विश्व बैंक समूह (World Bank Group) ने अगले पाँच वर्षों तक हर वर्ष 8–10 अरब अमेरिकी डॉलर की बड़ी वित्तीय सहायता भारत को देने की घोषणा की है। यह सहायता हाल ही में स्वीकृत कंट्री पार्टनरशिप फ्रेमवर्क (CPF) के तहत प्रदान की जाएगी, जिसका उद्देश्य भारत की आर्थिक वृद्धि को तेज़ करना और 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य को समर्थन देना है। यह घोषणा भारत की आर्थिक नीतियों और विकास पथ में गहरे वैश्विक विश्वास को दर्शाती है तथा भारत की भूमिका को एक महत्वपूर्ण वैश्विक विकास इंजन के रूप में रेखांकित करती है।
कंट्री पार्टनरशिप फ्रेमवर्क (CPF) क्या है?
कंट्री पार्टनरशिप फ्रेमवर्क (CPF) भारत और विश्व बैंक समूह के बीच सहयोग को दिशा देने वाला एक रणनीतिक रोडमैप है। नया CPF उन प्राथमिक क्षेत्रों को परिभाषित करता है जहाँ वित्तीय सहायता, तकनीकी सहयोग और वैश्विक विशेषज्ञता को एक साथ जोड़कर बड़े पैमाने पर विकासात्मक परिणाम हासिल किए जाएंगे। वित्त मंत्रालय के अनुसार, यह फ्रेमवर्क पूरी तरह से ‘विकसित भारत’ विज़न के अनुरूप है और इसका उद्देश्य केवल परियोजनाओं को धन उपलब्ध कराना ही नहीं, बल्कि संस्थागत मजबूती, वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं का साझा उपयोग तथा दीर्घकालिक सतत विकास सुनिश्चित करना भी है।
भारत का रुख: केवल वित्तपोषण से आगे की साझेदारी
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कंट्री पार्टनरशिप फ्रेमवर्क (CPF) का स्वागत करते हुए कहा कि भारत विकास साझेदारी को केवल धन तक सीमित नहीं मानता। उन्होंने ज्ञान साझा करने, तकनीकी सहायता और विश्व बैंक समूह के वैश्विक अनुभव के महत्व पर ज़ोर दिया। वित्त मंत्री ने यह भी रेखांकित किया कि सार्वजनिक धन को निजी पूंजी के साथ जोड़ना तथा ग्रामीण और शहरी भारत में रोजगार सृजन बड़े स्तर पर प्रभाव हासिल करने की कुंजी होगा। ये चर्चाएँ उस समय हुईं जब विश्व बैंक के अध्यक्ष के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने नई दिल्ली में उनसे मुलाकात की।
निजी क्षेत्र के नेतृत्व में रोजगार सृजन पर केंद्रित साझेदारी
नए भारत–विश्व बैंक साझेदारी के केंद्र में निजी क्षेत्र द्वारा संचालित रोजगार सृजन है। हर वर्ष लगभग 1.2 करोड़ युवा भारत के श्रम बाज़ार में प्रवेश करते हैं, जिससे रोजगार सृजन एक राष्ट्रीय प्राथमिकता बन गया है। CPF का उद्देश्य उन क्षेत्रों में निजी निवेश को प्रोत्साहित करना है जहाँ बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित हो सकते हैं। इसके तहत सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए बाधाएँ कम करना, कौशल उन्नयन, तथा युवाओं और महिलाओं के लिए अवसरों का विस्तार शामिल है, ताकि आर्थिक वृद्धि को अर्थपूर्ण और टिकाऊ रोजगार में बदला जा सके।
साझेदारी के चार रणनीतिक परिणाम
कंट्री पार्टनरशिप फ्रेमवर्क (CPF) चार व्यापक रणनीतिक परिणामों पर केंद्रित है। इनमें ग्रामीण समृद्धि और लचीलापन बढ़ाना, शहरी परिवर्तन और रहने योग्य शहरों को बढ़ावा देना, मानव संसाधन में निवेश के साथ ऊर्जा सुरक्षा और प्रमुख बुनियादी ढाँचे को सुदृढ़ करना, तथा समग्र आर्थिक और जलवायु लचीलापन मजबूत करना शामिल है। यह फ्रेमवर्क 2023 के बाद विश्व बैंक समूह द्वारा किए गए आंतरिक सुधारों से भी लाभान्वित है, जिनका उद्देश्य संस्था को अधिक तेज़, सरल और प्रभाव-केंद्रित बनाना है। इनमें से कई सुधारों को भारत की G20 अध्यक्षता के दौरान दिशा मिली।
विश्व बैंक: संक्षिप्त परिचय
| शीर्षक | विवरण |
| परिभाषा एवं उद्देश्य (Definition & Purpose) | एक वैश्विक विकास संस्था, जो वित्तीय सहायता, तकनीकी सहयोग और शोध प्रदान करती है। दुनिया भर में गरीबी उन्मूलन, शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढाँचा, सुशासन और जलवायु कार्रवाई को बढ़ावा देना इसका प्रमुख उद्देश्य है। |
| मुख्यालय (Headquarters) | वॉशिंगटन डी.सी., संयुक्त राज्य अमेरिका |
| इतिहास (History) | 1944 में ब्रेटन वुड्स सम्मेलन (न्यू हैम्पशायर, अमेरिका) में स्थापना। IBRD के Articles of Agreement को 27 दिसंबर 1945 को अनुमोदन। 25 जून 1946 से कार्य प्रारंभ। प्रारंभ में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पुनर्निर्माण पर केंद्रित; बाद में विकास, गरीबी उन्मूलन, अवसंरचना, मानव पूंजी और संस्थागत सुधारों तक विस्तार। |
| उद्देश्य / मिशन (Objectives / Mission) | अत्यधिक गरीबी का अंत और साझा समृद्धि को बढ़ावा देना। ऋण, अनुदान और जोखिम गारंटी प्रदान करना। तकनीकी सहायता, नीतिगत सलाह और क्षमता निर्माण। सड़क, बिजली, जल जैसी बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं को समर्थन। निजी क्षेत्र के नेतृत्व वाले विकास को प्रोत्साहन (IFC व MIGA के माध्यम से)। शोध और डेटा विश्लेषण के ज़रिये ज्ञान का सृजन और साझा करना। |
| संरचना (Structure) | विश्व बैंक समूह की मुख्य संस्थाएँ: IBRD – मध्यम आय व साख योग्य निम्न आय देशों को ऋण; वित्तीय बाज़ारों से पूंजी जुटाता है। IDA – सबसे गरीब देशों को रियायती ऋण व अनुदान; दाता देशों द्वारा वित्तपोषित।समर्थक संस्थाएँ: IFC – निजी क्षेत्र विकास; निवेश, इक्विटी व परामर्श सेवाएँ। MIGA – राजनीतिक जोखिम बीमा; विदेशी निवेश को प्रोत्साहन। ICSID – निवेश विवादों का मध्यस्थता के माध्यम से समाधान। |
| वित्तपोषण तंत्र (Funding Mechanism) | सदस्य देशों के अंशदान (Paid-in Capital) और अंतरराष्ट्रीय बॉन्ड के माध्यम से पूंजी जुटाता है। शेयरधारक पूंजी का कुशल उपयोग कर सीमित योगदान से बड़े पैमाने पर ऋण/अनुदान। अधिशेष आय का उपयोग IDA के रियायती ऋण हेतु। |


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