भारत के उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने नई दिल्ली स्थित उपराष्ट्रपति निवास (Vice President’s Enclave) में पुस्तक “Chalice of Ambrosia: Ram Janmabhoomi – Challenge and Response” का विमोचन किया। यह पुस्तक भारत सरकार के पूर्व सचिव श्री सुरेंद्र कुमार पचौरी द्वारा लिखी गई है। इस अवसर पर अनेक वरिष्ठ अधिकारी, विद्वान और प्रतिष्ठित व्यक्तित्व उपस्थित थे।
पुस्तक और उसका विषय
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि यह पुस्तक भगवान श्रीराम के जन्मस्थान की पुनर्प्राप्ति की लंबी और कठिन यात्रा को स्पष्ट रूप से सामने रखती है। उन्होंने लेखक की सराहना करते हुए कहा कि इतिहास को शांत, संतुलित और विद्वतापूर्ण ढंग से, बिना अतिशयोक्ति या पक्षपात के प्रस्तुत किया गया है। उनके अनुसार, यह पुस्तक पाठकों को तथ्यों, संवेदनशीलता और सत्य के सम्मान के साथ इस विषय को समझने में सहायता करती है।
राम मंदिर: भारत के इतिहास का एक ऐतिहासिक क्षण
श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा कि अयोध्या में श्रीराम मंदिर का निर्माण भारत के सभ्यतागत इतिहास का एक ऐतिहासिक पड़ाव है। यह एक दुर्लभ उदाहरण है जहाँ आस्था, इतिहास, कानून और लोकतंत्र शांतिपूर्ण ढंग से एक साथ आए। उन्होंने कहा कि भले ही अन्य स्थानों पर अनेक मंदिर बनें, लेकिन भगवान राम के जन्मस्थान पर बने मंदिर का महत्व अद्वितीय है।
भगवान राम और धर्म की अवधारणा
उपराष्ट्रपति ने भगवान श्रीराम को राष्ट्र की आत्मा और भारत के धर्म का आधार बताया। उन्होंने कहा कि धर्म को कभी पराजित नहीं किया जा सकता और अंततः सत्य की ही विजय होती है। महात्मा गांधी के राम राज्य के विचार का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इसका अर्थ न्याय, समानता और प्रत्येक नागरिक की गरिमा से है।
भारतीय लोकतंत्र की मजबूती
श्री राधाकृष्णन ने कहा कि भगवान राम के जन्मस्थान को स्थापित करने में इतना लंबा कानूनी संघर्ष होना पीड़ादायक था, लेकिन यह भारतीय लोकतंत्र की मजबूती को भी दर्शाता है। करोड़ों लोगों की आस्था के बावजूद, भूमि का निर्णय कानूनी साक्ष्यों और विधि प्रक्रिया के आधार पर हुआ। इसी कारण भारत को लोकतंत्र की जननी कहा जाता है।
सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय और उसका प्रभाव
2019 के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि इस फैसले ने करोड़ों भारतीयों के सपनों को पूरा किया। उन्होंने इसे भारतीय इतिहास का एक निर्णायक मोड़ बताया, जिसने राष्ट्रीय आत्मसम्मान की पुनर्स्थापना की। यह निर्णय मजबूत कानूनी और पुरातात्विक साक्ष्यों पर आधारित था।
इतिहास और पुरातात्विक साक्ष्यों की भूमिका
उपराष्ट्रपति ने कहा कि ऐतिहासिक अभिलेखों में खामियों के कारण वर्षों तक न्याय में देरी हुई। उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त की कि यह पुस्तक राम जन्मभूमि आंदोलन के आधुनिक चरण को आने वाली पीढ़ियों के लिए दर्ज करती है। पुस्तक में उल्लिखित ASI (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) के निष्कर्षों का भी उन्होंने उल्लेख किया, जो स्थल पर पूर्व-विद्यमान संरचना की ओर संकेत करते हैं।
राम मंदिर के लिए व्यापक जनसमर्थन
श्री राधाकृष्णन ने निर्णय के बाद मिले अभूतपूर्व जनसमर्थन को याद किया। उन्होंने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट द्वारा चलाए गए राष्ट्रव्यापी दान अभियान का उल्लेख किया, जिसमें देश-विदेश से ₹3,000 करोड़ से अधिक की राशि एकत्र की गई। उन्होंने 1990 के दशक में अपनी माता द्वारा शिला पूजन में भाग लेने की व्यक्तिगत स्मृति भी साझा की।
नेतृत्व और राष्ट्रीय एकता
उपराष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को इस पवित्र स्थल के पुनरुद्धार का श्रेय दिया, जिसे भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों और सांस्कृतिक आत्मविश्वास के अनुरूप आगे बढ़ाया गया। उन्होंने 25 नवंबर 2025 को हुए ध्वजारोहण समारोह को पूरे राष्ट्र के लिए एक भावनात्मक क्षण बताया।
भगवान श्रीराम का वैश्विक प्रभाव
भगवान राम की सार्वभौमिक अपील पर बोलते हुए श्री राधाकृष्णन ने कहा कि श्रीराम की उपासना केवल भारत तक सीमित नहीं है। उन्होंने फिजी और कंबोडिया के अंगकोर वाट जैसे स्थलों का उल्लेख किया, जो भारतीय संस्कृति और मूल्यों के वैश्विक प्रभाव को दर्शाते हैं।
नागरिकों के लिए संदेश
अपने संबोधन के अंत में उपराष्ट्रपति ने कहा कि भगवान श्रीराम का जीवन सद्गुण, करुणा और हृदय जीतने की शिक्षा देता है, न कि केवल राज्य पर शासन करने की। उन्होंने नागरिकों से इन आदर्शों को अपने दैनिक जीवन में अपनाने का आह्वान किया। साथ ही, लेखक को बधाई देते हुए आशा व्यक्त की कि यह पुस्तक व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचेगी।
कार्यक्रम में उपस्थित गणमान्य व्यक्ति
इस अवसर पर श्री नृपेंद्र मिश्रा, श्री विनोद राय, श्री दीपक गुप्ता, श्री अमित खरे, हर आनंद पब्लिकेशंस के श्री आशीष गोसाईं सहित अनेक प्रतिष्ठित अतिथि उपस्थित थे।


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