भारत एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक आयोजन की मेज़बानी करने जा रहा है, जो अरब दुनिया के साथ उसके नए सिरे से बढ़ते जुड़ाव को दर्शाता है। 31 जनवरी, 2026 को नई दिल्ली में दूसरी भारत–अरब विदेश मंत्रियों की बैठक (Foreign Ministers’ Meeting – FMM) आयोजित की जाएगी, जो लगभग एक दशक के अंतराल के बाद फिर से हो रही है। भारत और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की सह-अध्यक्षता में होने वाली इस बैठक में अरब लीग के सदस्य देशों के विदेश मंत्री भाग लेंगे। बदलते वैश्विक और क्षेत्रीय परिदृश्य के बीच यह आयोजन पश्चिम एशिया के साथ भारत की गहराती राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक साझेदारी की महत्वाकांक्षा को रेखांकित करता है।
भारत–अरब विदेश मंत्रियों की बैठक के बारे में
- भारत–अरब विदेश मंत्रियों की बैठक भारत और अरब लीग के बीच एक उच्चस्तरीय संवाद तंत्र है।
- यह राजनीतिक संवाद, रणनीतिक समन्वय और बहु-क्षेत्रीय सहयोग के लिए एक सामूहिक मंच प्रदान करती है।
- इस बैठक में अरब लीग के सदस्य देशों के विदेश मंत्रियों के साथ-साथ अरब लीग के महासचिव भी भाग लेते हैं।
- इस प्रारूप का पुनर्जीवन भारत की उस मंशा को दर्शाता है, जिसके तहत वह द्विपक्षीय संबंधों से आगे बढ़कर अरब दुनिया के साथ बहुपक्षीय और संस्थागत सहयोग को मजबूत करना चाहता है।
यूएई सह-अध्यक्ष क्यों है
- भारत के साथ इस बैठक की सह-अध्यक्षता संयुक्त अरब अमीरात द्वारा किया जाना दोनों देशों के गहरे रणनीतिक संबंधों को दर्शाता है।
- यूएई मध्य पूर्व में भारत के सबसे महत्वपूर्ण साझेदारों में से एक बनकर उभरा है, जहां व्यापार, ऊर्जा, निवेश, प्रवासी समुदाय और रक्षा सहयोग के मजबूत संबंध हैं।
- इस बैठक की सह-अध्यक्षता यूएई को अरब समूह के भीतर नेतृत्व की भूमिका देती है और भारत–अरब सहयोग को आगे बढ़ाने में उसकी सेतु-भूमिका को दर्शाती है।
- यह भारत की व्यापक पश्चिम एशिया नीति के अनुरूप भी है, जिसमें वह क्षेत्रीय स्थिरता के प्रमुख स्तंभ देशों के साथ मिलकर काम करता है।
10 वर्षों के अंतराल का महत्व
- दूसरी भारत–अरब विदेश मंत्रियों की बैठक पहली बैठक के 10 वर्ष बाद आयोजित हो रही है, जो 2016 में बहरीन में हुई थी।
- उस पहली बैठक में भारत और अरब देशों ने पांच प्राथमिक क्षेत्रों की पहचान की थी—अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, शिक्षा, मीडिया और संस्कृति।
- हालांकि, क्षेत्रीय अस्थिरता, वैश्विक संकटों और बदलती कूटनीतिक प्राथमिकताओं के कारण इस प्रक्रिया की गति धीमी हो गई।
- इस बैठक का पुनरारंभ दोनों पक्षों की नई राजनीतिक इच्छाशक्ति को दर्शाता है और यह भी संकेत देता है कि भारत के आर्थिक उदय तथा अरब देशों के विविधीकरण प्रयास अब साझेदारी के लिए अधिक मजबूत आधार प्रदान करते हैं।
बैठक के प्रमुख एजेंडा क्षेत्र
- दूसरी बैठक में पहले पहचाने गए पांच प्राथमिक क्षेत्रों को आगे बढ़ाया जाएगा। आर्थिक सहयोग में व्यापार विस्तार, निवेश और आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती पर जोर रहेगा।
ऊर्जा से जुड़े विमर्श में तेल और गैस के साथ-साथ नवीकरणीय ऊर्जा और ग्रीन हाइड्रोजन शामिल होने की संभावना है। - शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में लोगों के बीच संपर्क, छात्र आदान-प्रदान और सांस्कृतिक समझ को बढ़ावा देने पर ध्यान दिया जाएगा।
- मीडिया सहयोग के तहत सूचना के आदान-प्रदान और दुष्प्रचार से निपटने पर चर्चा हो सकती है। कुल मिलाकर, यह एजेंडा प्रतीकात्मक कूटनीति से आगे बढ़कर व्यावहारिक और परिणामोन्मुखी सहयोग की दिशा में संकेत करता है।
अरब दुनिया से व्यापक भागीदारी
- इस बैठक में अरब जगत के अनेक देशों की भागीदारी देखने को मिलेगी।
- सोमालिया, फिलिस्तीन, कोमोरोस और सूडान सहित कई देशों के विदेश मंत्री, साथ ही अरब लीग के महासचिव, नई दिल्ली में चर्चाओं में हिस्सा ले रहे हैं।
यह व्यापक प्रतिनिधित्व इस मंच के पैन-अरब स्वरूप को उजागर करता है। - साथ ही, यह क्षेत्र के प्रति भारत के संतुलित दृष्टिकोण को भी दर्शाता है, जिसमें वह खाड़ी देशों, उत्तरी अफ्रीका और हॉर्न ऑफ अफ्रीका—सभी से एक साझा कूटनीतिक ढांचे के तहत जुड़ता है।


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