मकर संक्रांति 2026: तारीख, महत्व और रीति-रिवाज विस्तार से

मकर संक्रांति 2026 बुधवार, 14 जनवरी को मनाई जाएगी। यह हिंदू पंचांग की एक महत्वपूर्ण सौर घटना है, जब सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है। इसके साथ ही शीत ऋतु का अंत और दिनों के लंबे होने की शुरुआत मानी जाती है। देशभर में यह पर्व स्नान, दान, पूजा और फसल उत्सव के रूप में मनाया जाता है।

क्यों चर्चा में?

मकर संक्रांति 2026 की तिथि को लेकर 14 या 15 जनवरी को लेकर भ्रम था। खगोलीय गणनाओं के अनुसार सूर्य का मकर राशि में प्रवेश 14 जनवरी 2026 को दोपहर 3:13 बजे होगा, इसलिए इसी दिन पर्व मनाया जाएगा।

मकर संक्रांति 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त

  • तिथि: बुधवार, 14 जनवरी 2026
  • संक्रांति क्षण: दोपहर 3:13 बजे
  • शुभ समय: दोपहर के बाद का समय दान, स्नान और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है।

महत्व और परंपराएँ

मकर संक्रांति 2026 में 14 जनवरी को मनाई जाएगी। पारंपरिक पंचांगों के अनुसार इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है। दोपहर के बाद का समय सबसे शुभ माना जाता है, जो दान-पुण्य, धार्मिक अनुष्ठान और आध्यात्मिक गतिविधियों के लिए विशेष रूप से उपयुक्त होता है।

मुख्य शुभ समय (दृक पंचांग के अनुसार)

  • मकर संक्रांति क्षण: दोपहर 3:13 बजे
  • पुण्य काल: दोपहर 3:13 बजे से शाम 5:45 बजे तक
  • महापुण्य काल: दोपहर 3:13 बजे से शाम 4:58 बजे तक

मकर संक्रांति का इतिहास और महत्व

मकर संक्रांति उन गिने-चुने हिंदू पर्वों में से एक है जो सौर कैलेंडर पर आधारित हैं, इसलिए इसकी तिथि हर वर्ष लगभग स्थिर रहती है। यह पर्व उत्तरायण का प्रतीक है, जब सूर्य अपनी उत्तर दिशा की यात्रा प्रारंभ करता है, जिसे अत्यंत शुभ माना जाता है। परंपरागत रूप से यह काल प्रकाश, सकारात्मकता, नवचेतना और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक है, साथ ही यह नए कृषि चक्र की शुरुआत को भी दर्शाता है।

भारत के विभिन्न राज्यों में मकर संक्रांति के नाम

मकर संक्रांति भारत के अलग-अलग राज्यों में विभिन्न नामों से मनाई जाती है। ये नाम वहाँ की संस्कृति, जलवायु और परंपराओं को प्रतिबिंबित करते हैं। कहीं यह फसल उत्सव के रूप में मनाई जाती है तो कहीं धार्मिक और सामाजिक पर्व के रूप में, जो भारत की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाता है।

1) उत्तर और मध्य भारत

माघी (Maghi)
पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के कुछ हिस्सों में मकर संक्रांति को माघी के रूप में मनाया जाता है। लोग अलाव जलाकर उसके चारों ओर एकत्र होते हैं, लोकगीत गाते हैं और फसल उत्सव को मिलकर मनाते हैं।

लोहड़ी (Lohri)
लोहड़ी मुख्य रूप से पंजाब और हरियाणा में मकर संक्रांति से एक रात पहले मनाई जाती है। यह कड़ाके की सर्दी के अंत का प्रतीक है। इस अवसर पर लोग पारंपरिक गीत गाते हैं और तिल, गुड़, मूंगफली व पॉपकॉर्न बाँटते हैं, जो गर्माहट और कृतज्ञता का प्रतीक माने जाते हैं।

खिचड़ी पर्व (Khichdi Parv)
उत्तर प्रदेश और बिहार में इस पर्व को खिचड़ी पर्व कहा जाता है। इस दिन अन्न, वस्त्र और भोजन का दान किया जाता है तथा खिचड़ी बनाकर देवताओं को अर्पित की जाती है।

2) पश्चिमी भारत

उत्तरायण (Uttarayan)
गुजरात और राजस्थान में मकर संक्रांति को उत्तरायण कहा जाता है, जो सूर्य के उत्तर दिशा की ओर गमन को दर्शाता है। पतंग उड़ाना इस पर्व का मुख्य आकर्षण है। तिल और गुड़ से बनी मिठाइयाँ विशेष रूप से बनाई जाती हैं।

मकर संक्रांति (Maharashtra)
महाराष्ट्र में लोग तिल-गुड़ का आदान-प्रदान करते हैं और एक-दूसरे से कहते हैं – “तिळगुळ घ्या, गोड गोड बोला”, जो आपसी मधुरता और सौहार्द का संदेश देता है।

3) दक्षिण भारत

पोंगल (Pongal)
तमिलनाडु में मकर संक्रांति को पोंगल के रूप में चार दिनों तक मनाया जाता है। नई फसल के चावल से पोंगल पकाकर सूर्य देव को अर्पित किया जाता है, जो समृद्धि और आभार का प्रतीक है।

संक्रांति (Karnataka)
कर्नाटक में किसान संक्रांति के अवसर पर तिल-गुड़ की मिठाइयाँ और गन्ना एक-दूसरे के साथ बाँटते हैं। यह पर्व खुशी, भाईचारे और सामूहिक उत्सव का प्रतीक है।

4) पूर्वी भारत

माघ बिहू (Magh Bihu)
असम में मकर संक्रांति को माघ बिहू कहा जाता है। इस अवसर पर लोग सामूहिक रूप से पारंपरिक भोजन बनाते हैं, भोज का आयोजन करते हैं और नई फसल का उत्सव मनाते हैं।

मकर संक्रांति (पश्चिम बंगाल)
पश्चिम बंगाल में इस दिन पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। श्रद्धालु गंगासागर में पवित्र स्नान करते हैं, जबकि घरों में चावल के आटे, खजूर के गुड़ और नारियल से बनी मिठाइयाँ तैयार की जाती हैं।

मकर संक्रांति क्यों मनाई जाती है?

मकर संक्रांति प्रकृति और सूर्य देव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पर्व है। यह सफल फसल के लिए धन्यवाद देने और जीवन में समृद्धि की कामना करने का अवसर माना जाता है। यह त्योहार अंधकार पर प्रकाश की और अज्ञान पर ज्ञान की विजय का प्रतीक भी है। मान्यता है कि इस दिन किए गए पुण्य कर्म, दान और सेवा से दीर्घकालिक आध्यात्मिक पुण्य और सकारात्मक कर्मफल प्राप्त होता है, इसलिए मकर संक्रांति को दान-पुण्य और सामाजिक सेवा के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।

रीति-रिवाज और उत्सव

मकर संक्रांति के दिन लोग प्रातःकाल जल्दी उठकर गंगा, गोदावरी जैसी पवित्र नदियों में स्नान करते हैं। इसके बाद विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और जरूरतमंदों को दान दिया जाता है। तिल और गुड़ से बनी मिठाइयाँ तैयार की जाती हैं, जो आपसी एकता, मधुरता और गर्माहट का प्रतीक हैं। कई क्षेत्रों में पतंग उड़ाना, लोक नृत्य और फसल से जुड़े उत्सव इस पर्व को और भी उल्लासपूर्ण बना देते हैं।

आंध्र प्रदेश ने नेल्लोर में दगदार्थी ग्रीनफील्ड हवाई अड्डे को मंजूरी दी

आंध्र प्रदेश के विमानन और औद्योगिक अवसंरचना को महत्वपूर्ण बढ़ावा देते हुए राज्य मंत्रिमंडल ने नेल्लोर जिले में दगदार्थी ग्रीनफील्ड हवाई अड्डे को मंजूरी दी है। इस मंजूरी के साथ दगदार्थी आंध्र प्रदेश का आठवां हवाई अड्डा बन जाएगा, जो राज्य के भविष्य के लिए तैयार, बहु-मार्गीय परिवहन और औद्योगिक नेटवर्क के निर्माण के दृष्टिकोण को मजबूत करेगा।

परियोजना का स्थान और रणनीतिक महत्व

दगदार्थी हवाई अड्डा रणनीतिक रूप से ऐसी जगह पर स्थित है कि यह राष्ट्रीय राजमार्गों, दो बड़े बंदरगाह – कृष्णापत्तनम पोर्ट और रामयापत्तनम पोर्ट और कई औद्योगिक क्षेत्रों जैसे केआरआईएस सिटी और आईएफएफसीओ एसईजेड से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।

परियोजना की स्वीकृति और विकास मॉडल

इस खास स्थानिक लाभ की वजह से यह हवाई अड्डा दक्षिण आंध्र प्रदेश में फैक्टरी, निर्यात, कृषि-परिवहन और सेवा क्षेत्र के विकास को बढ़ावा देने में बहुत महत्वपूर्ण साबित होगा।

इस परियोजना को पहले ही भारत सरकार के नागर विमानन मंत्रालय से मौलिक मंजूरी मिल चुकी है। परियोजना के विकास, संचालन और रखरखाव के लिए निजी कंपनियों से प्रस्ताव मांगा गया है।

आर्थिक और क्षेत्रीय प्रभाव

दगदार्थी ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट को क्षेत्रीय परिवर्तन के एक बड़े माध्यम के रूप में देखा जा रहा है। इससे—

  • लॉजिस्टिक्स लागत में कमी आएगी,
  • उद्योग और वेयरहाउसिंग में नए निवेश आकर्षित होंगे,
  • विमानन और संबद्ध क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे,
  • और आंध्र प्रदेश एक प्रमुख व्यापार व निर्यात गंतव्य के रूप में और मजबूत होगा।

कुल मिलाकर, यह परियोजना राज्य को बेहतर वैश्विक कनेक्टिविटी प्रदान करते हुए दीर्घकालिक आर्थिक विकास को गति देने वाली साबित होगी।

ICAR और NDDB ने डेयरी रिसर्च को मज़बूत करने के लिए रणनीतिक गठबंधन किया

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) ने 12 जनवरी 2026 को डेयरी अनुसंधान, नवाचार और विस्तार को मजबूत करने के लिए एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते का उद्देश्य शोध और जमीनी स्तर के कार्यान्वयन के बीच मजबूत तालमेल स्थापित कर लाखों दुग्ध किसानों को सीधे लाभ पहुंचाना है, जिससे उत्पादकता, जलवायु-लचीलापन और मूल्य संवर्धन को बढ़ावा मिल सके।

क्यों चर्चा में?

जनवरी 2026 में ICAR और NDDB के बीच एक MoU पर हस्ताक्षर किए गए, जिसका लक्ष्य डेयरी अनुसंधान एवं विकास में सहयोग को गहरा करना है। यह साझेदारी वैज्ञानिक अनुसंधान को जमीनी स्तर पर लागू करने पर केंद्रित है, ताकि भारत के डेयरी क्षेत्र को सशक्त बनाया जा सके।

ICAR-NDDB MoU के बारे में

  • यह MoU ICAR की वैज्ञानिक विशेषज्ञता और NDDB के व्यापक फील्ड-स्तरीय अनुभव को एक साथ लाता है।
  • यह उत्पादन, प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन सहित पूरी डेयरी मूल्य श्रृंखला को कवर करता है।
  • समझौते में बहुविषयक अनुसंधान, प्रौद्योगिकी सत्यापन और क्षमता निर्माण पर जोर दिया गया है।
  • प्रयोगशाला आधारित शोध को वास्तविक खेत परिस्थितियों से जोड़कर यह सुनिश्चित किया जाएगा कि नवाचार किसानों तक प्रभावी रूप से पहुंचें।
  • साथ ही, पशुधन उत्पादकता, जलवायु लचीलापन और सतत डेयरी विकास से जुड़ी उभरती चुनौतियों को दीर्घकालिक और संरचित ढंग से संबोधित किया जाएगा।

किसानों और जमीनी विकास पर फोकस

  • MoU का एक प्रमुख उद्देश्य दुग्ध किसानों को सशक्त बनाना है, जो भारत की दुग्ध अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं।
  • यह साझेदारी अनुसंधान परिणामों को व्यावहारिक फील्ड-स्तरीय समाधानों में बदलने पर केंद्रित है।
  • किसानों, शोधकर्ताओं और पेशेवरों के लिए संयुक्त प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
  • उत्पादकता, लाभप्रदता और स्थिरता को जमीनी स्तर पर सुधारने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
  • मजबूत विस्तार सेवाओं और ज्ञान साझाकरण के माध्यम से वैज्ञानिक प्रगति को सीधे किसानों की आय और आजीविका से जोड़ा जाएगा, विशेषकर देश के विविध कृषि-जलवायु क्षेत्रों में।

अनुसंधान, नवाचार और प्रौद्योगिकी एकीकरण

  • यह सहयोग संस्थागत सीमाओं को तोड़ते हुए एकीकृत और पूरक अनुसंधान को बढ़ावा देता है।
  • मुख्य फोकस क्षेत्रों में जलवायु-अनुकूल पशुधन प्रणाली, चारा विकास, कम उत्पादकता की चुनौतियां और मूल्य श्रृंखला सुदृढ़ीकरण शामिल हैं।
  • ICAR के अनुसंधान संस्थान आधुनिक तकनीकें प्रदान करेंगे, जबकि NDDB बड़े पैमाने पर फील्ड परीक्षण और अपनाने में सहयोग करेगा।
    बेहतर आहार प्रबंधन, गोबर-खाद प्रबंधन, बायोगैस उपयोग और एकीकृत कृषि प्रणालियों जैसे नवाचार-आधारित समाधान प्राथमिकता में रहेंगे।
  • यह दृष्टिकोण सुनिश्चित करता है कि शोध मांग-आधारित हो और किसानों की वास्तविक समस्याओं के अनुरूप हो।

नेतृत्व और दीर्घकालिक दृष्टि

  • दोनों संस्थानों के शीर्ष नेतृत्व ने इस साझेदारी की दीर्घकालिक दृष्टि को रेखांकित किया।
  • मंगी लाल जाट ने एकीकृत कृषि प्रणाली, चारा सुरक्षा और गोशाला-आधारित खाद प्रबंधन जैसे सतत समाधानों की आवश्यकता पर बल दिया।
  • मीनेश शाह ने इस MoU को दुनिया के सबसे बड़े एकीकृत डेयरी अनुसंधान मंचों में से एक बनने की क्षमता वाला बताया।
  • यह साझा दृष्टि ‘विकसित भारत’ के राष्ट्रीय लक्ष्य के अनुरूप है, जिसमें बड़े पैमाने पर लागू किए जा सकने वाले और दोहराए जा सकने वाले मॉडल पर जोर है।

क्षमता निर्माण और ज्ञान साझाकरण

  • मानव संसाधन विकास इस MoU का एक प्रमुख स्तंभ है।
  • समझौते के तहत वैज्ञानिकों, विस्तार कर्मियों और किसानों के लिए संयुक्त प्रशिक्षण, कार्यशालाएं और कौशल विकास कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
  • राशन संतुलन, खनिज मानचित्रण, एथ्नो-वेटरनरी चिकित्सा और टोटल मिक्स्ड राशन (TMR) जैसी विधियों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
  • ICAR संस्थानों और NDDB के फील्ड नेटवर्क के बीच ज्ञान साझाकरण से सर्वोत्तम प्रथाओं का मानकीकरण संभव होगा।
  • इस निरंतर सीखने की व्यवस्था से संस्थागत क्षमताएं मजबूत होंगी और डेयरी क्षेत्र की समग्र दक्षता में सुधार आएगा।

ICAR और NDDB की पृष्ठभूमि

  • ICAR भारत की कृषि अनुसंधान और शिक्षा की शीर्ष संस्था है।
  • NDDB भारत के डेयरी विकास, विशेष रूप से श्वेत क्रांति, की प्रमुख संस्था रही है।
  • दोनों संस्थानों ने पहले भी पोषण, उत्पादकता और डेयरी मिशनों में सहयोग किया है, जिससे यह MoU उनके साझा विरासत का स्वाभाविक विस्तार बनता है।

APAAR ID निर्माण में छत्तीसगढ़ सबसे आगे

छत्तीसगढ़ ने डिजिटल शिक्षा व्यवस्था को सशक्त करने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। राज्य ने छात्रों के लिए APAAR ID निर्माण में देश के बड़े राज्यों में अग्रणी स्थान प्राप्त किया है। जनवरी 2026 की शुरुआत तक लगभग 89 प्रतिशत कवरेज हासिल कर छत्तीसगढ़ ने यह दिखाया है कि मजबूत प्रशासनिक समन्वय और समयबद्ध कार्यान्वयन के जरिए राष्ट्रीय शिक्षा सुधारों को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सकता है।

क्यों चर्चा में?

छत्तीसगढ़ APAAR (Automated Permanent Academic Account Registry) ID बनाने में देश का शीर्ष प्रदर्शन करने वाला बड़ा राज्य बनकर उभरा है। राज्य ने 88 प्रतिशत से अधिक नामांकित छात्रों को कवर कर लिया है और केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित समयसीमा की ओर तेजी से बढ़ रहा है।

APAAR ID क्या है?

  • APAAR ID छात्रों की एक स्थायी डिजिटल शैक्षणिक पहचान है।
  • इसमें छात्रों के शैक्षणिक रिकॉर्ड, उपलब्धियां, प्रमाणपत्र और क्रेडिट सुरक्षित रूप से संग्रहीत रहते हैं।
  • यह छात्रों को स्कूल, बोर्ड या राज्य बदलने पर शैक्षणिक निरंतरता सुनिश्चित करता है।
  • इससे कागजी कार्य कम, पारदर्शिता बढ़ती है और पूरे देश में शैक्षणिक गतिशीलता को समर्थन मिलता है।
  • APAAR, शिक्षा क्षेत्र में डिजिटल गवर्नेंस को मजबूत करता है और राष्ट्रीय शिक्षा सुधारों के तहत डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर की दिशा में एक अहम कदम है।

छत्तीसगढ़ का समग्र प्रदर्शन

  • छत्तीसगढ़ में 57,10,207 छात्रों (57,045 स्कूलों में नामांकित) में से 50,60,941 छात्रों के APAAR ID बनाए जा चुके हैं।
  • इस प्रकार 7 जनवरी 2026 तक राज्य ने 88.63% कवरेज हासिल कर ली है, जो इसे अन्य बड़े राज्यों से आगे रखता है।
  • यह सफलता शिक्षा विभाग, जिला प्रशासन और स्कूल स्तर के अधिकारियों के बीच बेहतर समन्वय को दर्शाती है।
  • साथ ही यह दिखाती है कि राज्य सरकार राष्ट्रीय डिजिटल शिक्षा पहलों में किसी भी छात्र को पीछे नहीं छोड़ना चाहती।

जिला-स्तरीय उपलब्धियां

छत्तीसगढ़ के कई जिलों ने शानदार प्रदर्शन किया है—

  • बेमेतरा: 96.40% (सबसे अधिक)
  • राजनांदगांव: 96.38%
  • रायगढ़, कोरिया, रायपुर, कोरबा, धमतरी, दुर्ग और बलौदाबाजार: 93% से अधिक कवरेज

नारायणपुर, बीजापुर, सुकमा, बलरामपुर और दंतेवाड़ा जैसे कुछ जिलों को छोड़कर राज्य के लगभग सभी जिलों में 80% से अधिक APAAR ID बनाए जा चुके हैं, जो राज्यव्यापी सफलता को दर्शाता है।

कार्यान्वयन रणनीति और समयसीमा

  • राज्य सरकार ने सभी जिलों में मिशन मोड में APAAR ID निर्माण को प्राथमिकता दी है।
  • शिक्षक और अधिकारी मिलकर शेष छात्रों को कवर करने के लिए लगातार कार्य कर रहे हैं।
  • केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को 31 जनवरी तक APAAR ID निर्माण पूरा करने का निर्देश दिया है, और छत्तीसगढ़ इस लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में समयबद्ध और संगठित प्रयास कर रहा है।
  • निरंतर निगरानी, जिला-वार लक्ष्य निर्धारण और प्रशासनिक सहयोग ने इस तेज़ प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

भारत और जर्मनी ने डाक, एक्सप्रेस और लॉजिस्टिक सेवाओं के लिए समझौता किया

भारत और जर्मनी ने डाक, एक्सप्रेस और लॉजिस्टिक्स सेवाओं में सहयोग बढ़ाकर द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। इन समझौतों का उद्देश्य डिलीवरी प्रणालियों का आधुनिकीकरण करना, सीमा-पार व्यापार को सुगम बनाना और भारतीय निर्यातकों को वैश्विक बाजारों से बेहतर रूप से जोड़ना है। यह साझेदारी भारत और जर्मनी के बीच कुशल, टिकाऊ और वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी लॉजिस्टिक्स नेटवर्क विकसित करने की साझा सोच को दर्शाती है।

क्यों चर्चा में?

12 जनवरी 2026 को अहमदाबाद में भारत और जर्मनी के बीच दो प्रमुख सहयोग समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। ये समझौते विशेष रूप से डाक, एक्सप्रेस और लॉजिस्टिक्स सेवाओं, खासकर सीमा-पार ई-कॉमर्स और अंतरराष्ट्रीय डिलीवरी से जुड़े हैं।

प्रमुख समझौते

  • जर्मनी के संघीय चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ की भारत यात्रा के दौरान दो महत्वपूर्ण दस्तावेजों का आदान-प्रदान हुआ।
  • भारत के डाक विभाग और जर्मनी के संघीय आर्थिक मामलों और ऊर्जा मंत्रालय के बीच संयुक्त आशय घोषणा (Joint Declaration of Intent – JDoI)
  • डाक विभाग और डॉयचे पोस्ट एजी (Deutsche Post AG) के बीच लेटर ऑफ इंटेंट (LoI)
  • ये समझौते लॉजिस्टिक्स सेवाओं में एक संरचित और दीर्घकालिक साझेदारी को औपचारिक रूप देते हैं।

सहयोग के प्रमुख क्षेत्र

इस साझेदारी में डाक, एक्सप्रेस और लॉजिस्टिक्स सेवाओं को शामिल किया गया है, जिसमें सीमा-पार ई-कॉमर्स और समय-निश्चित अंतरराष्ट्रीय डिलीवरी पर विशेष जोर है।

  • संयुक्त उत्पादों का विकास
  • नेटवर्क कनेक्टिविटी को मजबूत करना
  • अंतिम छोर (लास्ट माइल) डिलीवरी में सुधार
  • पत्रों और पार्सलों के लिए द्विपक्षीय दर व्यवस्थाओं की संभावनाओं की खोज

इसके साथ ही डिजिटलीकरण, दक्षता, स्थिरता और ग्रीन लॉजिस्टिक्स से जुड़ी सर्वोत्तम प्रथाओं के आदान-प्रदान को भी बढ़ावा दिया जाएगा।

प्रीमियम अंतरराष्ट्रीय एक्सप्रेस सेवाएं

  • इस साझेदारी का एक महत्वपूर्ण परिणाम संयुक्त प्रीमियम अंतरराष्ट्रीय एक्सप्रेस सेवाओं की शुरुआत होगी।
  • इन सेवाओं में इंडिया पोस्ट की व्यापक लास्ट-माइल पहुंच और डॉयचे पोस्ट–डीएचएल समूह की वैश्विक लॉजिस्टिक्स क्षमता को जोड़ा जाएगा।
  • इससे अंतरराष्ट्रीय शिपमेंट का ट्रांजिट समय कम होगा, विश्वसनीयता बढ़ेगी और एंड-टू-एंड ट्रैकिंग संभव होगी।

निर्यात और MSME को बढ़ावा

  • यह पहल भारत के निर्यात बढ़ाने के लक्ष्य के अनुरूप है, विशेष रूप से MSME, स्टार्टअप, कारीगरों और छोटे उत्पादकों के लिए।
  • विश्वसनीय और किफायती वैश्विक लॉजिस्टिक्स समाधान मिलने से भारतीय व्यवसायों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच आसान होगी।
  • बेहतर लॉजिस्टिक्स ढांचा निर्यात मात्रा बढ़ाने, सेवा गुणवत्ता सुधारने और भारतीय उद्यमों को वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं से जोड़ने में सहायक होगा।

राष्ट्रीय खेल प्रशासन (राष्ट्रीय खेल निकाय) नियम, 2026 की अधिसूचना

भारत ने खेल प्रशासन में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए राष्ट्रीय खेल शासन (राष्ट्रीय खेल निकाय) नियम, 2026 को अधिसूचित किया है। इन नियमों का उद्देश्य राष्ट्रीय खेल निकायों में पारदर्शिता, खिलाड़ी-केंद्रित शासन और लैंगिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है। चुनाव प्रक्रिया, पात्रता और जवाबदेही मानकों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करके सरकार खेल प्रशासन को पेशेवर बनाने और इसे वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप लाने का प्रयास कर रही है।

क्यों चर्चा में?

केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय खेल शासन अधिनियम, 2025 के प्रावधानों को लागू करने के लिए राष्ट्रीय खेल शासन (राष्ट्रीय खेल निकाय) नियम, 2026 अधिसूचित किए हैं।

नियमों का उद्देश्य और दायरा

इन नियमों में राष्ट्रीय खेल निकायों (National Sports Bodies) और क्षेत्रीय खेल महासंघों के शासन के लिए विस्तृत ढांचा प्रदान किया गया है।
इनमें सामान्य निकाय (General Body) और कार्यकारी समिति (Executive Committee) की संरचना, चुनाव प्रक्रिया और पात्रता शर्तों को परिभाषित किया गया है। मुख्य उद्देश्य एक पारदर्शी, जवाबदेह और खिलाड़ी-प्रेरित खेल पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना है तथा वैधानिक शासन व्यवस्था में सुचारु परिवर्तन सुनिश्चित करना है।

विशिष्ट उपलब्धि वाले खिलाड़ियों (SOMs) का समावेशन

एक अहम सुधार के तहत प्रत्येक राष्ट्रीय खेल निकाय की सामान्य सभा में कम से कम चार विशिष्ट उपलब्धि वाले खिलाड़ियों (Sportspersons of Outstanding Merit – SOMs) को शामिल करना अनिवार्य किया गया है। लैंगिक समानता सुनिश्चित करने के लिए इनमें से 50% महिलाएं होना आवश्यक है। पात्रता शर्तों में न्यूनतम आयु 25 वर्ष, सक्रिय खेल से सेवानिवृत्ति और प्रतिस्पर्धी खेल से एक वर्ष का कूलिंग-ऑफ अवधि शामिल है।

कार्यकारी समितियों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व

  • निर्णय-निर्माण में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए नियमों में राष्ट्रीय खेल निकायों की कार्यकारी समिति में कम से कम चार महिलाओं के प्रतिनिधित्व का प्रावधान किया गया है।
  • खेल निकाय अपने उपविधानों (Bye-laws) के माध्यम से महिलाओं के लिए विशिष्ट पद भी आरक्षित कर सकते हैं, जिससे सार्थक और स्थायी लैंगिक समावेशन सुनिश्चित हो सके।

खिलाड़ी प्रतिनिधित्व के लिए स्तरीकृत मानदंड

  • नियमों में SOMs के लिए 10-स्तरीय वर्गीकरण प्रणाली शुरू की गई है।
  • यह प्रणाली ओलंपिक और पैरालंपिक खेलों के पदक विजेताओं से लेकर राष्ट्रीय खेलों और राष्ट्रीय चैंपियनशिप में पदक जीतने वाले खिलाड़ियों तक को शामिल करती है।
  • यह लचीला और समावेशी दृष्टिकोण विभिन्न खेल विधाओं में अंतरराष्ट्रीय और घरेलू दोनों उपलब्धियों को मान्यता देता है।

पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया और अयोग्यताएं

  • नियमों में SOM आवेदन से लेकर अंतिम मतदाता सूची और नामांकन तक स्पष्ट समय-सीमा के साथ चरणबद्ध चुनाव प्रक्रिया निर्धारित की गई है।
  • इसके साथ ही सख्त अयोग्यता मानदंड भी तय किए गए हैं।
  • न्यायालय द्वारा दोषसिद्ध और कारावास की सजा पाए व्यक्ति सामान्य निकाय, कार्यकारी समिति या खिलाड़ी समिति के किसी भी पद के लिए चुनाव लड़ने या पद धारण करने के पात्र नहीं होंगे।

राष्ट्रीय खेल निर्वाचन पैनल और अनुपालन

  • नियमों के तहत राष्ट्रीय खेल निर्वाचन पैनल का प्रावधान किया गया है, जिसमें कम से कम 20 योग्य सदस्य होंगे।
  • निर्वाचन अधिकारियों का शुल्क अधिकतम ₹5 लाख तक सीमित किया गया है।
  • सभी राष्ट्रीय खेल निकायों को अधिनियम के अनुरूप अपने उपविधान छह माह के भीतर संशोधित करने होंगे।
  • विशेष परिस्थितियों में केंद्र सरकार कारण दर्ज करते हुए 12 माह तक नियमों में शिथिलता प्रदान कर सकती है।

भारत करेगा राष्ट्रमंडल के स्पीकर्स और पीठासीन अधिकारियों के 28वें सम्मेलन की मेजबानी

भारत राष्ट्रमंडल देशों में संसदीय लोकतंत्र को सशक्त करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने जा रहा है। भारत नई दिल्ली में राष्ट्रमंडल के स्पीकर्स और पीठासीन अधिकारियों के 28वें सम्मेलन (CSPOC) की मेजबानी करेगा। यह प्रतिष्ठित तीन दिवसीय सम्मेलन 15 जनवरी 2026 से 16 जनवरी 2026 तक आयोजित होगा, जिसमें 60 से अधिक राष्ट्रमंडल देशों और अर्ध-स्वायत्त विधायिकाओं के स्पीकर और पीठासीन अधिकारी भाग लेंगे। यह आयोजन भारत की लोकतांत्रिक यात्रा में एक ऐतिहासिक क्षण है और संसदीय परंपराओं, लोकतांत्रिक मूल्यों तथा संस्थागत शासन में भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका को दर्शाता है।

CSPOC सम्मेलन के बारे में

  • राष्ट्रमंडल के स्पीकर्स और पीठासीन अधिकारियों का सम्मेलन (CSPOC) एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संसदीय मंच है, जिसका उद्देश्य ज्ञान-साझाकरण, पारस्परिक सीख और राष्ट्रमंडल की विधायिकाओं के बीच सहयोग को बढ़ावा देना है।
  • CSPOC का मुख्य लक्ष्य संसदीय संस्थानों को सुदृढ़ करना और विभिन्न रूपों में संसदीय लोकतंत्र की समझ को गहरा करना है।
  • 28वें संस्करण के लिए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला सम्मेलन के अध्यक्ष (Chairperson) होंगे, जो राष्ट्रमंडल संसदीय ढांचे में भारत की नेतृत्वकारी भूमिका को रेखांकित करता है।

प्रधानमंत्री द्वारा उद्घाटन

  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 15 जनवरी 2026 को ऐतिहासिक संविधान सदन (पूर्व संसद भवन) के केंद्रीय कक्ष में सम्मेलन का औपचारिक उद्घाटन करेंगे।
  • इस स्थल पर उद्घाटन भारत की संवैधानिक विरासत और लोकतांत्रिक परंपराओं को प्रतीकात्मक रूप से दर्शाता है।
  • इसके अलावा, प्रधानमंत्री स्पीकर्स और पीठासीन अधिकारियों से अनौपचारिक बातचीत भी करेंगे, जिससे राष्ट्रमंडल देशों के बीच संसदीय कूटनीति और सद्भाव को बल मिलेगा।

प्रमुख सत्र और विषय

  • सम्मेलन के दौरान कई उच्चस्तरीय सत्र आयोजित किए जाएंगे, जिनमें संसदीय कार्यप्रणाली से जुड़े समकालीन मुद्दों और नवाचारों पर चर्चा होगी।
  • एक प्रमुख विषय संसद में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उपयोग होगा, जिसमें विधायी दक्षता, पारदर्शिता और शोध समर्थन को बेहतर बनाने में AI की भूमिका पर विचार किया जाएगा।
  • अन्य महत्वपूर्ण विषयों में संसद सदस्यों पर सोशल मीडिया का प्रभाव, सर्वोत्तम प्रथाओं और नवाचारी विचारों का साझा करना, संसद के प्रति जन-समझ को बढ़ाना, तथा सांसदों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और कल्याण सुनिश्चित करना शामिल हैं।
  • ये विषय डिजिटल युग में बदलती लोकतांत्रिक आवश्यकताओं को दर्शाते हैं।

स्थायी समिति की बैठक

  • सम्मेलन के पहले दिन CSPOC की स्थायी समिति (Standing Committee) की बैठक आयोजित की जाएगी।
  • 28वें CSPOC के अध्यक्ष के रूप में ओम बिरला इस बैठक की अध्यक्षता करेंगे।
  • स्थायी समिति CSPOC की कार्यसूची, निरंतरता और संस्थागत स्मृति को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है।

भारत और राष्ट्रमंडल के लिए महत्व

  • 28वें CSPOC की मेजबानी भारत के लिए कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।
  • यह भारत की छवि को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और संसदीय मूल्यों, समावेशन तथा संवाद के मजबूत समर्थक के रूप में सुदृढ़ करता है।
  • साथ ही, यह राष्ट्रमंडल के साथ भारत की सहभागिता को और मजबूत करता है, जो विविध राजनीतिक प्रणालियों का ऐसा समूह है, जिसे लोकतांत्रिक सिद्धांत एकजुट करते हैं।
  • राष्ट्रमंडल के लिए यह सम्मेलन साझा शासन चुनौतियों पर चर्चा, तकनीकी परिवर्तनों के अनुकूलन और लोकतांत्रिक लचीलेपन को मजबूत करने का एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करता है।

CSPOC अध्यक्ष पद का हस्तांतरण

  • सम्मेलन के समापन के बाद, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला औपचारिक रूप से CSPOC का अध्यक्ष पद ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स के स्पीकर लिंडसे होयल को सौंपेंगे।
  • यह हस्तांतरण CSPOC ढांचे की घूर्णनशील और सहयोगात्मक प्रकृति का प्रतीक है।

BRICS प्रेसीडेंसी का लोगो, थीम और वेबसाइट लॉन्च

भारत ने BRICS अध्यक्षता 2026 की औपचारिक तैयारियाँ शुरू कर दी हैं। इसके तहत BRICS 2026 का आधिकारिक लोगो और समर्पित वेबसाइट लॉन्च की गई है। यह पहल ऐसे समय में की गई है जब वैश्विक स्तर पर अनिश्चितताएँ बढ़ रही हैं, और यह भारत की जन-केंद्रित, समावेशी और सहयोगात्मक अध्यक्षता की दृष्टि को दर्शाती है। इसका उद्देश्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच सहयोग को मजबूत करना और साझा विकास लक्ष्यों को आगे बढ़ाना है।

क्यों है खबर में?

विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने BRICS अध्यक्षता 2026 के लिए आधिकारिक लोगो और वेबसाइट का शुभारंभ किया। इसके साथ ही भारत की BRICS अध्यक्षता की तैयारियों की औपचारिक शुरुआत हो गई।

भारत की BRICS अध्यक्षता 2026 की दृष्टि

डॉ. जयशंकर के अनुसार, 2026 भारत के लिए विशेष महत्व रखता है क्योंकि उसी वर्ष BRICS के 20 वर्ष पूरे होंगे। इस दौरान BRICS उभरते और विकासशील देशों के बीच सहयोग का एक प्रमुख मंच बन चुका है। भारत की अध्यक्षता का फोकस जन-केंद्रित विकास, संवाद और व्यावहारिक सहयोग पर रहेगा, साथ ही बदलती वैश्विक परिस्थितियों और विस्तारित सदस्यता को भी ध्यान में रखा जाएगा।

अध्यक्षता की थीम और मार्गदर्शक दर्शन

भारत की BRICS अध्यक्षता की थीम है —“लचीलापन, नवाचार, सहयोग और सततता के लिए निर्माण” (Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability)। यह थीम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन और मानवता-प्रथम दर्शन से प्रेरित है। इसका उद्देश्य सभी सदस्य देशों के लिए समावेशी विकास, क्षमता निर्माण, नवाचार को बढ़ावा और दीर्घकालिक सततता सुनिश्चित करना है।

BRICS 2026 लोगो का प्रतीकात्मक अर्थ

नया BRICS 2026 लोगो एकता में विविधता का प्रतीक है। इसमें परंपरा और आधुनिकता का सुंदर मिश्रण दिखता है। लोगो की पंखुड़ियों में सभी BRICS सदस्य देशों के रंग शामिल हैं, जो समानता, साझा उद्देश्य और पारस्परिक सम्मान को दर्शाते हैं। यह यह भी बताता है कि BRICS अपनी विविध पहचान को बनाए रखते हुए सामूहिक शक्ति से आगे बढ़ता है।

BRICS इंडिया वेबसाइट की भूमिका

नई लॉन्च की गई BRICS इंडिया वेबसाइट भारत की अध्यक्षता के दौरान एक केंद्रीय डिजिटल मंच के रूप में काम करेगी। इस पर बैठकों, पहलों और परिणामों से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराई जाएगी। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी, समन्वय बेहतर होगा और आम लोगों व हितधारकों तक समय पर जानकारी पहुँचेगी।

वर्तमान वैश्विक परिप्रेक्ष्य में BRICS

डॉ. जयशंकर ने कहा कि आज की दुनिया भू-राजनीतिक तनाव, आर्थिक अनिश्चितता, जलवायु संकट, तेज तकनीकी बदलाव और विकास अंतर जैसी चुनौतियों से जूझ रही है। ऐसे समय में BRICS संवाद और सहयोग का एक महत्वपूर्ण मंच बना हुआ है। भारत की अध्यक्षता का लक्ष्य BRICS को व्यावहारिक समाधान देने वाला और अधिक प्रभावी मंच बनाना है।

BRICS क्या है?

BRICS की स्थापना 2006 में हुई थी। यह प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह है, जो आर्थिक, राजनीतिक और विकास से जुड़े मुद्दों पर सहयोग के लिए कार्य करता है और ग्लोबल साउथ की आवाज़ को वैश्विक मंचों पर मजबूती से प्रस्तुत करता है।

Jio लॉन्च करेगा देश का पहला मेड-इन-इंडिया AI प्लेटफॉर्म

रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के चेयरमैन मुकेश अंबानी ने घोषणा की है कि जियो जल्द ही “पीपल-फर्स्ट” आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) प्लेटफॉर्म लॉन्च करेगा, जिसका उद्देश्य एआई को हर भारतीय के लिए सुलभ बनाना है। यह प्लेटफॉर्म नागरिकों को उनकी अपनी भाषा और अपने डिवाइस पर एआई टूल्स के माध्यम से सशक्त करेगा। इसकी शुरुआत गुजरात से की जाएगी और आगे चलकर इसे वैश्विक स्तर तक विस्तार दिया जाएगा।

क्यों है खबर में?

मुकेश अंबानी ने जियो के पीपल-फर्स्ट एआई प्लेटफॉर्म की घोषणा की। यह घोषणा राजकोट में आयोजित वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस के दौरान की गई।

एआई प्लेटफॉर्म के बारे में

मुकेश अंबानी ने कहा कि यह आगामी एआई प्लेटफॉर्म भारत में बना, भारत के लिए और दुनिया के लिए होगा। इसके जरिए आम नागरिक रोजमर्रा के जीवन में एआई सेवाओं का उपयोग अपनी भाषा में और अपने व्यक्तिगत उपकरणों पर कर सकेंगे। इसका उद्देश्य उत्पादकता बढ़ाना, कार्यकुशलता में सुधार करना और डिजिटल समावेशन को मजबूत करना है, ताकि एआई सरल, किफायती और व्यापक रूप से उपलब्ध हो सके।

जामनगर में एआई इन्फ्रास्ट्रक्चर

इस लक्ष्य को साकार करने के लिए जियो जामनगर में भारत का सबसे बड़ा एआई-रेडी डेटा सेंटर विकसित कर रहा है। अंबानी के अनुसार, इसका मुख्य उद्देश्य हर भारतीय के लिए किफायती एआई उपलब्ध कराना है। यह आधारभूत संरचना बड़े पैमाने पर एआई सेवाओं को समर्थन देगी, साथ ही बेहतर प्रदर्शन, डेटा सुरक्षा और देशव्यापी पहुंच सुनिश्चित करेगी।

भारत के एआई अग्रदूत के रूप में गुजरात

अंबानी ने कहा कि रिलायंस का लक्ष्य गुजरात को भारत का आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अग्रदूत बनाना है। उन्होंने वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन को सौराष्ट्र और कच्छ के विकास के लिए एक फोर्स मल्टीप्लायर बताया। मजबूत औद्योगिक आधार, डिजिटल अवसंरचना और नीतिगत समर्थन के कारण गुजरात भारत की एआई-आधारित विकास यात्रा का नेतृत्व करने के लिए उपयुक्त है।

एआई पहल से जुड़ी प्रतिबद्धताएँ

यह एआई प्लेटफॉर्म गुजरात के प्रति रिलायंस की व्यापक प्रतिबद्धताओं का हिस्सा है, जिसमें अगले पाँच वर्षों में ₹7 लाख करोड़ का निवेश, स्वच्छ ऊर्जा में नेतृत्व और डिजिटल सेवाओं का विस्तार शामिल है। अंबानी ने जोर दिया कि तकनीक, सतत विकास और नवाचार मिलकर भारत की भविष्य की विकास दिशा तय करेंगे।

नई 2024 आधार श्रृंखला शुरू, भारत की CPI 2012 श्रृंखला समाप्त

भारत की मुद्रास्फीति मापन व्यवस्था एक नए चरण में प्रवेश कर रही है। दिसंबर 2025 के आँकड़ों के जारी होने के साथ ही 2012 आधार वर्ष पर आधारित उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) की लंबी श्रृंखला औपचारिक रूप से समाप्त हो गई है। अगले महीने से 2024 को आधार वर्ष मानकर नई CPI श्रृंखला लागू की जाएगी, जिसका उद्देश्य वर्तमान उपभोग प्रवृत्तियों और बदलती आर्थिक वास्तविकताओं को अधिक सटीक रूप से दर्शाना है।

क्यों है खबर में?

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) ने 2012 आधार वर्ष के तहत अंतिम CPI मुद्रास्फीति आँकड़े जारी किए हैं। इसके बाद 2024 आधार वर्ष वाली नई CPI श्रृंखला शुरू की जाएगी।

2012 आधार के तहत मुद्रास्फीति के रुझान

2012 आधार CPI श्रृंखला के विश्लेषण से पता चलता है कि नवंबर 2013 में शीर्षक मुद्रास्फीति 11.16% के शिखर पर पहुँची थी, जो उस समय उच्च मूल्य दबाव को दर्शाती है। इसके बाद वर्षों में मुद्रास्फीति धीरे-धीरे कम होती गई और अक्टूबर 2025 में 0.25% के ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुँच गई। यह दीर्घकालिक गिरावट बेहतर समष्टि-आर्थिक प्रबंधन, आपूर्ति पक्ष में सुधार और अधिक प्रभावी मौद्रिक नीति संचरण को दर्शाती है।

ग्रामीण और शहरी मुद्रास्फीति का स्वरूप

उच्च मुद्रास्फीति के वर्षों में खाद्य कीमतों के दबाव के कारण ग्रामीण मुद्रास्फीति शहरी मुद्रास्फीति से अधिक रही। हालांकि, 2025 में यह प्रवृत्ति उलट गई और शहरी CPI लगातार ग्रामीण CPI से अधिक दर्ज की गई। हाल के वर्षों में आवास लागत, सेवाओं की महँगाई और जीवनशैली से जुड़े खर्चों ने शहरी मुद्रास्फीति को ऊपर रखा।

खाद्य, कोर और ईंधन मुद्रास्फीति

2012 श्रृंखला के दौरान CPI-खाद्य मुद्रास्फीति में काफी उतार-चढ़ाव देखा गया। अप्रैल 2018 में यह 16.12% के उच्चतम स्तर पर रही, जबकि अप्रैल 2019 में इसका न्यूनतम स्तर दर्ज हुआ। कोर मुद्रास्फीति 2012–13 में 9.41% के शिखर पर थी, जो 2024–25 में घटकर 3.55% रह गई, जिससे अंतर्निहित मूल्य दबावों में कमी का संकेत मिलता है। ईंधन और प्रकाश मुद्रास्फीति 2021–22 में 11.25% पर पहुँची, जो वैश्विक ऊर्जा झटकों का परिणाम थी।

CPI और आधार वर्ष परिवर्तन का महत्व

उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) घरों द्वारा उपभोग की जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं की एक निश्चित टोकरी की कीमतों में होने वाले बदलाव को मापता है। समय-समय पर आधार वर्ष में संशोधन आवश्यक होता है ताकि बदलते उपभोग पैटर्न, नए उत्पादों और खर्च के हिस्सों को सही ढंग से शामिल किया जा सके। आधार वर्ष का अद्यतन होना नीति निर्धारण के लिए मुद्रास्फीति के मापन को अधिक सटीक और प्रासंगिक बनाता है।

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