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विश्व आर्द्रभूमि दिवस 2026: प्रकृति के जीवनदायी पारिस्थितिक तंत्रों के संरक्षण का संकल्प

World Wetlands Day 2026: विश्व आर्द्रभूमि दिवस या विश्व वेटलैंड्स डे (World Wetlands Day) पूरे दुनिया में 02 फरवरी को मनाया जाता है। इस बार के विश्व आर्द्रभूमि दिवस 2026 की थीम ‘आर्द्रभूमि और पारंपरिक ज्ञान: सांस्कृतिक विरासत का उत्सव’ है। इस वर्ष की वैश्विक थीम इस बात को रेखांकित करती है कि पारंपरिक और आदिवासी ज्ञान ने सदियों से आर्द्रभूमियों की रक्षा कैसे की है। आधुनिक विकास और जलवायु दबाव के कारण जहां आर्द्रभूमियां तेज़ी से समाप्त हो रही हैं, वहीं स्थानीय समुदाय आज भी पारंपरिक तरीकों से उनका सतत प्रबंधन कर रहे हैं। वर्ष 2026 का यह आयोजन नीति-निर्माताओं को याद दिलाता है कि विज्ञान और परंपरा का समन्वय ही आर्द्रभूमियों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है, जो जैव विविधता, जल सुरक्षा और दुनिया भर में लाखों लोगों की आजीविका के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।

विश्व आर्द्रभूमि दिवस क्या है?

विश्व आर्द्रभूमि दिवस हर वर्ष 2 फरवरी को मनाया जाता है, जो 1971 में ईरान के रामसर शहर में रामसर कन्वेंशन पर हस्ताक्षर की स्मृति में आयोजित होता है। इस दिन का उद्देश्य झीलों, दलदलों, मैंग्रोव, बाढ़ मैदानों और लैगून जैसी आर्द्रभूमियों के महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। ये पारिस्थितिक तंत्र स्वच्छ जल उपलब्ध कराते हैं, बाढ़ के प्रभाव को कम करते हैं, कार्बन का भंडारण करते हैं और समृद्ध जैव विविधता को सहारा देते हैं। अपनी अत्यधिक उपयोगिता के बावजूद, विकास योजनाओं में आर्द्रभूमियों को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। विश्व आर्द्रभूमि दिवस यह याद दिलाता है कि आर्द्रभूमियों का संरक्षण सीधे तौर पर मानव अस्तित्व और सतत विकास से जुड़ा हुआ है।

विश्व आर्द्रभूमि दिवस 2026 की थीम का विवरण

विश्व आर्द्रभूमि दिवस 2026 की थीम ‘आर्द्रभूमि और पारंपरिक ज्ञान: सांस्कृतिक विरासत का उत्सव’ है। पीढ़ियों से मछुआरा समुदाय, पशुपालक समूह और वनवासी आर्द्रभूमियों का प्रबंधन सतत दोहन, मौसमी उपयोग और सांस्कृतिक नियमों के माध्यम से करते आए हैं। इन परंपरागत तरीकों ने बिना आधुनिक तकनीक के भी पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखा। यह थीम इस बात को मान्यता देती है कि पारंपरिक ज्ञान पुराना नहीं, बल्कि आज के जलवायु संकट के दौर में अत्यंत प्रासंगिक है। साथ ही, यह सांस्कृतिक विरासत के सम्मान को बढ़ावा देते हुए संरक्षण को केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि लोगों-केंद्रित दृष्टिकोण के रूप में प्रस्तुत करती है।

रामसर कन्वेंशन और सामुदायिक सहभागिता

रामसर कन्वेंशन आर्द्रभूमियों के संरक्षण और उनके समझदारीपूर्ण उपयोग (Wise Use) को समर्पित एक वैश्विक संधि है। 170 से अधिक अनुबंधित देशों की भागीदारी के साथ यह कन्वेंशन आर्द्रभूमियों की रक्षा को प्रोत्साहित करता है, साथ ही सतत आजीविका के अवसरों को भी बनाए रखने पर ज़ोर देता है। इसका एक प्रमुख सिद्धांत “वाइज यूज़” है, जो पारंपरिक और स्थानीय प्रथाओं से गहराई से मेल खाता है। वर्ष 2025 तक दुनिया भर में 2,500 से अधिक रामसर स्थल हैं, जो 250 मिलियन हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैले हुए हैं। हाल के वर्षों में यह कन्वेंशन सामुदायिक भागीदारी पर विशेष बल देता है, यह मानते हुए कि संरक्षण के प्रयास तब सबसे अधिक सफल होते हैं जब स्थानीय लोग केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि सक्रिय भागीदार होते हैं।

भारत में आर्द्रभूमियां और सांस्कृतिक जुड़ाव

भारत में 98 रामसर स्थल हैं, जो दक्षिण एशिया में सबसे अधिक हैं और लगभग 13.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में फैले हुए हैं। भारत की आर्द्रभूमियां संस्कृति, धर्म और आजीविका से गहराई से जुड़ी हुई हैं। चिलिका झील पारंपरिक मछुआरा समुदायों का सहारा है, जबकि सुंदरबन आर्द्रभूमि में शहद संग्रह और मत्स्य पालन के माध्यम से लोगों की आजीविका चलती है। नाव उत्सवों से लेकर पवित्र झीलों तक, भारत की आर्द्रभूमियां जीवंत सांस्कृतिक परिदृश्य के रूप में मौजूद हैं। यही कारण है कि विश्व आर्द्रभूमि दिवस 2026 की थीम के संदर्भ में भारत की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण बन जाती है।

भारत में आर्द्रभूमियों की श्रेणियां

भारत की आर्द्रभूमियों को व्यापक रूप से आठ श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है। इनमें हिमालयी झीलें, गंगा के बाढ़ मैदानों के दलदल, दक्कन पठार के जलाशय, तटीय लैगून, मैंग्रोव, लवणीय आर्द्रभूमियां, उत्तर-पूर्वी दलदली क्षेत्र और द्वीपीय पारिस्थितिक तंत्र शामिल हैं। प्रत्येक श्रेणी स्थानीय जलवायु, भू-आकृति और जल उपलब्धता के अनुरूप विकसित हुई पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों से जुड़ी है। शुष्क क्षेत्रों में पारंपरिक जल-संचयन प्रणालियां और बाढ़ मैदानों में मौसमी मत्स्य-निषेध जैसी प्रथाएं इस बात का उदाहरण हैं कि किस तरह समुदायों ने अपनी आवश्यकताओं को पूरा करते हुए आर्द्रभूमियों के स्वास्थ्य की रक्षा की है।

आर्द्रभूमि (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम, 2017

आर्द्रभूमि (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम, 2017 भारत में आर्द्रभूमियों की सुरक्षा के लिए एक कानूनी ढांचा प्रदान करते हैं। इन नियमों के तहत राज्यों को आर्द्रभूमियों की पहचान करने, प्रदूषणकारी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने और उनके लिए प्रबंधन योजनाएं तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई है। महत्वपूर्ण रूप से, ये नियम सामुदायिक सहभागिता को प्रोत्साहित करते हैं, जो विश्व आर्द्रभूमि दिवस 2026 की थीम के अनुरूप है। हालांकि, कमजोर प्रवर्तन और विकास से जुड़े प्रतिस्पर्धी हितों के कारण इनके क्रियान्वयन में अभी भी चुनौतियां बनी हुई हैं। औपचारिक शासन प्रक्रियाओं में पारंपरिक ज्ञान के एकीकरण से अनुपालन और संरक्षण के परिणामों में सुधार किया जा सकता है।

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