अरुणाचल प्रदेश के कबक यानो ने पश्चिमी गोलार्ध की सबसे ऊंची चोटी फतह की

भारतीय पर्वतारोही कबक यानो ने अर्जेंटीना में स्थित माउंट अकॉनकागुआ की सफलतापूर्वक चोटी पर चढ़ाई की, जो दक्षिण अमेरिका और पश्चिमी गोलार्ध की सबसे ऊँची चोटी है। 22,831 फीट ऊँचाई वाली इस चढ़ाई ने उनके 7-सम्मिट पर्वतारोहण अभियान में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर स्थापित किया है। इस उपलब्धि से उनके दृढ़ संकल्प, सहनशीलता और साहस का परिचय मिलता है और यह पूरे देश के युवा खिलाड़ियों और साहसिक उत्साही लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी है।

कबक यानो कौन हैं?

कबक यानो अरुणाचल प्रदेश की 27 वर्षीय पर्वतारोही हैं, जो प्रतिष्ठित 7-सम्मिट पर्वतारोहण अभियान को पूरा करने के मिशन पर हैं। माउंट अकॉनकागुआ की उनकी सफल चढ़ाई इस यात्रा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इस चढ़ाई के लिए अत्यधिक शारीरिक सहनशक्ति, मानसिक मजबूती और तकनीकी कौशल की आवश्यकता थी, क्योंकि ऊँचाई बहुत अधिक थी और मौसम बेहद कठोर था। उनकी उपलब्धि न केवल उनके व्यक्तिगत दृढ़ संकल्प को दर्शाती है, बल्कि अरुणाचल प्रदेश को वैश्विक साहसिक खेल मानचित्र पर भी स्थापित करती है।

माउंट अकॉनकागुआ के बारे में: एंडीज़ का विशाल पर्वत

माउंट अकॉनकागुआ अर्जेंटीना की एंडीज़ पर्वत श्रृंखला में स्थित है और समुद्र तल से 22,831 फीट की ऊँचाई पर स्थित है। यह दक्षिण अमेरिका, पश्चिमी गोलार्ध और एशिया के बाहर की सबसे ऊँची चोटी है। हालांकि यह तकनीकी रूप से कठिन नहीं है, लेकिन ऊँचाई से होने वाली बीमारियों का खतरा, तेज़ हवाएँ और बर्फीले तापमान इसे बेहद चुनौतीपूर्ण बनाते हैं। इस चोटी को सफलतापूर्वक फतह करना अंतरराष्ट्रीय पर्वतारोहण में एक बड़ी उपलब्धि माना जाता है और Seven Summits अभियान में भाग लेने वाले पर्वतारोहियों के लिए एक प्रमुख मील का पत्थर है।

7-सम्मिट पर्वतारोहण अभियान की व्याख्या

सेवन समिट्स चुनौती में सात महाद्वीपों की सबसे ऊँची चोटी पर चढ़ाई शामिल है। इसे पर्वतारोहण की सबसे कठिन उपलब्धियों में से एक माना जाता है। कबक यानो का माउंट अकॉनकागुआ पर चढ़ाई उन्हें इस प्रतिष्ठित सूची को पूरा करने के और करीब ले जाती है।

यह अभियान कई वर्षों के प्रशिक्षण, वित्तीय योजना और वैश्विक यात्रा की मांग करता है। हर चढ़ाई सहनशक्ति, अनुकूलन क्षमता और जीवित रहने के कौशल की परीक्षा लेती है, जिससे यानो की प्रगति उनके अनुशासन और लंबे समय तक पर्वतारोहण में उत्कृष्टता के प्रति प्रतिबद्धता का प्रमाण बनती है।

स्वीकृति और नेतृत्व का समर्थन

अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल के. टी. परनाइक ने कबक यानो की इस अद्वितीय उपलब्धि के लिए बधाई दी। उन्होंने उनकी सफलता को व्यक्तिगत विजय के साथ-साथ राज्य के युवाओं के लिए प्रेरणा बताया। राज्यपाल ने पहले जुलाई 2025 में इटानगर से उनके 7-सम्मिट अभियान का शुभारंभ किया था।

राज्य के नेताओं ने यह भी रेखांकित किया कि उनका यह सफर साहस, एकाग्रता और अरुणाचल प्रदेश में बढ़ती खेल संस्कृति को दर्शाता है।

अमेरिका ने भारत पर टैरिफ 50% से घटाकर 18% किया

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2 फरवरी 2026 को दावा किया कि संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत के बीच एक व्यापार समझौता हो गया है, जिसके तहत शुल्क (टैरिफ) तत्काल प्रभाव से कम किए जाएंगे। यह घोषणा भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हुई सीधी बातचीत के बाद की गई। ट्रंप के अनुसार, इस समझौते के तहत भारतीय वस्तुओं पर लगाए गए अमेरिकी “पारस्परिक टैरिफ” को 25% से घटाकर 18% कर दिया गया है। इस डील से द्विपक्षीय व्यापार में वृद्धि, ऊर्जा क्षेत्र में बड़े बदलाव और शुल्क में राहत की उम्मीद जताई गई है, हालांकि इसके कानूनी स्वरूप और दीर्घकालिक प्रभावों को लेकर अभी भी कुछ सवाल बने हुए हैं।

ट्रंप ने व्यापार समझौते को लेकर क्या घोषणा की?

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अनुसार, अमेरिका भारतीय वस्तुओं पर लगाए गए “पारस्परिक टैरिफ” को घटाकर 18% कर देगा, जबकि भारत अमेरिकी उत्पादों पर शुल्क और गैर-शुल्क बाधाओं को शून्य की ओर ले जाने पर सहमत हुआ है। ट्रंप ने यह भी कहा कि भारत अमेरिका से कहीं अधिक मात्रा में उत्पाद खरीदेगा, जिनमें 500 अरब डॉलर से अधिक मूल्य की ऊर्जा, प्रौद्योगिकी, कृषि, कोयला और अन्य वस्तुएँ शामिल होंगी। यह घोषणा ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल के माध्यम से की और इसे तत्काल प्रभावी बताया, हालांकि अभी तक किसी आधिकारिक समझौता दस्तावेज़ को सार्वजनिक नहीं किया गया है।

ऊर्जा और भू-राजनीति: रूसी तेल का पहलू

घोषणा का एक अहम भू-राजनीतिक पक्ष यह था कि ट्रंप ने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रूसी तेल की खरीद बंद करने और इसके बजाय अमेरिका तथा संभवतः वेनेजुएला से तेल आयात बढ़ाने पर सहमत हुए हैं। ट्रंप के अनुसार, इससे यूक्रेन युद्ध में रूस की क्षमता को कमजोर करने में मदद मिलेगी। भारत की ऊर्जा खरीद लंबे समय से अमेरिका–भारत संबंधों में संवेदनशील मुद्दा रही है, खासकर तब जब पिछले वर्ष भारत द्वारा रूसी तेल आयात जारी रखने के आधार पर अमेरिका ने ऊँचे टैरिफ लगाए थे।

भारत की प्रतिक्रिया और आधिकारिक पुष्टि

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बाद में X (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट कर अमेरिकी टैरिफ में कटौती की पुष्टि की और इसे “मेक इन इंडिया” उत्पादों के लिए सकारात्मक कदम बताया। उन्होंने इस समझौते को दोनों लोकतंत्रों के लिए लाभकारी बताते हुए वैश्विक शांति, स्थिरता और समृद्धि के लिए सहयोग पर जोर दिया। हालांकि, भारतीय अधिकारियों की ओर से टैरिफ पूरी तरह समाप्त करने या तेल आयात में बदलाव को लेकर विस्तृत प्रतिबद्धताओं की जानकारी अभी सामने नहीं आई है, जिससे आगे बातचीत की गुंजाइश बनी हुई है।

कानूनी और संस्थागत सवाल

ट्रंप की मजबूत भाषा के बावजूद, इस समझौते की कानूनी स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है। न तो व्हाइट हाउस और न ही अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय ने कोई आधिकारिक दस्तावेज़ जारी किया है। कानूनी विशेषज्ञों और कुछ अमेरिकी सांसदों ने सवाल उठाया है कि क्या राष्ट्रपति कांग्रेस की मंजूरी के बिना बाध्यकारी व्यापार समझौते को अंतिम रूप दे सकते हैं। व्यापार विशेषज्ञों का भी कहना है कि ऐसे बदलाव तभी आधिकारिक माने जाते हैं जब उन्हें फेडरल रजिस्टर में अधिसूचित किया जाए, जिसमें संबंधित टैरिफ कोड और प्रभावी तिथियाँ स्पष्ट हों।

रक्षा मंत्रालय द्वारा यंत्र इंडिया लिमिटेड को मिनीरत्न कैटेगरी-I का दर्जा दिया गया

रक्षा मंत्री ने 2 फरवरी 2026 को ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड के निगमितकरण के बाद गठित रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम यंत्रा इंडिया लिमिटेड को मिनीरत्न श्रेणी-I का दर्जा देने की मंज़ूरी दी। महज़ चार वर्षों में यह कंपनी पारंपरिक सरकारी ढांचे से निकलकर मज़बूत बिक्री और बढ़ते निर्यात के साथ एक लाभकारी उपक्रम बनकर उभरी है। इस निर्णय को भारत में आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन को मज़बूती देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

यंत्रा इंडिया लिमिटेड के बारे में

यंत्रा इंडिया लिमिटेड अक्टूबर 2021 में ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड के निगमितकरण के बाद गठित सात रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों में से एक है। यह रक्षा उत्पादन विभाग के अंतर्गत कार्यरत है और उच्च तकनीक वाले रक्षा विनिर्माण पर केंद्रित है। इसके प्रमुख उत्पादों में कार्बन फाइबर कंपोज़िट्स, तोपखाना गन असेंबली, गोला-बारूद के घटक, बख़्तरबंद वाहन प्रणालियाँ तथा मुख्य युद्धक टैंकों में उपयोग होने वाली सामग्री शामिल हैं। यह कंपनी भारत की रक्षा आपूर्ति श्रृंखला को मज़बूत करने और आयात पर निर्भरता कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

मिनीरत्न श्रेणी-I दर्जा क्यों महत्वपूर्ण है

मिनीरत्न श्रेणी-I का दर्जा मिलने से यंत्रा इंडिया लिमिटेड को अधिक वित्तीय और परिचालन स्वायत्तता प्राप्त होती है। इस दर्जे के तहत कंपनी का बोर्ड नए प्रोजेक्ट, आधुनिकीकरण और उपकरणों की खरीद के लिए ₹500 करोड़ तक के पूंजीगत व्यय को बिना सरकारी मंज़ूरी के स्वीकृत कर सकता है। इससे निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज़ होती है, तकनीकी उन्नयन जल्दी संभव होता है और कंपनी की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ती है। रक्षा विनिर्माण के क्षेत्र में यह स्वायत्तता अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पीएसयू सैन्य आवश्यकताओं और वैश्विक निर्यात अवसरों पर तेजी से प्रतिक्रिया दे सकते हैं।

जिस परफॉर्मेंस की वजह से पहचान मिली

  • यंत्र इंडिया लिमिटेड ने अपनी शुरुआत से ही ज़बरदस्त ग्रोथ दिखाई है।
  • इसकी बिक्री 2021-22 (H2) में ₹956.32 करोड़ से बढ़कर FY 2024-25 में ₹3,108.79 करोड़ हो गई।
  • इसी दौरान एक्सपोर्ट ज़ीरो से बढ़कर ₹321.77 करोड़ हो गया।
  • रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कम समय में टर्नओवर बढ़ाने, स्वदेशीकरण बढ़ाने और परफॉर्मेंस के मुख्य बेंचमार्क पूरे करने के लिए YIL के मैनेजमेंट की तारीफ़ की।

रक्षा सुधारों और आत्मनिर्भर भारत से जुड़ाव

यह निर्णय भारत के व्यापक रक्षा सुधारों और आत्मनिर्भर भारत के विज़न के अनुरूप है। आयुध निर्माणी बोर्ड (Ordnance Factory Board) के निगमितकरण का उद्देश्य रक्षा पीएसयू में दक्षता, जवाबदेही और नवाचार को बढ़ावा देना था। इससे पहले, मई 2025 में तीन अन्य रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों को भी मिनीरत्न श्रेणी-I का दर्जा दिया गया था। यंत्रा इंडिया लिमिटेड को यह दर्जा प्रदान किया जाना स्वदेशी रक्षा क्षमताओं के निर्माण, निर्यात को प्रोत्साहन देने और भारत को वैश्विक रक्षा विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को और मज़बूत करता है।

यंत्रा इंडिया लिमिटेड : संक्षिप्त परिचय

  • प्रकार: सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम (PSU)
  • उद्योग: रक्षा उत्पादन
  • स्थापना: 1 अक्टूबर 2021
  • पूर्ववर्ती संस्था: आयुध निर्माणी बोर्ड (Ordnance Factory Board – OFB)
  • स्वामित्व: भारत सरकार

मुख्यालय

  • स्थान: ऑर्डनेंस फैक्ट्री अंबाझरी, नागपुर, महाराष्ट्र, भारत

प्रमुख नेतृत्व

  • अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक: गुरुदत्त राय, IOFS
  • निदेशक (परिचालन): शरद के. यादव, IOFS
  • निदेशक (वित्त): राकेश सिंह लाल, IOFS

मुख्य उत्पाद एवं क्षमताएँ

  • फोर्जिंग्स
  • कास्टिंग्स
  • धातु एवं इस्पात घटक
  • रक्षा-ग्रेड औद्योगिक सामग्री

यह कंपनी भारत की रक्षा आपूर्ति श्रृंखला को मज़बूत करने और आयात पर निर्भरता कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को पेन्नैयार नदी जल ट्रिब्यूनल बनाने का निर्देश दिया

भारत के लंबे समय से चले आ रहे अंतर्राज्यीय जल विवाद एक बार फिर चर्चा में आ गए हैं, जब तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच पेननैयार नदी जल विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया। 2 फरवरी 2026 को शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को एक महीने के भीतर इस विवाद के समाधान के लिए एक समर्पित जल विवाद न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) गठित करने का निर्देश दिया। यह निर्णय अंतर्राज्यीय नदी जल विवादों के समाधान के लिए संविधान में निर्धारित व्यवस्था को रेखांकित करता है और सहकारी संघवाद को बनाए रखने में न्यायपालिका की भूमिका को उजागर करता है।

पेननैयार नदी जल विवाद के बारे में

पेननैयार नदी कर्नाटक और तमिलनाडु से होकर बहती है, जिससे यह एक अंतर्राज्यीय नदी बनती है। विवाद तब उत्पन्न हुआ जब कर्नाटक ने नदी पर चेक डैम और जल मोड़ने वाली संरचनाओं का निर्माण किया। तमिलनाडु का आरोप है कि इन एकतरफा कदमों से नीचे की ओर जल प्रवाह कम हो रहा है और पुराने समझौतों का उल्लंघन हो रहा है। इस नदी का पानी तमिलनाडु के कई क्षेत्रों में कृषि और पेयजल के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिससे यह विवाद आर्थिक और सामाजिक रूप से संवेदनशील बन जाता है।

तमिलनाडु ने सुप्रीम कोर्ट का रुख क्यों किया?

तमिलनाडु ने वर्ष 2018 में मूल वाद (Original Suit) के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। राज्य का तर्क था कि अंतर्राज्यीय नदी जल राष्ट्रीय संपत्ति है और किसी एक राज्य का उस पर विशेष अधिकार नहीं हो सकता। तमिलनाडु ने यह भी आरोप लगाया कि कर्नाटक ने निर्माण कार्यों का विवरण साझा नहीं किया और न ही निचले प्रवाह वाले राज्य की सहमति ली, जो संघीय और कानूनी मानदंडों का उल्लंघन है।

1892 समझौते की भूमिका

तमिलनाडु ने अपने पक्ष में 1892 के समझौते का हवाला दिया, जो पेननैयार नदी के जल उपयोग को नियंत्रित करता है। राज्य का कहना है कि यह समझौता दोनों राज्यों पर बाध्यकारी है और कर्नाटक को बिना आपसी सहमति के बड़े जल परियोजनाएं शुरू करने से रोकता है।

सुप्रीम कोर्ट का निर्देश और कानूनी आधार

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया की पीठ ने केंद्र सरकार को आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना जारी कर एक महीने के भीतर न्यायाधिकरण गठित करने का आदेश दिया। यह निर्देश संविधान के अनुच्छेद 262 और अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के अनुरूप है, जो ऐसे विवादों को न्यायालय के बजाय ट्रिब्यूनल के माध्यम से सुलझाने का प्रावधान करता है।

जल विवाद न्यायाधिकरण क्यों महत्वपूर्ण हैं?

जल विवाद न्यायाधिकरण तकनीकी और प्रमाण-आधारित तरीके से जल बंटवारे के विवादों का समाधान करने के लिए बनाए जाते हैं। ये लंबे समय तक चलने वाले मुकदमों और राज्यों के बीच राजनीतिक तनाव को कम करने में मदद करते हैं। पेननैयार न्यायाधिकरण, कावेरी, कृष्णा और महादायी जैसे अन्य नदी जल न्यायाधिकरणों की श्रृंखला में जुड़कर सहकारी संघवाद की संस्थागत व्यवस्था को और मजबूत करता है।

रिस्पॉन्सिबल नेशन इंडेक्स 2026: पूरी रैंकिंग और विश्लेषण

वर्ल्ड इंटेलेक्चुअल फ़ाउंडेशन (WIF) द्वारा रिस्पॉन्सिबल नेशंस इंडेक्स 2026 जारी किया गया है, जो वैश्विक नेतृत्व के मूल्यांकन के तरीके में एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है। 19 जनवरी 2026 को प्रकाशित यह व्यापक सूचकांक 154 देशों का आकलन जिम्मेदारी, नैतिक शासन और सामूहिक हित के आधार पर करता है, न कि केवल आर्थिक उत्पादन या सैन्य शक्ति जैसे पारंपरिक मानकों पर।

रिस्पॉन्सिबल नेशंस इंडेक्स 2026 में सिंगापुर शीर्ष स्थान पर रहा है, उसके बाद स्विट्ज़रलैंड और डेनमार्क का स्थान है। यह दर्शाता है कि मजबूत शासन ढांचे वाले छोटे देश भी वैश्विक जिम्मेदारी के मामले में आर्थिक महाशक्तियों से बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं। यह रैंकिंग ऐसे समय में आई है जब दुनिया भू-राजनीतिक तनाव, आर्थिक अनिश्चितता और बढ़ती जलवायु चुनौतियों का सामना कर रही है।

रिस्पॉन्सिबल नेशंस इंडेक्स क्या है?

रिस्पॉन्सिबल नेशंस इंडेक्स वैश्विक देश रैंकिंग में एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। पारंपरिक सूचकांकों के विपरीत, जो जीडीपी, सैन्य ताकत या भू-राजनीतिक प्रभाव पर केंद्रित होते हैं, यह सूचकांक देशों का मूल्यांकन मानवता के सामूहिक हित और जिम्मेदार व्यवहार के आधार पर करता है।

मूल्यांकन के चार प्रमुख आयाम

यह सूचकांक 154 देशों का आकलन चार मुख्य आयामों पर करता है:

  • नैतिक शासन (Ethical Governance): पारदर्शिता, भ्रष्टाचार-रोधी उपाय, कानून का शासन और लोकतांत्रिक संस्थाएँ
  • सामाजिक कल्याण (Social Welfare): स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच, शिक्षा की गुणवत्ता, आय समानता और सामाजिक सुरक्षा प्रणालियाँ
  • पर्यावरणीय जिम्मेदारी (Environmental Responsibility): जलवायु कार्रवाई, नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग, संरक्षण प्रयास और सतत विकास नीतियाँ
  • वैश्विक जवाबदेही (Global Accountability): अंतरराष्ट्रीय सहयोग, मानवीय सहायता, शांति स्थापना में योगदान और कूटनीतिक जिम्मेदारी

विश्व के शीर्ष 10 सबसे जिम्मेदार देश 2026

नीचे दी गई तालिका रिस्पॉन्सिबल नेशंस इंडेक्स 2026 के अनुसार शीर्ष 10 देशों को दर्शाती है, जो वैश्विक जिम्मेदारी और सुशासन के मामले में अग्रणी हैं:

रैंक देश क्षेत्र स्कोर प्रमुख विशेषता
#1 सिंगापुर एशिया 0.6194 शीर्ष 10 में एकमात्र एशियाई देश
#2 स्विट्ज़रलैंड मध्य यूरोप 0.5869 नैतिक शासन में अग्रणी
#3 डेनमार्क उत्तरी यूरोप 0.5837 वैश्विक जवाबदेही में अग्रणी
#4 साइप्रस पूर्वी भूमध्यसागर 0.5774 मज़बूत सामाजिक कल्याण प्रणाली
#5 स्वीडन उत्तरी यूरोप 0.5740 पर्यावरणीय जिम्मेदारी में अग्रणी
#6 चेकिया मध्य यूरोप 0.5704 सभी स्तंभों में संतुलित विकास
#7 बेल्जियम पश्चिमी यूरोप 0.5690 सुदृढ़ शासन व्यवस्था
#8 ऑस्ट्रिया मध्य यूरोप 0.5665 उच्च सामाजिक कल्याण मानक
#9 आयरलैंड पश्चिमी यूरोप 0.5634 जन-केंद्रित शासन
#10 जॉर्जिया काकेशस 0.5581 उभरता हुआ जिम्मेदार राष्ट्र

रिस्पॉन्सिबल नेशंस इंडेक्स 2026 के प्रमुख निष्कर्ष

वैश्विक जिम्मेदारी में यूरोप का वर्चस्व

इंडेक्स में यूरोपीय देशों का स्पष्ट दबदबा देखने को मिलता है। शीर्ष 10 में से 9 देश यूरोप से हैं, जो इस क्षेत्र की नैतिक शासन व्यवस्था, मज़बूत सामाजिक कल्याण प्रणालियों और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के प्रति गहरी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। विशेष रूप से नॉर्डिक देश—जैसे डेनमार्क और स्वीडन—पर्यावरण संरक्षण और वैश्विक जवाबदेही के मानकों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हैं।

आर्थिक शक्ति का मतलब ज़िम्मेदारी नहीं

दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की रैंकिंग एक महत्वपूर्ण विरोधाभास को उजागर करती है। संयुक्त राज्य अमेरिका 66वें और चीन 68वें स्थान पर हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि केवल आर्थिक आकार या सैन्य शक्ति ही वैश्विक जिम्मेदारी का संकेतक नहीं है। यह निष्कर्ष पारंपरिक वैश्विक नेतृत्व की धारणाओं को चुनौती देता है।

संघर्ष-ग्रस्त देशों का सबसे निचला स्थान

लगातार संघर्ष झेल रहे देशों की रैंकिंग इंडेक्स में सबसे नीचे है। सीरिया 153वें और यमन 151वें स्थान पर हैं, जबकि राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहे कई अफ्रीकी देशों का प्रदर्शन भी कमजोर रहा है। यह दर्शाता है कि संघर्ष की स्थिति सीधे तौर पर जिम्मेदार शासन और सामाजिक कल्याण प्रणालियों को कमजोर कर देती है।

रिस्पॉन्सिबल नेशंस इंडेक्स 2026 में भारत की रैंकिंग

रिस्पॉन्सिबल नेशंस इंडेक्स 2026 में भारत ने वैश्विक स्तर पर 16वाँ स्थान हासिल किया है और उसका जिम्मेदारी स्कोर 0.5515 रहा है। यह रैंकिंग कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भारत की प्रगति को दर्शाती है। सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने और सार्वभौमिक स्वास्थ्य योजनाओं के विस्तार से स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में सुधार हुआ है। सामाजिक समानता के क्षेत्र में आय असमानता को कम करने और सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों के विस्तार की दिशा में ठोस कदम उठाए गए हैं। इसके साथ ही, पर्यावरणीय पहल के तहत नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों और जलवायु कार्रवाई नीतियों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता ने उसकी स्थिति को मजबूत किया है। जन-केंद्रित शासन में डिजिटल गवर्नेंस और नागरिकों पर केंद्रित नीतिगत ढांचे भी भारत की रैंकिंग को समर्थन देते हैं। हालांकि, इंडेक्स यह भी रेखांकित करता है कि दीर्घकालिक प्रदर्शन को और सुदृढ़ करने तथा भविष्य में शीर्ष 10 देशों में स्थान बनाने के लिए भारत को चारों आयामों में संतुलित और निरंतर नीति-ध्यान बनाए रखना होगा।

प्रमुख अर्थव्यवस्थाएँ और क्षेत्रीय शक्तियाँ: उल्लेखनीय रैंकिंग

देश रैंक स्कोर श्रेणी
भारत 16वाँ 0.5515 उभरता हुआ विकासशील राष्ट्र
संयुक्त राज्य अमेरिका 66वाँ प्रमुख अर्थव्यवस्था
चीन 68वाँ प्रमुख अर्थव्यवस्था
पाकिस्तान 90वाँ दक्षिण एशियाई देश
यमन 151वाँ संघर्ष-प्रभावित देश
सीरिया 153वाँ संघर्ष-प्रभावित देश

वैश्विक नेतृत्व के लिए इसका क्या अर्थ है

Responsible Nations Index 2026 वैश्विक शक्ति और प्रभाव की पारंपरिक धारणाओं को चुनौती देता है। यह स्पष्ट करता है कि जिम्मेदार नेतृत्व केवल आर्थिक प्रभुत्व या सैन्य ताकत पर आधारित नहीं होता, बल्कि टिकाऊ और समावेशी समाज बनाने पर निर्भर करता है, जो वैश्विक चुनौतियों में सकारात्मक योगदान दे सके।

जब दुनिया जलवायु परिवर्तन, आर्थिक असमानता और भू-राजनीतिक तनाव जैसी आपस में जुड़ी संकट स्थितियों का सामना कर रही है, तब यह सूचकांक यह दिखाने का एक रोडमैप प्रदान करता है कि व्यवहार में जिम्मेदार शासन कैसा होना चाहिए। जो देश नैतिक शासन, सामाजिक कल्याण, पर्यावरणीय स्थिरता और वैश्विक सहयोग को प्राथमिकता देते हैं, वे 21वीं सदी में नेतृत्व की बेहतर स्थिति में होंगे।

भारतीय मूल के वैज्ञानिक वीरभद्रन रामनाथन ने क्राफ़ोर्ड पुरस्कार 2026 जीता

भारतीय मूल के वैज्ञानिक वीरभद्रन रामनाथन को क्रैफोर्ड पुरस्कार से सम्मानित किया गया है, जिसे व्यापक रूप से “भू-विज्ञान का नोबेल” कहा जाता है। जलवायु परिवर्तन पर उनके दशकों लंबे शोध ने यह समझ ही बदल दी कि पृथ्वी का तापमान कैसे बढ़ता है। औद्योगिक गैसों के तापीय प्रभाव की खोज से लेकर वैश्विक पर्यावरण नीतियों को आकार देने तक, उनके कार्य ने विज्ञान और समाज—दोनों पर गहरा प्रभाव डाला है। यह पुरस्कार साक्ष्य-आधारित जलवायु विज्ञान के जरिए पृथ्वी की रक्षा के लिए समर्पित एक जीवनकाल के योगदान को मान्यता देता है।

वीरभद्रन रामनाथन कौन हैं?

  • वीरभद्रन रामनाथन भारतीय मूल के वायुमंडलीय वैज्ञानिक हैं, जिनके कार्यों ने जलवायु विज्ञान को नई दिशा दी।
  • दक्षिण भारत में जन्मे और शिक्षित रामनाथन ने बेंगलुरु में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की, इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका गए।
  • पाँच दशकों से अधिक के करियर में उन्होंने विश्व के अग्रणी संस्थानों में काम करते हुए वैश्विक तापन (ग्लोबल वार्मिंग) पर वैज्ञानिक सोच को मूल रूप से बदला।
  • उनके शोध से सिद्ध हुआ कि जलवायु परिवर्तन केवल कार्बन डाइऑक्साइड से नहीं, बल्कि कई ऊष्मा-फँसाने वाली गैसों के संयुक्त प्रभाव से संचालित होता है।

वह खोज जिसने जलवायु विज्ञान को बदल दिया

  • 1970 के दशक में नासा के लैंगली रिसर्च सेंटर में कार्य करते हुए रामनाथन ने यह खोज की कि क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) अत्यधिक मात्रा में ऊष्मा को फँसाते हैं।
  • 1975 में ‘साइंस’ पत्रिका में प्रकाशित उनके शोधपत्र ने दिखाया कि एक अकेला CFC अणु, कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में हजारों गुना अधिक तापन पैदा कर सकता है।
  • यह पहली स्पष्ट वैज्ञानिक पुष्टि थी कि CO₂ के अलावा अन्य गैसें भी वैश्विक तापन को तेज़ी से बढ़ा सकती हैं—जिससे जलवायु अनुसंधान की दिशा ही बदल गई।

ट्रेस गैसें और तेज़ होती वैश्विक गर्मी

  • रामनाथन के बाद के शोध ने मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी ट्रेस गैसों की शक्तिशाली भूमिका उजागर की।
  • 1985 में सह-लेखित शोध में उन्होंने चेतावनी दी कि ये गैसें अपेक्षा से कहीं तेज़ गति से वैश्विक तापन बढ़ा सकती हैं।
  • इसी वैज्ञानिक प्रमाण ने मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (1987) को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसके तहत CFCs को चरणबद्ध तरीके से समाप्त किया गया।
  • यह संधि सबसे सफल पर्यावरणीय समझौतों में गिनी जाती है और इसने अतिरिक्त वैश्विक तापन को काफी हद तक रोकने में मदद की।

विज्ञान, नैतिकता और वैश्विक नेतृत्व

  • रामनाथन ने नीति-निर्माताओं और वैश्विक नेताओं को सलाह दी है। वे पोंटिफिकल अकादमी ऑफ साइंसेज़ के सदस्य रहे हैं, जहाँ उन्होंने तीन पोपों को जलवायु नैतिकता पर परामर्श दिया।
  • वे लगातार इस बात पर ज़ोर देते हैं कि जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक असर गरीब और वंचित समुदायों पर पड़ता है।
  • व्यक्तिगत जीवन में वे स्वयं टिकाऊ जीवनशैली अपनाते हैं, लेकिन यह भी स्पष्ट करते हैं कि जलवायु संकट का समाधान केवल व्यक्तिगत प्रयासों से नहीं, बल्कि नीतिगत निर्णयों और नेतृत्व से ही संभव है।

UPI ने नया बेंचमार्क बनाया: अब तक के सबसे ज़्यादा ट्रांज़ैक्शन का रिकॉर्ड

भारत की डिजिटल भुगतान क्रांति ने एक और ऐतिहासिक मुकाम हासिल कर लिया है। जनवरी 2026 में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के माध्यम से होने वाले लेन-देन ने संख्या और मूल्य—दोनों के लिहाज से अब तक का सर्वोच्च स्तर छू लिया। आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, केवल एक महीने में भारतीयों ने 21.7 अरब से अधिक UPI लेन-देन किए, जिनका कुल मूल्य ₹28.33 लाख करोड़ रहा। यह तेज़ बढ़ोतरी दर्शाती है कि UPI अब छोटे खुदरा भुगतान से लेकर बड़े मूल्य के लेन-देन तक, रोज़मर्रा के भुगतानों की रीढ़ बन चुका है और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में भारत की वैश्विक नेतृत्वकारी स्थिति को और मजबूत करता है।

रिकॉर्ड तोड़ UPI आँकड़े

जनवरी 2026 में UPI लेन-देन का कुल मूल्य ₹28.33 लाख करोड़ तक पहुँच गया, जो दिसंबर 2025 के ₹27.97 लाख करोड़ से अधिक है। मूल्य के लिहाज से यह लगभग 21% की मासिक वृद्धि को दर्शाता है। वहीं, लेन-देन की संख्या 21.70 अरब तक पहुँच गई, जो उपयोगकर्ताओं और व्यवसायों दोनों के बीच UPI पर बढ़ते भरोसे और निर्भरता को दिखाती है। इन आँकड़ों का पैमाना यह स्पष्ट करता है कि UPI अब केवल एक भुगतान विकल्प नहीं रहा, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था में लेन-देन का डिफ़ॉल्ट माध्यम बन चुका है।

दैनिक लेन-देन के रुझान: गति और पैमाना

UPI की वृद्धि केवल मासिक आँकड़ों तक सीमित नहीं है। जनवरी में औसतन प्रतिदिन लगभग 70 करोड़ UPI लेन-देन हुए, जिनका दैनिक मूल्य करीब ₹91,403 करोड़ रहा। यह UPI की बेजोड़ गति, सुविधा और विश्वसनीयता को दर्शाता है, जो बिना किसी बाधा के अत्यधिक बड़े लेन-देन भार को संभालने में सक्षम है।

UPI के उपयोग में तेज़ बढ़ोतरी के कारण

UPI के तेजी से विस्तार के पीछे कई प्रमुख कारण हैं। इनमें स्मार्टफोन की व्यापक पहुँच, व्यापारियों द्वारा UPI को बढ़ते स्तर पर अपनाना, उपयोगकर्ताओं के लिए शून्य लागत वाले लेन-देन और बैंकों व ऐप्स के साथ सहज एकीकरण शामिल हैं। डिजिटल इंडिया के तहत सरकार के निरंतर समर्थन, साथ ही QR-कोड आधारित भुगतान और आवर्ती भुगतान (रिकरिंग मेंडेट) जैसी उपयोगकर्ता-अनुकूल नवाचारों ने इसके प्रसार को और गति दी है। यह निरंतर वृद्धि व्यवहार में आए बदलाव को दर्शाती है, जहाँ छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में भी डिजिटल भुगतान रोज़मर्रा की आदत बनते जा रहे हैं।

भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था में UPI की भूमिका

UPI भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (Digital Public Infrastructure) का एक प्रमुख स्तंभ बनकर उभरा है, जिसने वित्तीय समावेशन और पारदर्शिता को मजबूती दी है। इससे नकद पर निर्भरता में कमी आई है, कर अनुपालन में सुधार हुआ है और छोटे व्यवसायों को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जुड़ने का अवसर मिला है। विशेषज्ञों के अनुसार, UPI की लगभग 28% की वार्षिक वृद्धि दर यह संकेत देती है कि यह केवल अस्थायी अपनाने की प्रवृत्ति नहीं, बल्कि दीर्घकालिक और टिकाऊ डिजिटल भुगतान प्रणाली के रूप में स्थापित हो चुका है।

सरकार द्वारा ₹17.2 लाख करोड़ का रिकॉर्ड उधार-इसका क्या मतलब है

केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2026–27 (FY27) के लिए अब तक की सबसे अधिक ₹17.2 लाख करोड़ की उधारी योजना घोषित की है, जिसने बाजारों, अर्थशास्त्रियों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वालों का ध्यान खींचा है। यह घोषणा GDP के 4.3% के राजकोषीय घाटे के लक्ष्य के साथ की गई है, जो निरंतर लेकिन धीमे राजकोषीय समेकन का संकेत देती है। सरकार जहां विकास की जरूरतों और वित्तीय अनुशासन के बीच संतुलन साधना चाहती है, वहीं इतनी बड़ी उधारी ऋण स्थिरता, ब्याज दरों और दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता पर अहम सवाल खड़े करती है। इस कदम को समझना प्रतियोगी परीक्षाओं और आर्थिक जागरूकता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

सरकार ने क्या घोषणा की है

  • सरकार ने FY27 में ₹17.2 लाख करोड़ की सकल बाजार उधारी का अनुमान रखा है, जो FY26 के ₹14.8 लाख करोड़ से अधिक है।
  • इसमें से ₹11.7 लाख करोड़ की शुद्ध बाजार उधारी दिनांकित सरकारी प्रतिभूतियों (G-Secs) के माध्यम से होगी, जबकि शेष राशि लघु बचत और अन्य स्रोतों से जुटाई जाएगी।
  • FY26 में शुद्ध उधारी ₹12.5 लाख करोड़ बजट में रखी गई थी।
  • सरकार ने यह भी दोहराया कि FY26 का 4.4% राजकोषीय घाटा लक्ष्य पूरा किया जाएगा, जिससे घोषित लक्ष्यों के प्रति प्रतिबद्धता दिखती है।

राजकोषीय घाटा और उधारी को समझना

  • राजकोषीय घाटा तब होता है जब सरकार का कुल व्यय (उधार को छोड़कर) उसकी कुल प्राप्तियों से अधिक होता है।
  • इस अंतर को पाटने के लिए सरकार बाजार से उधार लेती है, मुख्यतः दिनांकित सरकारी प्रतिभूतियों के जरिए।
  • FY27 में राजकोषीय घाटा GDP का 4.3% रखा गया है, जो FY26 से केवल 0.1 प्रतिशत अंक कम है।
  • इससे स्पष्ट है कि समेकन जारी है, लेकिन उसकी गति धीमी है।
  • अधिक उधारी से अवसंरचना, कल्याण योजनाओं और विकास को वित्त मिलता है, लेकिन इससे सार्वजनिक ऋण और ब्याज दायित्व भी बढ़ते हैं।

बाजार और क्रेडिट रेटिंग का नजरिया

  • मूडीज़ रेटिंग्स के अनुसार, महामारी के बाद भारत ने राजकोषीय समेकन के प्रति स्पष्ट प्रतिबद्धता दिखाई है।
  • हालांकि, मूडीज़ ने यह भी कहा कि FY27 में सिर्फ 0.1% की कमी हाल के वर्षों में समेकन की सबसे धीमी गति है।
  • एजेंसी ने यह भी रेखांकित किया कि घाटा सरकार के पहले कार्यकाल के स्तरों की तुलना में अब भी अधिक है।
  • ऐसे आकलन महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि क्रेडिट रेटिंग विदेशी निवेश, उधारी लागत और वैश्विक भरोसे को प्रभावित करती है।

समेकन के बावजूद उधारी इतनी अधिक क्यों है

  • कम राजकोषीय घाटे के बावजूद रिकॉर्ड उधारी के पीछे कई कारण हैं।
  • भारत अवसंरचना, रक्षा, सामाजिक कल्याण और पूंजीगत व्यय में भारी निवेश जारी रखे हुए है ताकि विकास बना रहे।
  • बढ़ते ब्याज भुगतान और सब्सिडी प्रतिबद्धताएं भी वित्त पर दबाव डालती हैं।
  • वैश्विक अनिश्चितता के बीच आर्थिक गति बनाए रखने के लिए उच्च सार्वजनिक खर्च आवश्यक माना जा रहा है।
  • सरकार की रणनीति तीव्र कटौती के बजाय विकासोन्मुख खर्च और क्रमिक राजकोषीय अनुशासन के संतुलन पर आधारित है, ताकि अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी न पड़े।

क्या भारत के ₹17.2 लाख करोड़ के उधार में बढ़ोतरी के बाद RBI दखल दे सकता है?

बजट FY27 में वित्तीय अनुशासन का संदेश देने के बावजूद बांड बाजार में दबाव के संकेत साफ दिखाई दे रहे हैं। केंद्र सरकार की ओर से बाजार से ₹17.2 लाख करोड़ की बड़ी उधारी की योजना ने निवेशकों की क्षमता और सरकारी प्रतिभूतियों की आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। बढ़ती यील्ड और बाजार की बेचैनी यह दर्शाती है कि बांड बाजार को स्थिर रखना आसान नहीं होगा। महामारी के बाद ऊंचे बने हुए ऋण स्तरों के बीच अब यह सवाल अहम हो गया है कि क्या स्थिति को संभालने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक को हस्तक्षेप करना पड़ेगा।

बढ़ती उधारी: चुनौती का पैमाना

खर्च पर नियंत्रण के प्रयासों के बावजूद सरकार ने FY27 के लिए ₹17.2 लाख करोड़ की सकल बाजार उधारी का प्रावधान किया है, जो FY26 के बजट अनुमान से लगभग 16% अधिक है। FY26 में ही बांड बाजार को ₹14.82 लाख करोड़ की उधारी समाहित करने में कठिनाई हुई थी। आपूर्ति में इस तेज बढ़ोतरी ने बांड की कीमतों पर दबाव डाला है और यील्ड को ऊपर की ओर धकेला है। निवेशकों के लिए, मांग के अनुरूप आपूर्ति न बढ़ने से पूंजी हानि का डर पैदा होता है, जिससे उधारी कार्यक्रम और चुनौतीपूर्ण बन जाता है।

भारत का बढ़ता सार्वजनिक ऋण

कोविड-19 के दौरान भारत का सार्वजनिक ऋण तेजी से बढ़ा और उच्च पूंजीगत व्यय तथा लगातार बने हुए राजस्व खर्च के कारण यह अब भी ऊंचा बना हुआ है। सितंबर 2025 तक केंद्र सरकार की बकाया दिनांकित प्रतिभूतियां ₹121.37 लाख करोड़ तक पहुंच गईं, जबकि राज्यों की प्रतिभूतियां ₹67.21 लाख करोड़ रहीं। यह सितंबर 2019 की तुलना में लगभग दोगुना है, जब केंद्र की उधारी ₹63.14 लाख करोड़ थी। इसके बाद से केंद्र की उधारी 11.5% की चक्रवृद्धि वार्षिक दर से बढ़ी है, जबकि राज्यों की उधारी और भी तेज 13.8% CAGR से बढ़ी है।

बांड बाजार में बेचैनी क्यों है

बांड बाजार आपूर्ति और मांग के संतुलन के प्रति अत्यंत संवेदनशील होता है। जब सरकार की उधारी तेज़ी से बढ़ती है और मांग उसी अनुपात में नहीं बढ़ती, तो यील्ड में बढ़ोतरी स्वाभाविक हो जाती है। ऊंची यील्ड से सरकार की उधारी लागत बढ़ती है और इसका असर कॉरपोरेट बांड, बैंक ऋण दरों और आवास ऋण पर भी पड़ता है। मौजूदा बेचैनी इस आशंका को दर्शाती है कि घरेलू संस्थान इतनी बड़ी आपूर्ति को बिना यील्ड में तेज उछाल के शायद समाहित न कर पाएं, जिससे अर्थव्यवस्था में पूंजी की लागत बढ़ सकती है।

क्या RBI को हस्तक्षेप करना पड़ेगा?

ऐसी परिस्थितियों में बाजार अक्सर केंद्रीय बैंक से समर्थन की उम्मीद करता है। भारतीय रिज़र्व बैंक खुले बाजार परिचालन (OMO), तरलता प्रवाह या द्वितीयक बाजार में खरीद के जरिए बांड बाजार में उतार-चढ़ाव को कम कर सकता है। हालांकि RBI की प्राथमिकता महंगाई नियंत्रण है, लेकिन अगर बांड बाजार में अत्यधिक तनाव बना रहता है तो यह वित्तीय स्थिरता के लिए जोखिम बन सकता है। FY27 में महंगाई प्रबंधन और बांड बाजार स्थिरता के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी नीतिगत चुनौती होगा।

वैश्विक संदर्भ: भारत अकेला नहीं

भारत की ऋण वृद्धि वैश्विक रुझान का ही हिस्सा है। महामारी के बाद प्रोत्साहन पैकेज, भू-राजनीतिक तनाव और कमजोर वैश्विक विकास ने दुनियाभर की सरकारों को अधिक उधारी के लिए मजबूर किया है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अनुसार, वैश्विक सार्वजनिक ऋण 2025 के अंत तक 100 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो सकता है। यह संदर्भ कुछ हद तक राहत देता है, लेकिन भारत जैसे उभरते बाजार अब भी पूंजी प्रवाह में उतार-चढ़ाव और वैश्विक ब्याज दरों की चाल के प्रति संवेदनशील बने हुए हैं।

अरुणाचल में ‘अग्नि परीक्षा’ अभ्यास के लिए सेना और ITBP का संयुक्त अभियान

हाल ही में अरुणाचल प्रदेश में आयोजित अभ्यास अग्नि परीक्षा ने खास ध्यान आकर्षित किया है। यह एक संयुक्त प्रशिक्षण अभ्यास था, जिसमें भारतीय सेना और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के जवानों ने भाग लिया। इस अभ्यास का उद्देश्य आपसी समन्वय और युद्धक्षेत्र में प्रभावशीलता को बढ़ाना था। इसमें लाइव आर्टिलरी फायरिंग और व्यावहारिक युद्ध अभ्यास शामिल किए गए, जिससे गैर-तोपखाना (नॉन-आर्टिलरी) बलों को भी अग्नि-शक्ति के एकीकरण की समझ मिल सके। यह पहल संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में बलों के बीच संयुक्तता (Jointness) और त्वरित परिचालन प्रतिक्रिया पर भारत के बढ़ते फोकस को दर्शाती है।

अभ्यास अग्नि परीक्षा क्या है?

  • अभ्यास अग्नि परीक्षा भारतीय सेना और ITBP का एक संयुक्त सैन्य प्रशिक्षण अभ्यास है।
  • इसका उद्देश्य युद्ध जैसी परिस्थितियों में सेना और अर्धसैनिक बलों के बीच समन्वय को मजबूत करना है।
  • यह अभ्यास अपनी तरह का पहला माना जा रहा है, क्योंकि इसमें गैर-तोपखाना कर्मियों को भी सीधे आर्टिलरी फायरिंग अभ्यास में शामिल किया गया।
  • साझा संचालन प्रक्रियाओं और युद्ध तकनीकों के माध्यम से यह अभ्यास वास्तविक तैनाती के दौरान, विशेषकर उच्च हिमालयी और सीमावर्ती क्षेत्रों में, निर्बाध सहयोग सुनिश्चित करने पर केंद्रित है।

स्थान और भाग लेने वाली इकाइयाँ

  • यह अभ्यास अरुणाचल प्रदेश में आयोजित किया गया, जो रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण सीमावर्ती राज्य है।
  • इसमें स्पीयर कोर, आर्टिलरी रेजिमेंट, इन्फैंट्री बटालियन और ITBP की इकाइयों के जवान शामिल हुए।
  • स्पीयरहेड गनर्स ने प्रशिक्षण के दौरान मार्गदर्शन और निगरानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • इस क्षेत्र का चयन इसलिए किया गया ताकि सैनिक लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) और अन्य संवेदनशील सीमाओं जैसी वास्तविक युद्ध परिस्थितियों में खुद को ढाल सकें।

अभ्यास के उद्देश्य और लक्ष्य

  • अभ्यास अग्नि परीक्षा का मुख्य उद्देश्य इन्फैंट्री और ITBP कर्मियों को आर्टिलरी प्रक्रियाओं से परिचित कराना था।
  • प्रतिभागियों को समन्वय तंत्र, फायर मिशन निष्पादन और युद्ध के दौरान संचार प्रणाली का प्रशिक्षण दिया गया।
  • अभ्यास ने यह समझ विकसित करने पर जोर दिया कि कैसे आर्टिलरी की अग्नि-शक्ति ज़मीनी बलों को समर्थन देती है।
  • विशेषज्ञों की निगरानी में गैर-तोपखाना बलों को स्वतंत्र रूप से फायरिंग अभ्यास कराने से फायरपावर इंटीग्रेशन और संयुक्त परिचालन तैयारियों को नई मजबूती मिली।

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