सालूमरदा थिमक्का का जीवन भारत में पर्यावरण संरक्षण का सबसे प्रेरक उदाहरण माना जाता है। 114 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया, लेकिन वे पीछे एक ऐसी विरासत छोड़ गईं जो प्रेम, धैर्य और प्रकृति से गहरे जुड़ाव पर आधारित है। कर्नाटक की सड़कों पर सैकड़ों बरगद के वृक्ष लगाने और पालने के उनके कार्य ने साबित किया कि दृढ़ संकल्प के साथ एक साधारण व्यक्ति भी धरती को हराभरा बना सकता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन सकता है।
थिमक्का का जन्म कर्नाटक के तुमकूरु ज़िले के गुब्बी तालुक में हुआ था। साधारण परिवार, सीमित शिक्षा और आर्थिक कठिनाइयों के बीच पले-बढ़े होने के बावजूद वे ग्रामीण मूल्यों और प्रकृति से जुड़ी रहीं।
मुख्य बिंदु
जन्म: तुमकूरु ज़िले में एक सामान्य परिवार में
विवाह: हुलेकल गांव के बिक्कल चिक्कैय्या से
निःसंतानता ने उनके पर्यावरण मिशन की प्रेरणा का रूप लिया
अपनी व्यक्तिगत पीड़ा को मिशन में बदलते हुए थिमक्का और उनके पति ने कई दशकों तक कुदूर से हुलेकल के बीच राज्य राजमार्ग 94 (SH-94) पर 385 बरगद के पेड़ लगाए और बच्चों की तरह उनकी देखभाल की।
वृक्षारोपण का महत्व
पेड़ों को पानी, सुरक्षा और संरक्षण के लिए समर्पित जीवन
प्रमुख राजमार्ग पर हरित आवरण में वृद्धि
इसी काम के लिए मिला उपनाम: “सालूमरदा” (कन्नड़ में अर्थ: पेड़ों की कतार)
शिक्षा न होने के बावजूद थिमक्का के असाधारण योगदान ने उन्हें भारत की सबसे सम्मानित पर्यावरण कार्यकर्ताओं की सूची में शामिल कर दिया।
मुख्य सम्मान
पद्मश्री (2019) — सामाजिक कार्य व पर्यावरण संरक्षण के लिए
कई राज्य और राष्ट्रीय पर्यावरण पुरस्कार
पारिस्थितिकी में योगदान के लिए मानद डॉक्टरेट
लोकप्रिय उपनाम: “वृक्ष माता” (Mother of Trees)
अंतिम महीनों में थिमक्का कमजोरी और भूख कम होने के कारण कई बार अस्पताल में भर्ती हुईं। हल्का सुधार होने के बावजूद उन्होंने 14 नवंबर 2025 को बेंगलुरु स्थित एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली।
उनके निधन पर नेताओं, पर्यावरणविदों और नागरिकों ने गहरा शोक व्यक्त किया।
मुख्य प्रतिक्रियाएँ
कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने उन्हें “अमर” कहा और उनके कार्यों की अनूठी सेवा का स्मरण किया
पर्यावरण मंत्री ईश्वर खंड्रे ने कहा कि थिम्मक्का ने बिना औपचारिक शिक्षा के भी दुनिया को बड़ा संदेश दिया
पूरे कर्नाटक में लोग उन्हें सामुदायिक पर्यावरण संरक्षण की प्रेरणा के रूप में याद कर रहे हैं
थिमक्का का जीवन आज भी स्कूलों, आंदोलनों, नीतियों और समुदायों को प्रेरित करता है।
उनकी विरासत में शामिल हैं:
आज भी फल-फूल रहे 385 बरगद के पेड़
उनके नाम पर बने बॉटनिकल गार्डन और शहरी वन
पर्यावरण के प्रति सामुदायिक जागरूकता का बढ़ता अभियान
यह संदेश कि एक व्यक्ति भी पर्यावरण में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है
एलेना रिबाकिना ने मेलबर्न में खेले गए ऑस्ट्रेलियन ओपन 2026 के महिला एकल फाइनल में…
एक शोध दल ने बताया है कि उन्होंने प्रयोगशाला में चूहों में अग्नाशय कैंसर (Pancreatic…
भारत का कृषि क्षेत्र एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है, जहाँ अब केवल…
गुजरात ने ग्रामीण शासन को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की है।…
भारत का बहुप्रतीक्षित मानव अंतरिक्ष उड़ान सपना अब अपने सबसे निर्णायक चरण में प्रवेश कर…
जनवरी 2026 के मध्य में लद्दाख के हानले क्षेत्र के ऊपर रात का आसमान अचानक…