संयुक्त राष्ट्र महासभा ने अफगानिस्तान के तालिबान शासकों से महिलाओं और लड़कियों पर अत्याचार खत्म करने और देश में सक्रिय आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई करने की अपील करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया है। यह प्रस्ताव 116 देशों के समर्थन से पारित हुआ, जबकि अमेरिका और इज़रायल ने इसके खिलाफ मतदान किया। भारत, चीन, रूस और ईरान सहित 12 देशों ने मतदान से परहेज (abstain) किया।
यह प्रस्ताव बढ़ती अंतरराष्ट्रीय चिंता को दर्शाता है, जो अफगानिस्तान में मानवाधिकारों की बिगड़ती स्थिति के कारण सामने आई है।
11 पन्नों के इस प्रस्ताव में तालिबान से आग्रह किया गया है कि वे अपने कठोर नियमों को वापस लें, विशेष रूप से वे जो महिलाओं और लड़कियों की शिक्षा (छठी कक्षा के बाद शिक्षा पर रोक) और स्वतंत्र आवाजाही जैसे अधिकारों को सीमित करते हैं।
प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि अफगानिस्तान से सभी आतंकी संगठनों — जैसे अल-कायदा और इस्लामिक स्टेट (ISIS) — को समाप्त किया जाना चाहिए।
हालांकि यह प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है, लेकिन यह एक मजबूत वैश्विक संदेश देता है कि दुनिया अफगान जनता, विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों, के साथ खड़ी है। साथ ही यह आर्थिक पुनरुद्धार और मानवीय सहायता को प्रोत्साहित करता है।
यह प्रस्ताव जर्मनी द्वारा पेश किया गया था। जर्मनी की संयुक्त राष्ट्र में राजदूत एंटजे लेंडर्टसे ने कहा कि यह मतदान दिखाता है कि दुनिया ने अफगान महिलाओं और बच्चों को नहीं भुलाया, जो गरीबी, भूख और हिंसा का सामना कर रहे हैं।
हालांकि, संयुक्त राज्य अमेरिका ने प्रस्ताव का विरोध किया। अमेरिकी प्रतिनिधि जोनाथन श्रियर ने कहा कि यह प्रस्ताव गलत तरीके से तालिबान को वैश्विक मान्यता की दिशा में बढ़ावा देता है, जबकि वे अभी भी मानवाधिकारों का उल्लंघन कर रहे हैं।
उन्होंने प्रस्ताव के उस हिस्से की आलोचना भी की जिसमें ईरान और पाकिस्तान को अफगान शरणार्थियों को शरण देने के लिए सराहा गया है। श्रियर ने आरोप लगाया कि ईरान अफगान शरणार्थियों के साथ दुर्व्यवहार कर रहा है, उन्हें बिना उचित सुनवाई के फांसी दे रहा है और उन्हें मिलिशिया में शामिल होने के लिए मजबूर कर रहा है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने महासचिव एंतोनियो गुटेरेस से एक विशेष समन्वयक (special coordinator) नियुक्त करने का सुझाव दिया है, जो अफगानिस्तान पर वैश्विक प्रयासों और बातचीत को अधिक संरचित, एकजुट और प्रभावी बना सके।
यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है जब रूस तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता देने वाला पहला देश बन चुका है, जिससे वैश्विक बहस और तेज़ हो गई है। फिर भी, अधिकांश देशों का मानना है कि यदि तालिबान को वैश्विक स्वीकृति चाहिए, तो उन्हें मानवाधिकारों की रक्षा करनी होगी और आतंकवाद के खिलाफ सख्ती से काम करना होगा।
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