सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त पैनल ने केंद्र सरकार से ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) संशोधन विधेयक 2026 को वापस लेने की सिफारिश की है। समिति ने कहा कि यह विधेयक ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों को कमजोर कर सकता है। यह सिफारिश केंद्रीय मंत्री वीरेंद्र कुमार को उसी दिन भेजी गई, जिस दिन लोकसभा ने इस विधेयक को पारित किया, जिससे इस मुद्दे पर बहस और तेज हो गई। पूर्व न्यायाधीश आशा मेनन की अध्यक्षता वाली समिति ने चेतावनी दी कि प्रस्तावित संशोधन पहले से मिले अधिकारों को पीछे ले जा सकते हैं।
पैनल क्यों बनाया गया था?
यह समिति अक्टूबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित की गई थी। कोर्ट एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रहा था, जिसमें एक ट्रांसजेंडर महिला को उत्तर प्रदेश और गुजरात में उसकी लैंगिक पहचान के कारण शिक्षक की नौकरी से हटा दिया गया था।
कोर्ट ने 2019 के ट्रांसजेंडर अधिकार कानून के क्रियान्वयन में खामियों को देखते हुए पैनल बनाया, जिसका उद्देश्य था:
- कानूनी और नीतिगत कमियों की पहचान
- समान अवसर ढांचा तैयार करना
- ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए उचित सुविधाएं सुनिश्चित करना
2026 संशोधन विधेयक के प्रमुख प्रावधान
- इस विधेयक में कई महत्वपूर्ण बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं, जिन पर विवाद हो रहा है। सबसे बड़ा मुद्दा “स्व-पहचान (Self-identification)” के अधिकार को हटाना है।
- यह अधिकार NALSA v. Union of India (2014) के ऐतिहासिक फैसले में मान्यता प्राप्त था, जिसमें व्यक्ति को बिना मेडिकल हस्तक्षेप के अपनी लैंगिक पहचान चुनने का अधिकार दिया गया था।
नए विधेयक के तहत:
- जेंडर पहचान के लिए मेडिकल सर्टिफिकेट जरूरी होगा
- जिला स्तर पर मेडिकल बोर्ड द्वारा जांच की जाएगी
- ट्रांसजेंडर की परिभाषा को सीमित किया गया है
विरोध और जन प्रतिक्रिया
विधेयक के पारित होने के दौरान संसद में भी विरोध देखने को मिला। कई सांसदों ने इसे संसदीय समिति के पास भेजने की मांग की, लेकिन इसे स्वीकार नहीं किया गया।
संसद के बाहर भी देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए। LGBTQIA+ समुदाय और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह विधेयक:
- लैंगिक स्वायत्तता को कमजोर करता है
- अवैज्ञानिक और दखल देने वाली प्रक्रियाएं थोपता है
- विविध लैंगिक पहचानों को नजरअंदाज करता है
सरकार का पक्ष और आलोचना
- सरकार का कहना है कि यह विधेयक एक संगठित और समावेशी ढांचा बनाने की दिशा में कदम है।
- हालांकि आलोचकों का मानना है कि यह संशोधन सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसलों के खिलाफ है और पहले से दिए गए अधिकारों को कमजोर करता है।
निष्कर्ष: यह मुद्दा भारत में ट्रांसजेंडर अधिकारों, न्यायिक सिद्धांतों और विधायी प्रक्रिया के बीच संतुलन को लेकर एक महत्वपूर्ण बहस को दर्शाता है।


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