महिलाओं के खिलाफ हिंसा उन्मूलन के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस 2025

हर वर्ष 25 नवंबर को महिलाओं के विरुद्ध हिंसा उन्मूलन का अंतर्राष्ट्रीय दिवस मनाया जाता है, जो लैंगिक आधारित हिंसा के खिलाफ 16 दिनों के वैश्विक सक्रियता अभियान की शुरुआत भी है। वर्ष 2025 का विषय “UNiTE to End Digital Violence Against All Women and Girls” महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ बढ़ती डिजिटल हिंसा—जैसे साइबर स्टॉकिंग, डॉक्सिंग, डीपफेक, और समन्वित ऑनलाइन उत्पीड़न—पर वैश्विक चिंताओं को उजागर करता है।

भारत पारंपरिक और तकनीक-सक्षम दोनों तरह की हिंसा से निपटने के लिए कानून, डिजिटल पहलों, हेल्पलाइन सेवाओं और पुनर्वास योजनाओं के माध्यम से एक समन्वित दृष्टिकोण अपना रहा है, ताकि महिलाओं की सुरक्षा, गरिमा और सशक्तिकरण को वास्तविक जीवन के साथ-साथ डिजिटल दुनिया में भी सुनिश्चित किया जा सके।

वैश्विक पृष्ठभूमि और इतिहास

अंतरराष्ट्रीय दिवस की उत्पत्ति

  • संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2000 में 25 नवंबर को महिलाओं के विरुद्ध हिंसा उन्मूलन का अंतरराष्ट्रीय दिवस घोषित किया।
  • यह तिथि मिराबल बहनों की 1960 में हुई हत्या की याद में चुनी गई, जिन्होंने डोमिनिकन रिपब्लिक की तानाशाही का विरोध किया था।
  • यही दिन 16 दिनों के अभियान (25 नवंबर से 10 दिसंबर—मानवाधिकार दिवस) की शुरुआत भी करता है।
  • वर्षों में यह दिन एक वैश्विक आंदोलन बन गया है, जो सरकारों, नागरिक समाज और समुदायों को हर प्रकार की लैंगिक हिंसा के खिलाफ एकजुट करता है।

डिजिटल सुरक्षा की ओर रुझान

पिछले दशक में महिलाओं के खिलाफ हिंसा ने डिजिटल क्षेत्र में भी गंभीर रूप ले लिया है। महिलाएँ तेजी से निम्न प्रकार की ऑनलाइन हिंसा का सामना कर रही हैं:

  • साइबरस्टॉकिंग

  • ऑनलाइन ब्लैकमेल

  • निजी तस्वीरों का बिना अनुमति प्रसार

  • डीपफेक तकनीक से बनाए गए आपत्तिजनक वीडियो

  • ट्रोलिंग और लक्षित ऑनलाइन उत्पीड़न

2025 की वैश्विक थीम इस बढ़ते डिजिटल ख़तरे से महिलाओं की रक्षा की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

महिलाओं की सुरक्षा को मजबूत करने वाले विधिक ढाँचे

भारतीय न्याय संहिता (Bharatiya Nyaya Sanhita), 2023

1 जुलाई 2024 से प्रभावी यह नया दंड संहिता कानून IPC का स्थान लेता है। इसमें शामिल हैं:

  • यौन अपराधों के लिए कठोर दंड—18 वर्ष से कम आयु की लड़की के बलात्कार पर आजीवन कारावास

  • यौन अपराधों की परिभाषाओं का विस्तार

  • पीड़िता के बयान की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य

  • महिलाओं व बच्चों से जुड़े मामलों की प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई

घरेलू हिंसा सुरक्षा: PWDVA, 2005

यह कानून महिलाओं को घरेलू परिवेश में होने वाले सभी प्रकार के शोषण से सुरक्षा देता है, जैसे—

  • शारीरिक, यौन, मौखिक, भावनात्मक और आर्थिक हिंसा

  • दहेज उत्पीड़न

  • लिव-इन संबंधों में सुरक्षा

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न (POSH Act), 2013

सभी कार्यस्थलों पर लागू, इसमें शामिल है:

  • 10 से अधिक कर्मचारियों वाली संस्थाओं में आंतरिक समिति (IC)

  • जिला स्तर पर स्थानीय समिति (LC)

  • 90 दिनों के भीतर शिकायत का निवारण

  • SHe-Box पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन शिकायत और ट्रैकिंग

मिशन शक्ति: महिलाओं के सशक्तिकरण की राष्ट्रीय रणनीति

सरकार की प्रमुख योजना मिशन शक्ति दो भागों में महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तिकरण पर केंद्रित है:

  • संबल: सुरक्षा और संरक्षण सेवाएँ

  • समर्थ्य: कौशल, शिक्षा और स्वास्थ्य के माध्यम से सशक्तिकरण

यह मिशन महिलाओं को जीवनचक्र आधारित सहायता प्रदान करता है।

महत्वपूर्ण सहायता योजनाएँ और हेल्पलाइन

वन स्टॉप सेंटर (OSCs)

2015 से कार्यरत ये केंद्र प्रदान करते हैं:

  • चिकित्सीय, कानूनी, पुलिस, मनोवैज्ञानिक सहायता

  • अस्थायी आश्रय

स्वाधार गृह योजना

2016 से संचालित, यह संकटग्रस्त महिलाओं की मदद करती है, जैसे:

  • हिंसा की शिकार

  • मानसिक आघात झेल रही महिलाएँ

  • तस्करी पीड़ित

  • परामर्श, आश्रय, कानूनी सहायता, और कौशल प्रशिक्षण उपलब्ध कराती है

महिला हेल्पलाइन 181

24×7 सेवा जो महिलाओं को पुलिस, अस्पताल, आश्रय और कानूनी सहायता से जोड़ती है।

NCW हेल्पलाइन: 7827170170

तात्कालिक पुलिस, चिकित्सा और कानूनी सहायता के लिए उपलब्ध।

तकनीक आधारित सुरक्षा उपाय

शी-बॉक्स

POSH अधिनियम के तहत कार्यस्थल यौन उत्पीड़न से जुड़ी शिकायतों का ऑनलाइन निवारण पोर्टल।

डिजिटल शक्ति अभियान

राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा संचालित—महिलाओं की साइबर सुरक्षा जागरूकता बढ़ाने हेतु।

अपराध ट्रैकिंग प्रणालियाँ

  • ITSSO: यौन अपराध मामलों की पुलिस जांच की निगरानी

  • NDSO: दुष्कर्म व यौन अपराधियों का राष्ट्रीय डेटाबेस

  • Cri-MAC: पुलिस के लिए रियल-टाइम अपराध अलर्ट

तेज़ न्याय के लिए संस्थागत तंत्र

फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSCs)

पूरे देश में 773 FTSCs (जिनमें 400 विशेष POCSO अदालतें शामिल) स्थापित।
अगस्त 2025 तक 3.3 लाख से अधिक मामलों का निपटारा।

महिला सहायता डेस्क (WHDs)

फरवरी 2025 तक 14,658 डेस्क पुलिस थानों में स्थापित—सुरक्षित शिकायत और परामर्श हेतु।

मानसिक स्वास्थ्य सहायता: परियोजना स्त्री मनोरक्षा

NIMHANS, बेंगलुरु के सहयोग से:

  • OSC स्टाफ को मानसिक स्वास्थ्य और ट्रॉमा काउंसलिंग का प्रशिक्षण

  • हिंसा की पीड़िताओं को बेहतर मनो-सामाजिक सहायता

स्थिर तथ्य 

  • दिन: 25 नवंबर (महिलाओं के विरुद्ध हिंसा उन्मूलन का अंतरराष्ट्रीय दिवस)

  • 2025 की थीम: “सभी महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ डिजिटल हिंसा समाप्त करने के लिए एकजुट हों”

  • हेल्पलाइन: 181, 7827170170 (NCW), 112 (आपातकाल), 7217735372 (WhatsApp)

  • मुख्य विधिक सुधार: भारतीय न्याय संहिता 2023, PWDVA 2005, POSH Act 2013

  • प्रमुख योजनाएँ: मिशन शक्ति, स्वाधार गृह, वन स्टॉप सेंटर, डिजिटल शक्ति

  • डिजिटल उपकरण: ITSSO, NDSO, Cri-MAC, SHe-Box

  • महिला सहायता डेस्क: 14,658

  • फास्ट ट्रैक कोर्ट: 773 (400 विशेष POCSO अदालतें)

  • स्वाधार गृह योजना: अप्रैल 2016 से संशोधित रूप में लागू

इथियोपिया में 12 हजार साल बाद ज्वालामुखी फटा, जानें किन-किन देशों तक होगा इसका असर?

इथियोपिया का हैली गुब्बी ज्वालामुखी 12 हजार साल बाद अचानक 23 नवंबर 2025 को फट गया। इस विस्फोट से उठने वाली राख और सल्फर डाइऑक्साइड करीब 15 किमी ऊंचाई तक पहुंच गई। यह लाल सागर पार करते हुए यमन और ओमान तक फैल गई। विस्फोट से उठी भारी मात्रा में ज्वालामुखी राख ऊपरी वायुमंडल तक पहुंच गई है। ये राख बादल हजारों किलोमीटर की दूरी तय करते हुए अब उत्तरी भारत और पाकिस्तान की ओर बढ़ रहे हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय हवाई यातायात प्रभावित हो रहा है और विमानन प्राधिकरणों द्वारा अलर्ट जारी किए गए हैं। इस घटना के बाद भारत के डीजीसीए और कई एयरलाइनों ने एडवाइजरी जारी की है, जबकि मौसम विज्ञान एजेंसियाँ राख के फैलाव और उसकी दिशा की निरंतर निगरानी कर रही हैं।

कितने सालों बाद फिर सक्रिय हुआ ज्वालामुखी?

हैली गुब्बी एक शील्ड-टाइप ज्वालामुखी है और इथियोपिया के दूर-दराज अफार क्षेत्र में आता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इस ज्वालामुखी के होलोसीन काल (कई हजार साल) में विस्फोट का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला है। माना जाता है कि यह 10,00012,000 साल बाद फिर से सक्रिय हुआ है। इलाका बेहद दूर और कठिन है, इसलिए ज्वालामुखी की निगरानी आम तौर पर सैटेलाइट के जरिए ही होती है। इसी कारण विस्फोट से जुड़ी शुरुआती जानकारी भी उपग्रहों से ही मिली है।

हैली गुब्बी कहाँ है और यह क्यों महत्वपूर्ण है

हैली गुब्बी ज्वालामुखी इथियोपिया की रिफ्ट वैली में स्थित है, जो एर्टा अले पर्वतमाला का हिस्सा है और अपनी उच्च भू-भौतिकीय गतिविधि के लिए जाना जाता है।

मुख्य बिंदु

  • यह ज्वालामुखी लगभग 10,000–12,000 वर्ष पहले अंतिम बार फटा था।

  • 8:30 AM UTC (13:30 IST) पर इस बार विस्फोट हुआ।

  • ज्वालामुखीय राख 14 किलोमीटर की ऊँचाई तक पहुँच गई, जिससे यह उच्च-ऊँचाई वाली अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए खतरा बन गई।

  • अपनी भौगोलिक स्थिति और विस्फोट की तीव्रता के कारण यह घटना पूर्वी अफ्रीका–मध्य पूर्व–दक्षिण एशिया को जोड़ने वाले महत्वपूर्ण हवाई मार्गों को प्रभावित कर रही है।

ज्वालामुखीय राख का बादल क्या होता है?

ज्वालामुखी के विस्फोट के दौरान जब सामग्री अत्यधिक दबाव के साथ वातावरण में फेंकी जाती है, तो वह मिलकर राख का बादल बनाती है। इसमें शामिल होते हैं—

  • अत्यंत बारीक राख कण

  • सल्फर डाइऑक्साइड जैसे ज्वालामुखीय गैसें

  • सूक्ष्म चट्टान और कांच के टुकड़े

ये बादल 45,000 फीट तक ऊँचाई पर पहुँच सकते हैं और 100–120 किमी/घंटा की रफ्तार से यात्रा करते हैं।
ऐसे बादल विमानों के इंजन और नेविगेशन सिस्टम को गंभीर नुकसान पहुँचा सकते हैं, साथ ही ज़मीन पर वायु गुणवत्ता को भी खराब कर देते हैं।

भारत में संभावित रूप से प्रभावित क्षेत्र
IndiaMetSky Weather के अनुसार, हाइली गुब्बी ज्वालामुखी से उठा राख का गुबार भारत के कई हिस्सों की ओर बढ़ रहा है।

  • राख का बादल शाम तक गुजरात में प्रवेश कर सकता है

  • रात 10 बजे तक इसके राजस्थान, उत्तर-पश्चिम महाराष्ट्र, दिल्ली, हरियाणा और पंजाब तक पहुँचने की संभावना

  • आगे चलकर यह हिमालयी क्षेत्र को भी प्रभावित कर सकता है

मौसम विभाग और प्रदूषण निगरानी एजेंसियाँ इसकी गति, ऊँचाई और घनत्व पर लगातार नजर रखे हुए हैं।

ज्वालामुखीय राख के खतरे

1. विमानन जोखिम

ज्वालामुखीय राख विमानों के लिए अत्यंत खतरनाक होती है क्योंकि—

  • यह जेट इंजनों के भीतर पिघलकर इंजन फेलियर का कारण बन सकती है

  • पायलटों के लिए दृश्यता कम कर देती है

  • कॉकपिट की खिड़कियों को नुकसान पहुँचाती है और नेविगेशन सिस्टम में बाधा डालती है

1982 के माउंट गालुंगगुंग हादसे जैसे उदाहरणों में विमानों के इंजन बंद हो जाने के गंभीर मामले देखे गए हैं।

2. स्वास्थ्य जोखिम

राख के कण मानव स्वास्थ्य को भी प्रभावित करते हैं, विशेषकर—

  • अस्थमा, COPD या अन्य सांस संबंधी बीमारियों वाले लोगों के लिए परेशानी

  • आँखों और त्वचा में जलन

  • यात्रा बाधित होने और चेतावनियों के कारण मानसिक तनाव

विमानन प्रभाव और DGCA की सलाह

भारत की DGCA ने स्थिति को देखते हुए तुरंत चेतावनी जारी की है—

  • एयरलाइंस को प्रभावित ऊँचाइयों और हवाई क्षेत्रों से बचने के निर्देश

  • फ्लाइट रूट और ईंधन योजना में बदलाव की सलाह

  • मौसम और विमानन प्राधिकरणों के साथ निरंतर समन्वय बनाए रखने को कहा गया

ज्वालामुखीय राख विमानों के लिए खतरा पैदा करती है—

  • दृश्यता घटाकर

  • जेट इंजनों को नुकसान पहुँचाकर

  • संवेदनशील एवियोनिक्स उपकरणों को क्षतिग्रस्त कर

एयरलाइनों की प्रतिक्रिया

  • IndiGo: स्थिति पर लगातार नजर, सभी सुरक्षा उपायों के लिए तैयार

  • Air India: अभी कोई व्यवधान नहीं, लेकिन प्रभावित क्षेत्रों पर नजर

  • SpiceJet: दुबई के आसपास की उड़ानों में देरी की चेतावनी; यात्रियों से स्थिति जाँचने का अनुरोध

  • Akasa Air: क्षेत्रीय जोखिम पर नजर रखते हुए सभी सलाहों की समीक्षा कर रही है

हवाई अड्डे और यात्रियों के लिए अलर्ट — हिंदी अनुवाद

हवाई अड्डे और यात्री अलर्ट
छत्रपति शिवाजी महाराज अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे (मुंबई) ने एक सार्वजनिक सूचना जारी करते हुए कहा:

“इथियोपिया में ज्वालामुखी विस्फोट के कारण कुछ अंतरराष्ट्रीय मार्ग प्रभावित हो सकते हैं। यात्री हवाई अड्डे के लिए निकलने से पहले अपनी उड़ान स्थिति की पुष्टि करें।”

यह सलाह इसलिए जारी की गई है क्योंकि आशंका है कि राख का गुबार आने वाले दिनों में भारत के वायुमंडल में प्रवेश कर सकता है, जो हवा की दिशा और मौसम की स्थिति पर निर्भर करेगा।

वर्तमान राख गुबार (Ash Plume) की दिशा और मौसम विभाग की निगरानी

टूलूज़ वॉल्कैनिक ऐश एडवाइज़री सेंटर (VAAC) ने पुष्टि की है कि भले ही विस्फोट अब रुक चुका है, लेकिन राख का गुबार अभी भी सक्रिय है और उत्तर भारत की ओर बढ़ रहा है। इसके चलते पाकिस्तान, यमन, ओमान और भारत के हवाई क्षेत्र में अलर्ट जारी हुए हैं।

मौसम विशेषज्ञ सैटेलाइट इमेजरी की मदद से लगातार यह निगरानी कर रहे हैं:

  • राख की वास्तविक समय में गति

  • एशिया के संभावित प्रभावित क्षेत्र

  • विमानन और आपदा प्रबंधन एजेंसियों के लिए अपडेटेड चेतावनियाँ

आपको क्या करना चाहिए: सुरक्षा दिशानिर्देश

सामान्य जनता के लिए

  • राख के संपर्क से बचें: घर के अंदर रहें, दरवाजे-खिड़कियाँ बंद रखें

  • बाहर निकलना ज़रूरी हो तो N95 मास्क पहनें

  • दमा, COPD या अन्य श्वसन रोग वाले लोग दवाएँ तैयार रखें

  • दृश्यता कम हो तो बाहरी गतिविधियों से बचें

  • पानी, भोजन और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को ढककर रखें

यात्रियों के लिए

  • हवाई अड्डे निकलने से पहले उड़ान की स्थिति जाँचें

  • देरी, डायवर्जन या कैंसिलेशन संभव हैं

  • एयरलाइन से वास्तविक समय अपडेट लेते रहें

स्टैटिक फैक्ट्स 

  • ज्वालामुखी का नाम: हेली गुब्बी
  • स्थान: एर्टा एले रेंज, इथियोपिया (रिफ्ट वैली)
  • अंतिम विस्फोट: लगभग 12,000 वर्ष पहले
  • विस्फोट का समय: 8:30 AM UTC / 13:30 IST (रविवार)
  • राख गुबार की ऊँचाई: ~14 किमी
  • प्रभावित क्षेत्र: भारत, पाकिस्तान, रेड सी देश, मध्य पूर्व
  • DGCA सलाह: भारतीय एयरलाइनों को रूट बदलने / ऊँचाई समायोजित करने का निर्देश
  • निगरानी करने वाली एयरलाइंस: इंडिगो, एयर इंडिया, अकासा एयर, स्पाइसजेट, KLM

 

उपराष्ट्रपति ने जनजातीय मामलों के मंत्रालय की प्रमुख पहलों की समीक्षा की

भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन को हाल ही में केन्द्रीय जनजातीय कार्य मंत्री जुएल ओराम और वरिष्ठ अधिकारियों ने मंत्रालय की उन पहलों के बारे में अवगत कराया, जो देशभर की जनजातीय आबादी को सशक्त बनाने के उद्देश्य से चलाई जा रही हैं। संसद भवन में हुई इस बैठक में शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका और जनजातीय समुदायों के अधिकारों पर केन्द्रित कई कार्यक्रमों की जानकारी दी गई। उपराष्ट्रपति ने मंत्रालय के बढ़े हुए बजट की सराहना की और विश्वविद्यालयों–स्कूलों के बीच मजबूत संबंध, अधिक शैक्षणिक सहायता और विशेष रूप से जनजातीय-बहुल क्षेत्रों में त्वरित स्वास्थ्य हस्तक्षेप की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।

जनजातीय कल्याण के लिए बड़ा बजट बढ़ोतरी

  • पिछले 11 वर्षों में मंत्रालय के बजट में तीन गुना वृद्धि हुई है। मंत्रालय का बजट 2014-15 में लगभग ₹4,500 करोड़ से बढ़कर 2025-26 में करीब ₹15,000 करोड़ हो गया है।
  • यह वृद्धि शिक्षा, ग्रामीण बुनियादी ढांचे और विशेष रूप से अति संवेदनशील जनजातीय समूहों के कल्याण के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

शिक्षा को सशक्त बनाना: EMRS से विश्वविद्यालय तक

शिक्षा जनजातीय उत्थान रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। सरकार ने दूरस्थ जनजातीय क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय (EMRS) के नेटवर्क को तेजी से बढ़ाया है।

मध्य-2025 तक:

  • 728 EMRS स्वीकृत

  • 479 स्कूल कार्यरत

  • 1.38 लाख से अधिक जनजातीय विद्यार्थी नामांकित

उपराष्ट्रपति ने विश्वविद्यालय-सह विद्यालय साझेदारी की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि जनजातीय छात्र उच्च शिक्षा—यहाँ तक कि वैश्विक अवसरों—तक आसानी से पहुँच सकें। उन्होंने ड्रॉपआउट दर कम करने के लिए सतत शैक्षणिक सहयोग की जरूरत भी बताई।

समग्र विकास के प्रमुख कार्यक्रम

मंत्रालय की विकास दृष्टि बहु-क्षेत्रीय है, जिसे कई प्रमुख योजनाएँ आगे बढ़ाती हैं:

PM-JANMAN

प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महाअभियान
PVTGs (विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह) को शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी और आवास जैसी बुनियादी सेवाओं तक पहुँच सुनिश्चित करता है।

धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्‍कर्ष अभियान

यह योजना जनजातीय गाँवों में बुनियादी ढाँचे की 100% उपलब्धता पर केंद्रित है—सड़क, बिजली, स्कूल, और डिजिटल कनेक्टिविटी सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न मंत्रालयों के साथ काम करती है।

आदि कर्मयोगी अभियान

जनजातीय युवाओं और अधिकारियों में नेतृत्व और प्रशासनिक क्षमता विकसित करने की अनूठी पहल।

स्वास्थ्य प्राथमिकता: सिकल सेल एनीमिया से लड़ाई

सिकल सेल एनीमिया जनजातीय क्षेत्रों में एक प्रमुख स्वास्थ्य चुनौती है। इसे नियंत्रित करने के लिए मंत्रालय ने कई पहलें शुरू की हैं:

  • व्यापक स्क्रीनिंग और प्रारंभिक पहचान

  • उपचार और काउंसलिंग तक बेहतर पहुँच

  • दूरस्थ जनजातीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य ढाँचे को मजबूत करना

उपराष्ट्रपति ने इन प्रयासों की सराहना की और यह सुनिश्चित करने की जरूरत बताई कि जनजातीय समुदायों को समय पर गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ मिलें।

जनजातीय संस्कृति और आजीविका को बढ़ावा

मंत्रालय जनजातीय कला, संस्कृति और विरासत के संरक्षण के साथ-साथ उनकी आजीविका सुधारने पर भी काम कर रहा है। परंपरागत कौशल—हस्तशिल्प, वन उपज संग्रहण, जनजातीय उद्यमिता—को वित्तीय सहायता और प्रशिक्षण के माध्यम से मजबूत किया जा रहा है।

इस प्रयास का उद्देश्य जनजातीय पहचान को संरक्षित रखते हुए बेहतर आय और आर्थिक स्वावलंबन प्रदान करना है।

चुनौतियाँ जो अभी भी बनी हुई हैं

हालांकि बहुत प्रगति हुई है, लेकिन कुछ प्रमुख चुनौतियाँ अब भी हैं:

  • योजनाओं को हर जनजातीय परिवार तक पहुँचाना

  • ड्रॉपआउट दर कम करना और उच्च शिक्षा के लिए मार्ग सुगम बनाना

  • दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी को दूर करना

  • योजनाओं के क्रियान्वयन में समुदाय की भागीदारी बढ़ाना

उपराष्ट्रपति ने कहा कि केवल तभी भारत विकसित राष्ट्र (विकसित भारत) बन सकता है, जब जनजातीय समुदायों तक कल्याण योजनाओं के वास्तविक लाभ पहुँचें।

स्थिर तथ्य 

  • मंत्रालय बजट (2025-26): ₹14,925.81 करोड़

  • EMRS स्वीकृत: 728

  • EMRS कार्यरत: 479

  • EMRS नामांकन: 1.38 लाख+

  • प्रमुख योजनाएँ: PM-JANMAN, धरती आबा अभियान, आदि कर्मयोगी अभियान

  • लक्ष्य समूह: अनुसूचित जनजाति (विशेष रूप से PVTGs)

  • स्वास्थ्य फोकस: सिकल सेल एनीमिया स्क्रीनिंग व उपचार

  • शिक्षा फोकस: विश्वविद्यालय–विद्यालय सहयोग, विदेशी अध्ययन के अवसर

  • दृष्टि: जनजातीय उत्थान ही विकसित भारत का मार्ग

जस्टिस सूर्यकांत ने भारत के 53वें चीफ जस्टिस के तौर पर शपथ ली

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने 24 नवंबर 2025 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा राष्ट्रपति भवन में शपथ ग्रहण करने के बाद औपचारिक रूप से भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश (CJI) के रूप में पदभार संभाला। उनका यह कार्यभार भारतीय न्यायपालिका के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, क्योंकि वे दशकों के कानूनी अनुभव और कई ऐतिहासिक निर्णयों में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका के साथ सुप्रीम कोर्ट का नेतृत्व करने जा रहे हैं। उनका कार्यकाल 9 फरवरी 2027 तक रहेगा, जिससे उन्हें देश की सर्वोच्च अदालत का नेतृत्व करने के लिए एक वर्ष से अधिक का समय मिलेगा।

शपथ ग्रहण समारोह

  • न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने हिंदी में, ईश्वर के नाम पर, एक संक्षिप्त लेकिन गरिमामय समारोह में पद और गोपनीयता की शपथ ली।
  • इस अवसर पर उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई उच्च-स्तरीय नेता उपस्थित थे।
  • समारोह के बाद न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने प्रधानमंत्री से औपचारिक रूप से मुलाकात की। इसके बाद राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, निवर्तमान CJI न्यायमूर्ति गवई और कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल के साथ एक पारंपरिक समूह फ़ोटोग्राफ़ लिया गया।
  • पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ भी नए मुख्य न्यायाधीश को बधाई देने पहुंचे।

हिसार से भारत के सर्वोच्च न्यायिक पद तक का सफर

  • 10 फरवरी 1962 को हरियाणा के हिसार में जन्मे न्यायमूर्ति सूर्यकांत का कानूनी सफर एक छोटे-शहर के अधिवक्ता के रूप में शुरू हुआ।
  • न्यायिक पदों पर निरंतर प्रगति करते हुए उन्होंने पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में कार्य किया।
  • 2018 में वे हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बने।
  • इसके बाद 24 मई 2019 को उन्हें सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किया गया।
  • उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से एलएलएम शामिल है, जिसमें उन्हें “फर्स्ट क्लास फर्स्ट” का सम्मान प्राप्त हुआ।

संविधान और सुधारों से आकार लेती उनकी न्यायिक दृष्टि

सुप्रीम कोर्ट में अपने कार्यकाल के दौरान न्यायमूर्ति सूर्यकांत कई महत्वपूर्ण फैसलों का हिस्सा रहे हैं, जिनमें शामिल हैं—

  • अनुच्छेद 370 हटाए जाने से जुड़े मामले

  • पेगासस स्पाइवेयर जांच

  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिकता संबंधी मुद्दे

  • बिहार में विशेष मतदाता सूची संशोधन, जिसमें 65 लाख मतदाताओं के नाम हटने पर गंभीर सवाल उठाए

  • राज्य कानून से संबंधित मामलों में राज्यपाल और राष्ट्रपति की शक्तियों पर राष्ट्रपति के संदर्भ का परीक्षण

इन फैसलों ने उनकी उस प्रतिबद्धता को दर्शाया है जो संवैधानिक लोकतंत्र की बदलती जरूरतों और संस्थागत संतुलन को मजबूती देती है।

मुख्य न्यायाधीश के रूप में उनकी प्राथमिकताएँ

न्यायमूर्ति सूर्यकांत का शीर्ष न्यायालय के लिए एजेंडा निम्नलिखित प्रमुख क्षेत्रों पर केंद्रित है—

  • लंबित मामलों में कमी: निचली अदालतों को मजबूत करना और निपटान समय में सुधार

  • संविधान पीठों को पुनर्जीवित करना: 5, 7 या 9 न्यायाधीशों वाली लंबे समय से लंबित संविधान पीठों के मामलों में प्रगति

  • मध्यस्थता और वैकल्पिक विवाद समाधान को बढ़ावा

  • तकनीक आधारित नवाचार: डिजिटल केस मैनेजमेंट को बढ़ावा और AI उपकरणों के उपयोग की संभावनाओं पर ध्यान, साथ ही न्याय में मानव निर्णय की अनिवार्यता पर जोर

  • न्याय की सुलभता: विशेष रूप से वंचित समूहों के लिए संवेदनशील और समान न्याय वितरण पर बल

उनकी नियुक्ति का महत्व

CJI के रूप में न्यायमूर्ति सूर्यकांत की नियुक्ति भारतीय न्यायपालिका में संवैधानिक व्याख्या और संस्थागत सुधारों की निरंतरता को दर्शाती है।
उनके कार्यकाल में निम्नलिखित क्षेत्रों पर विशेष ध्यान रहने की उम्मीद है—

  • न्यायिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक जवाबदेही के बीच संतुलन

  • केंद्र-राज्य समन्वय के साथ कानूनी सुधारों को बढ़ावा

  • अधिकार-आधारित न्यायशास्त्र और पारदर्शी शासन को मजबूत करना

भारत के महत्वपूर्ण सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों के दौर में उनका नेतृत्व न्यायिक स्थिरता और प्रगतिशील कानूनी विकास को दिशा देगा।

स्थैतिक तथ्य 

  • नाम: न्यायमूर्ति सूर्यकांत

  • पद: भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश (CJI)

  • शपथ तिथि: 24 नवंबर 2025

  • सेवानिवृत्ति तिथि: 9 फरवरी 2027 (65 वर्ष की आयु पर)

  • जन्म: 10 फरवरी 1962, हिसार, हरियाणा

  • शिक्षा: एलएलएम, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय

  • पूर्व भूमिकाएँ: मुख्य न्यायाधीश, हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय; न्यायाधीश, पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय

  • सुप्रीम कोर्ट कार्यकाल आरंभ: 24 मई 2019

इलेक्ट्रिसिटी (संशोधन) विधेयक, 2025: भारत के बिजली क्षेत्र में सुधार

इलेक्ट्रिसिटी (संशोधन) विधेयक, 2025 भारत के बिजली क्षेत्र को आधुनिक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण सुधार पहल है। इसका उद्देश्य बिजली की आपूर्ति, मूल्य निर्धारण और विनियमन से जुड़ी पुरानी प्रणालियों को बदलकर एक अधिक प्रतिस्पर्धी, कुशल और उपभोक्ता-अनुकूल ढांचा स्थापित करना है।

विधेयक क्या करना चाहता है?

मुख्य लक्ष्य

  • बिजली की लागत का तर्कसंगतीकरण ताकि टैरिफ वास्तविक आपूर्ति लागत को दर्शा सकें।

  • छिपी हुई क्रॉस-सब्सिडी को कम करना, जहां उद्योग और वाणिज्यिक उपभोक्ता अन्य श्रेणियों को सब्सिडी देते हैं।

  • किसानों और निम्न-आय वर्गों के लिए सब्सिडी वाली बिजली को पूरी तरह सुरक्षित रखना।

  • नियामक जवाबदेही को मजबूत करना, जिससे निर्णय समय पर हों और वितरण कंपनियों पर वित्तीय दबाव कम हो।

  • साझा नेटवर्क उपयोग को बढ़ावा देना, ताकि समानांतर बुनियादी ढांचे की आवश्यकता कम हो और लागत में कमी आए।

  • बिजली आपूर्ति की गुणवत्ता और विश्वसनीयता में सुधार, साथ ही केंद्र-राज्य समन्वय बढ़ाना।

मुख्य संरचनात्मक सुधार

1. वितरण में प्रतिस्पर्धा

  • एक ही क्षेत्र में एक से अधिक वितरण लाइसेंसधारकों को काम करने की अनुमति दी जाएगी।

  • इससे पारंपरिक एकाधिकार मॉडल टूटेगा और उपभोक्ताओं को विकल्प तथा बेहतर सेवा मिलेगी।

  • सभी लाइसेंसधारकों पर सार्वभौमिक सेवा दायित्व (USO) लागू होगा, जिससे किसी भी उपभोक्ता के साथ भेदभाव नहीं होगा।

2. टैरिफ और क्रॉस-सब्सिडी का तर्कसंगतीकरण

  • टैरिफ को लागत-संगत (cost-reflective) बनाना अनिवार्य होगा।

  • उद्योग, रेलवे और मेट्रो जैसे उपभोक्ताओं के लिए क्रॉस-सब्सिडी को पाँच वर्षों में समाप्त करने का लक्ष्य।

  • कमजोर वर्गों को मिलने वाली सब्सिडी बरकरार रहेगी।

3. अवसंरचना और नेटवर्क दक्षता

  • नियामक आयोग को व्हीलिंग चार्ज तय करने की शक्ति दी गई है।

  • साझा नेटवर्क मॉडल को बढ़ावा देकर अनावश्यक समानांतर ढाँचे को रोका जाएगा।

  • ऊर्जा भंडारण प्रणाली (ESS) को बिजली प्रणाली के आधिकारिक हिस्से के रूप में मान्यता।

4. प्रशासन एवं नियामक सुधार

  • इलेक्ट्रिसिटी काउंसिल की स्थापना, जो केंद्र और राज्यों के बीच नीति समन्वय बढ़ाएगी।

  • राज्य विद्युत नियामक आयोगों (SERCs) को अधिक शक्तियाँ दी जाएँगी, जैसे—

    • अनुपालन न होने पर दंड लगाना

    • देर होने पर स्वतः टैरिफ आदेश जारी करना (suo motu)

5. बाज़ार एवं स्थिरता-केंद्रित सुधार

  • गैर-जीवाश्म स्रोतों से बिजली खरीदने के दायित्व को मजबूत किया गया है।

  • बिजली बाज़ारों, ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म और उन्नत डिस्पैच तंत्र को बढ़ावा।

  • स्वच्छ ऊर्जा और नेट-ज़ीरो लक्ष्यों के अनुरूप नीतियाँ।

संदर्भ और आवश्यकता

इन चुनौतियों के कारण सुधार आवश्यक हुए:

  • वितरण कंपनियों (DISCOMs) की लगातार वित्तीय समस्याएँ, उच्च AT&C नुकसान और बिलिंग अक्षमताएँ।

  • एकल-आपूर्तिकर्ता मॉडल के कारण उपभोक्ता विकल्पों की कमी और सेवा गुणवत्ता में सीमित सुधार।

  • उद्योगों पर उच्च बिजली दरों का बोझ, जिससे वैश्विक प्रतिस्पर्धा प्रभावित होती है।

  • ISTS (अंतर-राज्यीय ट्रांसमिशन सिस्टम) मॉडल ने दर्शाया कि साझा नेटवर्क और प्रतिस्पर्धा से बेहतर परिणाम मिलते हैं।

यह विधेयक बिजली क्षेत्र को भविष्य-तैयार बनाने का प्रयास है ताकि वह भारत की आर्थिक वृद्धि, उद्योगों, घरेलू उपभोक्ताओं और जलवायु लक्ष्यों में मजबूत योगदान दे सके।

स्थैतिक तथ्य (Static Facts)

  • विधेयक का नाम: इलेक्ट्रिसिटी (संशोधन) विधेयक, 2025

  • मुख्य नीति: लागत-प्रतिबिंबित टैरिफ, कमजोर वर्गों की सुरक्षा के साथ

  • क्रॉस-सब्सिडी समाप्ति लक्ष्य: उद्योग, रेलवे, मेट्रो – 5 वर्षों में

  • मुख्य संरचनात्मक सुधार:

    • एक क्षेत्र में कई वितरण लाइसेंस

    • साझा नेटवर्क

    • ESS को मान्यता

  • शासन सुधार:

    • इलेक्ट्रिसिटी काउंसिल

    • SERC की शक्तियों में वृद्धि

  • उद्देश्य: एकाधिकार से हटकर चयन-आधारित प्रतिस्पर्धी मॉडल की ओर संक्रमण

भारतीय रेलवे ने वित्त वर्ष 2025-26 में 1 बिलियन टन माल ढुलाई का आंकड़ा पार किया

भारतीय रेल ने देश की माल परिवहन क्षमता में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए वित्त वर्ष 2025-26 में 1 अरब टन (1 बिलियन टन) से अधिक की संचयी माल ढुलाई दर्ज की है। 19 नवंबर 2025 तक कुल माल लदान लगभग 1,020 मिलियन टन (MT) तक पहुंच गया। यह उपलब्धि भारत की औद्योगिक वृद्धि, बुनियादी ढाँचे के विकास, लॉजिस्टिक्स दक्षता और सतत परिवहन में रेल की अहम भूमिका को रेखांकित करती है।

प्रदर्शन का विश्लेषण

मुख्य योगदान करने वाले क्षेत्र

भारतीय रेल की माल ढुलाई कई प्रमुख वस्तु-श्रेणियों पर आधारित रही:

  • कोयला: ~505 MT

  • लौह अयस्क (Iron Ore): ~115 MT

  • सीमेंट: ~92 MT

  • कंटेनर यातायात: ~59 MT

  • पिग आयरन और तैयार स्टील: ~47 MT

  • उर्वरक: ~42 MT

  • खनिज तेल: ~32 MT

  • अनाज: ~30 MT

  • स्टील प्लांट के लिए कच्चा माल: ~20 MT

  • अन्य वस्तुएँ: ~74 MT

यह आँकड़े बताते हैं कि रेल की वृद्धि केवल एक या दो क्षेत्रों पर निर्भर नहीं है, बल्कि व्यापक और विविध माल श्रेणियों से संचालित हो रही है।

दैनिक और अवधि-आधारित प्रदर्शन

  • दैनिक माल ढुलाई: लगभग 4.4 मिलियन टन, जो पिछले वर्ष के ~4.2 मिलियन टन से अधिक है।

  • अप्रैल–अक्टूबर 2025: 935.1 MT

  • अप्रैल–अक्टूबर 2024: 906.9 MT
    यह वार्षिक आधार पर निरंतर वृद्धि को दर्शाता है।

रणनीतिक सुधार और लॉजिस्टिक सुधार

रेलवे ने गैर-कोयला भारी माल विशेषकर सीमेंट क्षेत्र में वृद्धि की क्षमता को पहचानते हुए कई सुधार लागू किए हैं:

  • बल्क सीमेंट टर्मिनल नीति — बड़े लॉट साइज और तेज हैंडलिंग की सुविधा

  • कंटेनरों में सीमेंट परिवहन के लिए दरों का तर्कसंगतकरण — उद्योग और उपभोक्ताओं दोनों के लिए लॉजिस्टिक लागत कम

इन सुधारों से:

  • अधिक माल रेल मार्ग से शिफ्ट होगा

  • टर्नअराउंड टाइम घटेगा

  • परिवहन लागत कम होगी

  • बुनियादी ढाँचे का विस्तार तेज़ी से होगा

सततता और आर्थिक प्रभाव

सड़क परिवहन से भारी माल को रेल पर स्थानांतरित करने से:

  • कार्बन उत्सर्जन में कमी

  • राजमार्गों पर भीड़ घटती है

  • सड़क रखरखाव पर कम खर्च

  • उद्योगों, विशेषकर MSMEs के लिए किफायती लॉजिस्टिक समाधान

  • राष्ट्रीय जलवायु लक्ष्यों में महत्वपूर्ण योगदान

यह उपलब्धि संकेत देती है कि भारतीय रेल माल ढुलाई अब आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण दोनों की प्रेरक शक्ति बन रही है।

स्थिर तथ्य 

  • कुल माल लदान (19 नवंबर 2025 तक): 1,020 MT

  • दैनिक माल ढुलाई: 4.4 मिलियन टन

  • अप्रैल–अक्टूबर 2025 माल ढुलाई: 935.1 MT

  • अप्रैल–अक्टूबर 2024: 906.9 MT

  • कोयला का योगदान: 505 MT

जानें क्या है आर्टिकल 240 जिसके दायरे में चंडीगढ़ को लाना चाहती है सरकार

भारत सरकार संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2025 लाने की तैयारी में है, जिसका उद्देश्य केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ को संविधान के अनुच्छेद 240 के अंतर्गत लाना है। यह कदम चंडीगढ़ के प्रशासनिक ढांचे में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत देता है और उसे उन अन्य केंद्र शासित प्रदेशों की श्रेणी में शामिल करेगा जो सीधे राष्ट्रपति द्वारा बनाए गए विनियमों के तहत संचालित होते हैं। वर्तमान में चंडीगढ़ का प्रशासन पंजाब के राज्यपाल के हाथों में है, जो पंजाब और हरियाणा दोनों की राजधानी होने की ऐतिहासिक व्यवस्था से जुड़ा है। प्रस्तावित संशोधन से चंडीगढ़ के लिए स्वतंत्र और स्पष्ट प्रशासनिक संरचना बनने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है, जिससे शासन और नीति-निर्माण प्रक्रियाएं अधिक सुव्यवस्थित और प्रभावी बनेंगी।

अनुच्छेद 240 क्या है?

अनुच्छेद 240 भारत के राष्ट्रपति को कुछ केंद्रशासित प्रदेशों (UTs) के लिए शांति, प्रगति और सुशासन से संबंधित विनियम (Regulations) बनाने का अधिकार देता है। वर्तमान में यह अधिकार निम्नलिखित केंद्रशासित प्रदेशों पर लागू होता है—

  • अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह

  • लक्षद्वीप

  • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव

  • पुडुचेरी (केवल तब, जब उसकी विधानसभा निलंबित या भंग हो)

प्रस्तावित विधेयक के अनुसार, चंडीगढ़ को भी इस सूची में शामिल किया जाएगा, जिससे राष्ट्रपति को चंडीगढ़ के लिए भी प्रत्यक्ष रूप से विनियम बनाने का अधिकार मिल जाएगा।

संशोधन क्या प्रस्तावित करता है?

  • चंडीगढ़ को अनुच्छेद 240 के अंतर्गत लाना: इससे चंडीगढ़ का प्रशासन अब पंजाब के राज्यपाल के माध्यम से नहीं, बल्कि सीधे राष्ट्रपति द्वारा बनाए गए विनियमों से संचालित होगा।

  • अन्य विधानसभा-रहित UTs के अनुरूप शासन: इसका मतलब है कि चंडीगढ़ का प्रशासन उन केंद्रशासित प्रदेशों जैसा होगा, जिनकी अपनी विधानसभाएं नहीं हैं।

  • स्वतंत्र प्रशासक की नियुक्ति का रास्ता: इससे चंडीगढ़ के लिए पंजाब से अलग एक स्वतंत्र प्रशासक या उपराज्यपाल (LG) नियुक्त करने का मार्ग खुल सकता है।

संवैधानिक और राजनीतिक महत्व

यह कदम प्रशासनिक के साथ-साथ राजनीतिक दृष्टि से भी अहम है—

1. संघीय संवेदनशीलताएँ

चंडीगढ़ लंबे समय से पंजाब और हरियाणा की साझा राजधानी रहा है। अनुच्छेद 240 के तहत लाने से दोनों राज्यों के बीच इसके “अधिकार” को लेकर राजनीतिक बहस बढ़ सकती है।

2. विकेंद्रीकरण बनाम केंद्रीकरण

जहाँ यह संशोधन प्रशासनिक स्पष्टता लाता है, वहीं यह चिंता भी पैदा करता है कि इससे केंद्र के अधिकार और अधिक सशक्त होकर राज्यों के अधिकार कमज़ोर न हो जाएँ।

3. संभावित प्रशासनिक पुनर्गठन

विधेयक पारित होने पर चंडीगढ़ की शासन-व्यवस्था स्थायी रूप से बदल सकती है, और उसका “साझी राजधानी” वाला विशिष्ट दर्जा समाप्त हो सकता है।

मुख्य बिंदु 

  • यह विधेयक अनुच्छेद 240 में संशोधन से संबंधित एक महत्वपूर्ण संवैधानिक पहल है।

  • यह विधानसभा रहित UTs की प्रशासनिक संरचना को और स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है।

  • यह कदम केंद्र–राज्य संबंधों तथा साझा राजधानी वाले शहरों की राजनीतिक स्थिति पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है।

  • यह भारत की बढ़ती संघीय प्रशासनिक सुधारों (federal reforms) की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम है।

भारत, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा ने ACITI पार्टनरशिप शुरू की

भारत, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा की सरकारों ने 22 नवम्बर 2025 को तकनीक और नवाचार के क्षेत्र में त्रिपक्षीय सहयोग को बढ़ावा देने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए ऑस्ट्रेलिया-कनाडा-इंडिया टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन (ACITI) पार्टनरशिप की शुरुआत की घोषणा की। यह साझेदारी महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में रणनीतिक सहयोग का एक नया अध्याय खोलती है, जिसका लक्ष्य तीनों देशों को एक सुरक्षित, सतत और नेट-ज़ीरो भविष्‍य की दिशा में आगे बढ़ाना है। ACITI पहल न केवल तकनीकी प्रगति को गति देगी, बल्कि वैश्विक नवाचार परिदृश्य में इन देशों की सामूहिक भूमिका को भी मजबूत करेगी।

ACITI साझेदारी का उद्देश्य और दृष्टि

ऑस्ट्रेलिया-कनाडा-भारत प्रौद्योगिकी और नवाचार (ACITI) साझेदारी केवल एक राजनयिक पहल नहीं है—यह एक तकनीक-आधारित गठबंधन है, जिसका लक्ष्य तीनों देशों की प्राकृतिक क्षमताओं, रणनीतिक प्राथमिकताओं और नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को एक साथ जोड़ना है। इस साझेदारी के प्रमुख उद्देश्य हैं—

  • महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकियों पर सहयोग को बढ़ाना

  • हरित ऊर्जा नवाचार के विकास और उपयोग का समर्थन करना

  • महत्वपूर्ण खनिजों (क्रिटिकल मिनरल्स) की आपूर्ति शृंखला को विविध और सुरक्षित बनाना

  • जनकल्याण में सुधार के लिए AI के व्यापक उपयोग को प्रोत्साहित करना

  • नेट-ज़ीरो उत्सर्जन प्राप्त करने की दिशा में संयुक्त क्षमता का निर्माण

यह त्रिपक्षीय पहल तीनों देशों के बीच पहले से चल रही द्विपक्षीय पहलों को मज़बूत करती है और व्यापक भू-राजनीतिक तथा आर्थिक तालमेल को दर्शाती है।

मुख्य फोकस क्षेत्र

1. हरित ऊर्जा नवाचार

यह साझेदारी जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करने के लिए स्वच्छ ऊर्जा समाधानों पर विशेष जोर देती है। इसमें शामिल है—

  • सौर, पवन और हाइड्रोजन जैसी नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकियों का संयुक्त विकास

  • डी-कार्बोनाइजेशन नवाचारों में निवेश

  • नेट-ज़ीरो लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सर्वोत्तम प्रथाओं और अनुसंधान का साझा उपयोग

2. महत्वपूर्ण खनिज और आपूर्ति शृंखला मज़बूती

ACITI लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ तत्वों जैसे महत्वपूर्ण खनिजों की पहचान, प्रसंस्करण और उनकी विश्वसनीय उपलब्धता सुनिश्चित करने में सहयोग को बढ़ावा देगा—ये बैटरियों, इलेक्ट्रिक वाहनों और इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए अनिवार्य हैं।

तीनों देश मिलकर—

  • आपूर्ति स्रोतों को विविध बनाएंगे

  • मजबूत और पारदर्शी आपूर्ति शृंखलाएँ विकसित करेंगे

  • भू-राजनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों पर निर्भरता कम करेंगे

3. कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और उभरती प्रौद्योगिकियाँ

भारत, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा संयुक्त रूप से ऐसी रूपरेखाएँ विकसित करेंगे, जिनसे AI समाधानों को जिम्मेदारी से व्यापक स्तर पर लागू किया जा सके। मुख्य फोकस—

  • नैतिक AI को बढ़ावा देना

  • डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर को सशक्त बनाना

  • अगली पीढ़ी की तकनीकों पर संयुक्त अनुसंधान और विकास


समयरेखा और आगे की दिशा

तीनों देशों ने सहमति जताई है कि 2026 की पहली तिमाही में अधिकारी एक साथ मिलकर ACITI साझेदारी के लिए विस्तृत रोडमैप तैयार करेंगे। यह बैठक निम्नलिखित बिंदुओं को निर्धारित करेगी—

  • सहयोग के औपचारिक तंत्र

  • विशिष्ट परियोजनाएँ और वित्तीय मॉडल

  • क्षेत्र-विशेष कार्य समूहों का गठन

इस समयरेखा का उद्देश्य ACITI को एक गतिशील और प्रगतिशील ढांचा बनाना है, जो ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और नवाचार के क्षेत्रों में वास्तविक और सार्थक परिणाम प्रदान करे।

COP30: न्यायसंगत जलवायु कार्रवाई के लिए भारत ने दोहराई प्रतिबद्धता

भारत ने ब्राज़ील के बेलेम में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) के 30वें कॉन्फ्रेंस ऑफ़ द पार्टीज़ (COP30) में एक सशक्त और स्पष्ट संदेश दिया, जिसने जलवायु न्याय, वित्तीय समानता और राष्ट्र-स्वायत्तता पर आधारित वैश्विक सहयोग के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया। 10 से 21 नवंबर 2025 तक चले इस सम्मेलन को वैश्विक जलवायु एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया, विशेषकर जलवायु वित्त, अनुकूलन (एडेप्टेशन) और व्यापार-संबंधी पर्यावरणीय नीतियों के संदर्भ में। भारत के वक्तव्य ने इस बात पर जोर दिया कि जलवायु उपाय निष्पक्ष, न्यायपूर्ण और विकासशील देशों की प्राथमिकताओं के अनुरूप होने चाहिए, ताकि वैश्विक जलवायु कार्रवाई वास्तव में समावेशी और संतुलित बन सके।

भारत का COP30 में मजबूत संदेश

ब्राज़ील के बेलेम में 10 से 21 नवंबर 2025 तक आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा सम्मेलन (UNFCCC) के 30वें पक्षकार सम्मेलन (COP30) में भारत ने जलवायु न्याय, वित्तीय समानता और संप्रभुता-आधारित वैश्विक सहयोग के प्रति अपनी अटूट प्रतिबद्धता को स्पष्ट और प्रभावी रूप से प्रस्तुत किया। यह सम्मेलन विशेष रूप से वित्त, अनुकूलन और पर्यावरण-संबंधी व्यापार नीतियों को आगे बढ़ाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रहा।

जलवायु वित्त पर नया जोर

भारत ने इस तथ्य पर प्रकाश डाला कि 1992 के रियो पृथ्वी सम्मलेन से 33 वर्ष बीत जाने के बावजूद विकसित देशों ने अभी भी कई मूलभूत प्रतिज्ञाएँ पूरी नहीं की हैं, खासकर विकासशील देशों के लिए वित्तीय सहायता के मामले में।

COP30 में भारत ने पेरिस समझौते के अनुच्छेद 9.1 पर दिए गए नए ध्यान का स्वागत किया, जो विकसित देशों पर यह कानूनी दायित्व लगाता है कि वे विकासशील देशों की शमन (mitigation) और अनुकूलन (adaptation) ज़रूरतों के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय वित्त उपलब्ध कराएं।

भारत ने ज़ोर दिया कि यह दान नहीं, बल्कि ऐतिहासिक उत्सर्जन और स्वीकृत वैश्विक सिद्धांतों के आधार पर बना न्यायोचित दायित्व है। भारत ने अपील की कि अब वैश्विक समुदाय इन अधूरे वादों को पूरा करने के लिए ठोस कदम उठाए।

न्यायपूर्ण संक्रमण तंत्र 

भारत ने नए गठित जस्ट ट्रांज़िशन मैकेनिज़्म का स्वागत किया और इसे एक ऐतिहासिक कदम बताया। इसका उद्देश्य उन देशों और समुदायों का समर्थन करना है जो कम-कार्बन अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं, ताकि यह परिवर्तन:

  • न्यायपूर्ण और समावेशी हो,

  • कमजोर समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित करे,

  • और आवश्यक सामाजिक-वित्तीय सहायता प्रदान करे।

भारत ने कहा कि जलवायु परिवर्तन का संक्रमण असमानता को न बढ़ाए, बल्कि हरित विकास और साझा समृद्धि का अवसर बने।


एकतरफा जलवायु-संबंधी व्यापार अवरोधों का विरोध

भारत ने एक उभरती हुई चिंता को जोरदार तरीके से उठाया—एकतरफा जलवायु-आधारित व्यापार अवरोध, जैसे कार्बन सीमा कर (carbon border taxes) या जलवायु टैरिफ़। भारत ने कहा कि ऐसे कदम:

  • CBDR-RC सिद्धांत का उल्लंघन करते हैं,

  • विकासशील देशों पर अनुचित बोझ डालते हैं,

  • वैश्विक व्यापार को बाधित करते हैं, और

  • बहुपक्षीय जलवायु कूटनीति को कमजोर करते हैं।

भारत ने COP30 की अध्यक्षता को धन्यवाद दिया कि इस मुद्दे को खुले तौर पर उठाने का अवसर दिया गया। भारत ने कहा कि जलवायु सहयोग जोर-जबर्दस्ती पर नहीं, बल्कि साझेदारी पर आधारित होना चाहिए।

सबसे कमजोर देशों की सुरक्षा को प्राथमिकता

भारत ने दोहराया कि जो देश जलवायु परिवर्तन में सबसे कम योगदान देते हैं, उन्हें सबसे अधिक बोझ नहीं उठाना चाहिए। भारत ने कहा कि:

  • सबसे अधिक संवेदनशील आबादी विकासशील देशों में रहती है,

  • अनुकूलन की ज़रूरतें लगातार बढ़ रही हैं,

  • और विश्व को अधिक वित्तीय और तकनीकी सहायता उपलब्ध करानी चाहिए।

भारत का स्पष्ट संदेश है — जलवायु न्याय की शुरुआत कमजोरों की रक्षा से होती है।

नियम-आधारित और न्यायपूर्ण वैश्विक व्यवस्था के प्रति भारत की प्रतिबद्धता

भारत ने कहा कि वैश्विक जलवायु शासन:

  • विज्ञान आधारित,

  • राष्ट्रों की परिस्थितियों के प्रति संवेदनशील,

  • और समानता पर आधारित होना चाहिए।

भारत ने सभी पक्षों के साथ मिलकर ऐसा वैश्विक ढांचा मजबूत करने की इच्छा व्यक्त की जो विकासशील देशों को हाशिये पर न रखकर उन्हें सशक्त बनाए।

स्थिर तथ्य (Static Facts)

UNFCCC और COP के बारे में

  • UNFCCC: 1992 में अपनाया गया, 1994 में लागू हुआ।

  • 198 पक्षकार — लगभग सार्वभौमिक सदस्यता।

  • COP: UNFCCC का सर्वोच्च निर्णय-निर्धारण मंच।

रियो अर्थ सम्मलेन 1992

जिसे UNCED 1992 भी कहा जाता है, इसने तीन प्रमुख वैश्विक समझौते दिए:

  1. UNFCCC

  2. जैव विविधता कन्वेंशन (CBD)

  3. मरुस्थलीकरण रोकथाम कन्वेंशन (UNCCD)

इसीने CBDR-RC सिद्धांत की अवधारणा प्रस्तुत की।

जलवायु वित्त (Climate Finance)

  • विकसित देशों ने COP15 (कोपेनहेगन, 2009) में प्रतिवर्ष 100 बिलियन डॉलर जुटाने का वादा किया था।

  • यह लक्ष्य अब भी अधूरा है और प्रमुख विवाद का विषय है।

धर्मेंद्र का 89 साल की उम्र में निधन, जानें सबकुछ

बॉलीवुड के ही-मैन कहे जाने वाले दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र ने 89 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया है। धर्मेंद्र के निधन से देओल परिवार समेत पूरे सिनेमा जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। उम्र संबंधी बीमारियों के चलते धर्मेंद्र पिछले कुछ वक्त मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती रहे। इसके बाद घर पर उनका इलाज चल रहा था। लेकिन अब उनके निधन की खबर सामने आई है। प्रोड्यूसर करण जौहर ने सोशल मीडिया पोस्ट करके दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र के निधन की जानकारी दी।

बॉलीवुड के मूल ‘ही-मैन’ और भारतीय सिनेमा के सबसे प्रिय सितारों में से एक के रूप में पहचाने जाने वाले धर्मेन्द्र ने छह दशकों से अधिक लंबे करियर में अद्वितीय विरासत स्थापित की। उनके जाने के साथ ही एक युग का अंत हो गया है। “बॉलीवुड के ही-मैन” के रूप में प्रसिद्ध धर्मेन्द्र केवल एक लोकप्रिय अभिनेता ही नहीं, बल्कि शक्ति, आकर्षण और दृढ़ता के प्रतीक भी थे। उनका निधन भारतीय सिनेमा में अपूरणीय रिक्तता छोड़ गया है।

लंबे समय से बीमार थे धर्मेंद्र

8 दिसंबर 1935 को जन्मे धर्मेंद्र कुछ दिन पहले ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती थे। कई दिनों तक अस्पताल में इलाज चला। इसके बाद उनका इलाज घर पर ही किया जाने लगा। लेकिन वक्त के साथ तबीयत नहीं सुधरी और आज सोमवार यानी 24 नवंबर 2025 को धर्मेंद्र का निधन हो गया।

प्रारंभिक जीवन और करियर की शुरुआत

धर्मेंद्र का जन्म पंजाब के लुधियाना में धर्मेंद्र केवल कृष्ण देओल के रूप में हुआ था।
पहली फ़िल्म: उन्होंने 1960 में फ़िल्म “दिल भी तेरा हम भी तेरे” से अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत की। शुरुआती दौर में उनका सफ़र साधारण रहा, लेकिन उनकी रौबदार पर्सनैलिटी, आकर्षक व्यक्तित्व और दमदार स्क्रीन प्रेज़ेंस ने जल्द ही उन्हें दर्शकों के बीच लोकप्रिय बना दिया।

धर्मेंद्र की शुरुआती फ़िल्मों ने उन्हें एक उभरते हुए सितारे के रूप में स्थापित किया, लेकिन आने वाले वर्षों में उनकी अदाकारी, एक्शन और रोमांस की अनोखी शैली ने उन्हें एक सुपरस्टार के रूप में मज़बूती से स्थापित कर दिया।

धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म होगी ‘इक्कीस’

89 साल की उम्र में भी धर्मेंद्र एक्टिंग में सक्रिय थे। अमिताभ बच्चन के नाती अगस्त्य नंदा की आगामी फिल्म ‘इक्कीस’ इस दिग्गज अभिनेता की आखिरी फिल्म होगी। फिल्म ‘इक्कीस’ की कहानी एक यंग आर्मी ऑफिसर अरुण खेतरपाल की है। महज 21 साल की उम्र में देश के लिए इस सैन्य अधिकारी ने बलिदान दिया था। फिल्म में अभिनेता धर्मेंद्र ने आर्मी ऑफिसर के पिता का किरदार निभाया।

प्रतिष्ठित भूमिकाएँ और करियर की प्रमुख उपलब्धियाँ

बॉलीवुड के “ही-मैन”: धमेन्द्र ने अपने दमदार एक्शन दृश्यों, साहसिक किरदारों और अडिग व्यक्तित्व के कारण “ही-मैन” का खिताब हासिल किया। उनकी उपस्थिति मात्र से पर्दे पर शक्ति और करिश्मा झलकता था।

प्रमुख फ़िल्में:

  • यादों की बारात (1973) – एक मील का पत्थर साबित हुई फ़िल्म, जिसमें संगीत, भावनाएँ और रोमांच का अनोखा संगम देखने को मिला।

  • मेरा गाँव मेरा देश (1971) – इस फ़िल्म ने उनके अभिनय कौशल और बहुमुखी प्रतिभा को नए आयाम दिए।

  • फूल और पत्थर (1966) – शुरुआती सफल फ़िल्मों में से एक, जिसने उन्हें उद्योग में मज़बूत पहचान दिलाई।

  • बेताब (1983) – इस फ़िल्म के माध्यम से उनके बेटे सनी देओल ने बॉलीवुड में पदार्पण किया।

  • घायल (1990) – एक दमदार एक्शन फ़िल्म जिसने उन्हें आलोचकों की सराहना दिलाई और भारतीय सिनेमा में उनकी महान स्थिति को और मजबूत किया।

व्यक्तिगत जीवन: दो प्रेमों की कहानी

धर्मेन्द्र का निजी जीवन भी उतना ही चर्चित रहा जितना उनका फ़िल्मी करियर। उन्होंने 1954 में मात्र 19 वर्ष की उम्र में प्रकाश कौर से विवाह किया था, जब वे फ़िल्म उद्योग में प्रवेश भी नहीं किए थे। बाद में वे अभिनेत्री हेमा मालिनी के प्रेम में पड़े और उनसे विवाह किया, जिससे वे बॉलीवुड के सबसे प्रतिष्ठित और चर्चित जोड़ों में से एक बन गए।

बच्चे: धर्मेन्द्र की विरासत उनके बच्चों के माध्यम से आज भी जीवित है। उनके बेटे सनी देओल और बॉबी देओल बॉलीवुड के प्रसिद्ध अभिनेता हैं। वहीं उनकी बेटियाँ ईशा देओल और अहाना देओल अभिनय और फ़िल्म निर्माण से जुड़ी रही हैं। धर्मेन्द्र की पहली पत्नी प्रकाश कौर से उनकी दो और बेटियाँ—अजीता और विजेता—भी हैं।

सम्मान और पहचान

अपने लंबे फ़िल्मी करियर के दौरान धर्मेन्द्र को अनेक प्रतिष्ठित सम्मान मिले, जिनमें प्रमुख हैं:

  • पद्म भूषण (2012): भारत सरकार का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान

  • फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार: सर्वश्रेष्ठ अभिनेता सहित कई नामांकन और सम्मान

वे केवल अभिनय के लिए ही नहीं बल्कि भारतीय फ़िल्म उद्योग को आकार देने में अपने योगदान के लिए भी सराहे जाते रहे।

बॉलीवुड के ‘ही-मैन’ की विरासत

धर्मेन्द्र ने पाँच दशकों से अधिक समय तक भारतीय सिनेमा में योगदान दिया और अपने दमदार एक्शन किरदारों की वजह से उन्हें ‘ही-मैन ऑफ़ बॉलीवुड’ कहा गया। उनकी अदाकारी और व्यक्तित्व ने पीढ़ियों को प्रभावित किया और वे भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम युग के प्रतीक बन गए।

उनकी गर्मजोशी, सादगी और अभिनय के प्रति गहरा समर्पण हमेशा याद किया जाएगा। धर्मेन्द्र की विरासत आने वाले कलाकारों और फ़िल्मकारों को प्रेरित करती रहेगी।

विरासत और अंतिम फ़िल्म

89 वर्ष की उम्र में भी धर्मेन्द्र सोशल मीडिया पर सक्रिय थे। वे अपने खेतों पर काम करते हुए वीडियो पोस्ट करते थे, ट्रैक्टर चलाते दिखते थे, जीवनशैली और स्वास्थ्य संबंधी सुझाव साझा करते थे, और लोगों को सरल, देसी और जैविक जीवन जीने के लिए प्रेरित करते थे।

उनकी अंतिम फ़िल्म “इक्कीस (Ikkis)” 25 दिसंबर 2025 को रिलीज़ होगी। यह फ़िल्म उनके चमकदार और ऐतिहासिक करियर के लिए एक उपयुक्त विदाई मानी जा रही है।

परिवार

धर्मेन्द्र अपने पीछे एक बड़ा और प्रतिष्ठित परिवार छोड़ गए हैं। वे अपनी दोनों पत्नियों—प्रकाश कौर और हेमा मालिनी—और अपने सभी बच्चों से घिरे रहे। देओल परिवार बॉलीवुड की सबसे सम्मानित फ़िल्मी विरासतों में से एक है, और धर्मेन्द्र के निधन से इस परिवार और पूरी फ़िल्म इंडस्ट्री में एक युग का अंत हो गया है।

परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य 

  • पूरा नाम: धर्मेन्द्र देओल

  • निधन तिथि: 10 नवंबर 2025

  • उम्र: 89 वर्ष

  • प्रसिद्ध फ़िल्में: शोले, फूल और पत्थर, चुपके चुपके

  • उपनाम: ही-मैन ऑफ़ बॉलीवुड

  • फ़िल्मों की संख्या: 300 से अधिक

  • महत्वपूर्ण पुरस्कार: फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड, पद्म भूषण (2012)

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