बजट FY27 में वित्तीय अनुशासन का संदेश देने के बावजूद बांड बाजार में दबाव के संकेत साफ दिखाई दे रहे हैं। केंद्र सरकार की ओर से बाजार से ₹17.2 लाख करोड़ की बड़ी उधारी की योजना ने निवेशकों की क्षमता और सरकारी प्रतिभूतियों की आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। बढ़ती यील्ड और बाजार की बेचैनी यह दर्शाती है कि बांड बाजार को स्थिर रखना आसान नहीं होगा। महामारी के बाद ऊंचे बने हुए ऋण स्तरों के बीच अब यह सवाल अहम हो गया है कि क्या स्थिति को संभालने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक को हस्तक्षेप करना पड़ेगा।
खर्च पर नियंत्रण के प्रयासों के बावजूद सरकार ने FY27 के लिए ₹17.2 लाख करोड़ की सकल बाजार उधारी का प्रावधान किया है, जो FY26 के बजट अनुमान से लगभग 16% अधिक है। FY26 में ही बांड बाजार को ₹14.82 लाख करोड़ की उधारी समाहित करने में कठिनाई हुई थी। आपूर्ति में इस तेज बढ़ोतरी ने बांड की कीमतों पर दबाव डाला है और यील्ड को ऊपर की ओर धकेला है। निवेशकों के लिए, मांग के अनुरूप आपूर्ति न बढ़ने से पूंजी हानि का डर पैदा होता है, जिससे उधारी कार्यक्रम और चुनौतीपूर्ण बन जाता है।
कोविड-19 के दौरान भारत का सार्वजनिक ऋण तेजी से बढ़ा और उच्च पूंजीगत व्यय तथा लगातार बने हुए राजस्व खर्च के कारण यह अब भी ऊंचा बना हुआ है। सितंबर 2025 तक केंद्र सरकार की बकाया दिनांकित प्रतिभूतियां ₹121.37 लाख करोड़ तक पहुंच गईं, जबकि राज्यों की प्रतिभूतियां ₹67.21 लाख करोड़ रहीं। यह सितंबर 2019 की तुलना में लगभग दोगुना है, जब केंद्र की उधारी ₹63.14 लाख करोड़ थी। इसके बाद से केंद्र की उधारी 11.5% की चक्रवृद्धि वार्षिक दर से बढ़ी है, जबकि राज्यों की उधारी और भी तेज 13.8% CAGR से बढ़ी है।
बांड बाजार आपूर्ति और मांग के संतुलन के प्रति अत्यंत संवेदनशील होता है। जब सरकार की उधारी तेज़ी से बढ़ती है और मांग उसी अनुपात में नहीं बढ़ती, तो यील्ड में बढ़ोतरी स्वाभाविक हो जाती है। ऊंची यील्ड से सरकार की उधारी लागत बढ़ती है और इसका असर कॉरपोरेट बांड, बैंक ऋण दरों और आवास ऋण पर भी पड़ता है। मौजूदा बेचैनी इस आशंका को दर्शाती है कि घरेलू संस्थान इतनी बड़ी आपूर्ति को बिना यील्ड में तेज उछाल के शायद समाहित न कर पाएं, जिससे अर्थव्यवस्था में पूंजी की लागत बढ़ सकती है।
ऐसी परिस्थितियों में बाजार अक्सर केंद्रीय बैंक से समर्थन की उम्मीद करता है। भारतीय रिज़र्व बैंक खुले बाजार परिचालन (OMO), तरलता प्रवाह या द्वितीयक बाजार में खरीद के जरिए बांड बाजार में उतार-चढ़ाव को कम कर सकता है। हालांकि RBI की प्राथमिकता महंगाई नियंत्रण है, लेकिन अगर बांड बाजार में अत्यधिक तनाव बना रहता है तो यह वित्तीय स्थिरता के लिए जोखिम बन सकता है। FY27 में महंगाई प्रबंधन और बांड बाजार स्थिरता के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी नीतिगत चुनौती होगा।
भारत की ऋण वृद्धि वैश्विक रुझान का ही हिस्सा है। महामारी के बाद प्रोत्साहन पैकेज, भू-राजनीतिक तनाव और कमजोर वैश्विक विकास ने दुनियाभर की सरकारों को अधिक उधारी के लिए मजबूर किया है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अनुसार, वैश्विक सार्वजनिक ऋण 2025 के अंत तक 100 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो सकता है। यह संदर्भ कुछ हद तक राहत देता है, लेकिन भारत जैसे उभरते बाजार अब भी पूंजी प्रवाह में उतार-चढ़ाव और वैश्विक ब्याज दरों की चाल के प्रति संवेदनशील बने हुए हैं।
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