EPFO से जुड़कर South Indian Bank ने शुरू की EPF पेमेंट सर्विस

साउथ इंडियन बैंक (South Indian Bank) ने कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (Employees’ Provident Fund Organisation) के सहयोग से नई EPF भुगतान सेवा शुरू की है। इस सेवा के माध्यम से नियोक्ता अब कर्मचारियों के भविष्य निधि (EPF) अंशदान का भुगतान सीधे बैंक के इंटरनेट बैंकिंग प्लेटफॉर्म SIBerNet के जरिए कर सकेंगे, जिससे वैधानिक भुगतान अधिक तेज़ और सुविधाजनक हो जाएगा। इस पहल की घोषणा 12 मार्च 2026 को की गई, जो बैंक की डिजिटल बैंकिंग सेवाओं के विस्तार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

SIBerNet के माध्यम से South Indian Bank EPF भुगतान सेवा

नई शुरू की गई EPF भुगतान सेवा के तहत व्यवसाय अब बैंक के SIBerNet इंटरनेट बैंकिंग प्लेटफॉर्म के माध्यम से वैधानिक EPF भुगतान आसानी से कर सकते हैं। यह इंटीग्रेशन बैंक की डिजिटल बैंकिंग प्रणाली को सीधे कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (Employees’ Provident Fund Organisation) के सिस्टम से जोड़ता है। इसके परिणामस्वरूप नियोक्ता अब अलग-अलग मैनुअल प्रक्रियाओं या अतिरिक्त भुगतान चैनलों के बिना ही ऑनलाइन आसानी से EPF भुगतान कर सकते हैं। यह प्रणाली व्यवसायों को EPF अंशदान जल्दी ट्रांसफर करने और नियामकीय आवश्यकताओं का पालन करने में मदद करती है।

नियोक्ताओं के लिए EPF भुगतान सेवा के लाभ

इस नई सेवा से पूरे भारत में नियोक्ताओं के लिए अनुपालन प्रक्रिया काफी आसान हो जाएगी। जिन व्यवसायों के खाते साउथ इंडियन बैंक में हैं, वे अब एक ही डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से अपने वैधानिक भुगतान प्रबंधित कर सकते हैं। इस प्रणाली के प्रमुख लाभ इस प्रकार हैं—

  • इंटरनेट बैंकिंग के माध्यम से सीधे EPF अंशदान का भुगतान
  • EPFO पोर्टल के जरिए तेज़ और सुरक्षित लेनदेन
  • नियोक्ताओं के लिए सरल वैधानिक अनुपालन
  • कागजी कार्यवाही और मैनुअल हस्तक्षेप में कमी

साउथ इंडियन बैंक EPF भुगतान प्रणाली कैसे काम करती है

साउथ इंडियन बैंक और कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के बीच इंटीग्रेशन पूरा होने के बाद नियोक्ता EPFO पोर्टल पर जाकर साउथ इंडियन बैंक के नेट बैंकिंग विकल्प का चयन कर भुगतान कर सकते हैं। इस प्रक्रिया के तहत वे मासिक EPF अंशदान, लंबित बकाया राशि तथा रेमिटेंस शुल्क जैसे संबंधित भुगतान आसानी से ऑनलाइन ट्रांसफर कर सकते हैं।

चेन्नई के ICF में अंतरराष्ट्रीय रेल कोच एक्सपो 2026 का शुभारंभ

अंतरराष्ट्रीय रेल कोच एक्सपो 2026  (International Rail Coach Expo 2026) का उद्घाटन 12 मार्च 2026 को इंटीग्रल कोच फैक्ट्री के परिसर में, चेन्नई में किया गया। इस कार्यक्रम का उद्घाटन ICF के महाप्रबंधक यू. सुब्बा राव ने किया। यह एक्सपो इंटीग्रल कोच फैक्ट्री द्वारा भारतीय उद्योग परिसंघ के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है। यह प्रदर्शनी 12 से 14 मार्च 2026 तक आयोजित होगी, जिसमें भारत और विदेशों से रेलवे निर्माता, प्रौद्योगिकी प्रदाता तथा उद्योग विशेषज्ञ भाग लेकर रेलवे क्षेत्र में नवीन तकनीकों और नवाचारों का प्रदर्शन करेंगे।

अंतरराष्ट्रीय रेल कोच एक्सपो (IRCE) के बारे में

अंतरराष्ट्रीय रेल कोच एक्सपो (IRCE) रेलवे कोच निर्माण और रेल प्रौद्योगिकी में नवाचारों को प्रदर्शित करने वाला एक महत्वपूर्ण मंच है। इस एक्सपो का उद्देश्य उन्नत रेल कोच डिज़ाइन, टिकाऊ रेल परिवहन समाधान, रेलवे क्षेत्र में स्वदेशी विनिर्माण को बढ़ावा देना तथा वैश्विक और भारतीय कंपनियों के बीच सहयोग को मजबूत करना है। इस कार्यक्रम का आयोजन पहले वर्ष 2018 में किया गया था और तब से यह रेलवे उद्योग से जुड़े हितधारकों के लिए एक प्रमुख वैश्विक मंच बन गया है।

IRCE 2026 के मुख्य क्षेत्र

International Rail Coach Expo 2026 में रेलवे परिवहन के भविष्य को आकार देने वाले कई प्रमुख विषयों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इस प्रदर्शनी में सस्टेनेबिलिटी से जुड़ी तकनीकों को प्रस्तुत किया जा रहा है, जो पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने और हरित रेलवे प्रणाली को बढ़ावा देने पर केंद्रित हैं। इसके साथ ही सुरक्षा के क्षेत्र में ट्रेन संचालन को सुरक्षित बनाने के लिए उन्नत सुरक्षा प्रणालियाँ और स्मार्ट मॉनिटरिंग तकनीकों का प्रदर्शन किया जा रहा है।

IRCE 2026 के उद्देश्य

इस एक्सपो का एक प्रमुख उद्देश्य रेलवे क्षेत्र में “Make in India” के तहत स्वदेशी विकास को बढ़ावा देना भी है, जिससे घरेलू नवाचार और उत्पादन को प्रोत्साहन मिले। इसके अलावा उद्योग विशेषज्ञ रेलवे कोचों की गुणवत्ता, टिकाऊपन और दक्षता बढ़ाने के लिए आधुनिक समाधानों को भी प्रस्तुत कर रहे हैं।

विश्व की सबसे बड़ी रेलवे कोच

Integral Coach Factory विश्व की सबसे बड़ी रेलवे कोच निर्माण इकाइयों में से एक है। यह संस्था यात्री कोचों के डिजाइन और निर्माण, आधुनिक ट्रेन प्रौद्योगिकियों के विकास तथा भारत के रेलवे आधुनिकीकरण प्रयासों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ICF को विशेष रूप से Vande Bharat Express ट्रेन सेटों के निर्माण के लिए भी जाना जाता है, जो स्वदेशी ट्रेन निर्माण में भारत की प्रगति को दर्शाते हैं।

रेलवे उद्योग से जुड़े हितधारकों के बीच नेटवर्किंग को बढ़ावा

यह एक्सपो रेलवे उद्योग से जुड़े हितधारकों के बीच नेटवर्किंग को बढ़ावा देने, आधुनिक रेल प्रौद्योगिकियों के प्रदर्शन, वैश्विक सहयोग को प्रोत्साहित करने और रेलवे निर्माण के क्षेत्र में भारत की स्थिति को मजबूत करने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करता है। यह कार्यक्रम देश में आधुनिक और तकनीकी रूप से उन्नत रेलवे अवसंरचना विकसित करने की व्यापक दृष्टि का भी समर्थन करता है।

PM Kisan 22वीं किस्त जारी: करोड़ों किसानों को मिला लाभ

प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (Pradhan Mantri Kisan Samman Nidhi) की 22वीं किस्त जारी कर दी गई है, जिसके तहत देशभर के लाखों किसानों को वित्तीय सहायता प्रदान की गई है। इस किस्त के अंतर्गत पात्र किसानों के बैंक खातों में ₹2,000 की राशि सीधे DBT (Direct Benefit Transfer) के माध्यम से भेजी गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुवाहाटी से इस किस्त को जारी किया, जिससे देश के 9 करोड़ से अधिक किसान परिवारों को लाभ मिला। इस किस्त के तहत किसानों को समर्थन देने के लिए सरकार ने ₹18,600 करोड़ से अधिक की राशि हस्तांतरित की है।

क्या है पीएम किसान सम्मान निधि योजना?

प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि एक केंद्रीय सरकारी योजना है, जिसे फरवरी 2019 में किसानों को वित्तीय सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से शुरू किया गया था। इस योजना के तहत पात्र किसानों को प्रति वर्ष ₹6,000 की आर्थिक सहायता दी जाती है। यह राशि ₹2,000 की तीन समान किस्तों में प्रदान की जाती है और DBT (Direct Benefit Transfer) के माध्यम से सीधे किसानों के बैंक खातों में भेजी जाती है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य किसानों को कृषि कार्यों और घरेलू खर्चों को पूरा करने में आर्थिक सहयोग देना है।

कितने किसानों को मिलेगा 22वीं किस्त का लाभ?

सरकार डीबीटी के माध्यम से पात्र किसानों के बैंक खाते में 2-2 हजार रुपये हस्तांतरित करेगी। सरकार की तरफ से योजना की आधिकारिक वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक, 22वीं किस्त का लाभ 9 करोड़ 32 लाख से अधिक पात्र किसानों को मिलेगा। केंद्र सरकार द्वारा जारी की गई ये राशि लाभार्थियों के बैंक खाते में डीबीटी के माध्यम से भेजे जाते हैं।

इससे पहले का किस्त

फरवरी 2025 में 22 हजार करोड़ रुपये की 19वीं किस्त 9.8 करोड़ किसानों को जारी की गई थी। अगस्त 2025 में 20,500 करोड़ रुपये की 20वीं किस्त 9.7 करोड़ किसानों को और नवंबर 2025 में 18 हजार करोड़ रुपये की 21वीं किस्त नौ करोड़ किसानों को जारी की गई थी।

इतने करोड़ अब तक किसानों के मिले हैं 

केंद्रीय कृषि मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में फरवरी 2019 में योजना शुरू होने के बाद से अब तक पीएम‑किसान के अंतर्गत पात्र किसान परिवारों के खातों में 4.09 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि सीधे भेजी जा चुकी है और 22वीं किस्त जारी होने के साथ ही कुल हस्तांतरित राशि 4.27 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो जाएगी।

तीन समान किस्तों में मिलती है राशि

बता दें कि पीएम‑किसान योजना के तहत हर पात्र किसान परिवार को साल में 6,000 रुपये की वित्तीय सहायता तीन समान किस्तों में दी जाती है और यह राशि पूरी तरह डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के माध्यम से किसानों के बैंक खातों में सीधे पहुंचती है। यह सहायता किसानों को बीज, खाद, कीटनाशक जैसी कृषि सामग्री खरीदने में मदद करती है।

OBC क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सिर्फ आय से तय नहीं होगी आरक्षण पात्रता

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए आरक्षण में क्रीमी लेयर के निर्धारण में माता-पिता के पद और उनके सामाजिक-प्रशासनिक दर्जे को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। अदालत ने केंद्र सरकार की अपीलों को खारिज करते हुए कई UPSC उम्मीदवारों को राहत दी, जिन्हें गलत तरीके से OBC क्रीमी लेयर मानकर नियुक्ति से रोक दिया गया था।

अदालत ने स्पष्ट किया कि माता-पिता की आय मात्र को क्रीमी लेयर निर्धारित करने का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता। क्रीमी लेयर का निर्धारण करते समय संबंधित प्राधिकरणों को माता-पिता की नौकरी का प्रकार, सामाजिक स्थिति और उनके पद जैसे अन्य कारकों को भी ध्यान में रखना होगा। इस निर्णय का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि OBC समुदाय के भीतर वास्तव में वंचित और पिछड़े वर्गों तक ही आरक्षण का लाभ पहुँचे।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

ओबीसी क्रीमीलेयर का दर्जा तय किए जाने के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि ओबीसी क्रीमीलेयर का दर्जा केवल उम्मीदवार के माता-पिता के वेतन से होने वाली आय के आधार पर तय नहीं हो सकता। उम्मीदवार के माता-पिता की स्थिति और पद की श्रेणी दोनों महत्वपूर्ण हैं। उनके स्टेटस और सेवा श्रेणी पर विचार किए बिना केवल उनकी आय के आधार पर ओबीसी आरक्षण के लिए क्रीमी लेयर का दर्जा निर्धारित नहीं किया जा सकता।

शीर्ष अदालत ने दिए फैसले में कहा कि 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम (कार्यालय ज्ञापन) में दिए गए पदों की श्रेणियों और स्टेटस के मापदंडों के संदर्भ के बगैर केवल उम्मीदवार के माता-पिता की आय के आधार पर क्रीमी लेयर का दर्जा तय करना कानूनन गलत है। इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि ओबीसी आरक्षण की पात्रता का निर्धारण करते समय निजी कंपनियों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) के कर्मचारियों के बच्चों और सरकारी कर्मचारियों के बच्चों को अलग मानना भेदभावपूर्ण है।

OBC आरक्षण में क्रीमी लेयर क्या है?

“क्रीमी लेयर” शब्द का अर्थ अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) समुदाय के उन आर्थिक और सामाजिक रूप से उन्नत वर्गों से है, जिन्हें आरक्षण के लाभ से बाहर रखा जाता है। इस अवधारणा को भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 1992 में दिए गए ऐतिहासिक फैसले इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ में प्रस्तुत किया था। यह निर्णय मंडल आयोग की सिफारिशों के कार्यान्वयन से जुड़ा हुआ था, जिसमें यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया कि आरक्षण का लाभ वास्तव में सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों तक ही पहुँचे।

वर्तमान में अन्य पिछड़ा वर्ग में क्रीमी लेयर की पहचान के लिए वार्षिक आय सीमा ₹8 लाख निर्धारित की गई है। यदि किसी व्यक्ति का परिवार इस सीमा से अधिक आय अर्जित करता है, तो उसे क्रीमी लेयर की श्रेणी में माना जाता है। ऐसे व्यक्तियों को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में OBC के 27% आरक्षण का लाभ नहीं मिलता, क्योंकि आरक्षण का उद्देश्य समाज के आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों को अवसर प्रदान करना है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्टीकरण क्यों दिया?

यह मुद्दा इसलिए उठा क्योंकि क्रीमी लेयर की स्थिति तय करने के तरीके को लेकर विवाद सामने आए, विशेष रूप से पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग (PSUs), बैंकों और निजी कंपनियों में काम करने वाले कर्मचारियों के बच्चों के मामले में। पहले कुछ नियमों में मुख्य रूप से माता-पिता की आय को आधार बनाया जाता था, जिसके कारण सरकारी कर्मचारियों और अन्य क्षेत्रों में कार्यरत कर्मचारियों के बीच अलग-अलग तरह का व्यवहार देखने को मिलता था।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने अवलोकन में कहा कि केवल आय के आधार पर सामाजिक उन्नति का निर्धारण नहीं किया जा सकता। इसलिए क्रीमी लेयर की स्थिति तय करते समय कई कारकों—जैसे माता-पिता का पद, नौकरी का प्रकार और सामाजिक स्थिति—को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि आरक्षण का लाभ वास्तव में जरूरतमंद और पिछड़े वर्गों तक पहुँचे।

भारत में LPG संकट क्यों बढ़ रहा है? गैस की कमी के पीछे 5 सबसे बड़े कारण

Lpg crisis in india reason: भारत वर्तमान में एक महत्वपूर्ण LPG कमी का सामना कर रहा है, एक स्थिति जो राष्ट्र की आयात पर बढ़ती निर्भरता और अपर्याप्त रणनीतिक भंडारण क्षमताओं से बढ़ गई है। रिपोर्टों से पता चलता है कि अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने LPG के लिए व्यापक भंडारण की अनुपस्थिति को एक महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा अंतर के रूप में पहचाना है।

इजरायल, ईरान और अमेरिका के बीच चल रही लड़ाई और इससे मिडिल ईस्ट में फैले तनाव का असर अब भारत पर भी बड़े पैमाने पर दिखने लगा है। भारत में LPG संकट मुख्य रूप से ईरान-इजरायल युद्ध के कारण मध्य पूर्व से होने वाली आपूर्ति में व्यवधान, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में जहाजों की आवाजाही रुकने और आयात पर अत्यधिक निर्भरता के चलते बढ़ रहा है। ईरान के साथ अमेरिका-इज़रायल संघर्ष ने वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को बाधित कर दिया है और ऊर्जा, व्यापार व मुद्रास्फीति के मोर्चे पर भारत की कमज़ोरियों को उजागर किया है।

LPG की कमी के पीछे 5 मुख्य कारण:

आयात पर निर्भरता: भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से खरीदता है. 25-27 लाख बैरल तेल प्रतिदिन सऊदी अरब, इराक, कतर और UAE से आता है। भारत की 55 प्रतिशत LPG और 30 प्रतिशत LNG भी इन्हीं देशों से आती है. ईरान‑इजरायल युद्ध के कारण होर्मुज से जहाजों की आवाजाही रुक गई, जिससे LPG और तेल सप्लाई प्रभावित हुई है. इससे कीमतों में बढ़ोतरी और बाजार में कमी की स्थिति बनी है.

भू-राजनीतिक तनाव: इजरायल, ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे संघर्ष ने मध्य पूर्व से आने वाली गैस की सप्लाई को बाधित कर दिया है। अमेरिका-इज़रायल-ईरान संघर्ष भारत की अर्थव्यवस्था को आयातित मुद्रास्फीति, रुपये पर दबाव और आपूर्ति शृंखला में व्यवधान के खतरे से उजागर करता है। यह खतरा विशेष रूप से भारत की ऊर्जा सुरक्षा, उर्वरक आपूर्ति और व्यापार के लिये है, जिसका मुख्य कारण खाड़ी के तेल, LNG और होर्मुज़ जलडमरूमध्य के माध्यम से उर्वरक आगत पर भारी निर्भरता है।

LPG का प्रमुख आयात: LPG का प्रमुख आयात संयुक्त अरब अमीरात, कतर, सऊदी अरब और कुवैत से होता है। अधिकांश खेप होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुज़रती है, जिसके कारण क्षेत्रीय संघर्ष या नाकाबंदी की स्थिति में आपूर्ति अत्यधिक संवेदनशील हो जाती है। भारत में, भूमिगत LPG भंडारण लगभग 1.4 लाख टन है। यह मात्रा, जिसकी दैनिक मांग लगभग 80,000 टन है, दो दिनों से भी कम की खपत के लिये पर्याप्त है। इस दैनिक मांग का 85% से अधिक हिस्सा घरेलू उपयोग के लिये होता है।

भारत विश्व में LPG का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता: भारत की LPG संबंधी संवेदनशीलता: प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत स्वच्छ खाना पकाने की सुविधा के विस्तार के कारण भारत विश्व में LPG का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है। भारत की LPG की लगभग 60% मांग आयात के माध्यम से पूरी होती है, क्योंकि घरेलू उत्पादन सीमित है।

सीमित भंडारण क्षमता: भारत की LPG भंडारण क्षमता लगभग 22 दिनों की खपत के बराबर है, जो कच्चा तेल के भंडार की तुलना में कम है। भारत में LPG खपत में महत्वपूर्ण वृद्धि, विशेष रूप से सरकारी योजनाओं से प्रभावित, रणनीतिक भंडारण पहलों की वृद्धि को पार कर गई है। भारत का भूवैज्ञानिक परिदृश्य भूमिगत भंडारण विस्तार के लिए अवसर और चुनौतियाँ दोनों प्रदान करता है। जबकि प्रायद्वीपीय क्षेत्र व्यवहार्य हैं, अन्य क्षेत्रों को इंजीनियरिंग बाधाओं का सामना करना पड़ता है। वर्तमान सरकारी रणनीतियों ने इन सुविधाओं के विस्तार को प्राथमिकता नहीं दी है, जिससे संवेदनशीलता बढ़ गई है।

निष्कर्ष

भारत की LPG कमी रणनीतिक भंडारण क्षमताओं पर ध्यान केंद्रित करने के लिए नीति संशोधन की आवश्यकता को इंगित करती है। पर्याप्त भंडार के बिना आयात पर निर्भरता बाहरी व्यवधानों के प्रति संवेदनशीलता का जोखिम उठाती है और घरेलू ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित करती है। भारत की मुद्रास्फीति दर लगभग 2.75 प्रतिशत है, जो प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे कम है। रूस से कच्चे तेल के आयात, ईंधन कर में लचीलेपन और एलपीजी की विनियमित कीमतों के कारण उपभोक्ताओं के लिए पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें नियंत्रण में बनी हुई हैं।

 

भारत ने चिप निर्माण को बढ़ावा देने के लिए ₹1 ट्रिलियन फंड की योजना बनाई

भारत घरेलू सेमीकंडक्टर (चिप) निर्माण को मजबूत करने और वैश्विक सेमीकंडक्टर केंद्र बनने के लक्ष्य को आगे बढ़ाने के लिए लगभग ₹1 ट्रिलियन (करीब 11 अरब डॉलर) के नए फंड की तैयारी कर रहा है। यह प्रस्तावित फंड चिप डिजाइन, निर्माण उपकरण और सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन के विकास को समर्थन देगा। यह पहल सरकार के पहले से लागू 2021 के $10 अरब सेमीकंडक्टर प्रोत्साहन कार्यक्रम का विस्तार मानी जा रही है।

भारत की ₹1 ट्रिलियन सेमीकंडक्टर फंड योजना

  • भारत सरकार एक बड़ा ₹1 ट्रिलियन सेमीकंडक्टर फंड शुरू करने की योजना बना रही है, जिसका उद्देश्य देश में सेमीकंडक्टर उद्योग को मजबूत करना और घरेलू चिप निर्माण परियोजनाओं को बढ़ावा देना है।
  • इस फंड के माध्यम से चिप डिजाइन, निर्माण उपकरण और सप्लाई चेन विकास के लिए सब्सिडी प्रदान की जा सकती है। यह कदम भारत की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत देश को वैश्विक सेमीकंडक्टर निर्माण केंद्र बनाना और आयातित चिप्स पर निर्भरता कम करना लक्ष्य है।

वैश्विक सेमीकंडक्टर प्रतिस्पर्धा और भारत का प्रयास

भारत का यह कदम ऐसे समय में सामने आया है जब दुनिया भर के देश सेमीकंडक्टर उत्पादन को बढ़ाने के लिए भारी निवेश कर रहे हैं।
उदाहरण के लिए, संयुक्त राज्य अमेरिका ने चिप्स और विज्ञान अधिनियम के तहत लगभग 52 अरब डॉलर का प्रोत्साहन पैकेज शुरू किया है। वहीं चीन ने भी सेमीकंडक्टर कंपनियों में बड़े निवेश फंड के माध्यम से भारी पूंजी लगाई है।
भारत की यह नई फंड योजना देश को इस वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूत स्थिति दिलाने और दीर्घकालिक तकनीकी व आर्थिक विकास सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लाई जा रही है।

इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन और 2021 प्रोत्साहन योजना

प्रस्तावित ₹1 ट्रिलियन फंड भारत सेमीकंडक्टर मिशन के तहत 2021 में शुरू किए गए $10 अरब के सेमीकंडक्टर प्रोत्साहन कार्यक्रम का विस्तार होगा।
इस कार्यक्रम के अंतर्गत सरकार ने सेमीकंडक्टर निर्माण परियोजनाओं की लागत का 50% तक वित्तीय समर्थन देने की नीति अपनाई थी। इस पहल ने भारत में सेमीकंडक्टर उद्योग की नींव रखने और बड़े निवेश आकर्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

भारत में प्रमुख सेमीकंडक्टर परियोजनाएँ

इस प्रोत्साहन कार्यक्रम के तहत कई बड़ी परियोजनाएँ पहले ही घोषित की जा चुकी हैं—

  • माइक्रोन टेक्नोलॉजी द्वारा गुजरात में सेमीकंडक्टर असेंबली और परीक्षण सुविधा की स्थापना
  • टाटा समूह द्वारा गुजरात में सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन प्लांट का निर्माण
  • टाटा समूह द्वारा चिप पैकेजिंग और टेस्टिंग यूनिट का विकास
  • फॉक्सकॉन टेक्नोलॉजी ग्रुप द्वारा सेमीकंडक्टर टेस्टिंग और असेंबली सुविधा की योजना

इन परियोजनाओं से भारत में सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को मजबूत करने और भविष्य में और अधिक निवेश आकर्षित करने की उम्मीद है।

नीति आयोग ने दूसरी वार्षिक “फिसकल हेल्थ इंडेक्स” रिपोर्ट जारी की

NITI Aayog ने फिसकल हेल्थ इंडेक्स 2026 (Fiscal Health Index 2026 का दूसरा वार्षिक संस्करण जारी किया है। यह रिपोर्ट भारतीय राज्यों के राजकोषीय प्रदर्शन और वित्तीय स्थिरता का आकलन करने के लिए तैयार की गई है। इसे नई दिल्ली में नीति आयोग के उपाध्यक्ष सुमन बेरी और सीईओ निधि छिब्बर ने लॉन्च किया। फिसकल हेल्थ इंडेक्स 2026 एक डेटा-आधारित ढांचा प्रदान करता है, जो यह मूल्यांकन करता है कि राज्य अपनी वित्तीय व्यवस्था को कितनी प्रभावी ढंग से संचालित करते हैं।

फिसकल हेल्थ इंडेक्स का उद्देश्य

फिसकल हेल्थ इंडेक्स 2026 का उद्देश्य भारतीय राज्यों की वित्तीय प्रबंधन प्रणाली का व्यापक मूल्यांकन करना है। यह सूचकांक राज्यों की वित्तीय नीतियों की ताकत और कमजोरियों की पहचान करता है तथा बजट योजना और व्यय प्रबंधन में सुधार के लिए प्रोत्साहित करता है। वर्तमान समय में वैश्विक स्तर पर सार्वजनिक वित्त पर दबाव बढ़ रहा है, इसलिए राज्यों में मजबूत राजकोषीय शासन बनाए रखना भारत में मैक्रो-आर्थिक स्थिरता और दीर्घकालिक आर्थिक विकास के लिए आवश्यक माना जाता है।

फिसकल हेल्थ इंडेक्स 2026 में विस्तारित दायरा

फिसकल हेल्थ इंडेक्स 2026 ने पिछले संस्करण की तुलना में अपने दायरे का विस्तार किया है। पहले संस्करण में 18 बड़े राज्यों का आकलन किया गया था, जबकि नए संस्करण में 10 उत्तर-पूर्वी (NE) और हिमालयी राज्यों को भी शामिल किया गया है। हालांकि निष्पक्ष तुलना सुनिश्चित करने के लिए इन राज्यों का मूल्यांकन और रैंकिंग बड़े राज्यों से अलग की गई है, क्योंकि उनकी आर्थिक और भौगोलिक परिस्थितियाँ अलग होती हैं।

फिसकल हेल्थ इंडेक्स के पाँच प्रमुख स्तंभ

यह सूचकांक राज्यों की वित्तीय स्थिति का आकलन पाँच प्रमुख स्तंभों के आधार पर करता है—

  • व्यय की गुणवत्ता (Quality of Expenditure) – यह देखता है कि राज्य सार्वजनिक धन का उपयोग कितनी दक्षता से करते हैं।
  • राजस्व संकलन (Revenue Mobilisation) – राज्यों की कर और अन्य स्रोतों से राजस्व जुटाने की क्षमता को मापता है।
  • राजकोषीय अनुशासन (Fiscal Prudence) – यह मूल्यांकन करता है कि राज्य घाटे और खर्च को कितनी जिम्मेदारी से प्रबंधित करते हैं।
  • ऋण सूचकांक (Debt Index) – राज्य सरकारों के कर्ज के स्तर और संरचना को दर्शाता है।
  • ऋण स्थिरता (Debt Sustainability) – यह देखता है कि राज्य अपने कर्ज को समय के साथ कितना प्रभावी ढंग से प्रबंधित और चुका सकते हैं।

प्रमुख राज्यों के लिए फिसकल हेल्थ इंडेक्स 2026 की मुख्य बातें

फिसकल हेल्थ इंडेक्स 2026 राज्यों को चार श्रेणियों में वर्गीकृत करता है—उपलब्धि हासिल करने वाले, अग्रणी, बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले और आकांक्षी राज्य।

इस रैंकिंग में ओडिशा शीर्ष प्रदर्शन करने वाला राज्य बनकर उभरा और उसने पिछले वर्ष की तुलना में अपने स्कोर में सुधार किया।

गोवा और झारखंड भी अचीवर श्रेणी में शामिल रहे, जो मजबूत राजकोषीय अनुशासन और प्रभावी वित्तीय प्रबंधन को दर्शाता है।

फ्रंट-रनर और परफॉर्मर राज्य

फ्रंट-रनर श्रेणी में निम्नलिखित राज्य शामिल हैं—

  • गुजरात
  • महाराष्ट्र
  • छत्तीसगढ
  • तेलंगाना
  • उत्तर प्रदेश
  • कर्नाटक

इन राज्यों का राजकोषीय प्रदर्शन स्थिर है, हालांकि उनका स्कोर Achiever राज्यों से थोड़ा कम है।

परफॉर्मर श्रेणी में शामिल राज्य हैं—

  • मध्य प्रदेश
  • हरयाणा
  • बिहार
  • तमिलनाडु
  • राजस्थान

इन राज्यों की वित्तीय संरचना अपेक्षाकृत संतुलित है, लेकिन इन्हें मध्यम घाटे और सीमित राजकोषीय लचीलापन जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

राजकोषीय दबाव का सामना कर रहे Aspirational राज्य

Aspirational श्रेणी में निम्नलिखित राज्य शामिल हैं—

  • पश्चिम बंगाल
  • केरल
  • आंध्र प्रदेश
  • पंजाब

इन राज्यों को उच्च राजकोषीय घाटे, बढ़ते ऋण स्तर और अपेक्षाकृत कम विकास व्यय के कारण वित्तीय दबाव का सामना करना पड़ रहा है।

मुख्य चुनौतियाँ:

  • राजकोषीय घाटा अक्सर FRBM सीमा से अधिक
  • ऋण स्तर लगभग 35–45% GSDP
  • राजस्व प्राप्तियों का 50–60% अनिवार्य खर्चों में जाना
  • उत्तर-पूर्व और हिमालयी राज्यों की रैंकिंग

उत्तर-पूर्व और हिमालयी राज्यों में अरुणाचल प्रदेश पहले स्थान पर रहा, इसके बाद उत्तराखंड और त्रिपुरा रहे। इन राज्यों ने व्यय की गुणवत्ता, राजस्व जुटाने और ऋण प्रबंधन जैसे संकेतकों पर बेहतर प्रदर्शन किया।

NE और हिमालयी राज्यों में Performer श्रेणी

Performer समूह में शामिल राज्य हैं—

  • असम
  • मेघालय
  • मिजोरम
  • सिक्किम
  • त्रिपुरा

इन राज्यों का प्रदर्शन मध्यम स्तर का है और विभिन्न संकेतकों में मिश्रित परिणाम देखने को मिले।

NE और हिमालयी Aspirational राज्य

Aspirational श्रेणी में—

  • हिमाचल प्रदेश
  • मणिपुर
  • नगालैंड

इन राज्यों को कमजोर राजस्व जुटाने और अधिक व्यय प्रतिबद्धताओं के कारण वित्तीय दबाव का सामना करना पड़ता है।

भारत में राज्य वित्त का महत्व

भारत की वित्तीय व्यवस्था में राज्य सरकारों की महत्वपूर्ण भूमिका है क्योंकि वे स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी ढांचे जैसी प्रमुख सार्वजनिक सेवाओं के लिए जिम्मेदार हैं। राज्यों का वित्तीय प्रदर्शन देश की समग्र आर्थिक स्थिरता को प्रभावित करता है। वर्तमान में भारतीय राज्यों का हिस्सा देश के कुल सरकारी ऋण का लगभग एक-तिहाई है। इसलिए उनकी वित्तीय प्रबंधन क्षमता सार्वजनिक वित्त को टिकाऊ बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

छत्तीसगढ़ कैबिनेट ने धर्म की स्वतंत्रता विधेयक 2026 को मंजूरी दी

छत्तीसगढ़ की राज्य मंत्रिपरिषद ने छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता विधेयक 2026 के मसौदे को मंजूरी दे दी है। इस विधेयक का उद्देश्य राज्य में अवैध धार्मिक धर्मांतरण को रोकना है। यह निर्णय रायपुर में आयोजित कैबिनेट बैठक में लिया गया, जिसकी अध्यक्षता मुख्यमंत्री विष्णु देव साई ने की। प्रस्तावित कानून का उद्देश्य ऐसे धर्मांतरणों पर रोक लगाना है जो बल, प्रलोभन, धोखाधड़ी या अनुचित प्रभाव के माध्यम से कराए जाते हैं। अब इस धर्म की स्वतंत्रता विधेयक 2026 को छत्तीसगढ़ विधान सभा में प्रस्तुत किया जाएगा।

छत्तीसगढ़ फ्रीडम ऑफ रिलिजन बिल 2026 का उद्देश्य

इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य गैरकानूनी धार्मिक धर्मांतरण को रोकना और साथ ही लोगों के अपने धर्म का पालन करने के संवैधानिक अधिकार की रक्षा करना है। यह कानून उन मामलों को ध्यान में रखकर लाया जा रहा है, जहाँ लोगों पर दबाव डालकर या उन्हें गुमराह करके धर्म परिवर्तन कराया जाता है। राज्य सरकार का मानना है कि यह विधेयक सुनिश्चित करेगा कि धर्म परिवर्तन स्वेच्छा से हो, न कि दबाव या भ्रामक तरीकों से।

विधेयक के प्रमुख प्रावधान

छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता विधेयक 2026 में ऐसे धर्मांतरणों को अवैध माना गया है जो अनैतिक या अवैध तरीकों से कराए जाते हैं। प्रस्तावित कानून के अनुसार निम्न परिस्थितियों में धर्म परिवर्तन को प्रतिबंधित किया जाएगा—

  • बल या दबाव (Force or Coercion)
  • प्रलोभन या आर्थिक लाभ का लालच (Inducements)
  • धोखाधड़ी या गलत जानकारी (Fraud or Misrepresentation)
  • अनुचित प्रभाव या मानसिक दबाव (Undue Influence)

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की अध्यक्षता में कैबिनेट की मंजूरी

इस विधेयक को मंजूरी मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में दी गई। यह निर्णय धार्मिक धर्मांतरण से जुड़े नियमों के संबंध में राज्य सरकार की एक महत्वपूर्ण नीति पहल माना जा रहा है। कैबिनेट से स्वीकृति मिलने के बाद अब इस विधेयक को छत्तीसगढ़ विधानसभा में पेश किया जाएगा। यदि विधानसभा इसे पारित कर देती है, तो यह राज्य के कानूनी ढाँचे का हिस्सा बन जाएगा।

भारतीय संविधान और धर्म की स्वतंत्रता

भारत का संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 के तहत नागरिकों को धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है। इन प्रावधानों के अनुसार हर व्यक्ति को अपने धर्म का पालन, प्रचार और प्रसार करने की स्वतंत्रता है। हालांकि, संविधान सरकार को लोक व्यवस्था, नैतिकता और सार्वजनिक स्वास्थ्य के हित में धर्म से संबंधित गतिविधियों को विनियमित करने का अधिकार भी देता है।

शैलेश कुमार ने वर्ल्ड पैरा एथलेटिक्स ग्रैंड प्रिक्स 2026 में गोल्ड जीता

भारतीय पैरा एथलीट शैलेश कुमार ने विश्व पैरा एथलेटिक्स ग्रैंड प्रिक्स में स्वर्ण पदक जीतकर शानदार प्रदर्शन किया। यह प्रतियोगिता नई दिल्ली में आयोजित हुई थी। शैलेश ने पुरुषों की हाई जंप T63 श्रेणी में 1.84 मीटर की छलांग लगाकर पहला स्थान हासिल किया। हालांकि यह उनके व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ 1.91 मीटर से कम था, फिर भी उन्होंने इस प्रदर्शन पर संतोष व्यक्त किया क्योंकि इससे उनके नए प्रतिस्पर्धी सत्र की अच्छी शुरुआत हुई है।

चोट से उबरने के बाद सीजन की शुरुआत

शैलेश कुमार ने बताया कि पिछले वर्ष विश्व पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप जीतने के बाद से उनके बाएं घुटने में दर्द बना हुआ था। इसी कारण उनके प्रशिक्षण कार्यक्रम को सावधानीपूर्वक तैयार किया गया ताकि वे सुरक्षित तरीके से फिर से प्रतियोगिताओं में वापसी कर सकें। उनका लक्ष्य शुरुआत में रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन करना नहीं बल्कि धीरे-धीरे अपनी फिटनेस और फॉर्म हासिल करना था।

एशियाई पैरा खेलों पर मुख्य लक्ष्य

इस सत्र में शैलेश कुमार का मुख्य लक्ष्य एशियाई पैरा खेल है, जिसे भारतीय पैरा खिलाड़ियों के लिए खेल कैलेंडर का एक महत्वपूर्ण आयोजन माना जाता है। उनके प्रशिक्षण कार्यक्रम को इसी प्रतियोगिता को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। प्रदर्शन में सुधार के लिए वे अपने टेक-ऑफ तकनीक पर विशेष ध्यान दे रहे हैं। उनका मानना है कि तकनीकी सुधार से वे अपने 1.91 मीटर के व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ रिकॉर्ड को पार कर सकते हैं।

प्रतियोगिता में कड़ी चुनौती का अभाव

स्वर्ण पदक जीतने के बाद शैलेश ने कहा कि प्रतियोगिता में उतनी कड़ी चुनौती नहीं थी क्योंकि मरियप्पन थंगावेलु इसमें भाग नहीं ले सके। तीन बार के पैरालंपिक पदक विजेता मरियप्पन थंगावेलु फिटनेस समस्याओं के कारण प्रतियोगिता से हट गए थे। दोनों खिलाड़ी बेंगलुरु में साथ प्रशिक्षण लेते हैं। शैलेश के अनुसार मजबूत प्रतिद्वंद्वी के साथ प्रतिस्पर्धा करने से खिलाड़ियों को बेहतर प्रदर्शन करने की प्रेरणा मिलती है और प्रतियोगिता का स्तर भी ऊँचा होता है।

वर्ल्ड पैरा एथलेटिक्स ग्रां प्री में भागीदारी

नई दिल्ली में आयोजित वर्ल्ड पैरा एथलेटिक्स ग्रां प्री में इस वर्ष 200 से अधिक भारतीय खिलाड़ियों ने भाग लिया, जिससे यह देश में आयोजित सबसे बड़े पैरा एथलेटिक्स आयोजनों में से एक बन गया। यह प्रतियोगिता उन खिलाड़ियों के लिए भी महत्वपूर्ण है जो पैरा खेलों की आधिकारिक श्रेणियों में क्लासिफिकेशन प्राप्त करना चाहते हैं। इसके अलावा इस आयोजन में अंतरराष्ट्रीय भागीदारी भी रही, जिसमें रूस के 26 एथलीट शामिल हुए।

दिल्ली ने हाईवे प्रदूषण से लड़ने हेतु भारत का पहला माइक्रोएल्गी एयर टावर लगाया

नई दिल्ली में प्योरएयर टॉवर (PureAir Tower) नामक भारत का पहला माइक्रोएल्गी आधारित एयर प्यूरीफिकेशन टॉवर तैनात किया गया है। इसे एरोसिटी राजमार्ग कॉरिडोर (Aerocity Highway Corridor) के सड़क डिवाइडर पर लगाया गया है। यह एक नवीन बायोटेक्नोलॉजी आधारित समाधान है जिसका उद्देश्य शहरी वायु प्रदूषण को कम करना है। इस परियोजना के तहत पारंपरिक सड़क ढांचे को एक सक्रिय वायु शुद्धिकरण प्रणाली में बदल दिया गया है। यह पायलट परियोजना राजधानी के व्यस्त ट्रैफिक कॉरिडोर में वाहनों से होने वाले उत्सर्जन को कम करने के लिए शुरू की गई है।

माइक्रोएल्गी एयर टॉवर कैसे काम करता है

पारंपरिक स्मॉग टावरों की तरह यांत्रिक फिल्टर का उपयोग करने के बजाय यह तकनीक फोटोसिंथेटिक माइक्रोएल्गी (सूक्ष्म शैवाल) का उपयोग करती है, जो आसपास की हवा से प्रदूषकों को सीधे अवशोषित करती है। यह प्रणाली कार्बन डाइऑक्साइड, पार्टिकुलेट मैटर और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसे प्रदूषकों को सड़क स्तर पर पकड़ती है। इसके बाद प्राकृतिक जैविक प्रक्रिया के माध्यम से ये प्रदूषक ऑक्सीजन और एल्गल बायोमास में परिवर्तित हो जाते हैं। माइक्रोएल्गी एयर टॉवर बहुत कम ऊर्जा का उपयोग करता है और इसमें कोई द्वितीयक फिल्टर कचरा भी उत्पन्न नहीं होता, जिससे यह एक पर्यावरण-अनुकूल वायु शुद्धिकरण समाधान बन जाता है।

परियोजना से जुड़ी कंपनियाँ

दिल्ली में स्थापित यह माइक्रोएल्गी एयर टॉवर कई संस्थाओं के सहयोग से विकसित किया गया है। इस परियोजना को सी पी अरोड़ा प्राइवेट लिमिटेड ने कार्बेलिम ​​प्राइवेट लिमिटेड के साथ मिलकर कार्यान्वित किया है। कार्बेलिम एक क्लाइमेट-टेक स्टार्ट-अप है, जिसे आईआईटी मद्रास में इनक्यूबेट किया गया है और इसे आईआईएम लखनऊ एंटरप्राइज़ इनक्यूबेशन सेंटर का समर्थन प्राप्त है।

रोड डिवाइडर से कार्बन सिंक तक

PureAir Tower माइक्रोएल्गी प्रणाली साधारण सड़क डिवाइडर को एक सक्रिय पर्यावरणीय समाधान में बदल देती है। प्रत्येक टॉवर की वायु शुद्धिकरण क्षमता लगभग 15 परिपक्व पेड़ों के बराबर मानी जाती है और यह गुजरने वाले वाहनों से निकलने वाले प्रदूषण को लगातार कम करता है। इस परियोजना में आगे BioDivider पैनलों को भी स्थापित करने की योजना है, जिससे सड़क डिवाइडरों को निरंतर हरित कॉरिडोर में बदला जा सके।

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