मनु भाकर ने एशियन शूटिंग चैंपियनशिप 2026 में 25 मीटर पिस्टल में सिल्वर मेडल जीता

भारत की स्टार निशानेबाज़ मनु भाकर ने नई दिल्ली में आयोजित एशियन शूटिंग चैंपियनशिप 2026 में 25 मीटर पिस्टल स्पर्धा में रजत पदक जीतकर जोरदार वापसी की। यह उपलब्धि उन्होंने 10 मीटर एयर पिस्टल फाइनल में सातवां स्थान हासिल करने के महज़ पाँच दिन बाद दर्ज की। कड़े मुकाबले, जबरदस्त दबाव और डबल शूट-ऑफ के बीच मनु ने मानसिक मजबूती दिखाते हुए दूसरा स्थान हासिल किया। यह 25 मीटर पिस्टल में उनका पहला व्यक्तिगत सिल्वर मेडल है।

25 मीटर पिस्टल फाइनल में सिल्वर मेडल की कहानी

25 मीटर पिस्टल फाइनल में मनु भाकर ने धीमी शुरुआत के बावजूद संयम और धैर्य बनाए रखा। उन्होंने क्वालिफिकेशन में 584 अंक हासिल कर आराम से फाइनल में जगह बनाई, जो उनके शानदार फॉर्म को दर्शाता है। फाइनल बेहद रोमांचक रहा, जहां मनु ने 35 अंक बनाए और वियतनाम की थुई ट्रांग गुयेन के साथ बराबरी पर रहीं। इसके बाद मुकाबला दो बार शूट-ऑफ में गया। दूसरे शूट-ऑफ में मनु तीन टारगेट चूक गईं, जिससे उन्हें स्वर्ण से चूककर रजत पदक से संतोष करना पड़ा।

धीमी शुरुआत, लेकिन दमदार वापसी

फाइनल के शुरुआती दौर में ईशा सिंह और गुयेन बढ़त बनाए हुए थीं, जबकि मनु लय में आने के लिए संघर्ष कर रही थीं। मुकाबले का टर्निंग पॉइंट नौवीं एलिमिनेशन सीरीज़ में आया, जब ईशा सिंह ने पाँच शॉट मिस कर दिए। इससे मनु के लिए रास्ता खुला और उन्होंने शांत दिमाग के साथ सिल्वर मेडल पोज़िशन हासिल कर ली। दबाव में फोकस बनाए रखने की उनकी क्षमता उनके फाइनल टेम्परामेंट में आए सुधार को दर्शाती है।

10 मीटर एयर पिस्टल के झटके के बाद मानसिक मजबूती

10 मीटर एयर पिस्टल में सातवें स्थान पर रहने को लेकर मनु भाकर ने कहा कि वह हमेशा “बड़ी तस्वीर” पर ध्यान देती हैं। उन्होंने बताया कि वह निराशाजनक नतीजों से जल्दी आगे बढ़ना सीख चुकी हैं। उनके अनुसार, एक इवेंट में हार या जीत दूसरी स्पर्धा के प्रदर्शन को तय नहीं करती। यही सोच उन्हें 25 मीटर पिस्टल फाइनल में मानसिक रूप से तरोताजा और प्रतिस्पर्धी बनाए रखने में मददगार रही।

25 मीटर पिस्टल में पहला व्यक्तिगत रजत

जहां मनु भाकर ने 10 मीटर एयर पिस्टल में कई पदक जीते हैं, वहीं 25 मीटर पिस्टल उनके लिए अपेक्षाकृत चुनौतीपूर्ण स्पर्धा रही है। यह रजत पदक इस इवेंट में उनका पहला व्यक्तिगत सिल्वर है। इससे पहले उन्होंने ISSF वर्ल्ड कप 2021 और 2023 में कांस्य पदक जीते थे। एशियन शूटिंग चैंपियनशिप 2026 का यह सिल्वर उनके प्रदर्शन में निरंतरता और फाइनल में बढ़ती मजबूती का संकेत माना जा रहा है।

10 मीटर और 25 मीटर इवेंट्स के बीच संतुलन

मनु भाकर 2018 से 10 मीटर एयर पिस्टल और 25 मीटर पिस्टल—दोनों स्पर्धाओं में हिस्सा ले रही हैं। उनका मानना है कि एक इवेंट का परिणाम दूसरे पर असर नहीं डालता। उनके अनुसार, सही तैयारी और अनुभव से संतुलन बनता है। यही स्पष्ट सोच उन्हें हर मुकाबले को अलग नजरिए से खेलने में मदद करती है, जो एशियन चैंपियनशिप जैसे उच्च दबाव वाले टूर्नामेंट में बेहद अहम है।

आगे की राह: एशियन गेम्स और ओलंपिक क्वालिफिकेशन

भारतीय निशानेबाज़ों के लिए 2026 बेहद अहम साल है, क्योंकि एशियन गेम्स नज़दीक हैं और लॉस एंजेलिस ओलंपिक 2028 के लिए क्वालिफिकेशन प्रक्रिया 31 जुलाई से शुरू होनी है। मनु ने कहा कि अपने कोच के साथ मिलकर सही समय पर पीक फॉर्म हासिल करना सबसे बड़ा लक्ष्य रहेगा। प्रतियोगिताओं का सही चयन, वर्कलोड मैनेजमेंट और फॉर्म—यही उनकी आगे की राह तय करेंगे। फिलहाल, एशियन गेम्स उनके प्रतिस्पर्धी कैलेंडर का प्रमुख लक्ष्य हैं।

भारत और ग्रीस ने पांच साल के गेम प्लान के साथ रक्षा समझौता किया

भारत और ग्रीस ने अपने रणनीतिक और सैन्य साझेदारी को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए रक्षा औद्योगिक सहयोग को बढ़ावा देने के लिए संयुक्त आशय घोषणा (Joint Declaration of Intent) पर हस्ताक्षर किए हैं। यह समझौता 10 फरवरी 2026 को अंतिम रूप दिया गया, जिसके तहत दोनों देशों के रक्षा उद्योगों के बीच सहयोग के लिए पाँच वर्षीय रोडमैप तय किया गया है। इसके साथ ही, दोनों पक्षों ने 2026 के लिए द्विपक्षीय सैन्य सहयोग योजना (Bilateral Military Cooperation Plan – BMCP) का भी आदान-प्रदान किया, जो क्षेत्रीय और समुद्री सुरक्षा में अधिक मजबूत सैन्य सहभागिता और आपसी समन्वय का संकेत देता है।

संयुक्त आशय घोषणा (Joint Declaration of Intent) का उद्देश्य

संयुक्त आशय घोषणा का मुख्य उद्देश्य भारत और ग्रीस के स्वदेशी रक्षा उद्योगों के बीच सहयोग को व्यापक बनाना है। यह पाँच वर्षीय रोडमैप भारत की आत्मनिर्भर भारत पहल को ग्रीस की एजेंडा 2030 के तहत हेल्लेनिक रक्षा सुधारों के साथ जोड़ता है। इसका लक्ष्य रक्षा विनिर्माण में संयुक्त विकास, सह-उत्पादन और प्रौद्योगिकी साझेदारी को प्रोत्साहित करना है, जिससे आत्मनिर्भरता बढ़े, आयात पर निर्भरता कम हो और दोनों देशों की रक्षा कंपनियों एवं स्टार्टअप्स के लिए नए अवसर खुलें।

2026 के लिए द्विपक्षीय सैन्य सहयोग योजना का आदान-प्रदान

इस बैठक का एक प्रमुख परिणाम 2026 के लिए द्विपक्षीय सैन्य सहयोग योजना (BMCP) का आदान-प्रदान रहा। यह योजना भारत और ग्रीस की सशस्त्र सेनाओं के बीच संयुक्त अभ्यास, प्रशिक्षण कार्यक्रम, आदान-प्रदान और सैन्य सहभागिता की दिशा तय करती है। इस तरह की संरचित योजना से नियमित संपर्क, आपसी समन्वय और विश्वास निर्माण को बढ़ावा मिलता है, जिससे रक्षा कूटनीति और परिचालन सहयोग मजबूत होता है।

IFC-IOR, गुरुग्राम में ग्रीक अधिकारी की तैनाती

समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में ग्रीस ने गुरुग्राम स्थित सूचना संलयन केंद्र–हिंद महासागर क्षेत्र (IFC-IOR) में एक ग्रीक अंतरराष्ट्रीय संपर्क अधिकारी की तैनाती की घोषणा की है। इससे सूचना साझा करने, समुद्री क्षेत्र जागरूकता और हिंद महासागर क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा मिलेगा, जो समुद्री मार्गों की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़ी साझा चिंताओं को दर्शाता है।

नई दिल्ली में उच्चस्तरीय रक्षा वार्ता

यह समझौता नई दिल्ली में भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और ग्रीस के राष्ट्रीय रक्षा मंत्री निकोलाओस-जॉर्जियोस डेंडियास के बीच हुई द्विपक्षीय बैठक के दौरान अंतिम रूप दिया गया। दोनों नेताओं ने दोहराया कि भारत–ग्रीस रणनीतिक साझेदारी शांति, स्थिरता, स्वतंत्रता और आपसी सम्मान जैसे साझा मूल्यों पर आधारित है, और उन्होंने क्षेत्रीय व वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों पर भी चर्चा की।

समुद्री दृष्टिकोण और रणनीतिक अभिसरण

भारत और ग्रीस ने स्वयं को प्राचीन समुद्री राष्ट्र बताते हुए समुद्री सुरक्षा में अपने साझा हितों को रेखांकित किया। चर्चाओं में नौवहन की स्वतंत्रता, क्षेत्रीय स्थिरता और सुरक्षित समुद्री मार्गों के महत्व पर जोर दिया गया। यह समुद्री फोकस व्यापक रक्षा सहयोग को पूरक बनाता है और वैश्विक भू-राजनीति में इंडो–मेडिटेरेनियन संपर्क के बढ़ते महत्व को दर्शाता है।

भारत–ग्रीस रणनीतिक साझेदारी

भारत और ग्रीस के बीच संबंध सांस्कृतिक जुड़ाव, लोकतांत्रिक मूल्यों और बढ़ते रणनीतिक सहयोग पर आधारित रहे हैं। हाल के वर्षों में रक्षा और सुरक्षा इस साझेदारी के प्रमुख स्तंभ बनकर उभरे हैं। संयुक्त आशय घोषणा और संरचित सैन्य योजनाएँ यह संकेत देती हैं कि दोनों देश अब केवल संवाद तक सीमित न रहकर कार्रवाई-उन्मुख सहयोग, विशेषकर रक्षा विनिर्माण और समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में, की ओर बढ़ रहे हैं।

आर विजय आनंद सिटी यूनियन बैंक के CEO नियुक्त

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने आर. विजय आनंद को सिटी यूनियन बैंक (CUB) का नया प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी (MD & CEO) नियुक्त करने की मंज़ूरी दे दी है। यह स्वीकृति 9 फरवरी 2026 के RBI पत्र के माध्यम से दी गई है और उनकी नियुक्ति 1 मई 2026 से प्रभावी होगी। यह निर्णय भारत के प्रमुख निजी क्षेत्र के बैंकों में से एक सिटी यूनियन बैंक में नेतृत्व परिवर्तन का संकेत देता है।

RBI की मंज़ूरी के अनुसार, आर. विजय आनंद का कार्यकाल तीन वर्षों का होगा, जो 1 मई 2026 से शुरू होगा। बैंक ने इसकी जानकारी स्टॉक एक्सचेंज को दी है, हालांकि नियामकीय प्रावधानों के अनुसार यह नियुक्ति शेयरधारकों की स्वीकृति के अधीन होगी।

वेतन और पारिश्रमिक

RBI ने विजय आनंद का वार्षिक पारिश्रमिक ₹2.50 करोड़ (परिलाभ सहित) तय किया है। यह एक निश्चित वेतन संरचना है, जो निजी क्षेत्र के बैंकों में शीर्ष प्रबंधन के पारिश्रमिक से जुड़े RBI के दिशा-निर्देशों के अनुरूप है। इससे बैंकिंग नेतृत्व में पारदर्शिता और सुशासन पर नियामक के ज़ोर को रेखांकित किया गया है।

पेशेवर अनुभव

आर. विजय आनंद को बैंकिंग क्षेत्र में 28 वर्षों से अधिक का अनुभव है। उन्होंने जोखिम प्रबंधन, क्रेडिट मूल्यांकन, पोर्टफोलियो विश्लेषण और रिटेल बैंकिंग जैसे क्षेत्रों में कार्य किया है। सिटी यूनियन बैंक से पहले वे RBL बैंक में रिटेल एसेट प्रोडक्ट्स के बिज़नेस एवं कलेक्शंस हेड रह चुके हैं और शीर्ष प्रबंधन के साथ निकटता से काम कर चुके हैं।

सिटी यूनियन बैंक में करियर प्रगति

विजय आनंद ने 2023 में एग्ज़ीक्यूटिव प्रेसिडेंट के रूप में सिटी यूनियन बैंक जॉइन किया था और 2024 में एग्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर (ED) बनाए गए। आंतरिक पदोन्नति से उनकी नियुक्ति बैंक में नेतृत्व निरंतरता और संस्थागत अनुभव को दर्शाती है, जिसे नियामक और निवेशक दोनों सकारात्मक रूप से देखते हैं।

आउटगोइंग एमडी व सीईओ

वर्तमान एमडी व सीईओ एन. कामकोडी मई 2011 से बैंक का नेतृत्व कर रहे हैं और उनका कार्यकाल 30 अप्रैल 2026 को समाप्त होगा। लगभग 15 वर्षों के उनके कार्यकाल के बाद यह सुनियोजित नेतृत्व परिवर्तन बैंक की संचालनात्मक स्थिरता सुनिश्चित करेगा।

RBI की भूमिका और सिटी यूनियन बैंक

सिटी यूनियन बैंक भारत के सबसे पुराने निजी क्षेत्र के बैंकों में से एक है, जिसकी मजबूत क्षेत्रीय उपस्थिति और रिटेल व MSME बैंकिंग पर विशेष पकड़ है। RBI वरिष्ठ प्रबंधन नियुक्तियों को मंज़ूरी देकर बैंकिंग प्रणाली की स्थिरता, सुशासन और जमाकर्ताओं के विश्वास को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है। ऐसे निर्णय बैंकिंग से जुड़े करंट अफेयर्स में विशेष महत्व रखते हैं।

केरल की पहली दिव्यांग महिला जज: थन्या नाथन ने सिविल जज परीक्षा में टॉप किया

केरल अपनी न्यायिक व्यवस्था में इतिहास रचने की कगार पर है। समावेशन और दृढ़ संकल्प का सशक्त उदाहरण पेश करते हुए, दृष्टिबाधित युवा वकील थन्या नाथन ने सिविल जज (जूनियर डिवीजन) परीक्षा में बेंचमार्क दिव्यांग श्रेणी के उम्मीदवारों में मेरिट सूची में पहला स्थान हासिल किया है। यह उपलब्धि केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की विकसित होती उस सोच को दर्शाती है जहाँ न्यायपालिका में क्षमता का मूल्यांकन योग्यता से होता है, न कि दिव्यांगता से।

थन्या नाथन कौन हैं? केरल की पहली दृष्टिबाधित महिला न्यायाधीश

थन्या नाथन केरल के कन्नूर ज़िले की 24 वर्षीय वकील हैं। जन्म से दृष्टिबाधित थन्या का पालन-पोषण मंगड में हुआ और उन्होंने विशेष व मुख्यधारा—दोनों प्रकार के संस्थानों से स्कूली शिक्षा प्राप्त की। उनकी शैक्षणिक यात्रा निरंतर उत्कृष्टता से भरी रही। केरल हाईकोर्ट सिविल जज (जूनियर डिवीजन) परीक्षा में बेंचमार्क दिव्यांग श्रेणी में शीर्ष रैंक हासिल कर वह केरल की पहली दृष्टिबाधित महिला न्यायाधीश बनने जा रही हैं—जो भारत में न्यायिक विविधता के लिए एक ऐतिहासिक क्षण है।

शैक्षणिक यात्रा और प्रारंभिक जीवन

थन्या नाथन की कहानी बचपन से ही दृढ़ता की मिसाल है। उन्होंने ब्रेल आधारित शिक्षण प्रणालियों और सहायक तकनीकों की मदद से पढ़ाई की। विधि अध्ययन के दौरान वह अपने बैच की एकमात्र दृष्टिबाधित छात्रा थीं और कन्नूर विश्वविद्यालय से एलएलबी में प्रथम स्थान प्राप्त किया। उनकी सफलता ने साबित किया कि सुलभ शिक्षा और संकल्प, संरचनात्मक सीमाओं को पार कर सकते हैं—और इसी ने उनके कानूनी करियर की मज़बूत नींव रखी।

सिविल जज परीक्षा की तैयारी कैसे की?

कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद थन्या ने तालिपरम्बा में जूनियर वकील के रूप में कार्य किया। उन्होंने केस नोट्स ब्रेल में तैयार किए और शोध व ड्राफ्टिंग के लिए स्क्रीन-रीडिंग सॉफ़्टवेयर का सहारा लिया। उनकी तैयारी अनुशासित आत्म-अध्ययन पर आधारित थी, जिसमें ब्रेल सामग्री, ऑडियो संसाधन और डिजिटल टूल्स शामिल थे। तिरुवनंतपुरम के एक वरिष्ठ वकील से साक्षात्कार मार्गदर्शन ने भी उनकी तैयारी को मज़बूत किया। यह पद्धति दिखाती है कि तकनीक किस तरह दिव्यांग व्यक्तियों की प्रतियोगी परीक्षाओं में समान भागीदारी संभव बनाती है।

न्यायालयों में दृष्टिबाधित पेशेवरों की चुनौतियाँ

प्रगति के बावजूद, थन्या नाथन ने बताया है कि कई न्यायालय प्रणालियाँ अभी भी पूरी तरह सुलभ नहीं हैं। भौतिक ढाँचा, डिजिटल कोर्ट प्लेटफ़ॉर्म और केस मैनेजमेंट सिस्टम अक्सर दिव्यांग-अनुकूल नहीं होते। उन्होंने आशा व्यक्त की है कि अधिकारी सुलभता में सुधार करेंगे ताकि दिव्यांग न्यायाधीश और वकील बिना बाधाओं के कार्य कर सकें। उनकी उपलब्धि भारत भर में समावेशी न्यायालयी अवसंरचना की आवश्यकता पर नया ध्यान केंद्रित करती है।

वह सुप्रीम कोर्ट का फैसला जिसने रास्ता खोला

थन्या की सफलता का एक महत्वपूर्ण आधार 2025 का सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय रहा, जिसमें स्पष्ट किया गया कि केवल दिव्यांगता के आधार पर किसी को न्यायिक सेवा से अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि दिव्यांगता के कारण किसी अवसर से वंचित नहीं किया जा सकता और राज्यों से समावेशी भर्ती नीतियाँ अपनाने का आग्रह किया। यह फैसला देशभर में न्यायिक समावेशन के लिए मील का पत्थर बन गया।

आगे क्या होगा?

केरल हाईकोर्ट ने अंतिम चयन सूची राज्य सरकार को औपचारिक नियुक्ति आदेश जारी करने के लिए भेज दी है। विधि विशेषज्ञों और नागरिक समाज ने इस उपलब्धि को अधिक प्रतिनिधि न्यायपालिका की दिशा में बड़ा कदम बताया है। नियुक्ति के बाद थन्या नाथन न केवल न्यायाधीश के रूप में सेवा देंगी, बल्कि भारत की न्याय व्यवस्था में समान अवसर का सशक्त प्रतीक भी बनेंगी।

भारत-नीदरलैंड हाइड्रोजन फेलोशिप कार्यक्रम का शुभारंभ, जानें सबकुछ

भारत ने स्वच्छ ऊर्जा नेतृत्व की दिशा में एक और अहम कदम उठाया है। 10 फरवरी 2026 को भारत और नीदरलैंड्स ने नया हाइड्रोजन फ़ेलोशिप प्रोग्राम शुरू किया और ग्रीन हाइड्रोजन अनुसंधान में शैक्षणिक सहयोग का विस्तार किया। यह पहल उभरती हाइड्रोजन तकनीकों में कौशल, शोध क्षमता और उन्नत ज्ञान विकसित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर भारत के बढ़ते ज़ोर को दर्शाती है, जो दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु लक्ष्यों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

भारत–नीदरलैंड्स हाइड्रोजन फ़ेलोशिप के बारे में

भारत–नीदरलैंड्स हाइड्रोजन फ़ेलोशिप प्रोग्राम का शुभारंभ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के सचिव अभय करंदीकर द्वारा किया गया। यह फ़ेलोशिप एक राष्ट्रीय क्षमता-विकास पहल के रूप में तैयार की गई है, जिसके तहत भारतीय शोधकर्ताओं को नीदरलैंड्स के उन्नत हाइड्रोजन इकोसिस्टम में प्रशिक्षण मिलेगा। यह स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु-केंद्रित अनुसंधान में भारत–नीदरलैंड्स के बढ़ते सहयोग को दर्शाता है।

कौन आवेदन कर सकता है और फ़ेलोशिप क्या प्रदान करती है

यह फ़ेलोशिप मान्यता प्राप्त संस्थानों से जुड़े भारतीय पीएचडी शोधार्थियों, पोस्ट-डॉक्टोरल शोधकर्ताओं और फैकल्टी सदस्यों के लिए खुली है। प्रतिभागियों को नीदरलैंड्स के अत्याधुनिक हाइड्रोजन इंफ्रास्ट्रक्चर का संरचित अनुभव मिलेगा। इसका उद्देश्य बड़े पैमाने की हाइड्रोजन प्रणालियों और पोर्ट-आधारित ऊर्जा मॉडल जैसे यूरोपीय सर्वोत्तम तरीकों से सीख लेकर भारत की तकनीकी तैयारी को मजबूत करना है।

हाइड्रोजन फ़ेलोशिप के प्रमुख फोकस क्षेत्र

कार्यक्रम में सिस्टम इंटीग्रेशन, हाइड्रोजन सुरक्षा मानक, टेक्नो-इकोनॉमिक विश्लेषण, लाइफ-साइकिल असेसमेंट और स्वदेशीकरण मार्गों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। ये सभी क्षेत्र हाइड्रोजन तकनीकों को प्रयोगशालाओं से वास्तविक उपयोग तक ले जाने के लिए निर्णायक हैं। DST के अनुसार, फ़ेलोशिप इस तरह डिज़ाइन की गई है कि शोध परिणाम सीधे भारत की स्वच्छ ऊर्जा आवश्यकताओं का समर्थन करें, खासकर स्टील, सीमेंट और भारी परिवहन जैसे कठिन क्षेत्रों में।

यूनिवर्सिटी ऑफ़ ग्रोनिंगन और IITs के साथ शैक्षणिक MoU

फ़ेलोशिप के साथ-साथ, DST ने यूनिवर्सिटी ऑफ़ ग्रोनिंगन और 19 भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) के बीच एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक समझौता (MoU) कराने में भूमिका निभाई। यह MoU हाइड्रोजन और ग्रीन एनर्जी शोध में दीर्घकालिक सहयोग का ढांचा तैयार करता है। इसके तहत फैकल्टी और छात्र विनिमय, संयुक्त शोध परियोजनाएँ और संरचित ज्ञान-साझाकरण संभव होगा, बिना किसी स्वतः वित्तीय प्रतिबद्धता के।

नीदरलैंड्स क्यों है एक प्रमुख हाइड्रोजन साझेदार

नीदरलैंड्स हाइड्रोजन इंफ्रास्ट्रक्चर, पोर्ट-आधारित ऊर्जा प्रणालियों और स्वच्छ ऊर्जा लॉजिस्टिक्स का अग्रणी यूरोपीय केंद्र है। औद्योगिक क्लस्टरों में हाइड्रोजन एकीकरण का उसका अनुभव भारत के लिए अत्यंत उपयोगी है। यह सहयोग भारतीय शोधकर्ताओं को वास्तविक दुनिया के हाइड्रोजन तैनाती मॉडल से सीखने का अवसर देता है और भारत की वैश्विक हाइड्रोजन उत्पादन एवं निर्यात हब बनने की महत्वाकांक्षा को मजबूती देता है।

भारत के राष्ट्रीय ऊर्जा लक्ष्यों के साथ सामंजस्य

ये पहलें भारत के नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन, ऊर्जा स्वतंत्रता 2047 और नेट-ज़ीरो 2070 लक्ष्यों के साथ पूरी तरह संरेखित हैं। डच डिप्टी एम्बेसडर हुइब माइनारेंड्स ने ऊर्जा संक्रमण में साझा प्राथमिकताओं को रेखांकित किया, जबकि यूनिवर्सिटी ऑफ़ ग्रोनिंगन के अध्यक्ष जौके डे व्रीज़ ने वैश्विक हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था के निर्माण के लिए दीर्घकालिक शैक्षणिक साझेदारी के महत्व पर ज़ोर दिया।

उत्तर प्रदेश ने अपना पहला आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया

उत्तर प्रदेश ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए अपना पहला आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 प्रस्तुत किया है, जो अब तक केवल केंद्र सरकार के स्तर पर देखने को मिलता था। वित्त मंत्री सुरेश खन्ना द्वारा राज्य विधानसभा में प्रस्तुत इस सर्वेक्षण में उत्तर प्रदेश को 1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का स्पष्ट, आंकड़ों पर आधारित रोडमैप दिया गया है। इसमें निवेश-आधारित विकास, बुनियादी ढांचे के विस्तार और विभिन्न क्षेत्रों में सुधारों पर विशेष जोर दिया गया है।

उत्तर प्रदेश आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26: राज्य के लिए पहली बार

उत्तर प्रदेश आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 राज्य की अर्थव्यवस्था, वित्तीय स्थिति और विकासशील क्षेत्रों का व्यापक मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। यह पहली बार है जब उत्तर प्रदेश ने इस तरह का विस्तृत वार्षिक आर्थिक दस्तावेज जारी किया है। सर्वेक्षण में निरंतर आर्थिक वृद्धि, बेहतर राजकोषीय अनुशासन और बढ़ते निवेशक विश्वास को रेखांकित किया गया है। यह उत्तर प्रदेश को एक उभरती हुई आर्थिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है, जिसे शासन सुधारों, डिजिटल प्रणालियों और सुदृढ़ कानून-व्यवस्था का समर्थन प्राप्त है। यह दस्तावेज विकसित उत्तर प्रदेश 2047 के दीर्घकालिक विजन के अनुरूप है, जिसमें सतत विकास, रोजगार सृजन और समावेशी प्रगति पर फोकस किया गया है।

निवेश-आधारित विकास के जरिए 1 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था का लक्ष्य

आर्थिक सर्वेक्षण का मुख्य उद्देश्य उत्तर प्रदेश को 1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाना है। राज्य का सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) 2016-17 में ₹13.30 लाख करोड़ से बढ़कर 2024-25 में ₹30.25 लाख करोड़ हो गया है, जबकि 2025-26 में इसके ₹36 लाख करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। औसत वार्षिक वृद्धि दर 10.8% रही है, जो देश में सबसे अधिक में से एक है। ₹50 लाख करोड़ से अधिक के निवेश प्रस्ताव घरेलू और वैश्विक निवेशकों के बढ़ते विश्वास को दर्शाते हैं।

‘ट्रिपल एस’ मॉडल: सुरक्षा, स्थिरता और गति

सर्वेक्षण में सरकार के “ट्रिपल एस” निवेश मॉडल—सुरक्षा, स्थिरता और गति को विकास रणनीति की रीढ़ बताया गया है। बेहतर कानून-व्यवस्था, पूर्वानुमेय नीतियां और तेज़ परियोजना स्वीकृतियों ने कारोबारी माहौल को मजबूत किया है। निवेश मित्र जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म समयबद्ध मंजूरी और पारदर्शिता सुनिश्चित करते हैं। उल्लेखनीय है कि विश्व आर्थिक मंच 2026 में ₹2.94 लाख करोड़ के MoU पर हस्ताक्षर हुए, जिससे उत्तर प्रदेश की वैश्विक निवेश छवि और मजबूत हुई है।

बुनियादी ढांचे पर जोर: एक्सप्रेसवे, हवाई अड्डे और लॉजिस्टिक्स

उत्तर प्रदेश आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में बुनियादी ढांचे को विकास का प्रमुख चालक बताया गया है। राज्य भारत के एक्सप्रेसवे हब के रूप में उभर रहा है, जहां 22 एक्सप्रेसवे संचालित या प्रस्तावित हैं। देश का सबसे बड़ा रेल नेटवर्क उत्तर प्रदेश में है और 24 हवाई अड्डों के विकास की योजना है, जिनमें पांच अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे शामिल हैं। जेवर अंतरराष्ट्रीय ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट को उत्तर भारत का प्रमुख कार्गो और लॉजिस्टिक्स केंद्र बनाने की योजना है, जिससे निर्यात और रोजगार को बढ़ावा मिलेगा।

उद्योग और विनिर्माण: क्लस्टर आधारित विकास

औद्योगिक विकास में तेज़ी आई है। पंजीकृत कारखानों की संख्या 30,000 के पार पहुंच गई है, जो हाल के वर्षों में लगभग दोगुनी हो गई है। औद्योगिक सकल मूल्य वर्धन (GVA) में 25% की वृद्धि दर्ज की गई है, जो प्रमुख राज्यों में सबसे अधिक है। क्लस्टर रणनीति के तहत लखनऊ को AI हब, कानपुर को ड्रोन निर्माण और परीक्षण केंद्र, और नोएडा को आईटी व इलेक्ट्रॉनिक्स हब के रूप में विकसित किया जा रहा है। इससे रोजगार सृजन और विनिर्माण क्षमता को मजबूती मिली है।

कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था: अब भी आधार स्तंभ

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार कृषि उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बनी हुई है। 2024-25 में अर्थव्यवस्था में कृषि की हिस्सेदारी बढ़कर 24.9% हो गई। राज्य 737.4 लाख मीट्रिक टन उत्पादन के साथ देश का सबसे बड़ा खाद्यान्न उत्पादक बना हुआ है। उत्पादकता में वृद्धि, MSP पर अधिक खरीद, सूक्ष्म सिंचाई और विस्तारित सिंचाई कवरेज से किसानों की आय में सुधार हुआ है। दालों और तिलहनों के रकबे में भी वृद्धि हुई है।

स्वास्थ्य, सामाजिक कल्याण और शासन सुधार

स्वास्थ्य बजट 2025-26 में बढ़कर ₹46,728.48 करोड़ हो गया है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बेहतर हुई और जेब से होने वाला खर्च घटा है। संस्थागत प्रसव 96.12% तक पहुंच गए हैं और पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों का पूर्ण टीकाकरण सुनिश्चित किया गया है। कानून-व्यवस्था सुधार, तकनीक आधारित पुलिसिंग, महिला सुरक्षा पहल और फास्ट-ट्रैक अदालतों ने शासन व्यवस्था को मजबूत किया है। राज्य का बजट बढ़कर ₹8.33 लाख करोड़ हो गया है, जबकि ऋण-से-GSDP अनुपात 28% है, जो राष्ट्रीय औसत से कम है।

ग्रामीण कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने हेतु गुजरात ने स्पेसएक्स की सहायक कंपनी स्टारलिंक से साझेदारी की

सैटेलाइट इंटरनेट कंपनी स्टारलिंक (Starlink) भारत के पश्चिमी राज्य गुजरात में एंट्री करने वाली है। गुजरात सरकार ने स्पेसएक्स(SpaceX) की सब्सिडियरी के साथ लेटर ऑफ़ इंटेंट (LoI) साइन किया है। लेटर ऑफ़ इंटेंट एक्सचेंज सेरेमनी गांधीनगर में मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल और उपमुख्यमंत्री हर्ष सांघवी की मौजूदगी में हुई। जिसका उद्देश्य, राज्य के दूरदराज, सीमावर्ती और ऐसे इलाकों में हाई-स्पीड सैटेलाइट-आधारित इंटरनेट कनेक्टिविटी उपलब्ध कराई जाएगी। डिजिटल इंडिया और विकसित भारत 2047 के लक्ष्यों के अनुरूप यह पहल ई-गवर्नेंस, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और आपदा प्रबंधन को मज़बूत करने के लिए विश्वसनीय डिजिटल कनेक्टिविटी सुनिश्चित करेगी।

गुजरात–स्टारलिंक समझौता: क्या है पूरा मामला

मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में गुजरात सरकार ने स्पेसएक्स की सहायक कंपनी स्टारलिंक सैटेलाइट कम्युनिकेशंस के साथ सहयोग ढांचे में प्रवेश किया है। इस आशय पत्र (LoI) का मुख्य उद्देश्य उन क्षेत्रों में सैटेलाइट आधारित ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी उपलब्ध कराना है, जहाँ पारंपरिक दूरसंचार नेटवर्क कमजोर हैं या उपलब्ध नहीं हैं। यह साझेदारी दिसंबर 2025 में राज्य नेतृत्व और स्टारलिंक के वैश्विक नेतृत्व के बीच हुई प्रारंभिक चर्चाओं का परिणाम है।

डिजिटल इंडिया विज़न और राज्यव्यापी कनेक्टिविटी

यह पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के डिजिटल इंडिया विज़न के अनुरूप है, जिसका लक्ष्य तकनीक आधारित शासन और समावेशी विकास है। सैटेलाइट इंटरनेट के माध्यम से गुजरात भौगोलिक बाधाओं को पार कर सीमावर्ती और आंतरिक आदिवासी क्षेत्रों तक ई-गवर्नेंस, सार्वजनिक सेवाओं और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की पहुँच सुनिश्चित करना चाहता है।

आदिवासी और आकांक्षी जिलों में पायलट परियोजनाएँ

पायलट चरण में नर्मदा और दाहोद जैसे आदिवासी एवं आकांक्षी जिलों में स्टारलिंक कनेक्टिविटी उपलब्ध कराई जाएगी, जहाँ लंबे समय से कनेक्टिविटी की समस्याएँ बनी हुई हैं। इससे कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) और ई-गवर्नेंस सुविधाएँ अधिक प्रभावी ढंग से काम कर सकेंगी तथा नागरिकों को सरकारी योजनाओं, प्रमाणपत्रों और कल्याणकारी सेवाओं तक तेज़ पहुँच मिलेगी।

स्वास्थ्य, शिक्षा और टेली-मेडिसिन को बढ़ावा

इस पहल का एक प्रमुख हिस्सा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC), सरकारी स्कूलों और टेली-मेडिसिन केंद्रों के लिए स्मार्ट कनेक्टिविटी है। हाई-स्पीड इंटरनेट से दूरस्थ परामर्श, डिजिटल कक्षाएँ, रियल-टाइम डेटा शेयरिंग और आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएँ संभव होंगी, खासकर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में।

आपदा प्रबंधन और सुरक्षा को मजबूती

LoI में जिला आपदा प्रबंधन नियंत्रण कक्षों, पुलिस चौकियों, बंदरगाहों और वन्यजीव अभयारण्यों के लिए कनेक्टिविटी भी शामिल है। विश्वसनीय सैटेलाइट संचार से प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियाँ, आपातकालीन समन्वय, तटीय सुरक्षा, वन्यजीव निगरानी और राजमार्ग सुरक्षा प्रणालियाँ मज़बूत होंगी। इससे यह पहल विकास के साथ-साथ लचीलापन और आंतरिक सुरक्षा के लिए भी अहम बनती है।

औद्योगिक, बंदरगाह और बुनियादी ढाँचा कनेक्टिविटी

सामाजिक क्षेत्रों के अलावा, समझौते में GIDC औद्योगिक पार्कों, बंदरगाहों, समुद्री संचालन और तटीय पुलिस इकाइयों में डिजिटल कनेक्टिविटी सुधारने का प्रावधान है। इससे औद्योगिक दक्षता, लॉजिस्टिक्स, सुरक्षा और निगरानी बेहतर होगी और गुजरात एक अग्रणी विनिर्माण व निवेश गंतव्य के रूप में अपनी स्थिति और सुदृढ़ करेगा।

 

इसरो ने चंद्रयान-4 के लैंडिंग स्थल का चयन कर लिया—जानें यह क्यों महत्वपूर्ण है

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने अपने आगामी चंद्रयान-4 मिशन के लिए चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास लैंडिंग स्थल की आधिकारिक पहचान कर ली है। केंद्रीय सरकार द्वारा स्वीकृत यह मिशन भारत का पहला चंद्र नमूना-वापसी (लूनर सैंपल रिटर्न) मिशन होगा, जिसे लगभग 2028 में प्रक्षेपित किए जाने का लक्ष्य रखा गया है। चयनित लैंडिंग स्थल मॉन्स मूटन (Mons Mouton) क्षेत्र में स्थित है, जो चंद्रमा के सबसे वैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण लेकिन तकनीकी रूप से अत्यंत चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में से एक माना जाता है।

चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव इतना महत्वपूर्ण क्यों है

चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यहां स्थायी रूप से छाया में रहने वाले गड्ढे (Permanently Shadowed Craters) मौजूद हैं, जिनमें जल-बर्फ (Water Ice) होने की संभावना है। यह भविष्य के मानव मिशनों के लिए एक अहम संसाधन हो सकता है। हालांकि, यह क्षेत्र लैंडिंग के लिए बेहद कठिन भी है, क्योंकि यहां—

  • ऊबड़-खाबड़ भू-भाग
  • तीखी ढलानें और गहरे गड्ढे
  • अत्यधिक तापमान परिवर्तन
  • पृथ्वी से सीमित सीधा संचार जैसी चुनौतियां मौजूद हैं। इन कठिनाइयों के बावजूद, इसरो के विस्तृत विश्लेषण से सबसे अधिक सुरक्षा मार्जिन वाला स्थान चिन्हित किया गया है।

मॉन्स मूटन क्षेत्र: अंतिम लैंडिंग स्थल कैसे चुना गया

इसरो के वैज्ञानिकों ने मॉन्स मूटन क्षेत्र में चार संभावित लैंडिंग स्थलों— MM-1, MM-3, MM-4 और MM-5—का मूल्यांकन किया। विस्तृत भू-आकृतिक और जोखिम (हैज़र्ड) विश्लेषण के बाद MM-4 को सबसे सुरक्षित विकल्प के रूप में चुना गया।

MM-4 लैंडिंग साइट की प्रमुख विशेषताएं

  • मूल्यांकित क्षेत्र: 1 किमी × 1 किमी
  • औसत ढलान: लगभग 5 डिग्री (चंद्र मानकों के अनुसार अपेक्षाकृत समतल)
  • औसत ऊंचाई: लगभग 5,334 मीटर
  • सबसे अधिक खतरे-रहित ग्रिड्स
  • चट्टानों और गड्ढों की सबसे कम घनत्व

ये सभी गुण MM-4 को सटीक सॉफ्ट लैंडिंग के लिए आदर्श बनाते हैं।

चंद्रयान-4: अब तक का सबसे जटिल भारतीय चंद्र मिशन

चंद्रयान-4 मिशन, पिछले मिशनों की तुलना में कहीं अधिक उन्नत है और इसमें कई विशेष मॉड्यूल शामिल हैं—

  • प्रोपल्शन मॉड्यूल (PM) – डीप स्पेस मैनूवर के लिए
  • ट्रांसफर मॉड्यूल (TM) – पृथ्वी-चंद्रमा स्थानांतरण के लिए
  • डिसेंडर मॉड्यूल (DM) – चंद्र सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग के लिए
  • असेंडर मॉड्यूल (AM) – चंद्र नमूनों को ऊपर उठाने के लिए
  • री-एंट्री मॉड्यूल (RM) – नमूनों को सुरक्षित पृथ्वी पर वापस लाने के लिए

DM + AM स्टैक उन्नत नेविगेशन, गाइडेंस और कंट्रोल सिस्टम की मदद से दक्षिणी ध्रुव पर अत्यधिक सटीक लैंडिंग करेगा।

इसरो के लिए चंद्रयान-4 एक बड़ी छलांग क्यों है

चंद्रयान-4 केवल लैंडिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि चंद्र मिट्टी को पृथ्वी पर वापस लाने का मिशन है। यह भारत को उन चुनिंदा अंतरिक्ष शक्तियों के समूह में शामिल करता है, जो सैंपल-रिटर्न मिशन करने में सक्षम हैं—इन्हें अंतरिक्ष अभियानों में सबसे कठिन माना जाता है।

यह मिशन इसरो की क्षमताओं को और मजबूत करता है—

  • स्वायत्त लैंडिंग
  • सटीक नेविगेशन
  • डीप-स्पेस संचार
  • ग्रहों के नमूनों का सुरक्षित प्रबंधन

भारत की चंद्र विरासत पर कैसे आगे बढ़ता है चंद्रयान-4

इसरो की चंद्र यात्रा क्रमिक रूप से आगे बढ़ी है—

  • चंद्रयान-1 (2008) – चंद्रमा की कक्षा से जल अणुओं की पुष्टि
  • चंद्रयान-2 (2019) – ऑर्बिटर सफल, लैंडर असफल
  • चंद्रयान-3 (2023) – दक्षिणी ध्रुव के पास ऐतिहासिक सॉफ्ट लैंडिंग
  • चंद्रयान-4 (2028) – दक्षिणी ध्रुव से नमूना-वापसी का नियोजित मिशन

हर मिशन ने चंद्रयान-4 के लिए आवश्यक आत्मविश्वास और तकनीकी क्षमता को मजबूत किया है।

भविष्य के लिए यह मिशन क्यों महत्वपूर्ण है

चंद्रयान-4 वैज्ञानिकों को—

  • चंद्र भूविज्ञान का गहन अध्ययन करने
  • चंद्रमा के विकास को समझने
  • जल-बर्फ की संभावनाओं का आकलन करने
  • भविष्य के मानव मिशनों और चंद्र ठिकानों की योजना बनाने में महत्वपूर्ण सहायता प्रदान करेगा।

भारत के बैंकों का NPA रिकॉर्ड निचले स्तर पर, वित्तीय स्थिरता का संकेत

भारत की बैंकिंग प्रणाली ने हाल के वर्षों में अपनी सबसे मजबूत पुनर्बहाली में से एक दर्ज की है। 9 फरवरी 2026 को संसद को बताया गया कि अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्तियाँ (एनपीए) सितंबर 2025 के अंत तक घटकर ऐतिहासिक न्यूनतम 2.15% पर आ गईं। यह स्तर 2010–11 की तुलना में भी कम है, जो खराब ऋणों और कॉरपोरेट डिफॉल्ट्स के कारण वर्षों तक चले दबाव के बाद एक महत्वपूर्ण बदलाव और मजबूती का संकेत देता है।

एनपीए क्या हैं और इनका महत्व क्यों है

गैर-निष्पादित परिसंपत्तियाँ (एनपीए) वे ऋण होते हैं जिनमें उधारकर्ता 90 दिनों से अधिक समय तक मूलधन या ब्याज का भुगतान नहीं करता। उच्च एनपीए बैंकों की लाभप्रदता को कमजोर करते हैं और नए ऋण देने की क्षमता को सीमित करते हैं। एनपीए में गिरावट बेहतर परिसंपत्ति गुणवत्ता, मजबूत ऋण मूल्यांकन और उधारकर्ताओं में बेहतर भुगतान अनुशासन का संकेत देती है। 2.15% तक की गिरावट एक स्वस्थ बैंकिंग प्रणाली को दर्शाती है, जो आर्थिक विकास को समर्थन देने में सक्षम है।

बैंक श्रेणियों के अनुसार एनपीए का विभाजन

30 सितंबर 2025 तक घरेलू परिचालनों के लिए आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) का सकल एनपीए अनुपात 2.50% रहा, जबकि निजी क्षेत्र के बैंकों का यह अनुपात 1.73% था। भारत में कार्यरत विदेशी बैंकों में सबसे कम सकल एनपीए 0.8% दर्ज किया गया। उल्लेखनीय है कि मार्च 2018 के बाद से पीएसबी में तेज सुधार हुआ है, जिससे निजी बैंकों के साथ का अंतर काफी कम हुआ है।

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में तेज सुधार के कारण

पीएसबी में एनपीए में तेज गिरावट का मुख्य कारण बैलेंस शीट की सफाई, पूंजी पुनर्पूंजीकरण और शासन सुधार रहे। सरकार के अनुसार, बेहतर लाभप्रदता और मजबूत पूंजी स्थिति ने बेहतर ऋण प्रथाओं को समर्थन दिया। एनपीए में कमी से प्रावधान (प्रोविजनिंग) की आवश्यकता भी घटी, जिससे बैंक मुनाफा और ऋण देने की क्षमता सीधे तौर पर बढ़ी।

आरबीआई और सरकार की 4R रणनीति की भूमिका

यह सुधार 2015 में आरबीआई की एसेट क्वालिटी रिव्यू (AQR) के बाद शुरू हुआ, जिसने खराब ऋणों की पारदर्शी पहचान को अनिवार्य बनाया। इसके बाद सरकार की 4R रणनीति—पहचान (Recognition), समाधान (Resolution), पुनर्पूंजीकरण (Recapitalisation) और सुधार (Reforms)—लागू की गई। इन कदमों ने तनावग्रस्त परिसंपत्तियों का व्यवस्थित समाधान किया और नए खराब ऋणों के जमाव को रोका।

वसूली के साधन: IBC, SARFAESI और DRTs

बैंकों ने वसूली के लिए ऋण वसूली न्यायाधिकरण (DRTs), SARFAESI अधिनियम और राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण के माध्यम से दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) के तहत मामलों जैसे कई तंत्रों का उपयोग किया। सरकार ने कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रियाओं (CIRPs) को तेज करने के लिए IBC में संशोधन का प्रस्ताव भी रखा, जिससे वसूली के परिणाम और मजबूत हुए।

स्लिपेज अनुपात में सुधार और भविष्य का दृष्टिकोण

स्लिपेज अनुपात—जो नए एनपीए के जुड़ने को मापता है—पिछले छह वर्षों में लगातार बेहतर हुआ है, खासकर पीएसबी के लिए। यह कम नए खराब ऋण और बेहतर क्रेडिट निगरानी का संकेत देता है। सुधारों के साथ मिलकर, यह भारत के बैंकिंग क्षेत्र में दीर्घकालिक स्थिरता का मजबूत संकेत है।

नेटवर्क रेडीनेस इंडेक्स 2025 में भारत की चार पायदान की छलांग

वैश्विक डिजिटल प्रदर्शन में भारत ने उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। 4 फरवरी 2026 को जारी नेटवर्क रेडीनेस इंडेक्स 2025 रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने चार पायदान की छलांग लगाते हुए 127 अर्थव्यवस्थाओं में 45वाँ स्थान हासिल किया है। रैंकिंग में सुधार के साथ-साथ भारत का कुल स्कोर भी बढ़कर 2024 के 53.63 से 54.43 (2025) हो गया है। रिपोर्ट में प्रौद्योगिकी अपनाने, डिजिटल अवसंरचना और नवाचार-आधारित विकास में भारत की बढ़ती मजबूती को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है।

नेटवर्क रेडीनेस इंडेक्स 2025 क्या है?

नेटवर्क रेडीनेस इंडेक्स 2025 यह आकलन करता है कि देश विकास और वृद्धि के लिए डिजिटल तकनीकों का कितनी प्रभावी ढंग से उपयोग कर रहे हैं। यह सूचकांक पोर्टुलान्स इंस्टीट्यूट (Portulans Institute) द्वारा तैयार किया जाता है, जो एक स्वतंत्र गैर-लाभकारी शोध संगठन है। इसमें 127 अर्थव्यवस्थाओं का मूल्यांकन चार स्तंभों—प्रौद्योगिकी, लोग, शासन और प्रभाव—के आधार पर किया जाता है, जिनके अंतर्गत 53 संकेतक शामिल हैं। यह सूचकांक अर्थव्यवस्था और समाज में नेटवर्क, डेटा और डिजिटल टूल्स के उपयोग की प्रभावशीलता की एक समग्र तस्वीर प्रस्तुत करता है।

NRI 2025 में भारत की बेहतर रैंक और स्कोर

नेटवर्क रेडीनेस इंडेक्स 2025 में भारत का 45वें स्थान पर पहुँचना विभिन्न डिजिटल संकेतकों में निरंतर सुधार को दर्शाता है। देश का स्कोर 54.43 (100 में से) तक बढ़ गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में अधिक मजबूत डिजिटल आधार का संकेत देता है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि भारत की नेटवर्क रेडीनेस उसकी आय स्तर की अपेक्षा से अधिक है, जिससे स्पष्ट होता है कि देश की डिजिटल प्रगति आर्थिक सीमाओं से तेज़ गति से आगे बढ़ रही है।

प्रमुख डिजिटल संकेतकों में भारत की शीर्ष वैश्विक रैंकिंग

नेटवर्क रेडीनेस इंडेक्स 2025 की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक यह है कि भारत ने कई महत्वपूर्ण संकेतकों में वैश्विक स्तर पर प्रथम स्थान हासिल किया है। भारत दूरसंचार सेवाओं में वार्षिक निवेश, एआई से जुड़े वैज्ञानिक प्रकाशन, आईसीटी सेवा निर्यात और ई-कॉमर्स कानून जैसे क्षेत्रों में दुनिया में पहला स्थान पर रहा। ये रैंकिंग भारत के मजबूत डिजिटल नीति ढांचे, सशक्त नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र और निर्यात-आधारित आईटी सेवा क्षेत्र को दर्शाती हैं। यह प्रदर्शन भारत की एक वैश्विक डिजिटल और प्रौद्योगिकी सेवा केंद्र के रूप में भूमिका को रेखांकित करता है।

कनेक्टिविटी और बाज़ार आकार में मजबूत प्रदर्शन

कनेक्टिविटी से जुड़े संकेतकों में भी भारत का प्रदर्शन प्रभावशाली रहा है। भारत ने FTTH/बिल्डिंग इंटरनेट सब्सक्रिप्शन, मोबाइल ब्रॉडबैंड इंटरनेट ट्रैफिक और अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट बैंडविड्थ में दूसरा वैश्विक स्थान प्राप्त किया, जो डिजिटल अवसंरचना के तीव्र विस्तार को दर्शाता है। इसके अलावा, भारत ने घरेलू बाज़ार आकार और आय असमानता संकेतक में तीसरा स्थान हासिल किया, जो देश के विशाल डिजिटल उपभोक्ता आधार और डिजिटल समावेशन में हो रहे सुधार को दर्शाता है।

निम्न-मध्यम आय वर्ग की अर्थव्यवस्थाओं में भारत

नेटवर्क रेडीनेस इंडेक्स 2025 में भारत को निम्न-मध्यम आय वाले देशों में दूसरा स्थान मिला है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भारत अपनी आर्थिक स्थिति से कहीं आगे बढ़कर डिजिटल तत्परता का प्रदर्शन कर रहा है। यह लक्षित नीतिगत हस्तक्षेपों, निजी क्षेत्र के निवेश और बड़े पैमाने के डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से तेज़ तकनीकी अपनाने का परिणाम है। भारत का यह प्रदर्शन दिखाता है कि विकासशील अर्थव्यवस्थाएँ किस तरह डिजिटल नेटवर्क का उपयोग कर समावेशी विकास को आगे बढ़ा सकती हैं।

श्रेणीवार शीर्ष प्रदर्शन करने वाले देश (Category Wise Performers)

श्रेणी 1: आय समूह के अनुसार शीर्ष 3 देश

उच्च आय (High Income)

  • संयुक्त राज्य अमेरिका — रैंक 1
  • फ़िनलैंड — रैंक 2
  • सिंगापुर — रैंक 3

उच्च-मध्यम आय (Upper-Middle Income)

  • चीन — रैंक 24
  • मलेशिया — रैंक 38
  • थाईलैंड — रैंक 44

निम्न-मध्यम आय (Lower-Middle Income)

  • वियतनाम — रैंक 40
  • भारत — रैंक 45
  • फ़िलिपींस — रैंक 66

निम्न आय (Low Income)

  • रवांडा — रैंक 87
  • युगांडा — रैंक 112
  • मलावी — रैंक 116

श्रेणी 2: क्षेत्रवार शीर्ष 3 देश

अफ्रीका

  • मॉरीशस — रैंक 58
  • दक्षिण अफ्रीका — रैंक 69
  • केन्या — रैंक 77

अरब देश

  • संयुक्त अरब अमीरात (UAE) — रैंक 26
  • सऊदी अरब — रैंक 34
  • बहरीन — रैंक 36

एशिया और प्रशांत

  • सिंगापुर — रैंक 3
  • कोरिया गणराज्य (दक्षिण कोरिया) — रैंक 10
  • जापान — रैंक 11

CIS (स्वतंत्र राष्ट्रमंडल)

  • रूसी संघ — रैंक 56
  • आर्मेनिया — रैंक 62
  • कज़ाख़स्तान — रैंक 65

यूरोप

  • फ़िनलैंड — रैंक 2
  • डेनमार्क — रैंक 4
  • स्वीडन — रैंक 5

अमेरिका महाद्वीप

  • संयुक्त राज्य अमेरिका — रैंक 1
  • कनाडा — रैंक 12
  • कोस्टा रिका — रैंक 42

श्रेणी 3: समग्र वैश्विक रैंकिंग (शीर्ष 5)

  • संयुक्त राज्य अमेरिका — स्कोर 79.13
  • फ़िनलैंड — स्कोर 75.82
  • सिंगापुर — स्कोर 75.46
  • डेनमार्क — स्कोर 75.14
  • स्वीडन — स्कोर 75.09

नेटवर्क रेडीनेस क्यों महत्वपूर्ण है

नेटवर्क रेडीनेस किसी देश की इस क्षमता को मापता है कि वह डिजिटल नेटवर्क का उपयोग आर्थिक, सामाजिक और शासन से जुड़े परिणामों के लिए कितनी प्रभावी तरह से कर पा रहा है। उच्च नेटवर्क रेडीनेस नवाचार को बढ़ावा देती है, सार्वजनिक सेवाओं को अधिक कुशल बनाती है, ई-कॉमर्स के विकास को समर्थन देती है और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करती है। भारत जैसे देश के लिए नेटवर्क रेडीनेस में सुधार स्टार्टअप्स, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, एआई अनुसंधान और वैश्विक आईटी निर्यात को मजबूती देने के लिए अत्यंत आवश्यक है, जिससे यह एक महत्वपूर्ण दीर्घकालिक विकास संकेतक बन जाता है।

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