प्रधानमंत्री मोदी ने स्वदेशी तकनीक से प्रमुख प्रतिष्ठानों की सुरक्षा के लिए ‘मिशन सुदर्शन चक्र’ का शुभारंभ किया

15 अगस्त 2025 को 79वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले से अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ऐतिहासिक राष्ट्रीय सुरक्षा पहल — ‘मिशन सुदर्शन चक्र’ की घोषणा की। यह महत्वाकांक्षी दस वर्षीय मिशन भारत की महत्वपूर्ण संस्थाओं और प्रतिष्ठानों की सुरक्षा स्वदेशी तकनीक से सुनिश्चित करेगा, जो रक्षा और सामरिक अवसंरचना संरक्षण में आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक निर्णायक कदम है।

दृष्टि और उद्देश्य
पीएम मोदी ने कहा, “हर नागरिक को सुरक्षित महसूस होना चाहिए”, और यह भी स्पष्ट किया कि यह मिशन शोध-आधारित होगा तथा पूरी तरह भारत में विकसित किया जाएगा। इस पहल का उद्देश्य है:

  • विकसित होते खतरों के खिलाफ बहु-स्तरीय सुरक्षा ढांचा स्थापित करना।

  • विदेशी सुरक्षा प्रणालियों पर निर्भरता कम करना।

  • निगरानी, साइबर सुरक्षा और भौतिक सुरक्षा को एक व्यापक कवच में एकीकृत करना।

  • खतरों का सामना करने से पहले उन्हें भांपकर रोकने की तैयारी करना।

सांस्कृतिक प्रेरणा
पीएम मोदी ने महाभारत का उदाहरण देते हुए वह प्रसंग याद किया जब भगवान कृष्ण ने जयद्रथ को पराजित करने में अर्जुन की मदद के लिए सूर्य को ढक लिया था।
उन्होंने कहा, “उस दैवीय हस्तक्षेप ने युद्ध की दिशा बदल दी। आज हमें भी अपने महत्वपूर्ण संस्थानों को उभरते खतरों से उसी तरह ढालना है”, इस प्रकार भारत की प्राचीन संस्कृति को आधुनिक सामरिक नवाचार से जोड़ा।

मिशन सुदर्शन चक्र की प्रमुख विशेषताएं
हालांकि पूर्ण परिचालन विवरण गोपनीय हैं, शुरुआती संकेत बताते हैं कि इसमें शामिल होंगे —

  • उन्नत निगरानी प्रणाली – संवेदनशील स्थलों की एआई-सक्षम निगरानी।

  • साइबर सुरक्षा ढांचा – साइबर युद्ध और हाइब्रिड खतरों से रक्षा।

  • भौतिक सुरक्षा सुदृढ़ीकरण – मजबूत अवसंरचना और त्वरित प्रतिक्रिया प्रणालियां।

  • एकीकृत खतरा प्रतिक्रिया नेटवर्क – सुरक्षा बलों, खुफिया एजेंसियों और शोध संस्थानों के बीच वास्तविक समय समन्वय।

  • जन-निजी सहयोग – प्रमुख भारतीय अनुसंधान संस्थानों, रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों और निजी नवाचारकर्ताओं के साथ भागीदारी।

रणनीतिक संदर्भ
यह घोषणा ऐसे समय में हुई है जब वैश्विक स्तर पर साइबर युद्ध, तोड़फोड़ और महत्वपूर्ण अवसंरचना पर हाइब्रिड हमलों को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं।
2008 के मुंबई हमलों जैसी घटनाओं से यह सीख मिली है कि सक्रिय और एकीकृत सुरक्षा की आवश्यकता है।
यह मिशन आत्मनिर्भर भारत के तहत रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण को बढ़ावा देने के बड़े अभियान का हिस्सा है।

लाल किले से पीएम मोदी के भाषण की बड़ी बातें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले की प्राचीर से देश के नाम संबोधन दिया। लाल किला से पीएम मोदी ने 12वीं बार देश को संबोधित किया है। पीएम मोदी के नाम लाल किले से सबसे लंबा भाषण देने का रिकॉर्ड रहा है। इस साल पीएम मोदी ने लाल किला से कुल 103 मिनट लंबा भाषण दिया है। ये लाल किला से दिया गया किसी भी पीएम का सबसे लंबा भाषण है। इससे पहले पीएम मोदी ने साल 2024 में 98 मिनट का भाषण दिया था।

12 बार लाल किला पर फहराया झंडा

स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले पर सबसे अधिक बार राष्ट्रीय ध्वज फहराने वाले प्रधानमंत्रियों में पीएम मोदी तीसरे स्थान पर हैं। अभी तक भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नाम 17 बार ध्वज फहराने का रिकॉर्ड है। इसके बाद पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का नाम है, जिन्होंने 16 बार राष्ट्रीय ध्वज फहराया था।

पीएम मोदी ने तोड़ा इंदिरा गांधी का ये रिकॉर्ड

पीएम मोदी ने आज 12वीं बार लाल किला से राष्ट्र को संबोधित करने के साथ इंदिरा गांधी का रिकार्ड तोड़ दिया। इस तरह पीएम मोदी जवाहरलाल नेहरू के बाद दूसरे स्थान पर आ गए, जिन्होंने लगातार 17 स्वतंत्रता दिवस भाषण दिए थे।

बता दें कि इंदिरा गांधी जनवरी 1966 से मार्च 1977 तक, और फिर जनवरी 1980 से अक्टूबर 1984 तक पीएम पद पर रहीं। इस दौरान इंदिरा गांधी ने 15 अगस्त को प्रधानमंत्री के रूप में 16 भाषण दिए, जिनमें से 11 लगातार थे। हालांकि, इस रिकॉर्ड तोड़ते हुए पीएम मोदी ने लगातार 12 बार लाल किला से भाषण दिया है।

पीएम मोदी ने अपने संबोधन में क्या कहा?

  • पीएम मोदी ने अपने संबोधन में पाकिस्तान, ‘ऑपरेशन सिंदूर’, स्पेस स्टेशन, आत्मनिर्भर भारत जैसी कई मुख्य बातें की।
  • पीएम मोदी ने सिंधु नदी जल समझौते और किसानों का भी ज़िक्र किया।
  • उन्होंने कहा, “भारत ने तय किया है कि खून और पानी साथ-साथ नहीं बहेंगे। भारतीय नदियों का पानी दुश्मनों के खेत को सींच रहा है। हिंदुस्तान को उसके हक़ का पानी मिलेगा।”
  • पीएम मोदी ने कहा, “इस पर हिंदुस्तान के किसानों का हक़ है। सिंधु समझौता एक तरफ़ा और अन्यायपूर्ण था। राष्ट्रहित में ये समझौता मंजूर नहीं है।”
  • उन्होंने इस बात का भी संकेत दिया कि इस बार की दिवाली में भारतीयों को बड़ा तोहफ़ा मिलने जा रहा है।
  • प्रधानमंत्री मोदी ने लाल क़िले की प्राचीर से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कई संदेश दिए।

भारत ने 2030 कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स के लिए आधिकारिक रूप से बोली लगाई

भारतीय खेल जगत के लिए एक बड़े ऐलान में भारतीय ओलंपिक संघ (IOA) ने औपचारिक रूप से 2030 राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी के लिए भारत की बोली को मंजूरी दे दी है। यह फैसला नई दिल्ली में हुई एक विशेष आम बैठक (Special General Meeting) में लिया गया, जिससे भारत को 31 अगस्त 2025 की अंतिम तिथि से पहले अपना आधिकारिक प्रस्ताव प्रस्तुत करने का रास्ता साफ हो गया। अगर भारत सफल होता है, तो यह आयोजन 2010 के बाद ठीक दो दशक बाद फिर भारतीय धरती पर लौटेगा।

2030 बोली का महत्व

भारत की 2030 की बोली ऐतिहासिक और रणनीतिक—दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। यह वर्ष 2010 राष्ट्रमंडल खेलों की 20वीं वर्षगांठ होगी, जब पहली और अब तक की एकमात्र बार भारत ने इस प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजन की मेजबानी की थी। उस संस्करण ने न केवल भारत के खेल बुनियादी ढांचे को मजबूत किया, बल्कि बड़े पैमाने पर वैश्विक प्रतियोगिताओं को आयोजित करने की भारत की क्षमता को भी साबित किया।

2030 में दोबारा मेजबानी भारत की खेलों के प्रति निरंतर प्रतिबद्धता, वैश्विक खेल साझेदारी, क्षेत्रीय विकास, पर्यटन और युवाओं को खेलों के माध्यम से प्रेरित करने का प्रतीक होगी।

IOA का रणनीतिक कदम

IOA की मंजूरी यह संकेत देती है कि भारत अंतरराष्ट्रीय खेल समुदाय में खुद को एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में फिर स्थापित करना चाहता है। अब संघ राष्ट्रमंडल खेल महासंघ (CGF) के नियमों के अनुसार भारत की अंतिम बोली रिपोर्ट (bid dossier) तैयार कर और प्रस्तुत करेगा। इसमें प्रस्तावित स्थल, बुनियादी ढांचा योजनाएं, लॉजिस्टिक क्षमताएं और सरकारी समर्थन शामिल होगा।

यह कदम भारत के स्पोर्ट्स डिप्लोमेसी (Sports Diplomacy) पर बढ़ते फोकस को दर्शाता है और दीर्घकाल में ओलंपिक खेलों जैसे बड़े आयोजनों की मेजबानी की संभावनाओं को भी मजबूत करता है।

आगे की राह

31 अगस्त 2025 तक औपचारिक बोली प्रस्तुति चयन प्रक्रिया का अगला अहम चरण होगा। अगर भारत बोली जीतता है, तो 2030 राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियां तुरंत शुरू होंगी—जिसमें स्टेडियम उन्नयन, शहरी विकास और एथलीट प्रशिक्षण ढांचे में बड़े निवेश शामिल होंगे। इस आयोजन से भारत के खेल पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा मिलेगा, युवा खिलाड़ियों को प्रेरणा मिलेगी और भारतीय शहर एक बार फिर वैश्विक खेल मानचित्र पर प्रमुखता से उभरेंगे।

राजीव प्रताप रूडी ने कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया के सीसीआई महासचिव का पद बरकरार रखा

कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया के सचिव पद लिए हुए चुनाव में बीजेपी नेता राजीव प्रताप रूडी ने अपनी बादशाहत बरकरार रखते हुए एक बार फिर जीत हासिल की है। रूडी के खिलाफ बीजेपी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान मैदान में थे। मंगलवार, शाम को जारी चुनाव नतीजों में राजीव प्रताप रूडी ने 392 वोटो के साथ जीत हासिल की। वहीं संजीव बालियान को 290 वोट मिले। रूडी ने अपने प्रतिद्वंदी बालियान को 102 वोट से हराकर जीत हासिल की।

रूडी बनाम बालियान की जंग

यह चुनाव सिर्फ नतीजे के लिए ही नहीं, बल्कि बीजेपी के आंतरिक समीकरणों को उजागर करने के कारण भी चर्चा में रहा। दोनों ही उम्मीदवार पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं, और इस मुकाबले ने पार्टी के भीतर स्पष्ट गुटबाजी की झलक दिखाई। बालियान, जो मुजफ्फरनगर से पूर्व सांसद और केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं, को शीर्ष बीजेपी नेतृत्व के साथ-साथ अन्य दलों के नेताओं का भी समर्थन मिला था।

संविधान क्लब ऑफ इंडिया (CCI) क्या है?

फरवरी 1947 में स्थापित संविधान क्लब ऑफ इंडिया, संसद भवन के पास रफी मार्ग पर स्थित है। यह वर्तमान और पूर्व सांसदों के लिए एक सामाजिक और पेशेवर मंच है, जहां अलग-अलग दलों के नेता आपसी मेलजोल और नेटवर्किंग कर सकते हैं।

क्लब का प्रमुख लोकसभा अध्यक्ष (एक्स-ऑफिसियो अध्यक्ष) होता है, जबकि उपाध्यक्ष (डिप्टी स्पीकर) महासचिव के रूप में कार्य करते हैं। इसके अलावा एक केंद्रीय मंत्री और राज्यसभा के उपसभापति इसके उपाध्यक्षों में शामिल होते हैं। 1,200 से अधिक सदस्यों वाला यह संस्थान दिल्ली के राजनीतिक हलके का एक प्रमुख केंद्र माना जाता है।

अन्य महत्वपूर्ण नियुक्तियां

रूडी के साथ ही कई अन्य पदों पर चुनाव हुए—कुछ सदस्यों का चयन बिना विरोध के नामांकन वापसी के कारण हुआ, जैसे:

  • राज्यसभा सांसद तिरुचि शिवा – सचिव (संस्कृति)

  • राजीव शुक्ला – सचिव (खेल)

  • ए. पी. जितेंदर रेड्डी (तेलंगाना) – कोषाध्यक्ष; वर्तमान में दिल्ली में तेलंगाना सरकार के विशेष प्रतिनिधि

  • 11 समिति सदस्यों का भी चुनाव हुआ, जिसके लिए 14 नामांकन दाखिल किए गए थे।

महान हॉकी खिलाड़ी वेस पेस का निधन

भारतीय खेल जगत की एक प्रतिष्ठित शख्सियत और 1972 म्यूनिख ओलंपिक में कांस्य पदक विजेता डॉ. वेस पेस का गुरुवार को 80 वर्ष की आयु में निधन हो गया। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी पेस न केवल भारतीय हॉकी टीम के पूर्व मिडफ़ील्डर थे, बल्कि एक खेल चिकित्सा विशेषज्ञ, प्रशासक और मार्गदर्शक भी थे। वे अपने पीछे खेल जगत में समृद्ध विरासत और अपने बेटे, भारत के दिग्गज टेनिस स्टार लिएंडर पेस का गौरवपूर्ण नाम छोड़ गए हैं।

हॉकी करियर

वेस पेस भारतीय हॉकी टीम में मिडफ़ील्डर के रूप में चमके और 1972 म्यूनिख ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली टीम के अहम सदस्य रहे। मैदान पर उनकी शांत स्वभाव, रणनीतिक खेल शैली और समर्पण ने उन्हें साथियों और प्रशंसकों के बीच खास पहचान दिलाई। उनकी भूमिका उस दौर में भारत की अंतरराष्ट्रीय हॉकी की उपलब्धियों में निर्णायक रही।

मैदान से बाहर: बहु-खेल प्रेमी

पेशेवर हॉकी से संन्यास लेने के बाद भी वेस पेस का खेलों से जुड़ाव कायम रहा। एक सच्चे ऑल-राउंडर के रूप में उन्होंने फुटबॉल, क्रिकेट और रग्बी जैसे खेलों में भी सक्रिय भागीदारी की। 1996 से 2002 के बीच वे इंडियन रग्बी फ़ुटबॉल यूनियन के अध्यक्ष रहे और भारत में रग्बी के विकास और संरचना को बढ़ावा दिया।

खेल चिकित्सा और प्रशासन में योगदान

डॉ. पेस खेल चिकित्सा के क्षेत्र में भी उतने ही सम्मानित थे। उन्होंने एशियन क्रिकेट काउंसिल और भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) जैसे प्रमुख खेल संगठनों के साथ मेडिकल कंसल्टेंट के रूप में काम किया। वे एंटी-डोपिंग शिक्षा कार्यक्रमों के जरिए भारतीय खेलों में नैतिक मानकों को स्थापित करने में अहम भूमिका निभाते रहे। इसके अलावा वे भारत के सबसे पुराने खेल क्लबों में से एक, कलकत्ता क्रिकेट एंड फ़ुटबॉल क्लब के अध्यक्ष भी रहे।

व्यक्तिगत विरासत

वेस पेस का प्रभाव भारतीय खेलों की अगली पीढ़ी तक फैला, विशेषकर उनके बेटे लिएंडर पेस के माध्यम से, जिन्होंने 1996 अटलांटा ओलंपिक में टेनिस में कांस्य पदक जीता और 15 ग्रैंड स्लैम खिताब अपने नाम किए। पिता-पुत्र की जोड़ी का संबंध, चाहे सार्वजनिक उत्सवों में हो या व्यक्तिगत पलों में, खेल महानता और पारिवारिक मजबूती का प्रतीक रहा।

SMFG इंडिया क्रेडिट का नए सीईओ बने रवि नारायणन

भारतीय गैर-बैंकिंग वित्तीय क्षेत्र (NBFC) के लिए एक अहम विकास में, एक्सिस बैंक के पूर्व ग्रुप एक्जीक्यूटिव रवि नारायणन को SMFG इंडिया क्रेडिट का मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) नियुक्त किया गया है। यह कदम सुमितोमो मित्सुई फाइनेंशियल ग्रुप (SMFG) द्वारा 2021 में फुलर्टन इंडिया क्रेडिट के अधिग्रहण के बाद से सबसे बड़ा नेतृत्व परिवर्तन माना जा रहा है।

SMFG इंडिया क्रेडिट में नेतृत्व पुनर्गठन

रवि नारायणन की नियुक्ति को SMFG इंडिया क्रेडिट के अधिग्रहण के बाद का पहला बड़ा नेतृत्व बदलाव माना जा रहा है। नारायणन ने पहले एक्सिस बैंक में खुदरा देनदारियां, शाखा बैंकिंग और उत्पादों का नेतृत्व किया है, जिससे उन्हें भारत के रिटेल बैंकिंग क्षेत्र में व्यापक अनुभव प्राप्त है।

हालांकि कंपनी की ओर से अभी आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन सूत्रों के अनुसार नारायणन अंतरिम नेतृत्व समिति का कार्यकाल समाप्त होने से पहले पदभार संभालेंगे। इससे यह संकेत मिलता है कि कंपनी अब केवल फुलर्टन की पुरानी नेतृत्व टीम पर निर्भर नहीं रहेगी।

पृष्ठभूमि: SMFG का अधिग्रहण और परिवर्तन

  • नवंबर 2021 में SMFG ने फुलर्टन इंडिया क्रेडिट में 74.9% हिस्सेदारी खरीदी थी।

  • मई 2024 में इस हिस्सेदारी को बढ़ाकर 100% कर लिया गया, जिससे इसका पूर्ण अधिग्रहण पूरा हुआ।

  • अधिग्रहण के बाद तत्कालीन एमडी और सीईओ शांतनु मित्रा को उनकी पुरानी नेतृत्व टीम के साथ पुनः नियुक्त किया गया।

  • जून 2025 में शांतनु मित्रा के इस्तीफे के बाद 90 दिनों के लिए तीन सदस्यीय अंतरिम कार्यकारी समिति बनाई गई थी, जो संचालन देख रही थी।

रवि नारायणन की नियुक्ति का महत्व

रवि नारायणन, जिनका फुलर्टन इंडिया क्रेडिट से पहले कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं रहा, की नियुक्ति SMFG की नई रणनीतिक दिशा को दर्शाती है। यह पहली बार है कि कंपनी ने शीर्ष कार्यकारी पद के लिए किसी बाहरी उम्मीदवार को चुना है।
उद्योग विशेषज्ञ इसे SMFG-प्रधान संचालन मॉडल की ओर बदलाव के रूप में देख रहे हैं, जिसका उद्देश्य बेहतर एकीकरण और दीर्घकालिक विकास है।

भारत ने ALMM के तहत 100 गीगावाट सौर पीवी विनिर्माण की उपलब्धि हासिल की

भारत की स्वच्छ ऊर्जा महत्वाकांक्षाओं को एक बड़ा प्रोत्साहन मिला है, क्योंकि देश ने आधिकारिक रूप से 100 गीगावाट (GW) सोलर फोटोवोल्टिक (PV) मॉड्यूल विनिर्माण क्षमता हासिल कर ली है। यह उपलब्धि स्वीकृत मॉडल और निर्माता सूची (Approved List of Models and Manufacturers – ALMM) के अंतर्गत दर्ज की गई है। 2014 में यह क्षमता सिर्फ 2.3 GW थी, जो अब एक दशक में कई गुना बढ़ी है। यह भारत की सौर ऊर्जा में आत्मनिर्भरता और 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता हासिल करने के लक्ष्य की दिशा में एक अहम कदम है।

सरकार का रणनीतिक सौर ऊर्जा मिशन

इस उपलब्धि की घोषणा करते हुए केंद्रीय नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और उच्च दक्षता वाले सौर मॉड्यूल के लिए उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना (PLI Scheme) जैसी नीतियों को इसका श्रेय दिया।
सरकार का उद्देश्य केवल ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना ही नहीं, बल्कि वैश्विक सौर वैल्यू चेन में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका स्थापित करना भी है।

यह तेज़ी से बढ़ी क्षमता सहायक योजनाओं, उद्योग की सक्रिय भागीदारी, और ALMM जैसे नियामकीय उपायों के प्रभावी क्रियान्वयन का परिणाम है, जो घरेलू सौर विनिर्माण में गुणवत्ता और मानकीकरण को बढ़ावा देते हैं।

ALMM: शुरुआत से विस्तार तक

  • 2 जनवरी 2019 को MNRE (नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय) द्वारा ALMM आदेश जारी किया गया।

  • पहली स्वीकृत सूची मार्च 2021 में प्रकाशित हुई, जिसमें केवल 8.2 GW क्षमता दर्ज थी।

  • मात्र चार वर्षों में यह क्षमता 12 गुना से अधिक बढ़कर 100 GW हो गई।

  • स्वीकृत निर्माताओं की संख्या 2021 में 21 से बढ़कर 2025 में 100 हो गई, जो देशभर में 123 इकाइयों का संचालन कर रहे हैं।

विविध और प्रतिस्पर्धी विनिर्माण ढांचा

100 GW का यह मील का पत्थर सिर्फ पैमाने में ही नहीं, बल्कि तकनीकी परिपक्वता में भी वृद्धि का प्रतीक है। कई नए निर्माताओं ने उच्च दक्षता मॉड्यूल तकनीक अपनाई है और वर्टिकली इंटीग्रेटेड संचालन विकसित किए हैं, जिससे एक प्रतिस्पर्धी और विविधतापूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र तैयार हुआ है। यह विकास घरेलू मांग पूरी करने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए भी अवसर पैदा कर रहा है, जिससे भारत का स्वच्छ ऊर्जा निर्यात बढ़ने की संभावना है।

आत्मनिर्भर भारत और 2030 का स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्य

यह उपलब्धि आत्मनिर्भर भारत के दृष्टिकोण के अनुरूप है और 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता (सौर, पवन, जलविद्युत, और परमाणु) के लक्ष्य को साकार करने में सहायक है। आयात पर निर्भरता घटाकर भारत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में होने वाले उतार-चढ़ाव से बच सकेगा और सतत, लचीला और स्वदेशी ऊर्जा विकास सुनिश्चित करेगा।

ICICI बैंक ने विरोध के बाद वापस लिया मिनिमम बैलेंस रखने का नियम

आईसीआईसीआई बैंक (भारत का दूसरा सबसे बड़ा निजी बैंक) ने नए बचत खाता धारकों के लिए न्यूनतम औसत शेष राशि (Minimum Average Balance – MAB) की शर्त में बदलाव किया है। हाल ही में बैंक ने शहरी क्षेत्रों में नए ग्राहकों के लिए एमएबी ₹10,000 से बढ़ाकर ₹50,000 कर दिया था, लेकिन व्यापक आलोचना और विरोध के बाद इस निर्णय को आंशिक रूप से वापस ले लिया गया। अब शहरी ग्राहकों के लिए नया एमएबी ₹15,000 तय किया गया है।

संशोधित नीति के मुख्य बिंदु

पहले ₹50,000 की बढ़ोतरी की घोषणा कुछ दिन पहले ही की गई थी, जिस पर ग्राहकों और वित्तीय विशेषज्ञों ने कड़ा विरोध जताया। आलोचकों का कहना था कि यह बढ़ोतरी अत्यधिक है, खासकर तब जब कई बैंक या तो एमएबी घटा रहे हैं या पूरी तरह खत्म कर चुके हैं।

संशोधन के बाद नई शर्तें इस प्रकार हैं —

  • शहरी क्षेत्र: ₹50,000 से घटाकर ₹15,000

  • अर्ध-शहरी क्षेत्र: ₹25,000 से घटाकर ₹7,500

  • ग्रामीण और अर्ध-शहरी पुराने ग्राहक: ₹5,000 (कोई बदलाव नहीं)

हालांकि नया शहरी एमएबी अभी भी पुराने ₹10,000 से ₹5,000 अधिक है, फिर भी यह ₹50,000 की तुलना में बड़ा बदलाव है।

अन्य बैंकों से तुलना

आईसीआईसीआई बैंक की ₹50,000 वाली शर्त तब और अलग दिखी जब अधिकांश भारतीय बैंकों का एमएबी ₹2,000 से ₹10,000 के बीच है। उदाहरण के लिए, भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने 2020 में न्यूनतम शेष राशि का नियम हटा दिया था, जिससे ग्राहक-हितैषी उदाहरण स्थापित हुआ।

एचडीएफसी, एक्सिस और कोटक महिंद्रा जैसे बैंक भी अपेक्षाकृत कम एमएबी रखते हैं, जिससे आईसीआईसीआई का ₹50,000 का निर्णय असंगत प्रतीत हुआ और विरोध की तीव्रता बढ़ी।

जनता की प्रतिक्रिया और नीति पर असर

तेजी से किया गया यह संशोधन दर्शाता है कि प्रतिस्पर्धी बैंकिंग बाजार में ग्राहकों की प्रतिक्रिया नीतिगत फैसलों को प्रभावित कर सकती है। वित्तीय समावेशन के समर्थकों ने चेतावनी दी थी कि इतना अधिक एमएबी कम आय वर्ग के लोगों और नए खाता धारकों को औपचारिक बैंकिंग से दूर कर देगा।

एमएबी घटाकर आईसीआईसीआई बैंक ने जन विश्वास बहाल करने की कोशिश की है, हालांकि यह अब भी औसत से अधिक है। इस कदम ने बैंकिंग पारदर्शिता, नियामकीय निगरानी, और लाभप्रदता बनाम समावेशिता के बीच संतुलन की आवश्यकता पर भी सवाल उठाए हैं।

केंद्रीय मंत्री ने ‘भारत स्टील’ के आधिकारिक लोगो का अनावरण किया

केंद्रीय इस्पात एवं भारी उद्योग मंत्री श्री एच.डी. कुमारस्वामी ने विज्ञान भवन, नई दिल्ली में भारत स्टील के लोगो, पुस्तिका (ब्रॉशर) और वेबसाइट का आधिकारिक शुभारंभ किया। इस महत्वपूर्ण अवसर पर इस्पात सचिव संदीप पाउन्ड्रिक और इस्पात मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित रहे। यह लॉन्च एक कार्यशाला के साथ आयोजित किया गया, जो सेकेंडरी स्टील सेक्टर पर केंद्रित थी—यह सरकार की भारत के पूरे इस्पात मूल्य शृंखला में समग्र विकास, नवाचार और सततता के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

‘भारत स्टील’ के बारे में

भारत स्टील, इस्पात मंत्रालय का प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन-सह-प्रदर्शनी है, जिसे भारत की सबसे बड़ी इस्पात प्रदर्शनी बनने की परिकल्पना की गई है। 16-17 अप्रैल 2026 को भारत मंडपम, नई दिल्ली में आयोजित होने वाले इस महत्वाकांक्षी आयोजन का उद्देश्य है, —

  • दुनिया भर के उद्योग नेताओं, सीईओ, नीति-निर्माताओं, प्रौद्योगिकी प्रदाताओं और निवेशकों को एक साथ लाना।

  • भारत की इस्पात निर्माण क्षमताओं का प्रदर्शन करना, खासकर हरित और सतत प्रथाओं पर जोर देना।

  • गहन थीमैटिक सेशन, क्षेत्रीय गोलमेज चर्चा (राज्य एवं देश स्तर), टेक्नोलॉजी शोकेस, सीईओ कॉन्फ्रेंस, और खरीदार–विक्रेता मुलाकातों का आयोजन करना।

सरकार की दृष्टि

लॉन्च कार्यक्रम में मंत्री श्री कुमारस्वामी ने सरकार की यह महत्वाकांक्षा व्यक्त की कि भारत को वैश्विक इस्पात इकोसिस्टम में नवाचार, सहयोग और निवेश का केंद्र बनाया जाए। यह पहल एक मजबूत, प्रतिस्पर्धी, जिम्मेदार और तकनीकी रूप से उन्नत इस्पात मूल्य शृंखला के निर्माण के प्रति व्यापक प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

भारत और सिंगापुर ने नई दिल्ली में तीसरे मंत्रिस्तरीय गोलमेज सम्मेलन में रणनीतिक साझेदारी को मजबूत किया

भारत और सिंगापुर ने नई दिल्ली में आयोजित तीसरे भारत–सिंगापुर मंत्रिस्तरीय गोलमेज सम्मेलन (ISMR) के दौरान अपने लंबे समय से चले आ रहे और निरंतर विकसित होते द्विपक्षीय संबंधों की पुनः पुष्टि की। इस बैठक में दोनों देशों के शीर्ष मंत्रियों ने भाग लिया और व्यापक रणनीतिक साझेदारी (Comprehensive Strategic Partnership) के तहत स्थापित मजबूत आधारों को और सुदृढ़ करने के लिए प्रमुख सहयोग क्षेत्रों पर विचार-विमर्श किया। यह मंच दोनों देशों की क्षेत्रीय विकास, नवाचार और इंडो-पैसिफिक में रणनीतिक तालमेल की साझा प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

उच्च-स्तरीय भागीदारी और रणनीतिक दृष्टिकोण

  • भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने किया, जिनके साथ विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल, तथा रेल एवं सूचना-प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव शामिल थे।
  • सिंगापुर की ओर से प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व उप प्रधानमंत्री एवं वाणिज्य और उद्योग मंत्री गान किम योंग ने किया।
  • अपने वक्तव्य में डॉ. जयशंकर ने भारत–सिंगापुर साझेदारी के अगले चरण को आगे बढ़ाने के लिए सरकार और उद्योग के बीच मजबूत तालमेल के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि भारत–सिंगापुर बिजनेस गोलमेज सम्मेलन (ISBR) के सदस्यों के साथ भी सार्थक चर्चा हुई, जिससे व्यापार और निवेश संवाद और मजबूत हुआ।

ISMR के अंतर्गत सहयोग के छह स्तंभ

इस मंत्रिस्तरीय गोलमेज सम्मेलन का केंद्रबिंदु सहयोग को गहरा करने के लिए पहचाने गए छह रणनीतिक स्तंभ रहे —

  1. डिजिटलीकरण – फिनटेक, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और साइबर सुरक्षा में संयुक्त प्रयास।

  2. कौशल विकास – संयुक्त प्रशिक्षण कार्यक्रमों और प्रौद्योगिकी-आधारित शिक्षा के माध्यम से कार्यबल की तैयारी।

  3. सतत विकास – जलवायु लचीलापन, नवीकरणीय ऊर्जा और हरित वित्त में सहयोग।

  4. स्वास्थ्य और औषधि – दवा व्यापार और स्वास्थ्य नवाचार को सुदृढ़ करना।

  5. उन्नत विनिर्माण – उच्च-स्तरीय औद्योगिक क्षेत्रों में नवाचार और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को प्रोत्साहित करना।

  6. कनेक्टिविटी – दोनों देशों के बीच भौतिक, डिजिटल और जन-से-जन संपर्क को मजबूत करना।

ये स्तंभ दोनों देशों की राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और वैश्विक महत्वाकांक्षाओं के अनुरूप हैं, खासतौर पर एक मजबूत इंडो-पैसिफिक ढांचे को बढ़ावा देने में।

रणनीतिक संदर्भ और व्यापक दृष्टि

यह गोलमेज बैठक इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सिंगापुर, भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी, महासागर विज़न और इंडो-पैसिफिक रणनीति का एक प्रमुख साझेदार है। दोनों देशों के बीच पहले से ही व्यापार, निवेश, रक्षा, शिक्षा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान में मजबूत संबंध हैं। सिंगापुर, भारत के सबसे बड़े विदेशी निवेशकों में से एक है और आसियान बाजारों का प्रवेश द्वार भी है।

भारत–सिंगापुर मंत्रिस्तरीय गोलमेज सम्मेलन का यह अनूठा प्रारूप न केवल एक संवाद मंच है, बल्कि यह भविष्य के सहयोग के लिए रणनीतिक एजेंडा तय करने का माध्यम भी है। यह तेजी से बदलते वैश्विक परिदृश्य में सहयोग के नए रास्ते निर्धारित करने में सहायक सिद्ध हो रहा है।

Recent Posts

द हिंदू रिव्यू मार्च 2026
Most Important Questions and Answer PDF
QR Code
Scan Me