हर वर्ष ओडिशा के पुरी शहर में एक विशेष उत्सव का आयोजन होता है, जिसमें भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा की पूजा की जाती है। वर्ष 2025 में यह उत्सव 11 जून को स्नान पूर्णिमा से शुरू हुआ है और 5 जुलाई तक चलेगा, जब प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा आयोजित की जाएगी। यह पर्व न केवल भारत से, बल्कि दुनिया भर से लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है।
स्नान पूर्णिमा वह दिन होता है जब भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा को मंदिर से बाहर लाकर आम दर्शन के लिए स्नान कराया जाता है। यह विशेष स्नान स्नान मंडप नामक ऊँचे मंच पर होता है और इसमें 108 कलशों से मंदिर के स्वर्ण कुएं से लाया गया पवित्र जल चढ़ाया जाता है। यह रथ यात्रा की शुरुआत का प्रतीक होता है।
स्नान यात्रा के बाद माना जाता है कि देवता शीत जल के कारण अस्वस्थ हो जाते हैं। उन्हें मंदिर के भीतर विश्राम हेतु ले जाया जाता है और लगभग 15 दिनों तक दर्शन के लिए नहीं लाया जाता। इस विश्राम काल को अनवासर कहा जाता है। भक्तों का मानना है कि इस समय देवता आरोग्य लाभ कर रहे होते हैं और रथ यात्रा की तैयारी कर रहे होते हैं।
| तिथि | आयोजन |
|---|---|
| 11 जून | स्नान पूर्णिमा (Snana Purnima) |
| 13 – 16 जून | अनवासर (देवताओं का विश्राम काल) |
| 26 जून | गुंडीचा मंदिर की सफाई (गुंडीचा मार्जन) |
| 27 जून | रथ यात्रा (भगवान की सवारी) |
| 1 जुलाई | हेरा पंचमी |
| 4 जुलाई | बहुड़ा यात्रा (वापसी यात्रा) |
| 5 जुलाई | सुना वेश (देवताओं का स्वर्णाभूषण श्रृंगार) व नीलाद्रि विजय (मुख्य मंदिर में वापसी) |
रथ यात्रा के दौरान तीनों देवता विशाल लकड़ी के रथों में सवार होकर पुरी की सड़कों पर यात्रा करते हैं। हर रथ की अलग पहचान होती है:
भगवान जगन्नाथ का रथ – 18 पहियों वाला
भगवान बलभद्र का रथ – 16 पहियों वाला
देवी सुभद्रा का रथ – 14 पहियों वाला
इन रथों को हजारों श्रद्धालु रस्सियों से खींचते हैं, जिसे बहुत पुण्यदायक माना जाता है।
जगन्नाथ रथ यात्रा की खास बात यह है कि इसमें धर्म, जाति, या देश की कोई सीमा नहीं होती। कोई भी व्यक्ति रथ खींचने में भाग ले सकता है। यह उत्सव एकता, भक्ति और आनंद का प्रतीक बन गया है।
रथ यात्रा विश्व के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में से एक है। लाखों लोग पुरी पहुंचते हैं, ताकि रथों की इस भव्य यात्रा को देख सकें। यह यात्रा पुरी की ग्रैंड रोड से होकर गुंडीचा मंदिर तक जाती है, जिसे देवताओं की मामाजी का घर कहा जाता है।
जगन्नाथ रथ यात्रा न केवल एक धार्मिक उत्सव है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत, समावेशिता और अध्यात्म का भी प्रतीक है।
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