भारतीय संविधान का अनुच्छेद 224A उच्च न्यायालयों में अस्थायी (ऐड-हॉक) न्यायाधीशों के रूप में सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित है। यह प्रावधान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को यह अधिकार देता है कि वह राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश को अस्थायी रूप से उच्च न्यायालय में कार्य करने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं। ऐसे ऐड-हॉक न्यायाधीशों को राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित भत्ते प्राप्त होते हैं और उनके पास कार्यकाल के दौरान उच्च न्यायालय के स्थायी न्यायाधीशों के समान अधिकार, शक्तियाँ और विशेषाधिकार होते हैं, लेकिन उन्हें स्थायी न्यायाधीश नहीं माना जाता।
यह प्रावधान न्यायिक रिक्तियों और उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों की समस्या को हल करने के लिए बनाया गया है ताकि न्यायपालिका की सुचारु कार्यप्रणाली बनी रहे। हाल ही में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 224A के कार्यान्वयन से संबंधित महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण और संशोधन किए हैं, विशेष रूप से अप्रैल 2021 के अपने निर्णय के संदर्भ में।
अनुच्छेद 224A के प्रमुख प्रावधान
नियुक्ति प्रक्रिया
अनुच्छेद 224A कहता है:
“किसी राज्य के लिए उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से, किसी ऐसे व्यक्ति से जो उस न्यायालय या किसी अन्य उच्च न्यायालय में न्यायाधीश रह चुका हो, उस राज्य के उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में कार्य करने का अनुरोध कर सकता है। ऐसे व्यक्ति को, जब वह उच्च न्यायालय में कार्य करेगा, राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित भत्ते प्राप्त होंगे और उसके पास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान अधिकार, शक्तियाँ और विशेषाधिकार होंगे, लेकिन उसे अन्यथा उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नहीं माना जाएगा।”
यह प्रावधान उच्च न्यायालयों को अनुभवी सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को अस्थायी रूप से नियुक्त करने की अनुमति देता है ताकि न्यायिक प्रणाली में लंबित मामलों को प्रभावी ढंग से निपटाया जा सके।
सुप्रीम कोर्ट का अप्रैल 2021 का निर्णय
अनुच्छेद 224A लागू करने की शर्तें
अप्रैल 2021 के एक निर्णय में, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 224A को लागू करने के लिए यह आवश्यक नहीं होगा कि न्यायिक रिक्तियाँ 20% से अधिक हों। अदालत ने कहा कि ऐड-हॉक न्यायाधीशों की नियुक्ति उच्च न्यायालय की कार्यक्षमता और लंबित मामलों की स्थिति के आधार पर की जानी चाहिए।
ऐड-हॉक न्यायाधीशों की संख्या
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि अनुच्छेद 224A के तहत प्रत्येक उच्च न्यायालय में नियुक्त ऐड-हॉक न्यायाधीशों की संख्या आमतौर पर दो से पाँच के बीच होनी चाहिए, जो न्यायालय की आवश्यकताओं के अनुसार तय होगी। यह सुनिश्चित करने के लिए किया गया कि अस्थायी न्यायाधीशों की नियुक्ति संतुलित और न्यायिक प्रणाली की जरूरतों के अनुरूप हो।
सुप्रीम कोर्ट के हालिया संशोधन (अक्टूबर 2023)
20% रिक्ति सीमा का संशोधन
सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने 12 अक्टूबर 2023 को अप्रैल 2021 के अपने निर्देशों में संशोधन किया। इस संशोधन के अनुसार, उच्च न्यायालय अब अनुच्छेद 224A के तहत ऐड-हॉक न्यायाधीशों की नियुक्ति करने के लिए 20% न्यायिक रिक्तियों की सीमा का इंतजार नहीं करेंगे। इसके बजाय, नियुक्त ऐड-हॉक न्यायाधीशों की संख्या उच्च न्यायालय की स्वीकृत शक्ति (sanctioned strength) के 10% से अधिक नहीं होनी चाहिए।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि अप्रैल 2021 के निर्णय के पैराग्राफ 43, 54, और 55, जो 20% रिक्ति आवश्यकता से संबंधित थे, को निलंबित रखा जाए। यह परिवर्तन न्यायालयों में कार्यभार और लंबित मामलों को देखते हुए लचीलापन प्रदान करने के लिए किया गया।
पीठों (Benches) की संरचना
अप्रैल 2021 के निर्णय में उच्च न्यायालयों को केवल ऐड-हॉक न्यायाधीशों वाली खंडपीठ (Division Bench) बनाने की अनुमति दी गई थी ताकि पुराने मामलों को सुलझाया जा सके। हालाँकि, अक्टूबर 2023 के संशोधन में कहा गया कि ऐड-हॉक न्यायाधीशों को उच्च न्यायालय के किसी स्थायी न्यायाधीश के साथ ही पीठ में बैठना होगा। यह सुनिश्चित करने के लिए किया गया कि ऐड-हॉक न्यायाधीशों का अनुभव और स्थायी न्यायाधीशों की विशेषज्ञता मिलकर लंबित आपराधिक अपीलों और अन्य मामलों को प्रभावी ढंग से निपटा सके।
नियुक्तियों की प्रक्रिया (Memorandum of Procedure – MoP)
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 224A के तहत ऐड-हॉक न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर (MoP) का पालन किया जाना चाहिए। MoP नियुक्ति प्रक्रिया को पारदर्शी और व्यवस्थित बनाए रखने के लिए एक दिशानिर्देश प्रदान करता है, जिससे न्यायिक प्रणाली की निष्पक्षता और अखंडता बनी रहे।
अनुच्छेद 224A का महत्व और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का प्रभाव
न्यायिक रिक्तियों और लंबित मामलों का समाधान
अनुच्छेद 224A के तहत ऐड-हॉक न्यायाधीशों की नियुक्ति उच्च न्यायालयों में न्यायिक रिक्तियों और लंबित मामलों की समस्या का समाधान करने के लिए एक महत्वपूर्ण उपाय है। अनुभवी सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की सहायता से मामलों के त्वरित निपटारे को सुनिश्चित किया जा सकता है, जिससे न्यायालयों की कार्यक्षमता बनी रहे।
लचीलापन और संतुलन बनाए रखना
सुप्रीम कोर्ट के हालिया स्पष्टीकरणों ने उच्च न्यायालयों को ऐड-हॉक न्यायाधीशों की नियुक्ति में अधिक लचीलापन प्रदान किया है। यह सुनिश्चित किया गया कि नियुक्तियों की संख्या न्यायालय की आवश्यकताओं के अनुरूप हो और न्यायिक प्रणाली की गुणवत्ता और अखंडता बनी रहे।
न्यायपालिका को सशक्त बनाना
ऐड-हॉक न्यायाधीशों की नियुक्ति सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के बहुमूल्य अनुभव और विशेषज्ञता को न्यायिक प्रणाली में लाने का एक प्रभावी तरीका है। ये न्यायाधीश विशेष रूप से जटिल और लंबे समय से लंबित मामलों के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिससे न्यायपालिका की समग्र कार्यक्षमता और मजबूती सुनिश्चित होती है।