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जातिगत भेदभाव के खिलाफ UGC के नए नियम, आखिर क्या है पूरा मामला

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने उच्च शिक्षा संस्थानों (HEI) में समता के संवर्द्धन से संबंधित विनियम, 2026 को अधिसूचित किया है, जिसका उद्देश्य जाति-आधारित भेदभाव का उन्मूलन करना है। ये केवल सुझाव नहीं हैं, बल्कि अनिवार्य (बाध्यकारी) नियम हैं, जिनका पालन हर संस्थान को करना होगा। इन नियमों का उल्लंघन करने वाले कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को कड़ी सज़ा का सामना करना पड़ेगा।

इन नियमों की ज़रूरत क्यों पड़ी?

भारतीय कॉलेजों में जातिगत भेदभाव एक असली और गंभीर समस्या है। 2019 में, IIT दिल्ली में एक स्टडी में पाया गया कि निचली जातियों के लगभग 75% छात्रों को कैंपस में भेदभाव का सामना करना पड़ा। इसमें शामिल हैं:

  • सामाजिक गतिविधियों से छात्रों को बाहर रखना
  • रूखा या अपमानजनक व्यवहार
  • छात्रावास, भोजनालय और खेल गतिविधियों में अलग-अलग व्यवहार या अलगाव

थोराट कमेटी (2007) ने पाया कि ये स्टूडेंट्स असल में अपने ही कॉलेजों में अलग-थलग थे, जिससे कैंपस के अंदर “अलग-अलग जगहें” बन गई थीं।

नए नियम क्या कहते हैं?

1. किन्हें संरक्षण मिलेगा?

नए नियमों के तहत संरक्षण दिया जाएगा:

  • अनुसूचित जाति (SC)
  • अनुसूचित जनजाति (ST)
  • अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)

ये नियम लोगों को धर्म, लिंग, विकलांगता और वे कहाँ से आते हैं, इस आधार पर होने वाले भेदभाव से भी बचाते हैं। यह पहले से ज़्यादा व्यापक है और यह हर किसी की सुरक्षा के प्रति सच्ची प्रतिबद्धता दिखाता है।

2. प्रत्येक कॉलेज को क्या करना अनिवार्य होगा?

अब हर कॉलेज और विश्वविद्यालय को एक समान अवसर केंद्र (Equal Opportunity Centre – EOC) स्थापित करना अनिवार्य होगा। इसे एक ऐसे विशेष कार्यालय के रूप में समझा जा सकता है जो:

  • भेदभाव से संबंधित शिकायतों को सुनता और दर्ज करता है
  • कॉलेज परिसर को अधिक न्यायपूर्ण और समावेशी बनाने के लिए कार्य करता है
  • यह सुनिश्चित करता है कि सभी छात्रों के साथ समान व्यवहार किया जाए

इस केंद्र में एक समिति का गठन भी अनिवार्य होगा, जिसमें निम्नलिखित वर्गों के प्रतिनिधि शामिल होंगे:

  • अनुसूचित जाति (SC) के छात्र
  • अनुसूचित जनजाति (ST) के छात्र
  • दिव्यांग छात्र
  • महिलाएँ
  • अन्य उपयुक्त प्रतिनिधि

इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि निर्णय-निर्माण प्रक्रिया में सभी वर्गों की आवाज़ शामिल हो।

3. कॉलेजों की जवाबदेही कैसे सुनिश्चित होगी?

अब कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को नियमित रूप से विस्तृत रिपोर्ट तैयार करनी होगी, जिसमें शामिल होगा:

  • प्राप्त हुई भेदभाव संबंधी शिकायतों की संख्या
  • उन शिकायतों पर की गई कार्रवाई
  • परिसर को अधिक समावेशी बनाने के लिए उठाए गए कदम

इन रिपोर्टों को साल में दो बार UGC को भेजना अनिवार्य होगा। इस प्रावधान से यह सुनिश्चित होगा कि संस्थान अब समस्याओं को छिपा नहीं सकेंगे और उन पर पारदर्शी तरीके से कार्रवाई करनी होगी।

4. राष्ट्रीय स्तर पर निगरानी व्यवस्था

UGC ने राष्ट्रीय स्तर पर एक समिति का गठन किया है, जिसमें सरकारी अधिकारी और नागरिक समाज (Civil Society) के सदस्य शामिल हैं।
इस समिति के प्रमुख कार्य हैं:

  • कॉलेजों और विश्वविद्यालयों द्वारा किए जा रहे कार्यों की समीक्षा करना
  • भेदभाव से संबंधित शिकायतों को सुनना
  • सुधार के लिए आवश्यक सुझाव देना
  • अद्यतन स्थिति बनाए रखने के लिए वर्ष में कम से कम दो बार बैठक करना

नियमों का पालन न करने पर क्या होगा?

यह इस व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है, क्योंकि अब नियमों का उल्लंघन करने पर वास्तविक और कड़े परिणाम होंगे:

  • नियम तोड़ने वाले कॉलेजों को सरकारी फंडिंग से वंचित किया जा सकता है
  • वे ऑनलाइन या दूरस्थ शिक्षा (Distance Learning) कार्यक्रम संचालित नहीं कर सकेंगे
  • ऐसे संस्थानों की UGC से मान्यता रद्द की जा सकती है

यह व्यवस्था पुराने नियमों से बिल्कुल अलग है, जो केवल सलाह या दिशा-निर्देश हुआ करते थे। अब संस्थानों को नियम मानने ही होंगे, अन्यथा उन्हें गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ेगा।

यह बदलाव क्यों महत्वपूर्ण है?

पुरानी समस्या: कई कॉलेजों में पहले से ही SC/ST सेल मौजूद थे, लेकिन वे प्रभावी रूप से काम नहीं कर पाए। अक्सर ये कार्यालय:

  • छात्रों को वास्तविक सहायता प्रदान नहीं करते थे
  • पीड़ितों की मदद करने के बजाय संस्थान की छवि बचाने पर ज़ोर देते थे
  • उनके पास बदलाव लागू करने की वास्तविक शक्ति नहीं थी

नया समाधान: नए समान अवसर केंद्र स्वतंत्र हैं, उनके पास असली संसाधन हैं, और उनमें असल बदलाव करने की शक्ति है।

मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health)

इन नियमों में एक महत्वपूर्ण पहलू को भी स्वीकार किया गया है—भेदभाव का सीधा असर छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है।
जब छात्रों को यह महसूस होता है कि वे किसी संस्थान का हिस्सा नहीं हैं, तो उनमें:

  • चिंता (Anxiety) बढ़ती है
  • आत्मविश्वास में कमी आती है
  • पढ़ाई में प्रदर्शन कमजोर हो जाता है

नए नियमों का उद्देश्य ऐसे सुरक्षित और सहयोगी वातावरण (Safe Spaces) तैयार करना है, जहाँ सभी छात्र बिना भय के आगे बढ़ सकें और अपनी पूरी क्षमता के साथ सफल हो सकें।

छात्रों के लिए इसका क्या अर्थ है?

इन नए नियमों का मतलब है कि अब:

  • छात्र बिना डर के भेदभाव की शिकायत दर्ज करा सकते हैं
  • कॉलेजों को हर शिकायत को गंभीरता से लेना अनिवार्य होगा
  • कार्रवाई न करने पर कॉलेजों के खिलाफ वास्तविक और कड़ी सज़ा का प्रावधान है
  • जाति, धर्म या सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर सभी छात्रों के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित किया जाएगा
  • कॉलेजों और विश्वविद्यालयों का ध्यान अब वास्तव में समावेशी (Inclusive) शैक्षणिक वातावरण बनाने पर होगा

 

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