कई महीनों की राजनीतिक अनिश्चितता के बाद मणिपुर में नई सरकार का गठन होने जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने युमनाम खेमचंद सिंह को अपने विधायक दल का नेता चुन लिया है, जिससे उनके राज्य के अगले मुख्यमंत्री बनने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। यह निर्णय ऐसे समय में आया है, जब राज्य में राष्ट्रपति शासन 13 फरवरी को समाप्त होने वाला है। लंबे समय तक चले जातीय तनाव और पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के इस्तीफे के बाद मणिपुर केंद्र के शासन में था। खेमचंद सिंह का नेतृत्व संभालना राज्य के लिए एक अहम मोड़ माना जा रहा है, जिससे राजनीतिक स्थिरता बहाल होने और सामान्य स्थिति की दिशा में आगे बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है।
मणिपुर के नए मुख्यमंत्री कौन हैं?
युमनाम खेमचंद सिंह 62 वर्षीय वरिष्ठ भाजपा नेता हैं और सिंगजामेई विधानसभा क्षेत्र से दो बार विधायक रह चुके हैं। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत 2000 के दशक की शुरुआत में एन. बीरेन सिंह के साथ की थी और वर्ष 2013 में भाजपा में शामिल हुए। एक अनुशासित संगठनकर्ता और पूर्व ताइक्वांडो खिलाड़ी रहे खेमचंद सिंह मणिपुर विधानसभा के अध्यक्ष (स्पीकर) भी रह चुके हैं और बाद में कैबिनेट मंत्री के रूप में जिम्मेदारी निभाई। समय के साथ, विशेषकर राज्य में लंबे समय से चले आ रहे संकट के दौरान, वे पूर्व नेतृत्व के प्रमुख आंतरिक आलोचकों में गिने जाने लगे।
युमनाम खेमचंद सिंह की सरकार का गठन
खेमचंद सिंह को विधायक दल का नेता चुने जाने का निर्णय नई दिल्ली में हुई भाजपा विधायक दल की बैठक में लिया गया, जिसकी अध्यक्षता स्वयं बीरेन सिंह ने की। 13 फरवरी को राष्ट्रपति शासन समाप्त होने से पहले केंद्र सरकार राज्य में शीघ्र लोकप्रिय सरकार स्थापित करना चाहती है। सूत्रों के अनुसार, नई मंत्रिपरिषद में संघर्ष से प्रभावित विभिन्न समुदायों को व्यापक प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है। खेमचंद सिंह को आरएसएस समर्थित और संगठनात्मक रूप से मजबूत नेता माना जाता है, जिससे संवेदनशील दौर में शासन और सुलह की प्रक्रिया को मजबूती मिलने की उम्मीद है।
मणिपुर राजनीतिक संकट में कैसे फंसा
मणिपुर का मौजूदा राजनीतिक संकट मई 2023 में भड़की मैतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच जातीय हिंसा से जुड़ा है। इसके बाद केवल कानून-व्यवस्था ही नहीं बिगड़ी, बल्कि घाटी और पहाड़ी क्षेत्रों के बीच भौगोलिक और राजनीतिक विभाजन भी गहरा गया। बड़े पैमाने पर विस्थापन, राहत शिविरों और आपसी अविश्वास ने शासन व्यवस्था पर जनता का भरोसा कमजोर कर दिया। समय के साथ मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह शांति बहाल करने में असफल माने जाने लगे, यहां तक कि अपनी ही पार्टी के भीतर भी।
आंतरिक विरोध और बीरेन सिंह का इस्तीफा
हिंसा जारी रहने के साथ बीरेन सिंह पर विपक्ष और भाजपा विधायकों दोनों का दबाव बढ़ता गया। अक्टूबर 2024 तक 19 भाजपा विधायकों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर चेताया कि मुख्यमंत्री राजनीतिक रूप से बोझ बन चुके हैं। स्थिति तब और बिगड़ गई जब नेशनल पीपुल्स पार्टी ने सामान्य स्थिति बहाल न होने का हवाला देते हुए समर्थन वापस ले लिया। संभावित अविश्वास प्रस्ताव और आंतरिक विद्रोह के बीच बीरेन सिंह ने फरवरी 2025 में इस्तीफा दे दिया, जिसके बाद राष्ट्रपति शासन का रास्ता साफ हुआ।
राष्ट्रपति शासन क्यों लगाया गया
फरवरी 2025 में मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लगाया गया और विधानसभा को निलंबित अवस्था में रखा गया। केंद्र ने इसे हिंसा पर नियंत्रण, सुरक्षा प्रबंधन और राजनीतिक अराजकता रोकने के लिए अस्थायी स्थिरीकरण उपाय के रूप में देखा। हालांकि कानून-व्यवस्था में कुछ सुधार हुआ, लेकिन राजनीतिक वैधता कमजोर रही। विधायक हाशिए पर रहे और जनता में असंतोष बढ़ा क्योंकि निर्वाचित प्रतिनिधियों की शासन में भूमिका सीमित हो गई थी।


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