7 साल बाद फिर शुरू होगा लिपुलेख दर्रा व्यापार, भारत-चीन के रिश्तों में नई पहल

भारत जून 2026 से लिपुलेख दर्रा (Lipulekh Pass) के माध्यम से चीन के साथ सीमा व्यापार फिर से शुरू करने जा रहा है। यह कदम 2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान लगाए गए सात साल के प्रतिबंध को समाप्त करेगा। यह निर्णय विभिन्न मंत्रालयों की मंजूरी और महत्वपूर्ण कूटनीतिक वार्ताओं के बाद लिया गया है। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित यह ऐतिहासिक व्यापार मार्ग लंबे समय से स्थानीय लोगों की आजीविका का आधार रहा है, और इसके दोबारा खुलने से व्यापारियों को आर्थिक राहत मिलने की उम्मीद है।

भारत-चीन लिपुलेख पास व्यापार बहाली 2026

  • लिपुलेख दर्रा के पुनः खुलने से भारत और चीन के बीच एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक और आर्थिक कदम माना जा रहा है। यह व्यापार सामान्यतः जून से सितंबर तक चलता है और परिस्थितियों के अनुसार आगे बढ़ाया जा सकता है।
  • यह निर्णय दोनों देशों के अधिकारियों के बीच उच्चस्तरीय वार्ताओं के बाद लिया गया, जिसमें 2020 से बंद हिमालयी व्यापार मार्गों को फिर से खोलने पर सहमति बनी।

भारत के लिए लिपुलेख व्यापार का महत्व

  • यह व्यापार केवल वस्तुओं के आदान-प्रदान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्थानीय अर्थव्यवस्था और क्षेत्रीय संपर्क को मजबूत करने में भी अहम भूमिका निभाता है।
  • सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए यह आय का प्रमुख स्रोत है और यह दोनों देशों के बीच पारंपरिक संबंधों को भी बनाए रखता है।

मुख्य लाभ:

  • स्थानीय व्यापारियों और व्यवसायों को बढ़ावा
  • पारंपरिक हिमालयी व्यापार मार्गों का पुनर्जीवन
  • भारत-चीन आर्थिक संबंधों को मजबूती
  • सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास को समर्थन

निर्णय के पीछे कूटनीतिक वार्ता

यह निर्णय अजीत डोभाल और वांग यी के बीच अगस्त 2025 में हुई वार्ता के बाद लिया गया। दोनों पक्षों ने कई व्यापार मार्गों को फिर से खोलने पर सहमति जताई, जिनमें शामिल हैं:

  • लिपुलेख पास (उत्तराखंड)
  • शिपकी ला (हिमाचल प्रदेश)
  • नाथू ला (सिक्किम)

उत्तराखंड में तैयारियां

पिथौरागढ़ जिले में स्थानीय प्रशासन ने व्यापार को सुचारु रूप से शुरू करने के लिए तैयारियां शुरू कर दी हैं।

की जा रही व्यवस्थाएं:

  • व्यापारियों के लिए ट्रांजिट कैंप की स्थापना
  • बैंकिंग और मुद्रा विनिमय सेवाएं
  • चिकित्सा सुविधाएं
  • सुरक्षित संचार प्रणाली

स्थानीय व्यापारियों के लिए राहत

2020 से व्यापार बंद होने के कारण स्थानीय व्यापारियों को भारी आर्थिक नुकसान हुआ था और कई परिवारों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

अब इस मार्ग के फिर से खुलने से स्थानीय समुदायों में नई उम्मीद जगी है। यह कदम आय के स्रोतों को बहाल करने और सीमावर्ती गांवों में आर्थिक गतिविधियों को पुनर्जीवित करने में सहायक होगा।

हिमालय में तेजी से पिघलती बर्फ: क्या गंगा-ब्रह्मपुत्र पर मंडरा रहा है संकट?

हिमालय अब खतरे में है। हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रही है। पहले ये धीरे-धीरे बपिघल रहे थे लेकिन अब ये दोगुनी रफ्तार से पिघल रहे हैं। ध्रुवीय क्षेत्रों के बाद हिमालय विश्व का तीसरा सबसे बड़ा बर्फ का भंडार है, जिसे ‘तीसरा ध्रुव’ भी कहा जाता है। सवाल बड़ा है यदि यही हाल रहा तो क्या गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी जीवनदायिनी नदियां भी सूख जाएंगी? क्या यह किसी आने वाले संकट का संकेत है? हालिया रिपोर्ट चेतावनी देती है।

यह केवल बर्फ नहीं पिघल रही। यह आने वाले जल संकट की नींव है। करोड़ों लोगों की जिंदगी इससे जुड़ी है। खेती, पानी, अर्थव्यवस्था सब दांव पर है। यह कोई दूर की बात नहीं। यह अभी हो रहा है। और तेजी से हो रहा है।

ग्लेशियर क्षेत्र का करीब 12% हिस्सा खत्म

रिपोर्ट के मुताबिक, हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियर पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा तेजी से सिकुड़ रहे हैं। 1990 से 2020 के बीच ग्लेशियर क्षेत्र का करीब 12 प्रतिशत हिस्सा खत्म हो चुका है। बर्फ का भंडार भी 9 प्रतिशत कम हो गया है। चिंता की बात यह है कि 21वीं सदी में बर्फ पिघलने की रफ्तार 20वीं सदी के मुकाबले लगभग दोगुनी हो गई है। खासकर 2010 के बाद यह गिरावट और तेज हो गई है। छोटे ग्लेशियर सबसे ज्यादा प्रभावित हैं. कई तो पूरी तरह गायब होने की कगार पर हैं।

बेसिन में ग्लेशियरों का सबसे ज्यादा नुकसान

रिपोर्ट बताती है कि गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन में ग्लेशियरों का सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। पिछले तीन दशकों में इन इलाकों में क्रमशः लगभग 21 प्रतिशत और 16 प्रतिशत तक ग्लेशियर क्षेत्र घटा है। ये वही नदियां हैं जिन पर भारत समेत कई देशों की बड़ी आबादी निर्भर है। यदि ग्लेशियर सिकुड़ते रहे, तो इन नदियों का जलस्तर भी प्रभावित होगा. खासकर सूखे मौसम में पानी की उपलब्धता घट सकती है।

हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में ज्यादा ग्लेशियर

हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में करीब 63,000 से ज्यादा ग्लेशियर हैं। ये ग्लेशियर सिर्फ बर्फ के पहाड़ नहीं हैं। ये प्राकृतिक जल भंडार हैं। गर्मियों में यही बर्फ पिघलकर नदियों को पानी देती है। लेकिन अब यह संतुलन बिगड़ रहा है। तापमान बढ़ रहा है। बारिश का पैटर्न बदल रहा है। 5500 मीटर से नीचे के ग्लेशियर सबसे ज्यादा तेजी से पिघल रहे हैं। वहीं, दक्षिण और पूर्व की ओर मुख वाले ग्लेशियर ज्यादा तेजी से खत्म हो रहे हैं क्योंकि उन्हें अधिक धूप मिलती है।

 

इजरायल के डिमोना को क्यों माना जाता था सबसे सुरक्षित शहर

ईरान और इजरायल के बढ़ते संघर्ष के दौरान 21 मार्च 2026 को एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है। दरअसल ईरानी मिसाइलों ने डिमोना और अराद शहरों पर हमला किया। इस हमले में 100 से ज्यादा लोगों के घायल होने की खबर है, जिसमें डिमोना को शुरुआती हमले का सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा। इस घटना को चौंकाने वाली बनाती है वह यह है कि डिमोना को लंबे समय से इजरायल के सबसे सुरक्षित शहरों में से एक माना जाता रहा है। आइए जानते हैं क्या है इसके पीछे की वजह।

बहुस्तरीय हवाई रक्षा प्रणाली

डिमोना को इतना सुरक्षित इसकी एडवांस्ड और बहुस्तरीय हवाई रक्षा प्रणाली बनाती है। आने वाले खतरों को रोकने के लिए आयरन डोम और पैट्रियट मिसाइल प्रणाली जैसे सिस्टम तैनात किए गए थे। यह सिस्टम मिसाइलों का पता लगाने, उन पर नजर रखने और हवा में ही नष्ट करने के लिए डिजाइन किए गए हैं। इससे डिमोना जैसे जरूरी क्षेत्रों के ऊपर एक सुरक्षा कवच बन जाता है।

देश के सबसे ज्यादा सुरक्षित स्थानों में से एक

डिमोना का महत्व वहां मौजूद शिमोन पेरेस नेगेव परमाणु अनुसंधान केंद्र की वजह से है। यह इजरायल की सबसे गुप्त और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सुविधाओं में से एक है। ऐसा माना जाता है कि यह सुविधा इजरायल के परमाणु कार्यक्रम का मुख्य केंद्र है। इससे यह देश के सबसे ज्यादा सुरक्षित स्थानों में से एक बन जाता है।

शहर के ऊपर नो-फ्लाइट जोन घोषित

डिमोना के ऊपर का हवाई क्षेत्र दुनिया के सबसे ज्यादा प्रतिबंधित क्षेत्रों में से एक है। इसे एक सख्त नो-फ्लाइट जोन घोषित किया गया है। इसका मतलब है कोई भी अनाधिकृत विमान चाहे वह नागरिक हो या फिर सैन्य, इसमें प्रवेश नहीं कर सकता।

आसपास होने वाले नुकसान सीमित

डिमोना नेगेव रेगिस्तान के काफी अंदर तक बसा है। यह बड़े आबादी वाले केंद्रों से काफी दूर है। इस भौगोलिक एकांत ने इसे दुश्मनों के लिए एक कठिन लक्ष्य बना दिया है। यह दूरी अचानक होने वाले हमलों की संभावना को कम करती है। इससे आसपास होने वाले नुकसान सीमित हो जाते हैं।

परमाणु सुविधा के लिए जरूरी हिस्से

इन सबके अलावा परमाणु सुविधा के लिए जरूरी हिस्से भूमिगत बनाए गए हैं और कंक्रीट व स्टील की मोटी परतों से इन्हें सुरक्षा दी गई है। यह संरचनाएं खास तौर से भारी बमबारी का सामना करने के लिए डिजाइन की गई हैं। इससे इन्हें नष्ट करना और भी मुश्किल हो जाता है।

 

INS Taragiri: भारतीय नौसेना की नई स्टील्थ ताकत, जानें इसकी विशेषताएँ

भारतीय नौसेना 3 अप्रैल 2026 को विशाखापत्तनम में आईएनएस तारागिरी को कमीशन करने जा रही है। यह भारत की समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह नई स्टील्थ फ्रिगेट Project 17A के तहत बनाई गई है, जो भारत की रक्षा क्षमता और आत्मनिर्भरता को दर्शाती है। इस समारोह में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के शामिल होने की संभावना है।

INS तारागिरी: मुख्य विवरण और प्रोजेक्ट 17A

INS तारागिरी, प्रोजेक्ट 17A के तहत बनने वाली चौथी स्टील्थ फ्रिगेट है, जिसका उद्देश्य आधुनिक और उन्नत युद्धपोत तैयार करना है। इसका निर्माण मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL), मुंबई द्वारा किया गया है, जो भारत की शिपबिल्डिंग क्षमता को दर्शाता है।

इस युद्धपोत का विस्थापन लगभग 6,670 टन है, जो इसे भारतीय नौसेना के लिए एक शक्तिशाली संपत्ति बनाता है।

उन्नत स्टील्थ तकनीक

INS तारागिरी की सबसे बड़ी विशेषता इसकी उन्नत स्टील्थ तकनीक है, जो इसे दुश्मन के रडार से छिपाने में मदद करती है। इसका आधुनिक डिजाइन और कम रडार क्रॉस-सेक्शन इसे पहचानना और निशाना बनाना कठिन बनाते हैं। यह आधुनिक युद्ध में इसकी प्रभावशीलता को बढ़ाता है।

हथियार और युद्ध क्षमता

यह फ्रिगेट अत्याधुनिक हथियार प्रणालियों से लैस है, जो इसे हवा, सतह और पानी के नीचे से आने वाले खतरों से निपटने में सक्षम बनाती हैं।

मुख्य हथियार प्रणाली:

  • सुपरसोनिक सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइलें
  • मध्यम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें
  • उन्नत पनडुब्बी रोधी (Anti-Submarine) प्रणाली

इन सभी को एक आधुनिक कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम के माध्यम से एकीकृत किया गया है।

इंजन, गति और संचालन क्षमता

इसमें संयुक्त डीज़ल या गैस (CODOG) प्रोपल्शन सिस्टम का उपयोग किया गया है, जो गति और ईंधन दक्षता दोनों प्रदान करता है। यह प्रणाली जहाज को उच्च गति के साथ-साथ लंबी दूरी के मिशनों में भी कुशल बनाती है।

मेक इन इंडिया को बढ़ावा

INS तारागिरी मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत पहल को मजबूती देती है। इसमें 75% से अधिक स्वदेशी घटकों का उपयोग किया गया है और 200 से अधिक MSMEs ने इसमें योगदान दिया है।

यह परियोजना न केवल भारत की रक्षा क्षमता को मजबूत करती है, बल्कि देश के औद्योगिक और आर्थिक विकास को भी बढ़ावा देती है।

PRARAMBH 2026 क्या है? जानिए यह करदाताओं पर कैसे डालेगा असर

भारत सरकार ने PRARAMBH 2026 नामक एक राष्ट्रीय जागरूकता अभियान शुरू किया है, जिसका उद्देश्य नागरिकों को Income Tax Act, 2025 के बारे में जानकारी देना है। यह अधिनियम 01 अप्रैल 2026 से लागू होगा। इस पहल का मकसद नए कर प्रणाली में सुचारु परिवर्तन सुनिश्चित करना, जानकारी को सरल बनाना और लोगों की समझ को बढ़ाना है। इस अभियान का नेतृत्व वित्त मंत्रालय द्वारा किया जा रहा है।

PRARAMBH 2026 का उद्देश्य और दृष्टि

PRARAMBH का पूरा नाम मिशन विकसित भारत के लिए नीतिगत सुधार और ज़िम्मेदार कार्रवाई (Policy Reform and Responsible Action for Mission Viksit Bharat) है। यह सरकार के दीर्घकालिक आर्थिक विकास और सुशासन के दृष्टिकोण को दर्शाता है।

इसका मुख्य उद्देश्य करदाताओं में जागरूकता बढ़ाना और स्वैच्छिक अनुपालन (voluntary compliance) को प्रोत्साहित करना है। सरल और सुलभ जानकारी के माध्यम से यह अभियान भ्रम को कम करने, विश्वास बढ़ाने और कर प्रणाली में भागीदारी को मजबूत करने का प्रयास करता है।

Income Tax Act 2025: बड़ा बदलाव

आयकर अधिनियम, 2025 (Income Tax Act, 2025) भारत की कर प्रणाली में एक बड़ा सुधार है, जो 1 अप्रैल 2026 से लागू होगा। इसका उद्देश्य कर प्रक्रियाओं को सरल बनाना, पारदर्शिता बढ़ाना और अनुपालन को बेहतर करना है।

PRARAMBH 2026 इस बदलाव के लिए करदाताओं को तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, ताकि व्यक्ति और व्यवसाय नए नियमों को आसानी से समझ सकें और अपनाने में कोई कठिनाई न हो।

मल्टी-चैनल आउटरीच रणनीति

यह अभियान देशभर में अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचने के लिए पारंपरिक और डिजिटल दोनों माध्यमों का उपयोग करता है।

मुख्य माध्यम:

  • प्रिंट मीडिया और समाचार पत्र
  • टीवी और रेडियो अभियान
  • सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म
  • आउटडोर विज्ञापन

डिजिटल नवाचार: ‘कर साथी’ और वेबसाइट 2.0

इस अभियान की खास बात AI आधारित टूल्स और डिजिटल सेवाएं हैं।

  • ‘कर साथी’ चैटबॉट: कर संबंधी सवालों के रियल-टाइम जवाब देगा
  • Income Tax Website 2.0: बेहतर नेविगेशन और यूज़र-फ्रेंडली सेवाएं
  • वीडियो, FAQs और गाइडेंस नोट्स: जटिल कर नियमों को सरल बनाते हैं

बहुभाषीय सुविधा: समावेशी पहल

यह अभियान हिंदी और अंग्रेजी के साथ 10 क्षेत्रीय भाषाओं में भी जानकारी उपलब्ध कराता है, जिससे देश के विभिन्न क्षेत्रों के लोग आसानी से समझ सकें।

जनभागीदारी और इंटरएक्टिव लर्निंग

इसमें MyGov क्विज़ और अन्य इंटरएक्टिव कार्यक्रम शामिल हैं, जो लोगों को कर प्रणाली के बारे में रोचक तरीके से सीखने के लिए प्रेरित करते हैं।

इस प्रकार, PRARAMBH 2026 न केवल जागरूकता बढ़ाता है, बल्कि करदाताओं में आत्मविश्वास और भागीदारी को भी मजबूत करता है।

ऊर्जा सुरक्षा पर सरकार अलर्ट: पीएम मोदी ने की उच्चस्तरीय बैठक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष के बीच 22 मार्च 2026 को कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की अहम बैठक की अध्यक्षता की। प्रधानमंत्री आवास पर तीन घंटे से ज्यादा देर तक चली इस बैठक में मौजूदा हालात, उसके भारत पर असर और सरकार की तैयारियों का व्यापक आकलन किया गया। कैबिनेट सेक्रेटरी ने वैश्विक स्थिति और अब तक उठाए गए कदमों पर डिटेल में प्रेजेंटेशन​ दिया।

सीसीएस की बैठक के दौरान जिन मुद्दों पर चर्चा हुई उनमें कृषि, फर्टिलाइजर, फूड सिक्योरिटी, पेट्रोलियम, पावर, MSME, एक्सपोर्ट, शिपिंग और सप्लाई चेन जैसे अहम सेक्टर शामिल रहे। मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष का इन सेक्टर्स पर पड़ने वाले असर और उससे निपटने के उपायों पर बैठक में चर्चा हुई। सरकार ने साफ किया कि बदलते हालात का असर शॉर्ट, मीडियम और लॉन्ग टर्म में देखने को मिल सकता है। आम नागरिकों के लिए जरूरी खाद्य वस्तुओं और ईंधन की उपलब्धता को प्राथमिकता दी गई।

क्या-क्या हुई चर्चा बैठक में?

कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की बैठक में प्रधानमंत्री ने स्पष्ट निर्देश दिए कि सरकार के सभी अंग सही नजरिया अपनाकर नागरिकों को इस संकट के प्रभाव से सुरक्षित रखें। बैठक में भोजन, ऊर्जा और ईंधन सुरक्षा पर चर्चा हुई। किसानों के लिए खरीफ सीजन के लिए खाद की आवश्यकता का आकलन किया गया। PM ने आश्वस्त किया कि पिछले सालों में बनाए गए स्टॉक के कारण खाद की कोई कमी नहीं होगी। भविष्य के लिए वैकल्पिक स्रोतों पर भी चर्चा हुई। इसके अतिरिक्त देश के सभी पावर प्लांटों में कोयले का पर्याप्त स्टॉक सुनिश्चित करने का फैसला लिया गया, ताकि देश में बिजली की कोई किल्लत न हो।

जमाखोरी न हो: प्रधानमंत्री

प्रधानमंत्री ने राज्य सरकारों के साथ उचित समन्वय के निर्देश दिए हैं ताकि युद्ध की आड़ में जरूरी वस्तुओं की कालाबाजारी और जमाखोरी न हो सके। उन्होंने कहा कि नागरिकों को कम से कम असुविधा होनी चाहिए। PM मोदी ने इस संकट से निपटने के लिए एक डेडीकेटेड ‘ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स’ और सचिवों के समूह के गठन का निर्देश दिया है। यह समूह अलग-अलग सेक्टर के हितधारकों के साथ मिलकर काम करेगा।

कैबिनेट मंत्री बैठक में मौजूद

पीएम हाउस पर हुई इस हाई लेवल मीटिंग में 13 कैबिनेट मंत्री भी मौजूद थे। इसमें गृहमंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन, विदेश मंत्री एस जयशंकर, पीयूष गोयल, हरदीप सिंह पुरी, प्रह्लाद जोशी, अश्विनी वैष्णव, के राम मोहन नायडू, जे पी नड्डा, सर्वानंद सोनोवाल, मनोहर लाल खट्टर और शिवराज सिंह चौहान शामिल थे। इसके अतिरिक्त बैठक में एनएसए अजीत डोभाल और पीएम के दोनों प्रिंसिपल सेक्रेटरी भी मौजूद रहे।

युद्ध की शुरुआत

अमेरिका और इसराइल द्वारा ईरान पर 28 फरवरी को हमला किए जाने के बाद युद्ध की शुरुआत हुई। ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए इसराइल और खाड़ी क्षेत्र के अपने कई पड़ोसी देशों पर हमला किया। ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बाधित कर दिया है, जो एक प्रमुख समुद्री मार्ग है और इसके जरिए दुनिया की 20 प्रतिशत ऊर्जा की ढुलाई होती है। इसके कारण भारत समेत कई देशों में ऊर्जा आपूर्ति में गंभीर व्यवधान पैदा हो गया।

रेलवे की नई पहल: QR कोड से पहचान योग्य फूड पैकेट, अनधिकृत वेंडिंग पर सख्ती

रेल यात्रियों की सुविधा और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए भारतीय रेलवे ने एक बड़ा कदम उठाया है। अब ट्रेनों में कैटरिंग से जुड़े स्टाफ और वेंडर्स के लिए QR कोड आधारित आईडी कार्ड अनिवार्य कर दिए गए हैं। इस पहल का उद्देश्य अनधिकृत वेंडिंग पर रोक लगाना और यात्रियों को सुरक्षित व भरोसेमंद सेवा देना है।

खाने को लेकर अधिकतर रेलवे यात्रियों की काफी ज्यादा समस्याएं रहती हैं। यात्रियों की पुरानी शिकायत यही रही है, कि उन्हें बासी या बेस्वाद खाना परोसा जा रहा है। IRCTC ने इसी समस्या को देखते हुए क्यूआर कोड (QR कोड) की सुविधा शुरू की है, जो फूड पैकेट्स पर लगा होगा। इन QR कोड को स्कैन करते ही खाना बनने का समय, पैकिंग की तारीख समेत अन्य जरूरी डिटेल्स सामने आ जाएंगी। यह फैसिलिटी अवैध वेंडरों पर रोक लगाने और यात्रियों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करेगी।

QR कोड से वेंडर की पूरी पहचान होगी

नई व्यवस्था के तहत हर अधिकृत वेडर, हेल्पर और कैटरिंग स्टाफ को QR कोड युक्त पहचान पत्र दिया जाएगा। यह QR कोड स्कैन करते ही संबंधित व्यक्ति की पूरी जानकारी सामने आ जाएगी, जिसमें नाम, आधार नंबर, मेडिकल फिटनेस और पुलिस वेरिफिकेशन जैसी डिटेल्स शामिल होंगी। इससे यात्रियों को यह पता लगाना आसान होगा कि जो व्यक्ति उन्हें खाना या सामान दे रहा है, वह अधिकृत है या नहीं।

खाने की गुणवत्ता पर भी फोकस

रेलवे ने सिर्फ पहचान व्यवस्था ही नहीं बदली, बल्कि खाने की गुणवत्ता और हाइजीन पर भी खास ध्यान दिया है। खाना अब तय बेस किचन से सप्लाई किया जा रहा है, जहां आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं। इन किचन में CCTV कैमरे लगाए गए हैं, ताकि फूड प्रिपरेशन की निगरानी की जा सके। साथ ही, कुकिंग में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल के लिए ब्रांडेड और भरोसेमंद प्रोडक्ट्स का उपयोग सुनिश्चित किया गया है।

खाने के नमूनों की जांच हो रही

खाने की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए ब्रांडेड और प्रमाणित कच्चे माल का इस्तेमाल अनिवार्य किया गया है। तेल, आटा, चावल, दाल, मसाले और डेयरी उत्पाद जैसी चीजें तय मानकों के अनुसार ही ली जाएंगी।हर यूनिट के लिए भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण का प्रमाणन भी जरूरी कर दिया गया है।

खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की निगरानी में काम होगा। रेलवे द्वारा नियमित रूप से खाने के नमूनों की जांच भी की जा रही है। थर्ड पार्टी ऑडिट के जरिए पेंट्री कार और किचन की साफ-सफाई और गुणवत्ता का मूल्यांकन किया जा रहा है। साथ ही यात्रियों की संतुष्टि के लिए सर्वे भी कराया जा रहा है। कर्मचारियों को बेहतर सेवा और स्वच्छता के लिए प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

 

चुनाव आयोग का बड़ा फैसला: चुनाव प्रचार के नए नियम, अब जरूरी होगा प्री-सर्टिफिकेशन!

चुनाव आयोग ने आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए सख्त दिशा-निर्देश जारी किए हैं। आयोग ने स्पष्ट किया है कि अब सभी राजनीतिक विज्ञापनों को जारी करने से पहले मीडिया सर्टिफिकेशन एंड मॉनिटरिंग कमेटी (एमसीएमसी) से प्री-सर्टिफिकेशन लेना अनिवार्य होगा।

6 राज्यों में उपचुनाव का कार्यक्रम घोषित

चुनाव आयोग ने 15 मार्च को असम, केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के साथ-साथ 6 राज्यों में उपचुनाव का कार्यक्रम घोषित किया था। इसके बाद चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाए रखने के लिए यह निर्देश जारी किए गए हैं।

विज्ञापनों के लिए स्वीकृति

आयोग के अनुसार कोई भी पंजीकृत राजनीतिक दल, संगठन, उम्मीदवार या व्यक्ति टीवी, रेडियो, सार्वजनिक स्थानों पर ऑडियो-वीडियो डिस्प्ले, ई-पेपर, बल्क एसएमएस/वॉयस मैसेज और सोशल मीडिया जैसे इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों पर विज्ञापन जारी करने से पहले एमसीएमसी से अनुमति लेगा। बिना प्री-सर्टिफिकेशन के कोई भी राजनीतिक विज्ञापन इंटरनेट या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जारी नहीं किया जा सकेगा।

एमसीएमसी के फैसलों के खिलाफ अपील

उम्मीदवार अपने विज्ञापनों के प्रमाणन के लिए जिला स्तर की एमसीएमसी में आवेदन कर सकते हैं जबकि राज्य या केंद्रशासित प्रदेश में मुख्यालय रखने वाले राजनीतिक दल राज्यस्तरीय एमसीएमसी से अनुमति लेंगे। इसके साथ ही, जिला या राज्य एमसीएमसी के फैसलों के खिलाफ अपील के लिए मुख्य निर्वाचन अधिकारी की अध्यक्षता में एक अपीलीय समिति भी बनाई गई है।

पेड न्यूज के संदिग्ध मामलों पर कड़ी नजर

चुनाव आयोग ने यह भी कहा है कि एमसीएमसी मीडिया में पेड न्यूज के संदिग्ध मामलों पर कड़ी नजर रखेगी और आवश्यक कार्रवाई करेगी। इसके अतिरिक्त, सभी उम्मीदवारों को नामांकन के समय अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट्स की जानकारी हलफनामे में देना अनिवार्य होगा, ताकि चुनावी प्रचार पर निगरानी रखी जा सके।

प्रचार-प्रसार पर खर्च का पूरा विवरण

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 77(1) और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, राजनीतिक दलों को चुनाव खत्म होने के 75 दिनों के भीतर इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिए किए गए प्रचार-प्रसार पर खर्च का पूरा विवरण चुनाव आयोग को देना होगा। इसमें इंटरनेट कंपनियों को दिए गए भुगतान, विज्ञापन खर्च, कंटेंट निर्माण और सोशल मीडिया संचालन से जुड़े सभी खर्च शामिल होंगे।

इस बैठक का मुख्य उद्देश्य

इस संबंध में 19 मार्च को चुनाव आयोग ने सभी चुनावी राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों, राज्य पुलिस नोडल अधिकारियों, आईटी नोडल अधिकारियों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के प्रतिनिधियों के साथ बैठक भी की। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य चुनाव के दौरान फेक न्यूज, गलत सूचना और भ्रामक खबरों पर समय रहते रोक लगाना और सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करना था।

विश्व मौसम विज्ञान दिवस 2026: बदलते जलवायु में मौसम विज्ञान की बढ़ती भूमिका

विश्व मौसम विज्ञान दिवस हर वर्ष 23 मार्च को मनाया जाता है। यह दिन मौसम और जलवायु विज्ञान के महत्व को उजागर करता है। वर्ष 2026 का थीम “आज का अवलोकन, कल की सुरक्षा” (Observing Today, Protecting Tomorrow) है, जो इस बात पर केंद्रित है कि सटीक मौसम डेटा कैसे जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं से निपटने में मदद करता है। यह दिन विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की स्थापना की भी स्मृति में मनाया जाता है, जिसने वैश्विक स्तर पर मौसम और जलवायु से जुड़ी सेवाओं को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

विश्व मौसम विज्ञान दिवस क्या है?

विश्व मौसम विज्ञान दिवस मौसम विज्ञान की उस महत्वपूर्ण भूमिका का उत्सव है, जो मौसम, जलवायु और जल प्रणालियों को समझने में मदद करती है। यह दर्शाता है कि वैज्ञानिक डेटा किस प्रकार सरकारों और समुदायों को पर्यावरणीय चुनौतियों के लिए तैयार होने में सहायक होता है। यह दिवस मौसम और जल विज्ञान सेवाओं के महत्व के प्रति जागरूकता भी बढ़ाता है, जो कृषि, विमानन, आपदा प्रबंधन और दैनिक जीवन के लिए आवश्यक जानकारी प्रदान करती हैं। साथ ही, यह देशों को बेहतर योजना और सुरक्षा के लिए अपनी मौसम पूर्वानुमान प्रणालियों को मजबूत करने के लिए प्रेरित करता है।

विश्व मौसम विज्ञान दिवस 2026 थीम

विश्व मौसम विज्ञान दिवस 2026 का थीम “Observing Today, Protecting Tomorrow” है। यह थीम भविष्य के जलवायु जोखिमों की भविष्यवाणी के लिए निरंतर अवलोकन और डेटा संग्रह के महत्व को रेखांकित करती है। आज के मौसम पैटर्न की निगरानी करने से प्राकृतिक आपदाओं को रोकने और उनके दीर्घकालिक प्रभाव को कम करने में मदद मिलती है। यह थीम उपग्रह, रडार सिस्टम और विश्लेषण उपकरण जैसी उन्नत तकनीकों में निवेश की आवश्यकता पर भी जोर देती है, ताकि मौसम पूर्वानुमान और आपदा प्रबंधन को और अधिक प्रभावी बनाया जा सके।

विश्व मौसम विज्ञान दिवस का इतिहास

विश्व मौसम विज्ञान दिवस (WMO) 23 मार्च, 1950 को विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की स्थापना की याद दिलाता है। इस दिवस का पहला आयोजन वर्ष 1961 में किया गया था। WMO संयुक्त राष्ट्र की एक विशेषीकृत एजेंसी है, जो वैश्विक स्तर पर मौसम और जलवायु से जुड़ी गतिविधियों का समन्वय करती है। समय के साथ इस संगठन ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करने, समय पर डेटा साझा करने और मौसम पूर्वानुमान क्षमताओं को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

वैश्विक मौसम में WMO की भूमिका 

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) विश्वभर में मौसम संबंधी जानकारी के समन्वय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह रियल-टाइम डेटा साझा करने की सुविधा प्रदान करता है, जिससे मौसम पूर्वानुमान और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों की सटीकता बढ़ती है।

WMO की प्रमुख भूमिकाएँ:

  • वैश्विक स्तर पर मौसम संबंधी डेटा का आदान-प्रदान सुनिश्चित करना
  • जलवायु परिवर्तन से जुड़े अनुसंधान को समर्थन देना
  • जल संसाधनों और पर्यावरणीय परिवर्तनों की निगरानी करना
  • आपदा जोखिम न्यूनीकरण रणनीतियों को मजबूत बनाना

इस प्रकार, WMO वैश्विक स्तर पर मौसम विज्ञान को सुदृढ़ बनाकर मानव जीवन और पर्यावरण की सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

 

भारत के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले नेता बने नरेंद्र मोदी: पूरी कहानी

भारत के माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले निर्वाचित सरकार प्रमुख बन गए हैं। उन्होंने कुल 8,931 दिनों का कार्यकाल पूरा करते हुए नेतृत्व के 25वें वर्ष में प्रवेश किया है। इस उपलब्धि के साथ उन्होंने पवन कुमार चामलिंग का रिकॉर्ड भी पीछे छोड़ दिया है। यह उपलब्धि उनके गुजरात के मुख्यमंत्री से लेकर भारत के प्रधानमंत्री तक के लंबे और निरंतर नेतृत्व कार्यकाल को दर्शाती है।

पीएम मोदी: भारत के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले नेता 

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह रिकॉर्ड भारतीय राजनीति में एक दुर्लभ उपलब्धि है, जहाँ किसी नेता ने इतनी लंबी अवधि तक लगातार सत्ता में रहते हुए नेतृत्व किया हो। उनका संयुक्त कार्यकाल राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर उनके नेतृत्व को दर्शाता है। उन्होंने वर्ष 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की और बाद में 2014 में भारत के प्रधानमंत्री बने।

मुख्य बिंदु:

  • कुल कार्यकाल: 8,931 दिन
  • पार किया: पवन कुमार चामलिंग (8,930 दिन)
  • सार्वजनिक नेतृत्व का 25वां वर्ष शुरू

पीएम मोदी का राजनीतिक सफर

नरेंद्र मोदी ने 07 अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में अपने राजनीतिक नेतृत्व की शुरुआत की और उन्होंने 13 वर्षों से अधिक समय तक इस पद पर कार्य किया। वे गुजरात के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले मुख्यमंत्री भी रहे हैं। इसके बाद मई 2014 में वे भारत के 14वें प्रधानमंत्री बने और राष्ट्रीय राजनीति में एक नया अध्याय शुरू किया, जिससे देश की राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव आया। वे पहले गैर-कांग्रेसी नेता थे जिन्होंने लोकसभा में पूर्ण बहुमत हासिल किया और 2014 से लगातार देश का नेतृत्व प्रधानमंत्री के रूप में कर रहे हैं।

मोदी की रिकॉर्ड तोड़ चुनावी सफलता 

नरेंद्र मोदी की इस ऐतिहासिक उपलब्धि के पीछे उनकी लगातार मजबूत चुनावी सफलता एक प्रमुख कारण रही है। उन्होंने 2014, 2019 और 2024 में लगातार तीन लोकसभा चुनाव जीते हैं।

वे कई महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल करने वाले नेता भी बने हैं:

  • पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री जिन्होंने दो पूर्ण कार्यकाल पूरे किए
  • हाल के दशकों में लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने वाले पहले नेता
  • मुख्यमंत्री के रूप में सबसे अधिक पूर्व अनुभव रखने वाले प्रधानमंत्री

पीएम मोदी की वैश्विक सोशल मीडिया उपस्थिति

राजनीतिक उपलब्धियों के अलावा, नरेंद्र मोदी ने डिजिटल दुनिया में भी कई रिकॉर्ड बनाए हैं। उनकी सोशल मीडिया पर मजबूत उपस्थिति ने उन्हें दुनिया के सबसे अधिक फॉलो किए जाने वाले नेताओं में शामिल कर दिया है।

मुख्य डिजिटल उपलब्धियाँ:

  • YouTube: 30 मिलियन से अधिक सब्सक्राइबर
  • Instagram: 100 मिलियन से अधिक फॉलोअर्स
  • X (Twitter): लगभग 106.4 मिलियन फॉलोअर्स

दीर्घकाल तक शासन करने वाले वैश्विक नेता (निर्वाचित/व्यवहारिक)

नेता देश पद सत्ता में कार्यकाल
ली कुआन यू सिंगापुर प्रधानमंत्री 31 वर्ष (1959–1990)
हुन सेन कंबोडिया प्रधानमंत्री 38 वर्ष (1985–2023)
नरेंद्र मोदी भारत प्रधानमंत्री (पूर्व मुख्यमंत्री भी) लगभग 25 वर्ष
शेख़ हसीना बांग्लादेश प्रधानमंत्री 17+ वर्ष (लगातार कार्यकाल)
एंजेला मर्केल जर्मनी चांसलर 16 वर्ष (2005–2021)

 

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