सुप्रीम कोर्ट ने मासिक धर्म स्वास्थ्य को मौलिक अधिकार क्यों घोषित किया है?

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने मासिक धर्म स्वास्थ्य (Menstrual Health) को अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा घोषित किया है। न्यायालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे तीन महीनों के भीतर प्रत्येक सरकारी और निजी स्कूल में निःशुल्क सैनिटरी पैड, अलग शौचालय, पानी की सुविधा और सुरक्षित निपटान व्यवस्था उपलब्ध कराएँ।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बुनियादी मासिक धर्म स्वच्छता सुविधाओं का अभाव लड़कियों को कक्षाओं से बाहर कर देता है और उन्हें सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ता है। इसलिए यह केवल एक कल्याणकारी मुद्दा नहीं, बल्कि एक संवैधानिक प्रश्न है।

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय क्या है?

न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और आर. महादेवन की पीठ ने यह निर्णय दिया कि मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन (Menstrual Hygiene Management – MHM) गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार से अविभाज्य है। न्यायालय ने कहा कि गरिमा कोई अमूर्त अवधारणा नहीं है, बल्कि इसका प्रतिबिंब रोज़मर्रा की परिस्थितियों में दिखना चाहिए। मासिक धर्म के दौरान शौचालय, सैनिटरी नैपकिन या सुरक्षित निपटान व्यवस्था का अभाव लड़कियों को अपमान, बहिष्कार और अनावश्यक पीड़ा की स्थिति में डाल देता है, जो सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।

राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और स्कूलों के लिए प्रमुख निर्देश

न्यायालय ने आदेश दिया कि शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित प्रत्येक स्कूल, चाहे वह सरकारी हो या निजी, में कार्यशील, लिंग-विभाजित शौचालय तथा पानी की समुचित व्यवस्था अनिवार्य होगी। सभी शौचालयों में गोपनीयता, साबुन और पानी के साथ हाथ धोने की सुविधा, तथा दिव्यांग बच्चों के लिए सुलभ पहुँच सुनिश्चित की जाएगी। निजी स्कूलों द्वारा आदेशों का पालन न करने पर उनकी मान्यता रद्द की जा सकती है, जबकि सरकारी स्कूलों के मामलों में संबंधित राज्य सरकारें सीधे उत्तरदायी होंगी।

निःशुल्क सैनिटरी पैड और सुरक्षित निपटान व्यवस्था

सभी स्कूलों को ASTM D-6954 मानकों के अनुरूप ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन निःशुल्क उपलब्ध कराने होंगे। इन्हें प्राथमिक रूप से शौचालयों के भीतर वेंडिंग मशीनों के माध्यम से उपलब्ध कराया जाना चाहिए। जहाँ यह संभव न हो, वहाँ सैनिटरी पैड निर्धारित स्कूल अधिकारियों के माध्यम से सुलभ कराए जाएँ। इसके साथ ही, न्यायालय ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों के अनुसार सुरक्षित, स्वच्छ और पर्यावरण-अनुकूल निपटान तंत्र को भी अनिवार्य किया है।

MHM कॉर्नर और आपातकालीन सहायता

न्यायालय के निर्णय के अनुसार प्रत्येक स्कूल में MHM (मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन) कॉर्नर स्थापित करना अनिवार्य होगा। इन कॉर्नरों में अतिरिक्त यूनिफॉर्म, इनरवियर, डिस्पोज़ेबल बैग और मासिक धर्म से जुड़ी आपात स्थितियों से निपटने के लिए आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराई जाएगी। इन उपायों का उद्देश्य मासिक धर्म के दौरान डर, असुविधा या संसाधनों की कमी के कारण होने वाली अनुपस्थिति और स्कूल छोड़ने की प्रवृत्ति को रोकना है।

शिक्षा, जागरूकता और सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ना

मासिक धर्म से जुड़ी सामाजिक कलंक (Stigma) को एक बड़ी बाधा मानते हुए न्यायालय ने NCERT और SCERT को निर्देश दिया कि वे अपने पाठ्यक्रमों में लैंगिक-संवेदनशील शिक्षा को शामिल करें, जिसमें मासिक धर्म, यौवनावस्था, तथा PCOS और PCOD जैसे प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़े विषय हों। इसके साथ ही, जन-जागरूकता फैलाने के लिए सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया, रेडियो, टेलीविजन और आउटडोर अभियानों का उपयोग करने के निर्देश भी दिए गए।

कानूनी आधार: शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009

न्यायालय ने अपने निर्णय में शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 पर विशेष रूप से भरोसा किया, खासकर धारा 19 और उससे जुड़ी अनुसूची पर, जो लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय तथा बैरियर-फ्री एक्सेस को अनिवार्य बनाती है। पीठ ने स्पष्ट किया कि “बैरियर-फ्री एक्सेस” का अर्थ केवल भौतिक बाधाओं को हटाना नहीं है, बल्कि मासिक धर्म स्वच्छता से जुड़ी बाधाओं को दूर करना भी है, क्योंकि स्वच्छता सुविधाओं की कमी से किशोर लड़कियों में अनुपस्थिति, सीखने में अंतर और अंततः स्कूल छोड़ने की समस्या उत्पन्न होती है।

अनुच्छेद 21 : जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार

शीर्षक मुख्य बिंदु
अनुच्छेद 21 का पाठ (Text of Article 21) “किसी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा।”
अधिकार की प्रकृति (Nature of Right) यह अधिकार नागरिकों और गैर-नागरिकों दोनों को उपलब्ध है।
इसे केवल राज्य के विरुद्ध ही दावा किया जा सकता है (अनुच्छेद 12 के अंतर्गत राज्य)।
निजी व्यक्तियों द्वारा किया गया उल्लंघन, जब तक उसमें राज्य की कार्रवाई या संलिप्तता न हो, इस अनुच्छेद के दायरे में नहीं आता।

वर्ल्ड बैंक ने भारत को सालाना 8-10 बिलियन अमेरिकी डॉलर देने का वादा क्यों किया है?

विश्व बैंक समूह (World Bank Group) ने अगले पाँच वर्षों तक हर वर्ष 8–10 अरब अमेरिकी डॉलर की बड़ी वित्तीय सहायता भारत को देने की घोषणा की है। यह सहायता हाल ही में स्वीकृत कंट्री पार्टनरशिप फ्रेमवर्क (CPF) के तहत प्रदान की जाएगी, जिसका उद्देश्य भारत की आर्थिक वृद्धि को तेज़ करना और 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य को समर्थन देना है। यह घोषणा भारत की आर्थिक नीतियों और विकास पथ में गहरे वैश्विक विश्वास को दर्शाती है तथा भारत की भूमिका को एक महत्वपूर्ण वैश्विक विकास इंजन के रूप में रेखांकित करती है।

कंट्री पार्टनरशिप फ्रेमवर्क (CPF) क्या है?

कंट्री पार्टनरशिप फ्रेमवर्क (CPF) भारत और विश्व बैंक समूह के बीच सहयोग को दिशा देने वाला एक रणनीतिक रोडमैप है। नया CPF उन प्राथमिक क्षेत्रों को परिभाषित करता है जहाँ वित्तीय सहायता, तकनीकी सहयोग और वैश्विक विशेषज्ञता को एक साथ जोड़कर बड़े पैमाने पर विकासात्मक परिणाम हासिल किए जाएंगे। वित्त मंत्रालय के अनुसार, यह फ्रेमवर्क पूरी तरह से ‘विकसित भारत’ विज़न के अनुरूप है और इसका उद्देश्य केवल परियोजनाओं को धन उपलब्ध कराना ही नहीं, बल्कि संस्थागत मजबूती, वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं का साझा उपयोग तथा दीर्घकालिक सतत विकास सुनिश्चित करना भी है।

भारत का रुख: केवल वित्तपोषण से आगे की साझेदारी

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कंट्री पार्टनरशिप फ्रेमवर्क (CPF) का स्वागत करते हुए कहा कि भारत विकास साझेदारी को केवल धन तक सीमित नहीं मानता। उन्होंने ज्ञान साझा करने, तकनीकी सहायता और विश्व बैंक समूह के वैश्विक अनुभव के महत्व पर ज़ोर दिया। वित्त मंत्री ने यह भी रेखांकित किया कि सार्वजनिक धन को निजी पूंजी के साथ जोड़ना तथा ग्रामीण और शहरी भारत में रोजगार सृजन बड़े स्तर पर प्रभाव हासिल करने की कुंजी होगा। ये चर्चाएँ उस समय हुईं जब विश्व बैंक के अध्यक्ष के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने नई दिल्ली में उनसे मुलाकात की।

निजी क्षेत्र के नेतृत्व में रोजगार सृजन पर केंद्रित साझेदारी

नए भारत–विश्व बैंक साझेदारी के केंद्र में निजी क्षेत्र द्वारा संचालित रोजगार सृजन है। हर वर्ष लगभग 1.2 करोड़ युवा भारत के श्रम बाज़ार में प्रवेश करते हैं, जिससे रोजगार सृजन एक राष्ट्रीय प्राथमिकता बन गया है। CPF का उद्देश्य उन क्षेत्रों में निजी निवेश को प्रोत्साहित करना है जहाँ बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित हो सकते हैं। इसके तहत सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए बाधाएँ कम करना, कौशल उन्नयन, तथा युवाओं और महिलाओं के लिए अवसरों का विस्तार शामिल है, ताकि आर्थिक वृद्धि को अर्थपूर्ण और टिकाऊ रोजगार में बदला जा सके।

साझेदारी के चार रणनीतिक परिणाम

कंट्री पार्टनरशिप फ्रेमवर्क (CPF) चार व्यापक रणनीतिक परिणामों पर केंद्रित है। इनमें ग्रामीण समृद्धि और लचीलापन बढ़ाना, शहरी परिवर्तन और रहने योग्य शहरों को बढ़ावा देना, मानव संसाधन में निवेश के साथ ऊर्जा सुरक्षा और प्रमुख बुनियादी ढाँचे को सुदृढ़ करना, तथा समग्र आर्थिक और जलवायु लचीलापन मजबूत करना शामिल है। यह फ्रेमवर्क 2023 के बाद विश्व बैंक समूह द्वारा किए गए आंतरिक सुधारों से भी लाभान्वित है, जिनका उद्देश्य संस्था को अधिक तेज़, सरल और प्रभाव-केंद्रित बनाना है। इनमें से कई सुधारों को भारत की G20 अध्यक्षता के दौरान दिशा मिली।

विश्व बैंक: संक्षिप्त परिचय

शीर्षक विवरण
परिभाषा एवं उद्देश्य (Definition & Purpose) एक वैश्विक विकास संस्था, जो वित्तीय सहायता, तकनीकी सहयोग और शोध प्रदान करती है।
दुनिया भर में गरीबी उन्मूलन, शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढाँचा, सुशासन और जलवायु कार्रवाई को बढ़ावा देना इसका प्रमुख उद्देश्य है।
मुख्यालय (Headquarters) वॉशिंगटन डी.सी., संयुक्त राज्य अमेरिका
इतिहास (History) 1944 में ब्रेटन वुड्स सम्मेलन (न्यू हैम्पशायर, अमेरिका) में स्थापना।
IBRD के Articles of Agreement को 27 दिसंबर 1945 को अनुमोदन।
25 जून 1946 से कार्य प्रारंभ।
प्रारंभ में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पुनर्निर्माण पर केंद्रित; बाद में विकास, गरीबी उन्मूलन, अवसंरचना, मानव पूंजी और संस्थागत सुधारों तक विस्तार।
उद्देश्य / मिशन (Objectives / Mission) अत्यधिक गरीबी का अंत और साझा समृद्धि को बढ़ावा देना।
ऋण, अनुदान और जोखिम गारंटी प्रदान करना।
तकनीकी सहायता, नीतिगत सलाह और क्षमता निर्माण।
सड़क, बिजली, जल जैसी बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं को समर्थन।
निजी क्षेत्र के नेतृत्व वाले विकास को प्रोत्साहन (IFC व MIGA के माध्यम से)।
शोध और डेटा विश्लेषण के ज़रिये ज्ञान का सृजन और साझा करना।
संरचना (Structure) विश्व बैंक समूह की मुख्य संस्थाएँ:
IBRD – मध्यम आय व साख योग्य निम्न आय देशों को ऋण; वित्तीय बाज़ारों से पूंजी जुटाता है।
IDA – सबसे गरीब देशों को रियायती ऋण व अनुदान; दाता देशों द्वारा वित्तपोषित।समर्थक संस्थाएँ:
IFC – निजी क्षेत्र विकास; निवेश, इक्विटी व परामर्श सेवाएँ।
MIGA – राजनीतिक जोखिम बीमा; विदेशी निवेश को प्रोत्साहन।
ICSID – निवेश विवादों का मध्यस्थता के माध्यम से समाधान।
वित्तपोषण तंत्र (Funding Mechanism) सदस्य देशों के अंशदान (Paid-in Capital) और अंतरराष्ट्रीय बॉन्ड के माध्यम से पूंजी जुटाता है।
शेयरधारक पूंजी का कुशल उपयोग कर सीमित योगदान से बड़े पैमाने पर ऋण/अनुदान।
अधिशेष आय का उपयोग IDA के रियायती ऋण हेतु।

भारतीय रेलवे ने एक दिन में कवच 4.0 सेफ्टी का सबसे बड़ा माइलस्टोन कैसे हासिल किया?

भारतीय रेलवे ने रेल सुरक्षा के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए कवच संस्करण 4.0 को एक ही दिन में 472.3 रूट किलोमीटर पर सफलतापूर्वक चालू किया है। यह भारत के रेल इतिहास में कवच का अब तक का सबसे बड़ा एक-दिवसीय कमीशनिंग रिकॉर्ड है।

यह उन्नत सुरक्षा प्रणाली अब पश्चिम रेलवे, उत्तर रेलवे और पूर्व मध्य रेलवे के प्रमुख खंडों पर सक्रिय हो चुकी है। इस उपलब्धि के साथ, भारतीय रेलवे यात्री सुरक्षा को और मजबूत कर रहा है, दुर्घटना जोखिम को कम कर रहा है तथा एक स्मार्ट और सुरक्षित रेल नेटवर्क के लक्ष्य की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है।

रिकॉर्ड तोड़ कवच 4.0 कमीशनिंग

हालिया कमीशनिंग में शामिल खंड:

  • वडोदरा–वीरार (344 किमी) – पश्चिम रेलवे
  • तुगलकाबाद जंक्शन केबिन–पलवल (35 किमी) – उत्तर रेलवे
  • मानपुर–सरमतनर (93.3 किमी) – पूर्व मध्य रेलवे

इस एक-दिवसीय उपलब्धि ने कोटा–मथुरा खंड (324 किमी) के पिछले रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया।

यह सफलता तेज़ क्रियान्वयन, बेहतर समन्वय और भारत की स्वदेशी रेल सुरक्षा तकनीक पर बढ़ते भरोसे को दर्शाती है। इसके साथ ही, कवच 4.0 अब भारतीय रेलवे के पाँच ज़ोन में चालू हो चुका है, जो उच्च घनत्व वाले रेल कॉरिडोरों पर तकनीक-आधारित सुरक्षा की दिशा में एक निर्णायक कदम है।

उत्तर रेलवे: दिल्ली–मुंबई कॉरिडोर की सुरक्षा में मजबूती

उत्तर रेलवे में 35 किमी तुगलकाबाद–पलवल खंड पर कवच 4.0 को चालू किया गया है, जो व्यस्त चार-लाइन दिल्ली–मुंबई मार्ग का हिस्सा है।

इस खंड में शामिल हैं:

  • दो स्वचालित सिग्नलिंग लाइनें
  • दो एब्सोल्यूट ब्लॉक सिग्नलिंग लाइनें
  • प्रमुख स्टेशन यार्ड

यह कॉरिडोर उपनगरीय, यात्री और मालगाड़ियों का भारी यातायात संभालता है। यहाँ कवच की तैनाती से सिग्नल को खतरे की स्थिति में पार करने (SPAD) और ओवरस्पीडिंग जैसी घटनाओं को रोका जा सकेगा, जिससे परिचालन विश्वसनीयता में बड़ा सुधार होगा।

पूर्व मध्य रेलवे: लाइव सुरक्षा परीक्षण में सफलता

  • पूर्व मध्य रेलवे के 93.3 किमी मानपुर–सरमतनर खंड में अब कवच-सक्षम परिचालन शुरू हो गया है।
  • इस प्रणाली के अंतर्गत चलने वाली पहली ट्रेन थी:
  • 13305 सासाराम इंटरसिटी एक्सप्रेस
  • इस ट्रेन ने हेड-ऑन टक्कर परीक्षण के दौरान कवच की स्वचालित ब्रेकिंग क्षमता का सफल प्रदर्शन किया।
  • यह खंड महत्वपूर्ण दिल्ली–हावड़ा ट्रंक रूट पर स्थित है, जहाँ अधिकतम गति 130 किमी/घंटा है और मिशन रफ्तार के तहत इसे 160 किमी/घंटा तक उन्नत करने का लक्ष्य है।
  • इस ज़ोन में कुल 4,235 रूट किमी पर कवच की योजना है, जिससे यह भविष्य की सुरक्षा उन्नयन योजनाओं का प्रमुख केंद्र बनता है।

पश्चिम रेलवे: मुंबई से पहली कवच-सुसज्जित ट्रेन

पश्चिम रेलवे ने 344 किमी वडोदरा–सूरत–वीरार खंड पर कवच 4.0 चालू कर एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। यह खंड दिल्ली–मुंबई मार्ग का हिस्सा है।

  • 20907 दादर–भुज सायाजीनगरी एक्सप्रेस
  • मुंबई से चलने वाली पहली कवच-सुसज्जित ट्रेन बनी।

इस कॉरिडोर पर कार्य जनवरी 2023 में शुरू हुआ था और तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।

आगामी लक्ष्य:

  • वडोदरा–नागदा खंड – मार्च 2026 तक
  • वीरार–मुंबई सेंट्रल खंड – सितंबर 2026 तक

इससे मुंबई के रेल नेटवर्क में कवच की पहुँच और गहराई तक बढ़ेगी।

कवच 4.0 : मुख्य विशेषताएँ 

शीर्षक विवरण
अवलोकन (Overview) कवच संस्करण 4.0 भारत की स्वदेशी ऑटोमैटिक ट्रेन प्रोटेक्शन (ATP) प्रणाली का नवीनतम और सबसे उन्नत संस्करण है।
इसे परिचालन अनुभव और स्वतंत्र सुरक्षा मूल्यांकन के आधार पर लगातार तकनीकी उन्नयन के माध्यम से विकसित किया गया है।
अनुमोदन एवं प्रमाणीकरण (Approval & Certification) रिसर्च डिज़ाइन्स एंड स्टैंडर्ड्स ऑर्गनाइज़ेशन (RDSO) द्वारा अनुमोदित।
स्वतंत्र सुरक्षा मूल्यांकनकर्ता (ISA) द्वारा प्रमाणित।
वैश्विक सुरक्षा मानकों के अनुरूप तथा SIL-4 सुरक्षा स्तर (विश्व में सर्वोच्च) का अनुपालन।
डिज़ाइन एवं नेटवर्क अनुकूलता (Design & Network Compatibility) भारत के उच्च घनत्व, बहु-लाइन और विविध रेल नेटवर्क के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन।
बेहतर विश्वसनीयता और तेज़ प्रतिक्रिया समय सुनिश्चित करता है।
मौजूदा सिग्नलिंग और इंटरलॉकिंग प्रणालियों के साथ सहज एकीकरण।
तकनीकी घटक (Technological Components) रियल-टाइम निर्णय के लिए माइक्रोप्रोसेसर का उपयोग।
सटीक ट्रेन स्थिति निर्धारण हेतु GPS (ग्लोबल पोज़िशनिंग सिस्टम) का एकीकरण।
ट्रेनों और ट्रैकसाइड उपकरणों के बीच निरंतर डेटा आदान-प्रदान के लिए रेडियो संचार प्रणाली
सिग्नल सुरक्षा – SPAD (Signal Protection at Danger) Signal Passing at Danger (SPAD) से स्वचालित सुरक्षा प्रदान करता है।
लाल सिग्नल को अनजाने में पार करने से ट्रेनों को रोकता है।

भारत ने अपना पहला AI-पावर्ड यूनिवर्सिटी कहाँ और क्यों लॉन्च किया है?

भारत ने आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के माध्यम से उच्च शिक्षा में बदलाव की दिशा में एक निर्णायक कदम उठाया है। पहली बार, किसी भारतीय विश्वविद्यालय में AI-संचालित शिक्षण, अध्ययन और प्रशासनिक प्रणालियों का परीक्षण किया जाएगा। यह पायलट परियोजना एक ऐसा स्केलेबल राष्ट्रीय मॉडल तैयार करने का लक्ष्य रखती है, जो AI युग में छात्रों के सीखने के तरीक़ों और विश्वविद्यालयों के कार्य-संचालन दोनों को नई दिशा दे सकती है।

AI-सक्षम विश्वविद्यालय पहल क्या है?

यह पहल कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय के नेतृत्व में Google Cloud और चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय (CCSU) के सहयोग से शुरू की गई है। CCSU को पायलट कैंपस के रूप में चुना गया है, जहाँ AI टूल्स का परीक्षण किया जाएगा और सफल होने पर इन्हें पूरे देश के अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों में लागू किया जाएगा। इस परियोजना की घोषणा नई दिल्ली में आयोजित Google के AI for Learning Forum में की गई।

मुख्य विशेषताएँ: AI सीखने को कैसे बदलेगा

इस कार्यक्रम के तहत Google Cloud के Gemini AI प्लेटफ़ॉर्म को शैक्षणिक और प्रशासनिक दोनों क्षेत्रों में लागू किया जाएगा। छात्रों को व्यक्तिगत AI ट्यूटर उपलब्ध होंगे, जिनमें क्षेत्रीय भाषाओं का समर्थन भी शामिल होगा। इससे छात्र अपनी गति से सीख सकेंगे और नौकरी बाज़ार की ज़रूरतों के अनुरूप अपनी कौशल कमियों की पहचान कर पाएंगे। वहीं, शिक्षक AI टूल्स की मदद से शिक्षण सामग्री, सिमुलेशन और बहुभाषी कंटेंट तैयार कर सकेंगे, जिससे कक्षा में सहभागिता और शिक्षण दक्षता बढ़ेगी। इसका उद्देश्य “एक ही ढाँचा सबके लिए” वाली शिक्षा से आगे बढ़कर व्यक्तिगत और परिणाम-आधारित सीखने की व्यवस्था बनाना है।

स्मार्ट कैंपस और कम काग़ज़ी काम

कक्षाओं के अलावा, यह पहल स्मार्ट कैंपस प्रबंधन पर भी केंद्रित है। विश्वविद्यालय कार्यालयों में AI-आधारित ऑटोमेशन से रोज़मर्रा का काग़ज़ी काम घटेगा, स्वीकृति प्रक्रियाएँ तेज़ होंगी और सेवा वितरण बेहतर होगा। इससे प्रशासनिक देरी कम होगी और कर्मचारी शैक्षणिक व छात्र-केंद्रित कार्यों पर अधिक ध्यान दे सकेंगे। इस तकनीकी क्रियान्वयन की ज़िम्मेदारी Placecom को सौंपी गई है।

समावेशन और क्षेत्रीय पहुँच पर ज़ोर

इस पायलट परियोजना का एक प्रमुख उद्देश्य भाषा, स्थान और संसाधनों से जुड़ी शैक्षणिक असमानताओं को कम करना है। क्षेत्रीय भाषाओं में AI ट्यूटर और उन्नत डिजिटल टूल्स की उपलब्धता से गैर-महानगरीय और क्षेत्रीय संस्थानों के छात्रों को विशेष लाभ मिलेगा, जिन्हें अक्सर अत्याधुनिक शैक्षणिक तकनीकों तक सीमित पहुँच मिलती है।

सरकार और उद्योग का दृष्टिकोण

कौशल विकास मंत्री जयंत चौधरी ने कहा कि यह परियोजना केवल डिग्री प्रदान करने तक सीमित नहीं है, बल्कि छात्रों को भविष्य के कार्यबल के लिए तैयार करने पर केंद्रित है। उन्होंने ज़ोर दिया कि AI टूल्स शिक्षा को उभरती हुई कौशल आवश्यकताओं से जोड़ने में मदद करेंगे। वहीं, Google इंडिया की कंट्री मैनेजर और वाइस प्रेसिडेंट प्रीति लोबाना ने कहा कि CCSU व्यक्तिगत शिक्षण मॉडल और AI-आधारित करियर मार्गदर्शन के लिए एक परीक्षण केंद्र के रूप में कार्य करेगा, जो भारत में उच्च शिक्षा की डिलीवरी को नए सिरे से परिभाषित कर सकता है।

प्रज्ञा-AIX क्या है और यह ONGC के संचालन को कैसे बदलेगा?

भारत की सबसे बड़ी ऊर्जा अन्वेषण कंपनी ONGC (ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन) ने अपने रोज़मर्रा के संचालन में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस को शामिल करने की दिशा में एक निर्णायक कदम उठाया है। पायलट परियोजनाओं से आगे बढ़ते हुए, अब एक नया डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म कई AI टूल्स को एक ही इकोसिस्टम के तहत लाता है, जिसका उद्देश्य तेल और गैस संचालन में दक्षता, सुरक्षा और उत्पादन को बेहतर बनाना है।

प्रज्ञा-AIX क्या है?

प्रज्ञा-AIX एक केंद्रीकृत डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म है, जो ONGC के विभिन्न AI अनुप्रयोगों को एकीकृत प्रणाली के रूप में जोड़ता है। अलग-अलग साइलो में काम करने वाले टूल्स के बजाय, यह प्लेटफ़ॉर्म एक ऐसा कार्यशील AI इकोसिस्टम तैयार करता है, जो ONGC के विभिन्न कार्य केंद्रों में दैनिक निर्णय-निर्माण में सहायता करता है। यह प्रयोगात्मक AI पायलट्स से आगे बढ़कर पूरे उद्यम स्तर पर AI को अपनाने की दिशा में बदलाव को दर्शाता है, जिससे डेटा-आधारित अंतर्दृष्टियों का तेज़ और समान रूप से उपयोग संभव होता है।

डेटा को उपयोगी बुद्धिमत्ता में बदलना

प्रज्ञा-AIX का मुख्य उद्देश्य विशाल परिचालन डेटा को उपयोगी और क्रियाशील बुद्धिमत्ता में बदलना है। यह प्लेटफ़ॉर्म भूकंपीय विश्लेषण, उत्पादन अनुकूलन और स्मार्ट फ़ील्ड मॉनिटरिंग जैसे महत्वपूर्ण अपस्ट्रीम कार्यों को समर्थन देता है। उप-सतही व्याख्या और तेल क्षेत्रों की रियल-टाइम निगरानी को बेहतर बनाकर यह प्रणाली मौजूदा परिसंपत्तियों से अधिकतम उत्पादन सुनिश्चित करती है, साथ ही हाइड्रोकार्बन वैल्यू चेन में सुरक्षा और लागत-दक्षता भी बढ़ाती है।

एक टूल से बढ़कर: डिजिटल इकोसिस्टम

ONGC ने प्रज्ञा-AIX को केवल एक सॉफ़्टवेयर टूल के रूप में नहीं, बल्कि एक नवाचार इकोसिस्टम के रूप में स्थापित किया है। यह प्लेटफ़ॉर्म संगठनात्मक साइलो को तोड़ने, तकनीकी टीमों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने और भविष्य के AI समाधानों के लिए एक स्केलेबल आधार प्रदान करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह दृष्टिकोण सुनिश्चित करता है कि नवाचार एक बार का डिजिटल अपग्रेड न होकर एक सतत परिचालन क्षमता बन जाए।

भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए रणनीतिक महत्व

प्रज्ञा-AIX का लॉन्च भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आत्मनिर्भरता के व्यापक लक्ष्यों के साथ पूरी तरह मेल खाता है। अन्वेषण और उत्पादन गतिविधियों में AI को शामिल करके ONGC भविष्य की ऊर्जा मांगों का अधिक प्रभावी ढंग से सामना करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। बेहतर रिकवरी दर, कम परिचालन जोखिम और तेज़ निर्णय-निर्माण देश को अपने घरेलू हाइड्रोकार्बन संसाधनों का टिकाऊ प्रबंधन करने में सक्षम बनाते हैं।

ऊर्जा क्षेत्र में एक नया मानक

प्रज्ञा-AIX के गो-लाइव होने के साथ ही ONGC ने भारत के तेल और गैस क्षेत्र में डिजिटल अपनाने का एक नया मानक स्थापित किया है। यह पहल दिखाती है कि AI जैसी उन्नत तकनीकों को पारंपरिक रूप से जटिल उद्योगों में भी बड़े पैमाने पर कैसे एकीकृत किया जा सकता है। साथ ही, यह ONGC की भूमिका को केवल एक ऊर्जा उत्पादक से आगे बढ़ाकर एक प्रौद्योगिकी-प्रेरित संगठन के रूप में मजबूत करती है, जो राष्ट्रीय विकास में योगदान देता है।

असम की मुख्यमंत्री एति कोली दुति पात योजना क्या है?

असम राज्य ने अपने चाय बागान समुदायों के लिए एक महत्वपूर्ण कल्याणकारी कदम उठाते हुए एक नई वित्तीय सहायता योजना की घोषणा की है। असम सरकार ने मुख्यमंत्री एति कोली दूती पात योजना (Mukhya Mantrir Eti Koli Duti Paat Scheme) की शुरुआत की है, जिसके तहत राज्य भर के चाय बागान श्रमिकों को एकमुश्त वित्तीय सहायता दी जाएगी। यह पहल असम की अर्थव्यवस्था में चाय श्रमिकों के ऐतिहासिक योगदान को मान्यता देती है और चाय उत्पादक क्षेत्रों में सामाजिक सुरक्षा, सम्मान और समावेशी विकास को मजबूत करने का लक्ष्य रखती है।

योजना की शुरुआत और राजनीतिक नेतृत्व

  • इस योजना की शुरुआत मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने तिनसुकिया ज़िले के डूमडूमा में की।
  • मुख्यमंत्री ने इस पहल को चाय जनजातियों और स्वदेशी समुदायों के प्रति सम्मान के रूप में बताया, जिनके श्रम ने असम के विश्वप्रसिद्ध चाय उद्योग को जीवित रखा है।
  • उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि लाभों के सुचारु और समयबद्ध वितरण के लिए पर्याप्त बजटीय प्रावधान किए गए हैं।

चाय श्रमिकों के लिए एकमुश्त वित्तीय सहायता

  • एति कोली दूती पात योजना के तहत ₹300 करोड़ से अधिक की राशि वितरित की जाएगी।
  • इसके अंतर्गत 6 लाख से अधिक चाय बागान श्रमिकों को ₹5,000 की एकमुश्त सहायता दी जाएगी।
  • लाभार्थियों में 27 ज़िलों और 73 विधानसभा क्षेत्रों में फैले 836 चाय बागानों में कार्यरत स्थायी और अस्थायी (कैजुअल) दोनों प्रकार के श्रमिक शामिल हैं।
  • इस योजना का उद्देश्य तत्काल वित्तीय राहत प्रदान करना और श्रमिक कल्याण के प्रति राज्य की प्रतिबद्धता को मजबूत करना है।

बाल देखभाल, स्वास्थ्य और कार्यस्थल की गरिमा से जुड़े उपाय

  • योजना के साथ-साथ मुख्यमंत्री ने चाय बागान क्षेत्रों में मोबाइल क्रेच (शिशु देखभाल केंद्र) और मोबाइल शौचालय सेवाओं का भी उद्घाटन किया।
  • इन सुविधाओं का उद्देश्य विशेष रूप से महिला श्रमिकों के लिए बाल देखभाल, स्वच्छता, स्वास्थ्य, सुरक्षा और गरिमा में सुधार करना है।
  • सरकार ने इस बात पर ज़ोर दिया कि कल्याणकारी हस्तक्षेप केवल मजदूरी तक सीमित नहीं होने चाहिए, बल्कि दैनिक जीवन की परिस्थितियों को भी बेहतर बनाना आवश्यक है ताकि दीर्घकालिक सामाजिक उत्थान सुनिश्चित हो सके।

असम की चाय विरासत के 200 वर्ष

  • असम के चाय उद्योग के 200 वर्षों के इतिहास का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि जहाँ असम की चाय को वैश्विक स्तर पर सराहा जाता है, वहीं इसके पीछे काम करने वाले श्रमिक अक्सर अदृश्य रह जाते हैं।
  • उन्होंने कहा कि असम चाय पर गर्व तभी सार्थक है जब चाय बागान श्रमिकों को सम्मान और पहचान दी जाए।
  • मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चाय बागानों से लंबे जुड़ाव और चाय समुदायों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति सुधारने पर उनके ज़ोर का भी उल्लेख किया।

भूमि अधिकार और दीर्घकालिक सामाजिक सुरक्षा

  • असम सरकार ने घोषणा की है कि चाय बागान श्रमिकों और श्रम लाइनों में रहने वाले स्वदेशी परिवारों को भूमि अधिकार (पट्टा) प्रदान किए जाएंगे।
  • भूमि पट्टों के लिए आवेदन फरवरी से शुरू होंगे। शर्त यह होगी कि भूमि कम से कम 10 वर्षों तक लाभार्थियों के पास रहे और इसका हस्तांतरण केवल चाय समुदाय के भीतर ही किया जा सके।
  • यह कदम दीर्घकालिक सुरक्षा और संपत्ति के स्वामित्व को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उठाया गया है।

शिक्षा, रोजगार और सांस्कृतिक पहलें

  • मुख्यमंत्री ने कई पूरक पहलों पर भी प्रकाश डाला, जिनमें ओरुनोदोई योजना का विस्तार, चाय बागान क्षेत्रों में मॉडल स्कूलों की स्थापना, एमबीबीएस और पैरामेडिकल पाठ्यक्रमों में आरक्षित सीटें, छात्रवृत्तियाँ, स्वरोज़गार सहायता, मोबाइल मेडिकल यूनिट्स और गर्भवती श्रमिकों के लिए वेतन क्षतिपूर्ति शामिल हैं।
  • सांस्कृतिक पहचान और विरासत को संरक्षित करने के लिए झूमर नृत्य के प्रचार पर भी विशेष ज़ोर दिया गया।
  • इसके अतिरिक्त, चाय जनजातियों को ग्रेड-III और ग्रेड-IV सरकारी नौकरियों में ओबीसी के अंतर्गत 3% आरक्षण भी प्रदान किया गया है।

उत्तराखंड को एविएशन प्रमोशन के लिए बेस्ट स्टेट अवॉर्ड क्यों मिला?

उत्तराखंड, जो अपनी पहाड़ियों और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के लिए जाना जाता है, ने नागरिक उड्डयन के क्षेत्र में चुपचाप लेकिन उल्लेखनीय प्रगति की है। 30 जनवरी 2026 को राज्य को एक ऐसी राष्ट्रीय मान्यता मिली जिसने सभी का ध्यान आकर्षित किया। विंग्स इंडिया 2026, जो भारत का प्रमुख नागरिक उड्डयन कार्यक्रम है, उसमें उत्तराखंड को “एविएशन इकोसिस्टम के संवर्धन के लिए सर्वश्रेष्ठ राज्य” का पुरस्कार दिया गया। यह सम्मान दर्शाता है कि केंद्रित नीतियाँ, बेहतर बुनियादी ढाँचा और सुदृढ़ क्षेत्रीय हवाई संपर्क, कठिन भौगोलिक क्षेत्रों को भी बदलने की क्षमता रखते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए यह विकास शासन, अवसंरचना, आपदा प्रबंधन और पर्यटन—इन सभी को एक साथ जोड़ने वाला महत्वपूर्ण उदाहरण है।

विंग्स इंडिया 2026 क्या है?

  • विंग्स इंडिया 2026 भारत का सबसे बड़ा नागरिक उड्डयन सम्मेलन और प्रदर्शनी है।
  • यह मंच नीति-निर्माताओं, विमानन कंपनियों, निवेशकों और वैश्विक हितधारकों को एक साथ लाता है।
  • इस कार्यक्रम में दिए जाने वाले पुरस्कार अत्यंत विश्वसनीय माने जाते हैं क्योंकि वे विमानन नीति और अवसंरचना में वास्तविक प्रगति को दर्शाते हैं।
  • उत्तराखंड को यहाँ मिली मान्यता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कठिन भू-भाग के बावजूद राज्य को प्रमुख विमानन केंद्रों की श्रेणी में रखा गया है।

उत्तराखंड को यह पुरस्कार क्यों मिला?

  • उत्तराखंड को लगातार नीति समर्थन, अवसंरचना विस्तार और क्षेत्रीय हवाई सेवाओं पर विशेष ध्यान देने के कारण चुना गया।
  • राज्य सरकार ने उत्तराखंड नागरिक उड्डयन विकास प्राधिकरण (UCADA) के माध्यम से हवाई अड्डों, हेलीपोर्ट्स और हवाई मार्गों के विकास पर काम किया है।
  • अधिकारियों ने बताया कि उत्तराखंड में विमानन विकास केवल वाणिज्यिक उड़ानों तक सीमित नहीं है, बल्कि दूरस्थ और पर्वतीय क्षेत्रों के लिए हेलीकॉप्टर सेवाएँ भी इसमें शामिल हैं।
  • इन प्रयासों से दुर्गम क्षेत्रों तक पहुँच आसान हुई है, यात्रा समय कम हुआ है और पर्यटन व आपातकालीन सेवाओं जैसी आर्थिक गतिविधियों को बल मिला है।

राज्य नेतृत्व और संस्थानों की भूमिका

  • यह पुरस्कार बेगमपेट हवाई अड्डे पर आयोजित एक समारोह में UCADA के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा प्राप्त किया गया।
  • इस अवसर पर केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री और मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित थे।
  • उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि यह सम्मान राज्य की स्पष्ट विमानन नीति और सशक्त प्रशासनिक समन्वय का प्रतिबिंब है।
  • उन्होंने जोर दिया कि हवाई सेवाओं के माध्यम से दूरस्थ और पहाड़ी क्षेत्रों को जोड़ना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता बना हुआ है।
  • यह उदाहरण दिखाता है कि अवसंरचना आधारित विकास में राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है।

पर्यटन, स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन पर प्रभाव

  • बेहतर हवाई संपर्क ने उत्तराखंड में बहु-क्षेत्रीय प्रभाव डाला है।
  • पर्यटन को लाभ हुआ है क्योंकि तीर्थयात्री और पर्यटक अब गंतव्यों तक अधिक तेज़ी और सुरक्षित तरीके से पहुँच पा रहे हैं।
  • हेलीकॉप्टर सेवाओं ने विशेष रूप से उच्च हिमालयी क्षेत्रों में आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत किया है।
  • मुख्यमंत्री ने यह भी रेखांकित किया कि विमानन अवसंरचना ने आपदा प्रतिक्रिया को काफी बेहतर बनाया है, जो बाढ़, भूस्खलन और चरम मौसम की दृष्टि से संवेदनशील राज्य के लिए अत्यंत आवश्यक है।

EU ने ईरान के IRGC को आतंकवादी ग्रुप क्यों घोषित किया है?

एक ऐतिहासिक और राजनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील निर्णय में यूरोपीय संघ (EU) ने औपचारिक रूप से ईरान की शक्तिशाली इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) को आतंकी संगठन घोषित कर दिया है। यह कदम तेहरान के प्रति यूरोप के रुख में स्पष्ट कठोरता को दर्शाता है और IRGC को वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त आतंकी संगठनों की कानूनी श्रेणी में रख देता है। इसके परिणामस्वरूप ईरान के साथ EU के सुरक्षा, कानूनी और कूटनीतिक संबंधों की प्रकृति में बुनियादी बदलाव आएगा।

IRGC क्या है?

  • इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स की स्थापना 1979 में ईरान की इस्लामी क्रांति के बाद धार्मिक शासन व्यवस्था की रक्षा के लिए की गई थी।
  • समय के साथ यह एक समानांतर शक्ति संरचना में बदल गया, जिसका प्रभाव ईरान की सेना, खुफिया एजेंसियों, मिसाइल कार्यक्रम, अर्थव्यवस्था और विदेशी अभियानों तक फैल गया।
  • ईरान की सीमाओं के बाहर IRGC क्षेत्रीय सहयोगी गुटों और मिलिशियाओं के माध्यम से काम करता है, जिससे यह मध्य पूर्व की सुरक्षा राजनीति का एक प्रमुख खिलाड़ी बन गया है।
  • EU का तर्क है कि आंतरिक दमन और बाहरी उग्र गतिविधियों का यह संयोजन इसे आतंकी संगठन घोषित करने को उचित ठहराता है।

पृष्ठभूमि: EU ने यह कदम अभी क्यों उठाया?

  • कई हफ्तों की विचार-विमर्श प्रक्रिया के बाद EU के विदेश मंत्रियों ने इस निर्णय पर सहमति बनाई।
  • यह प्रक्रिया ईरान में देशव्यापी प्रदर्शनों पर कथित हिंसक दमन की रिपोर्टों के बाद तेज हुई।
  • यूरोपीय अधिकारियों ने हजारों कथित मौतों, बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों और नागरिकों पर व्यवस्थित दमन का हवाला दिया।
  • EU का निष्कर्ष था कि IRGC न केवल देश के भीतर राज्य हिंसा को लागू करने में केंद्रीय भूमिका निभा रहा है, बल्कि विदेशों में भी अस्थिरता फैलाने वाली गतिविधियों का समर्थन कर रहा है।
  • EU अधिकारियों के अनुसार, यही दोहरी भूमिका यूरोपीय कानून के तहत साधारण प्रतिबंधों से आगे बढ़कर आतंकवादी गतिविधि की श्रेणी में आती है।

यूरोप और इज़राइल की प्रतिक्रियाएँ

  • वरिष्ठ EU नेताओं ने कहा कि नागरिकों के खिलाफ लगातार हिंसा को अनुत्तरित नहीं छोड़ा जा सकता।
  • फ्रांस और इटली जैसे कुछ देश, जो शुरुआत में सतर्क थे, अंततः कानूनी स्पष्टता और सुरक्षा चिंताओं के आधार पर इस निर्णय के समर्थन में आ गए।
  • इज़राइल ने इस कदम का स्वागत करते हुए इसे ऐतिहासिक बताया।
  • इज़राइली अधिकारियों के अनुसार, यह निर्णय IRGC से जुड़े वित्तीय, लॉजिस्टिक और परिचालन नेटवर्क को बाधित करने की यूरोप की क्षमता को मजबूत करेगा, जिनमें से कई मध्य पूर्व से बाहर भी सक्रिय हैं।

कानूनी और सुरक्षा प्रभाव

  • आतंकी सूची में शामिल किए जाने से EU का कानूनी ढांचा पूरी तरह बदल जाता है।
  • अब अधिकारी केवल IRGC से संबद्धता के आधार पर कार्रवाई कर सकते हैं, बिना किसी विशिष्ट आतंकी हमले में प्रत्यक्ष संलिप्तता साबित किए।
  • इससे तेज़ अभियोजन, तत्काल संपत्ति जब्ती, यात्रा प्रतिबंध और आपराधिक जांच संभव हो जाती है।
  • यह कदम यूरोपोल के माध्यम से समन्वय को भी मजबूत करता है, जिससे खुफिया जानकारी साझा करने और सीमा-पार कार्रवाई में तेजी आएगी।
  • EU अधिकारियों का मानना है कि इससे यूरोप के भीतर IRGC की धन जुटाने और संचालन करने की क्षमता पर गंभीर अंकुश लगेगा।

भारत 10 साल बाद अरब देशों के विदेश मंत्रियों से क्यों मिल रहा है?

भारत एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक आयोजन की मेज़बानी करने जा रहा है, जो अरब दुनिया के साथ उसके नए सिरे से बढ़ते जुड़ाव को दर्शाता है। 31 जनवरी, 2026 को नई दिल्ली में दूसरी भारत–अरब विदेश मंत्रियों की बैठक (Foreign Ministers’ Meeting – FMM) आयोजित की जाएगी, जो लगभग एक दशक के अंतराल के बाद फिर से हो रही है। भारत और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की सह-अध्यक्षता में होने वाली इस बैठक में अरब लीग के सदस्य देशों के विदेश मंत्री भाग लेंगे। बदलते वैश्विक और क्षेत्रीय परिदृश्य के बीच यह आयोजन पश्चिम एशिया के साथ भारत की गहराती राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक साझेदारी की महत्वाकांक्षा को रेखांकित करता है।

भारत–अरब विदेश मंत्रियों की बैठक के बारे में

  • भारत–अरब विदेश मंत्रियों की बैठक भारत और अरब लीग के बीच एक उच्चस्तरीय संवाद तंत्र है।
  • यह राजनीतिक संवाद, रणनीतिक समन्वय और बहु-क्षेत्रीय सहयोग के लिए एक सामूहिक मंच प्रदान करती है।
  • इस बैठक में अरब लीग के सदस्य देशों के विदेश मंत्रियों के साथ-साथ अरब लीग के महासचिव भी भाग लेते हैं।
  • इस प्रारूप का पुनर्जीवन भारत की उस मंशा को दर्शाता है, जिसके तहत वह द्विपक्षीय संबंधों से आगे बढ़कर अरब दुनिया के साथ बहुपक्षीय और संस्थागत सहयोग को मजबूत करना चाहता है।

यूएई सह-अध्यक्ष क्यों है

  • भारत के साथ इस बैठक की सह-अध्यक्षता संयुक्त अरब अमीरात द्वारा किया जाना दोनों देशों के गहरे रणनीतिक संबंधों को दर्शाता है।
  • यूएई मध्य पूर्व में भारत के सबसे महत्वपूर्ण साझेदारों में से एक बनकर उभरा है, जहां व्यापार, ऊर्जा, निवेश, प्रवासी समुदाय और रक्षा सहयोग के मजबूत संबंध हैं।
  • इस बैठक की सह-अध्यक्षता यूएई को अरब समूह के भीतर नेतृत्व की भूमिका देती है और भारत–अरब सहयोग को आगे बढ़ाने में उसकी सेतु-भूमिका को दर्शाती है।
  • यह भारत की व्यापक पश्चिम एशिया नीति के अनुरूप भी है, जिसमें वह क्षेत्रीय स्थिरता के प्रमुख स्तंभ देशों के साथ मिलकर काम करता है।

10 वर्षों के अंतराल का महत्व

  • दूसरी भारत–अरब विदेश मंत्रियों की बैठक पहली बैठक के 10 वर्ष बाद आयोजित हो रही है, जो 2016 में बहरीन में हुई थी।
  • उस पहली बैठक में भारत और अरब देशों ने पांच प्राथमिक क्षेत्रों की पहचान की थी—अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, शिक्षा, मीडिया और संस्कृति।
  • हालांकि, क्षेत्रीय अस्थिरता, वैश्विक संकटों और बदलती कूटनीतिक प्राथमिकताओं के कारण इस प्रक्रिया की गति धीमी हो गई।
  • इस बैठक का पुनरारंभ दोनों पक्षों की नई राजनीतिक इच्छाशक्ति को दर्शाता है और यह भी संकेत देता है कि भारत के आर्थिक उदय तथा अरब देशों के विविधीकरण प्रयास अब साझेदारी के लिए अधिक मजबूत आधार प्रदान करते हैं।

बैठक के प्रमुख एजेंडा क्षेत्र

  • दूसरी बैठक में पहले पहचाने गए पांच प्राथमिक क्षेत्रों को आगे बढ़ाया जाएगा। आर्थिक सहयोग में व्यापार विस्तार, निवेश और आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती पर जोर रहेगा।
    ऊर्जा से जुड़े विमर्श में तेल और गैस के साथ-साथ नवीकरणीय ऊर्जा और ग्रीन हाइड्रोजन शामिल होने की संभावना है।
  • शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में लोगों के बीच संपर्क, छात्र आदान-प्रदान और सांस्कृतिक समझ को बढ़ावा देने पर ध्यान दिया जाएगा।
  • मीडिया सहयोग के तहत सूचना के आदान-प्रदान और दुष्प्रचार से निपटने पर चर्चा हो सकती है। कुल मिलाकर, यह एजेंडा प्रतीकात्मक कूटनीति से आगे बढ़कर व्यावहारिक और परिणामोन्मुखी सहयोग की दिशा में संकेत करता है।

अरब दुनिया से व्यापक भागीदारी

  • इस बैठक में अरब जगत के अनेक देशों की भागीदारी देखने को मिलेगी।
  • सोमालिया, फिलिस्तीन, कोमोरोस और सूडान सहित कई देशों के विदेश मंत्री, साथ ही अरब लीग के महासचिव, नई दिल्ली में चर्चाओं में हिस्सा ले रहे हैं।
    यह व्यापक प्रतिनिधित्व इस मंच के पैन-अरब स्वरूप को उजागर करता है।
  • साथ ही, यह क्षेत्र के प्रति भारत के संतुलित दृष्टिकोण को भी दर्शाता है, जिसमें वह खाड़ी देशों, उत्तरी अफ्रीका और हॉर्न ऑफ अफ्रीका—सभी से एक साझा कूटनीतिक ढांचे के तहत जुड़ता है।

मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन के लिए 100 मीटर लंबा स्टील का पुल कैसे बनाया गया?

भारत की महत्वाकांक्षी मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना ने एक और महत्वपूर्ण इंजीनियरिंग माइलस्टोन पार कर लिया है। 29 जनवरी, 2026 को अहमदाबाद में 100 मीटर लंबा स्टील का पुल सफलतापूर्वक पूरा किया गया, जिसे पूरी तरह से मेक इन इंडिया पहल के तहत बनाया गया। इस उपलब्धि की खास बात यह है कि यह पुल एक भूमिगत मेट्रो टनल के ऊपर बनाया गया है, लेकिन पुल का कोई भार उस टनल पर नहीं डाला गया। यह दुर्लभ इंजीनियरिंग समाधान भारत की हाई-स्पीड रेल बुनियादी ढांचा और जटिल शहरी निर्माण क्षमता को उजागर करता है, जो प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए एक महत्वपूर्ण करंट अफेयर्स विषय है।

कहाँ और क्यों यह विशेष पुल बनाया गया

  • अहमदाबाद जिले में, बुलेट ट्रेन का मार्ग कालूपुर और शाहपुर स्टेशनों के बीच भूमिगत मेट्रो टनल के ऊपर से गुजरता है।
  • सामान्यतः इस हिस्से में बुलेट ट्रेन के वायाडक्ट में 30–50 मीटर के कंक्रीट स्पैन इस्तेमाल होते हैं। हालांकि, मेट्रो टनल के पास फाउंडेशन बनाने पर संरचनात्मक नुकसान का खतरा था।
  • इसे टालने के लिए इंजीनियरों ने संरचना को फिर से डिज़ाइन किया और स्पैन को लगभग 100 मीटर कर दिया, ताकि बुलेट ट्रेन का भार मेट्रो टनल पर न पड़े।
  • यह निर्णय घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्रों में सावधानीपूर्वक योजना का संकेत देता है।

वायाडक्ट से स्टील ट्रस डिज़ाइन की ओर बदलाव

  • मेट्रो टनल की सुरक्षा के कारण सुपर-स्ट्रक्चर डिज़ाइन को सामान्य वायाडक्ट से स्टील ट्रस ब्रिज में बदल दिया गया।
  • स्टील ट्रस पुल लंबी दूरी और भारी भार के लिए उपयुक्त होते हैं, साथ ही फाउंडेशन को संवेदनशील क्षेत्रों से दूर रखते हैं।
  • इस पुन: डिज़ाइन ने दोनों परिवहन प्रणालियों की संरचनात्मक सुरक्षा सुनिश्चित की – ऊपर बुलेट ट्रेन और नीचे मेट्रो।
  • डिज़ाइन में यह लचीलापन दिखाता है कि आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं जमीनी वास्तविकताओं के अनुसार ढलती हैं, कठोर टेम्पलेट का पालन नहीं करतीं, जो परीक्षाओं के लिए शासन और इंजीनियरिंग का महत्वपूर्ण पाठ है।

पुल को स्थल पर कैसे जोड़ा गया

  • स्टील पुल को जमीन से 16.5 मीटर की ऊँचाई पर अस्थायी ट्रेसल्स का उपयोग करके असेंबल किया गया। असेंबली पूरी होने के बाद इन सहारा संरचनाओं को सावधानीपूर्वक हटाया गया।
  • इसके बाद पुल को स्थायी आधारों पर सटीक रूप से रखा गया, एक प्रक्रिया जिसमें अत्यधिक सटीकता की आवश्यकता थी। पूरी क्रिया पास के रेलवे या मेट्रो संचालन को बाधित किए बिना पूरी की गई।
  • इस विधि ने सुरक्षा, संरेखण की सटीकता और संरचनात्मक स्थिरता सुनिश्चित की, जो भारत की भीड़भाड़ वाले शहरी वातावरण में जटिल निर्माण कार्य करने की क्षमता को दर्शाती है।

मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना

  • मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना भारत का पहला हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर है, जिसे नेशनल हाई-स्पीड रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड द्वारा लागू किया जा रहा है।
  • इसका उद्देश्य मुंबई और अहमदाबाद के बीच यात्रा समय को लगभग दो घंटे तक कम करना है।
  • यह परियोजना भारत की आधुनिक परिवहन बुनियादी ढांचे, तकनीकी हस्तांतरण और मेक इन इंडिया के तहत स्वदेशी निर्माण की दिशा में जोरदार प्रयास का प्रतीक है।

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