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प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित कर्जदारों के लिए RBI का ड्राफ्ट फ्रेमवर्क क्या है?

भारत में बढ़ते जलवायु जोखिमों को देखते हुए, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने बैंकों के लिए एक नया आपदा राहत ढांचा प्रस्तावित किया है। 27 जनवरी 2026 को घोषित इन मसौदा दिशानिर्देशों का उद्देश्य बाढ़, भूस्खलन और अन्य प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित उधारकर्ताओं को समय पर राहत देना है, साथ ही बैंकिंग प्रणाली की वित्तीय स्थिरता बनाए रखना भी है।

क्यों खबर में?

RBI ने प्राकृतिक आपदाओं के दौरान समाधान योजनाओं (Resolution Plans) से संबंधित मसौदा दिशानिर्देश जारी किए हैं, जो बैंकों और अन्य विनियमित संस्थाओं पर लागू होंगे। यह ढांचा 1 अप्रैल से प्रभावी होगा, और इस पर जनता एवं हितधारकों से 17 फरवरी तक सुझाव मांगे गए हैं।

RBI का प्रस्तावित आपदा राहत ढांचा क्या है?

इस ढांचे के तहत RBI ने बैंकों से कहा है कि वे अपनी ऋण नीतियों में प्राकृतिक आपदाओं के जोखिमों का पहले से आकलन करें। अब तक की तरह आपदा के बाद तात्कालिक राहत घोषणाओं के बजाय, बैंकों को पहले से समाधान तंत्र तैयार रखना होगा। RBI ने सिद्धांत-आधारित (principle-based) दृष्टिकोण अपनाया है, जिससे बैंकों को आपदा की गंभीरता, उधारकर्ता की प्रोफ़ाइल और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार राहत योजनाएं बनाने की लचीलापन मिलेगा, जबकि सावधानीपूर्ण बैंकिंग अनुशासन भी बना रहेगा।

ढांचे के तहत उपलब्ध राहत उपाय

मसौदा दिशानिर्देशों में कई राहत विकल्प शामिल हैं। इनमें ऋण पुनर्भुगतान की पुनर्सूचना (rescheduling), संचित ब्याज को अलग क्रेडिट सुविधा में बदलना, और अस्थायी मोरेटोरियम देना शामिल है। इसके अलावा, आपदा से उत्पन्न अस्थायी वित्तीय दबाव से उबरने के लिए अतिरिक्त ऋण भी दिया जा सकता है। हालांकि, ये राहत उपाय स्वचालित नहीं होंगे, बल्कि प्रत्येक मामले में बैंक द्वारा उधारकर्ता की स्थिति और आपदा के बाद उसकी पुनर्भुगतान क्षमता के आकलन के आधार पर दिए जाएंगे।

RBI की आपदा राहत के लिए पात्रता

RBI ने स्पष्ट किया है कि केवल मानक (standard) उधारकर्ता ही इस राहत के पात्र होंगे। जिन उधारकर्ताओं ने आपदा के समय 30 दिनों से अधिक का डिफ़ॉल्ट नहीं किया है, वही इस ढांचे के अंतर्गत राहत पा सकेंगे। इस शर्त का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राहत वास्तविक रूप से प्रभावित उधारकर्ताओं तक पहुंचे और पुराने या दीर्घकालिक तनावग्रस्त ऋणों को छिपाने के लिए इसका दुरुपयोग न हो।

क्यों जलवायु जोखिम अब बैंकिंग के लिए चिंता का विषय है?

भारत लगातार चरम मौसम घटनाओं का सामना कर रहा है। पंजाब और असम में बाढ़ से कृषि और आजीविका को नुकसान हुआ है, जबकि उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में अचानक आई बाढ़ और भूस्खलन ने भारी तबाही मचाई है। जर्मनवॉच ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स 2025 के अनुसार, भारत जलवायु संवेदनशीलता के मामले में विश्व में छठे स्थान पर है। 1993 से 2022 के बीच देश में 400 से अधिक चरम मौसम घटनाएं हुईं, जिनमें लगभग 80,000 लोगों की मृत्यु हुई और करीब 180 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान हुआ। यही कारण है कि जलवायु जोखिम अब केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि एक प्रणालीगत वित्तीय जोखिम भी बन चुका है।

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