इजरायल की वर्तमान जनसंख्या कितनी? जानिए ताज़ा आंकड़े

ईरान-इजरायल जंग थमने का नाम नहीं ले रही। मिडिल ईस्ट में संकट अब तक बरकरार है। अमेरिका और इजरायल मिलकर ईरान पर मिसाइलें और ड्रोन बरसा रहे हैं। ईरान भी मुंहतोड़ जवाब दे रहा है। ईरान खाड़ी देशों में इज़रायल और अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले कर रहा है। वहीं इजरायल और अमेरिका भी ईरानी ठिकानों पर हमले कर रहे हैं।

इजरायल की कुल जनसंख्या

2026 की शुरुआत के अनुसार, इजरायल की कुल जनसंख्या लगभग 10.15 से 10.18 मिलियन (1 करोड़ से अधिक) के बीच है। इसमें लगभग 73-74% यहूदी और लगभग 21% अरब नागरिक शामिल हैं। इज़राइल की जनसंख्या, जो मुख्य रूप से एक शहरी आबादी है, 2024 में 10 मिलियन का आंकड़ा पार कर गई थी।

2023-2024 के अनुमान के मुताबिक, इजरायल की कुल जनसंख्या 97 से 98 लाख है। यानी यहां लगभग 1 करोड़ लोग रहते हैं। दुनिया के कई बड़े देशों के मुकाबले यह संख्या कम है, लेकिन टेक्नोलॉजी, डिफेंस और इकोनॉमी के मामले में यह देश काफी आगे और ताकतवर है। इजरायल में सबसे बड़ा धर्म यहूदी धर्म है। यहां लगभग 73 से 74 प्रतिशत आबादी यहूदी ही हैं। इजरायल को विश्वभर के यहूदियों की मातृभूमि माना जाता है।

इजरायल में हिंदू आबादी 

इजरायल में हिंदुओं की संख्या बहुत कम है। अनुमान के अनुसार, यहां महज 10,000 से 15,000 हिंदू ही रहते हैं, जो कुल आबादी का केवल 0.1 प्रतिशत हैं। यहां रहने वाले ज्यादातर हिंदू भारत से गए लोग हैं। ये लोग आईटी प्रोफेशनल, केयर वर्कर, स्टूडेंट्स या दूसरे प्रोफेशनल्स के हैं।

इजरायल में मुस्लिम आबादी 

इजरायल में मुस्लिम समुदाय सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समूह है। यहां लगभग 17 से 21 लाख मुस्लिम रहते हैं यानी कुल आबादी का लगभग 18 से 21 प्रतिशत हिस्सा मुस्लिम है। ये लोग मुख्य रूप से अरब मूल के हैं और देश के अलग-अलग शहरों और कस्बों में रहते हैं। राजनीति और समाज में उनकी मौजूदगी भी दिखती है।

इजरायल की आबादी बहुत बड़ी नहीं

इजरायल की आबादी चाहे बहुत बड़ी न हो, लेकिन उसमें हो रही स्थिर वृद्धि यहूदी राष्ट्र के लिए एक सकारात्मक संकेत मानी जा रही है। इसके साथ ही, देश से बाहर जाकर बसने वाले इजरायलियों की संख्या में भी गिरावट आई है। रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान में केवल 56 हजार इजरायली ही विदेशों में रह रहे हैं।

एक स्थिर और बढ़ती हुई जनसंख्या वाला राष्ट्र

वर्ष 1948 में देश की स्थापना के बाद से अब तक लगभग 35 लाख लोग विदेशों से आकर इजरायल में बस चुके हैं। इन प्रवासियों में से बड़ी संख्या उन लोगों की है जो साल 1990 के बाद आए, खासकर सोवियत संघ के विघटन के बाद। उस दौर में बड़ी संख्या में यहूदियों को इजरायल में बसने की अनुमति दी गई थी। यह सब मिलकर इजरायल को एक स्थिर और बढ़ती हुई जनसंख्या वाला राष्ट्र बना रहे हैं।

ईरान–इज़राइल तनाव के बीच चर्चा: क्या ईरान में हैं हिंदू मंदिर?

ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच चल रही जंग ने पूरी विश्व में उथल-पुथल मचा रखी है। दोनों ओर से लगातार हमले जारी हैं। आसमान से गिरती मिसाइलों ने दोनों तरफ भारी नुकसान पहुंचाया है। अब तक कई इजरायली और अमेरिकी लोगों की मौत हो चुकी है। रिपोर्ट के अनुसार ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई भी इस युद्ध में मारे जा चुके हैं। युद्ध के चलते ईरान में रहने वाले हिंदुओं की भी बड़ी चर्चा हो रही है। जहां एक ओर यह संघर्ष सुर्खियों में छाया हुआ है वहीं दूसरी तरफ लोगों के मन में एक महत्वपूर्ण सवाल भी उठ रहा है। क्या ईरान में हिंदू मंदिर हैं? आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब।

बंदर अब्बास का ऐतिहासिक मंदिर

बता दें, ईरान में हिंदू विरासत के सबसे बड़े उदाहरणों में से एक विष्णु मंदिर है। इसे स्थानीय रूप से ‘इबादतगाह-ए-हिंदू” के नाम से भी जाना जाता है। इसका अर्थ होता है हिंदुओं का पूजा स्थल। इस मंदिर का निर्माण वर्ष 1892 में गुजरात के उन हिंदू व्यापारियों ने करवाया था जो व्यापार के उद्देश्य से बंदर अब्बास के बंदरगाह शहर में आकर बस गए थे। इसके वास्तुकला बहुत ज्यादा अनोखी है। इसमें भारतीय मंदिर वास्तुकला एवं ईरानी तत्वों का सुंदर मिश्रण देखने को मिलता है।

मंदिर की खासियत: मंदिर का निर्माण मूंगा पत्थर, मोर्टार, मिट्टी और लुई चाक से किया गया है। इस मंदिर में भगवान कृष्ण के भी कुछ चित्र उकेरे गए हैं। शास्त्रों में भगवान श्रीकृष्ण को विष्णु जी का आठवां और पूर्ण अवतार बताया गया है। मंदिर की बनावट पूरी तरह से भारतीय वास्तुकला पर आधारित है। मंदिर का एक केंद्रीय वर्गाकार कक्ष है, जिसके ऊपर गुंबद भी है। मुख्य भवन के गुंबद पर 72 बुर्ज हैं।

चाबहार के बंदरगाह शहर के पास स्थित एक और मंदिर

चाबहार के बंदरगाह शहर के पास एक और जरूरी स्थल स्थित है। यहां एक हिंदू मंदिर है, जिसके बारे में माना जाता है कि इसका निर्माण भी गुजराती व्यापारियों ने ही करवाया था। इन मंदिरों की स्थापना मुख्य रूप से तटीय व्यापार मार्गों के किनारे की गई थी। यहां भारतीय व्यापारी हमेशा व्यापार के सिलसिले में आया करते थे। ये मंदिर ना केवल पूजा पाठ के स्थलों के रूप में काम करते थे बल्कि विदेश में रहने वाले भारतीय समुदाय हेतु सांस्कृतिक केंद्रों के रूप में भी अपनी अहम भूमिका निभाते थे।

अन्य शहर में हिंदुओं के पूजा के छोटे स्थान

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, ऐतिहासिक मंदिरों के अतिरिक्त तेहरान, जहेदान एवं इस्फहान जैसे शहरों में हिंदुओं के पूजा के छोटे स्थान भी होने की खबर है। इन जगहों पर हिंदू समुदाय के लोग दीवाली जैसे त्योहार मनाने और धार्मिक रस्में पूरी करने के लिए इकट्ठा होते हैं।

ईरान में हिंदू आबादी कम

हालांकि ईरान में हिंदू आबादी कम है लेकिन इसका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व काफी ज्यादा है। जो मंदिर आज भी बचे हुए हैं वे केवल धार्मिक स्थल नहीं बल्कि दो प्राचीन सभ्यताओं के इतिहास के प्रतीक हैं।

ईरान में हिंदू मंदिर के मुख्य तथ्य:

  • बंदर अब्बास मंदिर: इसे ‘इबादतगाह-ए-हिंदू’ कहा जाता है, जो भारतीय और ईरानी वास्तुकला का मिश्रण है।
  • स्थान: यह मंदिर बंदर अब्बास की इमाम खोमेनी स्ट्रीट पर स्थित है, जो कभी व्यस्त बंदरगाह क्षेत्र था।
  • संरचना: मंदिर में एक चौकोर कमरा और एक बड़ा गुंबद है, जिसमें भगवान कृष्ण के चित्र भी हैं।
  • वर्तमान स्थिति: अब यहाँ नियमित पूजा नहीं होती, लेकिन यह एक संरक्षित सांस्कृतिक स्थल है।

तेहरान में प्रसिद्ध गुरुद्वारा

ईरान की राजधानी तेहरान में ‘भाई गंगा सिंह सभा’ नाम का एक प्रसिद्ध गुरुद्वारा भी है। इसका निर्माण वर्ष 1941 में करवाया गया था। ईरान में इसे ‘मस्जिद-ए-हिंडन’ के नाम से भी जाना जाता है। रिपोर्ट के अनुसार प्रत्येक शुक्रवार के दिन यहां लंगर का आयोजन किया जाता है। बता दें कि ईरान में सिखों की संख्या बहुत कम है।

2026 में ईरान की कुल जनसंख्या: आंकड़े चौंकाने वाले!

मिडिल ईस्ट में ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के दौरान दुनिया का ध्यान एक बार फिर से इस क्षेत्र की तरफ मुड़ गया है। अमेरिका और इजराइल की तरफ से ईरान पर हमले (Israel Iran War) लगातार जारी हैं, जबकि ईरान भी जवाबी कार्रवाई कर रहा है। इससे पूरा मध्य पूर्व तनाव की चपेट में है और वैश्विक ऊर्जा संकट गहराता जा रहा है। ईरान और इजरायल एवं अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया है।

ईरान की आबादी

साल 2025 में ईरान की जनसंख्या करीब 90 मिलियन है। वहीं, साल 2016 की जनगणना के अनुसार ईरान की जनसंख्या 79.9 मिलियन (लगभग 7.99 करोड़) थी। जो अब बढ़कर 9 करोड़ से भी अधिक हो गई है। ईरान की जनसंख्या में 1980 के बाद से बहुत तेज वृद्धि हुई है, जो 40 मिलियन से बढ़कर 90 मिलियन से ऊपर पहुंच गई है।

2026 में ईरान की कुल आबादी लगभग 9.3 करोड़ (93 मिलियन) से अधिक होने का अनुमान है। यह दुनिया का 17वां सबसे अधिक आबादी वाला देश है। देश की लगभग 99 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है, जिसमें मुख्य रूप से शिया समुदाय (89-95%) शामिल है। यहां की अधिकांश आबादी युवा है और शहरीकरण दर लगभग 73.5 प्रतिशत है।

इस्लामी राज्य

ईरान को दुनिया सदियों तक ‘फारस’ के नाम से जानती थी। ईरान के पश्चिम में तुर्की और इराक, उत्तर में कैस्पियन सागर और दक्षिण में फारस की खाड़ी है। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद, यह एक इस्लामी राज्य बन गया, जहां धर्म और राजनीति से देश चलता है। इसलिए कई चीजों पर कट्टर प्रतिबंध हैं। खासकर, महिलाओं को हिजाब में ही रहना पड़ता है।

ईरान कितना अमीर है?

ईरान प्राकृतिक संसाधनों के मामले में दुनिया के सबसे अमीर देशों में से एक है। इसके पास दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस भंडार और चौथा सबसे बड़ा तेल भंडार है। इसके अलावा, ईरान तांबा, जस्ता और सोने जैसे मेटल से भी समृद्ध है. देश की इकोनॉमी, तेल से चलती है।

ईरान दुनिया का सबसे बड़ा शिया बहुल देश

ईरान दुनिया का सबसे बड़ा शिया बहुल देश है। यहां की कुल आबादी का 90 से 95 प्रतिशत जनसंख्या शिया मुसलमानों का है। वहीं, करीब पांच फीसदी आबादी सुन्नी मुसलमानों की है।

सी ड्रैगन 2026: अंतरराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास में भारत की अहम भूमिका

भारत ने अमेरिका के नेतृत्व में आयोजित बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास ‘सी ड्रैगन 2026’ में भाग लिया है। यह अभ्यास वर्तमान में गुआम के पास आयोजित किया जा रहा है। इसमें भारतीय नौसेना के साथ ऑस्ट्रेलिया, जापान और न्यूजीलैंड जैसे देशों की सेनाएं भी शामिल हैं। इस अभ्यास का उद्देश्य पनडुब्बी रोधी युद्ध (Anti-Submarine Warfare) में समन्वय और युद्ध क्षमता को बढ़ाना है। यह दो सप्ताह का अभ्यास जटिल समुद्री परिस्थितियों में पनडुब्बियों का पता लगाने और उनका पीछा करने पर केंद्रित है।

सी ड्रैगन 2026 अभ्यास

सी ड्रैगन 2026 एक प्रमुख बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास है, जो पनडुब्बी रोधी अभियानों पर केंद्रित है।

यह अभ्यास अमेरिकी नौसेना के नेतृत्व में आयोजित किया जाता है और इसका उद्देश्य भाग लेने वाले देशों के बीच समन्वय को बेहतर बनाना है।

इसमें जटिल अभ्यास शामिल होते हैं, जैसे—

  • पनडुब्बियों का पता लगाना (Detecting)
  • उनका पीछा करना (Tracking)
  • और उन्हें निशाना बनाना (Engaging)

ये सभी गतिविधियां नौसैनिक बलों की दक्षता, गति और सटीकता की परीक्षा लेती हैं।

गुआम में भारतीय नौसेना की भागीदारी

  • गुआम में इस अभ्यास में भारतीय नौसेना की भागीदारी वैश्विक समुद्री सुरक्षा पहलों में भारत की बढ़ती भूमिका को दर्शाती है।
  • गुआम इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक स्थान है।
  • भारत उन्नत नौसैनिक बलों के साथ भाग लेकर आपसी सहयोग और समन्वय को मजबूत कर रहा है।
  • यह भागीदारी अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में शांति, स्थिरता और सुरक्षा बनाए रखने के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

साझेदार देशों की भूमिका

  • सी ड्रैगन 2026 में ऑस्ट्रेलिया, जापान और न्यूजीलैंड की भागीदारी इसे एक महत्वपूर्ण बहुराष्ट्रीय अभ्यास बनाती है।
  • प्रत्येक देश अपनी उन्नत तकनीक और विशेषज्ञता का योगदान देता है।
  • रॉयल ऑस्ट्रेलियन एयर फोर्स ने लगभग 50 कर्मियों के साथ P-8A पोसाइडन विमान तैनात किया है।

भारत के लिए रणनीतिक महत्व

सी ड्रैगन 2026 में भागीदारी भारत की इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक प्रमुख समुद्री शक्ति के रूप में स्थिति को मजबूत करती है। यह मित्र देशों के साथ रक्षा सहयोग को भी बढ़ाती है। इस अभ्यास के माध्यम से भारत को पनडुब्बी रोधी युद्ध में उपयोग होने वाली उन्नत तकनीकों और रणनीतियों का अनुभव प्राप्त होता है।

आयुध निर्माणी दिवस 2026: भारत की रक्षा उत्पादन विरासत का विस्तृत विश्लेषण

आयुध निर्माणी दिवस 2026 पूरे भारत में 18 मार्च को मनाया जाता है। यह दिन भारत की समृद्ध रक्षा उत्पादन परंपरा और आत्मनिर्भरता का उत्सव मनाने के लिए समर्पित है। यह दिन कोलकाता के कासिपुर में 1802 में भारत की पहली आयुध निर्माण इकाई में उत्पादन शुरू होने की याद दिलाता है। यह अवसर राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने में आयुध कारखानों के योगदान को उजागर करता है, जो हथियार, गोला-बारूद और सैन्य उपकरणों की आपूर्ति करते हैं।

आयुध निर्माणी दिवस 2026 क्या है?

  • आयुध निर्माणी दिवस 2026 भारत की पहली आधुनिक हथियार निर्माण इकाई की स्थापना की स्मृति में मनाया जाता है।
  • यह दिन औपनिवेशिक काल से लेकर आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन प्रणाली तक भारत की यात्रा को दर्शाता है।

यह दिवस निम्नलिखित उद्देश्यों के लिए एक मंच प्रदान करता है—

  • रक्षा तकनीक और उपकरणों का प्रदर्शन
  • इंजीनियरों और कर्मचारियों की भूमिका को उजागर करना
  • भारत के रक्षा विनिर्माण क्षेत्र के प्रति जागरूकता बढ़ाना

आयुध निर्माणी दिवस का इतिहास: 1775 से 2021 तक

आयुध निर्माणी दिवस का इतिहास दो शताब्दियों से भी अधिक पुराना है, जो भारत के रक्षा उद्योग के विकास को दर्शाता है।

मुख्य पड़ाव:

  • 1775: कोलकाता के फोर्ट विलियम में बोर्ड ऑफ ऑर्डनेंस की स्थापना
  • 1787: ईशापुर में गनपाउडर फैक्ट्री की स्थापना
  • 1802: कासिपुर में पहली आयुध फैक्ट्री में उत्पादन शुरू
  • 1947: स्वतंत्रता के बाद भारत को 18 आयुध कारखाने विरासत में मिले
  • 1979: ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड (OFB) का गठन
  • 2021: OFB का पुनर्गठन कर 7 रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों (DPSUs) में विभाजन

भारत में आयुध कारखाने: एक परिचय

  • भारत के आयुध कारखाने सरकारी स्वामित्व वाले रक्षा उत्पादन इकाइयों का एक बड़ा नेटवर्क रहे हैं।
  • ये सशस्त्र बलों के लिए आवश्यक सैन्य उपकरणों का निर्माण करते हैं।

मुख्य तथ्य:

  • देशभर में 41 कारखाने
  • 70,000 से अधिक कर्मचारी
  • लगभग ₹19,000 करोड़ का वार्षिक राजस्व
  • 30 से अधिक देशों को निर्यात

आयुध कारखानों में क्या उत्पादन होता है?

भारत की आयुध निर्माण प्रणाली सेना, नौसेना और वायुसेना के लिए विभिन्न प्रकार के रक्षा उपकरण बनाती है।

मुख्य उत्पाद:

  • छोटे हथियार जैसे राइफल और पिस्तौल
  • तोपखाना प्रणाली और गोला-बारूद
  • बख्तरबंद वाहन और युद्धक टैंक
  • पैराशूट और सैन्य वर्दी
  • विस्फोटक और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण

आयुध निर्माणी दिवस 2026 कैसे मनाया जाता है?

आयुध निर्माणी दिवस पर देशभर के रक्षा प्रतिष्ठानों में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

मुख्य गतिविधियाँ:

  • ध्वजारोहण और परेड
  • हथियारों, टैंकों और उपकरणों की सार्वजनिक प्रदर्शनी
  • रक्षा तकनीक पर सेमिनार और कार्यशालाएँ
  • उत्कृष्टता के लिए ‘आयुध रत्न’ जैसे पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं

यह दिवस भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता को सशक्त बनाने और ‘मेक इन इंडिया’ जैसे अभियानों को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

सबसे ज्यादा गैस भंडार किन देशों में है, कौन देता है भारत को सबसे ज्‍यादा LPG?

ईरान युद्ध के कारण दुनिया में कच्चे तेल की सप्लाई बहुत ज्यादा टाइट हो गई है। इससे भारत में खासकर एलपीजी (LPG) की काफी दिक्कत हो गई है। पिछले कुछ दिनों से आम लोग इसे लेकर काफी परेशान हैं। भारत एलपीजी के बड़े उपभोक्ता में शामिल है लेकिन देश में ज्यादातर गैस बाहर से आती है। हालांकि ईरान युद्ध शुरू होने के बाद देश में एलपीजी के उत्पादन में 36 प्रतिशत तेजी आई है लेकिन देश में इसकी कुल उपलब्धता अब भी चिंताजनक है।

भारत दुनिया के सबसे बड़े LPG उपभोक्ताओं में से एक है जहां 33 करोड़ से ज्यादा घरों में LPG सिलेंडर इस्तेमाल होता है जिनमें 10 करोड़ से ज्यादा उज्ज्वला योजना के लाभार्थी हैं। देश में हर साल करीब 3 करोड़ टन LPG की खपत होती है जिसमें से सिर्फ 40%करीब 1.24 करोड़ टन घरेलू उत्पादन से आता है और बाकी 60% आयात करना पड़ता है।

एलपीजी संकट की वजह से अफरा-तफरी का भी माहौल है। भारत में कई कंपनियां हैं जो एलपीजी सिलिंडर की सप्लाई करती है। क्या आप जानते हैं कि दुनिया में एलपीजी का सबसे ज्यादा उत्पादन किस देश में होता है? इसका जवाब है अमेरिका। दूर-दूर तक कोई देश अमेरिका के साथ मुकाबले में नहीं है।

एलपीजी का भी सबसे बड़ा उत्पादक देश

अमेरिका दुनिया में कच्चे तेल के साथ-साथ एलपीजी का भी सबसे बड़ा उत्पादक देश है। एलपीजी प्रोपेन और ब्यूटेन जैसी हाइड्रोकार्बन गैसों के मिक्सचर होती है। आसान स्टोरेज और ट्रांसपोर्टेशन के लिए इसे प्रेशर से लिक्विफाइड किया जाता है। दुनिया में एलपीजी का उत्पादन दो तरीकों से होता है। पहला तरीका नेचुरल गैस प्रोसेसिंग का है। जब नेचुरल गैस निकाली जाती है तो इस प्रोसेस के दौरान प्रोपेन और ब्यूटेन को अलग कर दिया जाता है। दुनिया में सबसे ज्यादा LPG उत्पादन संयुक्त राज्य अमेरिका (USA)करता है.उसका करीब 25% से ज्यादा ग्लोबल प्रोडक्शन है. उसके बाद चीन,सऊदी अरब,रूस और कनाडा जैसे देश आते हैं।

भारत को LPG सबसे ज्यादा कहां से मिलती है?

भारत की LPG खपत का 60% आयात होता है। भारत को सबसे अधिक एलपीजी देने वाला देश कतर (Qatar)है। यहां से भारत के कुल LPG आयात का 34% हिस्सा आता है। हाल ही में भारत-कतर के बीच 78 अरब डॉलर का बड़ा समझौता हुआ है, जिसमें 2048 तक सालाना 75 लाख टन LNG सप्लाई जारी रहेगी। इसके बाद संयुक्त अरब अमीरात (UAE),अमेरिका (USA),ओमान (Oman), ऑस्ट्रेलिया,रूस और अन्य देशों से भी एलपीजी को समझौते हुए हैं।

 

बढ़ते आयात का असर, भारत का व्यापार घाटा 27.1 अरब डॉलर हुआ

भारत का व्यापार घाटा फरवरी 2026 में बढ़कर 27.1 अरब डॉलर हो गया है। इसका मुख्य कारण आयात में तेज वृद्धि और निर्यात में हल्की गिरावट है। वाणिज्य विभाग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, इस महीने भारत का निर्यात 36.61 अरब डॉलर रहा, जो पिछले वर्ष की तुलना में 0.81% कम है। वहीं, आयात 24% बढ़कर 63.71 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जिसका मुख्य कारण सोना और चांदी की अधिक खरीद है।

भारत का व्यापार घाटा: फरवरी 2026

फरवरी 2026 में भारत का व्यापार घाटा पिछले वर्ष के इसी महीने की तुलना में काफी बढ़ गया है। यह 27.1 अरब डॉलर पर पहुंच गया, जो फरवरी 2025 के 14 अरब डॉलर से लगभग दोगुना है। व्यापार घाटा तब होता है जब किसी देश का आयात उसके निर्यात से अधिक हो जाता है, जिससे नकारात्मक व्यापार संतुलन बनता है।

फरवरी में आयात बढ़कर 63.71 अरब डॉलर

व्यापार घाटा बढ़ने का एक प्रमुख कारण आयात में तेज वृद्धि है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, फरवरी 2026 में आयात 24% बढ़कर 63.71 अरब डॉलर हो गया। इस वृद्धि का मुख्य कारण सोना और चांदी की अधिक खरीद रही।

वैश्विक चुनौतियों के बीच निर्यात में हल्की गिरावट

फरवरी 2026 में भारत का निर्यात 36.61 अरब डॉलर रहा, जो पिछले वर्ष की तुलना में 0.81% की गिरावट दर्शाता है। यह गिरावट वैश्विक व्यापार परिस्थितियों में चल रही चुनौतियों को दर्शाती है।

पश्चिम एशिया संकट और लॉजिस्टिक्स बाधाओं का प्रभाव

अधिकारियों के अनुसार, पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक घटनाक्रम भारत के व्यापार को प्रभावित कर रहे हैं। इस क्षेत्र की स्थिति ने वैश्विक शिपिंग मार्गों में बाधा उत्पन्न की है और लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ा दी है। विशेष रूप से होरमुज़ जलडमरूमध्य के आसपास की स्थिति ने माल परिवहन को धीमा कर दिया है और परिवहन खर्च में वृद्धि की है।

नागोया प्रोटोकॉल: भारत की पहली राष्ट्रीय रिपोर्ट जारी

भारत ने नागोया प्रोटोकॉल (Nagoya Protocol) के तहत अपनी पहली राष्ट्रीय रिपोर्ट जैव विविधता पर अभिसमय (CBD) को सौंपी है। यह रिपोर्ट 27 फरवरी 2026 को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) के सहयोग से प्रस्तुत की। इसमें 1 नवंबर 2017 से 31 दिसंबर 2025 तक भारत की प्रगति को दर्शाया गया है।

नागोया प्रोटोकॉल रिपोर्ट: वैश्विक महत्व

  • यह रिपोर्ट प्रोटोकॉल के अनुच्छेद 29 के तहत प्रस्तुत की गई है, जिसके अनुसार देशों को पहुँच और लाभ-साझाकरण (ABS) नियमों के क्रियान्वयन की प्रगति बतानी होती है।
  • नागोया प्रोटोकॉल यह सुनिश्चित करता है कि जैव संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान के उपयोग से होने वाले लाभों का उचित और समान वितरण हो।
  • यह भारत की CBD के प्रति प्रतिबद्धता और राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीति (NBSAP) के लक्ष्य 13 को पूरा करने के प्रयासों को दर्शाता है।

भारत में ABS का कानूनी ढांचा

भारत में पहुँच और लाभ-साझाकरण (ABS) ढांचा जैव विविधता अधिनियम, 2002 के तहत संचालित होता है। यह अधिनियम देश में जैव संसाधनों के प्रबंधन के लिए कानूनी आधार प्रदान करता है। इस ढांचे को जैव विविधता नियम, 2024 और ABS Regulations, 2025 का समर्थन प्राप्त है, जो विभिन्न प्रशासनिक स्तरों पर प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करते हैं। साथ ही, यह प्रणाली एक तीन-स्तरीय संस्थागत संरचना का पालन करती है, जिसमें राष्ट्रीय, राज्य और स्थानीय स्तर पर भागीदारी सुनिश्चित कर जैव विविधता प्रबंधन को मजबूत बनाया जाता है।

तीन-स्तरीय जैव विविधता शासन प्रणाली

भारत में नागोया प्रोटोकॉल के तहत ABS ढांचा एक सुव्यवस्थित संस्थागत प्रणाली के माध्यम से संचालित होता है। यह प्रणाली पूरे देश में जैव विविधता शासन को मजबूत बनाने के लिए बनाई गई है।

इस संरचना में राष्ट्रीय, राज्य और स्थानीय स्तर की संस्थाएं शामिल हैं। प्रमुख संस्थान इस प्रकार हैं:

  • राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA)
  • राज्य स्तर पर राज्य जैव विविधता बोर्ड (SBBs) और केंद्र शासित प्रदेशों के जैव विविधता परिषदें
  • स्थानीय स्तर पर जैव विविधता प्रबंधन समितियाँ (BMCs)

भारत में अब तक 2,76,653 से अधिक जैव विविधता प्रबंधन समितियां (BMCs) स्थापित की जा चुकी हैं। ये समितियां स्थानीय समुदायों को जैव विविधता संरक्षण और लाभ-साझाकरण (Benefit Sharing) की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करती हैं।

ABS से प्राप्त वित्तीय लाभ

भारत में नागोया प्रोटोकॉल के तहत ABS ढांचे के कार्यान्वयन से जैव विविधता संरक्षण और स्थानीय समुदायों को महत्वपूर्ण वित्तीय लाभ प्राप्त हुए हैं। इस प्रक्रिया के तहत राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) की स्वीकृतियों से ₹216.31 करोड़ की राशि संचित की गई है।

इसके अलावा, ₹139.69 करोड़ की राशि लाभार्थियों—जिनमें स्थानीय समुदाय, किसान और पारंपरिक ज्ञान धारक शामिल हैं—को वितरित की गई है। वहीं, राज्य जैव विविधता बोर्ड (SBBs) की स्वीकृतियों के माध्यम से ₹51.96 करोड़ की अतिरिक्त राशि भी उत्पन्न की गई है।

यह वित्तीय उपलब्धियां दर्शाती हैं कि भारत में ABS तंत्र न केवल जैव विविधता संरक्षण को बढ़ावा दे रहा है, बल्कि स्थानीय समुदायों के आर्थिक सशक्तिकरण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

नागोया प्रोटोकॉल क्या है?

नागोया प्रोटोकॉल एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है, जिसे वर्ष 2010 में जैव विविधता पर अभिसमय के तहत अपनाया गया था। यह समझौता आनुवंशिक संसाधनों (Genetic Resources) तक पहुंच (Access) और उनके उपयोग से प्राप्त लाभों के न्यायसंगत एवं समान वितरण (Access and Benefit Sharing – ABS) पर केंद्रित है। इस प्रोटोकॉल का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जब किसी देश या आदिवासी/स्थानीय समुदाय के जैव संसाधनों या पारंपरिक ज्ञान का उपयोग अनुसंधान, औषधि, कृषि या जैव प्रौद्योगिकी में किया जाए, तो उन्हें उचित लाभ प्राप्त हो। साथ ही, यह समझौता वैज्ञानिक नवाचार को बढ़ावा देते हुए सतत जैव विविधता संरक्षण को भी प्रोत्साहित करता है।

डाक सेवाओं में सुधार: इंडिया पोस्ट ने ‘24 स्पीड पोस्ट’ की शुरुआत की

डाक विभाग 17 मार्च 2026 से नई ’24 स्पीड पोस्ट’ सेवा शुरू करने जा रहा है। यह प्रणाली तत्काल पार्सलों की अगले दिन गारंटीशुदा डिलीवरी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से शुरू की जा रही है। यह सेवा शुरू में छह प्रमुख शहरों में संचालित होगी, जो हैं—दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, बेंगलुरु और हैदराबाद। इस सेवा का शुभारंभ नई दिल्ली स्थित आकाशवाणी भवन के रंगभवन सभागार में होगा।

छह प्रमुख शहरों में सेवाएं शुरू की गईं

शुरुआत में, ये सेवाएं छह शहरों दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, बेंगलुरु और हैदराबाद में शुरू की जा रही हैं। विभाग निर्धारित समयसीमा के भीतर डिलीवरी सुनिश्चित करने के लिए विशेष प्रसंस्करण और प्राथमिकता आधारित हवाई परिवहन का उपयोग करेगा। 24 स्पीड पोस्ट सेवा के तहत अगले ही दिन यानी शिपमेंट की डिलीवरी तत्काल और समयबद्ध तरीके से की जाएगी। सबसे खास बात यह है कि डिलीवरी में देरी होने पर मनी-बैक गारंटी भी दी जाएगी।

ग्रामीण डाक सेवा की जमकर तारीफ

केंद्रीय संचार मंत्री इस मौके पर ग्रामीण डाक सेवा की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि इंडिया पोस्ट के पास दुनिया का सबसे बड़ा और गहरा नेटवर्क है। देश के 6.5 लाख गांवों की हर तहसील और तालुका में लोग परिवार के किसी सदस्य से भी बढ़कर किसी पर भरोसा करते हैं, तो वह ग्रामीण डाक सेवा है। उनके अनुसार, यह इंडिया पोस्ट के लिए एक नई शुरुआत का पल है।

सुरक्षा पर भी पूरा ध्यान रहेगा

इस सेवा में सुविधा के साथ-साथ सुरक्षा का भी पूरा ध्यान रखा गया है। इसमें ग्राहकों को ओटीपी आधारित सुरक्षित डिलीवरी, एसएमएस अलर्ट और एंड-टू-एंड ट्रैकिंग की सुविधा मिलेगी। व्यापारिक ग्राहकों के लिए बाद में भुगतान, भारी मात्रा में बुकिंग के लिए मुफ्त पिकअप और केंद्रीकृत बिलिंग जैसी सुविधाएं शामिल हैं।

स्मार्ट गांव की दिशा में कदम: कुसुनपुर होगा ओडिशा का पहला स्मार्ट गांव

कुसुनपुर गाँव, ओडिशा (Kusunpur village, Odisha) के केंद्रपाड़ा जिले में स्थित, राज्य का पहला स्मार्ट गांव बनने जा रहा है। इस पहल को वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (Council of Scientific and Industrial Research) द्वारा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत शुरू किया गया है। लगभग 130 परिवारों और 700 की आबादी वाले इस गांव को सतत और आत्मनिर्भर ग्रामीण जीवन के मॉडल के रूप में विकसित किया जाएगा।

कुसुनपुर स्मार्ट गांव परियोजना: दृष्टि और उद्देश्य

कुसुनपुर स्मार्ट गांव परियोजना का उद्देश्य उन्नत तकनीक और वैज्ञानिक समाधानों को सीधे ग्रामीण समुदायों तक पहुंचाना है। यह पहल मिशन मोड में लागू की जा रही है, जिसमें कई अनुसंधान संस्थान मिलकर व्यावहारिक और विस्तार योग्य समाधान लागू करेंगे। इसका मुख्य लक्ष्य एक आत्मनिर्भर, जलवायु-लचीला (climate resilient) और टिकाऊ गांव का निर्माण करना है, जो पूरे भारत के लिए एक मॉडल बन सके।

CSIR स्मार्ट गांव परियोजना: प्रमुख संस्थान

इस परियोजना में CSIR के अंतर्गत कई विशेषज्ञ संस्थान शामिल हैं, जो विभिन्न क्षेत्रों में अपनी विशेषज्ञता प्रदान करेंगे:

  • CSIR-केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (CBRI), रुड़की
  • CSIR-खनिज एवं सामग्री प्रौद्योगिकी संस्थान (IMMT), भुवनेश्वर
  • CSIR-केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (CEERI)
  • CSIR-अंतर्विषयक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राष्ट्रीय संस्थान (NIIST)
  • CSIR-संरचनात्मक इंजीनियरिंग अनुसंधान केंद्र (SERC)
  • CSIR-केंद्रीय चर्म अनुसंधान संस्थान (CLRI)

कुसुनपुर में स्मार्ट इंफ्रास्ट्रक्चर विकास

इस परियोजना का एक प्रमुख हिस्सा आधुनिक और जलवायु-अनुकूल बुनियादी ढांचे का विकास है। इसके तहत—

  • जलवायु-लचीले स्कूल और आंगनवाड़ी भवन
  • सामुदायिक शौचालयों का निर्माण
  • बेहतर गांव नियोजन और लेआउट
  • बहुउद्देश्यीय चक्रवात शेल्टर का निर्माण

ये सभी सुधार विशेष रूप से ओडिशा जैसे तटीय क्षेत्रों में सुरक्षा, स्वच्छता और आपदा-प्रबंधन को मजबूत करेंगे।

नवीकरणीय ऊर्जा और स्वच्छ जीवन समाधान

कुसुनपुर स्मार्ट गांव पहल के तहत स्वच्छ ऊर्जा और टिकाऊ जीवनशैली को बढ़ावा दिया जाएगा। इसके अंतर्गत—

  • सौर ऊर्जा जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का उपयोग
  • स्वच्छ ईंधन (clean cooking fuel) की उपलब्धता
  • सुरक्षित पेयजल की व्यवस्था

यह पहल ग्रामीण क्षेत्रों में पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ जीवन स्तर सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

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