीं सकेंगे और उन पर पारदर्शी तरीके से कार्रवाई करनी होगी।

4. राष्ट्रीय स्तर पर निगरानी व्यवस्था

UGC ने राष्ट्रीय स्तर पर एक समिति का गठन किया है, जिसमें सरकारी अधिकारी और नागरिक समाज (Civil Society) के सदस्य शामिल हैं।
इस समिति के प्रमुख कार्य हैं:

  • कॉलेजों और विश्वविद्यालयों द्वारा किए जा रहे कार्यों की समीक्षा करना
  • भेदभाव से संबंधित शिकायतों को सुनना
  • सुधार के लिए आवश्यक सुझाव देना
  • अद्यतन स्थिति बनाए रखने के लिए वर्ष में कम से कम दो बार बैठक करना

नियमों का पालन न करने पर क्या होगा?

यह इस व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है, क्योंकि अब नियमों का उल्लंघन करने पर वास्तविक और कड़े परिणाम होंगे:

  • नियम तोड़ने वाले कॉलेजों को सरकारी फंडिंग से वंचित किया जा सकता है
  • वे ऑनलाइन या दूरस्थ शिक्षा (Distance Learning) कार्यक्रम संचालित नहीं कर सकेंगे
  • ऐसे संस्थानों की UGC से मान्यता रद्द की जा सकती है

यह व्यवस्था पुराने नियमों से बिल्कुल अलग है, जो केवल सलाह या दिशा-निर्देश हुआ करते थे। अब संस्थानों को नियम मानने ही होंगे, अन्यथा उन्हें गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ेगा।

यह बदलाव क्यों महत्वपूर्ण है?

पुरानी समस्या: कई कॉलेजों में पहले से ही SC/ST सेल मौजूद थे, लेकिन वे प्रभावी रूप से काम नहीं कर पाए। अक्सर ये कार्यालय:

  • छात्रों को वास्तविक सहायता प्रदान नहीं करते थे
  • पीड़ितों की मदद करने के बजाय संस्थान की छवि बचाने पर ज़ोर देते थे
  • उनके पास बदलाव लागू करने की वास्तविक शक्ति नहीं थी

नया समाधान: नए समान अवसर केंद्र स्वतंत्र हैं, उनके पास असली संसाधन हैं, और उनमें असल बदलाव करने की शक्ति है।

मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health)

इन नियमों में एक महत्वपूर्ण पहलू को भी स्वीकार किया गया है—भेदभाव का सीधा असर छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है।
जब छात्रों को यह महसूस होता है कि वे किसी संस्थान का हिस्सा नहीं हैं, तो उनमें:

  • चिंता (Anxiety) बढ़ती है
  • आत्मविश्वास में कमी आती है
  • पढ़ाई में प्रदर्शन कमजोर हो जाता है

नए नियमों का उद्देश्य ऐसे सुरक्षित और सहयोगी वातावरण (Safe Spaces) तैयार करना है, जहाँ सभी छात्र बिना भय के आगे बढ़ सकें और अपनी पूरी क्षमता के साथ सफल हो सकें।

छात्रों के लिए इसका क्या अर्थ है?

इन नए नियमों का मतलब है कि अब:

  • छात्र बिना डर के भेदभाव की शिकायत दर्ज करा सकते हैं
  • कॉलेजों को हर शिकायत को गंभीरता से लेना अनिवार्य होगा
  • कार्रवाई न करने पर कॉलेजों के खिलाफ वास्तविक और कड़ी सज़ा का प्रावधान है
  • जाति, धर्म या सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर सभी छात्रों के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित किया जाएगा
  • कॉलेजों और विश्वविद्यालयों का ध्यान अब वास्तव में समावेशी (Inclusive) शैक्षणिक वातावरण बनाने पर होगा

 

नेशनल जियोग्राफिक डे 2026: तिथि, इतिहास और महत्व

नेशनल जियोग्राफिक डे 2026 मानवता की उस जिज्ञासा का उत्सव है, जो हमें अपने ग्रह पृथ्वी को समझने और खोजने के लिए प्रेरित करती है। यह दिवस विश्व स्तर पर मनाया जाता है और भूगोल, विज्ञान, अन्वेषण, संस्कृति, वन्यजीवन तथा पर्यावरण संरक्षण के महत्व को उजागर करता है। यह नेशनल जियोग्राफिक सोसाइटी की विरासत को सम्मान देता है, जिसने एक सदी से अधिक समय तक शोध, अन्वेषण और प्रभावशाली कहानियों के माध्यम से लोगों को दुनिया को समझने, प्रकृति से जुड़ने और पृथ्वी की रक्षा करने के लिए प्रेरित किया है।

नेशनल जियोग्राफिक डे 2026: तिथि

  • नेशनल जियोग्राफिक डे 2026 मंगलवार, 27 जनवरी 2026 को मनाया जाएगा।
  • यह तिथि 1888 में नेशनल जियोग्राफिक सोसाइटी की स्थापना की वर्षगांठ को दर्शाती है, इसलिए यह ज्ञान, खोज और पर्यावरणीय जिम्मेदारी का प्रतीक दिवस है।

नेशनल जियोग्राफिक डे क्यों मनाया जाता है?

यह दिवस लोगों को पृथ्वी के भूदृश्यों, महासागरों, जलवायु, संस्कृतियों और जैव विविधता के बारे में सीखने के लिए प्रेरित करता है। यह जलवायु परिवर्तन, आवासीय क्षरण और वन्यजीव संरक्षण जैसी वैश्विक चुनौतियों के प्रति जागरूकता बढ़ाता है और याद दिलाता है कि पृथ्वी को समझना उसके भविष्य की रक्षा के लिए आवश्यक है।

नेशनल जियोग्राफिक डे का इतिहास

  • नेशनल जियोग्राफिक सोसाइटी की स्थापना 27 जनवरी 1888 को वॉशिंगटन डी.सी. में “भौगोलिक ज्ञान का विस्तार और प्रसार” करने के उद्देश्य से की गई थी।
  • समय के साथ यह संस्था अन्वेषण, विज्ञान, शिक्षा, संरक्षण और कहानी कहने के क्षेत्र में एक वैश्विक नेता बन गई।
  • इसकी प्रसिद्ध पत्रिका, डॉक्यूमेंट्री, फोटोग्राफी और शोध अभियानों ने दुनिया को प्रकृति और मानवता को देखने का नया दृष्टिकोण दिया। नेशनल जियोग्राफिक डे इसी जिज्ञासा, खोज और ज्ञान-विस्तार की परंपरा का स्मरण कराता है।

नेशनल जियोग्राफिक डे का महत्व

  • यह दिवस भौगोलिक साक्षरता और वैश्विक जागरूकता को बढ़ावा देता है।
  • यह सांस्कृतिक विविधता के प्रति सम्मान, पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता और सतत जीवनशैली अपनाने की प्रेरणा देता है।
  • वैज्ञानिक अनुसंधान और वास्तविक अन्वेषण के माध्यम से यह संदेश देता है कि जागरूक नागरिक ही वैश्विक पर्यावरणीय और सामाजिक चुनौतियों का समाधान कर सकते हैं।

दुनिया को नेशनल जियोग्राफिक कैसे प्रेरित करता है?

  • नेशनल जियोग्राफिक वैज्ञानिकों, खोजकर्ताओं, फोटोग्राफरों और कहानीकारों को समर्थन देकर पृथ्वी की सुंदरता और चुनौतियों को दुनिया के सामने लाता है।
  • पत्रिकाओं, पुस्तकों, फिल्मों और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से यह लाखों लोगों को शिक्षित करता है और संरक्षण अभियानों को बढ़ावा देता है।
  • इसका कार्य विज्ञान और कहानी कहने को जोड़ता है, जिससे लोग प्रकृति से भावनात्मक रूप से जुड़ते हैं और उसकी रक्षा की आवश्यकता को समझते हैं।

यूरोप से इम्पोर्टेड कारों पर टैरिफ 40% तक घटेगा

भारत अपनी व्यापार और ऑटोमोबाइल नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव की तैयारी कर रहा है। यूरोपीय संघ (EU) के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर बातचीत अंतिम चरण में पहुँचने के साथ, भारत यूरोपीय कारों पर आयात शुल्क में बड़ी कटौती पर विचार कर रहा है। यह कदम घरेलू उद्योगों की सुरक्षा बनाए रखते हुए भारत के अपेक्षाकृत संरक्षित ऑटो बाजार को धीरे-धीरे खोलने का संकेत देता है।

क्यों खबर में?

भारत यूरोपीय संघ से आयातित कारों पर शुल्क को वर्तमान 110% तक से घटाकर 40% करने की योजना बना रहा है। यह कदम भारत–EU मुक्त व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की दिशा में एक अहम प्रगति माना जा रहा है।

प्रस्तावित टैरिफ कटौती योजना

  • प्रस्ताव के तहत, EU में बनी कारों पर अधिकतम आयात शुल्क 110% से घटाकर 40% किया जाएगा।
  • शुरुआती चरण में यह कटौती केवल €15,000 (लगभग ₹16.3 लाख) से अधिक कीमत वाली पूरी तरह बनी (Fully Built) कारों की एक सीमित कोटा पर लागू होगी।
  • समय के साथ, शुल्क को और घटाकर 10% तक लाने पर भी विचार किया जा सकता है, जिससे यूरोपीय कंपनियों को भारतीय बाजार में अधिक पहुंच मिलेगी और घरेलू निर्माताओं पर प्रतिस्पर्धी दबाव धीरे-धीरे बढ़ेगा।

यूरोपीय ऑटो निर्माताओं पर प्रभाव

  • इस टैरिफ कटौती से BMW, Mercedes-Benz और Volkswagen जैसी प्रमुख यूरोपीय कार कंपनियों को लाभ होने की संभावना है।
  • रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत हर साल लगभग 2 लाख आंतरिक दहन इंजन (ICE) वाहनों पर शुल्क घटाने पर सहमत हुआ है, हालांकि अंतिम कोटा अभी तय हो सकता है।
  • इससे यूरोपीय ब्रांड्स की कीमत प्रतिस्पर्धी बनेगी और भारत के तेजी से बढ़ते ऑटो बाजार में उनकी मौजूदगी मजबूत होगी।

इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) को बाहर रखा गया

  • बैटरी इलेक्ट्रिक वाहन (EVs) को पहले पाँच वर्षों तक इस टैरिफ कटौती से बाहर रखा जाएगा।
  • इसका उद्देश्य घरेलू कंपनियों द्वारा इलेक्ट्रिक मोबिलिटी क्षेत्र में किए गए निवेश की सुरक्षा करना है।
  • भविष्य में, जब भारत का EV उद्योग और परिपक्व होगा, तब EVs पर भी इसी तरह की रियायतों पर विचार किया जा सकता है। यह चरणबद्ध नीति व्यापार उदारीकरण और औद्योगिक हितों के बीच संतुलन दर्शाती है।

भारत–EU व्यापार वार्ताएँ

  • भारत और यूरोपीय संघ कई वर्षों से एक व्यापक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर बातचीत कर रहे हैं।
  • शुल्क, बाजार पहुंच और नियामकीय मानकों जैसे मुद्दों पर मतभेद के कारण वार्ताएँ रुकी हुई थीं।
  • ऑटोमोबाइल टैरिफ में प्रस्तावित कटौती को एक ब्रेकथ्रू माना जा रहा है, जो व्यापक व्यापार समझौते का रास्ता खोल सकती है और नई दिल्ली–ब्रसेल्स के आर्थिक संबंधों को मजबूत करेगी।

कर्तव्य पथ: राजपथ से कर्तव्य-आधारित लोकतंत्र के प्रतीक तक

नई दिल्ली के बीचों-बीच स्थित कर्तव्य पथ, भारत के लोकतांत्रिक विकास का एक मज़बूत प्रतीक है। पहले इसे राजपथ कहा जाता था, यह शानदार सड़क राष्ट्रपति भवन को इंडिया गेट से जोड़ती है और यह भारत की औपनिवेशिक शासन से लेकर कर्तव्य, ज़िम्मेदारी और नागरिकों की भागीदारी पर आधारित लोकतंत्र तक की यात्रा को दिखाती है।

कर्तव्य पथ का ऐतिहासिक विकास

  • कर्तव्य पथ का इतिहास भारत की राजनीतिक यात्रा को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
  • ब्रिटिश शासन के दौरान, इसे एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर ने किंग्स वे (King’s Way) के रूप में डिजाइन किया था, जो साम्राज्यवादी सत्ता का प्रतीक था।
  • यह मार्ग वायसराय हाउस (अब राष्ट्रपति भवन) को इंडिया गेट से जोड़ता था और ब्रिटिश साम्राज्य की भव्यता को प्रदर्शित करता था।
  • 1947 में स्वतंत्रता के बाद, किंग्स वे का नाम बदलकर राजपथ रखा गया और यह गणतंत्र दिवस परेड तथा राष्ट्रीय समारोहों का प्रमुख स्थल बन गया।
  • हालांकि स्वतंत्रता के बाद भी इसमें औपनिवेशिक प्रतीकवाद बना रहा।
  • वर्ष 2022 में इसका नाम बदलकर कर्तव्य पथ रखा गया, जो एक महत्वपूर्ण वैचारिक परिवर्तन का संकेत है।

भारतीय लोकतंत्र में ‘कर्तव्य’ का प्रतीकात्मक महत्व

  • कर्तव्य शब्द भारतीय दर्शन और शासन व्यवस्था में गहराई से निहित है।
  • भारतीय परंपराएँ, विशेष रूप से भगवद्गीता, निस्वार्थ भाव से कर्तव्य पालन पर बल देती हैं।
  • भारतीय संविधान में यह विचार अनुच्छेद 51A के माध्यम से व्यक्त होता है, जिसमें नागरिकों के मूल कर्तव्यों का उल्लेख है।
  • कर्तव्य पथ यह संदेश देता है कि अधिकार तभी सार्थक होते हैं जब उनके साथ जिम्मेदारियाँ भी निभाई जाएँ।
  • यह राष्ट्र निर्माण में राज्य और नागरिकों की साझा जवाबदेही को रेखांकित करता है।
  • राजपथ से कर्तव्य पथ में नाम परिवर्तन शासक-केंद्रित सोच से हटकर नागरिक-केंद्रित लोकतंत्र की ओर बदलाव का प्रतीक है।

कर्तव्य पथ और सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना

  • कर्तव्य पथ, सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना की केंद्रीय धुरी है।
  • इस परियोजना का उद्देश्य नई दिल्ली के प्रशासनिक और औपचारिक क्षेत्र को आधुनिक बनाना है।
  • कर्तव्य पथ राष्ट्रपति भवन से इंडिया गेट तक फैला हुआ है और पूरे क्षेत्र की औपचारिक रीढ़ (ceremonial spine) का कार्य करता है।
  • पुनर्विकास के तहत पुरानी औपनिवेशिक संरचनाओं को हटाकर आधुनिक और सतत (sustainable) सुविधाएँ विकसित की गईं।
  • नागरिकों के लिए चौड़े पैदल मार्ग, हरित लॉन, बैठने की व्यवस्था और जल संरचनाएँ जोड़ी गईं।
  • भूमिगत उपयोगिताएँ (underground utilities) और पर्यावरण-अनुकूल प्रकाश व्यवस्था से सौंदर्य और कार्यक्षमता दोनों में वृद्धि हुई।
  • नया स्वरूप गणतंत्र दिवस परेड जैसे राष्ट्रीय आयोजनों के सुचारु आयोजन में सहायक है।

भारतीय संविधान की अनुसूचियां: अनुच्छेदों के साथ 12 अनुसूचियों की पूरी सूची

भारतीय संविधान एक विस्तृत और गतिशील दस्तावेज़ है, जिसे एक विविधतापूर्ण राष्ट्र का शासन सुचारु रूप से चलाने के लिए बनाया गया है। संविधान की जटिल और विस्तृत व्यवस्थाओं को सरल बनाने के लिए अनुसूचियों (Schedules) का प्रावधान किया गया है। ये अनुसूचियाँ संविधान के साथ संलग्न परिशिष्ट (Annexures) होती हैं, जिनमें प्रशासनिक और विधायी विवरण स्पष्ट रूप से दिए गए हैं। प्रारंभ में संविधान में 8 अनुसूचियाँ थीं, लेकिन समय-समय पर किए गए संवैधानिक संशोधनों के कारण अब इनकी संख्या बढ़कर 12 हो गई है, जो भारत की बदलती शासन आवश्यकताओं को दर्शाती हैं।

भारतीय संविधान की अनुसूचियाँ क्या हैं?

  • अनुसूचियाँ संविधान से जुड़ी सहायक सूचियाँ होती हैं, जिनमें वे विवरण दिए जाते हैं जिन्हें अनुच्छेदों (Articles) में सीधे शामिल नहीं किया गया है।
  • ये प्रदेशों, शक्तियों के विभाजन, वेतन, जनजातीय प्रशासन, चुनाव और शासन संरचना से संबंधित सूचनाओं को सुव्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करती हैं।
  • मुख्य अनुच्छेदों से विस्तृत विवरण को अलग रखकर संविधान को अधिक लचीला और संशोधन योग्य बनाया गया है।

अनुसूचियों का उद्देश्य और महत्व

  • अनुसूचियाँ कानूनी जटिलताओं को सरल बनाती हैं।
  • प्रशासकों, न्यायालयों और विधायकों के लिए तत्काल संदर्भ सामग्री का कार्य करती हैं।
  • सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अनुसूचियाँ संविधान को स्थिरता के साथ-साथ लचीलापन प्रदान करती हैं, क्योंकि इनमें संशोधन करना अपेक्षाकृत आसान होता है।

अनुसूचियों का विकास

26 जनवरी 1950 को जब संविधान लागू हुआ, तब इसमें 8 अनुसूचियाँ थीं। समय के साथ सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक आवश्यकताओं में बदलाव हुआ, जिसके कारण 4 नई अनुसूचियाँ जोड़ी गईं। आज भारतीय संविधान में कुल 12 अनुसूचियाँ हैं।

भारतीय संविधान की 12 अनुसूचियों की सूची

प्रथम अनुसूची – राज्य और केंद्र शासित प्रदेश

इसमें भारत के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सूची तथा उनकी क्षेत्रीय सीमाएँ दी गई हैं। यह अनुच्छेद 1 और 4 से संबंधित है।

द्वितीय अनुसूची – संवैधानिक पदाधिकारियों के वेतन

इस अनुसूची में राष्ट्रपति, राज्यपाल, लोकसभा/विधानसभा अध्यक्ष, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीश तथा नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) के वेतन, भत्ते और विशेषाधिकार दिए गए हैं।

तृतीय अनुसूची – शपथ और प्रतिज्ञान

इसमें मंत्रियों, सांसदों, विधायकों, न्यायाधीशों और CAG द्वारा ली जाने वाली शपथ और प्रतिज्ञान का विवरण है, जिससे संवैधानिक निष्ठा सुनिश्चित होती है।

चतुर्थ अनुसूची – राज्यसभा में प्रतिनिधित्व

इस अनुसूची में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को राज्यसभा में मिलने वाली सीटों का आवंटन जनसंख्या के आधार पर किया गया है।

पंचम अनुसूची – अनुसूचित क्षेत्र और अनुसूचित जनजातियाँ

यह अनुसूची अधिकांश राज्यों में अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातियों के प्रशासन और संरक्षण से संबंधित है।

षष्ठी अनुसूची – उत्तर-पूर्वी राज्यों के जनजातीय क्षेत्र

असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम के जनजातीय क्षेत्रों के लिए विशेष प्रशासनिक व्यवस्था का प्रावधान करती है।

सातवीं अनुसूची – शक्तियों का विभाजन

यह सबसे महत्वपूर्ण अनुसूचियों में से एक है, जिसमें तीन सूचियाँ शामिल हैं:

  • संघ सूची – रक्षा, विदेश नीति
  • राज्य सूची – पुलिस, स्वास्थ्य
  • समवर्ती सूची – शिक्षा, विवाह

आठवीं अनुसूची – राजभाषाएँ

इसमें भारत की 22 मान्यता प्राप्त भाषाएँ शामिल हैं और यह भाषाई विविधता को संरक्षण देती है।

नवम अनुसूची – न्यायिक समीक्षा से संरक्षित कानून

1951 के प्रथम संशोधन द्वारा जोड़ी गई यह अनुसूची कुछ कानूनों को न्यायिक समीक्षा से संरक्षण देती है।

दसवीं अनुसूची – दल-बदल विरोधी कानून

1985 के 52वें संशोधन द्वारा जोड़ी गई यह अनुसूची सांसदों और विधायकों के दल-बदल से संबंधित है।

ग्यारहवीं अनुसूची – पंचायती राज

73वें संशोधन (1992) द्वारा जोड़ी गई इस अनुसूची में ग्रामीण स्थानीय शासन से जुड़े 29 विषय शामिल हैं।

बारहवीं अनुसूची – नगरपालिकाएँ

74वें संशोधन (1992) द्वारा जोड़ी गई इस अनुसूची में शहरी शासन से जुड़े 18 विषय दिए गए हैं।

अनुसूचियों से जुड़े प्रमुख संवैधानिक संशोधन

  • प्रथम संशोधन (1951) – नवम अनुसूची को मजबूत किया
  • सातवाँ संशोधन (1956) – राज्यों का पुनर्गठन
  • 42वाँ संशोधन (1976) – विषयों को समवर्ती सूची में स्थानांतरित किया
  • 52वाँ संशोधन (1985) – दसवीं अनुसूची जोड़ी
  • 73वाँ और 74वाँ संशोधन (1992) – ग्यारहवीं और बारहवीं अनुसूचियाँ जोड़ी गईं

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