चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से हिंदू नववर्ष की शुरुआत होती है। इस बार हिंदू नववर्ष आज यानी 09 अप्रैल से शुरू हो चुका है। इसके पीछे की मान्यता है कि देव युग में ब्रह्मा जी ने इसी दिन से सृष्टि की रचना शुरू की थी। इसीलिए इस दिन को नववर्ष के रूप में मनाया जाता है। ऐसे खास मौके पर लोग हिंदू नववर्ष की एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं।
हिंदू कैलेंडर के अनुसार, नया साल चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को शुरू होता है। इस नववर्ष को देशभर में अलग-अलग नामों से भी जाना जाता है। महाराष्ट्र में मुख्य रूप से हिंदू नववर्ष को नव-सवंत्सर भी कहा जाता है तो कहीं इसे गुड़ी पड़वा के रूप में मनाते हैं। दक्षिणी राज्यों में इसे उगादी कहते हैं।
मान्यता है कि इसी तिथि पर ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी। इसी दिन से विक्रम संवत के नए साल की शुरुआत होती है। धरती के अपनी धूरी पर घुमने और धरती के सूर्य का एक चक्कर लगाने के बाद जब दूसरा चक्र प्रारंभ होता है तभी हिंदू नववर्ष मनाया जाता है। इस दिन गुड़ी पड़वा, उगादी और चैत्र नवरात्रि का त्योहार मनाया जाता है।
नव संवत्सर के दिन घरों में रंगोलियां बनाई जाती हैं। साथ ही कई तरह के पकवान बनते हैं। बहरहाल नव संवत्सर के दिन की शुरुआत अनुष्ठानिक तेल-स्नान और उसके बाद प्रार्थना से होती है। इस दिन तेल स्नान और नीम के पत्ते खाना शास्त्रों द्वारा सुझाए गए आवश्यक अनुष्ठान हैं। उत्तर भारतीय गुड़ी पड़वा नहीं मनाते हैं बल्कि उसी दिन से नौ दिवसीय चैत्र नवरात्रि पूजा शुरू करते हैं और नवरात्रि के पहले दिन मिश्री के साथ नीम भी खाते हैं। इन दिनों पूजा-पाठ, व्रत किया जाता है और घरों में पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं। साथ ही पारंपरिक नृत्य, गीत, संगीत आदि के कार्यक्रम होते हैं।
हिंदू नव वर्ष की तारीख निश्चित न होने का कारण यह है कि यह भारतीय संस्कृति की नक्षत्रों और कालगणना आधारित प्रणाली पर तय होता है। इसका निर्धारण पंचांग गणना प्रणाली यानी तिथियों के आधार पर सूर्य की पहली किरण के उदय के साथ होता है, जो प्रकृति के अनुरूप है। यह पतझड़ की विदाई और नई कोंपलों के आने का समय होता है। इस समय वृक्षों पर फूल नजर आने लगते हैं जैसे प्रकृति किसी बदलाव की खुशी मना रही है।
भारतीय नववर्ष यानी हिंदू नववर्ष, भारतीय राष्ट्रीय पंचांग या भारत के राष्ट्रीय कैलेंडर का पहला दिन होता है, जो शक संवत पर आधारित है। भारत सरकार ने सिविल कामकाज के लिए इसे ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ-साथ 22 मार्च 1957 (भारांग: 1 चैत्र 1879) को अपनाया था। इसमें चंद्रमा की कला (घटने और बढ़ने) के अनुसार महीने के दिनों की संख्या निर्धारित होती है।
यह न केवल एक नया साल है, बल्कि यह नवीनता, समृद्धि और उम्मीद का भी प्रतीक है। बता दें, यह नया साल नए लक्ष्य निर्धारित करने और उन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए एक नया दृष्टिकोण अपनाने का अवसर प्रदान करता है। हिंदू नव वर्ष न केवल एक नया साल है, बल्कि यह आत्म-चिंतन और आत्म-सुधार का समय भी है। यह एक ऐसा समय है जब हम अपने पिछले वर्ष के कार्यों पर विचार करते हैं और आने वाले वर्ष के लिए नए लक्ष्य निर्धारित करते हैं। यह एक ऐसा समय भी है जब हम अपने परिवार और दोस्तों के साथ मिलकर नए साल की शुरुआत का जश्न मनाते हैं।
हिंदू धर्म में चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को नवसंवत की शुरुआत होती है। इसे भारतीय नववर्ष भी कहा जाता है। इसका आरंभ विक्रमादित्य ने दिया था। इसलिए इसे विक्रम संवत भी कहा जाता है। इस समय से ऋतुओं और प्रकृति में परिवर्तन भी आरंभ होता है। ऐसी मान्यताएं हैं कि इसी पवित्र मास की नवमी तिथि को प्रभु राम का भी जन्म हुआ था। इसलिए चैत्र का महीना परमफलदायी माना गया है। इसके साथ चैत्र नवरात्रि भी शुरू हो जाते हैं।
[wp-faq-schema title="FAQs" accordion=1]
भारतीय अभिनेत्री ऋतुपर्णा सेनगुप्ता को 'महिला सशक्तिकरण पुरस्कार' से सम्मानित किया गया है। उन्हें वर्ष…
अंतर्राष्ट्रीय नवरोज़ दिवस (International Nowruz Day) हर वर्ष 21 मार्च को मनाया जाता है। यह…
विश्व हिमनद दिवस 2026 हर वर्ष 21 मार्च को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य पृथ्वी…
फरवरी 2026 में भारत के आठ प्रमुख उद्योगों के सूचकांक (Index of Eight Core Industries…
अंतर्राष्ट्रीय नस्लीय भेदभाव उन्मूलन दिवस हर वर्ष 21 मार्च को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य…
हाल ही में The Lancet Global Health में प्रकाशित एक अध्ययन में चेतावनी दी गई…