RBI की ₹1 लाख करोड़ की OMO खरीद से तरलता संकट कैसे होगा कम?

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने अपनी निर्धारित ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO) खरीद को आगे बढ़ा दिया है। अब केंद्रीय बैंक सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद के ज़रिये प्रणाली में ₹1 लाख करोड़ की तरलता डालेगा, ताकि तरलता की स्थिति को स्थिर किया जा सके और बॉन्ड बाज़ार में बनी नकारात्मक धारणा को शांत किया जा सके।

क्यों खबर में है?

RBI ने सरकारी प्रतिभूतियों की OMO खरीद नीलामियों के समय में बदलाव किया है। यह फैसला ऐसे समय लिया गया है जब बैंकिंग प्रणाली में तरलता अधिशेष तेजी से घटकर सामान्य स्तर से नीचे आ गया और बेंचमार्क बॉन्ड यील्ड 11 महीनों के उच्च स्तर पर पहुंच गई।

OMO खरीद क्या होती है?

ओपन मार्केट ऑपरेशन RBI का एक प्रमुख मौद्रिक उपकरण है, जिसके माध्यम से वह बाज़ार में तरलता का प्रबंधन करता है। जब RBI सरकारी प्रतिभूतियाँ खरीदता है, तो वह बैंकिंग प्रणाली में धन प्रवाहित करता है, जिससे तरलता बढ़ती है और उधारी की लागत कम होती है। वर्तमान स्थिति में 26 जनवरी को तरलता अधिशेष केवल ₹56,987 करोड़ रह गया था, जबकि आरामदायक स्तर ₹1.50 से ₹2.00 लाख करोड़ माना जाता है। इतनी तंग तरलता से ब्याज दरें बढ़ सकती हैं, जिससे कारोबार और सरकार दोनों के लिए कर्ज महंगा हो जाता है। OMO खरीद को आगे बढ़ाकर RBI इसी दबाव को कम करने की कोशिश कर रहा है।

संशोधित OMO कार्यक्रम: क्या बदला?

पहले RBI ने 5 फरवरी और 12 फरवरी 2026 को OMO खरीद नीलामियाँ करने की योजना बनाई थी, लेकिन अब इन्हें पहले कर दिया गया है। केंद्रीय बैंक अब 29 जनवरी 2026 और 5 फरवरी 2026 को ₹50,000 करोड़ की दो किश्तों में खरीद करेगा। नीलामियों को पहले आयोजित करना इस बात का संकेत है कि RBI तरलता संकट को लेकर गंभीर है और देर होने पर स्थिति और बिगड़ सकती थी।

बॉन्ड यील्ड में उछाल

बेंचमार्क 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड (6.48% GS 2035) की यील्ड 6 बेसिस पॉइंट बढ़कर 6.72% पर बंद हुई, जो 11 महीनों का उच्चतम स्तर है। चूंकि बॉन्ड की कीमत और यील्ड विपरीत दिशा में चलते हैं, इसलिए कीमत में लगभग 42 पैसे की गिरावट आई। ऊँची यील्ड से सरकार की उधारी महंगी होती है और इसका असर पूरी अर्थव्यवस्था की ब्याज दरों पर पड़ता है। इसी तेज़ उछाल ने RBI को सक्रिय कदम उठाने के लिए प्रेरित किया।

रेपो दर कटौती के बावजूद यील्ड ऊँची क्यों है?

नुवामा वेल्थ के अनुसार, फरवरी 2025 से अब तक RBI रेपो दर में 125 बेसिस पॉइंट की कटौती कर इसे 5.25% तक ला चुका है, फिर भी यील्ड ऊँची बनी हुई है। इसके पीछे कई घरेलू और वैश्विक कारण हैं, जैसे रुपये की कमजोरी, भारत–अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर अनिश्चितता और ब्लूमबर्ग इंडेक्स सर्विसेज द्वारा भारत के बॉन्ड को अपने ग्लोबल एग्रीगेट इंडेक्स में शामिल करने में देरी। इन कारणों से विदेशी निवेशकों की रुचि प्रभावित हुई है।

FY26 में तरलता पर दबाव

वित्त वर्ष 2025–26 के दौरान बैंकिंग प्रणाली में तरलता अस्थिर बनी रही है। रुपये में गिरावट, अग्रिम कर भुगतान और नियमित GST निकासी जैसे कारकों ने बार-बार तरलता को खींचा है। इसके अलावा इस सप्ताह सरकारी बॉन्ड और राज्य विकास ऋण (SDLs) की भारी आपूर्ति भी रही। पर्याप्त मांग के अभाव में यह अतिरिक्त आपूर्ति बॉन्ड बाज़ार पर दबाव डाल रही है, जिससे यील्ड ऊँची बनी हुई है।

भारत अब आय की गणना क्यों कर रहा है? एनएसओ पहली बार राष्ट्रीय आय सर्वेक्षण के लिए तैयार

स्वतंत्रता के बाद पहली बार भारत राष्ट्रीय स्तर पर घरेलू आय और कॉरपोरेट सेवा गतिविधियों का व्यवस्थित रूप से आकलन करने की तैयारी कर रहा है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) दो ऐतिहासिक सर्वेक्षणों की आधारशिला रख रहा है, जो आय वितरण और सेवा अर्थव्यवस्था को समझने के तरीके को पूरी तरह बदल देंगे। ये दोनों ही क्षेत्र अधिक स्मार्ट और लक्षित नीति-निर्माण के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।

क्यों चर्चा में है?

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने भारत के पहले राष्ट्रीय घरेलू आय सर्वेक्षण (NHIS) और वार्षिक समेकित सेवा क्षेत्र उद्यम सर्वेक्षण (ASISSE) की तैयारी शुरू कर दी है। दोनों सर्वेक्षणों का फील्डवर्क अप्रैल 2026 से शुरू होगा, उससे पहले देश-भर में अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया जाएगा।

ऑल-इंडिया वर्कशॉप ऑफ ट्रेनर्स (AIWOT) क्या है?

  • तैयारियों को मजबूत करने के लिए सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के अंतर्गत NSO 28–29 जनवरी 2026 को चेन्नई में ऑल-इंडिया वर्कशॉप ऑफ ट्रेनर्स (AIWOT) का आयोजन कर रहा है।
  • इसमें देश के विभिन्न हिस्सों से आए वरिष्ठ अधिकारी और फील्ड कर्मियों को मास्टर ट्रेनर के रूप में प्रशिक्षित किया जाएगा।
  • ये मास्टर ट्रेनर आगे चलकर पूरे देश में गणनाकर्ताओं और पर्यवेक्षकों को प्रशिक्षण देंगे।
  • कार्यशाला का फोकस सर्वेक्षण की अवधारणाओं, डिजिटल डेटा संग्रह और एकरूप पद्धति पर होगा, ताकि सर्वेक्षण के दौरान उच्च गुणवत्ता और तुलनीय आंकड़े सुनिश्चित किए जा सकें।

राष्ट्रीय घरेलू आय सर्वेक्षण (NHIS): ऐतिहासिक क्यों है?

  • राष्ट्रीय घरेलू आय सर्वेक्षण (NHIS) पूरे भारत में पहली बार किया जाने वाला व्यापक अभ्यास है। अब तक भारत उपभोग-आधारित सर्वेक्षणों और बिखरे हुए आय आंकड़ों पर निर्भर रहा है।
  • NHIS के माध्यम से सीधे घरेलू आय वितरण और जीवन-स्तर से जुड़े आंकड़े एकत्र किए जाएंगे।
  • यह श्रम, पूंजी और भूमि से होने वाली आय का विश्लेषण करेगा और उसे आर्थिक गतिविधियों से जोड़ेगा।
  • इससे विभिन्न क्षेत्रों, सामाजिक-आर्थिक समूहों और परिवारों के बीच तुलना संभव होगी, जो लक्षित कल्याण योजनाओं और समावेशी विकास नीतियों के लिए मजबूत आधार प्रदान करेगा।

नीति-निर्माण में NHIS की भूमिका

  • सटीक आय आंकड़े असमानता और संवेदनशीलता की पहचान के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
  • NHIS के निष्कर्ष सार्वभौमिक और लक्षित कल्याण हस्तक्षेपों में मदद करेंगे, सब्सिडी की प्रभावशीलता का आकलन करेंगे और राजकोषीय योजना को बेहतर बनाएंगे।
  • इससे नीति-निर्माता आय-आधारित गरीबी और उपभोग-आधारित गरीबी के बीच अंतर स्पष्ट रूप से समझ सकेंगे, जिससे सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों की रूपरेखा अधिक प्रभावी बनेगी।
  • पहली बार भारत के पास यह स्पष्ट राष्ट्रीय तस्वीर होगी कि कौन, कहाँ और कैसे कमाता है।

वार्षिक समेकित सेवा क्षेत्र उद्यम सर्वेक्षण (ASISSE)

  • ASISSE भारत के तेजी से बढ़ते कॉरपोरेट सेवा क्षेत्र पर केंद्रित है, जो GDP में बड़ा योगदान देता है, लेकिन जिसके लिए विस्तृत सांख्यिकीय कवरेज अब तक सीमित रहा है।
  • यह सर्वेक्षण सकल मूल्य वर्धन (GVA), पूंजी निर्माण, रोजगार और पारिश्रमिक से जुड़े आंकड़े उपलब्ध कराएगा।
  • इसके माध्यम से राज्य और उद्योग-स्तर पर अनुमान तैयार किए जाएंगे, जिससे सेवा क्षेत्र का विश्लेषण मजबूत होगा।
  • यह एक उद्यम-आधारित सर्वेक्षण है और GSTN ढांचे का उपयोग करता है, जिसमें केवल समेकित (incorporated) सेवा क्षेत्र इकाइयों को शामिल किया जाएगा।

ASISSE अर्थव्यवस्था के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

  • भारत की अर्थव्यवस्था में सेवा क्षेत्र का दबदबा है, लेकिन अब तक उद्यम-स्तर के विस्तृत आंकड़ों की कमी रही है।
  • ASISSE आईटी, वित्त, लॉजिस्टिक्स और पेशेवर सेवाओं जैसे क्षेत्रों में उत्पादकता, रोजगार रुझान और निवेश पैटर्न को समझने में मदद करेगा।
  • यह डेटा राष्ट्रीय खातों को बेहतर बनाएगा, क्षेत्र-विशिष्ट नीतियों को दिशा देगा और वैश्विक स्तर पर भारत की आर्थिक रिपोर्टिंग मानकों को मजबूत करेगा।

बोम्बार्डियर लरजेट 45 क्या है? — विवरण और कंपनी स्पेसिफिकेशन

बोम्बार्डियर लियरजेट 45 एक मिड-साइज़ बिज़नेस जेट विमान है, जिसका उपयोग मुख्य रूप से कॉर्पोरेट लीडर्स, निजी कंपनियों और सरकारी अधिकारियों द्वारा छोटी और मध्यम दूरी की यात्राओं के लिए किया जाता है। यह विमान अपनी तेज़ गति, आरामदायक केबिन और उच्च विश्वसनीयता के लिए जाना जाता है। लियरजेट 45 को बॉम्बार्डियर एयरोस्पेस ने अपने लियरजेट डिवीजन के तहत विकसित किया था; इसकी पहली उड़ान 1995 में हुई और इसे 1998 में सेवा में शामिल किया गया। यह विमान सीटिंग कॉन्फ़िगरेशन के अनुसार सामान्यतः 6 से 9 यात्रियों को ले जाने में सक्षम है।

बोम्बार्डियर लियरजेट 45: प्रमुख तकनीकी विशेषताएँ

  • बोम्बार्डियर लियरजेट 45 एक मिड-साइज़ बिज़नेस जेट विमान है। इसका निर्माण बॉम्बार्डियर एयरोस्पेस के लियरजेट डिवीजन द्वारा किया गया है। इसमें सामान्यतः 6 से 9 यात्रियों के बैठने की क्षमता होती है, जबकि संचालन के लिए 2 पायलट आवश्यक होते हैं।
  • इस विमान की अधिकतम गति लगभग 860 किमी/घंटा है और इसकी उड़ान रेंज करीब 3,700 किमी तक है। इसमें दो हनीवेल TFE731 टर्बोफैन इंजन लगे होते हैं, जो बेहतर प्रदर्शन और ईंधन दक्षता प्रदान करते हैं। लियरजेट 45 की अधिकतम क्रूज़िंग ऊँचाई 45,000 फीट तक है।
  • केबिन सुविधाओं में आरामदायक सीटें, कम शोर स्तर और आधुनिक एवियोनिक्स शामिल हैं। यह विमान तेज़ और स्मूथ यात्रा के लिए डिज़ाइन किया गया है, और इसकी ऊँची क्रूज़िंग क्षमता खराब मौसम और टर्बुलेंस से बचने में मदद करती है।

निर्माता कंपनी के बारे में: बॉम्बार्डियर

बॉम्बार्डियर एक कनाडाई एयरोस्पेस और परिवहन कंपनी है, जो बिज़नेस जेट, क्षेत्रीय विमान और रेलवे उपकरणों के निर्माण के लिए जानी जाती है। लियरजेट ब्रांड 1990 में लियरजेट कॉर्पोरेशन के अधिग्रहण के बाद बॉम्बार्डियर का हिस्सा बना। बॉम्बार्डियर के विमान दुनिया भर में उपयोग किए जाते हैं और अपनी उन्नत तकनीक तथा उच्च सुरक्षा मानकों के लिए प्रसिद्ध हैं। हालांकि बाद में बॉम्बार्डियर ने लियरजेट विमानों का उत्पादन बंद कर दिया, फिर भी लियरजेट 45 सहित कई लियरजेट मॉडल आज भी सक्रिय सेवा में हैं।

विमान के स्वामी के बारे में: वीएसआर वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड

हालिया घटना में शामिल बॉम्बार्डियर लियरजेट 45 विमान दिल्ली स्थित विमानन कंपनी वीएसआर वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड के स्वामित्व में था। यह कंपनी पिछले 15 वर्षों से अधिक समय से संचालन में है और विमानन क्षेत्र में विभिन्न सेवाएँ प्रदान करती है। इनमें विमान प्रबंधन, रखरखाव और संचालन, विमानन परामर्श, तथा नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) और अन्य नियामक प्राधिकरणों के साथ समन्वय शामिल है। अपनी आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, वीएसआर वेंचर्स का मुख्य फोकस कॉर्पोरेट और विशेष प्रयोजन वाली यात्राओं के लिए सुरक्षित, विश्वसनीय और कुशल हवाई यात्रा सुनिश्चित करना है।

केरल ने बैसिलस सब्टिलिस को आधिकारिक रूप से अपना राज्य सूक्ष्मजीव घोषित किया

केरल ने विज्ञान आधारित एक अनोखा कदम उठाते हुए पहली बार किसी सूक्ष्मजीव को अपनी राज्य पहचान का हिस्सा बनाया है। यह पहल मानव स्वास्थ्य से लेकर कृषि और पर्यावरणीय स्थिरता तक, दैनिक जीवन में सूक्ष्मजीवों की भूमिका को रेखांकित करती है। इस तरह का निर्णय भारत में पहली बार लिया गया है, जो ज्ञान और अनुसंधान के प्रति केरल की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

क्यों चर्चा में है?

केरल ने आधिकारिक रूप से बैसिलस सब्टिलिस (Bacillus subtilis) को अपना राज्य सूक्ष्मजीव (State Microbe) घोषित किया है। ऐसा करने वाला केरल भारत का पहला राज्य बन गया है।

Bacillus subtilis क्या है?

  • Bacillus subtilis एक लाभकारी प्रोबायोटिक जीवाणु है, जो मिट्टी, किण्वित (fermented) खाद्य पदार्थों और मानव आंत में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है।
  • यह आंतों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, मिट्टी की उर्वरता सुधारने और पौधों की बीमारियों को नियंत्रित करने में सहायक माना जाता है।
  • अपनी उच्च सहनशीलता और बीजाणु (spore) बनाने की क्षमता के कारण इसका उपयोग औषधि उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण और सतत कृषि में व्यापक रूप से किया जाता है।
  • इसे राज्य सूक्ष्मजीव के रूप में मान्यता देना मानव कल्याण और पारिस्थितिक संतुलन में सूक्ष्मजीवों के मूक लेकिन महत्वपूर्ण योगदान को उजागर करता है।

आधिकारिक घोषणा और ऐतिहासिक पहल

  • यह घोषणा मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने तिरुवनंतपुरम में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम में की।
  • इस निर्णय के साथ केरल ने राष्ट्रीय स्तर पर एक नई मिसाल कायम की है, जहाँ पहली बार किसी सूक्ष्मजीव को औपचारिक मान्यता दी गई है।
  • यह पहल पारंपरिक प्रतीकों (जैसे पशु या पक्षी) से आगे बढ़कर वैज्ञानिक और ज्ञान-आधारित पहचान को अपनाने का संकेत देती है, जो केरल की शिक्षा और अनुसंधान परंपरा के अनुरूप है।

माइक्रोबायोम में उत्कृष्टता केंद्र 

  • इस घोषणा के साथ ही माइक्रोबायोम में उत्कृष्टता केंद्र (CoEM) की भी शुरुआत की गई।
  • यह केंद्र मानव स्वास्थ्य, पोषण, प्रतिरक्षा, कृषि, मत्स्य पालन और पर्यावरण संरक्षण पर सूक्ष्मजीवों के प्रभावों का अध्ययन करेगा।
  • राज्य सरकार के अनुसार, Bacillus subtilis रोग नियंत्रण और उत्पादकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, और इससे विकसित उत्पाद केरल के लिए उच्च मूल्य वाली आर्थिक संपत्ति बन सकते हैं।

संस्थागत ढांचा

  • CoEM, केरल राज्य विज्ञान, प्रौद्योगिकी और पर्यावरण परिषद के अंतर्गत कार्य करेगा और केरल विकास एवं नवाचार रणनीतिक परिषद के सहयोग से संचालित होगा।
  • यह भारत का पहला संस्थान है, जो विभिन्न क्षेत्रों में माइक्रोबायोम आधारित अनुप्रयुक्त अनुसंधान को एक ही मंच पर एकीकृत करता है।
  • इससे प्रयोगशाला आधारित शोध और व्यावहारिक अनुप्रयोगों के बीच की दूरी कम होने की उम्मीद है।

माइक्रोबायोम अनुसंधान का महत्व

  • माइक्रोबायोम अनुसंधान सूक्ष्मजीवों और उनके परिवेश, विशेषकर मानव शरीर, के बीच संबंधों को समझने पर केंद्रित होता है।
  • इसका वैश्विक महत्व एंटीबायोटिक प्रतिरोध, जीवनशैली जनित रोगों, मिट्टी के क्षरण और जलवायु तनाव जैसी चुनौतियों से निपटने में है।
  • Bacillus subtilis को चुनकर केरल ने ऐसे सूक्ष्मजीव को सामने रखा है, जिसकी वैज्ञानिक मान्यता और व्यावहारिक उपयोग पहले से स्थापित हैं, जिससे यह पहल प्रतीकात्मक होने के साथ-साथ उपयोगी भी बन जाती है।

वैज्ञानिकों ने उत्तराखंड के ओक के जंगलों में एक दुर्लभ मशरूम की खोज की

उत्तराखंड के हिमालयी वनों में वैज्ञानिकों ने मशरूम की एक पहले अज्ञात प्रजाति की खोज की है। ऊँचाई वाले क्षेत्रों में ओक (बलूत) के पेड़ों के नीचे पाई गई यह नई प्रजाति भारत की कवक (फंगल) विविधता में एक नया अध्याय जोड़ती है और देश में Hemileccinum वंश का यह पहला आधिकारिक रिकॉर्ड है।

क्यों चर्चा में है?

शोधकर्ताओं ने उत्तराखंड के ओक वनों में पाई गई गड्ढेदार बीजाणुओं वाली मशरूम की एक नई प्रजाति की पहचान की है, जिसे Hemileccinum indicum नाम दिया गया है। वर्ष 2022–23 के दौरान किए गए फील्ड अध्ययनों में यह खोज हुई और यह भारत में Hemileccinum वंश की पहली दर्ज उपस्थिति है।

मशरूम की खोज कहाँ और कैसे हुई?

यह मशरूम उत्तराखंड के बागेश्वर ज़िले के धाकुरी क्षेत्र में, 2,600 मीटर से अधिक ऊँचाई पर पाया गया। इसकी खोज मानसून के दौरान की जाने वाली मैक्रोफंगल सर्वेक्षण यात्राओं (macrofungal forays) के दौरान हुई, जिनका उद्देश्य बड़े कवकों का दस्तावेजीकरण करना होता है। ये सर्वेक्षण भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (BSI), यूनिवर्सिटी ऑफ़ टोरिनो और सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज के शोधकर्ताओं द्वारा संयुक्त रूप से किए गए।

Hemileccinum indicum क्यों है एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक खोज?

प्रारंभ में यह मशरूम उत्तरी अमेरिका और चीन में पाई जाने वाली समान प्रजातियों जैसा प्रतीत हुआ, लेकिन उन्नत वैज्ञानिक परीक्षणों ने इसे पूरी तरह नई प्रजाति सिद्ध किया। बहु-जीन आणविक वंशावली (multigene molecular phylogenetic) विश्लेषण के माध्यम से इसके डीएनए की तुलना विश्वभर की ज्ञात प्रजातियों से की गई। परिणामों से पता चला कि यह फ्लोरिडा की एक प्रजाति से निकट संबंध रखता है, लेकिन आनुवंशिक रूप से विशिष्ट है। इससे यह कवकों के विकासवादी वृक्ष की एक नई शाखा के रूप में स्थापित हुआ और Hemileccinum वंश के वैश्विक विस्तार को भी दर्शाता है।

विशिष्ट शारीरिक और सूक्ष्म विशेषताएँ

Hemileccinum indicum ‘बोलेट’ समूह से संबंधित है, जिनमें गलफड़ों (gills) की जगह टोपी के नीचे छिद्र (pores) होते हैं। इसकी टोपी शुरुआत में झुर्रीदार बैंगनी-भूरी होती है, जो परिपक्व होने पर चमड़े जैसी भूरी हो जाती है। इसके छिद्रों की सतह हल्की पीली होती है और चोट लगने पर रंग नहीं बदलती। स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप के नीचे इसके बीजाणुओं में सूक्ष्म गड्ढेदार संरचना दिखाई देती है, जो इसकी सबसे विशिष्ट पहचान है। इसके चिकने तने और गड्ढेदार बीजाणु इसे संबंधित प्रजातियों से अलग करते हैं।

पारिस्थितिक महत्व

यह मशरूम पारिस्थितिक रूप से एक्टोमाइकोराइज़ल है, अर्थात यह पेड़ों की जड़ों के साथ सहजीवी संबंध बनाता है। यह विशेष रूप से Quercus (ओक) प्रजातियों के साथ जुड़ा होता है। ऐसे कवक पेड़ों को पोषक तत्व और जल अवशोषण में मदद करते हैं, जबकि बदले में उन्हें शर्करा प्राप्त होती है। यह भूमिगत सहयोग वनों के स्वास्थ्य, मृदा स्थिरता और पोषक तत्व चक्र को मजबूत करता है। यह खोज हिमालयी वनों में कवकों की छिपी हुई लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर करती है।

भारत की फंगल विविधता क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत की कवक जैव-विविधता अब भी काफी हद तक अनदेखी है, विशेषकर उच्च हिमालयी और समशीतोष्ण वनों में। Hemileccinum indicum जैसी खोजें संकेत देती हैं कि अनेक प्रजातियाँ अभी भी वैज्ञानिक दस्तावेज़ों से बाहर हैं। कवक पारिस्थितिकी संतुलन, जलवायु सहनशीलता और भविष्य के औषधीय अनुसंधान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए वनों का संरक्षण न केवल दृश्य वन्यजीवों के लिए, बल्कि उन सूक्ष्म जीवों के लिए भी आवश्यक है जो पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को सहारा देते हैं।

CCRAS–सेंट्रल संस्कृत यूनिवर्सिटी पांडुलिपि पुनरुद्धार पहल क्या है?

भारत ने अपनी प्राचीन चिकित्सकीय विरासत के संरक्षण की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया है। केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS) और केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय (CSU) ने केरल में आयोजित एक विशेष कार्यशाला के माध्यम से दुर्लभ आयुर्वेदिक पांडुलिपियों को पुनर्जीवित किया है। यह पहल ताड़पत्र पांडुलिपियों के लिप्यंतरण और शोध-आधारित उपयोग पर केंद्रित है, जिससे शास्त्रीय आयुर्वेदिक ज्ञान आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययन के लिए सुलभ हो सके।

क्यों चर्चा में है?

केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS) और केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय (CSU) ने केरल में आयोजित 15-दिवसीय लिप्यंतरण कार्यशाला को सफलतापूर्वक पूरा किया है, जिसके परिणामस्वरूप पाँच दुर्लभ और अब तक अप्रकाशित आयुर्वेदिक पांडुलिपियाँ शोध एवं अकादमिक उपयोग के लिए पुनर्जीवित की गई हैं।

केरल में लिप्यंतरण कार्यशाला

  • यह आवासीय कार्यशाला CCRAS और CSU के बीच हुए औपचारिक समझौता ज्ञापन (MoU) के तहत 12 से 25 जनवरी के बीच त्रिशूर स्थित CSU पुरणट्टुकरा (गुरुवायूर) परिसर में आयोजित की गई।
  • कुल 33 विद्वानों ने भाग लिया, जिनमें 18 आयुर्वेद और 15 संस्कृत के विद्वान शामिल थे
  • कार्यक्रम ने पांडुलिपि अध्ययन में अंतर्विषयी (interdisciplinary) दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया
  • प्रशिक्षण में पांडुलिपि विज्ञान, प्राचीन लिपि-विज्ञान (palaeography) और आयुर्वेदिक तकनीकी शब्दावली शामिल थी
  • ग्रंथ और वट्टेझुथु लिपियों पर विशेष ध्यान दिया गया
  • इस कार्यशाला ने नाजुक ताड़पत्र पांडुलिपियों के संरक्षण और अध्ययन में विद्वानों की क्षमता को सशक्त किया

व्यावहारिक प्रशिक्षण और लिपि विशेषज्ञता

  • इस कार्यक्रम की प्रमुख विशेषता केवल सैद्धांतिक अध्ययन के बजाय व्यावहारिक लिप्यंतरण पर जोर देना था।
  • प्रतिभागी विद्वानों ने मूल ताड़पत्र पांडुलिपियों पर प्रत्यक्ष कार्य किया
  • ग्रंथ, मध्यकालीन मलयालम और वट्टेझुथु जैसी लिपियों का अध्ययन कराया गया
  • ‘लिपि परिचय’ सत्रों के माध्यम से लिपियों के विकास को समझाया गया
  • सटीकता, एकरूपता और शोध-उपयोगिता पर विशेष ध्यान दिया गया
  • इस व्यावहारिक संरचना ने अल्प अवधि में ठोस अकादमिक परिणाम सुनिश्चित किए

दुर्लभ आयुर्वेदिक पांडुलिपियों का पुनर्जीवन

इस कार्यशाला के परिणामस्वरूप पाँच दुर्लभ और पहले अप्रकाशित आयुर्वेदिक पांडुलिपियों का सफल लिप्यंतरण किया गया, जो अब उन्नत शोध के लिए उपलब्ध हैं।

  • धन्वंतरी (वैद्य) चिंतामणि – ग्रंथ से संस्कृत
  • द्रव्यशुद्धि – ग्रंथ से संस्कृत
  • वैद्यम् – मध्यकालीन मलयालम से मलयालम
  • रोग निर्णय (भाग-I) – मध्यकालीन मलयालम से मलयालम
  • विविधरोगंगल – वट्टेझुथु से मलयालम और संस्कृत

ये ग्रंथ क्षेत्रीय आयुर्वेदिक परंपराओं पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालते हैं।

संस्थागत सहयोग और विशेषज्ञ नेतृत्व

वरिष्ठ शिक्षाविदों ने इस पांडुलिपि पुनर्जीवन पहल की बढ़ती गति को रेखांकित किया।

  • CCRAS के महानिदेशक प्रो. वैद्य रवीन्द्रनारायण आचार्य ने इसे CSU के साथ दूसरा सफल सहयोग बताया
  • इससे पहले ओडिशा के CSU पुरी परिसर में आयोजित कार्यशाला में 14 पांडुलिपियों का लिप्यंतरण किया गया था
  • CSU अधिकारियों ने मलयालम आयुर्वेदिक परंपराओं के संरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई
  • कार्यक्रम का समन्वय दोनों संस्थानों के वरिष्ठ विशेषज्ञों द्वारा किया गया
  • यह पहल भारत की शास्त्रीय ज्ञान प्रणालियों के संरक्षण और पुनरुत्थान के प्रति निरंतर और संस्थागत प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

IIT गुवाहाटी ने पूर्वी हिमालय में ग्लेशियर के खतरों को ट्रैक करने की तकनीक बनाई

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने संवेदनशील पूर्वी हिमालयी क्षेत्र में हिमनदीय खतरों की भविष्यवाणी के लिए एक नई विधि विकसित की है। इस अध्ययन में सैकड़ों ऐसे स्थानों की पहचान की गई है, जहाँ भविष्य में हिमनदीय झीलें बन सकती हैं। इससे बाढ़, बुनियादी ढांचे की सुरक्षा और पर्वतीय क्षेत्रों में जलवायु अनुकूलन को लेकर गंभीर चिंताएँ सामने आई हैं।

क्यों चर्चा में है?

आईआईटी गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने एक पूर्वानुमानात्मक ढांचा विकसित किया है, जिसके माध्यम से पूर्वी हिमालय में 492 संभावित हिमनदीय झील निर्माण स्थलों की पहचान की गई है। यह अध्ययन हाल ही में Scientific Reports पत्रिका में प्रकाशित हुआ है और इसमें ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड्स (GLOFs) से जुड़े नए खतरों को उजागर किया गया है।

हिमनदीय खतरे और GLOFs को समझना

हिमनदीय खतरे मुख्य रूप से हिमनदीय झीलों के बनने और उनके अचानक फटने से उत्पन्न होते हैं। इन घटनाओं को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड्स (GLOFs) कहा जाता है, जिनमें बहुत कम समय में भारी मात्रा में पानी, बर्फ और मलबा नीचे की ओर बह जाता है। ऐसी बाढ़ें गाँवों, सड़कों, जलविद्युत परियोजनाओं और कृषि भूमि को भारी नुकसान पहुँचा सकती हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर तेजी से पीछे हट रहे हैं, जिससे विशेषकर हिमालय में नई झीलें अभूतपूर्व गति से बन रही हैं। ऐसे में यह जानना अत्यंत आवश्यक हो गया है कि ये झीलें कहाँ बन सकती हैं, ताकि आपदा तैयारी, दीर्घकालिक जल प्रबंधन और पर्वतीय समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

आईआईटी गुवाहाटी के अध्ययन की विशेषता क्या है?

शोध दल ने उच्च-रिज़ॉल्यूशन गूगल अर्थ उपग्रह चित्रों और डिजिटल एलिवेशन मॉडल (DEM) का उपयोग कर स्थलाकृति का सूक्ष्म अध्ययन किया। पहले के अध्ययनों के विपरीत, जो मुख्यतः ग्लेशियर के आकार या तापमान प्रवृत्तियों पर केंद्रित थे, इस नए ढांचे ने भू-दृश्य संरचना पर विशेष ध्यान दिया। ढाल, सतह की बनावट, सर्क और पास की झीलों जैसे कारकों का विश्लेषण कर शोधकर्ताओं ने जटिल स्थलाकृतिक व्यवहार को समझा। महत्वपूर्ण रूप से, इस मॉडल में अनिश्चितता के स्तर का भी आकलन किया गया, जिससे पूर्वानुमान अधिक यथार्थवादी बने। यह तरीका विश्वसनीयता बढ़ाता है और प्रशासन को उन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने में मदद करता है, जहाँ तत्काल निगरानी और निवारक कदम आवश्यक हैं।

अध्ययन में प्रयुक्त उन्नत पूर्वानुमान मॉडल

सटीकता सुनिश्चित करने के लिए शोधकर्ताओं ने तीन पूर्वानुमान तकनीकों का परीक्षण किया—लॉजिस्टिक रिग्रेशन (LR), आर्टिफिशियल न्यूरल नेटवर्क (ANN) और बेयesian न्यूरल नेटवर्क (BNN)। इनमें BNN सबसे अधिक सटीक मॉडल के रूप में उभरा। इसकी विशेषता यह है कि यह अनिश्चितता को बेहतर ढंग से संभाल सकता है, जो उच्च पर्वतीय क्षेत्रों के डेटा में सामान्य होती है। BNN मॉडल ने पीछे हटते ग्लेशियर, हल्की ढाल, सर्क और आस-पास की झीलों जैसे प्रमुख कारकों की पहचान की। इससे यह स्पष्ट हुआ कि भू-आकृतिक विशेषताएँ, जिन्हें पहले अक्सर नज़रअंदाज़ किया जाता था, हिमनदीय झीलों के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाती हैं।

मुख्य निष्कर्ष: 492 उच्च-जोखिम स्थल चिन्हित

इस विकसित ढांचे का उपयोग करते हुए टीम ने पूर्वी हिमालय में 492 ऐसे स्थानों की पहचान की, जहाँ भविष्य में नई हिमनदीय झीलें बनने की संभावना है। ये क्षेत्र संभावित भविष्य के खतरे वाले ज़ोन हैं। आईआईटी गुवाहाटी के सहायक प्रोफेसर प्रो. अजय डाशोरा के अनुसार, यह ढांचा GLOFs के लिए प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को दिशा दे सकता है, सड़कों और जलविद्युत परियोजनाओं की सुरक्षित योजना बनाने में सहायक हो सकता है तथा बसावट के लिए उपयुक्त स्थान तय करने में मदद कर सकता है। इस प्रकार यह शोध आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों, योजनाकारों और हिमालयी राज्यों के नीति निर्माताओं के लिए अत्यंत उपयोगी है।

वैश्विक महत्व और भविष्य की संभावनाएँ

भारत के बाहर भी, आईआईटी गुवाहाटी द्वारा विकसित यह ढांचा दुनिया के अन्य हिमाच्छादित पर्वतीय क्षेत्रों में अपनाया जा सकता है। एंडीज़ से लेकर आल्प्स तक, वैश्विक तापन के कारण हिमनदीय खतरे बढ़ रहे हैं। शोध दल भविष्य में मोरेन विकास के इतिहास को जोड़ने, डेटा तैयारी को स्वचालित करने और फील्ड-आधारित सत्यापन शामिल कर मॉडल को और मजबूत करने की योजना बना रहा है। इन सुधारों से सटीकता बढ़ेगी और बड़े पैमाने पर निगरानी संभव होगी। इससे भारत वैश्विक जलवायु विज्ञान और आपदा-सहिष्णुता योजना में एक महत्वपूर्ण योगदानकर्ता के रूप में उभरता है।

नमो लक्ष्मी योजना के तहत गुजरात में बालिका शिक्षा को ₹1,250 करोड़ का समर्थन

गुजरात में बालिका शिक्षा को एक बड़ा प्रोत्साहन मिला है, क्योंकि राज्य सरकार ने किशोरियों के लिए बड़े पैमाने पर वित्तीय सहायता की घोषणा की है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्राथमिक शिक्षा के बाद आर्थिक कठिनाइयों के कारण किसी भी छात्रा की पढ़ाई बाधित न हो। यह कदम शैक्षिक पहुंच, लैंगिक समानता और बालिकाओं के समग्र सशक्तिकरण पर गुजरात सरकार के निरंतर फोकस को दर्शाता है।

क्यों चर्चा में है?

गुजरात सरकार ने शैक्षणिक सत्र 2025-26 के लिए नमो लक्ष्मी योजना के तहत ₹1,250 करोड़ की वित्तीय सहायता की घोषणा की है, जिससे कक्षा 9 से 12 तक पढ़ने वाली 12 लाख से अधिक छात्राओं को लाभ मिलेगा।

नमो लक्ष्मी योजना क्या है?

नमो लक्ष्मी योजना एक राज्य प्रायोजित योजना है, जिसका उद्देश्य बालिकाओं की माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा को समर्थन देना है। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के मार्गदर्शन में शुरू की गई यह योजना यह सुनिश्चित करती है कि आर्थिक कारणों से प्राथमिक शिक्षा के बाद बालिकाएं स्कूल छोड़ने को मजबूर न हों। यह चार वर्षों में संरचित वित्तीय सहायता प्रदान करती है, जो शिक्षा के साथ स्वास्थ्य, पोषण और दीर्घकालिक सशक्तिकरण को भी जोड़ती है।

वित्तीय सहायता की संरचना

इस योजना के तहत कक्षा 9 से 12 तक की प्रत्येक पात्र छात्रा को कुल ₹50,000 की सहायता चार वर्षों में दी जाती है। कक्षा 9 और 10 के लिए ₹20,000 दिए जाते हैं, जिसमें मासिक सहायता और कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षा उत्तीर्ण करने पर एकमुश्त राशि शामिल है। वहीं कक्षा 11 और 12 के लिए ₹30,000 की सहायता दी जाती है, जिसमें मासिक किस्तें और कक्षा 12 पूरी करने पर अंतिम भुगतान शामिल है। यह व्यवस्था छात्राओं को पढ़ाई जारी रखने और सफलतापूर्वक पूर्ण करने के लिए प्रेरित करती है।

पात्रता और दायरा

यह योजना गुजरात माध्यमिक एवं उच्चतर माध्यमिक शिक्षा बोर्ड या केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) से मान्यता प्राप्त विद्यालयों में अध्ययनरत छात्राओं पर लागू है। छात्राओं ने कक्षा 1 से 8 तक सरकारी या अनुदानित विद्यालयों, आरटीई के अंतर्गत या कक्षा 8 निजी विद्यालय से पूरी की होनी चाहिए। पारिवारिक वार्षिक आय ₹6 लाख से अधिक नहीं होनी चाहिए। महत्वपूर्ण बात यह है कि अन्य छात्रवृत्तियों का लाभ लेने वाली छात्राएं भी इस योजना के लिए पात्र हैं, क्योंकि यह अतिरिक्त सहायता प्रदान करती है।

पोषण और स्वास्थ्य पर ध्यान

शिक्षा के साथ-साथ नमो लक्ष्मी योजना किशोरियों के पोषण और स्वास्थ्य पर भी ध्यान देती है। नियमित वित्तीय सहायता से परिवार छात्राओं के लिए बेहतर भोजन और स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित कर सकते हैं। शिक्षा विभाग के अनुसार, बेहतर पोषण से सीखने की क्षमता, उपस्थिति और समग्र स्वास्थ्य में सुधार होता है, जिससे शिक्षा और समग्र विकास के बीच मजबूत संबंध बनता है।

गुजरात के शिक्षा मॉडल में भूमिका

यह पहल गुजरात में पहले से चल रही शिक्षा-केंद्रित योजनाओं, जैसे शाला प्रवेशोत्सव, को आगे बढ़ाती है, जिसने नामांकन और स्कूल में बने रहने की दर को बढ़ाया था। इन योजनाओं में से कई की शुरुआत गुजरात में नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री रहते हुई थी, जो बाद में राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनाई गईं। नमो लक्ष्मी योजना इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उन किशोरियों पर केंद्रित है, जो स्कूल छोड़ने के सबसे अधिक जोखिम में रहती हैं।

भारत और EU ने पहली बार व्यापक रक्षा और सुरक्षा साझेदारी पर हस्ताक्षर किए

भारत और यूरोपीय संघ ने आपसी संबंधों में एक ऐतिहासिक रणनीतिक कदम उठाया है। 27 जनवरी 2026 को दोनों पक्षों ने अपना पहला व्यापक रक्षा और सुरक्षा समझौता किया, साथ ही लंबे समय से लंबित मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को भी अंतिम रूप दिया। यह पहल बढ़ते आपसी विश्वास, साझा सुरक्षा चुनौतियों की समझ और भारत–EU रणनीतिक सहयोग के एक नए चरण का संकेत देती है।

क्यों खबर में?

यूरोपीय संघ के शीर्ष नेताओं की 77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर भारत यात्रा के दौरान भारत और यूरोपीय संघ ने अपना पहला समग्र सुरक्षा और रक्षा साझेदारी समझौता किया। यह कदम दर्शाता है कि द्विपक्षीय संबंध अब केवल व्यापार तक सीमित न रहकर रणनीतिक और सुरक्षा आयामों तक विस्तारित हो गए हैं।

रक्षा साझेदारी की प्रमुख विशेषताएँ

नव-हस्ताक्षरित भारत–EU सुरक्षा और रक्षा साझेदारी सहयोग के लिए एक औपचारिक और व्यापक ढांचा स्थापित करती है। यह भारत और EU के बीच पहला सर्वसमावेशी रक्षा एवं सुरक्षा समझौता है, जिसमें समुद्री सुरक्षा, रक्षा उद्योग, रक्षा प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष सुरक्षा शामिल हैं। इसके अलावा, यह साइबर खतरों, हाइब्रिड युद्ध और आतंकवाद-रोधी सहयोग को भी संबोधित करता है तथा विभिन्न क्षेत्रों में संकट प्रबंधन और तैयारी को बेहतर बनाने का लक्ष्य रखता है। यह समझौता दर्शाता है कि अस्थिर वैश्विक परिदृश्य में भारत और EU अब एक-दूसरे को दीर्घकालिक और भरोसेमंद सुरक्षा साझेदार के रूप में देखते हैं।

सूचना सुरक्षा समझौता (SOIA)

रक्षा साझेदारी के साथ-साथ दोनों पक्षों ने सूचना सुरक्षा समझौते (Security of Information Agreement) पर वार्ता शुरू करने पर भी सहमति जताई। यह समझौता गोपनीय सूचनाओं के आदान-प्रदान को सक्षम बनाएगा, संवेदनशील डेटा की सुरक्षा के लिए कानूनी प्रावधान सुनिश्चित करेगा और उन परिस्थितियों में आवश्यक ढांचा प्रदान करेगा, जब EU किसी तीसरे देश के साथ वर्गीकृत जानकारी साझा करता है। इससे रक्षा-औद्योगिक और रणनीतिक सहयोग को और मजबूती मिलने की उम्मीद है, जो भारत–EU संबंधों में बढ़ते विश्वास को दर्शाता है।

यह साझेदारी क्यों महत्वपूर्ण है?

यह समझौता बदलती भू-राजनीतिक वास्तविकताओं और साझा चिंताओं को प्रतिबिंबित करता है। इसमें अंतर-क्षेत्रीय सुरक्षा खतरों में वृद्धि, हिंद-प्रशांत क्षेत्र और समुद्री सुरक्षा पर बढ़ता ध्यान, रूस–यूक्रेन संघर्ष के संदर्भ में EU की रक्षा तैयारियाँ, तथा भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता और साझेदारों के विविधीकरण की नीति प्रमुख हैं। दोनों पक्षों ने माना कि हाइब्रिड खतरों, आतंकवाद और सीमा-पार अपराधों से निपटने के लिए घनिष्ठ सहयोग आवश्यक है।

‘टुवर्ड्स 2030’: संयुक्त व्यापक रणनीतिक एजेंडा

नेताओं ने “टुवर्ड्स 2030: भारत–EU संयुक्त व्यापक रणनीतिक एजेंडा” को भी अपनाया, जो दीर्घकालिक प्राथमिकताओं को निर्धारित करता है। यह एजेंडा पाँच प्रमुख स्तंभों पर केंद्रित है—समृद्धि और सततता, प्रौद्योगिकी और नवाचार, सुरक्षा और रक्षा, कनेक्टिविटी और वैश्विक चुनौतियाँ, तथा कौशल, गतिशीलता, व्यापार और जन-से-जन संपर्क जैसे सहायक क्षेत्र। यह रोडमैप सहयोग को गति देने और साझेदारी को दीर्घकालिक दिशा प्रदान करने का लक्ष्य रखता है।

भारत के लिए रक्षा उद्योग सहयोग

यूरोप में रक्षा क्षेत्र में बढ़ते निवेश से भारतीय कंपनियों के लिए नए अवसर खुल रहे हैं। EU ने मार्च 2025 में ‘री-आर्म यूरोप प्लान / रेडीनेस 2030’ शुरू किया, जिसके तहत €800 अरब से अधिक के रक्षा व्यय का प्रस्ताव है। इसके परिणामस्वरूप यूरोपीय देश तेजी से भारत से गोला-बारूद और रक्षा घटकों की खरीद कर रहे हैं, जबकि भारतीय रक्षा निर्माता अपनी उत्पादन क्षमता का विस्तार कर रहे हैं। यह साझेदारी भारत को एक विश्वसनीय रक्षा विनिर्माण केंद्र के रूप में और मजबूत करती है।

उत्तराखंड ने यूनिफॉर्म सिविल कोड (संशोधन) अध्यादेश, 2026 लागू किया

उत्तराखंड राज्य ने अपने नागरिक कानून ढांचे में एक और महत्वपूर्ण सुधार करते हुए समान नागरिक संहिता (UCC) को नए संशोधनों के माध्यम से और सुदृढ़ किया है। इस कदम का उद्देश्य कानून को अधिक व्यावहारिक, पारदर्शी और नागरिक-अनुकूल बनाना है, साथ ही राज्य में नागरिक मामलों में समानता और डिजिटल शासन को मजबूत करना है।

क्यों खबर में?

उत्तराखंड सरकार ने राज्यपाल की मंजूरी के बाद समान नागरिक संहिता (संशोधन) अध्यादेश, 2026 लागू किया है। इस अध्यादेश के जरिए UCC की प्रभावशीलता और स्पष्टता बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण सुधार किए गए हैं।

पृष्ठभूमि: उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता

उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता को 27 जनवरी 2025 को लागू किया गया था, जो भारत के कानूनी इतिहास में एक ऐतिहासिक कदम माना जाता है। इसके तहत विवाह, तलाक और लिव-इन संबंधों से जुड़ी प्रक्रियाओं को सरल और डिजिटल बनाया गया तथा सभी समुदायों के लिए समान नागरिक कानून सुनिश्चित किए गए। एक वर्ष पूरा होने पर राज्य में “UCC दिवस” मनाया जा रहा है, जो इस सुधार के सामाजिक और प्रशासनिक प्रभाव को रेखांकित करता है।

समान नागरिक संहिता (संशोधन) अध्यादेश, 2026 क्या है?

यह अध्यादेश भारत के संविधान के अनुच्छेद 213 के तहत राज्यपाल द्वारा जारी किया गया है, जिससे इसे तत्काल कानूनी प्रभाव मिला। इसमें UCC अधिनियम, 2024 के अंतर्गत प्रक्रियात्मक, प्रशासनिक और दंडात्मक सुधार किए गए हैं। इसका उद्देश्य अस्पष्टताओं को दूर करना, नए आपराधिक कानूनों के अनुरूप दंड प्रावधानों को संरेखित करना और कानून के सुचारु क्रियान्वयन को सुनिश्चित करना है। साथ ही पंजीकरण से जुड़े अधिकारों को मजबूत किया गया है और अपीलीय व्यवस्था में सुधार किया गया है।

संशोधनों के प्रमुख उद्देश्य

इन संशोधनों का फोकस महिलाओं के सशक्तिकरण, बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा और नागरिक कानूनों में समानता पर है। प्रक्रियाओं को सरल बनाकर देरी कम करने और पारदर्शिता बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया है। मुख्यमंत्री कार्यालय के अनुसार, ये बदलाव कानून को अधिक सुलभ और पालन में आसान बनाकर जन-विश्वास बढ़ाने तथा प्रवर्तन में जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए किए गए हैं।

विवाह पंजीकरण का डिजिटल परिवर्तन

UCC का सबसे स्पष्ट प्रभाव विवाह पंजीकरण के डिजिटलीकरण में दिखता है। UCC से पहले यह प्रक्रिया उत्तराखंड अनिवार्य विवाह पंजीकरण अधिनियम, 2010 के तहत होती थी, जिसमें उप-पंजीयक कार्यालय में शारीरिक उपस्थिति आवश्यक थी। UCC के तहत अब लगभग 100% विवाह पंजीकरण ऑनलाइन हो रहे हैं। दंपति और गवाह दस्तावेज़ अपलोड कर तथा वीडियो बयान रिकॉर्ड कर दूर से ही आवेदन कर सकते हैं। एक वर्ष में पाँच लाख से अधिक विवाह पंजीकरण हुए हैं और औसतन पाँच दिनों में प्रमाणपत्र जारी किए जा रहे हैं।

कानूनी और प्रशासनिक महत्व

यह अध्यादेश UCC से जुड़े दंड प्रावधानों को नए भारतीय आपराधिक कानूनों के अनुरूप बनाता है, जिससे कानूनी सामंजस्य सुनिश्चित होता है। साथ ही प्रशासनिक स्पष्टता और प्रवर्तन शक्तियों को बढ़ाकर प्रक्रियागत भ्रम को कम किया गया है। जिलों में UCC दिवस के अवसर पर जागरूकता और जन-संवाद कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, जो इस सुधार को सामाजिक स्वीकार्यता दिलाने के सरकार के प्रयासों को दर्शाते हैं।

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