अंतर्राष्ट्रीय नस्लीय भेदभाव उन्मूलन दिवस हर वर्ष 21 मार्च को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य विश्वभर में समानता को बढ़ावा देना और नस्लवाद के खिलाफ संघर्ष को मजबूत करना है। यह दिन 1960 के शार्पविल नरसंहार की दुखद घटना की स्मृति में मनाया जाता है, जिसमें दक्षिण अफ्रीका में 69 शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की हत्या कर दी गई थी। इस दिवस की स्थापना United Nations द्वारा की गई थी और यह वैश्विक स्तर पर नस्लीय भेदभाव के खिलाफ ठोस कदम उठाने की आवश्यकता को उजागर करता है।
इस दिवस की उत्पत्ति शार्पविल नरसंहार से जुड़ी है, जो नस्लीय भेदभाव के खिलाफ वैश्विक संघर्ष में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। 21 मार्च 1960 को दक्षिण अफ्रीकी पुलिस ने अपार्थाइड (रंगभेद) कानूनों के विरोध में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों पर गोली चला दी। इस घटना ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया और नस्लीय भेदभाव की क्रूरता को उजागर किया। इसके बाद यह घटना नस्लवाद के खिलाफ प्रतिरोध का प्रतीक बन गई और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रंगभेद को समाप्त करने के लिए दबाव बढ़ा।
United Nations ने इस दिवस की स्थापना वैश्विक स्तर पर नस्लवाद के खिलाफ कार्रवाई को प्रोत्साहित करने और समानता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की है। यह देशों से अपील करता है कि वे ऐसे कानून और नीतियाँ अपनाएँ जो भेदभाव को समाप्त करें और मानवाधिकारों की रक्षा करें। इस दिशा में एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय ढांचा सभी प्रकार के नस्लीय भेदभाव के उन्मूलन पर अंतर्राष्ट्रीय अभिसमय (ICERD) है, जिसे 1965 में अपनाया गया था। यह देशों को नस्लीय असमानता से निपटने और सभी के लिए समान व्यवहार सुनिश्चित करने के लिए कानूनी आधार प्रदान करता है।
सभी प्रकार के नस्लीय भेदभाव के उन्मूलन पर अंतर्राष्ट्रीय अभिसमय (ICERD) नस्लीय भेदभाव को समाप्त करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय ढांचों में से एक है। यह देशों को सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों में भेदभाव रोकने के लिए सक्रिय कदम उठाने के लिए बाध्य करता है। यह समझौता समानता, सामाजिक न्याय और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर विशेष जोर देता है। समय के साथ इसे अधिकांश देशों द्वारा अपनाया गया है, जो वैश्विक स्तर पर नस्लवाद के खिलाफ मजबूत प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
डरबन घोषणा और कार्य कार्यक्रम (2001) नस्लवाद, विदेशी-विरोध (Xenophobia) और असहिष्णुता के खिलाफ एक वैश्विक रणनीति के रूप में कार्य करता है। यह घोषणा दासता और उपनिवेशवाद जैसी ऐतिहासिक अन्यायों को वर्तमान असमानताओं का मूल कारण मानती है। इस ढांचे के तहत कई महत्वपूर्ण सुधार हुए, जैसे भेदभाव विरोधी कानूनों का निर्माण, राष्ट्रीय कार्य योजनाओं का विकास और जागरूकता फैलाने के लिए संस्थानों की स्थापना, जिससे समाज में समानता और न्याय को बढ़ावा मिला।
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