गगनयान और आर्टेमिस-II: 2026 के ऐतिहासिक मानव अंतरिक्ष मिशन

वर्ष 2026 वैश्विक अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए एक निर्णायक मोड़ साबित होने वाला है। भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका दो महत्वपूर्ण मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशनों की तैयारी कर रहे हैं। जहाँ भारत का गगनयान मिशन स्वदेशी मानव अंतरिक्ष उड़ान प्रणालियों का परीक्षण करेगा, वहीं नासा का आर्टेमिस-II मिशन पाँच दशकों से अधिक समय बाद मनुष्यों को चंद्रमा से आगे ले जाएगा और भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों की दिशा तय करेगा।

खबर में क्यों?

  • भारत का भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और अमेरिका की नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (NASA) वर्ष 2026 में होने वाले ऐतिहासिक मिशनों की तैयारी कर रहे हैं।
    ISRO का मानव रहित गगनयान-G1 मिशन और NASA का आर्टेमिस-II मिशन भविष्य के मानव अंतरिक्ष और गहरे अंतरिक्ष अभियानों के लिए तकनीकी आधार तैयार करेंगे।

गगनयान मिशन: भारत का मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम

गगनयान कार्यक्रम का उद्देश्य भारत की स्वतंत्र मानव अंतरिक्ष उड़ान क्षमता विकसित करना है, जिसमें अंतरिक्ष यात्रियों को सुरक्षित रूप से अंतरिक्ष में भेजना और वापस लाना शामिल है।

  • पहला मानव रहित कक्षीय परीक्षण मिशन G1, अस्थायी रूप से मार्च 2026 में प्रस्तावित है।
  • इसे LVM3 (गगनयान-Mk3) रॉकेट से प्रक्षेपित किया जाएगा, जिसे अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा के लिए ह्यूमन-रेटेड बनाया गया है।

व्योममित्रा की भूमिका और मिशन के उद्देश्य

  • व्योममित्रा नामक एक ह्यूमनॉइड रोबोट G1 मिशन में शामिल होगा।
  • यह अंतरिक्ष यात्रियों के व्यवहार और प्रतिक्रियाओं का अनुकरण करेगा।
  • मिशन में जीवन समर्थन प्रणाली, क्रू मॉड्यूल की सुरक्षा, संचार प्रणाली, पुनःप्रवेश प्रक्रिया और समुद्र में रिकवरी तंत्र का परीक्षण किया जाएगा।
  • सफलता की स्थिति में भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो जाएगा जिनके पास मानव अंतरिक्ष उड़ान क्षमता है।

नासा का आर्टेमिस-II मिशन

  • आर्टेमिस-II मिशन 5 फरवरी 2026 से पहले नहीं निर्धारित है।
  • इसमें चार अंतरिक्ष यात्री होंगे, जो ओरियन अंतरिक्ष यान में यात्रा करेंगे, जिसे स्पेस लॉन्च सिस्टम (SLS) रॉकेट से प्रक्षेपित किया जाएगा।
  • यह 1972 में अपोलो-17 के बाद पहला मानव मिशन होगा जो निम्न पृथ्वी कक्षा से आगे जाएगा, और गहरे अंतरिक्ष अन्वेषण की वापसी को चिह्नित करेगा।

आर्टेमिस-II के प्रमुख लक्ष्य

  • लगभग 10 दिनों का चंद्रमा के चारों ओर उड़ान मिशन।
  • अंतरिक्ष यान चंद्रमा से 5,000 समुद्री मील से अधिक दूरी तक जाएगा, जो अब तक की सबसे दूर मानव यात्रा होगी।
  • डीप-स्पेस नेविगेशन, विकिरण सुरक्षा, दीर्घकालिक जीवन समर्थन प्रणालियों और मिशन संचालन का परीक्षण।
  • यह भविष्य के चंद्र लैंडिंग मिशनों और मंगल अभियानों का मार्ग प्रशस्त करेगा।

वैश्विक अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए महत्व

  • गगनयान और आर्टेमिस-II, मिलकर एक बहुध्रुवीय (Multipolar) अंतरिक्ष युग की शुरुआत का संकेत देते हैं।
  • भारत निम्न पृथ्वी कक्षा में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है, जबकि अमेरिका अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ गहरे अंतरिक्ष अन्वेषण का नेतृत्व कर रहा है।
  • वर्ष 2026 में विकसित होने वाली तकनीकें भविष्य में अंतरिक्ष स्टेशन, निजी मिशन, चंद्र आधार और अंतरग्रहीय यात्रा को प्रभावित करेंगी।

भारत और पाकिस्तान ने काउंसलर समझौते के तहत कैदियों की लिस्ट का आदान-प्रदान किया

भारत और पाकिस्तान ने एक बार फिर एक नियमित लेकिन महत्वपूर्ण कूटनीतिक प्रक्रिया को पूरा किया है। दोनों देशों ने एक-दूसरे की हिरासत में मौजूद नागरिक कैदियों और मछुआरों की सूची का आदान-प्रदान किया। यह प्रक्रिया एक मौजूदा द्विपक्षीय समझौते के तहत की गई और व्यापक राजनीतिक चुनौतियों के बावजूद मानवीय तथा कांसुलर संवाद की निरंतरता को दर्शाती है।

खबर में क्यों?

भारत और पाकिस्तान ने 2008 के कांसुलर एक्सेस समझौते के तहत राजनयिक माध्यमों से कैदियों और मछुआरों की सूचियों का आदान-प्रदान किया। इस दौरान मानवीय पहलुओं पर जोर देते हुए भारत ने पाकिस्तान में बंद भारतीय कैदियों और मछुआरों की शीघ्र रिहाई, कांसुलर पहुंच और स्वदेश वापसी की मांग की।

कैदियों की सूची के आदान-प्रदान के बारे में

  • यह आदान-प्रदान नई दिल्ली और इस्लामाबाद में एक साथ किया गया।
  • विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारत ने अपनी हिरासत में मौजूद 391 नागरिक कैदियों और 33 मछुआरों की जानकारी साझा की, जो पाकिस्तानी हैं या पाकिस्तानी माने जाते हैं।
  • इसके बदले में पाकिस्तान ने 58 नागरिक कैदियों और 199 मछुआरों की सूची दी, जो भारतीय हैं या भारतीय माने जाते हैं।

कांसुलर एक्सेस समझौता, 2008 की प्रमुख विशेषताएं

  • यह समझौता दोनों देशों को वर्ष में दो बार कैदियों की सूची का आदान-प्रदान करने की अनुमति देता है।
  • इसके तहत हिरासत में लिए गए नागरिकों को कांसुलर पहुंच प्रदान की जाती है, जिससे वे अपने देश से संपर्क कर सकें।
  • इसका उद्देश्य कैदियों और मछुआरों के अधिकारों, सुरक्षा और कल्याण की रक्षा करना है, विशेषकर उन मछुआरों के लिए जो अनजाने में समुद्री सीमाएं पार कर जाते हैं।

भारत की मांगें और कूटनीतिक रुख

  • भारत ने नागरिक कैदियों और मछुआरों के साथ-साथ उनकी नौकाओं की शीघ्र रिहाई और स्वदेश वापसी की मांग की।
  • नई दिल्ली ने पाकिस्तान से 167 ऐसे भारतीय कैदियों और मछुआरों की रिहाई में तेजी लाने को कहा, जो अपनी सजा पूरी कर चुके हैं।
  • इसके अलावा, भारत ने 35 ऐसे कैदियों को तत्काल कांसुलर पहुंच देने की मांग की, जिन्हें भारतीय माना जा रहा है लेकिन अभी तक यह सुविधा नहीं मिली है।

मानवीय चिंताएं और सुरक्षा मुद्दे

  • भारत ने पाकिस्तान की हिरासत में मौजूद सभी भारतीय और भारतीय माने जाने वाले कैदियों की सुरक्षा, संरक्षा और कल्याण सुनिश्चित करने पर जोर दिया।
  • मछुआरों की गिरफ्तारी अक्सर समुद्री सीमा के अनजाने उल्लंघन के कारण होती है, जिससे उनकी लंबी हिरासत एक मानवीय मुद्दा बन जाती है, न कि आपराधिक।
  • इस तरह के आदान-प्रदान से हिरासत में लिए गए लोगों की उपेक्षा और दुर्व्यवहार को रोकने में मदद मिलती है।

कूटनीतिक प्रयासों से हुई प्रगति

  • आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2014 से लगातार कूटनीतिक प्रयासों के चलते पाकिस्तान से 2,661 भारतीय मछुआरों और 71 भारतीय नागरिक कैदियों की स्वदेश वापसी हो चुकी है।
  • इसमें 2023 के बाद से रिहा किए गए 500 मछुआरे और 13 नागरिक कैदी भी शामिल हैं, जो संवाद और कांसुलर तंत्र के माध्यम से धीरे-धीरे हो रही प्रगति को दर्शाता है।

एयर मार्शल एस. श्रीनिवास ने IAF ट्रेनिंग कमांड के प्रमुख के रूप में कार्यभार संभाला

भारतीय वायुसेना (IAF) ने एयर मार्शल एस. श्रीनिवास को अपने प्रशिक्षण कमान (Training Command) का नया प्रमुख नियुक्त किया है। यह नियुक्ति वायुसेना के प्रशिक्षण और मानव संसाधन विकास क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण नेतृत्व परिवर्तन को दर्शाती है। एक अनुभवी फाइटर पायलट, फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर और प्रमुख प्रशिक्षण संस्थानों के कमांडर के रूप में उनके व्यापक अनुभव से पायलट प्रशिक्षण, सुरक्षा और परिचालन तैयारियों को और मजबूती मिलने की उम्मीद है।

खबर में क्यों?

एयर मार्शल एस. श्रीनिवास ने 1 जनवरी को भारतीय वायुसेना के प्रशिक्षण कमान के एयर ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ (AOC-in-C) का पदभार संभाला। पदभार ग्रहण करने के बाद उन्होंने प्रशिक्षण कमान युद्ध स्मारक पर शहीद कर्मियों को श्रद्धांजलि अर्पित की।

एयर मार्शल एस. श्रीनिवास के बारे में

एयर मार्शल एस. श्रीनिवास भारतीय वायुसेना के एक वरिष्ठ अधिकारी हैं, जिन्हें फाइटर संचालन, उड़ान प्रशिक्षण और प्रशिक्षण प्रशासन में व्यापक अनुभव प्राप्त है। वे उड़ान प्रशिक्षण, सुरक्षा और कार्मिक प्रबंधन से जुड़े नेतृत्वकारी दायित्वों के लिए जाने जाते हैं।

करियर पृष्ठभूमि

  • नेशनल डिफेंस अकादमी (NDA) के पूर्व छात्र
  • 13 जून 1987 को भारतीय वायुसेना के फाइटर स्ट्रीम में कमीशन
  • श्रेणी ‘A’ के योग्य फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर
  • विभिन्न विमानों पर 4,200 से अधिक उड़ान घंटे

उड़ान और परिचालन अनुभव

एयर मार्शल श्रीनिवास ने कई प्रकार के विमानों पर उड़ान भरी है, जिनमें शामिल हैं:

  • मिग-21, इस्क्रा, किरण
  • पीसी-7 एमके-II, एचपीटी-32, माइक्रोलाइट विमान

इसके अलावा वे निम्न भूमिकाओं के लिए भी योग्य हैं:

  • चेतक और चीता हेलीकॉप्टर पर सेकंड पायलट
  • पेचोरा मिसाइल प्रणाली पर ऑपरेशंस ऑफिसर

प्रमुख कमांड नियुक्तियाँ

  • कमांडेंट, एयर फोर्स अकादमी
  • पश्चिमी सीमा पर एक अग्रिम फाइटर बेस के एयर ऑफिसर कमांडिंग
  • एक प्रमुख फ्लाइंग प्रशिक्षण बेस के एयर ऑफिसर कमांडिंग
  • एयर ऑफिसर कमांडिंग, एडवांस मुख्यालय पश्चिमी वायु कमान (जयपुर)
  • कमांडिंग ऑफिसर, फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर्स स्कूल
  • कमांडेंट, इंस्टीट्यूट ऑफ एयरोस्पेस सेफ्टी
  • कमांडिंग ऑफिसर, बेसिक फ्लाइंग ट्रेनिंग स्कूल

शैक्षणिक और व्यावसायिक योग्यताएँ

एयर मार्शल श्रीनिवास ने निम्न प्रतिष्ठित संस्थानों से प्रशिक्षण प्राप्त किया है:

  • नेशनल डिफेंस कॉलेज (NDC)
  • कॉलेज ऑफ डिफेंस मैनेजमेंट (CDM)
  • डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज (DSSC)

उनकी शैक्षणिक योग्यताओं में शामिल हैं:

  • रक्षा एवं सामरिक अध्ययन में एमफिल
  • मास्टर ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज
  • रक्षा एवं सामरिक अध्ययन में एमएससी

पुरस्कार और सम्मान

  • उत्कृष्ट सेवाओं के लिए एयर मार्शल एस. श्रीनिवास को निम्न सम्मान प्रदान किए गए हैं:
  • विशिष्ट सेवा पदक (VSM) – 2017
  • अति विशिष्ट सेवा पदक (AVSM) – 2024

तमिलनाडु थाचनकुरिची में एक कार्यक्रम के साथ जल्लीकट्टू 2026 की शुरुआत

तमिलनाडु में वार्षिक जलीकट्टू सत्र की शुरुआत वर्ष 2026 की शुरुआत में होने जा रही है। राज्य सरकार ने 3 जनवरी 2026 को पहले जलीकट्टू आयोजन की अनुमति प्रदान की है। यह पारंपरिक सांड-वश में करने का खेल पुडुकोट्टई ज़िले के थाचनकुरिची गांव में आयोजित होगा। यह आयोजन नियमन और सुरक्षा मानकों के तहत तमिलनाडु की सांस्कृतिक परंपरा को आगे बढ़ाता है।

खबर में क्यों?

तमिलनाडु सरकार ने आधिकारिक रूप से 3 जनवरी को पुडुकोट्टई ज़िले के थाचनकुरिची गांव में जलीकट्टू 2026 के पहले आयोजन की अनुमति दी है। यह अनुमति पशुपालन, दुग्ध, मत्स्य एवं मछुआ कल्याण विभाग द्वारा जारी अधिसूचना के माध्यम से दी गई है, जिससे राज्य में जलीकट्टू सत्र की औपचारिक शुरुआत होती है।

जलीकट्टू 2026 आयोजन के बारे में

जलीकट्टू आयोजन की अनुमति सरकारी गजट के माध्यम से जारी की गई है। यह आयोजन पुडुकोट्टई ज़िले के थाचनकुरिची गांव में होगा। परंपरागत रूप से हर वर्ष जलीकट्टू सत्र का पहला आयोजन यहीं किया जाता है, जिससे इस गांव को विशेष सांस्कृतिक महत्व प्राप्त है।

कानूनी ढांचा और अनुमति

यह आयोजन पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 (तमिलनाडु संशोधन अधिनियम, 2017) के अंतर्गत स्वीकृत किया गया है। इस संशोधन के तहत जलीकट्टू को एक पारंपरिक खेल के रूप में नियमन के साथ अनुमति दी गई है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि आयोजन के दौरान सभी कानूनी प्रावधानों और न्यायालय द्वारा निर्धारित सुरक्षा उपायों का कड़ाई से पालन किया जाएगा।

सुरक्षा मानक और एसओपी

अधिसूचना के अनुसार जलीकट्टू आयोजन राज्य सरकार तथा पशुपालन एवं पशु चिकित्सा सेवाओं के निदेशक द्वारा निर्धारित मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOP) के अनुसार ही होगा। जिला प्रशासन को भीड़ नियंत्रण, जन सुरक्षा, पशु कल्याण और आपातकालीन प्रबंधन (आपदा प्रबंधन सहित) सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।

पारदर्शिता और ऑनलाइन आवेदन प्रणाली

सरकार ने दोहराया है कि जलीकट्टू एवं अन्य पारंपरिक आयोजनों के लिए आवेदन केवल निर्धारित ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से ही स्वीकार किए जाएंगे। मैनुअल आवेदन मान्य नहीं होंगे। इससे पारदर्शिता, निगरानी और जवाबदेही बढ़ेगी तथा आयोजकों द्वारा सुरक्षा व कल्याण दिशानिर्देशों के पालन को सुनिश्चित किया जा सकेगा।

थाचनकुरिची और पुडुकोट्टई का महत्व

थाचनकुरिची को जलीकट्टू सत्र के पारंपरिक उद्घाटन स्थल के रूप में विशेष सांस्कृतिक पहचान प्राप्त है। पुडुकोट्टई ज़िला तमिलनाडु में सबसे अधिक ‘वाडीवासल’ (वह द्वार जहाँ से सांड छोड़े जाते हैं) के लिए जाना जाता है, जो जलीकट्टू आयोजनों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं।

भागीदारी और पिछले वर्षों के आंकड़े

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 2025 में लगभग 600 सांडों और 350 तामरों (सांड पकड़ने वाले प्रतिभागी) ने भाग लिया था, जबकि 4,500 से अधिक दर्शक मौजूद थे। इस दौरान सांड मालिकों, तामरों, दर्शकों और एक सांड को चोटें आई थीं। 2024 में 700 से अधिक सांडों ने भाग लिया और 22 लोग घायल हुए, जिससे सख्त सुरक्षा उपायों की आवश्यकता रेखांकित होती है।

तमिलनाडु में जलीकट्टू

जलीकट्टू तमिल संस्कृति और फसल उत्सवों, विशेष रूप से पोंगल, से जुड़ा एक पारंपरिक खेल है। वर्षों से यह परंपरा और पशु कल्याण के बीच बहस का विषय रही है। कानूनी चुनौतियों के बाद तमिलनाडु सरकार ने संशोधन कर इसे नियमन और सुरक्षा शर्तों के साथ आयोजित करने की अनुमति दी है।

दिसंबर 2025 में UPI ट्रांजैक्शन बढ़कर 21.63 बिलियन

भारत का डिजिटल भुगतान इकोसिस्टम लगातार तेज़ी से विस्तार कर रहा है। दिसंबर महीने में यूनिफ़ाइड पेमेंट्स इंटरफ़ेस (UPI) के माध्यम से लेन-देन की संख्या और मूल्य—दोनों में मज़बूत वृद्धि दर्ज की गई। ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि व्यक्ति और व्यवसाय नक़द रहित भुगतान पर तेजी से निर्भर हो रहे हैं, जिससे रियल-टाइम डिजिटल भुगतान प्रणालियों में भारत की वैश्विक अग्रणी स्थिति और सुदृढ़ हुई है।

समाचार में क्यों?

नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया (NPCI) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर में UPI लेन-देन की मात्रा साल-दर-साल 29% बढ़कर 21.63 अरब (बिलियन) लेन-देन तक पहुंच गई। लेन-देन का मूल्य और दैनिक उपयोग भी उल्लेखनीय रूप से बढ़ा, जो देशभर में डिजिटल भुगतान अपनाने की निरंतर वृद्धि को दर्शाता है।

दिसंबर में प्रमुख वृद्धि बिंदु

  • UPI लेन-देन 21.63 अरब तक पहुंचे — वार्षिक आधार पर 29% की तेज़ बढ़ोतरी
  • लेन-देन का कुल मूल्य साल-दर-साल 20% बढ़कर लगभग ₹28 लाख करोड़
  • मासिक आधार पर भी मात्रा और मूल्य—दोनों में स्वस्थ वृद्धि, जो एकमुश्त उछाल नहीं बल्कि स्थायी उपयोग को दर्शाती है

दैनिक लेन-देन रुझान

  • दिसंबर में औसत दैनिक लेन-देन मूल्य लगभग ₹90,217 करोड़, जो नवंबर 2025 के ₹87,721 करोड़ से अधिक है
  • औसत दैनिक लेन-देन संख्या बढ़कर 698 मिलियन, जबकि नवंबर में यह 682 मिलियन थी
  • ये आंकड़े दर्शाते हैं कि UPI बड़े पैमाने पर उच्च-आवृत्ति (हर रोज़) भुगतान संभालने में सक्षम है

UPI के साथ IMPS का प्रदर्शन

  • इमीडिएट पेमेंट सर्विस (IMPS) में भी वृद्धि दर्ज
  • दिसंबर में IMPS लेन-देन मूल्य ₹6.62 लाख करोड़, सालाना 10% की बढ़ोतरी
  • लेन-देन संख्या 380 मिलियन, जो नवंबर के 369 मिलियन से अधिक है
  • यह त्वरित बैंक ट्रांसफर की स्थिर मांग को दर्शाता है

वृद्धि का महत्व

  • शहरी और ग्रामीण—दोनों भारत में डिजिटल अपनाने की गहराई बढ़ रही है
  • कम-नक़द अर्थव्यवस्था के सरकारी लक्ष्यों को समर्थन, पारदर्शिता में सुधार और नक़दी पर निर्भरता में कमी
  • व्यवसायों के लिए तेज़ सेटलमेंट और कम लेन-देन लागत से दक्षता और आर्थिक गतिविधि में वृद्धि

UPI क्या है?

यूनिफ़ाइड पेमेंट्स इंटरफ़ेस (UPI) एक रियल-टाइम भुगतान प्रणाली है, जो मोबाइल फ़ोन के माध्यम से बैंक खातों के बीच तुरंत धन हस्तांतरण की सुविधा देती है।
NPCI द्वारा विकसित UPI, पीयर-टू-पीयर और मर्चेंट लेन-देन को आसान, कम लागत और उच्च सुरक्षा के साथ सक्षम बनाता है। यह भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था और वित्तीय समावेशन प्रयासों की रीढ़ बन चुका है।

 

दिसंबर 2025 में GST कलेक्शन 6.1% बढ़कर ₹1.75 लाख करोड़

भारत के वस्तु एवं सेवा कर (GST) राजस्व में दिसंबर महीने में भी निरंतर वृद्धि दर्ज की गई है, जो स्थिर आर्थिक गतिविधियों और बेहतर कर अनुपालन को दर्शाती है। जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, जीएसटी संग्रह में पिछले वर्ष की तुलना में 6% से अधिक की वृद्धि हुई है, जिससे सरकारी वित्त को मजबूती मिली है। जीएसटी प्राप्तियों में यह निरंतर बढ़ोतरी भारत की अप्रत्यक्ष कर प्रणाली की बढ़ती परिपक्वता और दरों के सरलीकरण व ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस को बढ़ावा देने वाले हालिया कर सुधारों के प्रभाव को दर्शाती है।

समाचार में क्यों?

दिसंबर में सकल जीएसटी संग्रह साल-दर-साल आधार पर 6.1% बढ़कर लगभग ₹1.75 लाख करोड़ हो गया। नवीनतम आंकड़े यह भी दर्शाते हैं कि अप्रैल–दिसंबर FY26 के दौरान संचयी जीएसटी संग्रह में मजबूत वृद्धि हुई है, जो जीएसटी व्यवस्था के तहत स्थिर राजस्व प्रदर्शन और बेहतर अनुपालन का संकेत है।

दिसंबर के जीएसटी आंकड़े क्या बताते हैं?

  • दिसंबर में कुल जीएसटी संग्रह: ₹1.75 लाख करोड़, जबकि पिछले वर्ष यह लगभग ₹1.64 लाख करोड़ था
  • CGST और SGST संग्रह में वृद्धि दर्ज की गई
  • IGST संग्रह में दिसंबर में साल-दर-साल आधार पर गिरावट रही
  • घटकों में मासिक उतार-चढ़ाव के बावजूद समग्र रुझान सकारात्मक बना हुआ है
  • FY26 में अब तक का जीएसटी प्रदर्शन (अप्रैल–दिसंबर)

सकल जीएसटी संग्रह में 8.6% की वार्षिक वृद्धि

  • कुल संग्रह लगभग ₹16.5 लाख करोड़, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में ₹15.2 लाख करोड़ था
  • CGST, SGST और IGST—तीनों प्रमुख घटकों में वृद्धि दर्ज
  • यह चालू वित्त वर्ष में स्थिर राजस्व संग्रह को दर्शाता है

हाल के वर्षों में रिकॉर्ड जीएसटी संग्रह

  • FY25 में अब तक का सर्वाधिक जीएसटी संग्रह: ₹22.08 लाख करोड़ (9.4% वृद्धि)
  • FY25 में औसत मासिक जीएसटी संग्रह: ₹1.84 लाख करोड़ (2017 में जीएसटी लागू होने के बाद सर्वाधिक)
  • जीएसटी राजस्व FY21 के ₹11.37 लाख करोड़ से बढ़कर FY24 में ₹20.18 लाख करोड़ हो गया

जीएसटी परिषद की भूमिका

  • संविधान के तहत 2016 में स्थापित
  • अध्यक्ष: केंद्रीय वित्त मंत्री
  • सदस्य: राज्य वित्त मंत्री और वरिष्ठ अधिकारी
  • अब तक 56 बैठकें आयोजित
  • कर दरों के सरलीकरण और अनुपालन सुधार पर फोकस

हालिया जीएसटी सुधार और दर युक्तिकरण

सितंबर 2025 में अगली पीढ़ी के जीएसटी सुधारों की घोषणा की गई:

जीएसटी संरचना को चार स्लैब (5%, 12%, 18%, 28%) से घटाकर तीन किया गया—

  • 5% (मेरिट रेट)
  • 18% (स्टैंडर्ड रेट)
  • 40% (चयनित लग्ज़री और ‘सिन’ वस्तुओं के लिए विशेष दर)

उद्देश्य: जीएसटी को सरल बनाना, विवाद कम करना और प्रणाली को अधिक व्यवसाय-अनुकूल बनाना

एयर मार्शल नागेश कपूर ने भारतीय वायु सेना के उप प्रमुख का पदभार संभाला

भारतीय वायु सेना (IAF) में एक महत्वपूर्ण नेतृत्व परिवर्तन हुआ है, जिसमें एयर मार्शल नागेश कपूर ने वाइस चीफ ऑफ द एयर स्टाफ का पद संभाला। लगभग 40 वर्षों की उत्कृष्ट सेवा के साथ, वे गहन संचालन, प्रशिक्षण और रणनीतिक अनुभव लाते हैं। उनकी नियुक्ति उस समय वायु सेना के शीर्ष नेतृत्व को मजबूत करती है, जब बल प्रशिक्षण आधुनिकीकरण, हवाई रक्षा तैयारी और परिचालन तत्परता पर केंद्रित है।

समाचार में क्यों?

एयर मार्शल नागेश कपूर ने 1 जनवरी 2026 को भारतीय वायु सेना के वाइस चीफ ऑफ द एयर स्टाफ के रूप में पद संभाला। वे एयर मार्शल नार्मदेश्वर तिवारी का स्थान ले रहे हैं, जो 40 वर्षों की सेवा पूरी करने के बाद सेवानिवृत्त हुए।

एयर मार्शल नागेश कपूर के बारे में

एयर मार्शल नागेश कपूर भारतीय वायु सेना के वरिष्ठ फाइटर पायलट अधिकारी हैं, जिनके पास कमांड, संचालन, प्रशिक्षण और स्टाफ भूमिकाओं में व्यापक अनुभव है। वे फाइटर ऑपरेशंस, प्रशिक्षण सुधार और प्रमुख वायु कमांड में नेतृत्व के लिए जाने जाते हैं।

करियर पृष्ठभूमि

  • राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) के पूर्व छात्र
  • 6 दिसंबर 1986 को IAF के फाइटर स्ट्रीम में कमीशन
  • NDA से दिसंबर 1985 में स्नातक
  • भारतीय वायु सेना में 39 से अधिक वर्षों की सेवा

संचालन और कमांड अनुभव

  • केंद्रीय क्षेत्र में फाइटर स्क्वाड्रन के कमांडिंग ऑफिसर
  • पश्चिमी क्षेत्र में उड़ान बेस के स्टेशन कमांडर
  • प्रमुख वायु आधार के एयर ऑफिसर कमांडिंग
  • साउथ वेस्टर्न एयर कमांड में एयर डिफेंस कमांडर
  • सेंट्रल एयर कमांड में वरिष्ठ एयर स्टाफ ऑफिसर
  • MiG-21 और MiG-29 के सभी संस्करण उड़ाए; 3,400+ उड़ान घंटे

प्रशिक्षण और शैक्षणिक भूमिका

  • एयर फोर्स अकादमी में चीफ इंस्ट्रक्टर (फ्लाइंग)
  • डिफेंस सर्विसेस स्टाफ कॉलेज, वेलिंगटन में डायरेक्टिंग स्टाफ
  • PC-7 Mk II ट्रेनर विमान के IAF में परिचय और परिचालन में प्रमुख भूमिका
  • इन भूमिकाओं से पायलट प्रशिक्षण और मानव संसाधन विकास में योगदान प्रदर्शित होता है।

पुरस्कार और सम्मान

  • वायु सेना पदक (Vayu Sena Medal – VM) – 2008
  • अति विशिष्ट सेवा पदक (Ati Vishisht Seva Medal – AVSM) – 2022
  • परम विशिष्ट सेवा पदक (Param Vishisht Seva Medal – PVSM) – 2025
  • सर्वोत्तम युद्ध सेवा पदक (Sarvottam Yudh Seva Medal – SYSM) – 2025

भारत और पाकिस्तान ने परमाणु सुविधाओं की जानकारी का आदान-प्रदान पूरा किया

भारत और पाकिस्तान ने परमाणु सुरक्षा से संबंधित एक महत्वपूर्ण राजनयिक परंपरा को जारी रखा है। दोनों देशों ने अपने-अपने परमाणु प्रतिष्ठानों और सुविधाओं की सूची आधिकारिक राजनयिक चैनलों के माध्यम से आदान-प्रदान की। यह कदम एक स्थापित विश्वास निर्माण तंत्र को दर्शाता है, जिसका उद्देश्य जोखिम को कम करना और दक्षिण एशिया में रणनीतिक स्थिरता बनाए रखना है।

समाचार में क्यों?

भारत और पाकिस्तान ने 1 जनवरी को अपने परमाणु प्रतिष्ठानों की सूचियाँ आदान-प्रदान कीं, जैसा कि द्विपक्षीय समझौते के तहत अनिवार्य है। यह आदान-प्रदान नई दिल्ली और इस्लामाबाद में एक साथ किया गया, और यह समझौते का 35वां लगातार वर्ष है, जिसका उद्देश्य परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमले को रोकना है।

समझौते के बारे में

  • यह आदान-प्रदान “परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमला निषेध” (Agreement on the Prohibition of Attack against Nuclear Installations and Facilities) समझौते के तहत किया जाता है।
  • समझौता 31 दिसंबर 1988 को हस्ताक्षरित हुआ और 27 जनवरी 1991 को लागू हुआ।
  • यह दोनों देशों को यह सुनिश्चित करने का दायित्व देता है कि वे हर साल एक-दूसरे को अपने परमाणु प्रतिष्ठानों और सुविधाओं की जानकारी दें।

समझौते की मुख्य विशेषताएँ

  • यह समझौता किसी भी देश को परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमला करने या हमले में सहायता करने से रोकता है।
  • दोनों पक्षों को हर वर्ष 1 जनवरी को इन प्रतिष्ठानों की अद्यतन सूची का आदान-प्रदान करना अनिवार्य है।
  • यह तंत्र नागरिक और सामरिक दोनों प्रकार के परमाणु प्रतिष्ठानों पर लागू होता है, जिससे तनाव के समय गलतफहमी और गलत गणना की संभावना कम होती है।

2025 का आदान-प्रदान विवरण

  • नवीनतम आदान-प्रदान नई दिल्ली और इस्लामाबाद में एक साथ राजनयिक चैनलों के माध्यम से किया गया।
  • विदेश मंत्रालय के अनुसार, यह लगातार 35वां आदान-प्रदान है, जिसका पहला आदान-प्रदान 1 जनवरी 1992 को हुआ था।
  • इस निरंतरता से यह दर्शाता है कि दोनों देश परमाणु विश्वास निर्माण उपायों का पालन कर रहे हैं।

द्विपक्षीय संबंधों के लिए महत्व

  • राजनीतिक तनाव के बावजूद, यह वार्षिक आदान-प्रदान यह दर्शाता है कि दोनों देश सुरक्षा से संबंधित महत्वपूर्ण समझौतों का सम्मान करते हैं।
  • यह रणनीतिक संयम बनाए रखने, आकस्मिक तनाव को कम करने और क्षेत्रीय परमाणु स्थिरता सुनिश्चित करने में मदद करता है।
  • दोनों देशों के परमाणु-शस्त्र सम्पन्न होने के कारण ऐसे तंत्र विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।

भारत–पाकिस्तान परमाणु CBMs

  • विश्वास निर्माण उपाय (CBMs) प्रतिद्वंद्वी देशों के बीच अविश्वास को कम करने के कदम हैं।
  • भारत और पाकिस्तान के कई परमाणु CBMs हैं, जैसे बैलिस्टिक मिसाइल परीक्षणों की पूर्व सूचना और सैन्य अधिकारियों के बीच हॉटलाइन संचार।
  • परमाणु प्रतिष्ठानों की सूची का आदान-प्रदान दोनों देशों के बीच सबसे पुराने और लगातार अपनाए जाने वाले CBMs में से एक है।

“परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमला निषेध” के बारे में

  • हस्ताक्षर: 31 दिसंबर 1988 (पाकिस्तानी पीएम बेनजीर भुट्टो और भारतीय पीएम राजीव गांधी द्वारा)
  • लागू: 27 जनवरी 1991
  • भाषाएँ: प्रत्येक की दो प्रतियाँ – उर्दू और हिंदी

समझौते की आवश्यकता

  • 1986 में भारत ने ‘ब्रासटैक्स’ सैन्य अभ्यास किया, जिससे परमाणु प्रतिष्ठानों पर संभावित हमले का डर उत्पन्न हुआ।
  • इसके बाद भारत और पाकिस्तान ने परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमलों को रोकने के लिए बातचीत शुरू की, जिससे यह संधि बनी।

मुख्य प्रावधान

  • दोनों देशों को हर वर्ष 1 जनवरी को अपने परमाणु प्रतिष्ठानों और सुविधाओं की जानकारी एक-दूसरे को देनी होगी।
  • यह विश्वास निर्माण उपाय के रूप में कार्य करता है और हमलों के जोखिम को कम करता है।

अमेज़न की बिना डंक वाली मधुमक्खियों को मिली कानूनी मान्यता

विश्व में पहली बार किसी कीट प्रजाति को कानूनी अधिकार प्राप्त हुए हैं। पेरू की दो नगरपालिकाओं ने आधिकारिक तौर पर अमेज़ॅन की डंकरहित मधुमक्खियों के अधिकारों को मान्यता दी है। ये मधुमक्खियां परागण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और लाखों वर्षों से उष्णकटिबंधीय वनों का पोषण करती आ रही हैं। यह निर्णय अधिकारों पर आधारित संरक्षण और पारिस्थितिकी तंत्र तथा स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों के लिए मजबूत सुरक्षा की दिशा में बढ़ते वैश्विक रुझान को दर्शाता है।

खबरों में क्यों?

पेरू के दो नगर पालिकाओं, सैटिपो और नौटा ने अमेज़ॅन की डंक रहित मधुमक्खियों को कानूनी अधिकार प्रदान करने वाला एक अध्यादेश पारित किया है, जिससे वे विश्व स्तर पर इस तरह की मान्यता प्राप्त करने वाले पहले कीट बन गए हैं। इस कदम का उद्देश्य उन्हें वनों की कटाई, जलवायु परिवर्तन और आवास के नुकसान से बचाना है।

बिना डंक वाली मधुमक्खियाँ क्या होती हैं?

डंक रहित मधुमक्खियाँ मधुमक्खियों का एक समूह हैं जिनमें या तो डंक नहीं होते हैं या उनके डंक गंभीर दर्द पैदा नहीं कर सकते हैं।

  • ये मुख्यतः उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
  • विश्वभर में लगभग 500 प्रजातियाँ मौजूद हैं।
  • लगभग आधे लोग अमेज़न वर्षावन में रहते हैं।
  • अकेले पेरू में ही 170 से अधिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं।

ये डायनासोर युग से लगभग 8 करोड़ वर्षों से अस्तित्व में हैं।

डंक रहित मधुमक्खियाँ क्यों महत्वपूर्ण हैं?

  • डंक रहित मधुमक्खियाँ उष्णकटिबंधीय पारिस्थितिक तंत्रों में सबसे महत्वपूर्ण परागणकर्ताओं में से हैं।
  • वे अमेज़न वर्षावन के 80% से अधिक पौधों का परागण करते हैं।
  • कोको, कॉफी और एवोकाडो जैसी प्रमुख फसलों का समर्थन करें
  • वन जैव विविधता और खाद्य श्रृंखलाओं को बनाए रखने में मदद करें
  • उनके शहद में सूजनरोधी, जीवाणुरोधी और विषाणुरोधी गुण होते हैं।
  • इनके बिना, वन और खाद्य सुरक्षा दोनों खतरे में पड़ जाएंगे।

स्वदेशी समुदायों के लिए सांस्कृतिक महत्व

डंक रहित मधुमक्खियाँ अशानिका और कुकामा-कुकामिरिया जैसी स्वदेशी समुदायों के जीवन से गहराई से जुड़ी हुई हैं।

  • उनके शहद का उपयोग पारंपरिक औषधि के रूप में किया जाता है।
  • मधुमक्खियाँ आध्यात्मिक मान्यताओं और पूर्वजों के ज्ञान का हिस्सा हैं।
  • स्वदेशी संस्कृति और वन स्वास्थ्य आपस में घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं।
  • इस सांस्कृतिक जुड़ाव ने नए अध्यादेश को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

डंक रहित मधुमक्खियों को होने वाले खतरे

अपनी महत्ता के बावजूद, डंक रहित मधुमक्खियाँ गंभीर खतरों का सामना कर रही हैं।

  • अवैध रूप से पेड़ों की कटाई, खेती और पशु चराई के कारण वनों की कटाई
  • वन में लगने वाली आग की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि हो रही है।
  • जलवायु परिवर्तन के कारण मधुमक्खियों को अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
  • आदिवासी बस्तियों के निकट पारंपरिक आवासों का नुकसान
  • समुदायों का कहना है कि अब मधुमक्खियों को ढूंढना पहले से कहीं ज्यादा मुश्किल हो गया है।

कानूनी अधिकार प्रदान करने का क्या अर्थ है?

यह नया अध्यादेश पेरू के 2024 के राष्ट्रीय कानून पर आधारित है, जिसमें बिना डंक वाली मधुमक्खियों को एक देशी प्रजाति के रूप में मान्यता दी गई थी।

मधुमक्खियों को अब निम्नलिखित अधिकार दिए गए हैं:

  • अस्तित्व और जीवन जीने का अधिकार
  • स्वस्थ और स्थिर जनसंख्या का अधिकार
  • पर्यावास बहाली का अधिकार
  • प्रदूषण मुक्त वातावरण में रहने का अधिकार

ये अधिकार अधिकारियों को कानूनी रूप से इन अधिकारों की रक्षा और संरक्षण के लिए बाध्य करते हैं।

प्रकृति के अधिकारों की अवधारणा

  • प्रकृति को कानूनी अधिकार प्रदान करने का विचार पारिस्थितिक तंत्रों या प्रजातियों को कानूनी संस्थाओं के रूप में मानने की अनुमति देता है।
  • इस पद्धति को कुछ देशों में नदियों, जंगलों और पहाड़ों पर पहले ही लागू किया जा चुका है।
  • इसे कीटों तक विस्तारित करना पर्यावरण कानून में एक नया कदम है।

मुख्य डेटा का संक्षिप्त विवरण

पहलू विवरण
खबरों में क्यों? पेरू में बिना डंक वाली मधुमक्खियों को कानूनी अधिकार दिए गए
प्रजातियाँ अमेज़ॅन की बिना डंक वाली मधुमक्खियाँ
जगह पेरू (अमेज़ॅन क्षेत्र)
महत्त्व महत्त्व
मुख्य खतरे वनों की कटाई, आग, जलवायु परिवर्तन
कानूनी अधिकार अस्तित्व, आवास, प्रदूषण मुक्त वातावरण

प्रश्न-उत्तर

प्रश्न: अमेज़ॅन की बिना डंक वाली मधुमक्खियों को किस देश में कानूनी अधिकार दिए गए थे?

ए. ब्राजील
बी. कोलंबिया
सी. पेरू
डी. इक्वाडोर

गोवा को मिलेगा तीसरा जिला: मुख्यालय क्यूपेम में होगा

गोवा में प्रशासनिक ढांचे में एक महत्वपूर्ण बदलाव होने जा रहा है। राज्य सरकार ने तीसरे जिले के गठन का निर्णय लिया है, जिसका उद्देश्य शासन को लोगों के और अधिक नज़दीक लाना है। यह नया जिला दक्षिण गोवा से अलग किया जाएगा और इसका मुख्यालय क्यूपेम में होगा। इस पहल का फोकस बेहतर प्रशासन, सेवा वितरण और आंतरिक क्षेत्रों के विकास पर रहेगा।

खबरों में क्यों?

गोवा सरकार ने दक्षिण गोवा के चार तालुकाओं को मिलाकर तीसरे जिले के गठन की घोषणा की है। यह निर्णय पहले ही कैबिनेट द्वारा स्वीकृत किया जा चुका है। इसका उद्देश्य प्रशासनिक दक्षता बढ़ाना, क्षेत्रीय विकास को गति देना और बेहतर शासन के लिए छोटे जिलों की सिफारिशों के अनुरूप कदम उठाना है।

नए जिले की प्रमुख विशेषताएँ

  • प्रस्तावित तीसरे जिले में सांगुएम, धारबंदोरा, क्यूपेम और कनाकोना तालुके शामिल होंगे।
  • ये सभी तालुके वर्तमान में दक्षिण गोवा जिले का हिस्सा हैं और अधिकतर आंतरिक व अर्ध-ग्रामीण क्षेत्र हैं।
  • जिला मुख्यालय क्यूपेम में होगा, जिससे दक्षिणी और आंतरिक गोवा के निवासियों को प्रशासनिक सेवाएँ अधिक सुलभ होंगी।

गोवा की वर्तमान प्रशासनिक संरचना

वर्तमान में गोवा में दो जिले हैं—

  • उत्तर गोवा: बारदेज़, तिसवाड़ी, पेरनेम, बिचोलिम और सत्तारी
  • दक्षिण गोवा: पोंडा, मोरमुगाओ, साल्सेट, सांगुएम, धारबंदोरा, क्यूपेम और कनाकोना

पुनर्गठन के बाद, दक्षिण गोवा में पोंडा, साल्सेट और मोरमुगाओ बने रहेंगे, जबकि शेष चार तालुके नए जिले का गठन करेंगे।

निर्णय प्रक्रिया और सरकार का तर्क

  • मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने बताया कि कैबिनेट का निर्णय विभिन्न दलों के विधायकों से विचार-विमर्श के बाद लिया गया।

  • NITI आयोग की सिफारिशों के अनुसार छोटे जिले बनाकर शासन को अधिक प्रभावी और लोगों के करीब लाया जा सकता है।

सरकारी समिति की भूमिका

  • नवंबर 2023 में गोवा सरकार ने मुख्य सचिव की अध्यक्षता में 7 सदस्यीय समिति का गठन किया।
  • समिति ने जनसंख्या वृद्धि, अवसंरचना, आर्थिक स्थिति, भूगोल और जनमत का अध्ययन किया।
  • विशेष रूप से पिछड़े और आदिवासी बहुल तालुकाओं के विकास पर प्रभाव तथा प्रशासनिक व वित्तीय निहितार्थों का आकलन किया गया।

विकासात्मक महत्व

  • समिति ने माना कि प्रस्तावित जिला आकांक्षी जिला कार्यक्रम के मानदंडों को पूरा करता है।
  • इससे स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, जल आपूर्ति, अवसंरचना और वित्तीय समावेशन जैसे क्षेत्रों में केंद्रीय सहायता मिलने की संभावना बढ़ेगी।
  • सरकार का मानना है कि दीर्घकालिक विकास लाभ, प्रारंभिक प्रशासनिक लागत से कहीं अधिक होंगे।

एक नज़र में मुख्य तथ्य

पहलू विवरण
ख़बरों में क्यों? गोवा ने तीसरे जिले के गठन की घोषणा की
नए जिले का मुख्यालय क्यूपेम
शामिल तालुके सांगुएम, धारबंदोरा, क्यूपेम, कनाकोना
किस जिले से अलग किया गया दक्षिण गोवा
प्रमुख उद्देश्य बेहतर शासन और क्षेत्रीय विकास

प्रश्न

Q. गोवा के प्रस्तावित तीसरे जिले का मुख्यालय कहाँ होगा?

A) पणजी
B) मडगांव
C) क्यूपेम
D) वास्को

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