AIIA ने कैशलेस आयुर्वेद कवरेज के लिए जनरल इंश्योरेंस काउंसिल के साथ MoU साइन किया

अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (AIIA) ने नई दिल्ली में जनरल इंश्योरेंस काउंसिल के साथ एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते के तहत अब 32 सामान्य बीमा कंपनियों के माध्यम से मरीजों को कैशलेस आयुर्वेद उपचार की सुविधा मिल सकेगी। आयुष मंत्रालय ने इसे आयुर्वेद को मुख्यधारा की स्वास्थ्य बीमा प्रणाली से जोड़ने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम बताया है। इस सूचीबद्धता (एम्पैनलमेंट) के बाद पात्र मरीज बीमित आयुर्वेद स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ अधिक आसानी से उठा सकेंगे। साथ ही, बीमा संबंधी प्रश्नों और सहायता के लिए एक समर्पित आयुष हेल्थ इंश्योरेंस हेल्पलाइन भी शुरू की गई है।

AIIA और जनरल इंश्योरेंस काउंसिल के बीच MoU क्या है?

अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (AIIA) ने जनरल इंश्योरेंस काउंसिल के साथ एक कॉमन एम्पैनलमेंट समझौता (MoU) किया है, जिसका उद्देश्य पूरे भारत में कैशलेस आयुर्वेद उपचार उपलब्ध कराना है। इस समझौते के तहत AIIA अब काउंसिल से जुड़ी सभी 32 सामान्य बीमा कंपनियों के साथ सूचीबद्ध (एम्पैनल्ड) हो गया है। इसका अर्थ है कि बीमा पॉलिसी धारक पात्र आयुर्वेद उपचार बिना अग्रिम भुगतान किए प्राप्त कर सकेंगे। यह पहल पारंपरिक चिकित्सा को आधुनिक बीमा प्रणाली से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है और आयुर्वेद स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ तथा आर्थिक रूप से समर्थ बनाती है।

कैशलेस आयुर्वेद उपचार से मरीजों को लाभ

AIIA और जनरल इंश्योरेंस काउंसिल के बीच हुए इस समझौते से आयुर्वेद उपचार की लागत और उपलब्धता दोनों में सुधार होगा। पंचकर्म, दीर्घकालिक रोग प्रबंधन और निवारक उपचार जैसी सेवाओं के लिए मरीज अब सीधे बीमा लाभ ले सकेंगे। कैशलेस सुविधा आर्थिक बोझ को कम करती है और आयुष स्वास्थ्य सेवाओं में लोगों का विश्वास बढ़ाती है। AIIA के निदेशक प्रोफेसर (वैद्य) पी. के. प्रजापति के अनुसार, यह पहल मरीजों के भरोसे को मजबूत करेगी और उपचार प्रक्रिया को अधिक सरल बनाएगी। बीमा ढांचे में आयुर्वेद को शामिल करने से समग्र स्वास्थ्य देखभाल को बढ़ावा मिलेगा और मरीज आर्थिक कारणों से इलाज टालने से बच सकेंगे।

स्वास्थ्य बीमा प्रणाली में आयुर्वेद का एकीकरण

स्वास्थ्य बीमा प्रणाली में आयुर्वेद का समावेश भारत की स्वास्थ्य नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है। पहले बीमा कवरेज मुख्य रूप से एलोपैथिक उपचार तक सीमित था, लेकिन अब 32 बीमा कंपनियों के तहत AIIA की सूचीबद्धता से आयुर्वेद को औपचारिक मान्यता मिल रही है। यह आयुष मंत्रालय के पारंपरिक चिकित्सा को मुख्यधारा में लाने के उद्देश्य को मजबूत करता है। यह पहल निवारक स्वास्थ्य देखभाल को बढ़ावा देने के साथ दीर्घकालिक स्वास्थ्य खर्च को कम करने में भी सहायक होगी। कैशलेस आयुर्वेद उपचार को बढ़ावा देकर सरकार पारंपरिक और आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों के संतुलित उपयोग को प्रोत्साहित कर रही है।

आयुष हेल्थ इंश्योरेंस हेल्पलाइन की भूमिका

इस समझौते के साथ आयुष मंत्रालय ने एक विशेष आयुष हेल्थ इंश्योरेंस हेल्पलाइन भी शुरू की है। यह हेल्पलाइन लाभार्थियों को बीमा से जुड़े सवालों के समाधान और आयुर्वेद उपचार की पात्रता समझने में मदद करेगी। इसका उद्देश्य दावा प्रक्रिया को आसान बनाना और लाभार्थियों को उनकी सुविधाओं तक सुचारु पहुंच प्रदान करना है। वर्तमान में बीमा समर्थित आयुर्वेद सेवाओं के बारे में जागरूकता सीमित है, इसलिए यह हेल्पलाइन मरीजों, अस्पतालों और बीमा कंपनियों के बीच बेहतर संवाद स्थापित करेगी। यह व्यवस्था कैशलेस आयुर्वेद उपचार के प्रभावी क्रियान्वयन और आयुष बीमा कवरेज में पारदर्शिता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

दिल्ली सरकार ने शुरू ‘लखपति बिटिया योजना’ की

दिल्ली सरकार ने राष्ट्रीय राजधानी में बालिकाओं के भविष्य को सुरक्षित करने के उद्देश्य से ‘लखपति बिटिया योजना’ नामक नई कल्याणकारी पहल शुरू की है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता द्वारा घोषित इस योजना का लक्ष्य जन्म से लेकर स्नातक की पढ़ाई पूरी होने तक बेटियों को वित्तीय सहायता प्रदान करना है। संरचित किस्त प्रणाली और पूर्ण डिजिटल पारदर्शिता के साथ यह योजना सामाजिक सुरक्षा को शिक्षा-आधारित प्रोत्साहनों से जोड़ती है, ताकि लैंगिक समानता को बढ़ावा दिया जा सके और बालिकाओं का दीर्घकालिक सशक्तिकरण सुनिश्चित हो सके।

लखपति बिटिया योजना क्या है?

लखपति बिटिया योजना वर्ष 2026 में दिल्ली सरकार द्वारा शुरू की गई एक बालिका कल्याण योजना है। इस योजना के तहत पात्र लाभार्थी बेटियों को जन्म से लेकर शिक्षा के विभिन्न चरणों तक कुल ₹56,000 की वित्तीय सहायता किस्तों में प्रदान की जाएगी। स्नातक की पढ़ाई सफलतापूर्वक पूरी करने के बाद यह योजना परिपक्व होगी और लाभार्थी को ₹1 लाख से अधिक की राशि प्राप्त होगी। इस प्रकार यह योजना शिक्षा के लिए दीर्घकालिक आर्थिक सहयोग प्रदान करती है।

योजना के तहत वित्तीय लाभ

दिल्ली की इस बालिका योजना की वित्तीय संरचना एकमुश्त भुगतान के बजाय चरणबद्ध सहायता पर आधारित है। महत्वपूर्ण शैक्षणिक पड़ावों पर किस्तों के रूप में राशि जारी की जाएगी, जिससे निरंतर समर्थन सुनिश्चित हो सके। स्नातक पूरा करने पर संचित राशि ₹1 लाख से अधिक हो जाएगी, जो उच्च शिक्षा को प्रोत्साहन देने के साथ-साथ युवावस्था की शुरुआत में आर्थिक सुरक्षा भी प्रदान करेगी।

पूर्णतः डिजिटल और पारदर्शी प्रक्रिया

लखपति बिटिया योजना की एक प्रमुख विशेषता इसका पूर्णतः डिजिटल ढांचा है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने बताया कि आवेदन से लेकर भुगतान तक की पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन संचालित की जाएगी। लाभार्थियों को किसी भी सरकारी कार्यालय के चक्कर नहीं लगाने होंगे। प्रत्येक लाभार्थी का डिजिटल रिकॉर्ड नियमित रूप से अपडेट किया जाएगा, जिससे पारदर्शिता, दक्षता और सुगम पहुंच सुनिश्चित होगी।

लैंगिक समानता और वित्तीय समावेशन पर जोर

यह योजना दिल्ली सरकार की लैंगिक समानता, वित्तीय समावेशन और मानव संसाधन विकास की व्यापक दृष्टि को दर्शाती है। शिक्षा के विभिन्न चरणों से वित्तीय सहायता को जोड़कर यह पहल परिवारों को बेटियों की पढ़ाई स्नातक स्तर तक जारी रखने के लिए प्रोत्साहित करती है। साथ ही, यह सामाजिक संदेश भी देती है कि बेटियों में निवेश करना समाज के भविष्य में निवेश करने के समान है।

यह योजना क्यों महत्वपूर्ण है?

लखपति बिटिया योजना केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य बालिकाओं में आत्मविश्वास बढ़ाना और यह सुनिश्चित करना है कि आर्थिक बाधाएं उनकी उच्च शिक्षा में रुकावट न बनें। इस प्रकार की योजनाएं स्कूल छोड़ने की दर कम करने, महिलाओं में उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने और समग्र सामाजिक-आर्थिक विकास को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

Om Birla के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव: स्पीकर को हटाने की क्या है प्रक्रिया

विपक्ष ने 10 फरवरी 2026 को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया है। यह प्रस्ताव अब संसदीय नियमों के अनुसार जांच और प्रक्रिया से गुजरेगा। सदन की कार्यवाही के दौरान अध्यक्ष द्वारा लिए गए कुछ निर्णयों को लेकर विपक्षी दलों ने आपत्ति जताई थी, जिसके बाद यह कदम उठाया गया। भारतीय संविधान लोकसभा अध्यक्ष को हटाने की स्पष्ट प्रक्रिया निर्धारित करता है। सरकार के खिलाफ लाए जाने वाले सामान्य अविश्वास प्रस्ताव से अलग, अध्यक्ष को हटाने के लिए विशेष प्रस्ताव लाना पड़ता है, जिसमें कड़े प्रावधान और निर्धारित शर्तें लागू होती हैं।

क्या लोकसभा अध्यक्ष को हटाया जा सकता है?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 94(c) के तहत लोकसभा अध्यक्ष को हटाने का प्रावधान है। इस प्रावधान के अनुसार, लोकसभा अध्यक्ष को सदन के तत्कालीन कुल सदस्यों के बहुमत से पारित प्रस्ताव द्वारा हटाया जा सकता है। यह प्रक्रिया केवल लोकसभा पर लागू होती है, राज्यसभा पर नहीं। संवैधानिक व्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि अध्यक्ष उच्च संवैधानिक पद पर होते हुए भी सदन के प्रति जवाबदेह रहें।

अनुच्छेद 94 क्या कहता है?

अनुच्छेद 94 के अनुसार अध्यक्ष निम्न परिस्थितियों में पद रिक्त करते हैं—

  • यदि वे लोकसभा के सदस्य नहीं रहते।
  • यदि वे उपाध्यक्ष को लिखित रूप में इस्तीफा दे दें।
  • यदि सदन के तत्कालीन कुल सदस्यों के बहुमत से पारित प्रस्ताव द्वारा उन्हें हटा दिया जाए।
  • यहाँ “पूर्ण बहुमत” (Absolute Majority) आवश्यक होता है, अर्थात उस समय सदन की कुल सदस्य संख्या के आधे से अधिक सदस्यों का समर्थन।

हटाने की चरणबद्ध प्रक्रिया

  • लोकसभा अध्यक्ष को हटाने की प्रक्रिया लोकसभा के कार्य संचालन नियम 200 से 203 के अंतर्गत निर्धारित है।
  • सबसे पहले, कोई सदस्य लोकसभा के महासचिव को लिखित सूचना देता है।
  • प्रस्ताव को विचारार्थ लेने से कम से कम 14 दिन पूर्व सूचना देना अनिवार्य है।
  • सूचना अवधि पूरी होने के बाद प्रस्ताव को सूचीबद्ध किया जाता है।
  • जब प्रस्ताव पर विचार किया जाता है, तो उसे स्वीकार करने के लिए कम से कम 50 सदस्यों का समर्थन आवश्यक होता है।
  • यदि 50 से कम सदस्य समर्थन करते हैं, तो प्रस्ताव प्रारंभिक चरण में ही असफल हो जाता है।

यदि प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाए तो क्या होता है?

यदि 50 या उससे अधिक सदस्य प्रस्ताव के समर्थन में खड़े होते हैं, तो पीठासीन अधिकारी प्रस्ताव को अनुमति (Leave) प्रदान करते हैं और 10 दिनों के भीतर उस पर चर्चा निर्धारित की जाती है।

चर्चा के दौरान—

  • बहस केवल प्रस्ताव में लगाए गए आरोपों तक सीमित रहती है।
  • प्रस्ताव प्रस्तुत करने वाले सदस्य को अधिकतम 15 मिनट बोलने का अवसर मिलता है।
  • लोकसभा अध्यक्ष को भी बहस में भाग लेने का अधिकार होता है।
  • अध्यक्ष प्रथम मतदान में वोट दे सकते हैं, लेकिन मत बराबर होने की स्थिति में निर्णायक (Casting Vote) नहीं दे सकते।
  • प्रस्ताव तभी पारित माना जाएगा जब उसे सदन के तत्कालीन कुल सदस्यों के पूर्ण बहुमत का समर्थन प्राप्त हो।

क्या पहले ऐसा हुआ है?

हाँ, लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव इतिहास में तीन बार लाया गया है—

  • 1954 – गणेश वासुदेव मावलंकर के खिलाफ
  • 1966 – हुकम सिंह के खिलाफ
  • 1987 – बलराम जाखड़ के खिलाफ

हालांकि, इनमें से कोई भी प्रस्ताव सफल नहीं हुआ। अब तक किसी भी लोकसभा अध्यक्ष को इस प्रक्रिया के माध्यम से पद से नहीं हटाया गया है।

प्रक्रिया के दौरान अध्यक्ष की भूमिका

यदि अध्यक्ष को हटाने का प्रस्ताव विचाराधीन हो, तो वे सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता नहीं करते। लेकिन उन्हें निम्न अधिकार प्राप्त रहते हैं—

  • बहस में बोलने का अधिकार
  • कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार
  • प्रथम मतदान में वोट देने का अधिकार

महत्वपूर्ण बात यह है कि लोकसभा भंग होने की स्थिति में भी अध्यक्ष अपने पद पर बने रहते हैं, जब तक कि नव-निर्वाचित लोकसभा की पहली बैठक से ठीक पहले तक।

लोकसभा अध्यक्ष के पद की पृष्ठभूमि

  • लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव सदन के सदस्य करते हैं और वे सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता करते हैं।
  • यह पद सदन में अनुशासन बनाए रखने, प्रक्रिया संबंधी प्रश्नों पर निर्णय लेने और विधायी कार्य को सुचारु रूप से चलाने में केंद्रीय भूमिका निभाता है।
  • सदन के नियमों की व्याख्या करने में अध्यक्ष अंतिम प्राधिकरण माने जाते हैं।

ADB ने ब्रह्मपुत्र के किनारे बाढ़ प्रबंधन बढ़ाने हेतु 182 मिलियन डॉलर के ऋण को मंजूरी दी

एशियाई विकास बैंक (ADB) ने असम में बाढ़ और नदी तट कटाव प्रबंधन को मजबूत करने के लिए अतिरिक्त 182 मिलियन अमेरिकी डॉलर के ऋण को मंजूरी दी है। यह राशि अक्टूबर 2023 में स्वीकृत 200 मिलियन डॉलर की “क्लाइमेट रेज़िलिएंट ब्रह्मपुत्र इंटीग्रेटेड फ्लड एंड रिवरबैंक इरोजन रिस्क मैनेजमेंट परियोजना” के अतिरिक्त है। इस पहल का उद्देश्य ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे बार-बार आने वाली बाढ़ से असम की संवेदनशीलता को कम करना और ग्रामीण आजीविका, बुनियादी ढांचे तथा राज्य की आर्थिक स्थिरता को मजबूत बनाना है।

असम में बाढ़ प्रबंधन के लिए ADB ऋण क्या है?

एशियाई विकास बैंक (ADB) द्वारा स्वीकृत अतिरिक्त 182 मिलियन डॉलर का ऋण असम में गंभीर बाढ़ और नदी तट कटाव को नियंत्रित करने के प्रयासों को मजबूत करेगा। भारी मानसूनी वर्षा और ब्रह्मपुत्र नदी की बदलती धारा के कारण असम हर वर्ष बाढ़ की समस्या का सामना करता है। यह वित्तपोषण “क्लाइमेट रेज़िलिएंट ब्रह्मपुत्र परियोजना” के तहत पहले से चल रहे व्यापक और जोखिम-आधारित दृष्टिकोण को और सशक्त बनाता है। यह रणनीति केवल बुनियादी ढांचे तक सीमित नहीं है, बल्कि दीर्घकालिक जलवायु अनुकूलन और आपदा सहनशीलता पर भी केंद्रित है।

पृष्ठभूमि: 200 मिलियन डॉलर की क्लाइमेट रेज़िलिएंट ब्रह्मपुत्र परियोजना

अक्टूबर 2023 में ADB ने असम के लिए 200 मिलियन डॉलर की परियोजना को मंजूरी दी थी, जिसका उद्देश्य बाढ़ और नदी तट कटाव प्रबंधन के लिए समग्र मॉडल अपनाना था। इस पहल का लक्ष्य बार-बार आने वाली बाढ़ से होने वाली ग्रामीण गरीबी को कम करना, कृषि भूमि और बुनियादी ढांचे की रक्षा करना, समुदायों के विस्थापन को रोकना तथा जलवायु सहनशीलता को मजबूत करना है। अब अतिरिक्त 182 मिलियन डॉलर की सहायता से इन प्रयासों का विस्तार किया जाएगा ताकि बेहतर तैयारी और टिकाऊ समाधान सुनिश्चित हो सकें।

असम में बाढ़ प्रबंधन क्यों महत्वपूर्ण है?

ब्रह्मपुत्र नदी विश्व की सबसे अधिक बाढ़-प्रवण और गतिशील नदियों में से एक है। असम में लगभग हर वर्ष विनाशकारी बाढ़ आती है, जिससे फसलें, घर, सड़कें और सार्वजनिक ढांचा प्रभावित होते हैं। बाढ़ और कटाव से आजीविका का नुकसान, पलायन, ग्रामीण गरीबी में वृद्धि और पर्यावरणीय क्षति जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। इसलिए प्रभावी बाढ़ और नदी तट कटाव प्रबंधन राज्य की आर्थिक स्थिरता और सामाजिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।

अतिरिक्त वित्तपोषण से क्या हासिल होगा?

नए 182 मिलियन डॉलर के ऋण से तटबंधों और बाढ़ सुरक्षा ढांचे को मजबूत किया जाएगा, उन्नत निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली लागू की जाएगी, जलवायु-सहिष्णु इंजीनियरिंग समाधान अपनाए जाएंगे और समुदाय-आधारित आपदा तैयारी को बढ़ावा मिलेगा। यह वित्तपोषण अस्थायी बाढ़ नियंत्रण उपायों के बजाय दीर्घकालिक और जलवायु-स्मार्ट बुनियादी ढांचे की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

जलवायु और आपदा वित्तपोषण में ADB की भूमिका

एशियाई विकास बैंक विकासशील देशों को बुनियादी ढांचा, जलवायु अनुकूलन और गरीबी उन्मूलन के लिए वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान करता है। असम के लिए यह परियोजना जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने हेतु वैश्विक प्रयासों का हिस्सा है।

एशियाई विकास बैंक (ADB) के बारे में

एडीबी की स्थापना 19 दिसंबर 1966 को हुई थी और इसका मुख्यालय मनीला, फिलीपींस में स्थित है। यह एशिया-प्रशांत क्षेत्र का प्रमुख बहुपक्षीय विकास बैंक है, जिसका उद्देश्य समृद्ध, समावेशी, सहनशील और सतत विकास को बढ़ावा देना तथा अत्यधिक गरीबी का उन्मूलन करना है। भारत एडीबी से वित्तीय प्रतिबद्धताओं का लगभग 14% प्राप्त करने वाला सबसे बड़ा लाभार्थी देश है, इसके बाद चीन, बांग्लादेश, फिलीपींस और पाकिस्तान आते हैं। एडीबी क्षेत्रीय विकास परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता, तकनीकी विशेषज्ञता और नीतिगत मार्गदर्शन प्रदान करता है।

उत्तर प्रदेश ने पेश किया 9.13 लाख करोड़ रुपये का गेम-चेंजर बजट 2026-27

उत्तर प्रदेश सरकार ने आगामी वर्ष के लिए एक विशाल वित्तीय रोडमैप प्रस्तुत किया है। विधानसभा में पेश किए गए यूपी बजट 2026-27 का कुल आकार ₹9.13 लाख करोड़ है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 12.2% अधिक है। वित्त मंत्री सुरेश खन्ना ने बजट पेश करते हुए अनुशासित वित्तीय प्रबंधन और ऋण नियंत्रण पर विशेष जोर दिया। महत्वपूर्ण रूप से, 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुरूप राजकोषीय घाटे को 3% तक सीमित रखा गया है, जो 2030-31 तक लागू रहेगा। यह बजट शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, आधारभूत संरचना और कौशल विकास पर विशेष ध्यान केंद्रित करता है, जिससे विकासोन्मुखी और संतुलित शासन का स्पष्ट संकेत मिलता है।

यूपी बजट 2026-27: आकार, वृद्धि और राजकोषीय अनुशासन

यूपी बजट 2026-27 का कुल आकार ₹9.13 लाख करोड़ है, जो इसे भारत के सबसे बड़े राज्य बजटों में शामिल करता है। यह पिछले वर्ष की तुलना में 12.2% की वार्षिक वृद्धि को दर्शाता है, जो विस्तारवादी लेकिन नियंत्रित व्यय नीति का संकेत है। बजट की एक महत्वपूर्ण विशेषता राजकोषीय घाटे की सीमा को सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के 3% पर निर्धारित करना है, जो 16वें वित्त आयोग के ढांचे के अनुरूप है। यह सीमा 2030-31 तक प्रभावी रहेगी, जिससे व्यापक आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित होगी। व्यय में वृद्धि के साथ घाटे पर अनुशासन बनाए रखना विकास और स्थिरता के बीच संतुलन को दर्शाता है।

यूपी बजट 2026-27 में क्षेत्रवार आवंटन

यूपी बजट 2026-27 में प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया है। शिक्षा क्षेत्र को कुल बजट का 12.4% आवंटित किया गया है, जो मानव पूंजी में निरंतर निवेश को दर्शाता है। स्वास्थ्य क्षेत्र को 6% हिस्सा दिया गया है, जो बढ़ती स्वास्थ्य आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए महत्वपूर्ण है। वहीं, कृषि एवं संबद्ध सेवाओं को 9% आवंटन दिया गया है, जो ग्रामीण विकास और किसानों के कल्याण के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

इन्फ्रास्ट्रक्चर और पूंजीगत निवेश पर जोर

यूपी बजट 2026-27 में पूंजीगत व्यय और बुनियादी ढांचे के विकास पर विशेष बल दिया गया है। पूंजीगत व्यय से सड़कों, एक्सप्रेसवे, बिजली परियोजनाओं और लॉजिस्टिक्स हब जैसी दीर्घकालिक परिसंपत्तियों का निर्माण होता है। सरकार का मानना है कि बुनियादी ढांचे का विस्तार आर्थिक उत्पादकता बढ़ाने और रोजगार सृजन में सहायक होगा। यह उत्तर प्रदेश को 1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के व्यापक लक्ष्य के अनुरूप है।

कौशल विकास एवं रोजगार रणनीति

यूपी बजट 2026-27 का एक प्रमुख आकर्षण मिशन मोड में कौशल विकास पर जोर है। वित्त मंत्री सुरेश खन्ना ने कहा कि तकनीकी या ट्रेड कौशल रखने वाले व्यक्तियों के बेरोजगार रहने की संभावना बहुत कम होती है। सरकार ने घोषणा की है कि:

  • मौजूदा कौशल प्रशिक्षण केंद्रों की क्षमता का विस्तार किया जाएगा।
  • नए प्रशिक्षण संस्थान स्थापित किए जाएंगे।
  • पीपीपी (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप) आधारित स्किल एवं प्लेसमेंट सेंटर को बढ़ावा दिया जाएगा।

निजी क्षेत्र की भागीदारी सुनिश्चित कर उद्योग और कौशल के बीच की खाई को पाटने का प्रयास किया जाएगा। बजट में महिलाओं के लिए समर्पित कौशल केंद्र स्थापित करने का भी प्रस्ताव है, जिससे महिला श्रमबल भागीदारी को बढ़ावा मिलेगा।

महिला केंद्रित रोजगार उपाय

यूपी बजट 2026-27 में महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ाने की आवश्यकता को विशेष रूप से स्वीकार किया गया है। प्रत्येक जिले में महिलाओं के लिए अलग कौशल विकास केंद्र स्थापित किए जाएंगे। यह पहल निम्नलिखित उद्देश्यों को समर्थन देती है:

  • आर्थिक आत्मनिर्भरता
  • समावेशी विकास
  • महिला सशक्तिकरण

यह रणनीति राज्य की समग्र विकास नीति को अधिक संतुलित और समावेशी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

करप्शन इंडेक्स 2025: भ्रष्टाचार के मामले में सुधरी भारत की रैकिंग

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक (Corruption Perceptions Index) 2025 एक चिंताजनक वैश्विक तस्वीर प्रस्तुत करता है। इस वर्ष वैश्विक औसत स्कोर में गिरावट दर्ज की गई है और “अत्यंत स्वच्छ” श्रेणी में आने वाले देशों की संख्या भी कम हुई है। रिपोर्ट के अनुसार, डेनमार्क एक बार फिर शीर्ष स्थान पर बना हुआ है, जबकि संघर्ष और अस्थिरता से प्रभावित देश सूची के निचले पायदानों पर प्रमुखता से दिखाई देते हैं। यह रुझान दर्शाता है कि विश्व स्तर पर सुशासन और पारदर्शिता को लेकर चुनौतियाँ अभी भी गंभीर बनी हुई हैं।

भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक 2025: वैश्विक रुझान नकारात्मक दिशा में

भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक (CPI) 2025 में 182 देशों का मूल्यांकन सार्वजनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार की धारणा के आधार पर किया गया। इस सूचकांक में देशों को 0 (अत्यधिक भ्रष्ट) से 100 (अत्यंत स्वच्छ) के पैमाने पर अंक दिए जाते हैं। इस वर्ष वैश्विक औसत स्कोर 42 रहा, जो पिछले एक दशक में सबसे कम है। विशेष रूप से 122 देशों का स्कोर 50 से नीचे रहा, जिससे स्पष्ट होता है कि भ्रष्टाचार की समस्या व्यापक रूप से बनी हुई है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने यह भी पाया कि 80 से अधिक अंक प्राप्त करने वाले देशों की संख्या वर्षों में काफी घट गई है, जो पारंपरिक रूप से मजबूत लोकतंत्रों में भी सुशासन संबंधी चुनौतियों का संकेत देता है।

CPI 2025 में सबसे कम भ्रष्ट देश

CPI 2025 के अनुसार डेनमार्क ने 89 अंकों के साथ लगातार आठवें वर्ष शीर्ष स्थान बनाए रखा। इसके अलावा शीर्ष प्रदर्शन करने वाले देशों में फ़िनलैंड (88), सिंगापुर (84), न्यूज़ीलैंड (81) और नॉर्वे (81) शामिल हैं। इन देशों को मजबूत संस्थानों, पारदर्शिता और सार्वजनिक क्षेत्र में कम भ्रष्टाचार के स्तर के लिए जाना जाता है। हालांकि, रिपोर्ट यह भी स्पष्ट करती है कि उच्च अंक प्राप्त करने वाले देश भी पूरी तरह भ्रष्टाचार-मुक्त नहीं हैं, क्योंकि हाल के वर्षों में कुछ देशों में गिरावट के संकेत देखे गए हैं।

भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक 2025: सबसे ऊपर और सबसे नीचे के देशों की स्थिति

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के Corruption Perceptions Index 2025 में सबसे नीचे संघर्ष, अस्थिरता और कमजोर शासन वाले देश प्रमुख हैं। सूचकांक में:

  • दक्षिण सूडान (South Sudan) — 9 अंक (रैंक 181)
  • सोमालिया (Somalia) — 9 अंक (रैंक 181)
  • वेनेज़ुएला (Venezuela) — 10 अंक (रैंक 180)

ये निचले स्कोर अक्सर कमजोर राज्य संस्थाओं, राजनीतिक अस्थिरता और नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध को दर्शाते हैं, जहाँ कानून का शासन और जवाबदेही प्रणालियाँ कमजोर होती हैं।

CPI 2025 में भारत की रैंक: भारत कहाँ है?

Corruption Perceptions Index 2025 के अनुसार भारत विश्व स्तर पर 91वें स्थान पर रहा और उसे 39 अंक प्राप्त हुए, जो 0 से 100 के पैमाने पर मापा गया है (जहाँ 0 सबसे भ्रष्ट और 100 सबसे स्वच्छ माना जाता है)। यह पिछले वर्ष की तुलना में एक मामूली सुधार को दर्शाता है। हालांकि भारत का स्कोर वैश्विक औसत 42 से अभी भी थोड़ा कम है, यह सूचक सुधार शासन और पारदर्शिता में प्रगति के संकेत देता है।

दीर्घकालिक सुधार दिखाने वाले देश

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के अनुसार वर्ष 2012 से अब तक लगभग 31 देशों ने भ्रष्टाचार के स्तर को कम करने में उल्लेखनीय प्रगति की है। इन देशों ने लगातार नीतिगत सुधार, डिजिटल प्रशासन और संस्थागत मजबूती के माध्यम से पारदर्शिता बढ़ाई है। प्रमुख उदाहरण इस प्रकार हैं—

  • एस्टोनिया – रैंक 12 (स्कोर 76)
  • भूटान – रैंक 18 (स्कोर 71)
  • दक्षिण कोरिया – रैंक 31 (स्कोर 63)

इन देशों में सुधार का श्रेय सशक्त भ्रष्टाचार-रोधी नीतियों, ई-गवर्नेंस के प्रभावी उपयोग, पारदर्शी प्रशासनिक प्रक्रियाओं और मजबूत संस्थागत ढांचे को दिया जाता है, जिससे जवाबदेही बढ़ी और सार्वजनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार कम हुआ।

CPI 2025: सबसे कम भ्रष्टाचार वाले शीर्ष 10 देश

रैंक देश CPI स्कोर 2025
1 डेनमार्क 89
2 फिनलैंड 88
3 सिंगापुर 84
4 न्यूज़ीलैंड 81
5 नॉर्वे 81
6 स्वीडन 80
7 स्विट्ज़रलैंड 80
8 लक्ज़मबर्ग 78
9 नीदरलैंड्स 78
10 जर्मनी / आइसलैंड (संयुक्त) 77

CPI 2025: सबसे अधिक भ्रष्टाचार वाले निचले 10 देश

क्रमांक देश CPI स्कोर 2025
181 दक्षिण सूडान 9
180 सोमालिया 9
179 वेनेज़ुएला 10
178 यमन 13
177 लीबिया 13
176 इरिट्रिया 13
175 सूडान 14
174 निकारागुआ 14
173 सीरिया 15
172 उत्तर कोरिया 15

भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक (CPI) के बारे में

  • प्रकाशित करता है: ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल (Transparency International)
  • मापदंड: सार्वजनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार की धारणा (Perceived Public Sector Corruption)
  • डेटा स्रोत: विशेषज्ञ आकलन (Expert Assessments) और व्यवसाय सर्वेक्षण (Business Surveys)
  • स्कोर की व्याख्या: अधिक स्कोर = अधिक स्वच्छ और पारदर्शी शासन व्यवस्था (कम भ्रष्टाचार)

भारत-ब्रिटेन के बीच नए समझौते से कामगारों के लिए सामाजिक सुरक्षा का बोझ कैसे कम होगा

भारत और यूनाइटेड किंगडम (यूके) ने अस्थायी रूप से कार्यरत कर्मचारियों को दोहरी सामाजिक सुरक्षा अंशदान (डबल सोशल सिक्योरिटी कॉन्ट्रिब्यूशन) से बचाने के उद्देश्य से एक सामाजिक सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। यह समझौता 10 फरवरी 2026 को नई दिल्ली में विक्रम मिस्री और लिंडी कैमरन द्वारा हस्ताक्षरित किया गया। यह पहल भारत–यूके व्यापक आर्थिक व्यापार समझौते (Comprehensive Economic Trade Agreement) का हिस्सा है और दोनों देशों के बीच पेशेवर गतिशीलता को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

भारत–यूके सामाजिक सुरक्षा समझौता क्या है?

भारत–यूके सामाजिक सुरक्षा समझौते के तहत, यदि किसी कर्मचारी को अधिकतम 36 महीनों के लिए अस्थायी रूप से दूसरे देश में नियुक्त किया जाता है, तो उसे दोनों देशों में एक साथ सामाजिक सुरक्षा अंशदान नहीं देना होगा। इससे दोहरी भुगतान की समस्या समाप्त होगी, जो अक्सर कंपनियों की लागत बढ़ाती है और कर्मचारियों के हाथ में आने वाली आय को कम करती है। यह समझौता सुनिश्चित करता है कि अल्पकालिक विदेशी नियुक्ति के दौरान कर्मचारी अपने मूल देश की सामाजिक सुरक्षा प्रणाली के अंतर्गत संरक्षित रहें।

अस्थायी कर्मचारियों के लिए यह समझौता क्यों महत्वपूर्ण है?

यूके में अस्थायी रूप से कार्य करने वाले भारतीय पेशेवरों और भारत में काम करने वाले ब्रिटिश कर्मचारियों के लिए यह समझौता वित्तीय राहत और प्रशासनिक स्पष्टता प्रदान करेगा। दोहरी अंशदान से बचाव के कारण कंपनियों की परिचालन लागत घटेगी और अंतरराष्ट्रीय नियुक्तियाँ अधिक आकर्षक बनेंगी। आईटी, वित्तीय सेवाएँ, शिक्षा और कंसल्टिंग जैसे क्षेत्रों में, जहाँ अल्पकालिक विदेशी तैनाती सामान्य है, यह समझौता विशेष रूप से लाभकारी सिद्ध होगा।

व्यापक भारत–यूके व्यापार समझौते का हिस्सा

विदेश मंत्रालय के अनुसार, यह सामाजिक सुरक्षा समझौता भारत–यूके व्यापक आर्थिक व्यापार समझौते का अभिन्न अंग है। यह समझौता उसी समय प्रभाव में आएगा जब व्यापक व्यापार समझौता लागू होगा। इससे स्पष्ट होता है कि आधुनिक व्यापार समझौतों में श्रम गतिशीलता और सामाजिक सुरक्षा को भी केंद्रीय महत्व दिया जा रहा है, जिससे आर्थिक सहयोग केवल वस्तुओं और सेवाओं तक सीमित न रहकर व्यापक स्तर पर मजबूत हो।

श्रम गतिशीलता और आर्थिक संबंधों पर प्रभाव

यह समझौता अल्पकालिक नियुक्तियों पर कार्यरत कर्मचारियों को निरंतर सामाजिक सुरक्षा कवरेज सुनिश्चित कर श्रम गतिशीलता को बढ़ावा देता है। यह भारत की उस रणनीति के अनुरूप है, जिसमें विदेशों में कार्यरत कुशल पेशेवरों को समर्थन देना और पारस्परिक अवसरों को प्रोत्साहित करना शामिल है। वित्तीय बाधाओं को कम कर यह समझौता द्विपक्षीय व्यापार, निवेश और आर्थिक सहभागिता को और सशक्त बनाएगा।

भारत–चीन रणनीतिक संवाद भी आयोजित

इसी दिन विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने भारत–चीन रणनीतिक संवाद में भी भाग लिया, जिसमें मा झाओशू (BRICS शेरपा बैठक के लिए भारत में उपस्थित) शामिल थे। दोनों पक्षों ने द्विपक्षीय संबंधों में सकारात्मक प्रगति की समीक्षा की और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने पर चर्चा की। साथ ही क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर भी विचार-विमर्श किया गया, जो भारत की सक्रिय कूटनीतिक भूमिका को दर्शाता है।

सामाजिक सुरक्षा समझौते (SSA) क्या होते हैं?

सामाजिक सुरक्षा समझौते द्विपक्षीय व्यवस्थाएँ होती हैं, जिनका उद्देश्य कर्मचारियों को एक ही अवधि के लिए दो देशों में सामाजिक सुरक्षा अंशदान देने से बचाना है। भारत ने अपने कार्यबल की वैश्विक गतिशीलता को सुगम बनाने के लिए कई देशों के साथ ऐसे समझौते किए हैं। ये समझौते पेंशन अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं और नियोक्ताओं के अनुपालन व्यय को कम करते हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय नियुक्तियाँ अधिक सरल और प्रभावी बनती हैं।

सरकार AI से तैयार कंटेंट पर हुई सख्त, सोशल मीडिया मंचों को 3 घंटे के अंदर हटानी होगी सामग्री

सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 में संशोधन को आधिकारिक रूप से अधिसूचित कर दिया है, जिससे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए नियम और कड़े हो गए हैं। संशोधित आईटी नियम 2021 के तहत अब एआई-जनित (AI-generated) सामग्री पर “स्पष्ट और प्रमुख” लेबल लगाना अनिवार्य होगा और अवैध सामग्री हटाने की समय-सीमा 36 घंटे से घटाकर केवल तीन घंटे कर दी गई है। ये बदलाव 20 फरवरी 2026 से लागू होंगे। इनका उद्देश्य डीपफेक, भ्रामक सूचना और गैर-सहमति से साझा की जाने वाली सामग्री पर नियंत्रण करना तथा मध्यस्थों की जवाबदेही बढ़ाना है।

आईटी नियम 2021 संशोधन के तहत एआई लेबल अनिवार्य

नए नियमों के अनुसार, प्लेटफॉर्म्स को यह सुनिश्चित करना होगा कि एआई-जनित या सिंथेटिक जनरेटेड इंफॉर्मेशन (SGI) पर स्पष्ट और प्रमुख रूप से दिखाई देने वाला लेबल लगाया जाए। पहले प्रस्ताव था कि लेबल सामग्री के कम से कम 10% हिस्से पर हो, लेकिन तकनीकी कंपनियों से परामर्श के बाद यह सीमा हटा दी गई। हालांकि, एक बार एआई लेबल लगाने के बाद उसे हटाया या दबाया नहीं जा सकेगा। इस प्रावधान का उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना और उपयोगकर्ताओं को कृत्रिम या छेड़छाड़ की गई सामग्री की पहचान करने में सहायता देना है।

तीन घंटे में सामग्री हटाने का प्रावधान

सबसे महत्वपूर्ण बदलाव सामग्री हटाने की समय-सीमा में किया गया है। अब प्लेटफॉर्म्स को अवैध सामग्री तीन घंटे के भीतर हटानी होगी, जबकि पहले यह सीमा 36 घंटे थी। गैर-सहमति से साझा की गई निजी या अंतरंग तस्वीरों के मामलों में यह समय-सीमा घटाकर केवल दो घंटे कर दी गई है। यदि प्लेटफॉर्म निर्धारित समय-सीमा में कार्रवाई नहीं करते, तो वे आईटी अधिनियम के तहत मिलने वाली “सेफ हार्बर” सुरक्षा खो सकते हैं।

सेफ हार्बर क्या है और क्यों महत्वपूर्ण है?

सेफ हार्बर एक कानूनी सुरक्षा प्रावधान है, जो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को उपयोगकर्ताओं द्वारा डाली गई सामग्री के लिए जिम्मेदारी से बचाता है, बशर्ते वे निर्धारित सावधानी मानकों का पालन करें। यदि प्लेटफॉर्म नई तीन घंटे की समय-सीमा का पालन नहीं करते, तो यह सुरक्षा समाप्त हो सकती है। सरकार का तर्क है कि त्वरित कार्रवाई से हानिकारक सामग्री के वायरल होने से रोका जा सकता है, जबकि कुछ कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी सख्त समय-सीमा से अति-सेंसरशिप और संचालन संबंधी चुनौतियाँ बढ़ सकती हैं।

सिंथेटिक जनरेटेड इंफॉर्मेशन (SGI) की परिभाषा

संशोधित नियमों में SGI की परिभाषा स्पष्ट की गई है। एआई के सहायक या गुणवत्ता-सुधार वाले उपयोगों को इसमें छूट दी गई है। सद्भावना में किया गया सामान्य ऑडियो, वीडियो या ऑडियो-विजुअल संपादन SGI के दायरे में नहीं आएगा। लेकिन यदि प्लेटफॉर्म को पता चलता है कि उसकी सेवाओं का उपयोग अवैध SGI बनाने में हो रहा है, तो उसे तुरंत कार्रवाई करनी होगी, जैसे सामग्री हटाना, एक्सेस रोकना या उपयोगकर्ता खाते को निलंबित करना।

तकनीकी उपाय और उपयोगकर्ता घोषणा

नए नियमों के तहत मध्यस्थों को उचित तकनीकी उपाय अपनाने होंगे ताकि अवैध SGI के प्रसार को रोका जा सके। उपयोगकर्ताओं को यह घोषित करना होगा कि सामग्री एआई-जनित है, और प्लेटफॉर्म को इस घोषणा की पुष्टि कर प्रमुख लेबल प्रदर्शित करना होगा। साथ ही, ऐसे SGI को रोकना होगा जो वास्तविक घटनाओं या किसी व्यक्ति की पहचान को गलत तरीके से प्रस्तुत करता हो, जिससे डीपफेक जैसी समस्याओं पर नियंत्रण पाया जा सके।

पृष्ठभूमि: डीपफेक और एआई दुरुपयोग पर बढ़ती चिंता

ये संशोधन ऐसे समय में आए हैं जब वैश्विक स्तर पर डीपफेक और एआई के दुरुपयोग को लेकर चिंताएँ बढ़ रही हैं। एआई-निर्मित आपत्तिजनक सामग्री और भ्रामक सूचनाओं की घटनाओं ने नियामकीय सख्ती की आवश्यकता को रेखांकित किया है। भारत के संशोधित आईटी नियम 2021 डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर अधिक जवाबदेही, पारदर्शिता और त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं।

अंतरराष्ट्रीय महिला एवं बालिका विज्ञान दिवस 2026: 11 फरवरी

विज्ञान में महिलाओं और बालिकाओं का अंतर्राष्ट्रीय दिवस हर वर्ष 11 फरवरी को मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र इस दिन को विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (STEM) क्षेत्रों में महिलाओं और बालिकाओं की समान भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए मनाता है। शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति के बावजूद, STEM करियर और अनुसंधान क्षेत्रों में अब भी लैंगिक अंतर मौजूद है। वर्ष 2026 की थीम कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सामाजिक विज्ञान, STEM और वित्त को एकीकृत कर समावेशी भविष्य के निर्माण पर केंद्रित है। यह दिवस इस बात पर जोर देता है कि सतत विकास और आर्थिक वृद्धि के लिए विज्ञान शिक्षा और वैज्ञानिक करियर में समान अवसर सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है।

विज्ञान में महिलाओं और बालिकाओं का अंतर्राष्ट्रीय दिवस

विज्ञान में महिलाओं और बालिकाओं का अंतर्राष्ट्रीय दिवस संयुक्त राष्ट्र द्वारा STEM (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित) क्षेत्रों में मौजूद लैंगिक असमानता को दूर करने के उद्देश्य से घोषित किया गया था। वर्षों में महिलाओं की उच्च शिक्षा में भागीदारी बढ़ी है, लेकिन वैज्ञानिक अनुसंधान और नेतृत्व पदों में उनकी उपस्थिति अब भी सीमित है। वर्ष 2013 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एक प्रस्ताव पारित कर महिलाओं और बालिकाओं के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी में समान अवसरों पर जोर दिया। तब से हर वर्ष 11 फरवरी को यह दिवस वैश्विक स्तर पर मनाया जाता है। यह 2030 सतत विकास एजेंडा के लक्ष्यों का समर्थन करता है और रेखांकित करता है कि समावेशी विज्ञान बेहतर नवाचार और मजबूत अर्थव्यवस्था की नींव रखता है।

विज्ञान में महिलाओं और बालिकाओं का अंतर्राष्ट्रीय दिवस 2026 की थीम

वर्ष 2026 की थीम है – “Synergizing AI, Social Science, STEM and Finance: Building Inclusive Futures for Women and Girls” अर्थात “एआई, सामाजिक विज्ञान, STEM और वित्त का समन्वय: महिलाओं और बालिकाओं के लिए समावेशी भविष्य का निर्माण।” यह थीम दर्शाती है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), STEM शिक्षा, सामाजिक विज्ञान और वित्तीय निवेश मिलकर किस प्रकार समान अवसरों वाला भविष्य बना सकते हैं। एआई स्वास्थ्य और जलवायु अनुसंधान जैसे क्षेत्रों को बदल रहा है, लेकिन इन क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी अभी भी कम है। सामाजिक विज्ञान नीतियों को समावेशी बनाता है और वित्त महिलाओं द्वारा संचालित स्टार्टअप तथा शोध को समर्थन देता है। इन चार स्तंभों के समन्वय से संतुलित भागीदारी और सतत विकास को बढ़ावा मिलता है।

STEM में लैंगिक अंतर: इस दिवस का महत्व

वर्तमान में वैश्विक स्तर पर केवल लगभग 31% शोधकर्ता महिलाएँ हैं, जबकि एआई से संबंधित पेशों में यह संख्या लगभग 22% है। हालांकि 46% युवा महिलाएँ उच्च शिक्षा में नामांकन कराती हैं, लेकिन विज्ञान विषयों में स्नातक करने वाली केवल 35% ही हैं। ये आँकड़े बताते हैं कि यह दिवस क्यों महत्वपूर्ण है। समान भागीदारी से शोध की गुणवत्ता बढ़ती है, नवाचार को प्रोत्साहन मिलता है और प्रौद्योगिकी का लाभ सभी समुदायों तक पहुँचता है। विद्यालय स्तर से ही बालिकाओं को STEM में प्रोत्साहित करने से कौशल अंतर कम किया जा सकता है। सरकारों और संस्थानों से अपेक्षा की जाती है कि वे समावेशी नीतियाँ बनाएँ, छात्रवृत्ति प्रदान करें और महिला वैज्ञानिकों के लिए नेतृत्व के अवसर बढ़ाएँ।

भारत की विकास दृष्टि और यह दिवस

भारत के लिए यह दिवस डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया और एआई नवाचार लक्ष्यों के अनुरूप है। STEM में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी आर्थिक विकास और तकनीकी प्रगति को सशक्त बनाती है। अनुसंधान में महिलाओं की उपस्थिति से वैज्ञानिक समाधानों में विविधता आती है। भारत के अंतरिक्ष मिशन, जैव-प्रौद्योगिकी और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों को कुशल मानव संसाधन की आवश्यकता है, जिसमें महिला वैज्ञानिक और इंजीनियर महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। यह दिवस नीति सुधार, मेंटरशिप कार्यक्रमों और वित्तीय सहायता तंत्र को प्रोत्साहित करता है, ताकि विज्ञान क्षेत्र महिलाओं और बालिकाओं के लिए अधिक सुलभ और समावेशी बन सके।

भारत पर गोल्डमैन सैक्स का भरोसा बढ़ा: 2026 की विकास संभावनाएँ क्यों हुईं मजबूत

भारत की 2026 की आर्थिक संभावनाओं को वैश्विक वित्तीय विशेषज्ञों से नया बल मिला है। गोल्डमैन सैक्स ने भारत के आर्थिक विकास अनुमान को बढ़ाते हुए इसके पीछे व्यापार दबावों में कमी और अनुकूल वैश्विक परिस्थितियों को प्रमुख कारण बताया है। यह संशोधन अमेरिका के साथ प्रस्तावित अंतरिम व्यापार ढांचे के तहत भारतीय निर्यात पर शुल्क घटने के बाद किया गया है। मजबूत घरेलू मांग, नियंत्रित मुद्रास्फीति और निरंतर नीतिगत समर्थन के चलते भारत वैश्विक अनिश्चितता के बावजूद प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में एक मजबूत प्रदर्शनकर्ता के रूप में उभरता नजर आ रहा है।

गोल्डमैन सैक्स ने भारत के 2026 विकास अनुमान को बढ़ाया

गोल्डमैन सैक्स ने कैलेंडर वर्ष 2026 के लिए भारत की वास्तविक GDP वृद्धि दर का अनुमान 6.7% से बढ़ाकर 6.9% कर दिया है। यह संशोधन अमेरिका द्वारा घोषित शुल्क राहत के बाद व्यापार से जुड़ी बाधाओं में कमी को दर्शाता है। रिपोर्ट के अनुसार, निर्यात शुल्क घटने से विनिर्माण, निर्यात और समग्र आर्थिक गति को समर्थन मिलेगा। यह कदम ऐसे समय में भारत की मैक्रो-आर्थिक स्थिरता में वैश्विक भरोसे को दर्शाता है, जब कई अर्थव्यवस्थाएं भू-राजनीतिक और व्यापारिक अनिश्चितताओं के कारण मंदी के जोखिम का सामना कर रही हैं।

विकास अनुमान बढ़ने में अमेरिकी शुल्क कटौती की भूमिका

विकास अनुमान में यह बढ़ोतरी सीधे तौर पर भारतीय निर्यात पर अमेरिकी शुल्क में कमी से जुड़ी है। भारत और अमेरिका ने “पारस्परिक और परस्पर लाभकारी व्यापार” पर केंद्रित एक अंतरिम व्यापार समझौते के ढांचे को लेकर संयुक्त बयान जारी किया है। इसमें क्षेत्र-विशेष शुल्क कटौती और रूस से तेल खरीद से जुड़े अतिरिक्त 25% शुल्क को वापस लेना शामिल है। गोल्डमैन सैक्स के अनुसार, इन कदमों से निर्यातकों पर दबाव कम होगा, प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी और 2026 के लिए भारत के GDP विकास दृष्टिकोण को सीधा समर्थन मिलेगा।

चालू खाते और रुपये की स्थिरता पर प्रभाव

गोल्डमैन सैक्स ने 2026 के लिए भारत के चालू खाता घाटे के अनुमान को भी घटाकर GDP के 0.8% कर दिया है, जो लगभग 0.25 प्रतिशत अंक की कमी है। कम शुल्क आयात-निर्यात असंतुलन को घटाते हैं और बाहरी स्थिरता को मजबूत करते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि हाल के समय में भारतीय रुपया उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं में अच्छा प्रदर्शन कर रहा है, हालांकि आगे तेज मजबूती सीमित रह सकती है क्योंकि पूंजी प्रवाह में बढ़ोतरी को RBI के हस्तक्षेप और विदेशी मुद्रा भंडार में वृद्धि से संतुलित किया जा सकता है।

मौद्रिक नीति परिदृश्य और RBI का रुख

गोल्डमैन सैक्स के मुताबिक, भारत में मौद्रिक ढील का चक्र लगभग समाप्त हो चुका है। भारतीय रिज़र्व बैंक के रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रखने की उम्मीद है, क्योंकि विकास से जुड़े नकारात्मक जोखिम कम हुए हैं। स्थिर मुद्रास्फीति, बेहतर बाहरी परिस्थितियां और मजबूत घरेलू मांग RBI को सतर्क लेकिन स्थिर नीति अपनाने की अनुमति देती हैं। यह स्थिरता निवेशकों के भरोसे और दीर्घकालिक आर्थिक योजना को समर्थन देती है।

अन्य विकास अनुमानों से तुलना

वैश्विक स्तर पर तुलना करें तो भारत का विकास दृष्टिकोण अब भी मजबूत बना हुआ है। भारत का आर्थिक सर्वेक्षण FY27 के लिए 6.8–7.2% वृद्धि का अनुमान लगाता है, जबकि मूडीज़ ने भारत की GDP वृद्धि दर 6.4% आंकी है, जो G20 देशों में सबसे तेज़ है। ये अनुमान दिखाते हैं कि उपभोग, निवेश और विनिर्माण में सुधार के सहारे भारत वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बावजूद अपनी मजबूती बनाए हुए है।

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