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WEF ने Global Risks Report 2023 जारी की

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की वार्षिक ‘Global Risks Report’ ने जीवन यापन की लागत के संकट (cost of living crisis) को सबसे बड़े अल्पकालिक जोखिम के रूप में उजागर किया है, जो जलवायु परिवर्तन के साथ सबसे बड़ा दीर्घकालिक खतरा है। इस वर्ष के संस्करण का निर्माण पेशेवर सेवा फर्म मार्श मैक्लेनन और ज्यूरिख इंश्योरेंस ग्रुप के साथ किया गया है।

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रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक स्तर पर अल्पावधि (2 वर्ष) में सबसे बड़ा जोखिम आजीविका संकट, प्राकृतिक आपदाओं और मौसम से जुड़ी चरम घटनाओं, भू-आर्थिक टकराव, जलवायु परिवर्तन को कम करने में विफलता और बड़े पैमाने पर पर्यावरणीय क्षति की घटनाएं हैं। लंबी अवधि (10 वर्ष) के सबसे बड़े जोखिमों में जलवायु परिवर्तन को रोकने की विफलता और जलवायु परिवर्तन के साथ अनुकूलन, जैव विविधता की हानि, बड़े पैमाने पर अनैच्छिक प्रवासन और प्राकृतिक संसाधन के संकट शामिल हैं।

 

उच्च ऋण भार को कम करने की कोशिश

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि यूक्रेन में रूस के युद्ध और कोविड-19 महामारी ने ऊर्जा संकट, भोजन की कमी और मुद्रास्फीति को सबसे अधिक दबाव वाले वैश्विक मुद्दों के रूप में प्रेरित किया है। सरकारें अब जीवन यापन की लागत के संकट के प्रभाव को कम करने की दिशा में काम कर रही हैं, साथ ही बढ़ती मुद्रास्फीति से बचाने और ऐतिहासिक रूप से उच्च ऋण भार को कम करने की कोशिश कर रही हैं।

 

जलवायु परिवर्तन के साथ शामिल

 

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया को “पारिस्थितिक संकट” (ecological breakdown) और निरंतर ग्लोबल वार्मिंग से बचने के लिए अगले दशक में जलवायु शमन और अनुकूलन पर अधिक प्रभावी ढंग से सहयोग करना चाहिए। अन्य जोखिमों में प्राकृतिक आपदाएं, भू-आर्थिक टकराव, सामाजिक सामंजस्य का क्षरण, व्यापक साइबर अपराध, बड़े पैमाने पर अनैच्छिक प्रवासन, और प्राकृतिक संसाधन संकट, जलवायु परिवर्तन के साथ शामिल हैं। साइबर अपराध और प्रवासन भी दीर्घकालिक जोखिमों के रूप में दिखाई दिए।

 

रिपोर्ट में कहा गया है कि इसका सामना अगले 2 साल के दौरान करना पड़ेगा और आयात पर निर्भर बाजारों पर इसका असर अधिक होगा। इसमें कहा गया है कि सामाजिक अशांति और राजनीतिक अस्थिरता न सिर्फ उभरते बाजारों पर असल डाल रहा है, बल्कि विकसित अर्थव्यवस्थाएं भी इससे प्रभावित हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि कोविड-19 और यूक्रेन में युद्ध के आर्थिक प्रभाव के कारण आसमान छूती महंगाई, मौद्रिक नीतियों के तेजी से सामान्यीकरण के बीच कम-विकास और कम-निवेश के युग की शुरुआत हुई है।

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vikash

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