भारत ने अपनी प्राचीन चिकित्सकीय विरासत के संरक्षण की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया है। केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS) और केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय (CSU) ने केरल में आयोजित एक विशेष कार्यशाला के माध्यम से दुर्लभ आयुर्वेदिक पांडुलिपियों को पुनर्जीवित किया है। यह पहल ताड़पत्र पांडुलिपियों के लिप्यंतरण और शोध-आधारित उपयोग पर केंद्रित है, जिससे शास्त्रीय आयुर्वेदिक ज्ञान आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययन के लिए सुलभ हो सके।
क्यों चर्चा में है?
केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS) और केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय (CSU) ने केरल में आयोजित 15-दिवसीय लिप्यंतरण कार्यशाला को सफलतापूर्वक पूरा किया है, जिसके परिणामस्वरूप पाँच दुर्लभ और अब तक अप्रकाशित आयुर्वेदिक पांडुलिपियाँ शोध एवं अकादमिक उपयोग के लिए पुनर्जीवित की गई हैं।
केरल में लिप्यंतरण कार्यशाला
- यह आवासीय कार्यशाला CCRAS और CSU के बीच हुए औपचारिक समझौता ज्ञापन (MoU) के तहत 12 से 25 जनवरी के बीच त्रिशूर स्थित CSU पुरणट्टुकरा (गुरुवायूर) परिसर में आयोजित की गई।
- कुल 33 विद्वानों ने भाग लिया, जिनमें 18 आयुर्वेद और 15 संस्कृत के विद्वान शामिल थे
- कार्यक्रम ने पांडुलिपि अध्ययन में अंतर्विषयी (interdisciplinary) दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया
- प्रशिक्षण में पांडुलिपि विज्ञान, प्राचीन लिपि-विज्ञान (palaeography) और आयुर्वेदिक तकनीकी शब्दावली शामिल थी
- ग्रंथ और वट्टेझुथु लिपियों पर विशेष ध्यान दिया गया
- इस कार्यशाला ने नाजुक ताड़पत्र पांडुलिपियों के संरक्षण और अध्ययन में विद्वानों की क्षमता को सशक्त किया
व्यावहारिक प्रशिक्षण और लिपि विशेषज्ञता
- इस कार्यक्रम की प्रमुख विशेषता केवल सैद्धांतिक अध्ययन के बजाय व्यावहारिक लिप्यंतरण पर जोर देना था।
- प्रतिभागी विद्वानों ने मूल ताड़पत्र पांडुलिपियों पर प्रत्यक्ष कार्य किया
- ग्रंथ, मध्यकालीन मलयालम और वट्टेझुथु जैसी लिपियों का अध्ययन कराया गया
- ‘लिपि परिचय’ सत्रों के माध्यम से लिपियों के विकास को समझाया गया
- सटीकता, एकरूपता और शोध-उपयोगिता पर विशेष ध्यान दिया गया
- इस व्यावहारिक संरचना ने अल्प अवधि में ठोस अकादमिक परिणाम सुनिश्चित किए
दुर्लभ आयुर्वेदिक पांडुलिपियों का पुनर्जीवन
इस कार्यशाला के परिणामस्वरूप पाँच दुर्लभ और पहले अप्रकाशित आयुर्वेदिक पांडुलिपियों का सफल लिप्यंतरण किया गया, जो अब उन्नत शोध के लिए उपलब्ध हैं।
- धन्वंतरी (वैद्य) चिंतामणि – ग्रंथ से संस्कृत
- द्रव्यशुद्धि – ग्रंथ से संस्कृत
- वैद्यम् – मध्यकालीन मलयालम से मलयालम
- रोग निर्णय (भाग-I) – मध्यकालीन मलयालम से मलयालम
- विविधरोगंगल – वट्टेझुथु से मलयालम और संस्कृत
ये ग्रंथ क्षेत्रीय आयुर्वेदिक परंपराओं पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालते हैं।
संस्थागत सहयोग और विशेषज्ञ नेतृत्व
वरिष्ठ शिक्षाविदों ने इस पांडुलिपि पुनर्जीवन पहल की बढ़ती गति को रेखांकित किया।
- CCRAS के महानिदेशक प्रो. वैद्य रवीन्द्रनारायण आचार्य ने इसे CSU के साथ दूसरा सफल सहयोग बताया
- इससे पहले ओडिशा के CSU पुरी परिसर में आयोजित कार्यशाला में 14 पांडुलिपियों का लिप्यंतरण किया गया था
- CSU अधिकारियों ने मलयालम आयुर्वेदिक परंपराओं के संरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई
- कार्यक्रम का समन्वय दोनों संस्थानों के वरिष्ठ विशेषज्ञों द्वारा किया गया
- यह पहल भारत की शास्त्रीय ज्ञान प्रणालियों के संरक्षण और पुनरुत्थान के प्रति निरंतर और संस्थागत प्रतिबद्धता को दर्शाती है।


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