Menaka Guruswamy ने रचा इतिहास, बनीं देश की पहली LGBTQ सांसद

सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने हाल ही में सांसद के रूप में शपथ लेकर नया इतिहास रच दिया है। वह भारत की पहली LGBTQ राज्यसभा सदस्य बन गईं हैं। यह कदम भारत में LGBTQ+ समुदाय के प्रतिनिधित्व के लिहाज से बहुत ही महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

कौन हैं मेनका गुरुस्वामी?

मेनका गुरुस्वामी ने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, हार्वर्ड लॉ स्कूल और नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी से कानून की डिग्री हासिल की है। मेनका गुरुस्वामी सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट हैं और कई संवैधानिक मामलों में अपनी विशेषज्ञता के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने 1997 में भारत के पूर्व अटॉर्नी जनरल अशोक देसाई के साथ काम करते हुए कानून की बारीकियां सीखीं। मेनका उन्हें अपना मेंटर मानती हैं।

किरण मनराल की किताब राइजिंग: 30 वीमेन हू चेंज्ड इंडिया में भी मेनका गुरुस्वामी को शामिल किया गया है। साल 2017 से 2019 तक वह न्यूयॉर्क के कोलंबिया लॉ स्कूल में बीआर आंबेडकर रिसर्च स्कॉलर और लेक्चरर थीं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सामने कई महत्वपूर्ण मामलों में अपनी दलीलें रखी हैं।

उनकी स्कूली पढ़ाई

उनकी स्कूली पढ़ाई हैदराबाद पब्लिक स्कूल में हुई, जिसके बाद उन्होंने दिल्ली के सरदार पटेल स्कूल से हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी की। उन्होंने इसके बाद नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु से साल 1997 में BALLB की डिग्री ली। उन्होंने इसके बाद ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से BCL और फिर हार्वर्ड लॉ स्कूल से LLM किया। मेनका गुरुस्वामी LLB करने के बाद 1997 में बार काउंसिल से जुड़ीं और तब के अटॉर्नी जनरल अशोक देसाई के साथ काम शुरू किया। उन्होंने ऑक्सफोर्ड और हार्वर्ड से डिग्री लेने के बाद न्यूयॉर्क में वकालत की।

धारा 377 केस में महत्वपूर्ण भूमिका

मेनका गुरुस्वामी उन वकीलों में शामिल रही हैं, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट में उस ऐतिहासिक केस में बहस की थी, जिसके बाद 2018 में भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को आंशिक रूप से रद्द कर दिया गया। इस फैसले के बाद भारत में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया था।

मेनका गुरुस्वामी की पार्टनर

मेनका गुरुस्वामी की पार्टनर अरुंधति काटजू हैं। वह पेशे से वकील हैं। इंडियन पीनल कोड (IPC) की धारा 377 के खिलाफ कानूनी लड़ाई में मेनका गुरुस्वामी और उनकी पार्टनर अरुंधति काटजू दोनों महत्वपूर्ण भूमिका में थीं। दिल्ली हाई कोर्ट ने साल 2009 में धारा 377 को खत्म कर दिया था, लेकिन इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट में मेनका और अरुंधति ने मिलकर इस मामले की पैरवी की। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए धारा 377 को फिर से लागू कर दिया।

भारत ने वित्त वर्ष 2025-26 में अब तक की सर्वाधिक पवन ऊर्जा क्षमता जोड़ी

भारत ने स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है, जिसके तहत वित्त वर्ष 2025-26 में 6.05 GW की रिकॉर्ड पवन ऊर्जा क्षमता जोड़ी गई है। इसके साथ ही, यह अब तक का सबसे अधिक वार्षिक उत्पादन बन गया है। यह वृद्धि पिछले वर्ष की तुलना में 46% की बढ़त को दर्शाती है और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में मज़बूत गति का संकेत देती है। इसके साथ ही, भारत की कुल स्थापित पवन ऊर्जा क्षमता 56 GW के पार पहुँच गई है, जिससे सतत ऊर्जा के क्षेत्र में एक वैश्विक अग्रणी के रूप में भारत की स्थिति और मज़बूत हुई है और देश 2030 के सतत लक्ष्यों को प्राप्त करने के और करीब पहुँच गया है।

2025-26 में पवन ऊर्जा में रिकॉर्ड तोड़ बढ़ोतरी

भारत के पवन ऊर्जा क्षेत्र में वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान ज़बरदस्त उछाल देखने को मिला है, और इसने 2016-17 में दर्ज किए गए 5.5 GW के पिछले उच्चतम स्तर को भी पार कर लिया है। 6.05 GW की अतिरिक्त क्षमता का जुड़ना, हरित ऊर्जा के विस्तार की दिशा में नए सिरे से किए जा रहे प्रयासों को दर्शाता है।

ये केवल आँकड़े ही नहीं हैं, बल्कि ये उस संरचनात्मक बदलाव को दर्शाते हैं कि भारत में नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं की योजना किस प्रकार बनाई और उन्हें किस प्रकार कार्यान्वित किया जाता है।

मुख्य बातें

  • वित्त वर्ष 2025-26 में कुल 6.05 GW पवन ऊर्जा क्षमता जोड़ी गई
  • जो वित्त वर्ष 2024-25 की तुलना में 46% की वृद्धि है
  • देश में कुल स्थापित पवन ऊर्जा क्षमता 56 GW के पार पहुँच गई है
  • यह 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ईंधन लक्ष्य की दिशा में हुई मज़बूत प्रगति को दर्शाता है

पवन ऊर्जा में इस तेज़ बढ़ोतरी की वजह क्या है?

पवन ऊर्जा क्षमता में यह भारी उछाल सरकार और उद्योग जगत के कई समन्वित प्रयासों का परिणाम है। टर्बाइन के पुर्जों पर रियायती सीमा शुल्क और 2028 तक इंटर-स्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम (ISTS) शुल्कों में छूट जैसी सरकारी पहलों ने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है। बेहतर ग्रिड कनेक्टिविटी और ट्रांसमिशन की तैयारी जैसे बुनियादी ढांचे पर ध्यान केंद्रित करने से, राष्ट्रीय ग्रिड में नवीकरणीय ऊर्जा का तेज़ी से एकीकरण संभव हो पाया है।

इसके अलावा, पारदर्शी बोली प्रणालियों के कारण पवन ऊर्जा की दरें किफायती हुई हैं, जिससे पवन ऊर्जा और भी अधिक आकर्षक बन गई है। पवन-सौर हाइब्रिड परियोजनाओं में हो रही यह वृद्धि कार्यक्षमता में सुधार ला रही है और चौबीसों घंटे बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित कर रही है।

पवन ऊर्जा विस्तार में शीर्ष योगदान देने वाले राज्य

भारत में, इस उपलब्धि को हासिल करने में कई राज्यों ने अहम भूमिका निभाई है।

शीर्ष 3 राज्य हैं:

  • गुजरात
  • कर्नाटक
  • महाराष्ट्र

ये राज्य भारत की पवन ऊर्जा क्रांति के मुख्य चालक के रूप में उभरे हैं।

वैश्विक पवन ऊर्जा क्षेत्र में भारत की स्थिति

पिछले कुछ दशकों में लगातार विकास और नीतिगत समर्थन के प्रयासों के कारण, भारत अब दुनिया भर में पवन ऊर्जा के शीर्ष उत्पादकों में से एक है।

देश की पवन ऊर्जा यात्रा 1990 के दशक की शुरुआत में शुरू हुई थी, और आज यह इन उपलब्धियों पर गर्व करता है:

  • एक मज़बूत विनिर्माण तंत्र।
  • साथ ही, ‘राष्ट्रीय पवन ऊर्जा संस्थान’ से मिलने वाला सशक्त संस्थागत सहयोग।
  • और निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी।

भारत के प्रमुख बंदरगाहों ने वित्त वर्ष 26 में 915.17 मिलियन टन कार्गो का प्रबंधन किया

भारत के समुद्री क्षेत्र ने एक अहम मील का पत्थर हासिल किया है, जिसमें प्रमुख बंदरगाहों ने वित्त वर्ष 2025-26 में रिकॉर्ड 915.17 मिलियन टन (MT) कार्गो का संचालन किया है। बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्रालय के अनुसार, यह प्रदर्शन न केवल 904 MT के वार्षिक लक्ष्य से अधिक रहा, बल्कि इसमें 7.06% की साल-दर-साल वृद्धि भी दर्ज की गई। यह उपलब्धि भारत की बढ़ती व्यापार क्षमता को दर्शाती है।

FY26 में रिकॉर्ड कार्गो हैंडलिंग की खास बातें

मंत्रालय ने बयान में कहा कि यह प्रदर्शन प्रमुख बंदरगाहों में निरंतर वृद्धि को दर्शाता है, जिसमें दीनदयाल बंदरगाह प्राधिकरण 160.11 मीट्रिक टन के साथ शीर्ष प्रदर्शनकर्ता के रूप में उभरा है, इसके बाद पारादीप बंदरगाह प्राधिकरण 156.45 मीट्रिक टन और जवाहरलाल नेहरू बंदरगाह प्राधिकरण (जेएनपीए) 102.01 मीट्रिक टन पर है।

वित्त वर्ष 26 में सबसे तेज़ी से बढ़ते बंदरगाह

विशाखापत्तनम बंदरगाह प्राधिकरण, मुंबई बंदरगाह प्राधिकरण, चेन्नई बंदरगाह प्राधिकरण और न्यू मंगलौर बंदरगाह प्राधिकरण सहित अन्य प्रमुख बंदरगाहों ने भी अच्छा प्रदर्शन किया, जिसने समग्र कार्गो माल ढुलाई में महत्वपूर्ण योगदान दिया। विकास दर के संदर्भ में, मोर्मुगाओ बंदरगाह प्राधिकरण ने 15.91 प्रतिशत की सबसे अधिक वृद्धि दर्ज की, इसके बाद कोलकाता डॉक सिस्टम 14.28 प्रतिशत और जेएनपीए 10.74 प्रतिशत पर रहे, जो बेहतर दक्षता और कार्गो की बढ़ती मात्रा को दर्शाते हैं।

सरकारी प्रोत्साहन और नीतिगत समर्थन

मंत्रालय के अनुसार कार्गो प्रबंधन में यह निरंतर वृद्धि कई कारकों द्वारा संचालित रही है, जिनमें बंदरगाहों के बुनियादी ढांचे का आधुनिकीकरण और उनकी क्षमता में वृद्धि, सुदृढ़ मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी तथा निर्बाध हिंटरलैंड लिंकेज (पश्चभूमि संपर्क), डिजिटल एवं स्मार्ट पोर्ट पहलों को अपनाना, और कोयला, कच्चे तेल, कंटेनर, उर्वरक एवं पी.ओ.एल. जैसी प्रमुख वस्तुओं के संचालन में वृद्धि शामिल है। साथ ही, जहाजों के टर्नअराउंड समय में सुधार और बंदरगाहों पर व्यापार सुगमता ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय बंदरगाह-आधारित विकास, लॉजिस्टिक्स एकीकरण और स्थिरता पर केंद्रित एक व्यापक समुद्री रणनीति को आगे बढ़ाना जारी रखे हुए है।

 

इतिहास के 3 सबसे बड़े और विनाशकारी युद्ध, जिन्होंने वैश्विक सीमाएं और राजनीतिक नक्शे बदल दिए

पश्चिम एशिया में तनाव जारी है। इसी बीच ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव के बीच 45 दिन के संभावित युद्धविराम को लेकर कूटनीतिक कोशिशें तेज हो गई हैं। युद्ध की वजह से दुनियाभर में घरेलू गैस और कच्चे तेल की कीमतों पर असर पड़ रहा है। इन युद्धों ने देशों की सीमाओं में बदलाव करने के साथ राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर काफी बड़ा बदलाव किया, जिसका सीधा असर लोगों के जीवन पर पड़ा। इतिहास में युद्ध अक्सर उम्मीद से कहीं ज्यादा लंबे चले हैं। दरअसल कुछ लड़ाइयां तो पीढ़ियों तक चली हैं।

इतिहास के 3 सबसे बड़े और विनाशकारी युद्ध: एक नजर में

प्रथम विश्व युद्ध: प्रथम विश्व युद्ध 1914 से 1918 तक लड़ा गया था। प्रथम विश्व युद्ध का तात्कालिक वजह ऑस्ट्रिया-हंगरी के प्रिंस आर्कड्यूक फर्डिनेंड की सर्बिया में हुई हत्या को माना जाता है। इसमें एक तरफ केंद्रीय शक्तियों में जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी और ओटोमन साम्राज्य था, तो दूसरी तरफ मित्र देश फ्रांस ब्रिटेन, रूस, इटली एवं अमेरिका भी शामिल हुए थे। पहली बार इस युद्ध में टैंकों, जहाजों और जहरीली गैसों का इस्तेमाल हुआ था, जिससे युद्ध के परिणाम भयावह हो गए थे। इस युद्ध में जर्मनी की हार हुई थी तथा बाद में वर्साय की संधि हुई थी, जिससे द्वितीय विश्व युद्ध की नींव तैयार हो गई थी।

द्वितीय विश्व युद्ध: साल 1939 से 1945 तक चला द्वितीय विश्व युद्ध इतिहास का सबसे घातक संघर्ष था। इसमें ‘टोटल वॉर’ के कॉन्सेप्ट ने शहरों को भी निशाना बनाया, जिससे भारी संख्या में नागरिक मारे गए। अकेले सोवियत संघ ने 2.7 करोड़ और चीन ने 2 करोड़ लोगों को खोया। जर्मनी और जापान के क्रूर कब्जे ने दुनिया को हिला कर रख दिया था। यह युद्ध उस समय हुआ, जब जर्मनी ने पोलैंड पर आक्रमण कर दिया था। इसे देखते हुए ब्रिटेन और फ्रांस ने भी जर्मनी के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया था। यह युद्ध जर्मनी, इटली और जापान जैसे धुरी राष्ट्र और ब्रिटेन, सोवियत संघ, अमेरकिा, फ्रांस और चीन जैसे मित्र देशों के बीच हुआ था। इस युद्ध में अमेरिका द्वारा जापान के हिरोशिमा एवं नागासाकी पर परमाणु बम गिराया गया था। वहीं, यहूदियां को मारा गया। इस युद्ध में मित्र देश जीते थे और संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई थी।

मंगोल आक्रमण: 13वीं शताब्दी में मंगोलों ने रूस से लेकर चीन और इराक तक अपना साम्राज्य फैलाया। वे जिस शहर से गुजरते, उसे कब्रिस्तान बना देते। फारस के निशापुर में 17 लाख और बगदाद में 10 लाख लोग मारे गए। अनुमान है कि उनके आक्रमणों में करीब 4 करोड़ लोग मारे गए और आज करोड़ों लोग चंगेज खान के वंशज हैं। इस युद्ध का परिणाम यह हुआ कि मंगलो साम्राज्य प्रशांत महासागर से पूर्वी यूरोप तक अपनी जगह बना चुका था। हालांकि, इस हमले में करोड़ों लोग मारे गए थे।

 

भुवनेश्वर कुमार IPL में 200 विकेट लेने वाले पहले तेज़ गेंदबाज़ बने

रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर और चेन्नई सुपर किंग्स के बीच हुए मुकाबले में भुवनेश्वर कुमार ने इतिहास रच दिया, क्योंकि वह इंडियन प्रीमियर लीग में 200 विकेट लेने वाले पहले तेज़ गेंदबाज़ बन गए। उन्होंने CSK के आयुष म्हात्रे को आउट करके यह उपलब्धि हासिल की। ​​यह लीग में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है, खासकर तब जब IPL के इतिहास में स्पिनरों को सबसे ज़्यादा विकेट लेने वालों के तौर पर जाना जाता है।

200 विकेट लेने वाले पहले तेज़ गेंदबाज़

क्रिकेट जगत के कई बड़े नाम IPL में खेल चुके हैं और अभी भी खेल रहे हैं, लेकिन यह उपलब्धि ऐतिहासिक है, क्योंकि उन्होंने अपना 200वां विकेट हासिल किया और ऐसा करने वाले पहले तेज़ गेंदबाज़ बन गए। आमतौर पर स्पिनरों को ही सबसे ज़्यादा विकेट लेने के लिए जाना जाता है, ऐसे में इस भारतीय तेज़ गेंदबाज़ के लिए यह उपलब्धि सचमुच ऐतिहासिक है।

वह इस समय IPL में सबसे ज़्यादा विकेट लेने वाले लेग स्पिनर युजवेंद्र चहल से ठीक पीछे हैं।

IPL में भुवनेश्वर का सफ़र

भुवनेश्वर ने 2011 में IPL में डेब्यू किया था और वे इन फ्रेंचाइज़ियों के सबसे भरोसेमंद गेंदबाज़ों में से एक रहे हैं:

  • रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु
  • पुणे वॉरियर्स इंडिया
  • सनराइज़र्स हैदराबाद

उनका सबसे बेहतरीन सीज़न 2017 में आया, जब उन्होंने 26 विकेट लिए और अपनी टीम के लिए ‘पर्पल कैप’ का अवॉर्ड जीता।

‘पर्पल कैप किंग’ के नाम से मशहूर

उनके नाम एक बेहद खास रिकॉर्ड दर्ज है — लगातार दो बार ‘पर्पल कैप’ जीतना।

  • 2016 – 23 विकेट
  • 2017 – 26 विकेट

IPL के इतिहास में वह एकमात्र ऐसे गेंदबाज़ हैं, जिन्होंने लगातार दो वर्षों तक यह उपलब्धि हासिल की है।

IPL में सबसे ज़्यादा विकेट लेने वाले टॉप 5 खिलाड़ियों की सूची

  • युजवेंद्र चहल : 223 विकेट
  • भुवनेश्वर कुमार: 202 विकेट
  • सुनील नरेन: 193 विकेट
  • पीयूष चावला : 192 विकेट
  • रविचंद्रन अश्विन: 187 विकेट

LPG उत्पादन में भारत के प्रमुख शहर कौन-कौन से हैं? देखें लिस्ट

भारत में आज 33 करोड़ से अधिक परिवार खाना बनाने के लिए एलपीजी सिलिडंर (LPG cylinder) का इस्तेमाल करते हैं। ईरान और अमेरिका-इजरायल युद्ध की वजह से एलपीजी की आपूर्ति प्रभावित हुई है। भारत में एलपीजी (LPG) का उत्पादन और वितरण तीन बड़ी सरकारी कंपनियों के पास है। इन कंपनियों की हिस्सेदारी भारतीय बाजार में सबसे अधिक है। ऐसे में इन्हें ऑयल मार्केटिंग कंपनियां भी कहा जाता है। इन तीन कंपनियों में भारत पेट्रोलियम, इंडियन ऑयल और हिंदुस्तान पेट्रोलियम के नाम शामिल है।

भारत की सबसे बड़ी सरकारी तेल कंपनी

इंडियन ऑयल द्वारा इंडेन नाम से एलपीजी गैस का उत्पादन कर बिक्री की जाती है। यह कंपनी भारत की सबसे बड़ी सरकारी तेल कंपनी है। बता दें कि भारतीय एलपीजी बाजार में इंडेन की सबसे बड़ी हिस्सेदारी है। यह भारत के कुल उत्पादन का 40 से 50 प्रतिशत हिस्से का योगदान देता है। ऐसे में यह विश्व के सबसे बड़े पैक-एलपीजी ब्रांडों में शामिल है। इंडियन गैस भारत की सबसे बड़ी एलपीजी कंपनी (India Number One LPG Company) है।

देश की दूसरी सबसे बड़ी सरकारी तेल कंपनी

भारत पेट्रोलियम अपने एलपीजी गैस उत्पाद को भारत गैस नाम से बेचता है। यह कंपनी देश की दूसरी सबसे बड़ी सरकारी तेल कंपनी है। साथ ही, इसके पास बड़ी रिफाइनरियों एवं बॉटलिंग प्लांट का अच्छा-खासा नेटवर्क भी है। देशभर में इसके करोड़ों उपभोक्ता हैं।

ONGC की सहायक कंपनी

हिंदुस्तान पेट्रोलियम अपने एलपीजी गैस उत्पाद को एचपी गैस (HP GAS) नाम से बेचता है। दरअसल, यह कंपनी ONGC की सहायक कंपनी के तौर पर काम करती है। हालांकि, भारत में इसकी पहचान गैस उत्पादन और वितरण के लिए भी है। इस कंपनी के कमर्शियल गैस सिलिंडर अधिक देखने को मिलते हैं।

गैस का मार्केट शेयर

Indane सबसे बड़े हिस्से के साथ सबसे आगे है, जिसके बाद Bharat Gas और HP Gas का स्थान आता है। निजी खिलाड़ियों की मौजूदगी अभी भी अपेक्षाकृत कम है। इसके बाद दूसरे नंबर पर भारत गैस है। भारत गैस का मार्केट शेयर करीब 26 से 27 फीसदी है। तीसरे नंबर पर HP गैस है। इसका मार्केट शेयर करीब 22 से 24 फीसदी है। और 2 से 7 फीसदी में बाकी के प्लेयर हैं।

भारत में प्रमुख LPG उत्पादक शहर और रिफाइनरियां:

  • जामनगर (गुजरात): रिलायंस इंडस्ट्रीज की रिफाइनरी के साथ देश का सबसे बड़ा एलपीजी हब।
  • पानीपत (हरियाणा): इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOCL) की बड़ी रिफाइनरी।
  • मथुरा (उत्तर प्रदेश): IOCL रिफाइनरी।
  • हल्दिया (पश्चिम बंगाल): IOCL रिफाइनरी।
  • कोच्चि (केरल): भारत पेट्रोलियम (BPCL) रिफाइनरी।
  • मंगलोर (कर्नाटक): मंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स (MRPL)।
  • वडोदरा/कोयाली (गुजरात): IOCL रिफाइनरी।
  • वडिनार (गुजरात): नायरा एनर्जी रिफाइनरी।
  • बरौनी (बिहार): IOCL रिफाइनरी।
  • पारादीप (ओडिशा): IOCL रिफाइनरी।
  • भटिंडा (पंजाब): HPCL-मित्तल रिफाइनरी।
  • असम (बोंगाईगांव, डिगबोई, गुवाहाटी): यहाँ भी IOCL की रिफाइनरियां LPG का उत्पादन करती हैं।

 

जानें भारत के किस शहर से पहली बार हुई थी जनगणना की शुरुआत?

बता दें कि, भारत में जनगणना 2026-27 की शुरुआत हो गई है। इस बार इसे दो चरणों में पूरा किया जाएगा। इसके तहत पहले चरण में मकान और निवास का डाटा एकत्रित होगा और दूसरा चरण फरवरी 2027 में शुरू होगा, जिसमें शिक्षा, लिंग, धर्म और जाति से जुड़े आंकड़े शामिल रहेंगे।

हालांकि, यह पहली बार नहीं है, जब भारत में जनगणना हो रही है। इसकी शुरुआत 202 साल पहले उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में साल 1824 में हुई थी, जब आर. गुलाब ने शहर की जनगणना कराई थी। भारत का पहली डिजिटल जनगणना (Census) 1 अप्रैल 2026 से शुरू हो चुकी है।

डिजिटल भारत के दौर में अब कागज-कलम की जगह मोबाइल ऐप एवं टैबलेट ने ले ली है। इसी तकनीकी बदलावों के अनुरूप खुद को बदलते हुए भारत सरकार ने अपनी आबादी की जनगणना डिजिटली कराने की सोची है। भारत में आखिरी बार साल 2011 में जनगणना हुई थी। यह देश की 15वीं और आजाद भारत की 7वीं जनगणना थी।

पहली बार जनगणना

इलाहाबाद में साल 1824 में आर. गुलाब ने पहली बार जनगणना कराई थी। इसके बाद 1827-28 में बनारस में जेम्स प्रिंसेप ने जनगणना करवाई। वहीं, साल 1830 में ढाका में हेनरी वाल्टर ने जनगणना कराई, जिसे पहली और पूरी तरह आधुनिक शहर की जनगणना माना गया।

भारत में पहली बार देशव्यापी जनगणना

भारत में पहली बार देशव्यापी जनगणना साल 1872 में गवर्नर जनरल लॉर्ड मेयो के कार्यकाल में हुई थी। हालांकि, यह एक ही समय पर नहीं हुई थी और इस दौरान कई क्षेत्र शामिल नहीं हो सके थे। इस कारण से इस जनगणना को सही नहीं माना जाता है।

भारत में पहली नियमित जनगणना साल 1881 में गवर्नर जनरल रहे लॉर्ड रिपन के कार्यकाल में हुई थी। उस समय डब्ल्यू. सी. प्लाउडेन के नेतृत्व में पूरे देश में एक साथ जनगणना की गई थी। इसके बाद प्रत्येक 10 साल में एक बार जनगणना की परंपरा शुरू हुई थी।

आजादी के बाद भारत की पहली जनगणना

आजादी के बाद भारत की पहली जनगणना साल 1951 में हुई थी। यह जनगणना 10 फरवरी 1951 को शुरू हुई और 1948 के जनगणना अधिनियम के तहत आयोजित की गई थी।

गुजरात हाईकोर्ट ने AI के इस्तेमाल को लेकर एक सख्त नीति जारी की

गुजरात हाई कोर्ट ने एक नीति जारी की है, जिसके तहत न्यायिक फ़ैसले लेने या फ़ैसलों का मसौदा तैयार करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई है। हाई कोर्ट ने माना है कि AI कार्यक्षमता को बेहतर बना सकता है, लेकिन साथ ही इस बात पर भी ज़ोर दिया है कि निष्पक्षता, जवाबदेही और न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए न्याय प्रक्रिया के केंद्र में मानवीय तर्कशक्ति ही रहनी चाहिए। यह कदम कानून और शासन जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में AI की भूमिका को लेकर बढ़ती बहसों के बाद उठाया गया है।

निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार

बार ऐंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, हाईकोर्ट ने साफ कहा है कि AI का इस्तेमाल किसी भी तरह की न्यायिक सोच, तर्क, बेल या सजा तय करने जैसे अहम फैसलों में नहीं किया जा सकता। इस नीति को संविधान के अनुच्छेद 225 और अनुच्छेद 227 के तहत बनाई गई है और इसका आधार अनुच्छेद 21 में दिए गए निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार पर रखा गया है।

AI का इस्तेमाल सबूतों को छाँटने

यह नियम हाईकोर्ट से लेकर जिला अदालतों तक सभी जजों, कोर्ट कर्मचारियों, लीगल असिस्टेंट, इंटर्न और पैरा-लीगल वॉलंटियर्स पर लागू होगा। नीति के अनुसार, AI का इस्तेमाल सबूतों को छाँटने, उनकी विश्वसनीयता जाँचने, गवाही का सार निकालने या किसी भी तरह के प्रमाण के मूल्यांकन में भी नहीं किया जा सकता।

कुछ सीमित कामों के लिए AI की अनुमति

हालाँकि, कुछ सीमित कामों के लिए AI की अनुमति दी गई है। जैसे कानूनी रिसर्च, पुराने फैसलों को खोजना, कानून की व्याख्या समझना और प्रशासनिक कार्य जैसे नोटिस या सर्कुलर बनाना। इसके अलावा AI का उपयोग भाषा सुधारने या ड्राफ्ट को बेहतर बनाने में किया जा सकता है लेकिन अंतिम कानूनी तर्क और फैसला पूरी तरह जज का ही होगा।

AI की गलती को बहाना नहीं बनाया जा सकता

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि AI से बनी किसी भी जानकारी की जिम्मेदारी पूरी तरह उस व्यक्ति की होगी जो उस पर हस्ताक्षर करता है। AI की गलती को बहाना नहीं बनाया जा सकता। साथ ही, निजी और संवेदनशील जानकारी जैसे पक्षकारों के नाम, पते, केस से जुड़े दस्तावेज या गोपनीय जानकारी को सार्वजनिक AI टूल में डालने पर भी रोक लगा दी गई है।

विभागीय कार्रवाई

यदि कोई इस नीति का उल्लंघन करता है तो उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई के साथ-साथ IT ऐक्ट एवं भारतीय न्याय संहिता 2024 के तहत कानूनी कार्रवाई हो सकती है। कोर्ट ने चेतावनी दी है कि AI में पक्षपात हो सकता है और इसलिए न्याय व्यवस्था में इसका सावधानी से इस्तेमाल जरूरी है।

शासन और सेवा वितरण को बढ़ावा देने हेतु ‘साधना सप्ताह 2026’ का शुभारंभ

भारत ने ‘साधना सप्ताह 2026’ की शुरुआत की है। यह एक राष्ट्रव्यापी पहल है, जिसका मुख्य उद्देश्य नागरिक-केंद्रित शासन को मज़बूत करना और सिविल सेवाओं में क्षमता निर्माण करना है। यह सप्ताह 2 से 8 अप्रैल 2026 तक मनाया जाएगा। इस कार्यक्रम के तहत विभिन्न मंत्रालय, राज्य और कई प्रशिक्षण संस्थान एक साथ मिलकर कौशल, जवाबदेही और सेवा वितरण को बेहतर बनाने का काम करेंगे। यह कार्यक्रम ‘मिशन कर्मयोगी’ के अंतर्गत संचालित किया जाएगा और यह आधुनिक तथा प्रौद्योगिकी-आधारित शासन की ओर हो रहे बदलाव को दर्शाता है।

साधना सप्ताह क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?

  • ‘साधना सप्ताह’ का पूरा नाम ‘राष्ट्रीय प्रगति के लिए अनुकूलनीय विकास और मानवीय योग्यता को सुदृढ़ बनाना’ (Strengthening Adaptive Development and Humane Aptitude for National Advancement) है। यह भारत की सबसे बड़ी सहयोगात्मक शासन पहलों में से एक है।
  • इसका आयोजन कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT), क्षमता निर्माण आयोग और कर्मयोगी भारत द्वारा किया जाता है।
  • इस पहल का उद्देश्य जवाबदेह और नागरिक-केंद्रित शासन को बढ़ावा देना, तथा सिविल सेवकों में कौशल और दक्षताओं का विकास करना है।
  • चूँकि इस कार्यक्रम में 100 से अधिक मंत्रालयों, 36 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों और 250 से अधिक प्रशिक्षण संस्थानों की भागीदारी होगी, इसलिए यह शासन सुधारों की दिशा में एक कदम है।

मिशन कर्मयोगी: सिविल सेवाओं की रीढ़

‘साधना सप्ताह’ का विचार ‘मिशन कर्मयोगी’ में निहित है, जो सिविल सेवाओं की क्षमता निर्माण के लिए भारत का एक प्रमुख कार्यक्रम है।

इसे ‘सिविल सेवाओं की क्षमता निर्माण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम’ के नाम से भी जाना जाता है। इसका मुख्य ध्यान निम्नलिखित बातों पर होगा:

  • नियम-आधारित शासन से भूमिका-आधारित शासन की ओर बढ़ना
  • साथ ही, सक्षमता-आधारित प्रशासन का निर्माण करना
  • जवाबदेही और कार्य-कुशलता को बढ़ाना

यह मिशन माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विज़न के साथ शुरू किया गया था, और इसका उद्देश्य एक ऐसी ‘भविष्य के लिए तैयार’ नौकरशाही का निर्माण करना है, जो बेहतर सार्वजनिक सेवाएँ प्रदान करने में सक्षम हो।

iGOT कर्मयोगी प्लेटफॉर्म के माध्यम से डिजिटल परिवर्तन

इस परिवर्तन का मुख्य आधार iGOT कर्मयोगी प्लेटफॉर्म है, जो सरकारी अधिकारियों के लिए एक डिजिटल लर्निंग इकोसिस्टम है।

इस प्लेटफॉर्म के तहत अब तक की मुख्य उपलब्धियां इस प्रकार हैं:

  • 1.5 करोड़ से अधिक पंजीकृत शिक्षार्थी
  • 8 करोड़ से अधिक कोर्स पूरे किए गए
  • कई भाषाओं में 4,600+ कोर्स तक पहुंच

यह प्लेटफ़ॉर्म किसी भी समय, कहीं भी सीखने की सुविधा प्रदान करता है, साथ ही व्यवहारिक, कार्यात्मक और संबंधित क्षेत्रों में कौशल विकास में भी मदद करता है।

साधना सप्ताह 2026 के तीन मुख्य विषय

  • प्रौद्योगिकी: जो स्मार्ट गवर्नेंस को शक्ति प्रदान करेगी।
  • परंपरा: भारत की ज्ञान प्रणालियों से सीखना।
  • मूर्त: सुधारों के वास्तविक प्रभाव को मापना।

इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि नीतियां नागरिकों के जीवन में स्पष्ट सुधार लाएं।

इस सप्ताह शुरू की जाने वाली प्रमुख पहलें

शासन क्षमता को मज़बूत करने के लिए कई नए कार्यक्रम शुरू किए गए हैं।

  • कर्मयोगी क्षमता कनेक्ट – फ्रंटलाइन सेवा देने के कौशल को बेहतर बनाता है
  • राष्ट्रीय जन सेवा कार्यक्रम – ज़मीनी स्तर पर लोगों की भागीदारी को भी बढ़ावा देता है
  • UNNATI पोर्टल – प्रशिक्षण संस्थानों के लिए डिजिटल आधार
  • AI-आधारित अमृत ज्ञान कोष – शासन से जुड़ी सीख पर आधारित केस-स्टडी
  • विकसित पंचायत के लिए क्षमता निर्माण – स्थानीय शासन को मज़बूत बनाता है

 

छत्तीसगढ़ में लगभग एक सदी बाद काले हिरणों की वापसी

छत्तीसगढ़ राज्य से काले हिरणों के संरक्षण की एक शानदार सफलता की कहानी सामने आई है। इस राज्य में एक समय यह प्रजाति विलुप्त हो गई थी, लेकिन कई प्रयासों के बाद अब राज्य में काले हिरणों की आबादी में लगातार बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। 1927 में आखिरी बार आधिकारिक तौर पर देखे जाने के लगभग एक सदी बाद, अब राज्य में लगभग 130 काले हिरण खुले जंगल में आज़ादी से घूम रहे हैं, और लगभग 80 अन्य काले हिरणों को भी जंगल में छोड़े जाने का इंतज़ार है। यह पुनर्स्थापन अभियान 2018 में शुरू किया गया था, और यह वन्यजीवों के संरक्षण और बहाली के प्रयासों में एक अहम मोड़ साबित हुआ है।

विलुप्ति से पुनरुद्धार तक – काले हिरणों की यात्रा

काला हिरण, जो कि मृगों की एक सुंदर प्रजाति है और मूल रूप से भारतीय उपमहाद्वीप का निवासी है, आवास की कमी और शिकार के दबाव के कारण छत्तीसगढ़ से विलुप्त हो गया था।

इनके पुनरुद्धार की शुरुआत वर्ष 2018 में बरनवापारा वन्यजीव अभयारण्य में हुई, जहाँ काले हिरणों का पहला जत्था (बैच) छोड़ा गया। इनमें से 50 हिरणों को दिल्ली से लाकर यहाँ बसाया गया, जबकि 27 हिरण बिलासपुर स्थित कानन पेंडारी चिड़ियाघर से लाए गए थे।

शुरुआत में उन्हें बाड़ों में रखा गया था, और जंगल में छोड़े जाने से पहले जानवरों को सावधानीपूर्वक तैयार की गई वातावरण के अनुकूल ढलने की प्रक्रिया से गुज़रना पड़ा। Covid-19 काल के दौरान लगभग 15 जानवरों की मृत्यु हो गई थी। इस झटके के बावजूद, प्रभावी संरक्षण रणनीतियों के कारण उनकी आबादी में लगातार वृद्धि हुई है।

आज बरनवापारा में लगभग:

  • 130 काले हिरण खुले जंगल में हैं
  • 60 सुरक्षित बाड़ों में हैं

वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत वैज्ञानिक संरक्षण

काले हिरणों को फिर से बसाने का कार्यक्रम वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के प्रावधानों के तहत चलाया गया है। यह अधिनियम एक वैज्ञानिक और नैतिक दृष्टिकोण सुनिश्चित करता है।

इस प्रक्रिया में ये चीज़ें शामिल थीं:

  • उनके लिए तनाव-मुक्त स्थानांतरण तकनीकें।
  • साथ ही, धीरे-धीरे माहौल में ढलने के लिए अनुकूलन बाड़े।
  • PTZ IR कैमरों का उपयोग करके लगातार निगरानी।
  • वन रक्षकों द्वारा रोज़ाना पैदल गश्त।

इन प्रयासों के चलते मृत्यु दर का जोखिम कम हुआ है और जीवित रहने की दर में सुधार आया है; इसी वजह से यह भारत की सबसे आशाजनक वन्यजीव पुनर्स्थापन परियोजनाओं में से एक बन गई है।

आवास का विस्तार: गोमर्धा अभयारण्य के लिए नई योजनाएँ

बरनवापारा में मिली सफलता से उत्साहित होकर, वन विभाग अब गोमर्धा वन्यजीव अभयारण्य में काले हिरणों का एक और समूह लाने की योजना बना रहा है।

इस कदम का उद्देश्य है:

  • प्रजाति के भौगोलिक विस्तार को बढ़ाना
  • किसी एक ही आवास पर पड़ने वाले पारिस्थितिक दबाव को कम करना
  • जनसंख्या की दीर्घकालिक स्थिरता को सुदृढ़ बनाना

काले हिरण का संरक्षण क्यों ज़रूरी है?

  • काले हिरण न सिर्फ़ देखने में बेहद आकर्षक जानवर होते हैं, बल्कि वे पारिस्थितिकी तंत्र में एक अहम भूमिका भी निभाते हैं।
  • खुरदरी घास खाने वाले जानवर होने के नाते, वे घास के मैदानों के पारिस्थितिकी तंत्र को स्वस्थ बनाए रखने में मदद करते हैं।
  • उनकी मौजूदगी, ऐसी घास की प्रजातियों को फैलने से रोकने में मदद करती है जिन्हें दूसरे जानवर खाना पसंद नहीं करते; साथ ही, वे घास के मैदानों की उत्पादकता को बढ़ाने में भी सहायक होते हैं।
  • इसके अलावा, वे शिकारी जानवरों के लिए शिकार के विविध स्रोतों को बनाए रखने में भी मदद करते हैं, और खुले आवासों में पारिस्थितिकी संतुलन को बनाए रखते हैं।

कृष्णमृग के बारे में

  • यह मृग की एक प्रजाति है जो मूल रूप से भारत और नेपाल में पाई जाती है।
  • वैज्ञानिक नाम: Antilope cervicapra
  • वितरण: राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, ओडिशा और प्रायद्वीपीय भारत के अन्य हिस्सों में व्यापक रूप से पाया जाता है।
  • राजकीय पशु: इसे पंजाब, हरियाणा और आंध्र प्रदेश द्वारा राजकीय पशु घोषित किया गया है।
  • आवास: यह खुले घास के मैदानों, शुष्क झाड़ीदार क्षेत्रों और हल्के वन क्षेत्रों को पसंद करता है।
  • इसे IUCN की सूची के तहत अनुसूची I (Schedule I) श्रेणी में रखा गया था।

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