संस्कृत विद्वान वेद कुमारी घई का 91 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनका जन्म 1931 में जम्मू और कश्मीर के जम्मू शहर में हुआ था। उन्होंने जम्मू विश्वविद्यालय से संस्कृत में एमए और पीएचडी की। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में भी अध्ययन किया।
घई एक विपुल विद्वान और संस्कृत साहित्य पर कई पुस्तकों के लेखक थे। उन्होंने गवर्नमेंट कॉलेज फॉर वीमेन, परेड, जम्मू में संस्कृत के प्रोफेसर के रूप में अपना करियर शुरू किया। वह 31 दिसंबर 1991 को अपनी सेवानिवृत्ति तक जम्मू विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर स्तर के संस्कृत विभाग की प्रमुख थीं। उन्होंने 1966-1967 और 1978-1980 में भारतीय अध्ययन संस्थान, कोपेनहेगन विश्वविद्यालय, डेनमार्क में पाणिनी के संस्कृत व्याकरण और साहित्य को पढ़ाया।वह डोगरी भाषा की विद्वान थीं और हिंदी भी जानती थीं। वह सामाजिक कार्यों से भी जुड़ी थीं। वह अमरनाथ श्राइन बोर्ड की सदस्य थीं।
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घई को संस्कृत साहित्य में उनके योगदान के लिए 2001 में भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म श्री से सम्मानित किया गया था। वह 1991 में अपनी पुस्तक “संस्कृत भाषा” के लिए भारत के सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार साहित्य अकादमी पुरस्कार की प्राप्तकर्ता भी थीं।
यहां उनके कुछ उल्लेखनीय कार्य हैं
- संस्कृत भाषा (1991)
- संस्कृत साहित्य का इतिहास (1996)
- रामायण (2000)
- महाभारत (2003)
- भगवद गीता (2005)
घई के काम की दुनिया भर के विद्वानों ने प्रशंसा की है। वह संस्कृत अध्ययन के क्षेत्र में अग्रणी थीं और उनके काम ने संस्कृत साहित्य को व्यापक दर्शकों के लिए अधिक सुलभ बनाने में मदद की है। वह एक सच्ची विद्वान थीं और उनके काम को आने वाली पीढ़ियों के लिए याद किया जाएगा।