जगदीप धनखड़ ने उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दिया

मानसून सत्र के पहले ही दिन उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने 21 जुलाई 2025 की शाम अचानक पद से इस्तीफे की घोषणा कर दी। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को भेजे गए पत्र में धनखड़ ने इस्तीफे के लिए खराब स्वास्थ्य को कारण बताया है। राज्यसभा के पदेन सभापति होने के नाते, उप-राष्ट्रपति की भूमिका संसद के संचालन में अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। उनके इस्तीफ़े से न केवल संवैधानिक रूप से नया उप-राष्ट्रपति चुनने की प्रक्रिया शुरू हुई है, बल्कि राज्यसभा की कार्यप्रणाली में भी अस्थायी बदलाव आया है। यह घटनाक्रम प्रतियोगी परीक्षाओं के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें कई संवैधानिक अनुच्छेद, चुनावी प्रक्रिया और संसदीय नियमों का प्रत्यक्ष उल्लेख है।

उप-राष्ट्रपति का संवैधानिक पद

भारत के उप-राष्ट्रपति का पद देश का दूसरा सर्वोच्च संवैधानिक पद होता है। संविधान के अनुच्छेद 63 से 71 के तहत उप-राष्ट्रपति का चुनाव पांच वर्ष के लिए किया जाता है। वह राज्यसभा के पदेन सभापति भी होते हैं और कार्यपालिका तथा विधायिका के बीच एक महत्त्वपूर्ण सेतु की भूमिका निभाते हैं।

इस्तीफ़ा और अनुच्छेद 67(क)

जगदीप धनखड़ ने अनुच्छेद 67(क) के तहत राष्ट्रपति को अपना इस्तीफ़ा सौंपा, जिसमें यह प्रावधान है कि उप-राष्ट्रपति राष्ट्रपति को लिखित रूप में इस्तीफ़ा दे सकते हैं। उनके इस्तीफ़े के बाद उप-राष्ट्रपति का पद रिक्त हो गया है, और संविधान के अनुसार, 60 दिनों के भीतर नए उप-राष्ट्रपति का चुनाव अनिवार्य है।

अब राज्यसभा की अध्यक्षता कौन करेगा?

अनुच्छेद 91 के अनुसार, उप-राष्ट्रपति का पद रिक्त होने पर राज्यसभा के उपसभापति अस्थायी रूप से सभापति की जिम्मेदारियाँ निभाते हैं। वर्तमान में जनता दल (यू) के सांसद हरिवंश नारायण सिंह राज्यसभा के उपसभापति हैं और मानसून सत्र के दौरान कार्यकारी सभापति के रूप में कार्य करेंगे, जब तक कि नया उप-राष्ट्रपति नहीं चुन लिया जाता।

उप-राष्ट्रपति का चुनाव प्रक्रिया

उप-राष्ट्रपति का चुनाव संविधान के अनुच्छेद 63 से 71 तथा Vice-President (Election) Rules, 1974 के तहत होता है। इस चुनाव में लोकसभा और राज्यसभा के सभी सदस्य (वर्तमान में कुल 788 सांसद) मतदान करते हैं। मतदान गुप्त बैलेट द्वारा एकल संक्रमणीय मत प्रणाली (Single Transferable Vote) से होता है। चुनाव आयोग चुनाव की अधिसूचना जारी करेगा और यह चुनाव 19 सितंबर 2025 से पहले संपन्न कराना आवश्यक है।

योग्यता की शर्तें

संविधान के अनुसार, कोई भी व्यक्ति उप-राष्ट्रपति बनने के लिए पात्र है यदि:

  • वह भारत का नागरिक हो,

  • उसकी आयु कम से कम 35 वर्ष हो,

  • वह राज्यसभा का सदस्य चुने जाने के योग्य हो,

  • वह केंद्र या राज्य सरकार के अधीन कोई लाभ का पद न रखता हो (राष्ट्रपति, राज्यपाल या मंत्री पद अपवाद हैं)।

राजनीतिक और प्रशासनिक महत्व

मानसून सत्र के दौरान उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का इस्तीफ़ा राजनीतिक और संसदीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनके कार्यकाल में विपक्ष के साथ कई बार तीखे टकराव और विवादित टिप्पणियाँ चर्चा में रहीं। उनका यह कदम भाजपा संगठन में संभावित बदलावों जैसे नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव के साथ मेल खा रहा है। अटकलें लगाई जा रही हैं कि अगला उप-राष्ट्रपति कोई वरिष्ठ नेता, पूर्व राज्यपाल या वर्तमान उपसभापति हो सकते हैं।

पृथ्वी पर मंगल ग्रह का सबसे बड़ा टुकड़ा 53 लाख डॉलर में बिका

न्यूयॉर्क में दुर्लभ भूवैज्ञानिक और पुरातात्विक वस्तुओं की एक नीलामी में पृथ्वी पर अब तक पाया गया मंगल ग्रह का सबसे बड़ा टुकड़ा 53 लाख डॉलर में बिक गया। उल्कापिंड की नीलामी का यह एक नया रिकार्ड बनाया है। एनडब्ल्यूए 16788 नामक इस पत्थर की नीलामी में ऑनलाइन और फोन बोलीदाताओं के बीच 15 मिनट तक बोली लगाने की होड़ मची रही। 54 पाउंड (24.5 किलोग्राम) के इस पत्थर की खोज नवंबर 2023 में नाइजर के सहारा रेगिस्तान में एक उल्कापिंड खोजने वाले ने की थी।

पृष्ठभूमि
नवंबर 2023 में नाइजर के अगाडेज़ क्षेत्र (सहारा रेगिस्तान के भीतर स्थित) में एक अनुभवी उल्कापिंड खोजकर्ता द्वारा एक अद्वितीय पत्थर की खोज की गई। स्थानीय लोगों को पहले से ही इसकी विशेषता पर संदेह था, लेकिन इसकी पुष्टि वैज्ञानिक परीक्षणों के बाद हुई। यह पत्थर वास्तव में मंगल ग्रह से आया हुआ उल्कापिंड निकला और यह अब तक पृथ्वी पर पाया गया सबसे बड़ा ज्ञात मंगल ग्रह का टुकड़ा है। माना जाता है कि करोड़ों साल पहले मंगल पर किसी बड़े क्षुद्रग्रह या धूमकेतु के टकराव से यह टुकड़ा अंतरिक्ष में फेंका गया था और अंततः पृथ्वी पर पहुंचा।

वैज्ञानिक महत्त्व
इस उल्कापिंड की वैज्ञानिक महत्ता इसके ग्रह-जनित स्रोत में निहित है। लगभग 50 लाख वर्ष पहले मंगल पर एक विशाल टक्कर ने उसकी सतह के कई टुकड़े अंतरिक्ष में भेज दिए। यह विशेष टुकड़ा लगभग 140 मिलियन मील की दूरी तय करते हुए पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर बच गया और खोजे जाने योग्य क्षेत्र में आ गिरा। इसका संरक्षित रह जाना और पहचाना जाना, मंगल की भूगर्भीय संरचना, खनिजीय संघटन और ब्रह्मांडीय टकरावों के इतिहास के अध्ययन के लिए अमूल्य सिद्ध होता है। यह ग्रहों के विकास और अंतरग्रहीय सामग्री के आदान-प्रदान की संभावना को भी दर्शाता है।

रिकॉर्ड तोड़ नीलामी और सार्वजनिक आकर्षण
सोथेबीज़ द्वारा आयोजित इस उल्कापिंड की नीलामी में केवल 15 मिनट के भीतर ऑनलाइन और फोन बोलीदाताओं के बीच तीव्र प्रतिस्पर्धा देखी गई। यह प्राकृतिक इतिहास और अंतरिक्ष से संबंधित वस्तुओं के प्रति बढ़ती वैश्विक रुचि को दर्शाता है। इस बिक्री ने उल्कापिंडों की अब तक की नीलामी का रिकॉर्ड तोड़ दिया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि वैज्ञानिक महत्व की वस्तुएँ अब अनुसंधान के साथ-साथ कीमती संग्रहणीय संपत्ति भी मानी जा रही हैं। सोथेबीज़ में साइंस डिपार्टमेंट की प्रमुख कैसेंड्रा हैटन ने इसे “एक अद्भुत मंगलग्रहीय उल्कापिंड” कहा, जिसकी यात्रा मंगल की सतह से अफ्रीका के रेगिस्तान और फिर एक अंतरराष्ट्रीय नीलामी घर तक बेहद रोमांचक रही है।

एनएसडीएल पेमेंट्स बैंक को आरबीआई की दूसरी अनुसूची में जोड़ा गया

भारत के बैंकिंग पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक उल्लेखनीय प्रगति में, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने आधिकारिक तौर पर एनएसडीएल पेमेंट्स बैंक लिमिटेड को भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 की दूसरी अनुसूची में शामिल कर लिया है। यह समावेशन, 19 जून, 2025 को अधिसूचित और 10 जुलाई, 2025 को भारत के राजपत्र में प्रकाशित, एनएसडीएल पेमेंट्स बैंक को एक अनुसूचित बैंक का दर्जा प्रदान करता है, जिससे यह आरबीआई की सुविधाओं तक पहुंच प्राप्त कर सकेगा और भारत के विनियमित वित्तीय ढांचे में इसके बढ़ते महत्व को दर्शाएगा।

पृष्ठभूमि: अनुसूचित बैंक क्या होता है?
अनुसूचित बैंक वे बैंक होते हैं जिन्हें भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की द्वितीय अनुसूची (Second Schedule) में सूचीबद्ध किया गया हो। ऐसे बैंकों को पूंजी पर्याप्तता, सुशासन, और जनहित से जुड़े नियमों का पालन करना होता है। इन्हें निम्नलिखित विशेष अधिकार प्राप्त होते हैं:

  • रिज़र्व बैंक से बैंक दर पर ऋण प्राप्त करने की पात्रता

  • तरलता सहायता (liquidity support) का लाभ

  • क्लियरिंग हाउस की सदस्यता

NSDL पेमेंट्स बैंक लिमिटेड के बारे में
NSDL पेमेंट्स बैंक लिमिटेड का मुख्यालय मुंबई के प्रभादेवी स्थित ‘वन इंटरनेशनल सेंटर’ में है, जो आधुनिक वित्तीय सेवाओं का केंद्र है। एक पेमेंट्स बैंक के रूप में यह निम्नलिखित सेवाएं प्रदान करता है:

  • लघु बचत खाता सेवाएं

  • भुगतान और प्रेषण सेवाएं

  • निम्न-आय वर्ग, छोटे व्यवसायों और कम सेवा प्राप्त आबादी को बैंकिंग सुविधाएं प्रदान करना
    इस बैंक को अनुसूचित सूची में शामिल किया जाना इसके वित्तीय सुदृढ़ता, नियामकीय अनुपालन और जनसेवा लक्ष्य की पुष्टि करता है।

द्वितीय अनुसूची में शामिल किए जाने का महत्व
भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा दी गई यह मान्यता NSDL पेमेंट्स बैंक के लिए परिचालनात्मक और प्रतिष्ठागत दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है:

  • अब यह बैंक भी अन्य विनियमित वित्तीय संस्थानों की तरह उच्च विश्वसनीयता के साथ काम कर सकेगा।

  • इसे RBI की पुनर्वित्त (refinancing) सुविधाएं मिलेंगी, जिससे यह अपने भुगतान और ऋण नेटवर्क का विस्तार कर पाएगा।

  • यह संकेत करता है कि RBI को बैंक की बैंकिंग प्रथाओं और वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने की क्षमता पर विश्वास है।

कानूनी आधार
इस सूची में शामिल किया जाना भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 42 की उपधारा (6) के खंड (a) के अंतर्गत अधिकृत है। RBI किसी भी बैंक को निम्नलिखित मानकों के आधार पर अनुसूचित घोषित कर सकता है:

  • पूंजीगत सुदृढ़ता

  • जनहित सेवा की क्षमता

  • संचालन की स्थिरता और वित्तीय सक्षमता
    NSDL पेमेंट्स बैंक का यह समावेश इन आवश्यक नियामकीय मानकों के अनुरूप होने का प्रमाण है।

फिट इंडिया संडे ऑन साइकिल -फिटनेस और नशामुक्त युवा हेतु एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन

‘फ़िट इंडिया साइकिल संडे’ पहल अब केवल एक फिटनेस कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय जन आंदोलन बन चुकी है, जिसका उद्देश्य शारीरिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के साथ-साथ युवाओं में नशामुक्ति और सशक्तिकरण जैसे सामाजिक संदेशों को भी मज़बूती से फैलाना है। युवा मामले और खेल मंत्रालय द्वारा संचालित इस पहल का 32वां संस्करण वाराणसी स्थित बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) परिसर में आयोजित हुआ, जिसमें केंद्रीय मंत्री मनसुख मांडविया समेत 3,000 से अधिक साइकिल चालकों ने भाग लिया। इस अभियान ने शैक्षणिक संस्थानों और स्थानीय निकायों के सहयोग से यह संदेश फैलाया कि “स्वस्थ शरीर से ही स्वस्थ मस्तिष्क बनता है”, जो विकसित भारत की दिशा में सहायक है।

पृष्ठभूमि
‘फ़िट इंडिया साइकिल संडे’ कार्यक्रम, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 2019 में शुरू किए गए ‘फ़िट इंडिया मूवमेंट’ का हिस्सा है। यह एक भागीदारी आधारित आंदोलन है जिसमें नागरिक हर रविवार को साइकिलिंग, योग और खेलों जैसी गतिविधियों में भाग लेकर शारीरिक रूप से सक्रिय रहने के लिए प्रेरित होते हैं। समय के साथ, इस पहल में नशा-उन्मूलन और पर्यावरणीय जागरूकता जैसे आयाम भी जुड़ गए हैं, जिससे यह एक सशक्त जन आंदोलन बन गया है।

महत्व
यह पहल विभिन्न स्तरों पर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है:

  • सार्वजनिक स्वास्थ्य: निष्क्रिय जीवनशैली और बढ़ती गैर-संक्रामक बीमारियों से लड़ने के लिए सक्रिय जीवनशैली को प्रोत्साहित करती है।

  • सामाजिक जागरूकता: ‘नशा मुक्त युवा – विकसित भारत’ जैसे अभियानों के माध्यम से युवाओं में नशे के खिलाफ जागरूकता फैलाती है।

  • युवा सशक्तिकरण: छात्रों और युवाओं के लिए फिटनेस और सामाजिक सकारात्मकता का मंच प्रदान करती है।

  • राष्ट्रीय एकता: 6,000 से अधिक स्थानों पर आयोजित इस कार्यक्रम से देशभर की विविध संस्कृतियां एक उद्देश्य के तहत एकत्रित होती हैं।

उद्देश्य

  • नियमित साइकिलिंग और अन्य शारीरिक गतिविधियों के ज़रिए शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देना।

  • स्कूली छात्रों और युवाओं को सकारात्मक, स्वस्थ गतिविधियों में जोड़ना।

  • नशा-मुक्त जीवनशैली और सामाजिक चेतना को प्रसारित करना।

  • सामूहिक जिम्मेदारी के साथ एक स्वस्थ और विकसित भारत के निर्माण में योगदान देना।

मुख्य विशेषताएं

  • जन भागीदारी: लाखों नागरिक स्कूलों, कॉलेजों और स्थानीय समुदायों से जुड़ते हैं।

  • बहु-गतिविधि ढांचा: साइकिलिंग के साथ-साथ योग, ज़ुम्बा, रस्सी कूद, कैरम और शतरंज जैसे खेल शामिल होते हैं।

  • सेलिब्रिटी प्रोत्साहन: राष्ट्रीय खिलाड़ी जैसे एसो अल्बेन की मौजूदगी से प्रतिभागियों को प्रेरणा मिलती है।

  • संस्थागत सहयोग: सीबीएसई, केवीएस, सीआईएससीई, डीएवी, साई और राहगीरी फाउंडेशन जैसे संगठनों का सहयोग।

  • पर्यावरण-अनुकूल मार्ग: BHU परिसर जैसे शांत और ट्रैफिक-मुक्त रास्तों पर साइकिलिंग, जिससे पर्यावरण जागरूकता को बल मिलता है।

यह अभियान न केवल एक स्वस्थ जीवनशैली का प्रतीक है, बल्कि यह विकसित भारत के निर्माण में समाज को सक्रिय भागीदार भी बनाता है।

भारतीय सैन्य निगरानी बढ़ाने के लिए वैश्विक सैटेलाइट कंपनियों से सहयोग

रणनीतिक सैन्य निगरानी और तत्परता को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से भारत सरकार ने वैश्विक वाणिज्यिक उपग्रह इमेजरी प्रदाताओं से बातचीत शुरू कर दी है। यह कदम मई 2025 में हुए ऑपरेशन “सिंदूर” के दौरान चीन द्वारा पाकिस्तान को लाइव सैटेलाइट डेटा मुहैया कराए जाने की खुफिया रिपोर्टों के बाद उठाया गया है। इस पहल का उद्देश्य भारत की मौजूदा क्षमताओं को उन्नत बनाकर रियल-टाइम, हाई-रिजोल्यूशन इमेजरी को रक्षा संचालन में एकीकृत करना है।

पृष्ठभूमि

वर्तमान में भारतीय सशस्त्र बलों की निगरानी और इमेजिंग जरूरतों को कार्टोसैट और रिसैट जैसे स्वदेशी उपग्रह पूरा करते हैं। ये उपग्रह दुश्मन की गतिविधियों को ट्रैक करने और हमलों के परिणामों की पुष्टि करने में सक्षम हैं, लेकिन इनमें इमेजिंग की आवृत्ति और रिजोल्यूशन की कुछ सीमाएं हैं। हालिया भू-राजनीतिक घटनाओं, विशेषकर चीन द्वारा पाकिस्तान को उपग्रह डेटा उपलब्ध कराने की भूमिका, ने भारत के सैटेलाइट-आधारित निगरानी तंत्र को तत्काल उन्नत करने की आवश्यकता को उजागर किया है।

महत्व

तेज़ गति से बदलते युद्धक्षेत्र की स्थितियों में रियल-टाइम, हाई-रिजोल्यूशन इमेजरी प्राप्त करना अत्यंत आवश्यक होता है। बेहतर दृश्यता से निर्णय लेने की गति, लक्ष्य की सटीकता और सैनिकों की गतिविधियों पर नज़र रखने की क्षमता बढ़ती है। मैक्सार टेक्नोलॉजीज जैसी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों से सहयोग भारत की मौजूदा सीमाओं को पाट सकता है और संभावित संघर्षों में रणनीतिक बढ़त दे सकता है।

उद्देश्य

इस पहल के मुख्य लक्ष्य हैं:

  • वर्तमान क्षमताओं से परे निगरानी कवरेज का विस्तार

  • संघर्ष की स्थिति में समय पर कार्रवाई योग्य खुफिया जानकारी की उपलब्धता सुनिश्चित करना

  • स्वदेशी उपग्रह कार्यक्रमों को वाणिज्यिक रियल-टाइम इमेजरी समाधानों से पूरक बनाना

एसबीएस-III कार्यक्रम की मुख्य विशेषताएँ

  • इस स्पेस बेस्ड सर्विलांस कार्यक्रम के तहत 2029 तक कुल 52 निगरानी उपग्रह प्रक्षेपित किए जाएंगे।

  • प्रारंभिक 21 उपग्रह इसरो द्वारा विकसित और प्रक्षेपित किए जाएंगे।

  • शेष 31 उपग्रह भारतीय निजी कंपनियों द्वारा बनाए जाएंगे।

  • रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी (DSA) इन उपग्रहों का संचालन और निगरानी करेगी।

  • इस कार्यक्रम के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 2024 में $3.2 अरब (लगभग ₹26,500 करोड़) की मंजूरी दी थी।

चुनौतियाँ

  • विदेशी वाणिज्यिक संस्थाओं पर निर्भरता रणनीतिक जोखिम उत्पन्न कर सकती है।

  • वैश्विक कंपनियों के साथ भागीदारी के दौरान डेटा की सुरक्षा और गोपनीयता बनाए रखना अत्यावश्यक है।

  • स्वदेशी प्रणालियों में हर मौसम में संचालन और क्षेत्र पुनरावृत्ति समय जैसी तकनीकी बाधाएं अब भी चुनौती बनी हुई हैं।

यह पहल भारत की सुरक्षा नीति में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन को दर्शाती है, जो तकनीकी सहयोग और स्वदेशी विकास दोनों को संतुलित करने की दिशा में उठाया गया है।

स्वदेशी मलेरिया वैक्सीन का व्यवसायीकरण करेगा ICMR

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) ने जनस्वास्थ्य नवाचार के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए स्वदेशी मलेरिया वैक्सीन ‘AdFalciVax’ के व्यवसायीकरण की प्रक्रिया शुरू की है। इस वैक्सीन का उद्देश्य मानवों में सबसे घातक मलेरिया परजीवी प्लाजमोडियम फेल्सीपेरम से लड़ना है। ICMR ने तकनीक हस्तांतरण और बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए दवा कंपनियों और विनिर्माताओं से साझेदारी हेतु “रुचि की अभिव्यक्ति” (Expression of Interest – EoI) आमंत्रित की है।

वैक्सीन के बारे में: AdFalciVax

  • यह वैक्सीन ICMR-रीजनल मेडिकल रिसर्च सेंटर, भुवनेश्वर (ICMR-RMRCBB) द्वारा विकसित की जा रही है।

  • इसका लक्ष्य प्लाजमोडियम फेल्सीपेरम को निशाना बनाना है, जो गंभीर और घातक मलेरिया का प्रमुख कारण है।

  • यह समुदाय स्तर पर संक्रमण की श्रृंखला को भी तोड़ने में सहायक होगी।

  • यह एक रिकॉम्बिनेंट मल्टी-स्टेज वैक्सीन है, जो परजीवी के जीवनचक्र की विभिन्न अवस्थाओं पर कार्य करती है।

व्यवसायीकरण और तकनीकी हस्तांतरण

  • ICMR ने योग्य कंपनियों से EoI आमंत्रित की है ताकि वे तकनीक हस्तांतरण के जरिए उत्पादन कर सकें।

  • चयनित कंपनियों को विकास के प्रत्येक चरण में ICMR-RMRCBB द्वारा विशेषज्ञ मार्गदर्शन और तकनीकी सहायता प्रदान की जाएगी।

  • इस साझेदारी से वैक्सीन की उपलब्धता में तेजी आएगी और अनुसंधान से व्यावहारिक उपयोग के बीच की दूरी घटेगी।

विकास का समयचक्र

  • वैक्सीन के पूर्ण विकास में कम से कम 7 वर्ष लगने का अनुमान है, जिसे 4 चरणों में विभाजित किया गया है।

  • प्रत्येक चरण में 6 माह का अतिरिक्त समय रखा गया है ताकि किसी भी अप्रत्याशित देरी का समाधान किया जा सके।

महत्व

भारत में मलेरिया, विशेषकर प्लाजमोडियम फेल्सीपेरम, से प्रभावित क्षेत्रों की संख्या अधिक है, खासकर जनजातीय और पिछड़े इलाकों में। एक स्वदेशी रूप से विकसित वैक्सीन से न केवल इसकी उपलब्धता और वहनीयता बढ़ेगी, बल्कि भारत की वैश्विक आपूर्ति पर निर्भरता भी घटेगी। यह भारत के 2030 तक मलेरिया उन्मूलन के लक्ष्य को भी बल प्रदान करेगा।

यूके और मालदीव के दौरे पर जाएंगे PM मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 23 से 26 जुलाई 2025 तक ब्रिटेन और मालदीव के द्विदेशीय दौरे पर जाने वाले हैं। यह यात्रा भारत की सक्रिय और गतिशील विदेश नीति का प्रतीक है। इस दौरे का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के साथ रणनीतिक और आर्थिक साझेदारी को मजबूत करना है, जिससे भारत की वैश्विक प्रभावशीलता बढ़े और क्षेत्रीय एवं वैश्विक सहयोग के प्रति उसकी प्रतिबद्धता सुदृढ़ हो।

पृष्ठभूमि

यह प्रधानमंत्री मोदी की ब्रिटेन की चौथी आधिकारिक यात्रा और मालदीव की तीसरी यात्रा होगी। ब्रिटेन दौरा हाल ही में निर्वाचित प्रधानमंत्री कीयर स्टारमर के आमंत्रण पर हो रहा है, जबकि मालदीव यात्रा वहां के राष्ट्रपति मोहम्‍मद मुईज्‍जू के आमंत्रण पर होगी। यह दौरा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मालदीव की स्वतंत्रता की 60वीं वर्षगांठ के साथ मेल खाता है, जिससे भारत की समुद्री पड़ोसी देशों के प्रति प्रतिबद्धता भी उजागर होती है।

भारत-ब्रिटेन संबंध: महत्व और एजेंडा

प्रधानमंत्री मोदी की यूनाइटेड किंगडम यात्रा का उद्देश्य भारत-ब्रिटेन समग्र रणनीतिक साझेदारी (CSP) को नई गति देना है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीयर स्टारमर के साथ उनकी बातचीत निम्नलिखित प्रमुख क्षेत्रों पर केंद्रित होगी:

  • व्यापार और अर्थव्यवस्था

  • प्रौद्योगिकी और नवाचार

  • रक्षा और सुरक्षा सहयोग

  • जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय कार्रवाई

  • स्वास्थ्य, शिक्षा और सांस्कृतिक संबंध

इसके अतिरिक्त, प्रधानमंत्री मोदी की किंग चार्ल्स तृतीय से भेंट भी प्रस्तावित है, जो उच्च स्तरीय कूटनीतिक संबंधों की गहराई को दर्शाता है।

भारत-मालदीव संबंध: रणनीतिक सहयोग

मालदीव में प्रधानमंत्री मोदी की राजकीय यात्रा भारत की “पड़ोसी प्रथम” नीति और “विजन महासागर” के अंतर्गत समुद्री रणनीतिक दृष्टिकोण को बल देती है। यह राष्ट्रपति मोहम्‍मद मुईज्‍जू के कार्यभार संभालने के बाद किसी विदेशी सरकार प्रमुख की पहली आधिकारिक यात्रा होगी। इस दौरे के दौरान निम्नलिखित मुद्दों पर विशेष ध्यान रहेगा:

  • भारत-मालदीव समग्र आर्थिक और समुद्री सुरक्षा साझेदारी की समीक्षा

  • द्विपक्षीय सुरक्षा सहयोग को सुदृढ़ करना

  • बुनियादी ढांचे, पर्यटन और ब्लू इकोनॉमी में सहयोग

प्रधानमंत्री मोदी 26 जुलाई को मालदीव की स्वतंत्रता की 60वीं वर्षगांठ समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में भी भाग लेंगे, जो दोनों देशों के घनिष्ठ संबंधों का प्रतीक है।

उद्देश्य और सामरिक महत्व

इस दो-राष्ट्र यात्रा का उद्देश्य है:

  • द्विपक्षीय और बहुपक्षीय संबंधों को प्रगाढ़ बनाना
  • आर्थिक, तकनीकी और सुरक्षा सहयोग को मज़बूत करना
  • क्षेत्रीय स्थिरता और सामरिक समुद्री उपस्थिति को बढ़ावा देना
  • दक्षिण एशिया और यूरोप दोनों में भारत की वैश्विक भूमिका को मज़बूत करना

संयुक्त राष्ट्र में भारत की नई मतदान नीति: ऐतिहासिक स्तर पर पहुँची मतदान से दूरी

संयुक्त राष्ट्र (UN) में भारत की मतदान प्रवृत्ति में हाल के वर्षों में उल्लेखनीय परिवर्तन देखने को मिला है। विशेष रूप से 2025 में मतदान से दूरी ऐतिहासिक उच्च स्तर पर पहुंच गई, जो भारत की विदेश नीति में एक नए चरण की शुरुआत को दर्शाता है। यह बदलाव एक ध्रुवीकृत वैश्विक व्यवस्था के प्रति भारत की रणनीतिक प्रतिक्रिया है, जिसमें वह अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए एक अधिक मुखर और संतुलित वैश्विक शक्ति के रूप में उभरने का प्रयास कर रहा है।

भारत की UN मतदान प्रवृत्ति का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य:

भारत ने 1946 से अब तक 5,500 से अधिक UN प्रस्तावों पर मतदान किया है, जिनमें समय के साथ उसका रुख काफी बदला है:

  • 1946–1960 के दशक के अंत तक: अत्यधिक अस्थिर मतदान पैटर्न; ‘हाँ’ (Yes) मत 20% से 100% तक के बीच रहे, जबकि मतदान से दूरी में भारी उतार-चढ़ाव देखा गया।

  • 1970–1994: अधिक स्थिरता के संकेत; ‘हाँ’ मत 74%–96% तक और मतदान से दूरी 8%–19% के बीच रही।

  • 1995–2019: एक परिपक्व और स्थिर चरण; ‘हाँ’ मत 75%–83%, जबकि Abstentions 10%–17% के दायरे में रहे।

  • 2019 के बाद: नया मोड़; 2025 तक ‘हाँ’ मत घटकर 56% रह गया, जबकि मतदान से दूरी बढ़कर 44% हो गई — 1955 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर।

यह प्रवृत्ति भारत के एक गुटनिरपेक्ष पर्यवेक्षक से रणनीतिक रूप से स्वायत्त अभिनेता बनने की दिशा में संक्रमण को दर्शाती है, जो अपने हितों को प्राथमिकता देते हुए वैश्विक मंच पर अधिक परिपक्व और सुसंगत नीति अपना रहा है।

रणनीतिक मतदान से दूर की ओर भारत के रुझान के पीछे के कारण

1. ध्रुवीकृत वैश्विक व्यवस्था

आज की वैश्विक व्यवस्था में प्रमुख शक्तियों—जैसे अमेरिका, चीन और रूस—के बीच गहरी विभाजक रेखाएं उभर चुकी हैं, जिससे संयुक्त राष्ट्र में आम सहमति बनाना कठिन हो गया है। भारत किसी एक खेमे में शामिल होने के बजाय तटस्थ रहने को प्राथमिकता देता है, जिससे उसकी स्वतंत्र विदेश नीति की छवि बनी रहती है।

2. प्रस्तावों की जटिलता

आधुनिक UN प्रस्ताव अक्सर बहुआयामी और विरोधाभासी होते हैं, जिन्हें राजनयिक कभी-कभी “क्रिसमस ट्री प्रस्ताव” (Christmas trees) कहते हैं — यानी जिनमें हर किसी के लिए कुछ न कुछ जोड़ा गया होता है। ऐसे प्रस्तावों पर मतदान से दूरी अपनाकर भारत विवादास्पद या अस्पष्ट प्रावधानों का समर्थन या विरोध करने से बचता है।

3. संप्रभुता की मुखर अभिव्यक्ति

आज के दौर में मतदान से दूरी को निर्णयहीनता नहीं, बल्कि भारत के संप्रभु राजनयिक विवेक का प्रतीक माना जाता है। इससे भारत अपनी रणनीतिक लचीलापन बनाए रखते हुए द्विपक्षीय हितों की रक्षा कर सकता है, बिना किसी प्रमुख सहयोगी देश को नाराज़ किए।

भारत के मतदान से दूरी की रणनीतिक महत्वता

  • स्वतंत्रता का संकेत: मतदान से दूरी भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और आधुनिक संदर्भ में गुटनिरपेक्षता के सिद्धांतों के साथ उसकी निरंतरता को दर्शाती है।

  • राजनयिक संतुलन साधना: भारत संवेदनशील वैश्विक मुद्दों जैसे रूस-यूक्रेन संघर्ष, म्यांमार संकट या इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद पर पक्ष लेने से बचता है, जिससे संतुलन बनाए रखता है।

  • वैश्विक छवि पर जोखिम: हालांकि यह रणनीति भारत को लचीलापन देती है, लेकिन कुछ सहयोगी देशों द्वारा इसे मानवाधिकारों या सुरक्षा मामलों पर प्रतिबद्धता की कमी के रूप में भी देखा जा सकता है।

इस तरह, भारत की नई मतदान रणनीति एक परिपक्व, संतुलित और स्वायत्त विदेश नीति की ओर उसके संक्रमण को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।

प्रकरण अध्ययन और व्यावहारिक प्रभाव

हालांकि विश्लेषण में किसी विशेष प्रस्ताव का नाम नहीं लिया गया है, भारत की मतदान से दूरी (abstention) की रणनीति कुछ प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विशेष रूप से देखने को मिली है—

  • रूस-यूक्रेन युद्ध से जुड़े प्रस्तावों में

  • म्यांमार और चीन में मानवाधिकार उल्लंघन पर प्रस्तावों में

  • इज़राइल-फिलिस्तीन संघर्ष से संबंधित बहसों में

इन सभी मामलों में भारत ने मतदान से दूरी अपनाकर अपने प्रमुख रणनीतिक साझेदारों के साथ संबंध बनाए रखे, जबकि साथ ही साथ कुछ मुद्दों पर अपनी चिंताओं का संकेत भी दिया। यह संतुलन भारत के दीर्घकालिक कूटनीतिक हितों के अनुरूप है।

भविष्य की दिशा

भारत की यह “रणनीतिक दूरी” की नीति निकट भविष्य में भी जारी रहने की संभावना है, विशेष रूप से तब तक जब तक भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की स्थायी सदस्यता के लिए प्रयासरत है और एक मध्यम शक्ति (Middle Power) के रूप में अपनी भूमिका को मजबूत कर रहा है।

यह दृष्टिकोण भारत को वैश्विक संबंधों में एक संतुलनकारी शक्ति के रूप में स्थापित करता है — जो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सक्रिय रूप से भागीदारी करता है, लेकिन बिना किसी पक्षपात या संप्रभु हितों से समझौता किए।

भारत का पर्यटन क्षेत्र और विज़न 2047 : $32 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था की ओर

भारत सरकार ने 2047 तक पर्यटन क्षेत्र के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में योगदान को 10% तक बढ़ाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। यह लक्ष्य भारत को $32 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था में बदलने की व्यापक योजना का हिस्सा है। सांस्कृतिक विरासत, प्राकृतिक विविधता और आध्यात्मिक संपदा से समृद्ध भारत का पर्यटन क्षेत्र आर्थिक विकास, रोजगार सृजन और वैश्विक प्रभाव का एक प्रमुख इंजन बन सकता है — बशर्ते ढांचागत और रणनीतिक चुनौतियों का समाधान किया जाए।

पृष्ठभूमि
वर्तमान में पर्यटन भारत की GDP में लगभग 5–6% का योगदान देता है। 2023 के आंकड़ों के अनुसार, भारत वैश्विक पर्यटन आय में 14वें स्थान पर है और विश्व स्तर पर 1.8% राजस्व का हिस्सा रखता है। इस क्षेत्र में 24% की संयोजित वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) का अनुमान है। सरकार अब 2047 तक इस हिस्सेदारी को दोगुना करने के लिए सतत और समावेशी विकास पर ध्यान केंद्रित कर रही है।

महत्व
पर्यटन एक श्रम-प्रधान उद्योग है, जो ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर रोजगार उत्पन्न करने की क्षमता रखता है। यह विदेशी मुद्रा अर्जन, बुनियादी ढांचे के विकास और सांस्कृतिक कूटनीति को भी मजबूत करता है। भारत की आध्यात्मिक, पारिस्थितिक और ऐतिहासिक विविधता उसे वैश्विक यात्रा रुझानों — जैसे मेडिकल टूरिज्म, साहसिक पर्यटन और ईको-टूरिज्म — में अग्रणी भूमिका निभाने का अवसर देती है।

भारत में पर्यटन के प्रकार

  • आध्यात्मिक पर्यटन: मंदिर, तीर्थ स्थल और धार्मिक सर्किट लाखों यात्रियों को आकर्षित करते हैं।

  • साहसिक पर्यटन: लद्दाख, सिक्किम और हिमालय की ट्रेकिंग लोकप्रिय है।

  • समुद्र तटीय पर्यटन: गोवा, केरल और अंडमान-निकोबार जैसे स्थल मुख्य आकर्षण हैं।

  • सांस्कृतिक पर्यटन: पुष्कर मेला, ताज महोत्सव जैसी परंपराएं विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करती हैं।

  • वन्यजीव पर्यटन: जिम कॉर्बेट और काजीरंगा जैसे नेशनल पार्क पर्यावरण प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र हैं।

  • चिकित्सा पर्यटन: “हील इन इंडिया” पहल के तहत भारत कम लागत में उच्च गुणवत्ता वाली चिकित्सा सेवा प्रदान करता है।

मुख्य चुनौतियाँ

  • बुनियादी ढांचे की कमी: कई प्रमुख स्थलों पर परिवहन और सुविधाओं का अभाव।

  • पर्यावरणीय क्षरण: अनियंत्रित पर्यटन से पारिस्थितिकी तंत्र पर दुष्प्रभाव।

  • मानकीकरण की कमी: सेवाओं की गुणवत्ता में असंगति।

  • मौसमी निर्भरता: पर्यटन में मौसम के अनुसार उतार-चढ़ाव।

  • प्रचार की कमी: कम प्रसिद्ध स्थलों का पर्याप्त विपणन नहीं होता।

  • संस्कृति-संवेदनशीलता: विरासत संरक्षण और पर्यटन के बीच संतुलन की आवश्यकता।

सरकारी पहलें

  • 50 डेस्टिनेशन चैलेंज मोड (2025 बजट): प्रमुख स्थलों पर बुनियादी ढांचे और कनेक्टिविटी को बेहतर बनाना।

  • स्वदेश दर्शन योजना: थीम-आधारित सर्किट का विकास विश्व स्तरीय सुविधाओं के साथ।

  • प्रसाद योजना: तीर्थ और विरासत स्थलों पर अवसंरचना सुधार।

  • मेडिकल टूरिज्म को बढ़ावा: सार्वजनिक-निजी भागीदारी और चिकित्सा यात्रियों के लिए वीज़ा प्रक्रिया में ढील।

  • अतिथि देवो भव: आतिथ्य उद्योग के कर्मचारियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम।

  • वीज़ा सुधार: ई-वीज़ा और शुल्क माफी जैसे उपाय।

  • सतत पर्यटन समर्थन: ईको-टूरिज्म, ज़िम्मेदार यात्रा और ग्रीन सर्टिफिकेशन को बढ़ावा।

  • रोजगार उपाय (2025–26): होमस्टे के लिए मुद्रा ऋण, राज्यों को प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन, और वीज़ा प्रणाली का सरलीकरण।

यह रणनीति भारत को न केवल एक वैश्विक पर्यटन हब बना सकती है, बल्कि इसके माध्यम से आत्मनिर्भर भारत और विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम भी सिद्ध हो सकती है।

नेट-जीरो बैंकिंग एलायंस से हटने पर HSBC को आलोचना का सामना

जुलाई 2025 में, दुनिया के सबसे बड़े बैंकिंग संस्थानों में से एक, एचएसबीसी ने नेट-जीरो बैंकिंग अलायंस (एनजेडबीए) से हटने पर जलवायु के प्रति जागरूक ग्राहकों और हितधारकों की कड़ी आलोचना की, जो कि दुनिया का सबसे बड़ा उद्योग समूह है जो बैंकिंग प्रथाओं को जलवायु लक्ष्यों के साथ संरेखित करने के लिए प्रतिबद्ध है। यह एलायंस वैश्विक जलवायु लक्ष्यों के अनुरूप बैंकिंग प्रथाओं को संरेखित करने के लिए समर्पित सबसे बड़ा उद्योग समूह है। HSBC ऐसा करने वाला पहला प्रमुख ब्रिटिश बैंक बन गया, जिससे यह संकेत मिला कि वित्तीय क्षेत्र की नेट-ज़ीरो उत्सर्जन लक्ष्य को लेकर प्रतिबद्धता कमजोर पड़ रही है। इस फैसले के बाद कई ग्राहकों, विशेषकर हरित ऊर्जा कंपनियों ने HSBC से अपने संबंध तोड़ दिए और इसके पर्यावरणीय दावों पर विश्वास नहीं होने का हवाला दिया।

पृष्ठभूमि: नेट-ज़ीरो बैंकिंग एलायंस (NZBA) क्या है?
अप्रैल 2021 में शुरू हुआ नेट-ज़ीरो बैंकिंग एलायंस (NZBA) संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम वित्त पहल (UNEP FI) द्वारा संचालित बैंकों का एक वैश्विक गठबंधन है। इसके सदस्य पेरिस समझौते के अनुरूप 2050 तक अपने ऋण और निवेश पोर्टफोलियो को नेट-ज़ीरो उत्सर्जन के साथ संरेखित करने का संकल्प लेते हैं। इसमें शामिल बैंकों को हर पाँच साल में अंतरिम लक्ष्य तय करने और प्रगति की पारदर्शी रिपोर्टिंग करने की आवश्यकता होती है। इस गठबंधन का उद्देश्य बैंकिंग क्षेत्र को जलवायु-लचीला और सतत वित्तपोषण के मार्ग पर लाना है।

HSBC की वापसी और उसके पीछे का कारण
HSBC की NZBA से वापसी उसके चीफ सस्टेनेबिलिटी ऑफिसर जूलियन वेंटज़ेल के उस बयान के बाद हुई, जिसमें उन्होंने कहा कि कार्बन-गहन उद्योगों के प्रति बढ़ते पूर्वाग्रह के कारण यह गठबंधन संतुलन खो रहा है। बैंक का तर्क है कि पारंपरिक ऊर्जा क्षेत्रों को समर्थन देना ऊर्जा संक्रमण की अवधि में आर्थिक स्थिरता के लिए आवश्यक है। हालांकि, इस कदम से HSBC की नैतिक प्रतिबद्धता और प्रतिष्ठा पर सवाल उठे हैं, खासकर जब उसने पूर्व में सार्वजनिक रूप से जलवायु परिवर्तन के खिलाफ ठोस कार्रवाई के वादे किए थे।

ग्राहकों की नाराज़गी और सार्वजनिक प्रतिक्रिया
प्रमुख हरित व्यवसाय नेताओं ने HSBC के फैसले पर तीव्र प्रतिक्रिया दी। नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र की अग्रणी कंपनी Ecotricity, जिसका सालाना हरित कारोबार £600 मिलियन है, ने HSBC से सार्वजनिक रूप से संबंध तोड़ लिए। कंपनी के संस्थापक डेल विंस ने यह घोषणा की कि वे अब Lloyds Banking Group के साथ काम करेंगे। उन्होंने कहा कि ग्राहक अब जागरूक हो चुके हैं और नैतिक बैंकिंग विकल्पों का महत्व तेजी से बढ़ रहा है। विंस के बयान ने इस बात पर जोर दिया कि अब जलवायु मुद्दों पर वित्तीय जवाबदेही की मांग को लेकर आम लोगों और कंपनियों से जमीनी स्तर पर दबाव तेजी से बढ़ रहा है। व्यक्तियों और संस्थानों दोनों की ओर से यह मांग उठ रही है कि बैंक और वित्तीय संस्थाएं अपने पर्यावरणीय वादों के प्रति पारदर्शी और जिम्मेदार बनें।

बैंकिंग और जलवायु वित्त पर प्रभाव
HSBC का यह कदम अन्य वित्तीय संस्थानों को भी अपने पर्यावरणीय जुड़ावों पर पुनर्विचार के लिए प्रेरित कर सकता है, या फिर यह निर्णय HSBC को वैश्विक जलवायु निगरानी के बीच अलग-थलग भी कर सकता है। यह निर्णय एक बार फिर जलवायु आदर्शवाद और व्यवहारिक वित्त के बीच बहस को जन्म देता है—जहाँ बैंक उत्सर्जन में कटौती के लक्ष्यों और पारंपरिक जीवाश्म ईंधन में निवेश के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करते हैं। अब नियामक संस्थाएं, निवेशक और ग्राहक बैंकों को जलवायु पारदर्शिता, सततता मानदंड और सामाजिक ज़िम्मेदारी के आधार पर और भी बारीकी से आंक सकते हैं।

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