केरल ने एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया है। वित्त वर्ष 2026–27 (FY27) के बजट में राज्य ने भारत का पहला “वृद्धजन बजट (Elderly Budget)” घोषित किया है, जो पूरी तरह से वरिष्ठ नागरिकों पर केंद्रित है। यह कदम पहली नज़र में क्रांतिकारी लगता है, लेकिन गहराई से देखने पर पता चलता है कि बजट का बड़ा हिस्सा उन पेंशनों से जुड़ा है, जो राज्य पहले से ही देता आ रहा है। यह घोषणा केरल में बढ़ती वृद्ध आबादी की चुनौती को सामने लाती है और कल्याणकारी नीतियों, वित्तीय दबाव तथा जनसांख्यिकीय परिवर्तन से जुड़े अहम सवाल खड़े करती है।
वृद्धजन बजट एक नीतिगत उपकरण है, जिसमें वरिष्ठ नागरिकों से संबंधित सभी सरकारी खर्चों को एक ही बजटीय विवरण में प्रस्तुत किया जाता है। इसमें पेंशन, स्वास्थ्य सेवाएं, सामाजिक सुरक्षा और अन्य कल्याणकारी योजनाएं शामिल होती हैं। यह जरूरी नहीं कि इससे अतिरिक्त खर्च बढ़े, लेकिन इससे पारदर्शिता आती है और यह समझने में मदद मिलती है कि बढ़ती उम्र की आबादी का सार्वजनिक वित्त पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। जनसांख्यिकीय परिवर्तन से जूझ रहे कई देश इस तरह के बजटीय वर्गीकरण का उपयोग योजना निर्माण के लिए कर रहे हैं।
केरल के वित्त मंत्री के. एन. बालगोपाल ने FY27 के राज्य बजट में वृद्धजन बजट की घोषणा की। इसके साथ ही केरल ऐसा करने वाला भारत का पहला राज्य बन गया। वृद्धजन बजट के लिए कुल ₹46,236.52 करोड़ का प्रावधान किया गया है, जो केरल के कुल बजट आकार का लगभग 19.07% है। इसका उद्देश्य वरिष्ठ नागरिकों पर होने वाले खर्च को स्पष्ट और केंद्रित रूप में सामने लाना है।
हालांकि यह पहल नई लगती है, लेकिन कुल आवंटन का लगभग 68% हिस्सा सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों की पेंशन पर खर्च हो रहा है। ये पेंशन वैधानिक दायित्व हैं और वृद्धजन बजट न होने पर भी दी जातीं। इसी कारण यह बहस चल रही है कि क्या यह कदम वास्तव में नई कल्याणकारी योजनाओं को दर्शाता है या केवल मौजूदा खर्चों को नए रूप में प्रस्तुत करता है। फिर भी सरकार का तर्क है कि अलग से बजट दिखाने से नीति-निर्माताओं और नागरिकों को वृद्ध आबादी पर होने वाले कुल खर्च को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिलती है।
वृद्धजन बजट के पीछे केरल की तेज़ी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी एक प्रमुख कारण है। राज्य में 2011 से 2026 (अनुमानित) के बीच वृद्ध आबादी में लगभग 47% की वृद्धि हुई है, जबकि पूरे देश में यह वृद्धि लगभग 36% है। 2011 के बाद से केरल में वृद्ध जनसंख्या का अनुपात राष्ट्रीय औसत से लगातार 4–8 प्रतिशत अंक अधिक रहा है। कम प्रजनन दर, उच्च जीवन प्रत्याशा और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं इस प्रवृत्ति के प्रमुख कारण हैं, जिससे वृद्धावस्था एक दीर्घकालिक नीतिगत चुनौती बन गई है।
यह बजट केरल पर बढ़ते वित्तीय दबाव को भी उजागर करता है। जैसे-जैसे वरिष्ठ नागरिकों की संख्या बढ़ती है, पेंशन और स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च भी लगातार बढ़ता जाता है। बजट का बड़ा हिस्सा अनिवार्य पेंशन भुगतान में बंधा होने से नई वृद्धजन-केंद्रित योजनाओं के लिए राज्य के पास सीमित गुंजाइश बचती है। विशेषज्ञ इसे एक डेटा-आधारित कदम मानते हैं, जो भविष्य की वित्तीय देनदारियों के पैमाने को सामने लाता है और पेंशन सुधार, वृद्धजन स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार तथा सामुदायिक देखभाल मॉडलों की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
वृद्धजन बजट केवल केरल तक सीमित महत्व नहीं रखता। भारत के कई अन्य राज्य भी धीरे-धीरे वृद्ध समाज की ओर बढ़ रहे हैं। केरल का यह मॉडल अन्य राज्यों को भी वरिष्ठ नागरिकों पर होने वाले खर्च को अलग से ट्रैक करने के लिए प्रेरित कर सकता है। शासन और नीति निर्माण के दृष्टिकोण से, वृद्धजन बजट साक्ष्य-आधारित नीतियों, कल्याण योजनाओं के बेहतर लक्ष्यीकरण और दीर्घकालिक योजना निर्माण को मजबूती प्रदान करता है।
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