भारतीय मूल के सुनील अमृत ने द बर्निंग अर्थ के लिए ब्रिटिश अकादमी पुस्तक पुरस्कार जीता

प्रसिद्ध भारतीय मूल के इतिहासकार सुनील अमृत (Sunil Amrith) ने अपनी उत्कृष्ट पुस्तक The Burning Earth: An Environmental History of the Last 500 Years के लिए ब्रिटिश एकेडमी बुक प्राइज़ 2025 जीता है। यह पुरस्कार हर वर्ष एक ऐसी गैर-काल्पनिक (non-fiction) पुस्तक को दिया जाता है, जो वैश्विक इतिहास, संस्कृति और समाज की गहरी समझ प्रस्तुत करती है। पुरस्कार राशि £25,000 (लगभग ₹26 लाख) है।

सुनील अमृत कौन हैं?

सुनील अमृत येल विश्वविद्यालय (Yale University) में इतिहास के प्रोफेसर हैं। उनका जन्म केन्या में हुआ, उनका पालन-पोषण सिंगापुर में हुआ, और उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय (University of Cambridge, England) से उच्च शिक्षा प्राप्त की।
उनकी बहुसांस्कृतिक पृष्ठभूमि और वैश्विक दृष्टिकोण ने उन्हें पर्यावरणीय इतिहास, प्रवासन (migration) और औपनिवेशिक काल (colonialism) जैसे विषयों पर गहन शोध के लिए प्रसिद्ध बनाया है।

अमृत अपने गहन अकादमिक शोध और सरल, मानवीय कहानी कहने की शैली के लिए जाने जाते हैं, जिससे पाठक समझ पाते हैं कि अतीत की घटनाएँ आज की दुनिया को कैसे प्रभावित करती हैं।

पुस्तक के बारे में — The Burning Earth

पुस्तक पिछले 500 वर्षों के पर्यावरण और मानव इतिहास का व्यापक अध्ययन प्रस्तुत करती है। यह दिखाती है कि मानव गतिविधियों — जैसे उपनिवेशवाद, औद्योगीकरण और आधुनिक विकास — ने पृथ्वी और समाज दोनों को किस प्रकार रूपांतरित किया है।

न्यायाधीशों (judges) के अनुसार, यह पुस्तक “शक्तिशाली और सुंदर भाषा में लिखी गई एक उत्कृष्ट कृति” है, जो आज के जलवायु संकट (climate crisis) की ऐतिहासिक जड़ों को उजागर करती है।

स्वयं अमृत के शब्दों में, यह पुस्तक “मानव-जनित पर्यावरणीय क्षति के साथ-साथ उन भूले-बिसरे सतत जीवन-शैली के विचारों” को भी दिखाने का प्रयास है जो कभी अस्तित्व में थे।

निर्णायकों की टिप्पणियाँ

निर्णायक मंडल की अध्यक्ष प्रोफेसर रेबेका एर्ल (Rebecca Earle) ने पुस्तक की प्रशंसा करते हुए कहा —

“यह एक भव्य (magisterial) और संवेदनशील विवरण है जो दिखाता है कि मानव इतिहास और पर्यावरणीय परिवर्तन कितने गहराई से जुड़े हुए हैं। यह आज के जलवायु संकट को समझने के लिए आवश्यक पठन है।”

न्यायाधीशों ने सर्वसम्मति से कहा कि अमृत की पुस्तक इस पुरस्कार की भावना का सटीक प्रतिनिधित्व करती है — यानी ऐसी रचनाएँ जो दुनिया को नए दृष्टिकोण से समझने में मदद करें।

The Burning Earth क्यों विशेष है?

ब्रिटिश एकेडमी ने अमृत की दशकों की शोध-यात्रा और उनके “वैश्विक दृष्टिकोण” की सराहना की।
पुस्तक में विभिन्न महाद्वीपों और सदियों को समेटते हुए निम्नलिखित विषयों को शामिल किया गया है —

  • अमेरिका में औपनिवेशिक विजय (colonial conquests)

  • औद्योगिक विस्तार और प्रकृति पर उसका प्रभाव

  • ब्रिटिश शासनकाल में दक्षिण अफ्रीका में खनन व वनों की कटाई

  • द्वितीय विश्व युद्ध (World War II) के पर्यावरणीय परिणाम

अमृत दिखाते हैं कि सदियों पहले शुरू हुए दोहन और विकास के पैटर्न आज के वैश्विक पर्यावरण संकट की नींव हैं।

अन्य चयनित (Shortlisted) पुस्तकें

सुनील अमृत के साथ पाँच अन्य लेखकों को भी ब्रिटिश एकेडमी बुक प्राइज़ 2025 की सूची में शामिल किया गया, जिन्हें प्रत्येक को £1,000 का पुरस्कार मिला —

पुस्तक का शीर्षक लेखक
द गोल्डन रोड: हाउ एनशिएंट इंडिया ट्रांसफॉर्म्ड द वर्ल्ड विलियम डालरिम्पल (William Dalrymple)
द बैटन एंड द क्रॉस: रशियाज़ चर्च फ्रॉम पैगन्स टू पुतिन लूसी ऐश (Lucy Ash)
अफ्रीकनॉमिक्स: ए हिस्ट्री ऑफ वेस्टर्न इग्नोरेंस ब्रोनवेन एवरिल (Bronwen Everill)
सिक ऑफ इट: द ग्लोबल फाइट फॉर वीमेन हेल्थ सोफी हार्मन (Sophie Harman)
साउंड ट्रैक्स: ए म्यूजिकल डिटेक्टिव स्टोरी ग्रेम लॉसन (Graeme Lawson)

ब्रिटिश एकेडमी बुक प्राइज़ के बारे में

ब्रिटिश एकेडमी बुक प्राइज़ की स्थापना 2013 में हुई थी।
यह पुरस्कार मानविकी (Humanities) और सामाजिक विज्ञान (Social Sciences) के क्षेत्र में लिखी गई उत्कृष्ट गैर-काल्पनिक पुस्तकों को सम्मानित करता है।

इसका उद्देश्य ऐसी रचनाओं को प्रोत्साहन देना है जो —

  • गहन शोध पर आधारित हों,

  • विचारोत्तेजक हों, और

  • आम पाठकों के लिए सुलभ भाषा में लिखी गई हों।

यह पुरस्कार किसी भी राष्ट्रीयता के लेखक को दिया जा सकता है, बशर्ते पुस्तक यूके में अंग्रेज़ी भाषा में प्रकाशित हुई हो।

निष्कर्ष:
सुनील अमृत की The Burning Earth न केवल पर्यावरणीय इतिहास का गहन अध्ययन है, बल्कि यह मानवता और प्रकृति के बीच के जटिल संबंधों को नए दृष्टिकोण से देखने का अवसर भी देती है — एक ऐसी पुस्तक जो इतिहास और भविष्य दोनों के लिए चेतावनी और प्रेरणा है।

थाईलैंड की राजमाता सिरीकित का 93 वर्ष की आयु में निधन

थाईलैंड की प्रिय और सम्मानित राजशाही हस्ती, क्वीन मदर सिरीकित (Queen Mother Sirikit) का शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2025 को 93 वर्ष की आयु में निधन हो गया। रॉयल हाउसहोल्ड ब्यूरो (Royal Household Bureau) ने पुष्टि की कि उनका निधन बैंकॉक के एक अस्पताल में हुआ, जहाँ उन्हें 17 अक्टूबर से रक्त संक्रमण (blood infection) के इलाज के लिए भर्ती कराया गया था। निरंतर चिकित्सा देखभाल के बावजूद, उनकी स्थिति में सुधार नहीं हुआ।

हाल के वर्षों में स्वास्थ्य गिरावट के कारण उन्होंने सार्वजनिक जीवन से दूरी बना ली थी। उनका निधन थाईलैंड के आधुनिक इतिहास के एक युग के अंत को दर्शाता है।

प्रारंभिक जीवन और शाही विवाह

सिरीकित किटियाकर (Sirikit Kitiyakara) का जन्म 12 अगस्त 1932 को बैंकॉक में हुआ था। वे चक्री राजवंश से जुड़ी एक अभिजात (noble) और कुलीन परिवार से थीं। उनके पिता प्रिंस नक्खात्रा मंगकला किटियाकर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद फ्रांस में थाईलैंड के राजदूत रहे।

पेरिस में पढ़ाई के दौरान, सिरिकिट की मुलाकात किंग भूमिबोल अदुल्यादेज़ (King Bhumibol Adulyadej) से हुई, जो उस समय स्विट्ज़रलैंड में अध्ययन कर रहे थे।
राजा के एक सड़क दुर्घटना के बाद दोनों के बीच मित्रता गहरी हुई और उन्होंने 1950 में विवाह किया।

उसी वर्ष हुए राज्याभिषेक (coronation) के दौरान, दोनों ने यह वचन लिया —

“हम न्याय और धर्म के साथ शासन करेंगे ताकि सियामी लोगों के लाभ और सुख के लिए कार्य हो।”

उनके चार बच्चे हुए —
किंग महा वजिरालोंगकोर्न, प्रिंसेस उबोलरतना, प्रिंसेस सिरिन्धोर्न, और प्रिंसेस चुलाभोर्न

थाईलैंड के विकास में योगदान

हालाँकि वे अपने पति राजा भूमिबोल की लोकप्रियता के कारण अक्सर छाया में रहीं, परंतु क्वीन सिरीकित ने अपने मानवीय और विकास कार्यों के माध्यम से एक अलग पहचान बनाई।

उन्होंने ग्रामीण जीवन सुधारने, गरीबी घटाने और थाईलैंड की पारंपरिक कलाओं को पुनर्जीवित करने के लिए अनेक राजकीय परियोजनाएँ (royal projects) शुरू कीं।

प्रमुख पहलें

  • SUPPORT फाउंडेशन (1976):
    ग्रामीणों को रेशम बुनाई, आभूषण निर्माण, चित्रकला, सिरेमिक, और अन्य पारंपरिक कलाओं में प्रशिक्षण देकर आय सृजन के अवसर दिए।

  • पर्यावरण संरक्षण:
    ग्रीन क्वीन (Green Queen)” के नाम से प्रसिद्ध, उन्होंने Forest Loves Water और Little House in the Forest जैसी परियोजनाएँ शुरू कीं, जो वन और जल संरक्षण के महत्व को दर्शाती थीं।

  • वन्यजीव संरक्षण:
    उन्होंने वन्यजीव प्रजनन केंद्र, खुले चिड़ियाघर, और कछुआ संरक्षण केंद्र स्थापित किए ताकि संकटग्रस्त प्रजातियों की रक्षा की जा सके।

इन पहलों ने ग्रामीण और शहरी समुदायों के बीच सेतु का कार्य किया और आर्थिक सशक्तिकरण व सतत विकास (sustainable development) को बढ़ावा दिया।

विवाद और सार्वजनिक आलोचना

थाईलैंड में सैन्य तख्तापलट (military coups) और राजनीतिक अस्थिरता के दशकों के दौरान, क्वीन सिरिकिट की भूमिका को कई बार राजनीतिक रूप से संवेदनशील माना गया।
एक प्रदर्शनकारी के अंतिम संस्कार में उनकी उपस्थिति ने कभी-कभी राजशाही की राजनीतिक भूमिका पर बहस छेड़ दी। इसके बावजूद, उनकी लोकप्रियता — विशेष रूप से ग्रामीण जनता के बीच — अडिग रही। लोगों ने उन्हें राष्ट्रीय एकता और करुणा का प्रतीक माना।

एक युग का अंत

क्वीन मदर सिरीकित का निधन थाईलैंड के लिए गहरा भावनात्मक और ऐतिहासिक क्षण है। उनकी मानवीय दृष्टि, पर्यावरण प्रेम, और ग्रामीण उत्थान के प्रति समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत बना रहेगा।

वनडे में भारत के लिए सर्वाधिक रन बनाने वाले तीसरे बल्लेबाज बने रोहित, गांगुली को पीछे छोड़ा

भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान रोहित शर्मा ने अपने शानदार करियर में एक और ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज की है। उन्होंने सौरव गांगुली को पीछे छोड़ते हुए वनडे अंतरराष्ट्रीय (ODI) क्रिकेट में भारत के तीसरे सर्वाधिक रन बनाने वाले बल्लेबाज़ बन गए हैं। यह रिकॉर्ड उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ दूसरे वनडे मैच में शानदार 73 रनों की पारी खेलते हुए हासिल किया। इस उपलब्धि के साथ रोहित ने भारतीय क्रिकेट इतिहास में अपना नाम और भी मज़बूती से दर्ज कर लिया है, जहां अब उनसे आगे सिर्फ सचिन तेंदुलकर और विराट कोहली हैं।

स्टैट्स का विवरण

खिलाड़ी मैच रन औसत शतक अर्धशतक
सचिन तेंदुलकर 463 18,426 44.83 49 96
विराट कोहली 304 14,181 58.69 51 72
रोहित शर्मा 275 11,249 48.69 32 59
सौरव गांगुली 308 11,121 40.95 22 71

संतुलित पारी
अपने सामान्य आक्रामक अंदाज के विपरीत, रोहित ने इस पारी में धैर्यपूर्वक खेलते हुए 97 गेंदों में 73 रन बनाए, जिनका स्ट्राइक रेट 75.26 रहा। इस दौरान उन्होंने 7 चौके और 2 छक्के लगाए। पारी को संयम के साथ बनाने की उनकी रणनीति ने दबाव में भी उनकी क्षमता को साबित किया।

करियर हाइलाइट्स

  • सर्वश्रेष्ठ स्कोर: 264 बनाम श्रीलंका – वनडे इतिहास में व्यक्तिगत सर्वोच्च स्कोर

  • 32 वनडे शतक: कोहली और तेंदुलकर के बाद भारतीयों में तीसरा सर्वाधिक

  • 59 अर्धशतक: टीम के शीर्ष क्रम में लगातार योगदान

2025 की वनडे प्रदर्शन
इस साल रोहित ने 10 वनडे मैच खेले हैं, जिसमें उन्होंने 383 रन बनाए और उनका औसत 38.30 है। इस दौरान उन्होंने 1 शतक और 2 अर्धशतक बनाए, जिनमें सर्वोच्च स्कोर 119 रहा।

वित्त वर्ष 2026 में भारत की जीडीपी 6.7-6.9 प्रतिशत बढ़ेगी: डेलॉइट इंडिया

डेलॉइट इंडिया की नवीनतम इंडिया इकॉनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2025–26 में भारत की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 6.7% से 6.9% के बीच रहने का अनुमान है। यह अनुमान पिछले पूर्वानुमान से 0.3 प्रतिशत अंक अधिक है, जो घरेलू खपत में वृद्धि, सरकारी सुधारों और निवेश माहौल में सुधार से प्रेरित नवीन आशावाद को दर्शाता है। यह अनुमान भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के 6.8% वृद्धि अनुमान के अनुरूप है, जो भारत की मज़बूत मैक्रोइकॉनॉमिक नींव की पुष्टि करता है।

प्रमुख विकास कारक

  1. घरेलू मांग में वृद्धि – त्योहारी सीज़न के दौरान खपत में उछाल से तिमाही जीडीपी वृद्धि को बल मिलने की उम्मीद।

  2. नीतिगत सुधारजीएसटी 2.0 सहित संरचनात्मक सुधार व्यापार सुगमता और कर दक्षता को बेहतर बनाएंगे।

  3. निजी निवेश – भारत-अमेरिका और भारत-यूरोपीय संघ के संभावित व्यापार समझौतों से निवेश भावना मजबूत होगी।

  4. मौद्रिक समर्थन – मुद्रास्फीति नियंत्रण में रहने से मौजूदा मौद्रिक नीति नरम बनी हुई है, जिससे ऋण प्रवाह और उपभोग को बल मिल रहा है।

संभावित जोखिम

डेलॉइट ने कुछ चुनौतियों पर भी सावधानी बरतने की सलाह दी है —

  • वैश्विक व्यापार अनिश्चितता: भू-राजनीतिक तनाव और अधूरे व्यापार समझौते निर्यात पर असर डाल सकते हैं।

  • स्थायी कोर मुद्रास्फीति: मुख्य मुद्रास्फीति 4% से ऊपर बनी हुई है, जिससे आरबीआई की ब्याज नीति पर सीमाएँ लगती हैं।

  • वैश्विक ब्याज दरें: यदि अमेरिकी फेडरल रिज़र्व उच्च दरें बनाए रखता है, तो तरलता पर दबाव और पूंजी बहिर्वाह हो सकता है।

  • आपूर्ति शृंखला बाधाएँ: महत्वपूर्ण खनिजों और संसाधनों पर प्रतिबंध लागत दबाव बढ़ा सकते हैं।

एमएसएमई पर विशेष ध्यान

रिपोर्ट में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) क्षेत्र को रोजगार, निर्यात और आय सृजन का प्रमुख इंजन बताया गया है। डेलॉइट का मानना है कि इस क्षेत्र को सशक्त बनाना भारत की समावेशी और सतत आर्थिक वृद्धि सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य है।

ग्लोबल फाइनेंस द्वारा एसबीआई को “विश्व का सर्वश्रेष्ठ उपभोक्ता बैंक 2025” नामित किया गया

भारत के बैंकिंग क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि में, भारतीय स्टेट बैंक (State Bank of India – SBI) को अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन ग्लोबल फाइनेंस (Global Finance) द्वारा “विश्व का सर्वश्रेष्ठ उपभोक्ता बैंक 2025” (World’s Best Consumer Bank 2025) पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान एसबीआई की डिजिटल बैंकिंग, उपभोक्ता सेवा और वित्तीय समावेशन के क्षेत्र में प्रगति को दर्शाता है।

पुरस्कार की पृष्ठभूमि

ग्लोबल फाइनेंस, न्यूयॉर्क स्थित एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिका है, जो हर वर्ष प्रदर्शन, नवाचार और ग्राहक सेवा में उत्कृष्टता दिखाने वाले बैंकों को सम्मानित करती है।

  • वर्ष 2025 के लिए एसबीआई को दो सम्मान मिले —
    “विश्व का सर्वश्रेष्ठ उपभोक्ता बैंक”
    “भारत का सर्वश्रेष्ठ बैंक”

  • यह पुरस्कार आईएमएफ–विश्व बैंक बैठकों के दौरान वाशिंगटन डी.सी. में आयोजित वार्षिक समारोह में प्रदान किया गया।

एसबीआई को यह सम्मान क्यों मिला

एसबीआई के चयन के पीछे कई प्रमुख कारण रहे —

  1. डिजिटल बैंकिंग में नेतृत्व — मोबाइल बैंकिंग, वॉयस बैंकिंग (क्षेत्रीय भाषाओं में) और नए ग्राहक ऑनबोर्डिंग में नवाचार।

  2. वृहद ग्राहक आधार — 52 करोड़ से अधिक ग्राहक, और प्रतिदिन लगभग 65,000 नए उपभोक्ता जुड़ते हैं।

  3. ग्राहक-केंद्रित दृष्टिकोण — एआई-आधारित समाधान और ओमनी-चैनल मॉडल से व्यक्तिगत और समावेशी बैंकिंग अनुभव प्रदान करना।

  4. तकनीकी ढांचा — एसबीआई की मोबाइल ऐप के 10 करोड़ से अधिक उपयोगकर्ता हैं, जिनमें से 1 करोड़ से अधिक प्रतिदिन सक्रिय रहते हैं, जिससे यह भारत के सबसे अधिक उपयोग किए जाने वाले वित्तीय ऐप्स में से एक बन गया है।

भारत और बैंकिंग क्षेत्र के लिए महत्व

यह उपलब्धि भारत के बैंकिंग क्षेत्र के लिए एक ऐतिहासिक क्षण है —

  • यह दर्शाता है कि भारत वैश्विक स्तर पर डिजिटल और उपभोक्ता-केंद्रित बैंकिंग सेवाएँ प्रदान करने में सक्षम है।

  • यह साबित करता है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक भी नवाचार और प्रतिस्पर्धा में अग्रणी भूमिका निभा सकते हैं।

  • वित्तीय समावेशन और डिजिटल परिवर्तन की दिशा में भारत की प्रगति को रेखांकित करता है।

  • आधुनिक बैंकिंग में तकनीक और ग्राहक अनुभव के महत्व को और मजबूत करता है।

ITBP स्थापना दिवस 2025 – इतिहास, महत्व और सीमा सुरक्षा में भूमिका

आईटीबीपी स्थापना दिवस 2025 हर वर्ष 24 अक्टूबर को मनाया जाता है, ताकि भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (Indo-Tibetan Border Police – ITBP) की स्थापना का स्मरण किया जा सके — यह एक विशिष्ट बल है जो भारत-चीन सीमा की रक्षा करता है, जो पृथ्वी के सबसे कठिन और ऊँचे भूभागों में से एक है।

इस वर्ष आईटीबीपी स्थापना दिवस 2025 अपने 63वें वर्ष की सेवा का प्रतीक है, जिसमें उन जवानों के साहस, अनुशासन और दृढ़ता का सम्मान किया जाता है जो 14,000 फीट से अधिक ऊँचाई पर भारत की सीमाओं की सुरक्षा करते हैं।

आईटीबीपी क्या है?

आईटीबीपी (Indo-Tibetan Border Police) भारत की पाँच केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPFs) में से एक है। यह सीमा सुरक्षा, आपदा राहत, और आतंक-रोधी अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

आईटीबीपी 3,488 किलोमीटर लंबी भारत-चीन सीमा की रक्षा करती है, जो लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक फैली है। यह क्षेत्र अत्यंत ठंडा और दुर्गम है, जहाँ तापमान कई बार -25°C से नीचे चला जाता है।

आईटीबीपी स्थापना का इतिहास

आईटीबीपी की स्थापना 24 अक्टूबर 1962 को भारत-चीन युद्ध के बाद की गई थी। उस युद्ध में कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और संसाधनों की कमी के कारण भारत को भारी नुकसान उठाना पड़ा।

इसके बाद सरकार ने उच्च पर्वतीय इलाकों में सुरक्षा के लिए एक विशेष बल की आवश्यकता महसूस की और इसी उद्देश्य से आईटीबीपी का गठन किया गया।

  • प्रारंभ में यह बल केवल 4 बटालियन के साथ शुरू हुआ था।

  • आज इसके पास 60 से अधिक बटालियन और लगभग 85,000 कर्मी हैं।

  • वर्ष 1992 में इसे नया स्वरूप देकर Indo-Tibetan Border Police Force Act के तहत पुनर्गठित किया गया, जिससे इसका आधुनिक दायरा और जिम्मेदारियाँ तय की गईं।

आईटीबीपी के प्रमुख कर्तव्य

आईटीबीपी देश की सुरक्षा और नागरिक सहायता दोनों में अहम भूमिका निभाता है:

  • भारत-चीन सीमा की चौकसी (लद्दाख के काराकोरम पास से लेकर अरुणाचल के जाचेप ला तक)।

  • घुसपैठ और तस्करी की रोकथाम।

  • सीमा क्षेत्र के गाँवों की सुरक्षा और नागरिक सहायता।

  • हिमालयी क्षेत्रों में आपदा राहत और बचाव अभियान।

  • पर्वतारोहण, स्कीइंग और अत्यधिक ठंड में जीवित रहने का प्रशिक्षण।

  • विदेशों में भारतीय दूतावासों की सुरक्षा, जैसे काबुल (अफगानिस्तान) में भारतीय मिशन।

आईटीबीपी पर्यावरण संरक्षण के लिए भी प्रसिद्ध है — यह नियमित रूप से वृक्षारोपण अभियान और ईको-फ्रेंडली इन्फ्रास्ट्रक्चर का निर्माण करती है।

स्थापना दिवस का महत्व

आईटीबीपी स्थापना दिवस का उद्देश्य है:

  • कठिन परिस्थितियों में कार्य करने वाले जवानों के साहस और समर्पण का सम्मान करना।

  • देश की उत्तरी सीमाओं के सामरिक महत्व को रेखांकित करना।

  • बल के आधुनिकीकरण और उपलब्धियों को प्रदर्शित करना।

  • युवाओं को सुरक्षा बलों में सेवा करने के लिए प्रेरित करना।

इस अवसर पर परेड, सांस्कृतिक कार्यक्रम और वीरता पुरस्कार वितरण समारोह आयोजित किए जाते हैं।

प्रशिक्षण और विशेष उपलब्धियाँ

आईटीबीपी भारत के सर्वश्रेष्ठ पर्वतारोहियों और बचाव विशेषज्ञों में से एक है। इसके कर्मियों ने माउंट एवरेस्ट, नंदा देवी, और कामेत शिखर जैसी ऊँचाइयों को सफलतापूर्वक फतह किया है।

बल ने कई आपात स्थितियों में असाधारण सेवा दी है, जैसे —

  • उत्तराखंड बाढ़ (2013) के दौरान बचाव अभियान।

  • ऑपरेशन देवी शक्ति (अफगानिस्तान में भारतीयों की निकासी)।

  • संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में भागीदारी।

आईटीबीपी का आदर्श वाक्य

“शौर्य, दृढ़ता, कर्म निष्ठा”
(Valour, Determination, Devotion to Duty)

यह वाक्य बल की उस अटूट भावना को दर्शाता है जो विपरीत परिस्थितियों में भी देश की सीमाओं की रक्षा के लिए समर्पित रहती है।

अडानी के गोड्डा पावर प्लांट को राष्ट्रीय ग्रिड कनेक्शन के लिए मंजूरी

भारत सरकार ने अडानी पावर के गोड्डा अल्ट्रा सुपर क्रिटिकल थर्मल प्लांट (Godda Ultra Super Critical Thermal Plant) को राष्ट्रीय बिजली ग्रिड से जोड़ने की अनुमति दे दी है। यह 1,600 मेगावाट क्षमता वाला कोयला आधारित पावर प्लांट, जो अब तक केवल बांग्लादेश को बिजली निर्यात करने के लिए बनाया गया था, अब देश के भीतर भी बिजली आपूर्ति कर सकेगा। यह निर्णय भारत की सीमापार विद्युत व्यापार नीति और ग्रिड रणनीति में एक ऐतिहासिक बदलाव माना जा रहा है।

गोड्डा पावर प्लांट क्या है?

  • यह प्लांट झारखंड के गोड्डा ज़िले में स्थित है।

  • इसे अडानी पावर लिमिटेड (Adani Power Limited – APL) ने अल्ट्रा सुपर क्रिटिकल तकनीक से बनाया है।

  • इसका उद्देश्य प्रारंभ में केवल बांग्लादेश को बिजली निर्यात करना था, जिसके लिए एक दीर्घकालिक समझौता किया गया था।

  • अब 2025 में, इसकी यह “एक्सपोर्ट-ओनली” (केवल निर्यात हेतु) स्थिति समाप्त हो रही है।

ग्रिड कनेक्शन का विवरण

  • APL को राष्ट्रीय बिजली ग्रिड (National Electricity Grid) से जोड़ने की अनुमति दी गई है।

  • यह कनेक्शन “लाइन-इन लाइन-आउट (LILO)” व्यवस्था के तहत कहलगांव–मैथन बी 400 केवी ट्रांसमिशन लाइन पर किया जाएगा।

  • यह अनुमति विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 164 के अंतर्गत दी गई है, जो भारतीय तार अधिनियम, 1885 के समान अधिकार देती है ताकि ट्रांसमिशन लाइन बिछाई जा सके।

  • LILO मार्ग गोड्डा और पोरैयाहाट (Poreyahat) तहसीलों के 56 गांवों से होकर गुज़रेगा।

  • यह स्वीकृति 25 वर्षों के लिए वैध होगी, परंतु इसे रेलवे, नागरिक उड्डयन, रक्षा, वन्यजीव, पर्यावरण और स्थानीय प्रशासनिक निकायों से आवश्यक मंजूरी लेनी होगी।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है?

1. रणनीतिक ग्रिड लचीलापन (Strategic Grid Flexibility)

अब यह प्लांट न केवल निर्यात करेगा, बल्कि देश के भीतर बिजली की मांग बढ़ने पर घरेलू ग्रिड को भी आपूर्ति करेगा।

2. राष्ट्रीय आपूर्ति में बढ़ोतरी (Boosting National Supply)

  • देश की बिजली उपलब्धता में 1,600 मेगावाट की बढ़ोतरी

  • बढ़ती औद्योगिक और शहरी मांग को पूरा करने में मदद।

  • निर्यात में कमी आने पर प्लांट की संपूर्ण उपयोग क्षमता (Plant Utilisation) बढ़ेगी।

3. नीतिगत मिसाल (Policy Precedent)

यह पहली बार हुआ है कि किसी निर्यात-केन्द्रित पावर प्लांट को Inter-State Transmission System (ISTS) में जोड़ा गया है।

नीतिगत और नियामक संशोधन

इस बदलाव को लागू करने के लिए कई नीतिगत और नियामक सुधार किए गए:

  • विद्युत मंत्रालय (Ministry of Power): अगस्त 2024 में सीमापार बिजली व्यापार दिशा-निर्देशों में संशोधन।

  • केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA): सीमापार बिजली प्रवाह प्रक्रियाओं (Cross-Border Power Flow Procedures) में बदलाव।

  • केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग (CERC): जनरल नेटवर्क एक्सेस (GNA) और ISTS विनियमों में संशोधन।

भारत को होने वाले लाभ

पहलू लाभ
ऊर्जा सुरक्षा राष्ट्रीय ग्रिड में अतिरिक्त 1,600 MW क्षमता जुड़ने से बिजली उपलब्धता में सुधार।
संसाधनों का बेहतर उपयोग उच्च निवेश वाले प्लांट का पूर्ण उपयोग सुनिश्चित।
भूराजनीतिक जोखिम में कमी केवल निर्यात पर निर्भरता घटेगी, बाहरी मांग के जोखिम कम होंगे।
निजी-सरकारी सहयोग सार्वजनिक-निजी साझेदारी (Public-Private Synergy) को बढ़ावा।

भारत को एंटी-डोपिंग पर COP10 ब्यूरो का पुनः उपाध्यक्ष चुना गया

भारत को खेलों में डोपिंग के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय अभिसमय (International Convention against Doping in Sport) के अंतर्गत COP10 ब्यूरो के उपाध्यक्ष (Vice-Chairperson) पद पर पुनः निर्वाचित किया गया है। यह उपलब्धि भारत की स्वच्छ खेलों के प्रति वैश्विक नेतृत्व क्षमता और प्रतिबद्धता को सशक्त रूप से दर्शाती है।

यह घोषणा 20–22 अक्टूबर 2025 को यूनेस्को मुख्यालय, पेरिस में आयोजित 10वीं कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज़ (COP10) सत्र के दौरान की गई। यह सत्र इस अभिसमय की 20वीं वर्षगांठ भी था — जो खेलों से डोपिंग को समाप्त करने के लिए विश्व का एकमात्र विधिक रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय ढांचा है।

COP10 में भारत की भूमिका

भारत के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व

  • हरी रंजन राव, सचिव (खेल)

  • अनंत कुमार, महानिदेशक, राष्ट्रीय डोपिंग रोधी एजेंसी (NADA)
    ने किया।

उन्होंने 190 से अधिक सदस्य देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों — जैसे अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (IOC), विश्व डोपिंग रोधी एजेंसी (WADA), तथा अफ्रीकी संघ (African Union) — के प्रतिनिधियों के साथ भागीदारी की।

भारत को एशिया-प्रशांत क्षेत्र (Group IV) से 2025–2027 कार्यकाल के लिए पुनः उपाध्यक्ष चुना गया।
इस पद के माध्यम से भारत अब वैश्विक डोपिंग नीति निर्धारण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग में अधिक प्रभावशाली भूमिका निभाएगा।

अन्य निर्वाचित सदस्य:

  • अज़रबैजान – अध्यक्ष

  • ब्राज़ील, ज़ाम्बिया और सऊदी अरब – क्षेत्रीय उपाध्यक्ष

COP10 की प्रमुख विशेषताएँ

इस सम्मेलन में 500 से अधिक प्रतिभागियों — जिनमें सरकारी अधिकारी, डोपिंग विशेषज्ञ और यूनेस्को प्रतिनिधि शामिल थे — ने निम्नलिखित प्रमुख विषयों पर चर्चा की:

  • अनुपालन और शासन तंत्र (Governance Mechanisms) को सशक्त बनाना

  • Fund for the Elimination of Doping in Sport के लिए वित्तीय सहायता बढ़ाना

  • जीन हेरफेर (Gene Manipulation), पारंपरिक औषधियों के दुरुपयोग, और उच्च प्रदर्शन खेलों में नैतिक चुनौतियों जैसी नई धमकियों से निपटना

भारत ने इन चर्चाओं में सक्रिय योगदान दिया, और अपनी इंटरएक्टिव बोर्ड प्रदर्शनी के माध्यम से एंटी-डोपिंग कन्वेंशन के विकास और मील के पत्थरों को भी प्रदर्शित किया।

भारत के योगदान और नीतिगत प्रस्ताव

भारत ने COP10 में एक शैक्षिक और मूल्यों-आधारित पहल — “Values Education through Sport (VETS)” — को बढ़ावा दिया, जिसका उद्देश्य है:

  • खेलों में नैतिकता, ईमानदारी और निष्पक्षता (Fair Play) को प्रोत्साहित करना

  • युवाओं को मूल्य-आधारित शिक्षा के माध्यम से खेलों से जोड़ना

  • खेल संगठनों की भूमिका को मजबूत करना ताकि स्वच्छ खेल संस्कृति का निर्माण हो सके

इस प्रस्ताव को व्यापक समर्थन मिला और इसे सदस्य देशों में शिक्षा-केंद्रित एंटी-डोपिंग परियोजनाओं का हिस्सा बनाया जा रहा है।

पुनर्निर्वाचन का महत्व

भारत का पुनर्निर्वाचन इस बात का प्रमाण है कि —

  • भारत की वैश्विक खेल शासन (Sports Governance) में साख बढ़ी है

  • NADA इंडिया की डोपिंग जागरूकता और प्रवर्तन में प्रभावशीलता सिद्ध हुई है

  • भारत अब स्वच्छ और नैतिक खेलों के प्रचार में एक वैचारिक नेतृत्वकर्ता (Thought Leader) के रूप में उभर रहा है

यह उपलब्धि भारत सरकार के प्रमुख खेल अभियानों —
फ़िट इंडिया मूवमेंट, खेलो इंडिया, और अंतरराष्ट्रीय खेल मानकों के अनुरूप नीति निर्माण — की दिशा में भी एक बड़ा कदम है।

केरल का पहला अंडरवाटर टनल प्रोजेक्ट: अरब सागर के नीचे जुड़ेगा वैपिन और फोर्ट कोच्चि

केरल एक ऐतिहासिक अवसंरचनात्मक (infrastructure) परियोजना की दिशा में कदम बढ़ा रहा है — राज्य का पहला अंडरवाटर टनल (जलमग्न सुरंग), जो वैपिन (Vypin) और फोर्ट कोच्चि (Fort Kochi) को जोड़ेगा। यह सुरंग केरल के तटीय राजमार्ग विकास परियोजना (Coastal Highway Project) का हिस्सा है।

इस इंजीनियरिंग चमत्कार के पूरा होने पर मौजूदा 16 किमी की दूरी घटकर मात्र 3 किमी की समुद्र-तल यात्रा रह जाएगी, जिससे कोच्चि — भारत के सबसे व्यस्त बंदरगाह शहरों में से एक — की कनेक्टिविटी एक नई परिभाषा पाएगी।

परियोजना का सारांश: एक अद्वितीय समुद्र-तल इंजीनियरिंग उपलब्धि

इस अंडरवाटर टनल का विकास केरल रेल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड (KRDCL) द्वारा किया जाएगा, जिसकी अनुमानित लागत ₹2,672 करोड़ होगी।

प्रमुख तकनीकी विवरण:

  • कुल लंबाई: 2.75 किमी
    (1.75 किमी बोर टनल + 1 किमी कट-एंड-कवर सेक्शन)

  • संरचना: ट्विन-ट्यूब डिज़ाइन (प्रत्येक दिशा के लिए अलग सुरंग)

  • आकार: 12.5 मीटर बाहरी व्यास, 11.25 मीटर आंतरिक चौड़ाई

  • गहराई: समुद्र तल से लगभग 35 मीटर नीचे

सुरक्षा विशेषताएँ:

  • हर 250 मीटर पर आपातकालीन रुकने के स्थान (Emergency Stops)

  • हर 500 मीटर पर एस्केप पैसेज (Escape Passage)

  • उन्नत वेंटिलेशन और अग्नि सुरक्षा प्रणाली

यह परियोजना केरल में अपनी तरह की पहली जलमग्न सड़क सुरंग होगी — जो केवल कोलकाता की हुगली नदी मेट्रो सुरंग से तुलना की जा सकती है, जो भारत की पहली अंडरवाटर रेल टनल है।

यात्रा समय और लागत में बड़ा सुधार

टनल के निर्माण से वैपिन और फोर्ट कोच्चि के बीच यात्रा समय में क्रांतिकारी बदलाव आएगा —
अब जहां यात्रा में 2 घंटे से अधिक समय लगता है, वहीं सुरंग के माध्यम से यह सिर्फ 30 मिनट में पूरी हो सकेगी।

वर्तमान में लोग या तो भीड़भाड़ वाले फेरी मार्गों का उपयोग करते हैं या 16 किमी लंबे गोश्री ब्रिज (Goshree Bridge) के रास्ते से घूमकर जाते हैं।

अब होगा सीधा फायदा:

  • टनल टोल शुल्क: ₹50–₹100 (वर्तमान औसत ₹300 की तुलना में काफी कम)

  • मासिक बचत: लगभग ₹1,500 तक

  • पर्यटकों और स्थानीय निवासियों दोनों के लिए समय और धन की बचत

टनल क्यों, पुल क्यों नहीं?

इससे पहले कोचिन पोर्ट चैनल पर पुल बनाने की योजना थी, लेकिन विशेषज्ञों ने कई तकनीकी चुनौतियाँ बताईं —

  • पुल को बहुत अधिक ऊँचाई पर बनाना पड़ता ताकि बड़े मालवाहक जहाज़ निकल सकें।

  • भूमि अधिग्रहण और लागत बहुत अधिक होती।

  • स्थानीय परिवेश और यातायात पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता।

इसके विपरीत, टनल के लाभ:

  • दोनों सिरों पर केवल 100 मीटर भूमि की आवश्यकता

  • शिपिंग यातायात और बंदरगाह संचालन पर कोई असर नहीं

  • पर्यावरणीय और शहरी प्रभाव न्यूनतम

KRDCL के प्रबंध निदेशक वी. अजित कुमार ने पुष्टि की कि यह सुरंग तकनीकी और वित्तीय दोनों दृष्टियों से अधिक व्यवहार्य और दीर्घकालिक समाधान है।

संक्षेप में:
केरल की यह अंडरवाटर टनल परियोजना न केवल राज्य की पहली समुद्र-तल सड़क सुरंग होगी, बल्कि यह भारत की तटीय कनेक्टिविटी के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगी — जो तकनीकी नवाचार, पर्यावरणीय संवेदनशीलता और आर्थिक दक्षता का एक अद्भुत संगम प्रस्तुत करती है।

भारतीय विज्ञापन जगत के दिग्गज पीयूष पांडे का 70 वर्ष की आयु में निधन

इंडियन एडवरटाइजिंग इंडस्ट्री के दिग्गज पीयूष पांडे का 70 साल की उम्र में निधन हो गया। पीयूष भारतीय विज्ञापन जगत की आवाज, मुस्कान और क्रिएटिविटी का चेहरा थे। जिन्होंने चार दशकों से अधिक समय तक ओगिल्वी इंडिया में काम किया और विज्ञापन जगत को बदल दिया। पांडे को सिर्फ एक विज्ञापन विशेषज्ञ के रूप में ही नहीं बल्कि ऐसी शख्सियत के रूप में याद किया जाता था, जिन्होंने भारतीय विज्ञापन को उसकी अपनी भाषा और आत्मा दी।

पीयूष पांडे ने 1982 में ओगिल्वी एंड माथर इंडिया (अब ओगिल्वी इंडिया) के साथ अपने विज्ञापन करियर की शुरुआत की थी। उन्होंने एक प्रशिक्षु खाता कार्यकारी के रूप में शुरुआत की और फिर रचनात्मक क्षेत्र में कदम रखा। अपनी प्रतिभा से उन्होंने भारतीय विज्ञापन जगत की तस्वीर ही बदल दी। पीयूष पांडे द्वारा बनाए गए विज्ञापन आज भी लोगों की यादों में बसे हुए हैं।

कई कैंपेन बेहद चर्चित

पीयूष पांडे विज्ञापन की दुनिया के जाने माने दिग्गज थे। उनके कई कैंपेन बेहद चर्चित रहे, जिसने घर-घर में ब्रांड्स की पहचान बना दी। लंबे समय तक भारत की विविधता में एकता दिखाने वाले गीत ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ के लेखक भी थे। उन्होंने फेविकोल, हच (वोडाफोन) जैसी कंपनियों के लिए भी कई सफल ऐड कैंपेन को भी लीड किया था।

मोदी के प्रचार अभियान का हिस्सा

पीयूष पांडे पीएम नरेंद्र मोदी के प्रचार अभियान का भी हिस्सा रहे। अबकी बार मोदी सरकार का नारा भी उन्होंने ही दिया था। जो काफी चर्चा में रहा।

पद्मश्री से सम्मानित

बता दें कि 2004 में पीयूष पांडे ने कान्स लायंस इंटरनेशनल फेस्टिवल ऑफ क्रिएटिविटी में जूरी अध्यक्ष के रूप में कार्य करने वाले पहले एशियाई के रूप में इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया। उनके अग्रणी योगदान को बाद में 2012 में क्लियो लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड और पद्मश्री से सम्मानित किया गया, जिससे वे राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त करने वाले भारतीय विज्ञापन जगत के पहले व्यक्ति बन गए।

पीयूष पांडे का जन्म

पीयूष पांडे का जन्म 1955 में जयपुर में हुआ था। उनके परिवार में नौ बच्चे थे, जिनमें सात बहनें और दो भाई शामिल थे। उनके भाई प्रसून पांडे फिल्म निर्देशक हैं, जबकि बहन ईला अरुण गायिका और अभिनेत्री थीं। उनके पिता राजस्थान राज्य सहकारी बैंक में कार्यरत थे। उन्होंने दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से इतिहास में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की और 1982 में विज्ञापन जगत में कदम रखा और ओगिल्वी इंडिया में क्लाइंट सर्विसिंग एक्जीक्यूटिव के रूप में शामिल हुए। उनका पहला प्रिंट विज्ञापन सनलाइट डिटर्जेंट के लिए लिखा गया।

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