ट्रांसजेंडर अधिकार संशोधन विधेयक 2026 संसद में पेश किया गया है। यह विधेयक 2019 के ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम में महत्वपूर्ण बदलाव प्रस्तावित करता है। इसका उद्देश्य भारत में ट्रांसजेंडर पहचान को मान्यता देने की प्रक्रिया को पुनर्परिभाषित करना है, जिससे व्यापक बहस छिड़ गई है। सबसे विवादास्पद प्रावधानों में से एक आत्म-पहचान (Self Identification) के अधिकार को हटाना है, जिसे 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने मान्यता दी थी।
भारत में ट्रांसजेंडर अधिकार कानून: पृष्ठभूमि
वर्तमान कानूनी ढांचा 2019 के अधिनियम पर आधारित है, जो सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक NALSA बनाम भारत संघ (2014) फैसले के बाद लागू हुआ था।
मुख्य विशेषताएं:
- ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को तीसरे लिंग के रूप में मान्यता
- लिंग की आत्म-पहचान का अधिकार (पुरुष, महिला या तीसरा लिंग)
- ट्रांसजेंडर पहचान पत्र जारी करना
- सरकारी योजनाओं तक पहुंच
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत में अब तक 32,000 से अधिक ट्रांसजेंडर पहचान पत्र जारी किए जा चुके हैं।
ट्रांसजेंडर अधिकार संशोधन विधेयक 2026: प्रमुख बदलाव
1. आत्म-पहचान का अधिकार समाप्त
- इस विधेयक का सबसे बड़ा बदलाव लिंग की आत्म-पहचान के अधिकार को हटाना है।
- सरकार का तर्क है कि पहले की परिभाषा बहुत व्यापक थी और उसे लागू करना कठिन था।
- यह प्रावधान NALSA फैसले के उस सिद्धांत को उलट देता है, जिसमें पहचान को व्यक्तिगत पसंद माना गया था।
2. मेडिकल सर्टिफिकेशन की व्यवस्था
- नए विधेयक के अनुसार, ट्रांसजेंडर पहचान की पुष्टि मेडिकल बोर्ड द्वारा की जाएगी।
- यह बोर्ड विशेषज्ञों से मिलकर बनेगा और जिला मजिस्ट्रेट को प्रमाणन की सिफारिश करेगा।
- यह पहले की प्रणाली से अलग है, जहां बिना मेडिकल जांच के आत्म-घोषणा के आधार पर पहचान मिलती थी।
3. ट्रांसजेंडर की संकीर्ण परिभाषा
इस विधेयक में ट्रांसजेंडर की परिभाषा को अधिक सीमित किया गया है।
इसमें शामिल हैं—
- कुछ विशेष सामाजिक-सांस्कृतिक समूहों के व्यक्ति
- जैविक या जन्मजात भिन्नताओं वाले व्यक्ति
यह 2019 के व्यापक और समावेशी दृष्टिकोण की जगह लेता है।
4. जबरन पहचान के लिए नई श्रेणी
- इस संशोधन में उन लोगों के लिए नई श्रेणी बनाई गई है, जिन्हें जबरन ट्रांसजेंडर पहचान में धकेला जाता है।
- इसका उद्देश्य शोषण और दुरुपयोग के मामलों को रोकना है।
5. सख्त सजा का प्रावधान
विधेयक में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के खिलाफ अपराधों के लिए सजा को कड़ा किया गया है।
मुख्य प्रावधान:
- हिंसा के माध्यम से पहचान थोपने पर 10 वर्ष से आजीवन कारावास
- बच्चों के खिलाफ अपराधों पर अधिक कठोर दंड
- जबरन भीख मंगवाने या बंधुआ मजदूरी कराने पर सजा
यह विधेयक विवादास्पद क्यों है?
इस विधेयक का LGBTQ+ समुदाय और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा विरोध किया जा रहा है।
मुख्य चिंताएं:
- आत्म-पहचान के अधिकार को हटाना
- मेडिकल प्रमाणन पर निर्भरता बढ़ाना
- सीमित परिभाषा के कारण कई पहचान का बाहर रह जाना
- पहचान साबित करने का बोझ व्यक्तियों पर डालना
भारत में ट्रांसजेंडर समुदाय पर प्रभाव
इस विधेयक के प्रस्तावित बदलाव ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों और पहचान पर बड़ा प्रभाव डाल सकते हैं।
संभावित प्रभाव:
- पहचान प्रमाणपत्र प्राप्त करना कठिन हो सकता है
- नौकरशाही प्रक्रियाएं बढ़ सकती हैं
- गैर-पारंपरिक पहचान वाले लोग बाहर हो सकते हैं
- संस्थागत स्वीकृति पर निर्भरता बढ़ेगी


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